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पाठक के नाम पत्र
[लेखक द्वारा संशोधित अन्तिम संस्करण के आरम्भ में जोड़ा गया।]
इस ग्रन्थ के पहले संस्करण में, उस सफलता की मुझे ज़रा भी आशा न थी जो परमेश्वर ने अपनी असीम भलाई से इसे दी, इसलिए मैंने अपना कार्य अधिकतर बेमन से किया (जैसा छोटे-मोटे उपक्रमों में प्रायः होता है); परन्तु जब मैंने जाना कि लगभग सभी भक्तों ने इसे ऐसी कृपा से ग्रहण किया जिसे माँगने का भी मुझे कभी साहस न हुआ था, आशा करना तो दूर की बात थी, तो जितना सच्चे मन से मैं जानता था कि यह स्वागत मेरी योग्यता से बढ़कर है, उतना ही अधिक मैंने सोचा कि मेरी कृतघ्नता बड़ी होगी यदि मैं उन अति दयालु इच्छाओं का, जो मेरे प्रति प्रकट की गई थीं और मानो स्वयं मुझे परिश्रम के लिए बुला रही थीं, अपनी तुच्छ सामर्थ्य के अनुसार भी उत्तर देने का यत्न न करूँ। यह मैंने केवल दूसरे संस्करण में ही नहीं किया, वरन् उसके बाद के हर संस्करण में ग्रन्थ कुछ न कुछ सुधरता रहा। परन्तु यद्यपि पहले किए गए परिश्रम पर मुझे खेद नहीं, मुझे तब तक सन्तोष न हुआ जब तक ग्रन्थ उस क्रम में न सजाया गया जिसमें वह अब दिखाई देता है। अब मुझे आशा है कि यह मेरे सब पाठकों के विवेक को भाएगा। इस बात का स्पष्ट प्रमाण कि परमेश्वर की कलीसिया की यह सेवा करने में मैंने कितने परिश्रम से काम किया है, मैं यह बता सकता हूँ कि पिछली सर्दी में, जब मैं सोचता था कि चौथैया ज्वर से मर रहा हूँ, तब रोग जितना बढ़ता गया उतना ही मैंने अपने आप को न बख़्शा, ताकि यह पुस्तक अपने पीछे छोड़ जाऊँ और भक्तों की उनके दयालु आग्रह के बदले कुछ भरपाई कर सकूँ। मैं इसे और पहले देना चाहता था, परन्तु यदि अच्छा हो तो वह समय पर ही है। जब मैं देखूँगा कि यह परमेश्वर की कलीसिया के लिए पहले से अधिक लाभदायक है, तब मैं मानूँगा कि यह उचित समय पर प्रकट हुआ। मेरी एकमात्र कामना यही है।
और सचमुच मेरी बड़ी दुर्दशा होती यदि मैं केवल परमेश्वर की स्वीकृति से सन्तुष्ट न रहकर, अज्ञानियों की मूर्खतापूर्ण और हठीली निन्दाओं, तथा अधर्मियों की द्वेषपूर्ण और अन्यायी निन्दाओं को तुच्छ न जान पाता। क्योंकि यद्यपि परमेश्वर की कृपा से मेरी सबसे प्रबल अभिलाषा उसके राज्य को बढ़ाने और जनहित को आगे बढ़ाने की रही है,—और मैं भली-भाँति जानता हूँ, और परमेश्वर तथा उसके स्वर्गदूतों को साक्षी ठहराता हूँ कि जब से मैंने कलीसिया में 25 शिक्षक का कार्य सँभालना आरम्भ किया, तब से मेरा एकमात्र उद्देश्य भक्ति की शुद्ध शिक्षा को थामे रखकर कलीसिया का भला करना रहा है,—फिर भी मैं मानता हूँ कि मुझ से अधिक निन्दा से घिरा, डसा और फाड़ा गया कोई मनुष्य कभी नहीं हुआ [परमेश्वर के सत्य के घोषित शत्रुओं से भी, और उसकी कलीसिया में घुस आए अनेक निकम्मे लोगों से भी—उन भिक्षुओं से भी जो अपने चोगे अपने मठों से निकालकर जहाँ-जहाँ जाते हैं संक्रमण फैलाने ले आए हैं, और उनसे बढ़कर नहीं ऐसे अन्य दुष्टों से भी51 ]। जब यह पाठक के नाम पत्र छप रहा था, तब मुझे निस्सन्देह सूचना मिली कि ऑग्सबर्ग में, जहाँ शाही सभा हुई थी, मेरे पोप-मत की ओर लौट जाने की अफ़वाह फैली, और राजाओं के दरबारों में आशा से कहीं अधिक सरलता से मानी गई।52 यही मुझे उन लोगों ने लौटाया है जो निश्चय ही मेरी दृढ़ता के अनेक प्रमाणों से अनजान नहीं—ऐसे प्रमाण जो उस घिनौने आरोप का खण्डन करते हैं, और जिन्हें सब सहृदय और निष्पक्ष न्यायियों के सामने मेरी रक्षा करनी चाहिए थी। परन्तु शैतान और उसका सारा दल चूक जाता है यदि वह समझता है कि नीच झूठों से मुझ पर आक्रमण करके मेरे उत्साह को ठण्डा कर देगा या मेरे परिश्रम को घटा देगा। मुझे भरोसा है कि परमेश्वर अपनी अनन्त भलाई से मुझे सामर्थ्य देगा कि मैं उसकी पवित्र बुलाहट के मार्ग पर अटल धीरज के साथ चलता रहूँ। इसका एक नया प्रमाण मैं भक्त पाठक को वर्तमान संस्करण में देता हूँ।
मैं यह भी कहूँगा कि इस ग्रन्थ में मेरा उद्देश्य पवित्र सेवकाई के उम्मीदवारों को पवित्र ग्रन्थ के अध्ययन के लिए तैयार करना और सिखाना रहा है, ताकि उन्हें उसमें सहज प्रवेश मिले और वे उसे अडिग क़दमों से आगे बढ़ा सकें; क्योंकि यदि मैं भूल नहीं करता, तो मैंने धर्म का सारांश उसके सब अंगों में दिया है और उसे ऐसे क्रम में सजाया है कि जो उसे ठीक-ठीक समझता हो, उसके लिए यह जानना सरल हो कि पवित्रशास्त्र में उसे मुख्यतः क्या खोजना है और उसमें जो कुछ है उसे किस शीर्षक के अन्तर्गत रखना है। इस प्रकार मानो मार्ग को समतल कर देने के बाद, चूँकि पवित्रशास्त्र पर जो टीकाएँ मैं आगे प्रकाशित करूँगा उनमें सैद्धान्तिक बातों पर लम्बी चर्चाओं में पड़ने और सामान्य विषयों को फैलाने की आवश्यकता न होगी, मैं उन्हें संकरी सीमा में समेट दूँगा। इस रीति से भक्त पाठक को बहुत परिश्रम और थकान से बचा लिया जाएगा—बशर्ते वह वर्तमान ग्रन्थ के ज्ञान को अनिवार्य पूर्व-आवश्यकता मानकर तैयार होकर आए। यहाँ जिस पद्धति का पालन हुआ है, वह मेरी सब टीकाओं में मानो दर्पण में दिखाई देती है, इसलिए मैं इसे शब्दों में समझाने की अपेक्षा उसे अपने विषय में स्वयं बोलने देना अधिक उचित समझता हूँ।
प्रिय पाठक, विदा; यदि मेरे परिश्रम से तुम्हें कोई लाभ पहुँचे, तो अपनी प्रार्थनाओं के द्वारा 26 स्वर्गीय पिता के सामने मेरी सहायता करो।
जिनेवा, 1559 ई. अगस्त 1।
जिनका पक्ष मैंने लिया, उनके उत्साह ने
51 कोष्ठक में दिया गया अंश केवल फ़्रांसीसी मूल में मिलता है। शब्द ये हैं: “Tant des ennemis manifestes de la
vérité de Dieu, que de beaucoup de canailles qui se sont fourrez en son Eglise: tant des Moines qui ont apporté leurs frocs hors
de leurs cloistres pour infecter le lieu où ils venoyent, que d’autres vilains qui ne valent pas mieux qu’eux.” (परमेश्वर के सत्य के प्रकट शत्रुओं से भी, और उसकी कलीसिया में घुस आए अनेक निकम्मे लोगों से भी; उन भिक्षुओं से भी जो जहाँ जाते थे वहाँ संक्रमण फैलाने के लिए अपने चोगे मठों से बाहर ले आए, और उनसे बढ़कर नहीं ऐसे अन्य नीचों से भी।)
52 फ़्रांसीसी में शब्द ये हैं: “Avec trop grande facilité; ce qui monstroit que beaucoup de mechans hypocrites, faisans
profession de l’Evangile, eussent bien voulu qu’ainsi fust.” अर्थात्: बहुत अधिक सरलता से; जिससे दिखता था कि सुसमाचार का दावा करनेवाले अनेक दुष्ट कपटी चाहते थे कि ऐसा ही हो।
एक छोटी-सी सफ़ाई को ग्रन्थ बनाकर फुला दिया है।
“मैं उन लोगों में से एक होने का दावा करता हूँ जो लाभ पाते हुए लिखते हैं और लिखते हुए लाभ पाते हैं।”—अगस्तीन, पत्र 7।
