पुस्तक II · अध्याय 6

खोए हुए मनुष्य के लिए छुटकारा मसीह में ढूँढ़ना होगा

Institutes of the Christian Religion · John Calvin

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खोए हुए मनुष्य के लिए छुटकारा मसीह में ढूँढ़ना होगा

अध्याय 6।

खोए हुए मनुष्य के लिए छुटकारा मसीह में ढूँढ़ना होगा।

इस अध्याय के भाग ये हैं: I. छुड़ानेवाले मसीह के सिद्धान्त की उत्कृष्टता—ऐसा सिद्धान्त जिसे कलीसिया ने सदा माना है, खण्ड 1। II. दोनों विधानों में मध्यस्थ मसीह धर्मी इस्राएलियों और प्राचीन लोगों के विश्वास के सामने रखा गया था, जैसा बलिदान की स्थापना, अब्राहम के घराने की बुलाहट, और दाऊद तथा उसके वंश की उन्नति से प्रकट है, खण्ड 2। III. इसी से व्यवस्था के अधीन भक्तों की शान्ति, बल, आशा और भरोसा था, क्योंकि उनके स्वर्गीय पिता ने उनके सामने मसीह को अनेक रीतियों से रखा।

खण्ड।

1. सृष्टिकर्ता परमेश्वर का ज्ञान छुड़ानेवाले मसीह में विश्वास के बिना किसी काम का नहीं। पहला कारण। एक प्रेरित की गवाही से दृढ़ किया गया दूसरा कारण। निष्कर्ष। यह सिद्धान्त जगत् के आरम्भ से सब युगों में परमेश्वर की सन्तानों ने माना है। उन अन्यजातियों के लिए, जो मसीह के विषय में कुछ नहीं जानते, स्वर्ग का द्वार खोल देने की भूल। इसके बहानों का पवित्रशास्त्र के अंशों से खण्डन।

2. प्राचीन इस्राएलियों पर परमेश्वर मध्यस्थ मसीह के बिना कभी प्रसन्न न हुआ। पहला कारण बलिदान की स्थापना पर आधारित। दूसरा कारण अब्राहम की बुलाहट पर आधारित। तीसरा कारण दाऊद के घराने की राजकीय प्रतिष्ठा तक उन्नति पर आधारित, और पवित्रशास्त्र के स्पष्ट अंशों से पुष्ट।

3. मसीह दुखियों के लिए सदा प्रतिज्ञा की गई शान्ति है; विश्वास और आशा की पताका सदा ऊँची रही। यह पवित्रशास्त्र के विविध अंशों से पुष्ट।

4. यहूदियों को मसीह की ओर दृष्टि रखना सिखाया गया। इस शिक्षा पर हमारे उद्धारकर्ता की स्वयं मुहर लगी। यह साधारण कथन कि परमेश्वर विश्वास का विषय है, समझाए और सीमित किए जाने की अपेक्षा रखता है। मसीह के विषय में इस चर्चा का निष्कर्ष। अन्यजातियों में उद्धार देनेवाला कोई ज्ञान नहीं।

1. आदम में सारा मानव-वंश नष्ट हो गया, इसलिए हमारी उत्पत्ति की जो उत्कृष्टता और गरिमा ऊपर वर्णित हुई, वह हमारे किसी काम आना तो दूर, उलटे हमारी और अधिक लज्जा का कारण बन जाती है—जब तक कि परमेश्वर, जो पाप से अशुद्ध और भ्रष्ट हुए मनुष्य को अपनी रचना नहीं मानता, अपने एकलौते पुत्र के व्यक्तित्व में छुड़ानेवाले के रूप में प्रकट न हो। जीवन से मृत्यु में हमारे गिर जाने के बाद परमेश्वर सृष्टिकर्ता के उस सारे ज्ञान का, जिसकी हमने चर्चा की है, कोई लाभ न होता, यदि उसके पीछे वह विश्वास न आता जो मसीह में परमेश्वर को हमारे पिता के रूप में हमारे सामने रखता है। निःसन्देह स्वाभाविक क्रम यही था कि जगत् की रचना एक पाठशाला हो जिसमें हम भक्ति सीखें और उससे अनन्त जीवन और पूर्ण आनन्द की ओर बढ़ें। परन्तु ऊपर और नीचे जहाँ कहीं हम दृष्टि करते हैं वहाँ पूर्णता को देखने के बाद भी हमारा सामना परमेश्वर के शाप से होता है, जो निर्दोष प्राणियों को भी हमारे दोष में लपेटता हुआ, अनिवार्य रूप से हमारी अपनी आत्माओं को निराशा से भर देता है। क्योंकि यद्यपि परमेश्वर अब भी बहुत रीतियों से हम पर अपनी पितृवत् कृपा प्रकट करने में प्रसन्न होता है, तो भी केवल जगत् को देखकर हम यह निष्कर्ष नहीं निकाल सकते कि वह हमारा पिता है। भीतर से विवेक हमें कोंचता और दिखाता है कि पाप हमारे त्यागे जाने का उचित कारण है; वह हमें यह सोचने नहीं देता कि परमेश्वर हमें पुत्र गिनता या वैसा व्यवहार करता है। इसके अतिरिक्त हमारा आलस्य और कृतघ्नता है। हमारे मन ऐसे अन्धे हैं कि सत्य को देख नहीं पाते, और हमारी सारी इन्द्रियाँ ऐसी भ्रष्ट हैं कि हम दुष्टता से परमेश्वर की महिमा छीन लेते हैं। इसलिए हमें पौलुस के साथ यह निष्कर्ष निकालना चाहिए, “इसलिए जब परमेश्वर के ज्ञान के अनुसार संसार ने अपनी बुद्धि से परमेश्वर को न जाना, तो परमेश्वर को यह अच्छा लगा कि इस प्रचार की मूर्खता के द्वारा विश्वास करनेवालों को बचाए,” (1 कुरिन्थियों 1:21)। “परमेश्वर के ज्ञान” से वह आकाश और पृथ्वी के इस भव्य रंगमंच को कहता है, जो असंख्य आश्चर्यों से भरा है, और जिसके बुद्धिमानी से मनन से हमें परमेश्वर को जानने में समर्थ होना चाहिए था। परन्तु हम यह बहुत थोड़े लाभ से करते हैं; इसलिए वह हमें मसीह में विश्वास के लिए बुलाता है—वह विश्वास, जो मूर्खता के आभास के कारण अविश्वासी को अरुचिकर लगता है। अतः यद्यपि क्रूस का प्रचार मानवीय बुद्धि के अनुकूल नहीं है, तो भी यदि हम अपने सृजनहार परमेश्वर के पास, जिससे हम दूर हो गए हैं, लौटना चाहते हैं कि वह फिर हमारा पिता बने, तो हमें नम्रता से उसे ग्रहण करना ही होगा। यह निश्चित है कि हमारे प्रथम पिता के पतन के बाद मध्यस्थ के बिना परमेश्वर का कोई ज्ञान उद्धार के लिए प्रभावकारी न रहा। जब मसीह कहता है, “अनन्त जीवन यह है कि वे तुझ अद्वैत सच्चे परमेश्वर को और यीशु मसीह को, जिसे तू ने भेजा है, जानें,” (यूहन्ना 17:3), तब वह केवल अपने युग की नहीं, वरन् सब युगों की बात करता है। इसलिए उन लोगों की धृष्टता और भी लज्जाजनक है जो उस अनुग्रह की अनुपस्थिति में भी अविश्वासियों और अपवित्र लोगों के लिए स्वर्ग का द्वार खोल देते हैं, जिसे पवित्रशास्त्र सदा एकमात्र द्वार बताता है जिससे होकर हम जीवन में प्रवेश करते हैं। यदि कोई हमारे उद्धारकर्ता के वचनों को सुसमाचार के प्रचार के बाद के समय तक ही सीमित करे, तो खण्डन तुरन्त उपलब्ध है; क्योंकि सब युगों और जातियों के लिए समान आधार पर यह घोषित किया गया है कि जो परमेश्वर से दूर हैं, और इस कारण शाप के अधीन और क्रोध की सन्तान हैं, वे जब तक मेल-मिलाप न पाएँ, परमेश्वर को प्रसन्न नहीं कर सकते। इसमें वह उत्तर भी जोड़ा जा सकता है जो हमारे उद्धारकर्ता ने सामरी स्त्री को दिया, “तुम जिसे नहीं जानते उसकी आराधना करते हो; हम जिसे जानते हैं उसकी आराधना करते हैं; क्योंकि उद्धार यहूदियों में से है,” (यूहन्ना 4:22)। इन शब्दों से वह हर अन्यजातीय धर्म को झूठा ठहराता है, और कारण भी बताता है—अर्थात् यह कि व्यवस्था के अधीन छुड़ानेवाले की प्रतिज्ञा केवल चुने हुए लोगों से की गई थी, और इसलिए कोई ऐसी आराधना परमेश्वर को कभी प्रसन्न न कर सकी जिसमें मसीह की ओर दृष्टि न रखी गई हो। इसीलिए पौलुस भी कहता है कि सब अन्यजाति “परमेश्वर से रहित” और जीवन की आशा से वंचित थे। अब, क्योंकि यूहन्ना सिखाता है कि आरम्भ से जीवन मसीह में था, और सारा जगत् उसे खो चुका था (यूहन्ना 1:4), इसलिए उसी सोते की ओर लौटना आवश्यक है; और इसी कारण मसीह घोषित करता है कि वह प्रायश्चित करनेवाला होने के कारण जीवन है। और सचमुच स्वर्ग का उत्तराधिकार परमेश्वर के पुत्रों को छोड़ किसी का नहीं है (यूहन्ना 15:6)। और जो एकलौते पुत्र की देह में कलम न लगाए गए हों, उनमें से किसी को पुत्रों का स्थान और पद देना अत्यन्त असंगत होगा। और यूहन्ना स्पष्ट गवाही देता है कि जो उसके नाम पर विश्वास करते हैं वे परमेश्वर की सन्तान बनते हैं। परन्तु चूँकि इस समय मसीह में विश्वास के विषय को विधिवत् चर्चा करना मेरा उद्देश्य नहीं है, इसलिए इतना ही पर्याप्त है कि उसे यहाँ प्रसंगवश छू लिया।

2. इसी से यह है कि परमेश्वर ने अपने प्राचीन लोगों पर मध्यस्थ के बिना कभी अपने को प्रसन्न न दिखाया, और न उन्हें अनुग्रह की कोई आशा दी। मैं व्यवस्था के उन बलिदानों की चर्चा नहीं करता जिनके द्वारा विश्वासियों को स्पष्ट और खुले रूप में सिखाया गया कि उद्धार उस प्रायश्चित को छोड़ और कहीं नहीं मिल सकता जिसे अकेले मसीह ने पूरा किया। मैं केवल इतना कहता हूँ कि कलीसिया की समृद्ध और सुखी दशा सदा मसीह के व्यक्तित्व पर आधारित रही। क्योंकि यद्यपि परमेश्वर ने अब्राहम के सारे वंश को अपनी वाचा में लिया, तो भी पौलुस ठीक ही तर्क देता है (गलातियों 3:16) कि मसीह सचमुच वह वंश था जिसमें पृथ्वी की सारी जातियाँ धन्य होनी थीं, क्योंकि हम जानते हैं कि जितने अब्राहम से शरीर के अनुसार उत्पन्न हुए, वे सब वंश नहीं गिने गए। इश्माएल और अन्य को छोड़ दें तो भी, इसहाक के दो पुत्रों, जुड़वाँ भाई एसाव और याकूब में से, गर्भ ही में एक क्यों चुना गया और दूसरा त्यागा गया? बल्कि पहलौठा क्यों त्यागा गया और केवल छोटा ही क्यों ग्रहण किया गया? फिर यह कैसे होता है कि अधिकांश लोग त्याग दिए जाते हैं? इसलिए स्पष्ट है कि अब्राहम का वंश मुख्यतः एक सिर में गिना जाता है, और प्रतिज्ञा किया हुआ उद्धार मसीह के पास आए बिना नहीं मिलता, जिसका काम बिखरे हुओं को इकट्ठा करना है। इस प्रकार चुने हुए लोगों का आदि लेपालकपन मध्यस्थ के अनुग्रह पर निर्भर था। यद्यपि मूसा में यह बहुत स्पष्ट शब्दों में व्यक्त नहीं है, तो भी यह सब भक्तों में सामान्यतः ज्ञात प्रतीत होता है। क्योंकि इस्राएलियों पर राजा ठहराए जाने से पहले शमूएल की माता हन्ना ने धर्मियों के सुख का वर्णन करते हुए अपने गीत में कहा, “वह अपने राजा को बल देगा, और अपने अभिषिक्त के सींग को ऊँचा करेगा;” इन शब्दों से उसका अर्थ था कि परमेश्वर अपनी कलीसिया को आशीष देगा। इससे मेल खाती वह भविष्यद्वाणी है जो आगे जोड़ी गई है, “मैं अपने लिए एक विश्वासयोग्य याजक खड़ा करूँगा, और वह मेरे अभिषिक्त के सम्मुख सदा चलता रहेगा,” (1 शमूएल 2:10, 35)। और इसमें कोई सन्देह नहीं कि हमारे स्वर्गीय पिता का अभिप्राय था कि दाऊद और उसके वंश में मसीह की एक जीवित छवि देखी जाए। इसीलिए धर्मियों को अपना भय मानने का उपदेश देते हुए वह उनसे कहता है, “पुत्र को चूमो,” (भजन संहिता 2:12)। इसके अनुरूप सुसमाचार का यह अंश है, “जो पुत्र का आदर नहीं करता, वह पिता का, जिसने उसे भेजा है, आदर नहीं करता,” (यूहन्ना 5:23)। इसलिए यद्यपि दस गोत्रों के विद्रोह से राज्य टूट गया, तो भी वह वाचा जो परमेश्वर ने दाऊद और उसके उत्तराधिकारियों में बाँधी थी, अवश्य स्थिर रहनी थी, जैसा उसके भविष्यद्वक्ताओं ने भी घोषित किया, “तो भी मैं सारा राज्य उसके हाथ से न छीनूँगा; परन्तु अपने दास दाऊद के कारण उसे जीवन भर प्रधान बनाए रखूँगा,” (1 राजाओं 11:34)। यही बात दूसरी और तीसरी बार दोहराई गई है। यह भी स्पष्ट कहा गया है, “मैं इस कारण दाऊद के वंश को दुःख तो दूँगा, परन्तु सदा के लिए नहीं,” (1 राजाओं 11:39)। कुछ समय बाद कहा गया, “तो भी दाऊद के कारण उसके परमेश्वर यहोवा ने उसे यरूशलेम में एक दीपक दिया, कि उसके पीछे उसके पुत्र को खड़ा करे और यरूशलेम को स्थिर रखे,” (1 राजाओं 15:4)। और जब बातें विनाश के निकट पहुँच गई थीं, तब फिर कहा गया, “तो भी यहोवा ने अपने दास दाऊद के कारण यहूदा को नष्ट करना न चाहा, क्योंकि उसने उसे और उसके वंश को सदा एक दीपक देने का वचन दिया था,” (2 राजाओं 8:19)। सारी बात का सार यह है—अन्य सब को छोड़कर दाऊद वह व्यक्ति चुना गया जिसमें यहोवा की प्रसन्नता निवास करे; जैसा अन्यत्र कहा गया है, “उसने शीलो के निवासस्थान को त्याग दिया;” “फिर उसने यूसुफ के तम्बू को तुच्छ जाना, और एप्रैम के गोत्र को न चुना;” “परन्तु यहूदा के गोत्र को, और अपने प्रिय सिय्योन पर्वत को चुन लिया;” “उसने अपने दास दाऊद को भी चुना, और भेड़शालाओं में से ले लिया; वह उसे दूध पिलानेवाली भेड़ों के पीछे-पीछे फिरने से ले आया कि वह उसकी प्रजा याकूब की, और उसके निज भाग इस्राएल की चरवाही करे,” (भजन संहिता 78:60, 67, 70, 71)। अन्ततः परमेश्वर ने अपनी कलीसिया को इस प्रकार सुरक्षित रखने में यह ठहराया कि उसकी सुरक्षा और उद्धार उसके सिर मसीह पर निर्भर हो। इसीलिए दाऊद पुकारता है, “यहोवा उनका बल है, और वह अपने अभिषिक्त के लिए उद्धार का दृढ़ गढ़ है;” और फिर प्रार्थना करता है, “अपनी प्रजा का उद्धार कर, और अपने निज भाग को आशीष दे;” इससे सूचित करता है कि कलीसिया की सुरक्षा मसीह के शासन से अटूट रूप से जुड़ी है। इसी अर्थ में वह अन्यत्र कहता है, “हे यहोवा, बचा ले; जब हम पुकारें तब राजा हमें उत्तर दे,” (भजन संहिता 20:9)। ये शब्द स्पष्ट सिखाते हैं कि विश्वासी परमेश्वर की सहायता माँगते समय अपना एकमात्र भरोसा इसी में रखते थे—कि वे राजा के अदृश्य शासन के अधीन हैं। यह एक और भजन से भी निकाला जा सकता है, “हे यहोवा, बिनती है, अब बचा ले: धन्य है वह जो यहोवा के नाम से आता है,” (भजन संहिता 118:25, 26)। यहाँ स्पष्ट है कि विश्वासी मसीह की ओर बुलाए जाते हैं, इस निश्चय के साथ कि जब वे पूरी तरह उसके हाथ में होंगे तब सुरक्षित रहेंगे। इसी आशय की एक और प्रार्थना है जिसमें सारी कलीसिया परमेश्वर की दया की विनती करती है, “तेरा हाथ तेरे दाहिने हाथ के पुरुष पर, उस मनुष्य के पुत्र पर रहे जिसे तू ने अपने लिए दृढ़ किया है (या जो तेरे लिए सबसे उपयुक्त है),” (भजन संहिता 80:17)। क्योंकि यद्यपि भजन का रचयिता सारी जातियों के बिखर जाने पर विलाप करता है, तो भी वह उसके पुनरुद्धार के लिए उसी में प्रार्थना करता है जो अकेला सिर है। जब प्रजा बन्धुआई में ले जाई गई, देश उजाड़ हो गया, और बातें देखने में निराशाजनक हो गईं, तब यिर्मयाह कलीसिया की विपत्ति पर विलाप करते हुए विशेष रूप से शिकायत करता है कि राज्य के नाश से विश्वासियों की आशा कट गई; “हमारे जीवन का श्वास, यहोवा का अभिषिक्त, उनके गड्ढों में पकड़ा गया, जिसके विषय में हम कहते थे कि उसकी छाया में हम जाति-जाति के बीच जीवित रहेंगे,” (विलापगीत 4:20)। इस सब से भली-भाँति स्पष्ट है कि जैसे प्रभु मध्यस्थ के बिना मानव-जाति पर प्रसन्न नहीं हो सकता, वैसे ही व्यवस्था के अधीन पवित्र पुरखाओं के सामने मसीह सदा उनके विश्वास के विषय के रूप में रखा गया था।

3. इसके अतिरिक्त जब दुःख में शान्ति की प्रतिज्ञा की जाती है, विशेषकर जब कलीसिया के छुटकारे का वर्णन होता है, तब मसीह में विश्वास और आशा की पताका फहराई जाती है। हबक्कूक कहता है, “तू अपनी प्रजा के उद्धार के लिए, हाँ, अपने अभिषिक्त के संग उद्धार के लिए निकला” (3:13)। और जब कभी भविष्यद्वक्ताओं में कलीसिया के नवीकरण का उल्लेख आता है, तब लोगों को दाऊद से की गई उस प्रतिज्ञा की ओर निर्देशित किया जाता है कि उसका राज्य सदा बना रहेगा। और इसमें कोई अचम्भा नहीं, क्योंकि अन्यथा वाचा में कोई स्थिरता न रहती। इसी प्रयोजन से यशायाह 7:14 की वह उल्लेखनीय भविष्यद्वाणी है। यह देखकर कि अविश्वासी राजा आहाज ने यरूशलेम के घेरे से छुटकारे और उसकी तुरन्त सुरक्षा के विषय में जो गवाही दी गई थी उसे ठुकरा दिया, वह मानो अचानक मसीह की ओर मुड़ जाता है, “देखो, एक कुँवारी गर्भवती होगी और पुत्र जनेगी, और उसका नाम इम्मानुएल रखेगी;” इससे परोक्ष रूप से सूचित करता है कि यद्यपि राजा और उसकी प्रजा ने उन्हें दी गई प्रतिज्ञा को दुष्टता से ठुकरा दिया, मानो वे परमेश्वर की विश्वासयोग्यता को निष्फल करने पर तुले हों, तो भी वाचा विफल न होगी—छुड़ानेवाला अपने ठहराए समय पर आएगा। अन्ततः सब भविष्यद्वक्ता, यह दिखाने के लिए कि परमेश्वर मनाया जा सकता है, दाऊद के उस राज्य को सामने लाने में सदा सावधान रहे जिस पर छुटकारा और अनन्त उद्धार निर्भर था। इसी प्रकार यशायाह में कहा गया है, “मैं तुम्हारे साथ एक सदा की वाचा बाँधूँगा, अर्थात् दाऊद पर की गई अटल कृपा। देखो, मैंने उसे देश-देश के लोगों के लिए साक्षी ठहराया है,” (यशायाह 55:3, 4); इससे सूचित करता है कि विपत्ति की दशा में विश्वासियों को कोई आशा न होती, यदि उनके पास यह गवाही न होती कि परमेश्वर उनकी सुनने को तैयार रहेगा। इसी प्रकार उनके गिरते हुए मन को फिर जगाने के लिए यिर्मयाह कहता है, “देखो, यहोवा की यह वाणी है, ऐसे दिन आते हैं जब मैं दाऊद के लिए एक धर्मी शाखा उत्पन्न करूँगा, और वह राजा बनकर राज्य करेगा, और बुद्धि से काम करेगा, और पृथ्वी पर न्याय और धार्मिकता का कार्य करेगा। उसके दिनों में यहूदा बचा रहेगा और इस्राएल निडर रहेगा,” (यिर्मयाह 23:5, 6)। यहेजकेल में भी कहा गया है, “मैं उन पर एक ही चरवाहा ठहराऊँगा, और वह उन्हें चराएगा, अर्थात् मेरा दास दाऊद; वह उन्हें चराएगा, और वही उनका चरवाहा होगा। और मैं यहोवा उनका परमेश्वर रहूँगा, और मेरा दास दाऊद उनके बीच प्रधान होगा; मुझ यहोवा ने यह कहा है। और मैं उनके साथ शान्ति की वाचा बाँधूँगा,” (यहेजकेल 34:23, 24, 25)। और फिर इस अद्भुत नवीकरण की चर्चा करने के बाद वह कहता है, “मेरा दास दाऊद उनका राजा होगा, और उन सब का एक ही चरवाहा होगा।” “मैं उनके साथ शान्ति की वाचा बाँधूँगा; वह उनके साथ सदा की वाचा होगी,” (यहेजकेल 37:24–26)।

मैं बहुतों में से कुछ ही अंश चुनता हूँ, क्योंकि मैं केवल अपने पाठकों के मन में यह बैठाना चाहता हूँ कि विश्वासियों की आशा सदा अकेले मसीह में संचित रही। अन्य सब भविष्यद्वक्ता भी इसमें सहमत हैं। इस प्रकार होशे कहता है, “तब यहूदा के लोग और इस्राएल के लोग इकट्ठे होकर अपने लिए एक प्रधान ठहराएँगे,” (होशे 1:11)। इसे वह आगे और स्पष्ट शब्दों में समझाता है, “उसके बाद इस्राएली लौटकर अपने परमेश्वर यहोवा को और अपने राजा दाऊद को ढूँढ़ेंगे,” (होशे 3:5)। मीका भी लोगों की वापसी के विषय में कहते हुए स्पष्ट कहता है, “उनका राजा उनके आगे-आगे चलेगा, और यहोवा उनके अगुवे के रूप में होगा,” (मीका 2:13)। वैसे ही आमोस लोगों के नवीकरण की भविष्यद्वाणी करते हुए कहता है, “उस दिन मैं दाऊद की गिरी हुई छावनी को खड़ा करूँगा, और उसके छेदों को बन्द करूँगा; और उसके खण्डहरों को उठाऊँगा, और उसे प्राचीनकाल के समान बनाऊँगा,” (आमोस 9:11); दूसरे शब्दों में, उद्धार की एकमात्र पताका दाऊद के घराने का राजकीय वैभव तक उन्नत होना था, जो मसीह में पूरा हुआ। इसी से जकर्याह भी, जो मसीह के प्रकट होने के समय के अधिक निकट था, अधिक स्पष्टता से बोलता है, “हे सिय्योन की बेटी, अति मगन हो; हे यरूशलेम की बेटी, जयजयकार कर: देख, तेरा राजा तेरे पास आता है; वह धर्मी और उद्धार पानेवाला है,” (जकर्याह 9:9)। यह भजन संहिता के पहले उद्धृत उस अंश से मेल खाता है, “यहोवा उनका बल है, और वह अपने अभिषिक्त के लिए उद्धार का दृढ़ गढ़ है।” यहाँ उद्धार सिर से सारी देह तक फैलाया गया है।

4. इन भविष्यद्वाणियों से यहूदियों को परिचित कराकर परमेश्वर उन्हें सिखाना चाहता था कि छुटकारा ढूँढ़ने में वे सीधे मसीह की ओर दृष्टि करें। और यद्यपि वे बहुत गिर गए थे, तो भी इस सामान्य सिद्धान्त का ज्ञान उन्होंने कभी पूरी तरह न खोया कि परमेश्वर मसीह के हाथ से कलीसिया का छुड़ानेवाला होगा, जैसी उसने दाऊद से प्रतिज्ञा की थी; और केवल इसी रीति से वह मुफ़्त वाचा पूरी होगी जिससे परमेश्वर ने अपने चुने हुए लोगों को लेपालक बनाया था। इसीलिए जब हमारा उद्धारकर्ता अपनी मृत्यु से कुछ ही पहले यरूशलेम में आया, तब बालकों ने पुकारा, “दाऊद की सन्तान को होशाना,” (मत्ती 21:9)। क्योंकि प्रतीत होता है कि एक भजन सब को ज्ञात और सामान्य प्रयोग में था, जिसमें वे गाते थे कि परमेश्वर की दया का उनके पास जो एकमात्र शेष प्रतिज्ञापत्र था, वह एक छुड़ानेवाले के आने की प्रतिज्ञा थी। इसी कारण मसीह अपने चेलों से कहता है कि मुझ पर विश्वास करो, ताकि उन्हें परमेश्वर में स्पष्ट और पूर्ण विश्वास हो, “तुम परमेश्वर पर विश्वास रखते हो, मुझ पर भी विश्वास रखो,” (यूहन्ना 14:1)। क्योंकि यद्यपि ठीक कहें तो विश्वास मसीह से पिता की ओर चढ़ता है, फिर भी वह सूचित करता है कि जब वह परमेश्वर पर टिकता भी है, तब भी वह धीरे-धीरे लुप्त हो जाता है, जब तक वह स्वयं उसे ठोस बल देने के लिए बीच में न आए। परमेश्वर की महिमा इतनी ऊँची है कि पृथ्वी पर कीड़ों की तरह रेंगनेवाले मनुष्य उस तक चढ़ नहीं सकते। इसलिए यह साधारण कथन कि परमेश्वर विश्वास का विषय है (Lactantius, lib. 4 c. 16), कुछ सीमा के साथ ग्रहण किया जाना चाहिए। जब मसीह को अदृश्य परमेश्वर का स्वरूप कहा जाता है (कुलुस्सियों 1:15), तो यह वचन बिना कारण नहीं कहा गया, वरन् हमें स्मरण दिलाने के लिए है कि जब तक हम परमेश्वर को मसीह में न देखें, तब तक हमें अपने उद्धार का कोई ज्ञान नहीं हो सकता। क्योंकि यद्यपि यहूदी शास्त्रियों ने अपनी झूठी व्याख्याओं से भविष्यद्वक्ताओं की छुड़ानेवाले के विषय की शिक्षा को धुँधला कर दिया था, तो भी मसीह ने इसे एक ऐसा तथ्य माना जो मानो सर्वसम्मति से ग्रहण किया गया था, कि निराशा की दशा में कोई और उपाय नहीं, कलीसिया के छुटकारे का मध्यस्थ के प्रकट होने के सिवा कोई और मार्ग नहीं। यह सच है कि पौलुस ने जिस बात की ओर संकेत किया—अर्थात् कि मसीह व्यवस्था का अन्त है (रोमियों 10:4)—वह उतनी सामान्यतः ज्ञात न थी जितनी होनी चाहिए थी, यद्यपि यह सत्य भी है और व्यवस्था तथा भविष्यद्वक्ताओं दोनों से स्पष्ट भी होता है। फिर भी मैं इस समय विश्वास के विषय में नहीं कह रहा, क्योंकि उसके लिए हमें अन्यत्र अधिक उपयुक्त स्थान मिलेगा (पुस्तक 3, अध्याय 2), परन्तु मैं इस प्रकार अपने पाठकों के मन में यह बैठाना चाहता हूँ कि भक्ति का पहला कदम यह स्वीकार करना है कि परमेश्वर पिता है, जो हमारी रक्षा करता, हम पर शासन करता और हमें पालता है, जब तक वह हमें अपने राज्य के अनन्त उत्तराधिकार तक न पहुँचा दे; कि इससे, जैसा हमने अभी देखा, यह स्पष्ट है कि मसीह के बिना परमेश्वर का ज्ञान पाना सम्भव नहीं, और इसलिए जगत् के आरम्भ से मसीह सब चुने हुओं के सामने उनके विश्वास और भरोसे के विषय के रूप में रखा गया था। इसी अर्थ में इरेनियस कहता है कि पिता, जो स्वयं में असीम है, पुत्र में सीमित हुआ है, क्योंकि उसने अपने को हमारी समझ के अनुकूल बना लिया, ऐसा न हो कि हमारे मन उसकी महिमा की अपारता में निगल लिए जाएँ (Irenaeus, lib. 4 cap. 8)। उन्मादी लोग इस पर ध्यान न देकर एक उपयोगी कथन को अधर्मी स्वप्न में बदल देते हैं,185 मानो मसीह के पास ईश्वरत्व का केवल एक अंश है, जैसे पूर्ण से लिया हुआ कोई भाग; जबकि अर्थ केवल इतना है कि परमेश्वर केवल मसीह में ही समझा जाता है। यूहन्ना का यह कथन सदा सत्य रहा है, “जो कोई पुत्र का इन्कार करता है उसके पास पिता भी नहीं,” (1 यूहन्ना 2:23)। क्योंकि यद्यपि प्राचीनकाल में बहुत से लोग घमण्ड करते थे कि वे परमप्रधान ईश्वरत्व की, अर्थात् आकाश और पृथ्वी के बनानेवाले की, आराधना करते हैं, तो भी जब उनके पास मध्यस्थ न था, तो उनके लिए परमेश्वर की दया का सच्चा आनन्द उठाना, और यह निश्चय पाना कि वह उनका पिता है, असम्भव था। सिर को, अर्थात् मसीह को, न पकड़े रहने के कारण परमेश्वर का उनका ज्ञान क्षणभंगुर था; और इसीलिए वे अन्ततः घोर और घिनौने अन्धविश्वासों में गिर गए, जो उनकी अज्ञानता को प्रकट करते हैं, ठीक जैसे आज के तुर्क, जो पूरे गले से घोषणा करते हैं कि आकाश और पृथ्वी का सृजनहार उनका परमेश्वर है, फिर भी मसीह को ठुकराकर उसके स्थान पर एक मूर्ति स्थापित कर देते हैं।

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