पुस्तक I · अध्याय 7

पवित्रशास्त्र को पूरा अधिकार देने के लिए आत्मा की गवाही आवश्यक है। यह दावा करना अधर्म है कि पवित्रशास्त्र की विश्वसनीयता कलीसिया के निर्णय पर टिकी है

Institutes of the Christian Religion · John Calvin

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पवित्रशास्त्र को पूरा अधिकार देने के लिए आत्मा की गवाही आवश्यक है। यह दावा करना अधर्म है कि पवित्रशास्त्र की विश्वसनीयता कलीसिया के निर्णय पर टिकी है

अध्याय 7।

पवित्रशास्त्र को पूरा अधिकार देने के लिए आत्मा की गवाही आवश्यक है। यह दावा करना अधर्म है कि पवित्रशास्त्र की विश्वसनीयता कलीसिया के निर्णय पर टिकी है।

खण्ड। 1. पवित्रशास्त्र का अधिकार मनुष्यों से नहीं, परमेश्वर के आत्मा से आता है। आपत्ति: पवित्रशास्त्र कलीसिया के निर्णय पर निर्भर है। खण्डन: I. इस प्रकार परमेश्वर का सत्य मनुष्य की इच्छा के अधीन हो जाएगा। II. यह पवित्र आत्मा का अपमान है। III. यह कलीसिया में अत्याचार स्थापित करता है। IV. यह भूलों का पुलिन्दा बनाता है। V. यह विवेक को उलट देता है। VI. यह हमारे विश्वास को अधर्मियों के उपहास के सामने खोल देता है।

2. प्रेरित पौलुस के शब्दों से ली गई आपत्ति का एक और उत्तर। विरोधियों द्वारा उठाई गई कठिनाइयों का समाधान। दूसरी आपत्ति का खण्डन।

3. अगस्तीन के एक कथन पर आधारित तीसरी आपत्ति पर विचार।

4. निष्कर्ष: पवित्रशास्त्र का अधिकार इस बात पर आधारित है कि वह परमेश्वर का कहा हुआ है। इसकी पुष्टि भक्तों के विवेक से और थोड़ी भी सच्चाई रखनेवाले सब मनुष्यों की सहमति से होती है। अधर्मियों के मुँह में चढ़ी चौथी आपत्ति। खण्डन।

5. अन्तिम और आवश्यक निष्कर्ष: पवित्रशास्त्र का अधिकार विश्वासियों के हृदयों पर पवित्र आत्मा की गवाही से मुहरबन्द होता है। इस गवाही की निश्चयता। यशायाह के एक अंश और विश्वासियों के अनुभव से इसकी पुष्टि। यशायाह के एक और अंश से भी।

1. आगे बढ़ने से पहले, पवित्रशास्त्र के अधिकार के विषय में कुछ बातें कहना उचित जान पड़ता है, ताकि हमारे मन उसे श्रद्धा से ग्रहण करने के लिए तैयार ही न हों, वरन् सब सन्देह से मुक्त भी हो जाएँ।

जब जो वस्तु परमेश्वर का वचन होने का दावा करती है, उसे वैसा ही मान लिया जाए, तब कोई भी मनुष्य, जब तक कि वह सामान्य बुद्धि और मनुष्य की भावनाओं से रहित न हो, बोलनेवाले की बात न मानने का ऐसा दुस्साहस नहीं करेगा। परन्तु चूँकि स्वर्ग से प्रतिदिन उत्तर नहीं दिए जाते, और पवित्रशास्त्र ही एकमात्र अभिलेख है जिसमें परमेश्वर ने अपने सत्य को सदा की स्मृति के लिए सौंपना चाहा है, इसलिए विश्वासियों के बीच उसका जो पूरा अधिकार होना चाहिए वह तब तक नहीं माना जाता जब तक वे यह विश्वास न करें कि वह स्वर्ग से उसी सीधेपन से आया है मानो परमेश्वर को उसे उच्चारण करते हुए सुना गया हो। यह विषय विस्तार से वर्णन और अधिक सूक्ष्म विचार के सर्वथा योग्य है। परन्तु मेरे पाठक मुझे क्षमा करेंगे कि मैंने इस विषय के विस्तार की माँग से अधिक अपनी योजना की सीमा का ध्यान रखा है।

एक अत्यन्त हानिकारक भूल बहुत व्यापक रूप से फैली हुई है—अर्थात् यह कि पवित्रशास्त्र का महत्त्व केवल उतना ही है जितना कलीसिया की सम्मति उसे प्रदान करती है; मानो परमेश्वर का अनन्त और अटल सत्य मनुष्यों की इच्छा पर निर्भर हो सकता हो। पवित्र आत्मा का बड़ा अपमान करते हुए यह पूछा जाता है कि कौन हमें विश्वास दिलाए कि पवित्रशास्त्र परमेश्वर की ओर से आया; कौन इसकी गारण्टी दे कि वह हमारे समय तक सुरक्षित और अक्षुण्ण पहुँचा है; कौन हमें समझाए कि इस पुस्तक को श्रद्धा से ग्रहण करना है और उस को सूची से निकाल देना है, यदि कलीसिया ही ये सब बातें निश्चय के साथ नियत न करे? इसलिए कहा जाता है कि पवित्रशास्त्र के प्रति जो आदर देना उचित है और कौन-सी पुस्तकें प्रामाणिक सूची में स्वीकार की जाएँ, ये दोनों कलीसिया के निर्णय पर निर्भर हैं। इस प्रकार अधर्मी मनुष्य, कलीसिया के बहाने निरंकुश अत्याचार लाना चाहते हुए, इसकी परवाह नहीं करते कि वे अपने आप को और दूसरों को कैसी बेतुकी बातों में उलझाते हैं, बस वे सीधे-सादे लोगों से यही एक स्वीकारोक्ति कराएँ—कि ऐसा कुछ नहीं जो कलीसिया न कर सके। परन्तु उन दुखी विवेकों का क्या होगा जो अनन्त जीवन की किसी ठोस निश्चयता की खोज में हैं, यदि उसके विषय की सब प्रतिज्ञाओं को मनुष्य के निर्णय से बेहतर कोई आधार प्राप्त नहीं? क्या यह सुनकर वे सन्देह करना और काँपना छोड़ देंगे? दूसरी ओर, हमारा विश्वास दुष्टों के कैसे-कैसे उपहास का पात्र बनता है—और सबकी दृष्टि में कितना सन्देहास्पद ठहरता है—यदि यह माना जाए कि उसे केवल मनुष्यों की सद्भावना से उधार मिला हुआ अनिश्चित अधिकार प्राप्त है?

2. इन प्रलापों का एक प्रेरित का एक ही कथन उत्तम रीति से खण्डन कर देता है। पौलुस गवाही देता है कि कलीसिया “प्रेरितों और भविष्यद्वक्ताओं की नींव पर खड़ी की गई है” (इफिसियों 2:20)। यदि प्रेरितों और भविष्यद्वक्ताओं की शिक्षा कलीसिया की नींव है, तो उस शिक्षा की निश्चयता कलीसिया के अस्तित्व में आने से पहले ही रही होगी। न इस छिद्रान्वेषण के लिए कोई स्थान है कि यद्यपि कलीसिया अपना प्रथम आरम्भ वहीं से पाती है, फिर भी यह सन्देहास्पद रहता है कि कौन-से लेख प्रेरितों और भविष्यद्वक्ताओं के माने जाएँ, जब तक कि उसका निर्णय बीच में न आए। क्योंकि यदि मसीही कलीसिया आरम्भ में भविष्यद्वक्ताओं के लेखों और प्रेरितों के प्रचार पर स्थापित हुई थी, तो वह शिक्षा, जहाँ कहीं भी पाई जाए, कलीसिया से पहले ही निश्चित और अनुमोदित थी, क्योंकि इसके बिना कलीसिया स्वयं कभी अस्तित्व में नहीं आ सकती थी।70 इसलिए इस कल्पना से अधिक बेतुकी कोई बात नहीं हो सकती कि पवित्रशास्त्र को परखने की शक्ति कलीसिया में है, और उसकी निश्चयता उसके संकेत पर निर्भर है। जब कलीसिया उसे ग्रहण करती है और उस पर अपने अधिकार की मुहर लगाती है, तब वह उस वस्तु को प्रामाणिक नहीं बनाती जो अन्यथा सन्देहास्पद या विवादित थी; वरन् उसे परमेश्वर का सत्य मानकर, कर्तव्य के नाते, बिना हिचकिचाहट की सहमति से अपना आदर प्रकट करती है। रही यह बात कि कलीसिया के किसी आदेश का आश्रय लिए बिना हमें कैसे विश्वास हो कि वह परमेश्वर की ओर से आया, तो यह वैसा ही प्रश्न है मानो पूछा जाए कि हम उजियाले को अन्धकार से, श्वेत को श्याम से, मीठे को कड़वे से कैसे पहचानना सीखें। पवित्रशास्त्र अपने मुख पर अपने सत्य का वैसा ही स्पष्ट प्रमाण लिए हुए है जैसा श्वेत और श्याम अपने रंग का, और मीठा और कड़वा अपने स्वाद का।

3. मैं जानता हूँ कि अगस्तीन का एक वाक्य उद्धृत करने की प्रथा है जिसमें वह कहता है कि यदि कलीसिया का अधिकार उसे प्रेरित न करता तो वह सुसमाचार पर विश्वास न करता (अगस्तीन, Cont. Epist. Fundament. c. 5)। परन्तु सन्दर्भ से यह समझना सरल है कि उसे ऐसा अर्थ देना कितना अशुद्ध और अनुचित है। वह मनीकीवादियों के विरुद्ध तर्क कर रहा था, जो आग्रह करते थे कि उनकी बिना जाँचे बात मानी जाए, और दावा करते थे कि सत्य उनके पास है, यद्यपि वे उसे दिखाते नहीं थे। परन्तु जब वे मानी के समर्थन में सुसमाचार की दुहाई देने का ढोंग करते थे, तो वह पूछता है कि यदि उनका सामना ऐसे मनुष्य से हो जो सुसमाचार पर भी विश्वास नहीं करता, तो वे उसे अपने मत में लाने के लिए किस प्रकार का तर्क देंगे। वह आगे कहता है, “परन्तु मैं सुसमाचार पर विश्वास न करता,” आदि; इसका अर्थ यह है कि यदि वह विश्वास से अपरिचित होता, तो सुसमाचार को ग्रहण करने के लिए उसे प्रेरित करनेवाली एकमात्र वस्तु कलीसिया का अधिकार होती। और क्या यह कोई आश्चर्य की बात है कि जो मसीह को नहीं जानता वह मनुष्यों का आदर करे?

70 फ्रांसीसी संस्करण जोड़ता है, “Comme le fondement va deuant l’edifice;”—जैसे नींव भवन से पहले जाती है।

इसलिए अगस्तीन यहाँ यह नहीं कहता कि भक्तों का विश्वास कलीसिया के अधिकार पर आधारित है; न उसका अभिप्राय यह है कि सुसमाचार की निश्चयता उस पर निर्भर है; वह केवल यह कहता है कि अविश्वासियों को सुसमाचार की ऐसी निश्चयता न होती जिससे वे मसीह को जीत सकें, यदि वे कलीसिया की सहमति से प्रभावित न होते। और वह अपना यह अभिप्राय थोड़ा पहले इन शब्दों में स्पष्ट कर देता है: “जब मैं अपने विश्वास-वचन की प्रशंसा कर चुका और तुम्हारे की हँसी उड़ा चुका, तो तुम क्या समझते हो कि हमारे बीच न्याय कौन करे; या इससे अधिक और क्या करना है कि उन्हें छोड़ दें जो हमें निश्चयता का निमन्त्रण देकर फिर अनिश्चित बात पर विश्वास करने की आज्ञा देते हैं, और उनका अनुसरण करें जो हमें पहले उस बात पर विश्वास करने को बुलाते हैं जिसे हम अभी समझ नहीं सकते, ताकि स्वयं विश्वास से बलवन्त होकर हम जो मानते हैं उसे समझने के योग्य हो जाएँ—फिर मनुष्य नहीं, वरन् स्वयं परमेश्वर भीतर से हमारे मनों को सुदृढ़ और प्रकाशित करे?” निस्सन्देह ये अगस्तीन के शब्द हैं (अगस्तीन, Cont. Epist. Fundament. cap. 4); और इनसे स्पष्ट निष्कर्ष यही निकलता है कि इस पवित्र जन का अभिप्राय पवित्रशास्त्र पर हमारे विश्वास को कलीसिया के संकेत या निर्णय पर टिकाना नहीं था,71 वरन् केवल यह जताना था (जिसे हम भी सच मानते हैं) कि जो अब तक परमेश्वर के आत्मा से प्रकाशित नहीं हुए हैं वे कलीसिया के प्रति आदर से सीखने योग्य बनते हैं, और इस प्रकार सुसमाचार से मसीह के विश्वास को सीखने के लिए झुकते हैं। इस प्रकार, यद्यपि कलीसिया का अधिकार हमें आगे ले चलता है और सुसमाचार पर विश्वास करने के लिए तैयार करता है, फिर भी स्पष्ट है कि अगस्तीन भक्तों की निश्चयता को एक बिलकुल भिन्न नींव पर टिकाना चाहता है।72

इतने पर भी मैं इनकार नहीं करता कि वह पवित्रशास्त्र के समर्थन में तर्क करते हुए, जिसे मनीकीवादी ठुकराते थे, प्रायः उन पर सारी कलीसिया की सहमति का दबाव डालता है। इसी कारण वह फौस्तुस को (lib. 32) डाँटता है कि वह सुसमाचार के सत्य के अधीन नहीं होता—ऐसा सत्य जो इतना सुस्थापित, इतना दृढ़, इतना महिमा से प्रसिद्ध है, और प्रेरितों के दिनों से निश्चित उत्तराधिकार द्वारा सौंपा गया है। परन्तु वह कहीं यह संकेत नहीं देता कि पवित्रशास्त्र को हम जो अधिकार देते हैं वह मनुष्यों की परिभाषाओं या युक्तियों पर निर्भर है। वह केवल कलीसिया के सार्वभौमिक निर्णय को ऐसी बात के रूप में सामने रखता है जो विषय से अत्यन्त सम्बन्धित है, और जिसमें उसे अपने विरोधियों पर बढ़त भी प्राप्त थी। जो कोई इसे और पूरी रीति से सिद्ध देखना चाहे, वह उसकी छोटी रचनाएँ De Utilitate Credendi (विश्वास करने के लाभ) पढ़े, जहाँ पाया जाएगा कि विश्वास करने की जिस सुविधा की वह सिफ़ारिश करता है वह केवल वही है जो प्रवेश कराती है और खोज के लिए उचित आरम्भ बनती है; जबकि वह घोषणा करता है कि हमें केवल मत से सन्तुष्ट नहीं होना चाहिए, वरन् ठोस सत्य की खोज में लगना चाहिए।

71 फ्रांसीसी संस्करण जोड़ता है, “La destournant du seul fondement qu’elle a en l’Escriture;”—उसे उस एकमात्र नींव से हटाते हुए जो उसकी पवित्रशास्त्र में है।

72 अगस्तीन, De Ordine, lib. 2 c. 9 “Ad discendum dupliciter movemur, auctoritate atque ratione: tempore auctoritas, re autem ratio prior est,” आदि। “Itaque quamquam bonorum auctoritas imperitae multitudini videatur esse salubrior, ratio vero aptior eruditis: tamen quia nullus hominum nisi ex imperito peritus fit, &c., evenit ut omnibus bona, magna, occulta discere cupientibus, non aperiat nisi auctoritas januam,” आदि। उसने इसी आशय की और भी बहुत-सी उत्तम बातें कही हैं।

4. जो मैंने अभी कहा उस पर ध्यान देना आवश्यक है, कि शिक्षा पर हमारा विश्वास तब तक स्थापित नहीं होता जब तक हमें पूरा विश्वास न हो कि परमेश्वर उसका रचयिता है। इसलिए पवित्रशास्त्र का सर्वोच्च प्रमाण सदा उसके स्वरूप से लिया जाता है जिसका वह वचन है। भविष्यद्वक्ता और प्रेरित न अपनी तीक्ष्णता का, न बोलनेवालों को विश्वसनीय बनानेवाले किसी गुण का घमण्ड करते हैं, और न तर्कों पर टिकते हैं; वे परमेश्वर के पवित्र नाम की दुहाई देते हैं, ताकि सारा जगत अधीन होने को विवश हो जाए। अगली बात यह विचारणीय है कि यह केवल सम्भाव्य ही नहीं, वरन् निश्चित कैसे प्रतीत होता है कि परमेश्वर का नाम न उतावली से, न चतुराई से धारण किया गया है। यदि हम अपने विवेकों के लिए सबसे प्रभावी रीति से प्रबन्ध करना चाहें, और उन्हें अनिश्चितता के बवण्डर में उड़ाए जाने से, डगमगाने से, और छोटी-से-छोटी बाधा पर ठोकर खाने से बचाना चाहें, तो पवित्रशास्त्र के सत्य पर हमारा विश्वास मानवीय अनुमानों, निर्णयों या तर्कों से ऊँचे स्रोत से आना चाहिए; अर्थात् आत्मा की गुप्त गवाही से। यह सच है कि यदि हम तर्कों के मार्ग पर चलना चाहें तो अनेक प्रकार के प्रमाणों से यह स्थापित करना सरल है कि यदि स्वर्ग में कोई परमेश्वर है, तो व्यवस्था, भविष्यद्वाणियाँ और सुसमाचार उसी की ओर से आए हैं। यहाँ तक कि यदि विद्वान और अत्यन्त प्रतिभाशाली मनुष्य विरोधी पक्ष लें, और इस वाद-विवाद में अपनी बुद्धि की सारी शक्तियों को बुलाकर दिखावे के साथ प्रदर्शित करें, तो भी यदि वे निर्लज्ज ढिठाई से ग्रस्त नहीं हैं, तो उन्हें स्वीकार करना पड़ेगा कि पवित्रशास्त्र अपने परमेश्वर के कहे जाने का, और इसलिए अपने में उसकी स्वर्गीय शिक्षा होने का स्पष्ट प्रमाण प्रस्तुत करता है। थोड़ा आगे हम देखेंगे कि पवित्रशास्त्र का ग्रन्थ अन्य सब लेखों से बहुत ऊपर है। वरन् यदि हम उसे स्पष्ट आँखों और निष्पक्ष विवेक से देखें, तो वह तुरन्त ऐसी ईश्वरीय महिमा के साथ प्रस्तुत होगा जो हमारे अभिमानी विरोध को जीत लेगी और हमसे उसका आदर कराएगी।

तो भी बहस से पवित्रशास्त्र पर पूर्ण विश्वास खड़ा करने का प्रयत्न करना उलटी बात है। यह सच है कि यदि मुझे परमेश्वर के सबसे चतुर तिरस्कारियों से लड़ना पड़ता, तो मुझे भरोसा है, यद्यपि मैं सर्वोच्च योग्यता या वाक्पटुता से सम्पन्न नहीं, उनके कोलाहल करते मुँह बन्द करना मुझे कठिन न लगता; और जो डींगें वे कोनों में बुदबुदाते हैं उन्हें मैं बिना अधिक कठिनाई के दबा देता, यदि उनके कुतर्कों के खण्डन से कुछ पाया जा सकता। परन्तु यद्यपि हम विरोधियों के सामने परमेश्वर के पवित्र वचन की रक्षा कर सकते हैं, इससे यह नहीं निकलता कि हम तुरन्त उनके हृदयों में वह निश्चयता बो देंगे जो विश्वास के लिए आवश्यक है। अधर्मी लोग समझते हैं कि धर्म केवल मत पर टिका है, और इसलिए, कि वे मूर्खता से या हल्के आधारों पर विश्वास न करें, वे चाहते और आग्रह करते हैं कि तर्क से सिद्ध किया जाए कि मूसा और भविष्यद्वक्ता ईश्वरीय प्रेरणा से बोले। परन्तु मैं उत्तर देता हूँ कि आत्मा की गवाही तर्क से श्रेष्ठ है। क्योंकि जैसे परमेश्वर ही अपने वचनों की उचित गवाही दे सकता है, वैसे ही ये वचन मनुष्यों के हृदयों में तब तक पूरा विश्वास नहीं पाएँगे जब तक आत्मा की भीतरी गवाही से मुहरबन्द न हों। इसलिए वही आत्मा, जो भविष्यद्वक्ताओं के मुँह से बोला, हमारे हृदयों में भी पैठे, ताकि हमें विश्वास दिलाए कि उन्होंने उस सन्देश को, जो ईश्वरीय रीति से उन्हें सौंपा गया था, विश्वसनीयता से पहुँचाया। यह सम्बन्ध यशायाह ने इन शब्दों में अत्यन्त उचित रीति से व्यक्त किया है, “मेरा आत्मा जो तुझ पर ठहरा है, और मेरे वचन जो मैं ने तेरे मुँह में डाले हैं, वे तेरे मुँह से, और तेरे वंश के मुँह से, और तेरे वंश के वंश के मुँह से, अब से लेकर सदा तक कभी न हटेंगे, यहोवा का यही वचन है” (यशायाह 59:21)। कुछ भले मनुष्य घबरा जाते हैं, क्योंकि जब दुष्ट लोग परमेश्वर के वचन के विरुद्ध दण्डमुक्त होकर बड़बड़ाते हैं, तब उनके पास उन्हें चुप कराने का स्पष्ट प्रमाण हाथ में नहीं होता; वे यह भूल जाते हैं कि आत्मा को बयाना और मुहर इसी कारण कहा गया है कि भक्तों के विश्वास को दृढ़ करे, क्योंकि जब तक वह उनके मनों को प्रकाशित न करे, वे सन्देहों के समुद्र में इधर-उधर डोलते रहते हैं।

5. इसलिए इसे निश्चित माना जाए कि जो पवित्र आत्मा से भीतर से सिखाए गए हैं वे पवित्रशास्त्र को बिना हिचक मान लेते हैं; कि पवित्रशास्त्र अपना प्रमाण अपने साथ लिए हुए है और प्रमाणों और तर्कों के अधीन होना उचित नहीं समझता, वरन् जिस पूर्ण निश्चय से हमें उसे ग्रहण करना चाहिए वह आत्मा की गवाही का ऋणी है।73 उसके द्वारा प्रकाशित होकर हम अब न अपने निर्णय पर, न दूसरों के निर्णय पर विश्वास करते हैं कि पवित्रशास्त्र परमेश्वर की ओर से है; वरन् मानवीय निर्णय से ऊँची रीति से पूरी तरह निश्चित हैं—उतने ही, मानो हम उस पर ईश्वरीय छाप को प्रत्यक्ष अंकित देखते हों—कि वह मनुष्यों के साधन से स्वयं परमेश्वर के मुँह से हम तक पहुँचा। हम ऐसे प्रमाण या सम्भावनाएँ नहीं माँगते जिन पर अपना निर्णय टिकाएँ, वरन् अपनी बुद्धि और निर्णय को उसके अधीन करते हैं, यह मानकर कि वह हमारे आँकने के लिए बहुत ऊँचा है। परन्तु यह हम उस रीति से नहीं करते जिससे कुछ लोग किसी अनजानी वस्तु से चिपक जाते हैं, जो जानते ही अप्रिय लगने लगती है; वरन् इसलिए कि हमें पूरा निश्चय है कि उसे थामे रहने में हम अजेय सत्य को थामे हैं; उन दुखी मनुष्यों की भाँति नहीं जिनके मन अन्धविश्वास के दास हैं, वरन् इसलिए कि हम उसमें एक ईश्वरीय सामर्थ्य को जीवित और साँस लेता हुआ अनुभव करते हैं—ऐसी सामर्थ्य जिससे हम खिंचकर और उत्साहित होकर उसकी आज्ञा मानते हैं, अपनी इच्छा से और जानते-बूझते, परन्तु उससे अधिक सजीव और प्रभावी रीति से जो मानवीय इच्छा या ज्ञान से हो सकता। इसीलिए परमेश्वर यशायाह के मुँह से अत्यन्त न्याय से पुकारता है, “यहोवा की यह वाणी है, कि तुम मेरे साक्षी हो, और मेरे दास हो जिसे मैं ने इसलिये चुना है कि तुम जानकर मेरी प्रतीति करो, और समझो कि मैं वही हूँ” (यशायाह 43:10)।

अतः ऐसा ही है वह निश्चय जो कारण नहीं माँगता; ऐसा ही वह ज्ञान जो सर्वोच्च तर्क के अनुकूल है, अर्थात् ऐसा ज्ञान जिसमें मन किसी भी तर्क से अधिक दृढ़ और सुरक्षित विश्राम पाता है; और अन्त में ऐसा ही वह निश्चय जिसे केवल स्वर्ग से आया प्रकाशन उत्पन्न कर सकता है। मैं इससे अधिक कुछ नहीं कहता जो हर विश्वासी अपने भीतर अनुभव नहीं करता, यद्यपि मेरे शब्द वास्तविकता से बहुत पीछे रह जाते हैं। इस समय मैं इस विषय पर नहीं ठहरता, क्योंकि हम इस पर फिर लौटेंगे: अभी केवल इतना समझ लें कि एकमात्र सच्चा विश्वास वही है जिस पर परमेश्वर का आत्मा हमारे हृदयों में मुहर लगाता है। वरन् नम्र और सीखने को तैयार पाठक को यशायाह में दी गई उस प्रतिज्ञा में पर्याप्त कारण मिलेगा कि नवीकृत कलीसिया की सब सन्तान “यहोवा के सिखाए हुए होंगे” (यशायाह 54:13)। यह अनुपम अधिकार परमेश्वर केवल अपने चुने हुओं को देता है, जिन्हें वह शेष मनुष्य-जाति से अलग करता है। क्योंकि सच्ची शिक्षा का आरम्भ परमेश्वर के वचन को सुनने की तत्परता के सिवा और क्या है? और परमेश्वर मूसा के मुँह से इस प्रकार सुने जाने की माँग करता है: “वह आकाश में नहीं है, कि तू कहे, कौन हमारे लिये आकाश पर चढ़कर उसे हमारे पास ले आए, कि हम उसे सुनकर उसका पालन करें? परन्तु वह वचन तेरे बहुत निकट, वरन् तेरे मुँह और तेरे मन ही में है” (व्यवस्थाविवरण 30:12, 14)। जब परमेश्वर ने बुद्धि का भण्डार अपनी सन्तान के लिए सुरक्षित रखना चाहा है, तो आश्चर्य नहीं कि मनुष्यों की साधारण भीड़ में इतना अज्ञान और जड़ता दिखाई देती है। इस साधारण भीड़ में मैं उन्हें भी गिनता हूँ जो विशेष रूप से चुने गए हैं, जब तक वे कलीसिया की देह में कलम न लगाए जाएँ। इसके अतिरिक्त, यशायाह हमें स्मरण दिलाते हुए कि भविष्यद्वाणी की शिक्षा न केवल परदेशियों को, वरन् उन यहूदियों को भी अविश्वसनीय लगेगी जो परमेश्वर के घराने के गिने जाना चाहते थे, इसका कारण जोड़ता है जब वह पूछता है, “यहोवा का भुजबल किस पर प्रगट हुआ?” (यशायाह 53:1)। इसलिए यदि कभी हम विश्वास करनेवालों की थोड़ी संख्या से व्याकुल हों, तो दूसरी ओर यह स्मरण करें कि परमेश्वर के भेदों को वही समझते हैं जिन्हें यह दिया गया है।

73 फ्रांसीसी संस्करण जोड़ता है, “Car jacoit qu’en sa propre majesté elle ait assez de quoy estre reuerée, neantmoins elle commence lors à nous vrayement toucher, quand elle est scellée en nos coueurs par le Sainct Esprit.”—क्योंकि यद्यपि अपनी ही महिमा में उसके पास आदर पाने के लिए पर्याप्त है, तथापि वह तब हमें सचमुच छूना आरम्भ करता है जब वह पवित्र आत्मा के द्वारा हमारे हृदयों में मुहरबन्द हो जाता है।

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