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संसार और उसकी सब वस्तुओं की सृष्टि में सच्चा परमेश्वर कुछ चिह्नों के द्वारा कल्पित देवताओं से अलग किया गया है
अध्याय 14।
संसार और उसकी सब वस्तुओं की सृष्टि में सच्चा परमेश्वर कुछ चिह्नों के द्वारा कल्पित देवताओं से अलग किया गया है।
इस अध्याय में पहली पुस्तक का दूसरा भाग आरम्भ होता है—अर्थात् मनुष्य का ज्ञान। कुछ बातें पहले कही गई हैं। I. सामान्य रूप से संसार की सृष्टि (खण्ड 1 और 2)। II. स्वर्गदूतों के विषय पर विचार (खण्ड 3-13)। III. बुरे स्वर्गदूतों या शैतानों के विषय में (खण्ड 13-20); और, IV. सृष्टि के इतिहास का व्यावहारिक उपयोग (खण्ड 20-22)।
खण्ड।
1. केवल सृष्टि का तथ्य ही हमें परमेश्वर को स्वीकार करने की ओर ले जाए, परन्तु हम अन्यजातियों की कल्पनाओं की ओर न भटक जाएँ, इसलिए परमेश्वर ने कृपा करके हमें सृष्टि का इतिहास दिया है। एक अधर्मी आपत्ति: संसार पहले क्यों नहीं रचा गया? उसका उत्तर। एक वृद्ध पुरुष की चतुराई-भरी उक्ति।
2. इसी कारण संसार एक क्षण में नहीं, वरन् छः दिनों में रचा गया। सृष्टि का क्रम वर्णित है, जिससे दिखता है कि आदम तब तक नहीं रचा गया जब तक परमेश्वर ने अपनी अनन्त भलाई से उसके लिए भरपूर प्रबन्ध न कर दिया।
3. स्वर्गदूतों के विषय की शिक्षा की व्याख्या। 1. ताकि हम उनसे भी परमेश्वर को पहचानना सीखें। 2. ताकि हम स्वर्गदूतों के आराधकों और मानीवादियों की भूलों से सावधान रहें। मानीवाद का खण्डन। भक्ति का नियम।
4. स्वर्गदूत परमेश्वर के रचे हुए हैं। वे किस समय और किस क्रम में रचे गए, यह पूछना अनुचित है। छद्म-दियुनुसियुस की बकवास।
5. स्वर्गदूतों का स्वभाव, कार्य और अनेक नाम।
6. स्वर्गदूत हमारे प्रति ईश्वरीय उदारता के वितरक हैं।
7. वे राज्यों और प्रान्तों पर एक प्रकार के अधिकारी हैं, परन्तु विशेष रूप से चुने हुओं के रखवाले हैं। यह निश्चित नहीं कि हर विश्वासी एक ही स्वर्गदूत की देखरेख में है। इतना ही काफ़ी है कि सब स्वर्गदूत कलीसिया की सुरक्षा के लिए जागते रहते हैं।
8. स्वर्गदूतों की संख्या और श्रेणियाँ निर्धारित नहीं की गई हैं। स्वर्गदूतों को पंखोंवाले क्यों कहा गया है।
9. स्वर्गदूत सेवा करनेवाली आत्माएँ और आत्मिक सत्ताएँ हैं।
10. स्वर्गदूतों को परमेश्वर के सिंहासन पर बैठाने की अन्यजातीय भूल का खण्डन। 1. पवित्रशास्त्र के पदों द्वारा।
11. खण्डन जारी। 2. अन्य पदों से निकाले गए निष्कर्षों द्वारा। परमेश्वर स्वर्गदूतों की सेवा का उपयोग क्यों करता है।
12. पवित्र स्वर्गदूतों के विषय में पवित्रशास्त्र की शिक्षा का उपयोग।
13. बुरे स्वर्गदूतों या शैतानों के विषय की शिक्षा चार शीर्षकों में समेटी गई। 1. ताकि हम उनकी चालों और आक्रमणों से सावधान रहें।
14. ताकि हम भक्ति के अभ्यासों के लिए उभारे जाएँ। एक ही स्वर्गदूत का एकवचन में बार-बार उल्लेख क्यों हुआ है।
15. शैतान को मनुष्य का बैरी बताया गया है, इसलिए हमें उससे निरन्तर युद्ध करना चाहिए।
16. शैतान की दुष्टता सृष्टि के कारण नहीं, भ्रष्टता के कारण है। स्वर्गदूतों के पतन की रीति, समय और स्वरूप के विषय में पूछताछ करना व्यर्थ और निष्फल है।
17. यद्यपि शैतान अपनी इच्छा और प्रयत्न में सदा परमेश्वर की इच्छा का विरोधी रहता है, फिर भी वह उसकी अनुमति और सहमति के बिना कुछ नहीं कर सकता।
18. परमेश्वर दुष्ट आत्माओं पर ऐसा शासन करता है कि वे विश्वासियों को परखें और दुष्टों पर प्रभुता करें।
19. बुरे स्वर्गदूतों का स्वभाव। वे बुद्धि और समझ से सम्पन्न आत्मिक सत्ताएँ हैं।
20. अध्याय का पिछला भाग, जिसमें सृष्टि के इतिहास का संक्षेप में वर्णन है, और यह दिखाया गया है कि परमेश्वर के विषय में हमारे लिए क्या जानना महत्त्वपूर्ण है।
21. इस ज्ञान का विशेष उद्देश्य यह है कि हम कृतघ्नता या असावधानी के कारण परमेश्वर की सिद्धताओं की अनदेखी न कर बैठें। इस प्राथमिक ज्ञान का उदाहरण।
22. इस ज्ञान का एक और उद्देश्य—अर्थात् यह देखकर कि ये वस्तुएँ हमारे उपयोग के लिए रची गई हैं, हम परमेश्वर पर भरोसा रखने, उससे प्रार्थना करने और उससे प्रेम करने के लिए उभारे जाएँ।
1. यद्यपि यशायाह झूठे देवताओं के आराधकों पर ठीक ही यह दोष लगाता है कि वे पृथ्वी की नींवों और आकाश के मण्डल से यह नहीं सीखते कि सच्चा परमेश्वर कौन है (यशायाह 40:21); तथापि हमारी बुद्धि इतनी मन्द और भूमि पर रेंगनेवाली है कि आवश्यक था कि वह और स्पष्टता से चित्रित किया जाए, ताकि विश्वासी अन्यजातियों की कल्पनाओं की ओर न भटक जाएँ। यह विचार कि परमेश्वर संसार की आत्मा है, यद्यपि दार्शनिकों के सुझावों में सबसे सहनीय है, फिर भी बेतुका है; इसलिए यह महत्त्वपूर्ण था कि हमें और निकट का ज्ञान दिया जाए, ताकि हम अनिश्चितता में इधर-उधर न भटकें। इसलिए परमेश्वर ने चाहा कि सृष्टि का एक इतिहास विद्यमान रहे—ऐसा इतिहास जिस पर कलीसिया का विश्वास टिका रह सके और जिसमें उस परमेश्वर को छोड़ किसी और परमेश्वर की खोज न करनी पड़े जिसे मूसा संसार का सृष्टिकर्ता और रचनेवाला ठहराता है। पहले तो उस इतिहास में समय की अवधि इस प्रकार अंकित की गई है कि विश्वासी वर्षों की अटूट कड़ी से चढ़ते हुए अपने वंश और सब वस्तुओं के आदि उद्गम तक पहुँच सकें। यह ज्ञान अत्यन्त उपयोगी है, न केवल उन भयानक कथाओं की औषधि के रूप में जो प्राचीन काल में मिस्र और संसार के अन्य देशों में प्रचलित थीं, वरन् इसलिए भी कि इससे सृष्टि के जन्म के सामने परमेश्वर की अनन्तता और अधिक स्पष्टता से प्रकट होती है, और हमारे मन में और ऊँचा विस्मय उत्पन्न होता है। हमें उस अधर्मी उपहास से विचलित नहीं होना चाहिए कि यह कैसी अचम्भे की बात है कि परमेश्वर को आकाश और पृथ्वी रचने का विचार पहले क्यों नहीं आया, और उसने क्यों एक अनन्त काल को व्यर्थ बीत जाने दिया, जिसमें हज़ारों पीढ़ियाँ हो सकती थीं, जबकि वर्तमान संसार अपना छः हज़ारवाँ वर्ष पूरा करने से पहले ही अन्त की ओर बढ़ रहा है। परमेश्वर ने इतना विलम्ब क्यों किया, यह पूछना न उचित है, न वैध। यदि मानव मन ऐसा करने का दुस्साहस करे, तो उसे असफलता ही हाथ लगेगी; और जो बात परमेश्वर ने हमारे विश्वास की नम्रता की परीक्षा के लिए जानबूझकर छिपा रखी है, उसे जानना हमारे लिए लाभदायक भी नहीं। यह एक भले वृद्ध पुरुष की चतुराई-भरी उक्ति थी, जब किसी ने ढिठाई से उपहास करते हुए पूछा कि संसार के रचे जाने से पहले परमेश्वर क्या करता था, तो उसने उत्तर दिया कि वह उत्सुक लोगों के लिए नरक बना रहा था (August. Confess., lib. 11 c. 12)। यह फटकार जितनी कठोर है उतनी ही भारी भी, और इसे उस गुदगुदाती हुई उच्छृंखलता को दबा देना चाहिए जो बहुतों को बुरे और हानिकारक विचारों में लिप्त होने के लिए उकसाती है।
अन्त में, स्मरण रखें कि वह अदृश्य परमेश्वर, जिसकी बुद्धि, सामर्थ्य और न्याय अगम्य हैं, मूसा के इतिहास में हमारे सामने मानो दर्पण में रखा गया है, जिसमें उसकी जीवित छवि झलकती है। क्योंकि जैसे आँख, जो बुढ़ापे से धुँधली हो गई हो या किसी और कारण से दुर्बल हो, चश्मे की सहायता के बिना कुछ भी स्पष्ट नहीं देखती, वैसे ही (हमारी दुर्बलता ऐसी है) यदि पवित्रशास्त्र परमेश्वर की हमारी खोज में हमारा मार्गदर्शन न करे, तो हम तुरन्त अपनी कल्पनाओं में व्यर्थ हो जाते हैं। जो लोग अब अपनी ढिठाई में लगे हैं और चेतावनी नहीं मानते, वे बहुत देर से सीखेंगे कि परमेश्वर की गुप्त युक्तियों का श्रद्धापूर्वक आदर करना उन निन्दाओं को उगलने से कितना अच्छा था जो आकाश के मुख को अशुद्ध करती हैं। अगस्तीन ठीक ही शिकायत करता है कि जब कभी परमेश्वर की इच्छा से ऊँचा कोई कारण माँगा जाता है, तब परमेश्वर का अपमान किया जाता है (Lib. de Gent.)। वह एक और स्थान पर बुद्धिमानी से हमें स्मरण दिलाता है कि अनन्त काल के विषय में प्रश्न उठाना उतना ही अनुचित है जितना अनन्त अन्तरिक्ष के विषय में (De Civit. Dei.)। आकाश का घेरा चाहे कितना ही विशाल हो, उसकी कोई निश्चित सीमा तो है ही। परन्तु यदि कोई परमेश्वर से यह शिकायत करे कि सृष्टि से सौ गुना अधिक रिक्त स्थान बचा रह गया है, तो क्या हर भक्त मन इस धृष्टता से घृणा न करेगा? उन लोगों का पागलपन भी ऐसा ही है जो परमेश्वर पर यह दोष लगाते हैं कि उसने संसार को उससे अनगिनत युग पहले रचकर उन्हें प्रसन्न नहीं किया, और इस प्रकार वह निठल्ला रहा। अपनी लालसा में वे संसार से परे जाने का ढोंग करते हैं, मानो आकाश और पृथ्वी का विशाल घेरा हमारी सब इन्द्रियों को लीन कर लेने के लिए पर्याप्त और तेजोमय वस्तुओं को न समेटे हो; मानो छः हज़ार वर्ष की अवधि में परमेश्वर ने हमारे मनों को निरन्तर मनन में लगाए रखने के लिए पर्याप्त घटनाएँ न दी हों। इसलिए आइए, हम स्वेच्छा से उन सीमाओं के भीतर बँधे रहें जिनमें परमेश्वर ने हमारे व्यक्तित्व को सीमित करना और मानो हमारे मनों को घेर देना चाहा है, ताकि वे बेरोक-टोक भटककर खो न जाएँ।
2. इसी उद्देश्य से मूसा बताता है कि सृष्टि का कार्य एक क्षण में नहीं, वरन् छः दिनों में पूरा हुआ। इस कथन से हम कल्पना से हटकर उस एक परमेश्वर की ओर खींचे जाते हैं जिसने इस प्रकार अपने कार्य को छः दिनों में बाँटा, ताकि हमें अपना सारा जीवन उसके मनन में लगाने से हिचकिचाहट न हो। क्योंकि यद्यपि हमारी आँखें जिस ओर भी मुड़ें परमेश्वर के कार्यों को देखने को विवश हैं, फिर भी हम देखते हैं कि हमारा ध्यान कितना क्षणिक है, और यदि कोई भक्तिपूर्ण विचार उठता भी है तो कितनी शीघ्रता से मिट जाता है। यहाँ भी इन क्रमिक चरणों पर यह कहकर आपत्ति की जाती है कि ये परमेश्वर की सामर्थ्य के अनुकूल नहीं, जब तक कि मानव बुद्धि विश्वास की आज्ञाकारिता के आगे झुकाई न जाए और उस शान्त विश्राम का स्वागत करना न सीखे जिसके लिए सातवें दिन के पवित्र ठहराए जाने ने हमें बुलाया। घटनाओं के क्रम में ही हमें मानवजाति के प्रति परमेश्वर की पितृतुल्य भलाई पर ध्यान से विचार करना चाहिए कि उसने आदम को तब तक नहीं रचा जब तक पृथ्वी को सब अच्छी वस्तुओं से उदारता से भर न दिया। यदि वह उसे बंजर और बिना साज-सामान की पृथ्वी पर रखता; यदि प्रकाश से पहले जीवन दे देता, तो ऐसा प्रतीत हो सकता था कि उसने उसके हित की थोड़ी ही चिन्ता की। परन्तु अब जब उसने सूर्य और तारों की गतियाँ मनुष्य के उपयोग के लिए ठहराईं, वायु, पृथ्वी और जल को जीवित प्राणियों से भर दिया, और भोजन की पूर्ति के लिए सब प्रकार के फल बहुतायत से उत्पन्न किए, तो एक दूरदर्शी और परिश्रमी गृहस्वामी का कर्तव्य निभाकर उसने हमारे प्रति अपनी अद्भुत भलाई प्रकट की है। इन विषयों को, जिन्हें मैं केवल संक्षेप में छूता हूँ, यदि अधिक ध्यान से विचारा जाए, तो यह प्रकट हो जाएगा कि मूसा उस एकमात्र सृष्टिकर्ता का निश्चित गवाह और घोषक था। मैं उसे दोहराता नहीं जो मैं पहले समझा चुका हूँ—अर्थात् यहाँ केवल परमेश्वर के सार का उल्लेख नहीं है, वरन् उसकी अनन्त बुद्धि और आत्मा भी हमारे सामने रखे गए हैं, ताकि हम किसी और परमेश्वर का स्वप्न न देखें, सिवाय उसके जो उस स्पष्ट स्वरूप में पहचाना जाना चाहता है।
3. परन्तु इससे पहले कि मैं मनुष्य के स्वभाव की और विस्तार से चर्चा आरम्भ करूँ (अध्याय 15 और पुस्तक 2, अध्याय 1), स्वर्गदूतों के विषय में कुछ कहना उचित होगा। क्योंकि यद्यपि मूसा ने साधारण लोगों की अज्ञानता के अनुकूल होकर सृष्टि के इतिहास में परमेश्वर के उन्हीं कार्यों का उल्लेख किया जो हमारी आँखों के सामने आते हैं, फिर भी चूँकि वह आगे चलकर स्वर्गदूतों को परमेश्वर के सेवकों के रूप में प्रस्तुत करता है, हम सहज ही निष्कर्ष निकाल लेते हैं कि जिसकी वे सेवा करते हैं वही उनका सृष्टिकर्ता है। इसलिए, यद्यपि मूसा ने लोकभाषा में बोलते हुए आरम्भ ही में स्वर्गदूतों को परमेश्वर की सृष्टियों में नहीं गिना, फिर भी पवित्रशास्त्र में अन्यत्र उनके विषय में जो कहा गया है उसकी अलग और स्पष्ट चर्चा करने में कोई बाधा नहीं। क्योंकि यदि हम परमेश्वर को उसके कार्यों से जानना चाहते हैं, तो इस उत्कृष्ट और तेजस्वी नमूने की अनदेखी हम निश्चय ही नहीं कर सकते। हम यह भी जोड़ सकते हैं कि शिक्षा की यह शाखा अनेक भूलों के खण्डन के लिए बहुत आवश्यक है। बहुतों के मन स्वर्गदूतीय स्वभाव की श्रेष्ठता से इतने प्रभावित हैं कि वे समझते हैं कि उन्हें परमेश्वर के अधिकार के अधीन करके अधीनस्थ बनाने में उनका अपमान होगा। इसलिए उन्हें एक कल्पित ईश्वरत्व दे दिया गया है। मानी भी अपने पन्थ के साथ उठ खड़ा हुआ, जिसने अपने लिए दो आदि-तत्त्व गढ़ लिए—परमेश्वर और शैतान—भली वस्तुओं की उत्पत्ति परमेश्वर को सौंपी, परन्तु सब बुरे स्वभावों का रचनेवाला शैतान को ठहरा दिया। यदि यह प्रलाप हमारे मनों पर अधिकार कर ले, तो संसार की सृष्टि में परमेश्वर को उसकी महिमा से वंचित कर दिया जाएगा। क्योंकि चूँकि परमेश्वर की जितनी विशेषता अनन्तता और स्वयंभूता की है (अर्थात् स्वयं से अस्तित्व, यदि मैं ऐसा कह सकूँ) उतनी किसी और बात की नहीं, तो जो इसे शैतान को सौंपते हैं, क्या वे कुछ अंश में उसे ईश्वरत्व का सम्मान नहीं पहनाते? और यदि शैतान को यह सामर्थ्य है कि परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध और उसके विरोध के होते हुए भी जो चाहे कर डाले, तो परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता कहाँ रही? परन्तु मानीवादियों का एकमात्र भला आधार—अर्थात् यह कि किसी बुरी वस्तु की सृष्टि भले परमेश्वर को सौंपना अधर्म होगा—खरे विश्वास के विरुद्ध किसी रीति से नहीं ठहरता, क्योंकि यह स्वीकार नहीं किया जाता कि समस्त ब्रह्माण्ड में कुछ भी स्वभाव से बुरा है; मनुष्य या शैतान की भ्रष्टता और दुष्टता, और उससे उत्पन्न पाप, स्वभाव से नहीं, वरन् स्वभाव के बिगड़ने से हैं; और आरम्भ में कुछ भी ऐसा न था जो ईश्वरीय बुद्धि और न्याय का कोई प्रकाशन न करता हो। ऐसी हठी कल्पनाओं को रोकने के लिए हमें अपने मनों को उससे ऊँचा उठाना चाहिए जहाँ तक हमारी आँखें भेद सकती हैं। सम्भवतः इसी दृष्टि से निकिया का विश्वास-वचन, परमेश्वर को सब वस्तुओं का सृष्टिकर्ता कहते हुए, अदृश्य वस्तुओं का स्पष्ट उल्लेख करता है। फिर भी मेरी चिन्ता यह होनी चाहिए कि मैं उन सीमाओं के भीतर रहूँ जो भक्ति ठहराती है, ऐसा न हो कि अपनी पहुँच से परे के अनुमानों में लिप्त होकर मैं पाठक को उलझा दूँ और उसे विश्वास की सादगी से भटका दूँ। और चूँकि पवित्र आत्मा सदा हमें उपयोगी बातें सिखाता है, परन्तु जो बातें उन्नति में कम काम आती हैं उन्हें बिल्कुल छोड़ देता है, या केवल सरसरी तौर पर छूता है, इसलिए ऐसी सब बातों के विषय में स्वेच्छा से अनजान बने रहना निश्चय ही हमारा कर्तव्य है।
4. स्वर्गदूत, परमेश्वर की आज्ञाओं को पूरा करने के लिए ठहराए गए सेवक होने के कारण, निस्सन्देह उसकी सृष्टि स्वीकार किए जाने चाहिए; परन्तु वे किस समय या किस क्रम में रचे गए, इस विषय पर प्रश्न उठाना (देखिए लोम्बार्ड, lib. 2 dist. 2, sqq.) परिश्रम से अधिक हठ को प्रकट करता है। मूसा बताता है कि आकाश और पृथ्वी अपनी सारी सेना सहित पूरे हो गए; यह चिन्तापूर्वक पूछने से क्या लाभ कि तारों और ग्रहों से अधिक छिपी हुई अन्य स्वर्गीय सेनाएँ भी किस समय अस्तित्व में आईं? इस पर न अटकते हुए, हम यहाँ यह स्मरण रखें कि धर्म के सम्पूर्ण विषय में नम्रता और संयम का एक नियम मानना चाहिए, और वह यह है कि अस्पष्ट बातों में उससे अधिक न बोलें, न सोचें, न जानने की लालसा रखें जितना परमेश्वर के वचन ने बताया है। दूसरा नियम यह है कि पवित्रशास्त्र पढ़ते समय हम अपनी खोज और मनन को निरन्तर उन्हीं बातों की ओर लगाएँ जो उन्नति करती हैं, न कि जिज्ञासा में पड़ें, या निरर्थक बातों का अध्ययन करें। और चूँकि प्रभु ने हमें व्यर्थ के प्रश्नों में नहीं, वरन् ठोस भक्ति, अपने नाम के भय, सच्चे विश्वास और पवित्रता के कर्तव्यों में शिक्षा देना चाहा है, इसलिए आइए हम ऐसे ही ज्ञान से सन्तुष्ट रहें। इसलिए, यदि हम यथोचित रूप से बुद्धिमान होना चाहते हैं, तो हमें स्वर्गदूतों के स्वभाव, श्रेणियों और संख्या के विषय में निठल्ले मनुष्यों की उन व्यर्थ बकवासों को त्याग देना चाहिए जिनके पीछे परमेश्वर के वचन का कोई अधिकार नहीं। मैं जानता हूँ कि बहुत-से लोग इन विषयों से अधिक उत्सुकता से चिपक जाते हैं, और इनमें उन्हें दैनिक आचरण से सम्बन्धित बातों से अधिक आनन्द मिलता है। परन्तु यदि हम मसीह के चेले बनने से मुँह नहीं मोड़ते, तो उस पद्धति पर चलने से भी मुँह न मोड़ें जो उसने ठहराई है। इस प्रकार उसे अपना गुरु मानकर सन्तुष्ट रहने से हम न केवल उन फालतू अनुमानों से बचेंगे जिन्हें वह हतोत्साहित करता है, वरन् उनसे हमें अरुचि भी होगी। कोई यह नहीं नकार सकता कि दियुनुसियुस (जो कोई भी रहा हो) की स्वर्गीय श्रेणीक्रम में बहुत चतुर और सूक्ष्म विवेचनाएँ हैं, परन्तु उन्हें निकट से देखने पर हर किसी को दिखेगा कि वे केवल निठल्ली बातें हैं। फिर भी धर्मविज्ञानी का कर्तव्य कान को गुदगुदाना नहीं, वरन् जो सत्य, निश्चित और उपयोगी है उसे सिखाकर विवेक को दृढ़ करना है। जब आप दियुनुसियुस की रचना पढ़ें तो ऐसा लगेगा मानो वह मनुष्य स्वर्ग से उतर आया है और वह नहीं बता रहा जो उसने सीखा, वरन् जो उसने सचमुच देखा है। परन्तु पौलुस तीसरे स्वर्ग तक उठा लिया गया था, फिर भी उसने ऐसा कुछ नहीं बताया, वरन् स्पष्ट घोषणा करता है कि जो भेद उसने देखे उन्हें कहना मनुष्य के लिए उचित नहीं। इसलिए उस निरर्थक बुद्धि को विदा कहकर, आइए हम पवित्रशास्त्र की सरल शिक्षा से यह जानने का प्रयत्न करें कि स्वर्गदूतों के विषय में प्रभु की इच्छा है कि हम क्या जानें।
5. तो पवित्रशास्त्र में हम सदा यही पढ़ते हैं कि स्वर्गदूत स्वर्गीय आत्माएँ हैं, जिनकी आज्ञाकारिता और सेवा को परमेश्वर अपने ठहराए हुए सब उद्देश्यों को पूरा करने के लिए काम में लाता है; और इसी कारण उनका नाम पड़ा, क्योंकि वे मानो बीच के दूत हैं जो मनुष्यों पर उसकी इच्छा प्रकट करते हैं। उनमें से कई जिन नामों से पहचाने जाते हैं वे इसी कार्य से सम्बन्ध रखते हैं। उन्हें सेना कहा गया है, क्योंकि वे अपने राजकुमार को उसके दरबार की तरह घेरे रहते हैं,—उसकी महिमा को सजाते और प्रकट करते हैं,—सैनिकों की तरह उनकी आँखें अपने सेनापति के झण्डे की ओर सदा लगी रहती हैं, और उसकी आज्ञाओं को पूरा करने के लिए ऐसे तैयार और तत्पर रहते हैं कि जैसे ही वह संकेत करता है, वे तैयारी में लग जाते हैं, या कहें वास्तव में काम में जुट जाते हैं। ईश्वरीय सिंहासन की भव्यता का वर्णन करते हुए भविष्यद्वक्ताओं ने ऐसे ही चित्र दिए हैं, विशेषकर दानिय्येल ने, जब वह कहता है कि जब परमेश्वर न्याय करने को खड़ा हुआ, तब “हज़ारों हज़ार उसकी सेवा करते थे, और दस हज़ार गुणा दस हज़ार उसके सामने खड़े थे” (दानिय्येल 7:10)। चूँकि इन्हीं के द्वारा प्रभु अपने हाथ की सामर्थ्य और शक्ति को अद्भुत रीति से प्रयोग में लाता और प्रकट करता है, इसलिए उन्हें सामर्थ्य कहा गया है। फिर, चूँकि संसार पर उसका शासन उन्हीं के द्वारा चलाया और सँभाला जाता है, इसलिए उन्हें कभी प्रधानताएँ, कभी अधिकार, कभी प्रभुताएँ कहा जाता है (कुलुस्सियों 1:16; इफिसियों 1:21)। अन्त में, चूँकि परमेश्वर की महिमा कुछ अंश में उनमें निवास करती है, उन्हें सिंहासन भी कहा जाता है; यद्यपि इस अन्तिम नाम के विषय में मैं निश्चित रूप से कुछ कहना नहीं चाहता, क्योंकि एक भिन्न व्याख्या भी उतनी ही, बल्कि उससे अधिक, उचित है। इसलिए सिंहासन नाम को छोड़ भी दें, तो पहले के नाम पवित्र आत्मा ने स्वर्गदूतीय सेवा की प्रतिष्ठा की प्रशंसा में प्रायः प्रयोग किए हैं। और यह उचित भी नहीं कि जिन साधनों के द्वारा परमेश्वर अपनी सामर्थ्य की उपस्थिति को विशेष रूप से प्रकट करता है, उन्हें बिना आदर के छोड़ दिया जाए। वरन् उन्हें एक से अधिक बार ईश्वर कहा गया है, क्योंकि उनकी सेवा में परमेश्वर कुछ अंश में मानो दर्पण में हमारे सामने दिखाया जाता है। फिर भी मैं प्राचीन लेखकों से सहमत होने की ओर अधिक झुकता हूँ कि उन पदों में109 जहाँ कहा गया है कि प्रभु का दूत अब्राहम, याकूब और मूसा को दिखाई दिया, वह दूत मसीह था। फिर भी यह सच है कि जब सब स्वर्गदूतों का उल्लेख होता है, तब उन्हें प्रायः इसी नाम से पुकारा जाता है। इसमें अचम्भे की कोई बात नहीं। क्योंकि यदि राजाओं और शासकों को यह आदर इसलिए दिया जाता है कि वे अपने पद में परम राजा और न्यायी परमेश्वर के प्रतिनिधि हैं, तो स्वर्गदूतों को, जिनमें ईश्वरीय महिमा का तेज कहीं अधिक स्पष्ट प्रकट होता है, यह आदर इससे कहीं अधिक उचित रूप से दिया जा सकता है।
6. परन्तु जिस बात पर पवित्रशास्त्र विशेष बल देता है, वह वही है जो हमारी सान्त्वना और हमारे विश्वास की दृढ़ता के लिए सबसे अधिक काम की है, अर्थात् यह कि स्वर्गदूत हमारे प्रति ईश्वरीय उदारता के सेवक और वितरक हैं। इसलिए हमें बताया गया है कि वे हमारी सुरक्षा के लिए कैसे जागते हैं, हमारी रक्षा का भार कैसे उठाते हैं, हमारा मार्ग कैसे दिखाते हैं, और इसका ध्यान रखते हैं कि हम पर कोई विपत्ति न आए। ऐसे पूरे अंश हैं जो पहले मसीह से सम्बन्ध रखते हैं, जो कलीसिया का सिर है, और उसके बाद सब विश्वासियों से। “वह तेरे लिये अपने दूतों को आज्ञा देगा कि तेरी सब चालचलन में तेरी रक्षा करें। वे तुझे हाथों-हाथ उठा लेंगे, ऐसा न हो कि तेरे पाँव में पत्थर से ठेस लगे।” फिर, “यहोवा का दूत उसके डरवैयों के चारों ओर छावनी किए हुए उनको बचाता है।”110 इन पदों से प्रभु दिखाता है कि जिनकी रक्षा का उसने बीड़ा उठाया है, उनकी सुरक्षा का भार उसने अपने स्वर्गदूतों को सौंप दिया है। इसलिए प्रभु का एक दूत हाजिरा को उसके भागने में सान्त्वना देता है और उसे अपनी स्वामिनी से मेल करने को कहता है। अब्राहम अपने सेवक से प्रतिज्ञा करता है कि एक दूत उसकी यात्रा का मार्गदर्शक होगा। याकूब एप्रैम और मनश्शे को आशीर्वाद देते हुए प्रार्थना करता है, “वह दूत जिसने मुझे सब बुराई से छुड़ाया है, इन लड़कों को आशीष दे।” इसी प्रकार इस्राएलियों की छावनी की रखवाली के लिए एक दूत ठहराया गया; और जब-जब परमेश्वर ने इस्राएल को उसके शत्रुओं के हाथ से छुड़ाना चाहा, तब-तब उसने स्वर्गदूतों की सेवा के द्वारा पलटा लेनेवाले उठाए। इस प्रकार, अन्त में (और अधिक न कहकर), स्वर्गदूतों ने मसीह की सेवा की, और सब संकटों में उसके साथ रहे। उन्होंने स्त्रियों को उसके जी उठने का समाचार दिया; चेलों को उसके तेजस्वी आगमन की पूर्व-सूचना दी। हमारे रक्षक के कर्तव्य को निभाते हुए वे शैतान और हमारे सब शत्रुओं से युद्ध करते हैं, और हमें सतानेवालों से बदला लेते हैं। इस प्रकार हम पढ़ते हैं कि प्रभु के एक दूत ने यरूशलेम को घेराबन्दी से छुड़ाने के लिए अश्शूर के राजा की छावनी में एक ही रात में एक लाख पचासी हज़ार पुरुषों को मार डाला।
7. प्रत्येक विश्वासी की रक्षा के लिए उसे एक स्वर्गदूत सौंपा गया है या नहीं, इसे मैं निश्चित रूप से कहने का साहस नहीं करता। जब दानिय्येल फारस के दूत और यूनानियों के दूत का उल्लेख करता है, तो वह निस्सन्देह यह संकेत देता है कि कुछ स्वर्गदूत राज्यों और प्रान्तों पर एक प्रकार के अधिकारी ठहराए गए हैं।111 फिर, जब मसीह कहता है कि बालकों के स्वर्गदूत सदा मेरे पिता का मुँह देखते रहते हैं, तो वह संकेत देता है कि कुछ स्वर्गदूत हैं जिन्हें उनकी सुरक्षा सौंपी गई है। परन्तु मैं नहीं जानता कि इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है या नहीं कि प्रत्येक विश्वासी का अपना एक स्वर्गदूत है। यह तो मैं निश्चित मानता हूँ कि हम में से हर एक की चिन्ता केवल एक स्वर्गदूत नहीं करता, वरन् सब एकमत होकर हमारी सुरक्षा के लिए जागते हैं। क्योंकि सब स्वर्गदूतों के विषय में सामूहिक रूप से कहा गया है कि वे “एक मन फिरानेवाले पापी के विषय में, उन निन्यानवे धर्मियों से अधिक आनन्द मनाते हैं जिन्हें मन फिराने की आवश्यकता नहीं।” यह भी कहा गया है कि स्वर्गदूतों ने (अर्थात् एक से अधिक ने) लाज़र की आत्मा को अब्राहम की गोद में पहुँचाया। और एलीशा ने अपने सेवक को आग के जो अनेक रथ दिखाए जो विशेष रूप से उसी के लिए ठहराए गए थे, वह भी व्यर्थ नहीं था।
110 भजन संहिता 91:11; 34:8; उत्पत्ति 16:9; 24:7; 48:16; निर्गमन 14:19, 28, 29; न्यायियों 2:1, 20; 6:11; 13:10; मत्ती 4:11; लूका 22:43; मत्ती 28:5; लूका 24:5; प्रेरितों के काम 1:10; 2 राजाओं 19:35; यशायाह 37:36।
109 उत्पत्ति 18:2; 32:1, 28; यहोशू 5:14; न्यायियों 6:14; 13:10, 22।
एक अंश ऐसा है जो कुछ अधिक स्पष्टता से संकेत देता प्रतीत होता है कि प्रत्येक व्यक्ति का अलग स्वर्गदूत है। जब पतरस कारागार से छूटने के बाद उस घर के द्वार पर खटखटाता है जहाँ भाई इकट्ठे थे, तो वे यह सोच न सके कि वह स्वयं हो सकता है, और उन्होंने कहा कि वह उसका स्वर्गदूत है। यह विचार उन्हें इस सामान्य मान्यता से सूझा प्रतीत होता है कि प्रत्येक विश्वासी को एक ही स्वर्गदूत सौंपा गया है। फिर भी यहाँ यह कहा जा सकता है कि इसे उन स्वर्गदूतों में से किसी एक के विषय में समझने में कोई बाधा नहीं जिन्हें प्रभु ने उस विशेष समय पर पतरस की देखभाल सौंपी हो, बिना यह माने कि वह उसका स्थायी रखवाला था, जैसा कि साधारण कल्पना है (देखिए मरकुस 5:9 पर कैल्विन), कि हर व्यक्ति को दो स्वर्गदूत, एक भला और एक बुरा, मानो एक प्रकार के अधिष्ठाता देव के रूप में सौंपे गए हैं। अन्त में, जिस बात का हमसे बहुत सम्बन्ध नहीं, उसकी चिन्तापूर्वक छानबीन करना उचित नहीं। यदि किसी को यह जानना काफ़ी नहीं लगता कि स्वर्गीय सेना की सब श्रेणियाँ निरन्तर उसकी सुरक्षा के लिए जागती हैं, तो मैं नहीं देखता कि यह जानकर कि उसका एक विशेष रखवाला स्वर्गदूत है, उसे क्या अधिक प्राप्त होगा। और जो लोग हम में से प्रत्येक के लिए परमेश्वर की चिन्ता को एक ही स्वर्गदूत तक सीमित कर देते हैं, वे अपनी और कलीसिया के सब अंगों की बड़ी हानि करते हैं, मानो उन सहायक सेनाओं की प्रतिज्ञाओं का कोई मूल्य ही न हो, जो हमें चारों ओर से घेरकर और बचाकर हमें और अधिक साहस से लड़ने को प्रोत्साहित करती हैं।
8. जो लोग स्वर्गदूतों की श्रेणियों और संख्या के विषय में मत स्थापित करने का दुस्साहस करते हैं, वे अच्छा करेंगे कि सोचें कि वे किस नींव पर खड़े हैं। श्रेणी के विषय में मैं मानता हूँ कि दाऊद ने मीकाईल को एक पराक्रमी प्रधान कहा है, और यहूदा ने प्रधान स्वर्गदूत।112 पौलुस भी हमें बताता है कि एक प्रधान स्वर्गदूत तुरही फूँकेगा जो संसार को न्याय के लिए बुलाएगी। परन्तु ऐसे पदों से स्वर्गदूतों के बीच सम्मान के क्रम को निश्चित करना, उनके चिह्न ठहराना, और प्रत्येक का स्थान और पद निर्धारित करना कैसे सम्भव है? पवित्रशास्त्र में उल्लिखित दो नाम, मीकाईल और जिब्राईल, या यदि चाहें तो तोबित के इतिहास से तीसरा नाम जोड़ लें, अपने अर्थ से संकेत देते प्रतीत होते हैं कि वे स्वर्गदूतों को हमारी बुद्धि की दुर्बलता के अनुकूल होकर दिए गए हैं, यद्यपि मैं इस विषय में निश्चित रूप से कुछ कहना नहीं चाहता। स्वर्गदूतों की संख्या के विषय में हम अपने उद्धारकर्ता के मुख से जानते हैं कि अनेक सेनादल हैं, और दानिय्येल से कि अनेक लाख हैं। एलीशा के सेवक ने रथों की भीड़ देखी, और उनकी विशाल संख्या इस बात से प्रकट होती है कि वे यहोवा के डरवैयों के चारों ओर छावनी डालते हैं। यह निश्चित है कि आत्माओं का कोई शारीरिक आकार नहीं होता, फिर भी पवित्रशास्त्र हमारे अनुकूल होकर उन्हें पंखोंवाले करूबों और सराफों के रूप में वर्णित करता है; यह निराधार नहीं, ताकि हमें आश्वासन मिले कि अवसर पड़ने पर वे अविश्वसनीय तेज़ी से हमारी सहायता को दौड़ेंगे, और बिजली की गति से पंख लगाकर हमारे पास आएँगे। इससे आगे, स्वर्गदूतों की श्रेणियों और संख्या के विषय में, हम उन्हें उन रहस्यमय विषयों में गिनें जिनका पूरा प्रकाशन अन्तिम दिन के लिए रोक रखा गया है, और इसलिए अधिक जिज्ञासा से पूछताछ करने और दुस्साहसपूर्वक बोलने से बचें।
111 दानिय्येल 10:13, 20; 12:1; मत्ती 18:20; लूका 15:7; 16:22; 2 राजाओं 16:17; प्रेरितों के काम 12:15।
112 दानिय्येल 12:1; यहूदा 9; 1 थिस्सलुनीकियों 4:16; दानिय्येल 10:13, 21; लूका 1:19, 26; तोबित 3:17; 5:5; मत्ती 26:53; दानिय्येल 7:10; 2 राजाओं 6:17; भजन संहिता 34:7।
9. एक बात ऐसी है, जिसे कुछ बेचैन लोगों ने सन्देह में डाल दिया है, फिर भी हमें उसे निश्चित मानना चाहिए—अर्थात् यह कि स्वर्गदूत सेवा करनेवाली आत्माएँ हैं (इब्रानियों 1:14); जिनकी सेवा परमेश्वर अपने लोगों की रक्षा के लिए काम में लाता है, और जिनके द्वारा वह मनुष्यों में अपने उपकार बाँटता है, और अन्य कार्य भी पूरे करता है। प्राचीन काल के सदूकी यह मानते थे कि स्वर्गदूतों से कुछ और अभिप्राय नहीं, केवल वे गतियाँ हैं जो परमेश्वर मनुष्यों पर डालता है, या अपनी सामर्थ्य के वे प्रकाशन जो वह देता है (प्रेरितों के काम 23:8)। परन्तु इस स्वप्न का खण्डन पवित्रशास्त्र के इतने पद करते हैं कि यह अचम्भे की बात लगती है कि यहूदियों में ऐसी घोर अज्ञानता को कैसे समर्थन मिल सका। जिन पदों को मैं पहले उद्धृत कर चुका हूँ, उनके अतिरिक्त, जिनमें स्वर्गदूतों के हज़ारों और सेनादलों का उल्लेख है, उन्हें आनन्द मनाते हुए, विश्वासियों को हाथों में उठाते हुए, उनकी आत्माओं को विश्राम में पहुँचाते हुए, अपने पिता का मुँह देखते हुए बताया गया है, इत्यादि,113 और भी पद हैं जो अत्यन्त स्पष्टता से सिद्ध करते हैं कि वे आत्मिक सार से सम्पन्न वास्तविक सत्ताएँ हैं। स्तिफनुस और पौलुस कहते हैं कि व्यवस्था स्वर्गदूतों के हाथों में ठहराई गई। हमारा उद्धारकर्ता यह भी कहता है कि पुनरुत्थान में चुने हुए लोग स्वर्गदूतों के समान होंगे; कि न्याय के दिन का पता स्वर्गदूतों को भी नहीं; कि उस समय वह स्वयं पवित्र स्वर्गदूतों के साथ आएगा। ऐसे पदों को चाहे कितना ही मरोड़ा जाए, उनका अर्थ स्पष्ट है। इसी प्रकार, जब पौलुस तीमुथियुस से विनती करता है कि वह उसकी आज्ञाओं को मसीह और उसके चुने हुए स्वर्गदूतों के सामने जैसा मानकर पालन करे, तो वह बिना सार के गुणों या प्रेरणाओं की नहीं, वरन् सच्ची आत्माओं की बात कर रहा है। और जब इब्रानियों की पत्री में कहा गया है कि मसीह स्वर्गदूतों से उत्तम ठहराया गया, कि संसार उनके अधीन नहीं किया गया, कि मसीह ने उनका नहीं, मनुष्य का स्वभाव लिया, तो इन पदों का कोई अर्थ तब तक निकालना असम्भव है जब तक यह न समझा जाए कि स्वर्गदूत धन्य आत्माएँ हैं, जिनके विषय में ऐसी तुलनाएँ उचित रूप से की जा सकती हैं। उस पत्री का लेखक यही बात तब भी कहता है जब वह विश्वासियों की आत्माओं और पवित्र स्वर्गदूतों को स्वर्ग के राज्य में एक साथ रखता है। फिर, जिन पदों को हम पहले उद्धृत कर चुके हैं, उनमें कहा गया है कि बालकों के स्वर्गदूत परमेश्वर का मुँह देखते हैं, अपनी रक्षा से हमारी सुरक्षा करते हैं, हमारे उद्धार पर आनन्दित होते हैं, कलीसिया में परमेश्वर के नाना प्रकार के अनुग्रह पर चकित होते हैं, और अपने सिर मसीह के अधीन हैं। इसी की पुष्टि इससे भी होती है कि वे पवित्र कुलपतियों को बार-बार मनुष्य के रूप में दिखाई दिए, बोले, और आतिथ्य स्वीकार करने को सहमत हुए। मसीह को भी, उस प्रभुता के कारण जो उसे मध्यस्थ के रूप में प्राप्त है, दूत कहा गया है (मलाकी 3:1)। इस विषय को प्रसंगवश छूना इसलिए उचित समझा गया कि सीधे-सादे लोगों को उन मूर्खतापूर्ण और बेतुकी कल्पनाओं से सावधान किया जाए, जो अनेक शताब्दियों पहले शैतान के सुझाव पर उठीं और बार-बार नए सिरे से उठ खड़ी होती रहती हैं
113 लूका 15:10; भजन संहिता 91:11; मत्ती 4:6; लूका 4:10, 16, 22; मत्ती 18:10; प्रेरितों के काम 7:55; गलातियों 3:19; मत्ती 22:80; 24:36; इफिसियों 30:10; 1 पतरस 1:12; इब्रानियों 1:6; भजन संहिता 97:7।
10. अब उस अन्धविश्वास के विरुद्ध चेतावनी देना शेष है जो प्रायः तब घुसने लगता है जब कहा जाता है कि सब आशीषें हमें स्वर्गदूतों के द्वारा दी और बाँटी जाती हैं। क्योंकि मानव मन तुरन्त यह सोचने लगता है कि ऐसा कोई सम्मान नहीं जो उन्हें न मिलना चाहिए, और इसी कारण मसीह और परमेश्वर के विशेष कार्य उन्हें सौंप दिए जाते हैं। इस प्रकार अनेक पिछले युगों तक मसीह की महिमा बहुत धुँधली पड़ी रही, क्योंकि पवित्रशास्त्र के किसी अधिकार के बिना स्वर्गदूतों की अत्यधिक प्रशंसाएँ की जाती रहीं। जिन बिगाड़ों का हम अब विरोध करते हैं, उनमें शायद ही कोई इससे अधिक प्राचीन हो। यहाँ तक कि पौलुस को भी कुछ ऐसे लोगों से कठिन संघर्ष करना पड़ा प्रतीत होता है जिन्होंने स्वर्गदूतों को इतना ऊँचा उठाया कि उन्हें लगभग मसीह से भी बढ़कर बना दिया। इसी कारण वह कुलुस्सियों की अपनी पत्री में इतनी चिन्ता से बल देता है (कुलुस्सियों 1:16, 20) कि मसीह न केवल सब स्वर्गदूतों से श्रेष्ठ है, वरन् जो भी गुण उनमें हैं वे सब उसी से आए हैं; और इस प्रकार हमें चेतावनी देता है कि हम उसे छोड़कर उनकी ओर न मुड़ें जो अपने लिए पर्याप्त नहीं, वरन् हमारे साथ एक ही सोते से जल भरना पड़ता है। चूँकि उनमें ईश्वरीय महिमा का तेज प्रकट होता है, इसलिए हम जितनी सरलता से किसी बात की ओर झुकते हैं वह यही है कि मूर्खतापूर्ण आराधना में उनके सामने दण्डवत् करें, और फिर उन आशीषों को उनके नाम चढ़ाएँ जो केवल परमेश्वर की देन हैं। यूहन्ना भी प्रकाशितवाक्य में मानता है (प्रकाशितवाक्य 19:10; 22:8, 9) कि उसके साथ भी यही हुआ, परन्तु वह तुरन्त वह उत्तर जोड़ देता है जो उसे दिया गया, “देख, ऐसा न कर; मैं तेरा संगी दास हूँ; परमेश्वर ही की आराधना कर।”
11. हम इस खतरे से भली-भाँति बच जाएँगे, यदि हम इस पर विचार करें कि परमेश्वर अपनी सामर्थ्य प्रकट करने, अपने लोगों की सुरक्षा का प्रबन्ध करने और अपनी उदारता के दान बाँटने में उनकी सेवा के बिना सीधे कार्य करने के बदले उसे काम में क्यों लाता है। यह वह निश्चय ही आवश्यकता से नहीं करता, मानो उनके बिना काम चलाना उसके लिए सम्भव न हो। जब चाहता है, उन्हें छोड़ देता है और केवल एक संकेत से अपना काम पूरा कर देता है: वे उसे किसी कठिनाई से मुक्त करने से कितने दूर हैं। इसलिए जब वह उन्हें काम में लाता है, तो हमारी दुर्बलता की सहायता के लिए, ताकि हमारी आशा को ऊँचा उठाने या हमारे भरोसे को दृढ़ करने में कुछ कमी न रहे। वैसे तो हमारे लिए इतना ही काफ़ी होना चाहिए कि प्रभु स्वयं को हमारा रक्षक घोषित करता है। परन्तु जब हम अपने आपको इतने खतरों, इतनी हानियों और इतने प्रकार के शत्रुओं से घिरा देखते हैं, तो हमारी निर्बलता और कायरता ऐसी है कि कभी-कभी हम भय से भर जाएँ, या निराशा में डूब जाएँ, यदि प्रभु हमारी दुर्बल क्षमताओं के अनुकूल किसी साधन से अपनी अनुग्रहपूर्ण उपस्थिति की घोषणा न करे। इसी कारण वह न केवल हमारी चिन्ता करने की प्रतिज्ञा करता है, वरन् हमें निश्चय दिलाता है कि उसके असंख्य सेवक हैं जिन्हें उसने हमारी सुरक्षा सौंपी है, ताकि जो भी खतरे सिर पर मण्डराएँ, जब तक हम उनकी सुरक्षा और रखवाली से घिरे हैं, तब तक हम हर हानि के संकट से परे रखे गए हैं। मैं मानता हूँ कि जब हमें ईश्वरीय सुरक्षा का सीधा-सादा आश्वासन मिल चुका है, तब भी सहायता के लिए इधर-उधर देखते रहना अनुचित है। परन्तु चूँकि हमारी इस दुर्बलता के लिए प्रभु अपनी असीम भलाई और कृपालुता से प्रबन्ध करना चाहता है, इसलिए इस उपकार की अनदेखी करना हमें शोभा नहीं देता। इसका उदाहरण हमें एलीशा के सेवक में मिलता है (2 राजाओं 6:17), जिसने पहाड़ को अश्शूरियों की सेना से घिरा और बचने का कोई उपाय न देखकर भय से पूरी तरह हार मान ली, और समझा कि उसका और उसके स्वामी का सब कुछ समाप्त हो गया। तब एलीशा ने परमेश्वर से प्रार्थना की कि वह सेवक की आँखें खोल दे, और उसने तुरन्त देखा कि पहाड़ घोड़ों और आग के रथों से भरा है; अर्थात् स्वर्गदूतों की एक भीड़ से, जिन्हें उसकी और भविष्यद्वक्ता की देखभाल सौंपी गई थी। इस दर्शन से दृढ़ होकर उसने साहस पाया, और उस शत्रु को निडर होकर ललकार सका, जिसका रूप पहले उसे भय से भर देता था।
12. इसलिए स्वर्गदूतों की सेवा के विषय में जो कुछ कहा गया है, उसे हम सब अविश्वास दूर करने और परमेश्वर पर अपने भरोसे को दृढ़ करने के लिए काम में लाएँ। चूँकि प्रभु ने हमें ऐसी सुरक्षा दी है, इसलिए हम अपने शत्रुओं की भीड़ से ऐसे न घबराएँ मानो उसकी सहायता के होते हुए भी वे प्रबल हो सकते हैं, वरन् एलीशा का वह भाव अपनाएँ कि जो हमारे विरुद्ध हैं उनसे अधिक हमारे साथ हैं। इसलिए यह कितना बेतुका है कि हम अपने आपको उन स्वर्गदूतों के द्वारा परमेश्वर से दूर ले जाए जाने दें जो ठीक इसी उद्देश्य से ठहराए गए हैं कि हमें सहायता के लिए उसकी अधिक प्रत्यक्ष उपस्थिति का निश्चय दिलाएँ! परन्तु हम ऐसे ही दूर ले जाए जाते हैं, यदि स्वर्गदूत हमें सीधे उसकी ओर न ले जाएँ—हमें उसी की ओर देखने, उसी को पुकारने और उसी का गुणगान करने की ओर न लगाएँ कि वही हमारा एकमात्र रक्षक है—यदि उन्हें केवल उन हाथों के रूप में न माना जाए जो ठीक उसके निर्देश के अनुसार हमारी सहायता को चलते हैं—यदि वे हमें मसीह की ओर न ले जाएँ जो एकमात्र मध्यस्थ है, जिस पर हमें पूरी तरह निर्भर रहना और टिकना है, उसी की ओर देखते हुए और उसी में विश्राम करते हुए। हमारे मनों को उस पर पूरा ध्यान देना चाहिए जो याकूब ने अपने दर्शन में देखा (उत्पत्ति 28:12),—स्वर्गदूत एक सीढ़ी के द्वारा पृथ्वी पर मनुष्यों के पास उतर रहे थे, और फिर मनुष्यों के पास से स्वर्ग को चढ़ रहे थे, जिस सीढ़ी के ऊपर सेनाओं का प्रभु विराजमान था; इससे यह संकेत मिलता है कि स्वर्गदूतों की सेवा केवल मसीह की मध्यस्थता से ही हम तक पहुँचती है, जैसा कि वह स्वयं घोषित करता है, “अब से तुम स्वर्ग को खुला हुआ, और परमेश्वर के स्वर्गदूतों को मनुष्य के पुत्र के ऊपर उतरते और चढ़ते देखोगे” (यूहन्ना 1:51)। इसलिए अब्राहम का सेवक, यद्यपि उसे एक स्वर्गदूत की रखवाली में सौंपा गया था (उत्पत्ति 24:7), फिर भी उस स्वर्गदूत को अपने साथ रहने के लिए नहीं पुकारता, वरन् उस सौंपे जाने पर भरोसा रखकर अपनी प्रार्थनाएँ प्रभु के सामने उँडेलता है, और उससे विनती करता है कि वह अब्राहम पर दया करे। जैसे परमेश्वर स्वर्गदूतों को अपनी सामर्थ्य और भलाई का सेवक इसलिए नहीं बनाता कि वह अपनी महिमा उनके साथ बाँटे, वैसे ही वह उनके द्वारा अपनी सहायता की प्रतिज्ञा इसलिए नहीं करता कि हम अपना भरोसा उसके और उनके बीच बाँट दें। इसलिए प्लेटो के उस दर्शन को दूर करें जो स्वर्गदूतों के द्वारा परमेश्वर तक पहुँच खोजता है और उन्हें इस दृष्टि से मनाता है कि परमेश्वर अधिक प्रसन्न हो (Plat. in Epinomide et Cratylo),—ऐसा दर्शन जिसे दुस्साहसी और अन्धविश्वासी मनुष्यों ने आरम्भ में हमारे धर्म में घुसाने का प्रयत्न किया, और जिस पर वे आज तक अड़े हुए हैं।
13. शैतानों के विषय में पवित्रशास्त्र जो कुछ सिखाता है, उस सबकी प्रवृत्ति यह है कि हम उनकी चालों और षड्यन्त्रों से सावधान रहें, ताकि हम अपने आपको इतने सबल हथियारों से सज्जित करें कि सबसे भयंकर शत्रुओं को भी भगा सकें। क्योंकि जब शैतान को इस संसार का ईश्वर और अधिकारी, हथियारबन्द बलवन्त मनुष्य, आकाश के अधिकार का प्रधान, गरजनेवाला सिंह कहा गया है,114 तो इन सब वर्णनों का उद्देश्य हमें और सावधान और चौकस बनाना, और संघर्ष के लिए और तैयार करना है। यह कभी-कभी स्पष्ट शब्दों में भी कहा गया है। क्योंकि पतरस, शैतान को गरजते हुए सिंह के रूप में वर्णित करके, जो इधर-उधर घूमता है कि किसे फाड़ खाए, तुरन्त यह उपदेश जोड़ता है, “विश्वास में दृढ़ होकर उसका साम्हना करो” (1 पतरस 5:9)। और पौलुस, यह स्मरण दिलाकर कि हमारा मल्लयुद्ध लहू और माँस से नहीं, परन्तु प्रधानों से, अधिकारियों से, इस संसार के अन्धकार के शासकों से, और उस दुष्टता की आत्मिक सेनाओं से है जो आकाश में हैं, तुरन्त हमें इतने बड़े और भयंकर युद्ध के योग्य कवच धारण करने की आज्ञा देता है (इफिसियों 6:12)। इसलिए इन सब कथनों को हम इसी उपयोग में लाएँ। सबसे साहसी, सबसे सामर्थी, सबसे चालाक, सबसे अथक, सब यन्त्रों से पूर्णतया सज्जित और युद्ध-विद्या में सबसे निपुण शत्रु की निरन्तर उपस्थिति की पूर्व-चेतावनी पाकर, हम अपने आपको आलस्य या कायरता का शिकार न होने दें, वरन् इसके विपरीत, जागृत मन से और सदा सजग रहकर, विरोध करने को तैयार खड़े रहें; और यह जानते हुए कि यह युद्ध केवल मृत्यु पर ही समाप्त होता है, हम दृढ़ बने रहने का यत्न करें। सबसे बढ़कर, अपनी दुर्बलता और कौशल की कमी को भली-भाँति जानते हुए, हम परमेश्वर की सहायता माँगें, और उस पर भरोसा किए बिना कुछ न करने का प्रयत्न करें, क्योंकि केवल वही है जो सलाह, और शक्ति, और साहस, और शस्त्र देता है।
114 2 कुरिन्थियों 4:4; यूहन्ना 12:31; मत्ती 12:29; इफिसियों 2:2।
14. ताकि हम ऐसा करने के लिए और अधिक प्रबलता से उभारे जाएँ, पवित्रशास्त्र घोषित करता है कि जो शत्रु हमसे युद्ध करते हैं वे एक या दो, या थोड़े नहीं, वरन् एक बड़ी सेना हैं। कहा गया है कि मरियम मगदलीनी सात दुष्टात्माओं से छुड़ाई गई जो उसमें थीं; और हमारा उद्धारकर्ता हमें बताता है कि यह साधारण बात है कि जब कोई दुष्टात्मा निकाल दी जाए, और उसे फिर प्रवेश मिले, तो वह अपने से भी अधिक दुष्ट सात और आत्माओं को साथ लेकर खाली स्थान पर फिर अधिकार कर लेती है। वरन् एक मनुष्य में पूरी सेना के समान दुष्टात्माएँ बसी बताई गई हैं।115 इससे हमें सिखाया गया है कि जिन शत्रुओं से हमें लड़ना है उनकी संख्या लगभग अनन्त है, ताकि हम उनकी थोड़ी संख्या का तुच्छ विचार करके संघर्ष में ढीले न पड़ें, या यह कल्पना करके कि हमें बीच-बीच में युद्धविराम दिया जाता है, आलस्य में न पड़ जाएँ। एक ही शैतान या दुष्टात्मा का बार-बार एकवचन में उल्लेख होने में, जो बात सूचित है वह अधर्म का वह प्रभुत्व है जो धार्मिकता के राज्य के विरुद्ध खड़ा है। क्योंकि जैसे कलीसिया और सन्तों की संगति का सिर मसीह है, वैसे ही दुष्टों का दल और दुष्टता स्वयं अपने प्रधान के साथ, जो प्रभुत्व करता है, चित्रित की गई है। इसी से यह वचन है, “हे स्रापित लोगो, मेरे सामने से उस अनन्त आग में चले जाओ जो शैतान और उसके दूतों के लिये तैयार की गई है” (मत्ती 25:41)।
15. एक बात जो हमें शैतान से निरन्तर संघर्ष करने को उमंग देनी चाहिए, यह है कि उसे सर्वत्र हमारा भी और परमेश्वर का भी विरोधी कहा गया है। क्योंकि यदि परमेश्वर की महिमा हमें प्रिय है, जैसी होनी चाहिए, तो जो उस महिमा को मिटाना चाहता है उसके विरुद्ध हमें अपनी पूरी शक्ति से संघर्ष करना चाहिए। यदि मसीह के राज्य को बनाए रखने के लिए हमारे भीतर उचित धुन है, तो जो उसके विनाश का षड्यन्त्र रचता है उससे हमें समझौते-रहित युद्ध करना चाहिए। फिर, यदि हमें अपने उद्धार की कोई चिन्ता है, तो जो उसके विनाश की योजनाएँ निरन्तर बनाता रहता है उससे हमें न शान्ति करनी चाहिए, न युद्धविराम। परन्तु शैतान का चरित्र उत्पत्ति के तीसरे अध्याय में ऐसा ही दिया गया है, जहाँ वह मनुष्य को परमेश्वर की आज्ञाकारिता से बहकाता दिखाई देता है, ताकि वह परमेश्वर को उसका उचित सम्मान न लेने दे और मनुष्य को सिर के बल विनाश में गिरा दे। सुसमाचारों में भी उसका ऐसा ही वर्णन है (मत्ती 13:28), जहाँ उसे बैरी कहा गया है, और कहा गया है कि वह अनन्त जीवन के बीज को बिगाड़ने के लिए जंगली दाने बोता है। एक ही शब्द में, उसके सब कार्यों में हम अपने उद्धारकर्ता के उस वर्णन की सच्चाई का अनुभव करते हैं कि वह “आरम्भ से हत्यारा है, और सत्य पर स्थिर न रहा” (यूहन्ना 8:44)। सत्य पर वह झूठ से आक्रमण करता है, ज्योति को अन्धकार से ढाँपता है। मनुष्यों के मनों को वह भूल में उलझाता है; बैर उभारता है, झगड़े और युद्ध भड़काता है, और यह सब इसलिए कि वह परमेश्वर के राज्य को उलट दे, और मनुष्यों को अपने साथ अनन्त विनाश में डुबा दे। इससे प्रकट है कि उसका सम्पूर्ण स्वभाव भ्रष्ट, हानिकारक और द्वेषपूर्ण है। जिस मन का झुकाव परमेश्वर की महिमा और मनुष्य के उद्धार पर आक्रमण करने की ओर है, उसमें अत्यन्त भ्रष्टता अवश्य होगी।
115 मरकुस 16:9; मत्ती 12:43; लूका 8:30।
यूहन्ना अपनी पत्री में इसी की ओर संकेत करता है जब वह कहता है कि वह “आरम्भ से पाप करता आया है” (1 यूहन्ना 3:8), जिसका अर्थ है कि वह सब द्वेष और दुष्टता का रचनेवाला, अगुवा और योजनाकार है।
16. परन्तु चूँकि शैतान परमेश्वर का रचा हुआ है, हमें स्मरण रखना चाहिए कि यह द्वेष जो हम उसके स्वभाव में बताते हैं, सृष्टि से नहीं, वरन् बिगड़ जाने से है। उसमें जो कुछ भी दण्ड के योग्य है, वह उसने अपने विद्रोह और पतन से स्वयं अपने ऊपर बुलाया है। पवित्रशास्त्र हमें यही स्मरण दिलाता है, ऐसा न हो कि यह मानकर कि वह आरम्भ से ऐसा ही रचा गया था, हम परमेश्वर पर वह बात आरोपित कर दें जो उसके स्वभाव से सबसे अधिक पराई है। इसी कारण मसीह घोषित करता है (यूहन्ना 8:44) कि शैतान जब झूठ बोलता है, तो “अपने स्वभाव ही से बोलता है,” और कारण बताता है, “क्योंकि वह सत्य पर स्थिर न रहा।” यह कहकर कि वह सत्य पर स्थिर न रहा, वह निश्चय ही संकेत देता है कि वह कभी सत्य में था, और उसे झूठ का पिता कहकर वह शैतान के लिए यह असम्भव कर देता है कि वह उस भ्रष्टता का दोष परमेश्वर पर लगाए जिसका कारण वह स्वयं था। यद्यपि ये कथन संक्षिप्त हैं और बहुत स्पष्ट नहीं, फिर भी परमेश्वर की महिमा को हर निन्दा से बचाने के लिए पूरी तरह पर्याप्त हैं। और शैतानों के विषय में हमारे लिए इससे अधिक जानना क्या आवश्यक है? कुछ लोग बड़बड़ाते हैं कि पवित्रशास्त्र अनेक स्थानों में शैतान के पतन, उसके कारण, रीति, समय और स्वरूप का स्पष्ट और क्रमबद्ध वर्णन नहीं करता। परन्तु चूँकि ये बातें हमारे लिए कोई महत्त्व नहीं रखतीं, इसलिए उचित था कि यदि इन्हें पूरी तरह चुप्पी में न छोड़ा जाए, तो कम से कम केवल हल्के से छुआ जाए। पवित्र आत्मा निरर्थक और निष्फल कथाओं से जिज्ञासा को खिलाना स्वीकार नहीं कर सकता था। हम देखते हैं कि प्रभु का उद्देश्य यह था कि अपनी पवित्र वाणियों में वह कुछ ऐसा न दे जिसे हम उन्नति के लिए न सीख सकें। इसलिए फालतू बातों पर ठहरने के बदले हमारे लिए इतना काफ़ी हो कि शैतानों के स्वभाव के विषय में हम संक्षेप में यह थामे रहें कि अपनी पहली सृष्टि में वे परमेश्वर के स्वर्गदूत थे, परन्तु विद्रोह करके उन्होंने स्वयं को भी नाश किया और दूसरों के विनाश के साधन भी बने। चूँकि इतना जानना लाभदायक था, इसलिए पतरस और यहूदा इसे स्पष्ट सिखाते हैं; वे कहते हैं, “परमेश्वर ने पाप करनेवाले स्वर्गदूतों को न छोड़ा, पर नरक में डालकर अन्धकार के गड़हों में सौंप दिया, ताकि न्याय के दिन तक बन्दी रहें” (2 पतरस 2:4; यहूदा पद 6)। और पौलुस, चुने हुए स्वर्गदूतों की बात करके, स्पष्ट रूप से उनके और त्यागे हुए स्वर्गदूतों के बीच एक मौन विरोधाभास खींचता है।
17. शैतान के विषय में कहा जाता है कि वह परमेश्वर से झगड़ा और युद्ध करता है; इसे इस सीमा के साथ समझना चाहिए कि शैतान परमेश्वर की इच्छा और सहमति के विरुद्ध कुछ भी नहीं कर सकता। क्योंकि हम अय्यूब के इतिहास में पढ़ते हैं कि शैतान परमेश्वर की उपस्थिति में अपनी आज्ञाएँ लेने के लिए आता है, और जब तक उसे अधिकार न दिया जाए, किसी कार्य को पूरा करने की हिम्मत नहीं करता। इसी प्रकार, जब अहाब को धोखा दिया जाना था, तो उसने सब भविष्यद्वक्ताओं के मुँह में झूठ बोलनेवाली आत्मा बनना अपने ऊपर लिया; और प्रभु से आज्ञा पाकर वह ऐसा ही करने लगा। इसी कारण, शाऊल को सतानेवाली आत्मा को प्रभु की ओर से भेजी हुई दुष्ट आत्मा कहा गया है, क्योंकि वह मानो वह कोड़ा था जिससे उस दुष्ट राजा के बुरे कामों का दण्ड दिया गया। एक और स्थान में कहा गया है कि मिस्र की विपत्तियाँ परमेश्वर ने बुरे स्वर्गदूतों के द्वारा भेजीं। इन विशेष उदाहरणों के अनुसार, पौलुस सामान्य रूप से घोषित करता है कि अविश्वासियों को परमेश्वर अन्धा करता है, यद्यपि उसने पहले उसे शैतान का काम बताया था।116 इसलिए प्रकट है कि शैतान परमेश्वर की सामर्थ्य के अधीन है, और उसके अधिकार से इस प्रकार शासित है कि उसे उसकी आज्ञा माननी ही पड़ती है। इसके अतिरिक्त, यद्यपि हम कहते हैं कि शैतान परमेश्वर का विरोध करता है, और उसके कार्यों से भिन्न कार्य करता है, फिर भी हम साथ ही यह मानते हैं कि यह विरोधाभास और विरोध परमेश्वर की अनुमति पर निर्भर है। मैं अभी शैतान की इच्छा और प्रयत्न की नहीं, केवल परिणाम की बात करता हूँ। क्योंकि शैतान का स्वभाव दुष्ट होने के कारण उसकी ईश्वरीय इच्छा मानने की ओर कोई प्रवृत्ति नहीं, वरन् इसके विपरीत वह पूरी तरह हठ और विद्रोह पर तुला है। इतना तो उसके अपने पास और उसकी अपनी अधर्मिता से है कि वह उत्सुकता से और जान-बूझकर परमेश्वर का विरोध करता है, और उन बातों का लक्ष्य रखता है जिन्हें वह परमेश्वर की इच्छा के सबसे विपरीत समझता है। परन्तु चूँकि परमेश्वर उसे अपनी सामर्थ्य की लगाम से बाँधे और जकड़े हुए रखता है, इसलिए वह केवल वही कार्य करता है जिनकी अनुमति उसे दी गई है, और इस प्रकार, चाहे अनिच्छा से, अपने सृष्टिकर्ता की आज्ञा मानता है, और जब-जब आवश्यकता होती है, उसकी सेवा करने को विवश होता है।
116 अय्यूब 1:6; 2:1; 1 राजाओं 22:20; 1 शमूएल 16:14; 18:10; 2 थिस्सलुनीकियों 2:9, 11।
18. इस प्रकार परमेश्वर अशुद्ध आत्माओं को अपनी इच्छा से इधर-उधर घुमाते हुए उन्हें विश्वासियों को परखने के लिए काम में लाता है, कि वे उनसे युद्ध करें, चालों से उन पर आक्रमण करें, प्रलोभनों से उन्हें उकसाएँ, उन पर निकट से दबाव डालें, उन्हें बेचैन करें, डराएँ और कभी-कभी घायल भी करें, परन्तु कभी जीतने या कुचलने न पाएँ; जबकि दुष्टों को वे दासता में रखती हैं, उनके मनों और शरीरों पर प्रभुता करती हैं, और उन्हें सब प्रकार के अधर्म में बँधुआ दासों की तरह काम में लाती हैं। चूँकि विश्वासी ऐसे शत्रुओं से सताए जाते हैं, इसलिए उनसे ऐसे उपदेशों में कहा गया है: “और न शैतान को अवसर दो;” “तुम्हारा विरोधी शैतान गरजनेवाले सिंह के समान इस खोज में रहता है कि किसे फाड़ खाए; विश्वास में दृढ़ होकर उसका साम्हना करो” (इफिसियों 4:27; 1 पतरस 5:8)। पौलुस स्वीकार करता है कि वह इस प्रकार के संघर्ष से मुक्त नहीं था, जब वह कहता है कि उसके घमण्ड को दबाने के लिए शैतान का एक दूत उसे घूँसे मारने को भेजा गया (2 कुरिन्थियों 12:7)। इसलिए यह परीक्षा परमेश्वर की सब सन्तानों के लिए साधारण है। परन्तु चूँकि शैतान का सिर कुचलने की प्रतिज्ञा (उत्पत्ति 3:15) मसीह और उसके सब अंगों पर समान रूप से लागू होती है, मैं इनकार करता हूँ कि विश्वासी उसके द्वारा कभी कुचले या जीते जा सकते हैं। वे प्रायः भयभीत तो हो जाते हैं, पर इतने नहीं कि स्वयं को सँभाल न सकें। वे प्रहारों के वेग से गिर जाते हैं, पर फिर उठ खड़े होते हैं; वे घायल होते हैं, पर प्राणघातक रूप से नहीं। अन्त में, वे अपने जीवन की सारी दौड़ में परिश्रम करते रहते हैं, ताकि अन्ततः विजय पाएँ, यद्यपि बीच-बीच में उन्हें हार भी मिलती है। हम जानते हैं कि दाऊद परमेश्वर के उचित क्रोध के कारण कुछ समय के लिए शैतान के हाथ छोड़ दिया गया, और उसके उकसाने से उसने प्रजा की गिनती की (2 शमूएल 24:1); और पौलुस भी बिना कारण नहीं, यदि कोई शैतान की चालों में फँस गया हो तो क्षमा की आशा दिलाता है (2 तीमुथियुस 2:26)। इसलिए वह अन्यत्र दिखाता है कि ऊपर उद्धृत प्रतिज्ञा इसी जीवन में आरम्भ होती है, जहाँ संघर्ष चलता है, और संघर्ष समाप्त होने के बाद पूरी होती है। उसके शब्द हैं, “शान्ति का परमेश्वर शैतान को तुम्हारे पाँवों से शीघ्र कुचलवा देगा” (रोमियों 16:20)। हमारे सिर में तो यह विजय सदा सिद्ध रही, क्योंकि संसार के सरदार का उसमें “कुछ नहीं” था (यूहन्ना 14:30); परन्तु हम में, जो उसके अंग हैं, यह अब आंशिक रूप से प्राप्त हुई है, और तब सिद्ध होगी जब हम अपना नश्वर शरीर उतार चुके होंगे, जिसके कारण हम दुर्बलता के अधीन हैं, और पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से परिपूर्ण हो चुके होंगे। इस प्रकार, जब मसीह का राज्य खड़ा और स्थापित होता है, शैतान का राज्य गिरता है, जैसा कि हमारा प्रभु स्वयं कहता है, “मैं शैतान को बिजली के समान स्वर्ग से गिरा हुआ देख रहा था” (लूका 10:18)। इन शब्दों से उसने उस समाचार की पुष्टि की जो प्रेरितों ने अपने प्रचार के प्रभाव के विषय में दिया। इसी प्रकार वह कहता है, “जब बलवन्त मनुष्य हथियार बाँधे हुए अपने घर की रखवाली करता है, तो उसकी संपत्ति बची रहती है। पर जब उससे बलवन्त कोई चढ़ाई करके उसे जीत लेता है, तो उसके वे हथियार जिन पर उसका भरोसा था, छीन लेता है और उसकी लूट बाँट देता है” (लूका 11:21, 22)। और इसी उद्देश्य से मसीह ने मरकर शैतान को, जिसके पास मृत्यु की सामर्थ्य थी, जीत लिया (इब्रानियों 2:14), और उसकी सब सेनाओं पर विजय पाई कि वे कलीसिया को हानि न पहुँचा सकें, जो अन्यथा हर क्षण उनसे दुःख पाती। क्योंकि (हमारी दुर्बलता ऐसी है और उसका क्रोध ऐसा प्रचण्ड) यदि हम अपने अगुवे की विजय पर भरोसा न रखते, तो उसके नाना प्रकार के और अटूट आक्रमणों का सामना किसी भी अवधि तक, चाहे कितनी ही छोटी हो, कैसे कर पाते? इसलिए परमेश्वर शैतान को विश्वासियों की आत्माओं पर प्रभुत्व नहीं करने देता, वरन् केवल अधर्मियों और अविश्वासियों को उसके अधिकार में सौंपता है, जिन्हें वह अपने झुण्ड में गिनना स्वीकार नहीं करता। क्योंकि कहा गया है कि शैतान इस संसार पर तब तक निर्विवाद अधिकार रखता है जब तक मसीह उसे वहाँ से हटा नहीं देता। इसी प्रकार कहा गया है कि वह उन सबको अन्धा करता है जो सुसमाचार पर विश्वास नहीं करते, और आज्ञा न माननेवालों की सन्तानों में अपना कार्य करता है। और ठीक भी है; क्योंकि सब दुष्ट क्रोध के बरतन हैं, और इसलिए ईश्वरीय बदले के सेवक के सिवा वे और किसके अधीन किए जाएँ? अन्त में, कहा गया है कि वे अपने पिता शैतान के हैं।117 क्योंकि जैसे विश्वासी परमेश्वर का स्वरूप धारण करने से उसकी सन्तान पहचाने जाते हैं, वैसे ही दुष्ट लोग उसके स्वरूप में गिर जाने के कारण उचित रूप से शैतान की सन्तान गिने जाते हैं।
19. पवित्र स्वर्गदूतों के विषय में उस निरर्थक दर्शन का ऊपर खण्डन कर चुकने के बाद, जो सिखाता है कि वे केवल भली गतियाँ या प्रेरणाएँ हैं जो परमेश्वर मनुष्यों के मनों में जगाता है, हमें यहाँ उनका भी खण्डन करना चाहिए जो मूर्खता से यह कहते हैं कि शैतान केवल बुरी भावनाएँ या विकार हैं जो हमारे शारीरिक स्वभाव से उठते हैं। इसका संक्षिप्त खण्डन इस विषय पर पवित्रशास्त्र के पदों में मिलता है, जो न थोड़े हैं, न अस्पष्ट। पहले तो, जब उन्हें अशुद्ध आत्माएँ और भ्रष्ट हुए स्वर्गदूत कहा गया है (मत्ती 12:43; यहूदा, पद 6), जो अपनी मूल अवस्था से गिर गए हैं, तो ये शब्द ही पर्याप्त रूप से घोषित करते हैं कि वे मन की गतियाँ या भावनाएँ नहीं हैं, वरन् सचमुच, जैसा कि उन्हें कहा गया है, बुद्धि और समझ से सम्पन्न मन या आत्माएँ हैं। इसी प्रकार, जब यूहन्ना, और हमारे उद्धारकर्ता भी, परमेश्वर की सन्तानों की तुलना शैतान की सन्तानों से करते हैं, तो यदि शैतान शब्द का अर्थ बुरी प्रेरणाओं के सिवा कुछ न होता, तो क्या यह तुलना बेतुकी न होती? और यूहन्ना और भी ज़ोर देकर जोड़ता है कि शैतान आरम्भ से पाप करता आया है (1 यूहन्ना 3:8)। इसी प्रकार, जब यहूदा प्रधान स्वर्गदूत मीकाईल को शैतान से विवाद करते हुए प्रस्तुत करता है (यहूदा, पद 9), तो वह निश्चय ही एक दुष्ट और विद्रोही स्वर्गदूत की तुलना एक भले स्वर्गदूत से करता है। इसी से मेल खाता वर्णन अय्यूब की पुस्तक में है कि शैतान पवित्र स्वर्गदूतों के साथ परमेश्वर की उपस्थिति में आया। परन्तु सबसे स्पष्ट पद वे हैं जो उस दण्ड का उल्लेख करते हैं जो परमेश्वर के न्याय से वे अभी से भोगने लगे हैं, और विशेष रूप से पुनरुत्थान के समय भोगेंगे, “हे परमेश्वर के पुत्र यीशु, हमारा तुझ से क्या काम? क्या तू समय से पहले हमें दुःख देने यहाँ आया है?” (मत्ती 8:29); और फिर, “हे स्रापित लोगो, मेरे सामने से उस अनन्त आग में चले जाओ जो शैतान और उसके दूतों के लिये तैयार की गई है” (मत्ती 25:41)। फिर, “जब परमेश्वर ने पाप करनेवाले स्वर्गदूतों को न छोड़ा, पर नरक में डालकर अन्धकार के गड़हों में सौंप दिया, ताकि न्याय के दिन तक बन्दी रहें,” इत्यादि (2 पतरस 2:4)। ये कथन कितने बेतुके होंगे कि शैतान अनन्त दण्ड के लिए ठहराए गए हैं, कि उनके लिए आग तैयार है, कि अभी भी मसीह की महिमा से वे तड़प और पीड़ा पा रहे हैं, यदि सचमुच कोई शैतान होते ही नहीं? परन्तु चूँकि इस विषय पर सब वाद-विवाद उनके लिए अनावश्यक है जो परमेश्वर के वचन पर विश्वास करते हैं, जबकि उन खोखले अटकलबाज़ों को पवित्रशास्त्र के पद सुनाने से बहुत कम लाभ होता है जिन्हें नवीनता के सिवा कुछ भाता ही नहीं, मैं मानता हूँ कि मैं अपने उद्देश्य के लिए पहले ही पर्याप्त कर चुका हूँ, जो यह था कि भक्तों को उन प्रलापी स्वप्नों से सावधान करूँ जिनसे बेचैन लोग स्वयं को और सीधे-सादे लोगों को सताते हैं। फिर भी यह विषय छूने योग्य था, ऐसा न हो कि कोई उस भूल को अपनाकर यह समझ ले कि उसका कोई शत्रु नहीं, और इस कारण विरोध करने में अधिक ढीला या कम सावधान हो जाए।
117 2 कुरिन्थियों 4:4; इफिसियों 2:2; रोमियों 9:22; यूहन्ना 8:44; 1 यूहन्ना 3:8।
20. इस बीच, इस अति सुन्दर रंगमंच में रखे जाने पर, आइए हम परमेश्वर के स्पष्ट और प्रत्यक्ष कार्यों में भक्तिपूर्वक आनन्द लेने से इनकार न करें। क्योंकि, जैसा कि हमने अन्यत्र देखा है, यद्यपि यह मुख्य नहीं, तथापि क्रम की दृष्टि से विश्वास का पहला प्रमाण है कि हम जिस ओर भी मुड़ें यह स्मरण रखें कि जो कुछ आँखों के सामने आता है वह परमेश्वर का कार्य है, और साथ ही भक्तिपूर्ण सावधानी से उस उद्देश्य पर मनन करें जो परमेश्वर ने उसे रचते समय अपने सामने रखा था। इसलिए, ताकि हम सच्चे विश्वास से उसे ग्रहण कर सकें जो परमेश्वर के विषय में जानना आवश्यक है, सृष्टि के उस इतिहास पर ध्यान देना महत्त्वपूर्ण है जो मूसा ने संक्षेप में लिखा और जिसे बाद में भक्त लेखकों ने, विशेषकर बासिल और अम्ब्रोस ने, अधिक विस्तार से स्पष्ट किया। इस इतिहास से हम सीखते हैं कि परमेश्वर ने अपने वचन और अपनी आत्मा की सामर्थ्य से आकाश और पृथ्वी को शून्य से रचा; कि इसके बाद उसने सब प्रकार की निर्जीव और सजीव वस्तुएँ उत्पन्न कीं, असंख्य प्रकार की वस्तुओं को अद्भुत क्रम में सजाया, प्रत्येक जाति को उसका उचित स्वभाव, कार्य, स्थान और पद दिया; साथ ही, चूँकि सब वस्तुएँ नाश के अधीन थीं, प्रत्येक जाति की निरन्तरता का प्रबन्ध किया, कुछ को गुप्त रीतियों से पोषित किया और मानो समय-समय पर उनमें नई शक्ति डाली, और अन्य को अपनी जाति बढ़ाते रहने की सामर्थ्य दी, ताकि वह उनकी अपनी मृत्यु के साथ नष्ट न हो जाए। इस प्रकार आकाश और पृथ्वी के अत्यन्त समृद्ध रूप से सजाए जाने और सब वस्तुओं से भरपूर भर दिए जाने पर, एक विशाल और भव्य भवन की तरह जो शानदार रीति से बना और उत्कृष्ट रीति से सजा हो, अन्त में मनुष्य रचा गया—मनुष्य, जो अपने रूप की सुन्दरता और अपनी अनेक उत्कृष्ट योग्यताओं के कारण परमेश्वर के कार्यों का सबसे तेजस्वी नमूना है। परन्तु चूँकि मेरा विचार सृष्टि का इतिहास विस्तार से देने का नहीं है, इसलिए इसे फिर इस प्रकार संक्षेप में प्रसंगवश छूना ही पर्याप्त है। मैं पाठक को पहले ही स्मरण दिला चुका हूँ कि उसके लिए सबसे उत्तम मार्ग यही है कि इस विषय का ज्ञान मूसा से और उन अन्य लोगों से ले जिन्होंने सृष्टि का वृत्तान्त ध्यानपूर्वक और विश्वासयोग्य रीति से आगे पहुँचाया है।
21. परमेश्वर के कार्यों पर विचार करने में जिस उद्देश्य को सामने रखना चाहिए, उस पर विस्तार से ठहरना अनावश्यक है। इस विषय की बहुत हद तक व्याख्या अन्यत्र हो चुकी है, और हमारे वर्तमान कार्य को जितना चाहिए, उसे अब थोड़े शब्दों में निपटाया जा सकता है। निस्सन्देह यदि कोई संसार की रचना में परमेश्वर की अनमोल बुद्धि, सामर्थ्य, न्याय और भलाई का यथोचित शब्दों में वर्णन करने का प्रयत्न करे, तो भाषा की कोई शोभा या तेज उस विषय की महानता की बराबरी नहीं कर सकता। फिर भी इसमें कोई सन्देह नहीं कि प्रभु चाहता है कि हम ऐसे पवित्र मनन में निरन्तर लगे रहें, ताकि जब हम सृष्टियों में, मानो अनेक दर्पणों में, प्रकट हुई बुद्धि और भलाई की अपार निधियों को देखें, तो हम उन पर केवल जल्दबाज़ी की, और मानो क्षणभंगुर, दृष्टि न डालें, वरन् उन पर देर तक ठहरें, गम्भीरता और निष्ठा से उन्हें अपने मन में घुमाएँ, और बार-बार स्मरण में लाएँ। परन्तु चूँकि वर्तमान ग्रन्थ शिक्षा देनेवाला है, हम उन विषयों में उचित रूप से नहीं पड़ सकते जिनके लिए लम्बे प्रवचन की आवश्यकता है। इसलिए संक्षेप में कहने के लिए, पाठक यह समझे कि संसार के सृष्टिकर्ता के रूप में परमेश्वर के स्वरूप की उसे सच्ची समझ तब है, पहले, जब वह इस सामान्य नियम पर ध्यान दे कि परमेश्वर अपनी सृष्टियों में जो तेजस्वी सिद्धताएँ प्रकट करता है, उन्हें कभी लापरवाही या भूल से न छोड़ दे; और दूसरे, जब वह जो देखता है उसे अपने ऊपर लागू करे, ताकि वह उसके हृदय में गहरी बैठ जाए। पहली बात का उदाहरण तब मिलता है जब हम विचार करते हैं कि वह रचनेवाला कितना महान होगा जिसने तारों की सेना की भीड़ को इतने अद्भुत रूप से गढ़ा और सजाया कि इससे अधिक तेजस्वी दृश्य की कल्पना करना असम्भव है; कुछ को इस प्रकार स्थित और विशेष स्थानों में जड़ दिया कि वे हिल नहीं सकते; दूसरों को अधिक स्वतन्त्र मार्ग दिया फिर भी उनके भटकने की सीमाएँ बाँध दीं; सबकी गति को ऐसा संयमित किया कि दिन और रात, महीने, वर्ष और ऋतुएँ नाप दी जाएँ, और साथ ही दिनों की असमानता को ऐसा नियन्त्रित किया कि किसी प्रकार की गड़बड़ी न हो। पहली बात का उदाहरण तब भी मिलता है जब हम उसकी उस सामर्थ्य पर ध्यान देते हैं जिससे वह इस विशाल पिण्ड को थामे रखता और आकाशीय पिण्डों के तेज़ परिक्रमण का मार्गदर्शन करता है, इत्यादि। ये थोड़े-से उदाहरण पर्याप्त रूप से समझा देते हैं कि संसार की सृष्टि में ईश्वरीय सिद्धताओं को पहचानने का क्या अर्थ है। यदि हम सारे विषय को पार करने का प्रयत्न करें तो कभी निष्कर्ष तक न पहुँचेंगे, क्योंकि ईश्वरीय सामर्थ्य के उतने ही चमत्कार, बुद्धि और भलाई के उतने ही प्रभावशाली प्रमाण हैं जितने वस्तुओं के वर्ग हैं, वरन् जितनी समस्त ब्रह्माण्ड में बड़ी या छोटी अलग-अलग वस्तुएँ हैं।
22. दूसरी बात, जिसका विश्वास से अधिक निकट सम्बन्ध है, अभी विचारने को शेष है—अर्थात् यह कि जब हम देखते हैं कि परमेश्वर ने सब वस्तुओं को हमारी भलाई और उद्धार के लिए ठहराया है, तब साथ ही हम अपने भीतर भी और उन बड़ी आशीषों में भी, जो उसने हमें दी हैं, उसकी सामर्थ्य और अनुग्रह का अनुभव करें; और इससे अपने आपको उस पर भरोसा रखने, उसे पुकारने, उसकी स्तुति करने और उससे प्रेम करने के लिए उभारें। इसके अतिरिक्त, जैसा मैंने अभी कहा, प्रभु ने स्वयं सृष्टि के क्रम ही से यह प्रमाणित कर दिया है कि उसने सब वस्तुएँ मनुष्य के लिए रचीं। और यह देखना भी महत्त्वहीन नहीं कि उसने संसार की रचना को छः दिनों में बाँटा, यद्यपि सारे कार्य को उसके सब अंगों सहित एक क्षण में पूरा करना क्रमिक प्रगति से किसी भी प्रकार अधिक कठिन न होता। परन्तु वह इसमें हमारे प्रति अपना विधान और पितृतुल्य चिन्ता दिखाना चाहता था कि मनुष्य को रचने से पहले उसने वह सब तैयार कर दिया जो उसने पहले से देखा कि उसके लिए उपयोगी और हितकर होगा। इसलिए यह कितनी कृतघ्नता होगी कि हम इस पर सन्देह करें कि इस परम उत्तम पिता को हमारी चिन्ता है, जिसे हम देखते हैं कि उसने हमारे जन्म से पहले ही हमारी चिन्ता की! यह कितना अधर्म होगा कि हम अविश्वास में काँपें, कि कहीं एक दिन अपनी आवश्यकता में हम उस कृपा द्वारा त्याग न दिए जाएँ, जिसने हमारे अस्तित्व से भी पहले सब भली वस्तुओं की पूरी पूर्ति में स्वयं को प्रकट किया! इसके अतिरिक्त, मूसा हमें बताता है कि संसार में जो कुछ है वह सब उदारता से हमारे अधिकार में रखा गया है। यह परमेश्वर ने निश्चय ही इसलिए नहीं किया कि हमें दान के खोखले रूप से धोखा दे। इसलिए हमारी सुरक्षा से सम्बन्ध रखनेवाली कोई वस्तु कभी कम न पड़ेगी। अन्त में, एक ही शब्द में; जब-जब हम परमेश्वर को आकाश और पृथ्वी का सृष्टिकर्ता कहें, तब-तब यह स्मरण रखें कि जो कुछ उसने रचा उन सब वस्तुओं का वितरण उसी के हाथ और सामर्थ्य में है, परन्तु हम उसके पुत्र हैं, जिन्हें पालने और अपनी आज्ञाकारिता में बढ़ाने का भार उसने उठाया है, ताकि हम सब भली वस्तुओं का सार केवल उसी से आशा रखें, और पूरी आशा रखें कि वह हमें उद्धार के लिए आवश्यक वस्तुओं में कभी घटी न होने देगा कि हमें किसी और स्रोत पर निर्भर रहना पड़े; ताकि हम जो कुछ भी चाहें उसके लिए अपनी प्रार्थनाएँ उसी से करें, और जो भी भलाई पाएँ उसमें उसका हाथ पहचानें और उसका धन्यवाद करें; इस प्रकार उसकी बड़ी भलाई और उदारता से खिंचकर हम पूरे हृदय से उससे प्रेम करने और उसकी सेवा करने का यत्न करें।
