पुस्तक III · अध्याय 22

यह सिद्धान्त पवित्रशास्त्र के प्रमाणों से पुष्ट किया गया

Institutes of the Christian Religion · John Calvin

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यह सिद्धान्त पवित्रशास्त्र के प्रमाणों से पुष्ट किया गया

अध्याय 22।

यह सिद्धान्त पवित्रशास्त्र के प्रमाणों से पुष्ट किया गया।

इस अध्याय के विभाग ये हैं—I. दो प्रकार के व्यक्तियों के विरोध में खरे सिद्धान्त की पुष्टि। यह पुष्टि हमारे उद्धारकर्ता के वचनों और पौलुस की लिखी बातों की सावधान व्याख्या पर आधारित है, खण्ड 1-7। II. प्राचीन लेखकों, थॉमस एक्विनास और अधिक आधुनिक लेखकों से ली गई कुछ आपत्तियों का खण्डन, खण्ड 8-10। III. त्याग के विषय में, जो पूरी तरह परमेश्वर की धर्ममय इच्छा पर आधारित है, खण्ड 11।

खण्ड।

1. कुछ लोग कल्पना करते हैं कि परमेश्वर पुण्य के पूर्वज्ञान के अनुसार चुनता या त्यागता है। कुछ और लोग परमेश्वर पर यह दोष लगाते हैं कि वह कुछ को चुनता और दूसरों को छोड़ देता है। दोनों का खण्डन, 1. अकाट्य तर्कों से; 2. अगस्तीन की गवाही से।

2. कौन चुने गए हैं, कब, किसमें, किसलिए, और किस कारण से।

3. कारण परमेश्वर की सुइच्छा है, जो चुनाव में इस प्रकार राज्य करती है कि न बीते हुए, न आनेवाले किसी कर्म पर ध्यान दिया जाता है। इसका प्रमाण हमारे उद्धारकर्ता की उल्लेखनीय घोषणाओं और पौलुस के अंशों से।

4. रोमियों की पत्री की एक उल्लेखनीय चर्चा से प्रमाण। उसका उद्देश्य और पद्धति समझाई गई। पूर्वज्ञान के समर्थकों का खण्डन प्रेरित द्वारा, जब वह दृढ़ता से कहता है कि चुनाव विशेष है और पूरी तरह अनुग्रह से है।

5. बचाव की चाल का खण्डन। प्रेरित की चर्चा का सार और विश्लेषण।

6. एक अपवाद, और उसके तीन उत्तर। सेंतमेंत के चुनाव की प्रभावशीलता केवल विश्वासियों तक फैली है, जिनके विषय में कहा जाता है कि वे पूर्वज्ञान के अनुसार चुने गए। यह पूर्वज्ञान या पूर्वदृष्टि केवल चिन्तनात्मक नहीं, वरन् सक्रिय है।

7. यह मसीह के वचनों से सिद्ध किया गया। उत्तर का निष्कर्ष, और यहूदा के विषय में आपत्ति का समाधान।

8. प्राचीन पिताओं से ली गई एक आपत्ति। अगस्तीन से उत्तर, अगस्तीन द्वारा उद्धृत अम्ब्रोस से, और एक प्रेरित द्वारा एक अकाट्य तर्क। इस तर्क का सार।

9. थॉमस एक्विनास की आपत्ति। उत्तर।

10. अधिक आधुनिक लेखकों की आपत्ति। उत्तर। वे अंश जिनमें विरोधाभास का आभास है, उनका मेल। बहुत से बुलाए हुए और थोड़े चुने हुए क्यों हैं। वचन और विश्वास के बीच पारस्परिक सहमति पर आधारित एक आपत्ति। पौलुस, अगस्तीन और बर्नार्ड के शब्दों से पुष्ट समाधान। हमारे उद्धारकर्ता की एक स्पष्ट घोषणा।

11. त्याग को किस दृष्टि से देखना चाहिए। वह परमेश्वर की धर्ममय इच्छा पर आधारित है।

1. बहुत से लोग उन सब बातों का विरोध करते हैं जो हमने स्थापित की हैं, विशेषकर विश्वासियों के सेंतमेंत के चुनाव का, जिसे फिर भी उलटा नहीं जा सकता। क्योंकि वे सामान्यतः कल्पना करते हैं कि परमेश्वर मनुष्यों के बीच उन पुण्यों के अनुसार भेद करता है जो वह देखता है कि प्रत्येक के होंगे, जिनके विषय में वह पहले से जानता है कि वे उसके अनुग्रह के अयोग्य न होंगे उन्हें पुत्रों का लेपालकपन देता है, और जिनके स्वभाव में वह देखता है कि बुराई और दुष्टता की प्रवृत्ति होगी उन्हें विनाश का दण्ड देता है। इस प्रकार पूर्वज्ञान को परदे की तरह बीच में डालकर वे न केवल चुनाव को धुँधला करते हैं, वरन् उसे भिन्न उद्गम देने का ढोंग भी करते हैं। यह केवल साधारण लोगों की सामान्यतः मानी हुई राय ही नहीं है, क्योंकि सब युगों में इसके बड़े-बड़े समर्थक रहे हैं (देखो खण्ड 8)। यह मैं खुलकर मानता हूँ, ताकि कोई यह आशा न रखे कि उनके नामों से इसका विरोध करके हमारे पक्ष को बहुत हानि पहुँचा देगा। परमेश्वर का सत्य यहाँ इतना निश्चित है कि हिलाया नहीं जा सकता, इतना स्पष्ट है कि मनुष्य के अधिकार से दबाया नहीं जा सकता। दूसरे लोग, जो न पवित्रशास्त्र में निपुण हैं, न किसी गिनती के योग्य हैं, खरे सिद्धान्त पर ऐसी ढिठाई और दुष्टता से आक्रमण करते हैं जो सहन करना असम्भव है।496 क्योंकि परमेश्वर केवल अपनी सुइच्छा से कुछ को चुनकर दूसरों को छोड़ देता है, वे उस पर दोषारोपण करते हैं। परन्तु यदि बात निश्चित है तो परमेश्वर से झगड़ने से उन्हें क्या मिलेगा? हम केवल वही सिखाते हैं जिसे अनुभव सत्य सिद्ध करता है—अर्थात् यह कि परमेश्वर सदा इस बात में स्वतन्त्र रहा है कि जिस पर चाहे अपना अनुग्रह करे। यह न पूछकर कि अब्राहम का वंश दूसरों से किस बात में बढ़कर था, यदि किसी ऐसी योग्यता में नहीं जिसका कारण परमेश्वर के बाहर कहीं नहीं पाया जाता, वे हमें बताएँ कि मनुष्य बैलों या गधों से अच्छे क्यों हैं। जब परमेश्वर ने उन्हें अपने स्वरूप में रचा, तब वह उन्हें कुत्ते भी बना सकता था। क्या वे निम्न प्राणियों को परमेश्वर से बहस करने देंगे, मानो उनकी दशा की निम्नता अन्याय हो? यह निश्चय ही उससे अधिक न्यायसंगत नहीं कि मनुष्य उस विशेषाधिकार का आनन्द लें जो उन्होंने किसी पुण्य से नहीं कमाया, बजाय इसके कि वह अनुग्रहों को जैसा उसे उचित लगे अलग-अलग बाँटे। यदि वे अलग-अलग व्यक्तियों के उदाहरण पर जाएँ, जहाँ असमानता उन्हें अधिक अखरती है, तो उन्हें कम से कम हमारे उद्धारकर्ता के उदाहरण को देखकर श्रद्धा-भाव से रुक जाना चाहिए कि वे इस ऊँचे भेद के विषय में इतने आत्मविश्वास से न बोलें। वह दाऊद के वंश से एक मरणशील मनुष्य के रूप में गर्भ में आया; मैं उनसे पूछूँगा, वे कौन-से गुण थे जिनके कारण वह गर्भ ही में स्वर्गदूतों का सिर, परमेश्वर का एकलौता पुत्र, पिता का स्वरूप और महिमा, और जगत की ज्योति, धार्मिकता और उद्धार बनने के योग्य ठहरा? अगस्तीन ने बुद्धिमानी से यह देखा है,497 कि कलीसिया के सिर ही में हमें सेंतमेंत के चुनाव का एक उज्ज्वल दर्पण मिलता है, ताकि हम अंगों को उससे कोई कष्ट न हो—अर्थात् यह कि वह धर्मी जीवन जीने से परमेश्वर का पुत्र नहीं बना, वरन् यह बड़ा सम्मान उसे सेंतमेंत दिया गया, कि बाद में वह दूसरों को अपने दानों का भागी बनाए। यदि कोई यहाँ पूछे कि दूसरे वैसे क्यों नहीं जैसा वह था, या हम सब उससे इतनी दूर क्यों हैं, हम सब भ्रष्ट क्यों हैं जबकि वह पवित्रता है, तो वह न केवल अपना पागलपन, वरन् अपनी ढिठाई भी प्रकट करेगा। परन्तु यदि वे परमेश्वर को चुनने और त्यागने के स्वतन्त्र अधिकार से वंचित करने पर तुले हैं, तो साथ ही वह भी छीन लें जो मसीह को दिया गया है। अब यह उचित होगा कि हम ध्यान दें कि पवित्रशास्त्र दोनों के विषय में क्या कहता है। जब पौलुस घोषणा करता है कि हम जगत की उत्पत्ति से पहले मसीह में चुने गए (इफिसियों 1:4), तो वह निश्चय ही दिखाता है कि हमारी अपनी योग्यता पर कोई ध्यान नहीं दिया गया; क्योंकि यह ऐसा है मानो उसने कहा हो, जब आदम के सारे वंश में हमारे स्वर्गीय पिता ने कुछ भी अपने चुनाव के योग्य नहीं पाया, तब उसने अपने अभिषिक्त की ओर दृष्टि की, ताकि जिन्हें वह जीवन की सहभागिता में लेनेवाला था उन्हें अपनी देह के अंगों के रूप में चुन ले। इसलिए विश्वासी इस कारण को पूरा प्रभाव दें—अर्थात् यह कि हम मसीह में स्वर्गीय मीरास के लिए लेपालक बनाए गए, क्योंकि अपने आप में हम ऐसी उत्कृष्टता के योग्य नहीं थे। यही बात वह एक और अंश में कहता है, जिसमें वह कुलुस्सियों को उकसाता है कि वे धन्यवाद दें कि वे पवित्र लोगों की मीरास के भागी होने के योग्य बनाए गए (कुलुस्सियों 1:12)। यदि चुनाव उस ईश्वरीय अनुग्रह से पहले आता है जिससे हम अमरता का जीवन पाने के योग्य बनाए जाते हैं, तो परमेश्वर हम में ऐसा क्या पा सकता है जो उसे हमें चुनने के लिए प्रेरित करे? जो मैं कहना चाहता हूँ वह एक और अंश में और भी स्पष्ट समझाया गया है: वह कहता है, परमेश्वर ने “जगत की उत्पत्ति से पहले हमें उसमें चुन लिया कि हम उसके सम्मुख प्रेम में पवित्र और निर्दोष हों: और अपनी इच्छा की सुइच्छा के अनुसार हमें अपने लिए पहले से ठहरा लिया कि यीशु मसीह के द्वारा उसके लेपालक पुत्र हों,” (इफिसियों 1:4, 5)। यहाँ वह परमेश्वर की सुइच्छा को हमारे हर प्रकार के पुण्यों के सामने रखता है।

496 फ्रेंच में, “Il y en a d’aucuns, lesquels n’estans exercés en l’Ecriture ne sont dignes d’aucun credit ne reputation; et toutesfois sont plus hardis et temeraires à diffamer la doctrine qui leur est incognue; et ainsi ce n’est par raison que leur arrogance soit supportée.”—कुछ ऐसे हैं जो पवित्रशास्त्र के अभ्यासी न होने के कारण किसी विश्वास या प्रतिष्ठा के योग्य नहीं, फिर भी उस सिद्धान्त की, जो उनके लिए अज्ञात है, बदनामी करने में अधिक साहसी और धृष्ट हैं, और इसलिए उनका अहंकार सहने योग्य नहीं।

पवित्र जीवन चुनाव से उपजता है, और वही उसका उद्देश्य है। 2. प्रमाण को और पूर्ण करने के लिए उस अंश के अलग-अलग वाक्यांशों पर ध्यान देना महत्त्वपूर्ण है। जब वे आपस में जोड़े जाते हैं तो कोई सन्देह नहीं छोड़ते। उन्हें चुने हुए का नाम देने से स्पष्ट है कि वह विश्वासियों को सम्बोधित कर रहा है, जैसा कि वह थोड़ी देर बाद स्वयं घोषणा भी करता है। इसलिए इस नाम को उस युग तक सीमित कर देना, जिसमें सुसमाचार प्रचारित हुआ, उसका पूरी तरह उलट देना है। यह कहकर कि वे जगत की उत्पत्ति से पहले चुने गए, वह योग्यता के सब विचार को हटा देता है। क्योंकि उन व्यक्तियों के बीच, जो अभी थे ही नहीं, और उन व्यक्तियों के बीच जो बाद में उन्हीं के समान आदम में होनेवाले थे, भेद का क्या आधार था? परन्तु यदि वे मसीह में चुने गए, तो इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि न केवल प्रत्येक किसी बाहरी आधार पर नहीं चुना गया, वरन् कुछ दूसरों से भिन्न स्थिति में रखे गए, क्योंकि हम देखते हैं कि सब मसीह के अंग नहीं हैं। इस अतिरिक्त कथन में कि वे इसलिए चुने गए कि पवित्र हों, प्रेरित उन लोगों की भूल का सीधा खण्डन करता है जो चुनाव को पूर्वज्ञान से निकालते हैं, क्योंकि वह घोषणा करता है कि मनुष्यों में जो भी सद्गुण दिखाई देता है वह चुनाव का परिणाम है। फिर यदि उच्चतर कारण पूछा जाए, तो पौलुस उत्तर देता है कि परमेश्वर ने इस प्रकार पूर्वनियत किया, और अपनी इच्छा की सुइच्छा के अनुसार पूर्वनियत किया। इन शब्दों से वह उन सब आधारों को उलट देता है जिन्हें मनुष्य अपने भीतर चुनाव के कारण के रूप में मान बैठते हैं। क्योंकि वह दिखाता है कि आत्मिक जीवन के सम्बन्ध में परमेश्वर जो भी अनुग्रह देता है वह इसी एक सोते से बहता है, क्योंकि परमेश्वर ने जिसे चाहा उसे चुना, और उनके जन्म से पहले ही वह अनुग्रह, जो वह उन्हें देना चाहता था, उनके उपयोग के लिए अलग रख दिया था।
497 August. de Corrept. et Gratia ad Valent. c. 15. Hom. de Bono Perseveran. c. 8. Item, de Verbis Apost. Serm. 8.

3. जहाँ-जहाँ परमेश्वर की यह सुइच्छा राज्य करती है, वहाँ कोई भले कर्म गिने नहीं जाते। प्रेरित ने निस्सन्देह इस विरोधाभास को आगे नहीं बढ़ाया, परन्तु इसे समझना चाहिए, जैसा वह स्वयं एक और अंश में समझाता है, “जिसने हमें पवित्र बुलाहट से बुलाया, हमारे कामों के अनुसार नहीं, परन्तु अपने ही उद्देश्य और उस अनुग्रह के अनुसार जो मसीह यीशु में सनातन से हम पर हुआ,” (2 तीमुथियुस 1:9)। हम पहले दिखा चुके हैं कि अतिरिक्त शब्द, “कि हम पवित्र हों,” हर सन्देह को दूर कर देते हैं। यदि तुम कहो कि उसने पहले से देखा कि वे पवित्र होंगे और इसलिए उन्हें चुना, तो तुम पौलुस के क्रम को उलट देते हो। इसलिए तुम निश्चिन्त होकर यह निष्कर्ष निकाल सकते हो: यदि उसने हमें इसलिए चुना कि हम पवित्र हों, तो उसने हमें इसलिए नहीं चुना कि उसने पहले से देखा कि हम पवित्र होंगे। ये दोनों बातें स्पष्टतः असंगत हैं—अर्थात् यह कि भक्त लोग अपनी पवित्रता के लिए चुनाव के ऋणी हैं, और फिर भी कर्मों के द्वारा चुनाव को प्राप्त करते हैं। उस कुतर्क में कोई बल नहीं जिसकी ओर वे बार-बार लौटते हैं, कि प्रभु चुनाव को पिछले पुण्यों के प्रतिफल में नहीं देता, परन्तु आगे आनेवाले पुण्यों को ध्यान में रखकर देता है। क्योंकि जब कहा गया है कि विश्वासी इसलिए चुने गए कि पवित्र हों, तो साथ ही यह भी जताया गया है कि जो पवित्रता उनमें होनेवाली थी उसका उद्गम चुनाव में है। और यह कैसे संगत रूप से कहा जा सकता है कि जो बातें चुनाव से निकली हैं वही चुनाव का कारण हैं? जो बात प्रेरित ने कही थी उसी की पुष्टि वह बाद में यह जोड़कर करता प्रतीत होता है, “उसकी उस सुइच्छा के अनुसार जो उसने अपने आप में ठहराई थी,” (इफिसियों 1:9); क्योंकि “अपने आप में ठहराई” इस कथन का वही अर्थ है मानो कहा गया हो कि अपनी आज्ञा बनाने में उसने अपने से बाहर किसी वस्तु पर विचार नहीं किया; और इसलिए तुरन्त जोड़ा गया है कि हमारे चुनाव में सारा लक्ष्य यह है कि “हम उसकी महिमा की स्तुति के कारण हों।” निश्चय ही ईश्वरीय अनुग्रह चुनाव की सारी स्तुति के योग्य न ठहरता यदि चुनाव सेंतमेंत का न होता; और वह सेंतमेंत का न होता यदि परमेश्वर किसी व्यक्ति को चुनते समय उसके आगामी कर्मों का ध्यान रखता। इसलिए जो मसीह ने अपने चेलों से कहा था वह सब विश्वासियों पर सार्वभौमिक रूप से लागू पाया जाता है, “तुमने मुझे नहीं चुना, परन्तु मैंने तुम्हें चुना है,” (यूहन्ना 15:16)। यहाँ वह न केवल पिछले पुण्यों को हटाता है, वरन् घोषणा करता है कि उनमें अपने आप में ऐसा कुछ नहीं था जिसके कारण वे चुने जाते, केवल उतना जितना उसकी दया ने पहले से किया। और पौलुस के इन शब्दों को हम कैसे समझें, “किसने पहले उसे कुछ दिया है जिसका बदला उसे दिया जाए?” (रोमियों 11:35)। उसका अर्थ स्पष्टतः यह है कि मनुष्य पूरी तरह परमेश्वर की पूर्वगामी भलाई के ऋणी हैं, क्योंकि उनमें, न बीते हुए में, न आनेवाले में, ऐसा कुछ नहीं जो उसकी कृपा को मना सके।

4. रोमियों की पत्री में (रोमियों 9:6), जिसमें वह इस विषय पर फिर अधिक गूढ़ता से और विस्तार से विचार करता है, वह घोषणा करता है कि “वे सब इस्राएली नहीं हैं जो इस्राएल के वंश के हैं;” क्योंकि यद्यपि सब वंशानुगत अधिकारों के विषय में आशीष पाए हुए थे, फिर भी सब ने उत्तराधिकार समान रूप से प्राप्त नहीं किया। सारी चर्चा यहूदियों के अभिमान और व्यर्थ घमण्ड से उत्पन्न हुई, जो कलीसिया का नाम अपने लिए ठहराकर सुसमाचार के विश्वास को अपनी इच्छा पर निर्भर बना देते; जैसे आज के दिन पोप के अनुयायी इसी बहाने अपने आप को परमेश्वर के स्थान पर रखना चाहेंगे। पौलुस, यह मानते हुए कि वाचा के विषय में वे अब्राहम की पवित्र सन्तान थे, फिर भी तर्क करता है कि उनमें से अधिकांश उसके लिए पराए थे, और केवल इसलिए नहीं कि वे पतित होकर पुत्रों के स्थान पर अवैध सन्तान बन गए थे, परन्तु इसलिए कि विचार का मुख्य बिन्दु परमेश्वर का विशेष चुनाव था, जिससे अकेले उसका लेपालकपन पक्का किया जाता था। यदि कुछ की भक्ति उन्हें उद्धार की आशा में स्थिर करती, और दूसरों का विद्रोह ही उनके त्यागे जाने का एकमात्र कारण होता, तो पौलुस के लिए अपने पाठकों को किसी गुप्त चुनाव की ओर ले जाना मूर्खतापूर्ण और बेतुका होता। परन्तु यदि परमेश्वर की इच्छा (जिसका कोई उससे बाहर का कारण न दिखता है न खोजा जाना चाहिए) कुछ को दूसरों से अलग करती है, ऐसे कि इस्राएल के सब पुत्र सच्चे इस्राएली नहीं हैं, तो किसी का अपनी दशा का उद्गम अपने भीतर खोजना व्यर्थ है। वह फिर याकूब और एसाव के उदाहरणों की तुलना करके विषय को और विस्तार से आगे बढ़ाता है। दोनों अब्राहम के पुत्र थे, दोनों एक ही समय अपनी माता के गर्भ में थे, और उस परिवर्तन में बहुत अनोखी बात थी जिससे ज्येष्ठाधिकार का सम्मान याकूब को चला गया, तो भी पौलुस घोषणा करता है कि यह परिवर्तन एक के चुनाव और दूसरे के त्याग की गवाही था।

विचाराधीन प्रश्न चुनाव का उद्गम और कारण है। पूर्वज्ञान के समर्थक आग्रह करते हैं कि यह मनुष्यों के गुणों और अवगुणों में पाया जाना चाहिए। क्योंकि वे छोटा और सरल मार्ग अपनाकर कहते हैं कि परमेश्वर ने याकूब के व्यक्तित्व में दिखाया कि वह उन्हें चुनता है जो उसके अनुग्रह के योग्य हैं, और एसाव के व्यक्तित्व में कि वह उन्हें त्यागता है जिन्हें वह अयोग्य देखता है। उनका दृढ़ कथन ऐसा ही है; परन्तु पौलुस क्या कहता है? “क्योंकि अभी तक न तो बालक जन्मे थे, और न उन्होंने कुछ भला या बुरा किया था, इसलिए कि परमेश्वर की मनसा जो उसके चुनाव के अनुसार है, कर्मों के कारण नहीं परन्तु बुलानेवाले के कारण बनी रहे, उसने रिबका से कहा, कि बड़ा छोटे का दास होगा। जैसा लिखा है, कि मैंने याकूब से प्रेम किया, परन्तु एसाव को अप्रिय जाना,” (रोमियों 9:11-13)। यदि भाइयों के इस भेद में पूर्वज्ञान का कोई हाथ होता, तो समय का उल्लेख असंगत होता। यह मान लें कि याकूब आगे प्राप्त होनेवाले गुणों की योग्यता के कारण चुना गया, तो पौलुस ने यह क्यों कहा कि वह अभी जन्मा नहीं था? और यह जोड़ने का भी कोई अवसर न होता कि उसने अभी कुछ भला नहीं किया था, क्योंकि उत्तर सदा तैयार रहता कि परमेश्वर से कुछ छिपा नहीं, और इसलिए याकूब की भक्ति उसके सामने उपस्थित थी। यदि कर्म कृपा दिलाते हैं, तो याकूब के जन्म से पहले ही उन पर मूल्य रखा जाना चाहिए था, मानो वह पूर्ण आयु का रहा हो। परन्तु कठिनाई को समझाते हुए प्रेरित आगे दिखाता है कि याकूब का लेपालकपन कर्मों पर नहीं, परमेश्वर की बुलाहट पर आधारित था। कर्मों के विषय में वह बीते या आगामी का कोई उल्लेख नहीं करता, वरन् उन्हें स्पष्ट रूप से परमेश्वर की बुलाहट के विरुद्ध रखता है, यह जताते हुए कि जब एक को स्थान दिया जाता है तो दूसरा गिर जाता है; मानो उसने कहा हो, विचार करने की एकमात्र बात यह है कि परमेश्वर को क्या भाया, यह नहीं कि मनुष्यों ने अपनी ओर से क्या दिया। अन्त में, यह निश्चित है कि वे सब कारण, जो मनुष्य परमेश्वर की गुप्त युक्ति से बाहर गढ़ने के आदी हैं, मनसा और चुनाव शब्दों के प्रयोग से हटा दिए गए हैं।

5. मनुष्य इन कथनों को चुनाव में पिछले या आगामी कर्मों को कोई स्थान देकर क्यों धुँधला करने का यत्न करते हैं? यह तो उसी से पूरी तरह बच निकलना है जिसके लिए प्रेरित तर्क करता है—अर्थात् यह कि भाइयों के बीच भेद कर्मों के किसी आधार पर नहीं, वरन् केवल परमेश्वर की बुलाहट पर आधारित है, क्योंकि वह बालकों के जन्म से पहले ठहराया गया था। यदि इस चतुराई में कोई ठोसपन होता, तो वह प्रेरित की दृष्टि से न बचता, परन्तु यह भली-भाँति जानते हुए कि परमेश्वर ने मनुष्य में कोई भलाई पहले से नहीं देखी, सिवा उसके जो वह अपने चुनाव के द्वारा देना पहले ही ठहरा चुका था, वह कोई उलटा क्रम नहीं अपनाता जो भले कर्मों को उनके कारण से पहले रख दे। प्रेरित के शब्दों से हम सीखते हैं कि विश्वासियों का उद्धार पूरी तरह ईश्वरीय चुनाव की आज्ञा पर आधारित है, कि यह विशेषाधिकार कर्मों से नहीं, सेंतमेंत की बुलाहट से प्राप्त होता है। हमारे सामने स्वयं वस्तु का भी एक नमूना रखा गया है। एसाव और याकूब भाई हैं, एक ही माता-पिता से उत्पन्न, एक ही गर्भ में, अभी जन्मे नहीं। उनमें सब कुछ समान है, फिर भी उनके विषय में परमेश्वर का न्याय-निर्णय भिन्न है। वह एक को अपनाता और दूसरे को त्यागता है। पूर्वता का एकमात्र अधिकार ज्येष्ठता का था; परन्तु उसे अनदेखा किया जाता है, और छोटे को बड़े पर प्राथमिकता दी जाती है। वरन् दूसरों के विषय में परमेश्वर ने ज्येष्ठता को अनदेखा किया प्रतीत होता है, इसी उद्देश्य से कि शरीर को घमण्ड के हर आधार से अलग रखे। इश्माएल को त्यागकर वह इसहाक पर कृपा करता है; मनश्शे को पीछे करके वह एप्रैम को सम्मानित करता है।

6. यदि कोई आपत्ति करे कि ये छोटे और निम्न अनुग्रह हमें भावी जीवन के विषय में निर्णय करने के योग्य नहीं बनाते, कि यह मान लेना उचित नहीं कि जिसे ज्येष्ठता का सम्मान मिला वह उसी से स्वर्ग की मीरास के लिए अपनाया गया था; (बहुत से आपत्ति करनेवाले पौलुस को भी नहीं छोड़ते, वरन् उस पर दोष लगाते हैं कि इन अंशों को उद्धृत करने में उसने पवित्रशास्त्र को उसके उचित अर्थ से मोड़ दिया); तो मैं पहले की तरह उत्तर देता हूँ कि प्रेरित ने बिना सोचे-विचारे चूक नहीं की, न अपनी इच्छा से पवित्रशास्त्र के अंशों को अनुचित रूप से लगाया; परन्तु उसने देखा (जो इन लोगों से विचार कराया नहीं जा सकता) कि परमेश्वर ने एक सांसारिक चिह्न के नीचे याकूब के आत्मिक चुनाव को घोषित करना चाहा, जो अन्यथा उसके अगम्य न्यायासन पर छिपा रहता। क्योंकि यदि हम उसे दी गई ज्येष्ठता को आनेवाले जगत से न जोड़ें, तो आशीष का रूप बिलकुल व्यर्थ और हास्यास्पद होगा, क्योंकि उससे उसे परिश्रमों और कष्टों की भीड़, देश-निकाला, तीखे शोक और कड़वी चिन्ताओं के सिवा कुछ प्राप्त नहीं हुआ। इसलिए जब पौलुस को निस्सन्देह मालूम था कि बाहरी वस्तु के द्वारा परमेश्वर ने उन आत्मिक और अमिट आशीषों को प्रकट किया जो उसने अपने दास के लिए अपने राज्य में तैयार की थीं, तब उसने दूसरे को सिद्ध करने के लिए पहले से तर्क लेने में संकोच नहीं किया। क्योंकि हमें स्मरण रखना चाहिए कि कनान देश स्वर्गीय मीरास की बयाने के रूप में दिया गया था; और इसलिए इसमें कोई सन्देह नहीं कि याकूब स्वर्गदूतों के समान मसीह की देह में रोपा गया था, ताकि वह उसी जीवन का भागी हो। इसलिए याकूब चुना जाता है जबकि एसाव त्यागा जाता है; परमेश्वर की पूर्वनियति वहाँ भेद करती है जहाँ पुण्य के विषय में कोई भेद नहीं था। यदि तुम कारण पूछो तो प्रेरित उसे देता है, “क्योंकि वह मूसा से कहता है, मैं जिस किसी पर दया करना चाहूँ उस पर दया करूँगा, और जिस किसी पर कृपा करना चाहूँ उस पर कृपा करूँगा” (रोमियों 9:15)। और इसका क्या अर्थ है, कृपया बताएँ? यह प्रभु की ओर से स्पष्ट घोषणा ही है कि वह मनुष्यों में स्वयं ऐसा कुछ नहीं पाता जो उसे कृपा दिखाने के लिए प्रेरित करे, कि यह पूरी तरह उसकी अपनी दया के कारण है, और इसलिए कि उनका उद्धार उसी का कार्य है। जब परमेश्वर तुम्हारा उद्धार केवल अपने ही में रखता है, तो तुम अपने पास क्यों उतरो? जब वह तुम्हें केवल अपनी दया देता है, तो तुम अपने पुण्यों की ओर क्यों लौटो? जब वह तुम्हारे विचारों को केवल अपनी दया तक सीमित करता है, तो तुम आंशिक रूप से अपने कर्मों की ओर क्यों मुड़ो?

इसलिए हमें उस छोटी संख्या पर आना चाहिए जिनका वर्णन पौलुस कहीं और परमेश्वर के पूर्वज्ञात के रूप में करता है (रोमियों 11:2); पूर्वज्ञात, जैसा ये लोग कल्पना करते हैं, निठल्ले, निष्क्रिय चिन्तन के द्वारा नहीं, वरन् उस अर्थ में जो वह प्रायः रखता है। क्योंकि निश्चय ही जब पतरस कहता है कि मसीह “परमेश्वर की ठहराई हुई योजना और पूर्वज्ञान के अनुसार पकड़वाया गया,” (प्रेरितों के काम 2:23), तब वह परमेश्वर को केवल चिन्तन करनेवाला नहीं, वरन् वास्तव में हमारा उद्धार सम्पन्न करनेवाला दिखाता है। इसी प्रकार पतरस भी, यह कहकर कि जिन विश्वासियों को वह लिख रहा है वे “परमेश्वर के पूर्वज्ञान के अनुसार” चुने हुए हैं, (1 पतरस 1:2), उस गुप्त पूर्वनियति को ठीक-ठीक व्यक्त करता है जिसके द्वारा परमेश्वर ने उन पर मुहर लगाई है जिन्हें उसने पुत्रों के रूप में अपनाना भाया। मनसा शब्द को उस शब्द का पर्यायवाची मानकर प्रयोग करने से, जो सदा उसे सूचित करता है जिसे निश्चित ठहराव कहा जाता है, वह निस्सन्देह दिखाता है कि हमारे उद्धार का कर्ता होने में परमेश्वर अपने से बाहर नहीं जाता। इसी अर्थ में वह उन्हीं अध्यायों में कहता है कि मसीह, “मेमने” के रूप में, “जगत की उत्पत्ति से पहले ठहराया गया था,” (1 पतरस 1:19, 20)। इससे अधिक नीरस या बेतुकी बात और क्या हो सकती थी कि परमेश्वर को स्वर्ग की ऊँचाई से यह देखते दिखाया जाए कि मानवजाति का उद्धार कहाँ से आनेवाला है? पूर्वज्ञात प्रजा से पतरस का वही अर्थ है जो पौलुस का परमेश्वर का नाम झूठा धारण करनेवाली भीड़ में से चुने हुए बचे हुओं से है। एक और अंश में, उनके व्यर्थ घमण्ड को दबाने के लिए जो केवल मुखौटा ओढ़े हुए संसार की दृष्टि में भक्तों के बीच प्रथम स्थान अपने लिए ठहराते हैं, पौलुस कहता है, “प्रभु अपनों को जानता है,” (2 तीमुथियुस 2:19)। संक्षेप में, उस शब्द से वह दो प्रकार के लोगों को सूचित करता है, एक जो अब्राहम की सारी सन्तान से बना है, दूसरा उस सन्तान में से अलग किया हुआ लोग, जो मनुष्य की दृष्टि से छिपा होने पर भी परमेश्वर की आँख के सामने खुला है। और इसमें कोई सन्देह नहीं कि उसने यह अंश मूसा से लिया, जो घोषणा करता है कि परमेश्वर जिस पर चाहे दया करेगा (यद्यपि वह एक चुने हुए लोगों के विषय में बोल रहा था जिनकी दशा प्रत्यक्ष में समान थी); मानो उसने कहा हो कि सामान्य लेपालकपन में एक विशेष अनुग्रह समाया था जो वह कुछ को अधिक पवित्र निधि के रूप में देता है, और सामान्य वाचा में ऐसा कुछ नहीं जो इस संख्या को सामान्य क्रम से अलग होने से रोके। इस विषय में स्वतन्त्र बाँटनेवाला और प्रबन्धक होना परमेश्वर को भाता है, और वह स्पष्ट घोषणा करता है कि एक पर दूसरे की अपेक्षा दया दिखाने का एकमात्र आधार उसकी सर्वोच्च सुइच्छा है; क्योंकि जब दया उस पर की जाती है जो उसे माँगता है, तो यद्यपि वह निश्चय ही इनकार नहीं सहता, फिर भी वह या तो पहले से कृपा करता है या आंशिक रूप से उसे पाता है, जिसके सारे पुण्य का दावा परमेश्वर अपने लिए करता है।

7. अब सर्वोच्च न्यायी और गुरु ही सारे मामले का निर्णय करे। अपने सुननेवालों में ऐसी हठ देखकर कि उसके वचन भीड़ पर लगभग निष्फल पड़े, वह इस ठोकर को दूर करने के लिए पुकार उठता है, “जो कुछ पिता मुझे देता है वह सब मेरे पास आएगा।” “और मेरे भेजनेवाले की इच्छा यह है कि जो कुछ उसने मुझे दिया है, उसमें से मैं कुछ न खोऊँ,” (यूहन्ना 6:37, 39)।

ध्यान दो कि पिता का देना हमारे मसीह की देखरेख और रक्षा में सौंपे जाने का पहला कदम है। सम्भव है कोई यहाँ पलटकर आपत्ति करे कि पिता के विशेष रूप से केवल वे ही हैं जो विश्वास के द्वारा स्वेच्छा से अपने आप को सौंप देते हैं। परन्तु मसीह केवल यह दृढ़ता से कहता है कि यद्यपि बड़ी भीड़ों का पीछे हट जाना संसार को हिला दे, फिर भी परमेश्वर की युक्ति दृढ़ बनी रहेगी, स्वर्ग से भी अधिक स्थिर, कि उसका चुनाव कभी विफल न होगा। चुने हुओं के विषय में कहा गया है कि वे पिता के थे, इससे पहले कि उसने उन्हें अपने एकलौते पुत्र को दिया। पूछा जाता है कि क्या वे स्वभाव से उसके थे? नहीं, वे पराए थे, पर वह उन्हें सौंपकर अपना बना लेता है। मसीह के शब्द इतने स्पष्ट हैं कि कुतर्क के किसी कोहरे से धुँधले नहीं किए जा सकते। “कोई मेरे पास नहीं आ सकता जब तक पिता, जिसने मुझे भेजा है, उसे खींच न ले।” “इसलिए जिस किसी ने पिता से सुना और सीखा है वह मेरे पास आता है,” (यूहन्ना 6:44, 45)। यदि सब बिना भेद के मसीह के आगे घुटने टेकते, तो चुनाव सामान्य होता; जबकि अब विश्वासियों की थोड़ी-सी संख्या में स्पष्ट भेद दिखाई देता है। इसलिए हमारा उद्धारकर्ता, यह घोषणा करने के थोड़ी देर बाद कि जो चेले उसे दिए गए थे वे पिता की सामान्य सम्पत्ति थे, जोड़ता है, “मैं संसार के लिए विनती नहीं करता, परन्तु उनके लिए जिन्हें तूने मुझे दिया है; क्योंकि वे तेरे हैं,” (यूहन्ना 17:9)। इसी से सारा संसार अब अपने सृष्टिकर्ता का नहीं रहा, सिवा उतने के जितने अनुग्रह कुछ को, बहुतों को नहीं, जो अन्यथा नाश होते, शाप, ईश्वरीय क्रोध और अनन्त मृत्यु से छुड़ाता है, जबकि वह संसार को उस विनाश के लिए छोड़ देता है जिसके लिए वह ठहराया गया है। इस बीच, यद्यपि मसीह मध्यस्थ के रूप में बीच में आता है, फिर भी वह पिता के साथ मिलकर चुनने का अधिकार जताता है, “मैं तुम सब के विषय में नहीं कहता: मैं जानता हूँ कि मैंने किन्हें चुना है” (यूहन्ना 13:18)। यदि पूछा जाए कि उसने उन्हें कहाँ से चुना है, तो वह दूसरे स्थान पर उत्तर देता है, “संसार में से;” जिसे वह अपनी विनतियों से बाहर रखता है जब वह अपने चेलों को पिता को सौंपता है (यूहन्ना 15:19)। हमें यह अवश्य मानना चाहिए, जब वह कहता है कि वह जानता है कि उसने किन्हें चुना है, कि पहले, मानवजाति के कुछ व्यक्ति सूचित हैं; और दूसरे, कि वे अपने गुणों के स्तर से नहीं, स्वर्गीय आज्ञा से अलग किए गए हैं। इससे यह निकलता है कि जब मसीह अपने आप को चुनाव का कर्ता ठहराता है, तब कोई अपने बल या परिश्रम से श्रेष्ठ नहीं ठहरता। कहीं और यहूदा को चुने हुओं में गिनते हुए, यद्यपि वह शैतान था (यूहन्ना 6:70), वह केवल प्रेरिताई के पद की ओर संकेत करता है, जो यद्यपि ईश्वरीय कृपा का उज्ज्वल प्रकटीकरण है (जैसा पौलुस अपने विषय में इसे बार-बार मानता है), फिर भी अपने भीतर अनन्त उद्धार की आशा नहीं रखता। इसलिए यहूदा, जब उसने विश्वासघात से प्रेरित का पद निभाया, तो शैतान से भी बुरा हो सकता था; परन्तु जिन्हें मसीह ने एक बार अपनी देह में रोपा, उनमें से किसी को वह कभी नाश होने नहीं देगा, क्योंकि उनका उद्धार सुनिश्चित करने में वह वही पूरा करेगा जिसकी उसने प्रतिज्ञा की; अर्थात् सब से बड़ी ईश्वरीय सामर्थ्य का प्रयोग (यूहन्ना 10:28)। क्योंकि जब वह कहता है, “जिन्हें तूने मुझे दिया उनमें से मैंने एक को भी न खोया, केवल उस विनाश के पुत्र को,” (यूहन्ना 17:12), तो यह कथन, यद्यपि इसमें अपप्रयोग-अलंकार (catachresis) है, तनिक भी अस्पष्ट नहीं। सार यह है कि परमेश्वर सेंतमेंत के लेपालकपन से उन्हें गढ़ता है जिन्हें वह पुत्रों के रूप में चाहता है; परन्तु भीतरी कारण स्वयं उसी में है, क्योंकि वह अपनी गुप्त सुइच्छा से सन्तुष्ट है।

8. परन्तु अम्ब्रोस, ओरिजन और जेरोम का मत था कि परमेश्वर अपना अनुग्रह मनुष्यों में उस उपयोग के अनुसार बाँटता है जो वह पहले से देखता है कि प्रत्येक उसका करेगा। यह भी जोड़ा जा सकता है कि अगस्तीन भी कुछ समय तक इसी मत का था; परन्तु जब उसने पवित्रशास्त्र के ज्ञान में अधिक उन्नति कर ली, तब उसने न केवल उसे स्पष्टतः झूठा कहकर वापस ले लिया, वरन् सामर्थ्य के साथ उसका खण्डन किया (August. Retract. Lib. 1, c. 13)। वरन् वापस लेने के बाद भी, पेलाजियस के अनुयायियों की ओर संकेत करते हुए जो उस भूल पर अब भी डटे थे, वह कहता है, “कौन आश्चर्य नहीं करता कि प्रेरित ने यह अति तीव्र बात नहीं देखी? क्योंकि उनके विषय में जो अभी जन्मे नहीं थे, एक अति चौंकानेवाला कथन कहकर, और फिर आपत्ति के रूप में अपने आप से यह प्रश्न पूछकर, ‘तो हम क्या कहें? क्या परमेश्वर के यहाँ अन्याय है?’ उसे अवसर था कि उत्तर दे कि परमेश्वर ने दोनों के पुण्य पहले से देख लिए थे, पर वह ऐसा नहीं कहता, वरन् परमेश्वर के न्याय और दया की शरण लेता है,” (August. Epist. 106, ad Sixtum)। और एक और अंश में, चुनाव से पहले सब पुण्य को हटाकर, वह कहता है, “यहाँ निश्चय ही उन लोगों के व्यर्थ तर्क के लिए कोई स्थान नहीं जो परमेश्वर के पूर्वज्ञान को परमेश्वर के अनुग्रह के विरुद्ध बचाते हैं, और इसलिए यह मानते हैं कि हम जगत की उत्पत्ति से पहले इसलिए चुने गए कि परमेश्वर ने पहले से जान लिया कि हम भले होंगे, इसलिए नहीं कि वह स्वयं हमें भला बनाएगा। यह उसकी भाषा नहीं जो कहता है, ‘तुमने मुझे नहीं चुना, परन्तु मैंने तुम्हें चुना है,’ (यूहन्ना 15:16)। क्योंकि यदि उसने हमें इसलिए चुना कि उसने पहले से जान लिया कि हम भले होंगे, तो वह साथ ही यह भी पहले से जानता कि हम उसे चुनेंगे,” (August. in Joann. 8, उसी आशय में जो आगे कहा गया है उसे भी देखो)। जो लोग स्वेच्छा से पिताओं के अधिकार से सन्तुष्ट हो जाते हैं, उन पर अगस्तीन की गवाही प्रबल हो: यद्यपि अगस्तीन यह स्वीकार नहीं करता कि वह दूसरों से भिन्न मत रखता है,498 परन्तु स्पष्ट प्रमाण से दिखाता है कि वह भेद जो पेलाजियस के अनुयायियों ने द्वेषवश उस पर थोपा, निराधार है। क्योंकि वह अम्ब्रोस से उद्धृत करता है (Lib. de Prædest. Sanct. cap. 19), “मसीह उन्हें बुलाता है जिन पर वह तरस खाता है।” फिर, “यदि वह चाहता तो उन्हें अभक्तों के बदले भक्त बना सकता था; परन्तु परमेश्वर उन्हें बुलाता है जिन्हें बुलाना वह उचित समझता है, और जिसे चाहे धार्मिक बना देता है।” यदि हम अगस्तीन से ही पूरी पुस्तक रचने को तैयार होते, तो पाठक को यह दिखाना सरल होता कि मुझे उसके शब्दों के सिवा और किन्हीं शब्दों के प्रयोग की आवश्यकता नहीं; परन्तु मैं उसे लम्बे वर्णन से बोझिल करना नहीं चाहता। परन्तु यह मानकर भी कि पिताओं ने ऐसा नहीं कहा, हम स्वयं वस्तु पर ध्यान दें। एक कठिन प्रश्न उठाया गया था—अर्थात् क्या परमेश्वर ने कुछ व्यक्तियों को अपना अनुग्रह देकर न्याय किया? पौलुस इस प्रश्न से तुरन्त यह कहकर छुटकारा पा सकता था कि परमेश्वर ने कर्मों पर दृष्टि की। वह ऐसा क्यों नहीं करता? वह ऐसी भाषा क्यों जारी रखता है जो उसे उसी कठिनाई में खुला छोड़ती है? इसके सिवा और क्यों, कि ऐसा कहना उचित नहीं होता? उसके मुख से बोलनेवाले पवित्र आत्मा की ओर से कोई विस्मृति नहीं थी। इसलिए वह बिना अस्पष्टता के उत्तर देता है कि परमेश्वर अपने चुने हुओं पर कृपा करता है क्योंकि यही उसे भाता है, और दया करता है क्योंकि यही उसे भाता है। क्योंकि ये शब्द, “मैं जिस पर अनुग्रह करना चाहूँ उस पर अनुग्रह करूँगा, और जिस पर दया करना चाहूँ उस पर दया करूँगा,” (निर्गमन 33:19), वास्तव में वैसे ही हैं मानो कहा गया हो, परमेश्वर दया करने के लिए किसी और कारण से नहीं, केवल इसलिए प्रेरित होता है कि उसे दया करना भाता है। इसलिए अगस्तीन की घोषणा सच बनी रहती है। परमेश्वर का अनुग्रह मनुष्यों को चुने जाने के योग्य पाता नहीं, बनाता है।

9. और हम थॉमस की उस चतुराई में न अटकें कि पुण्य का पूर्वज्ञान पूर्वनियति का कारण है, निस्सन्देह पूर्वनियति करने के कार्य के विषय में नहीं, परन्तु हमारी ओर से किसी अर्थ में वह कहा जा सकता है, अर्थात् पूर्वनियति के किसी विशेष आकलन के विषय में; जैसे जब कहा जाता है कि परमेश्वर मनुष्य को उसके पुण्य के अनुसार महिमा के लिए पूर्वनियत करता है, इस अर्थ में कि उसने उसे वह अनुग्रह देना ठहराया जिससे वह महिमा का पुण्य कमाता है। क्योंकि जबकि प्रभु चाहता है कि हम चुनाव में उसकी केवल भलाई के सिवा और कुछ न देखें, तब किसी का और अधिक देखना चाहना उलटी दिखावटी लालसा है। परन्तु यदि हम चतुराई की परीक्षा करना चाहें, तो थॉमस की कुटिल युक्ति का खण्डन करना कठिन न होगा। वह कहता है कि चुने हुए एक प्रकार से अपने पुण्यों के कारण महिमा के लिए पूर्वनियत हैं, क्योंकि परमेश्वर उन्हें वह अनुग्रह देने को पूर्वनियत करता है जिससे वे महिमा का पुण्य कमाते हैं। यदि मैं इसके विपरीत यह आपत्ति करूँ कि अनुग्रह की पूर्वनियति जीवन के लिए चुनाव की सेविका है और उसकी दासी के रूप में उसके पीछे आती है; कि अनुग्रह उन्हीं के लिए पूर्वनियत है जिनके लिए महिमा का अधिकार पहले ठहराया गया था, क्योंकि प्रभु अपने पुत्रों को चुनाव के द्वारा धर्मी ठहराए जाने तक पहुँचाना चाहता है? क्योंकि इससे यह निकलेगा कि महिमा की पूर्वनियति अनुग्रह की पूर्वनियति का कारण है, और इसका उलटा नहीं। परन्तु इन विवादों को हम उन लोगों के बीच अनावश्यक समझकर छोड़ दें जो समझते हैं कि परमेश्वर के वचन में उनके लिए पर्याप्त बुद्धि है। क्योंकि एक प्राचीन कलीसियाई लेखक ने सच ही कहा है, जो परमेश्वर के चुनाव का श्रेय पुण्यों को देते हैं वे जितना उन्हें होना चाहिए उससे अधिक बुद्धिमान बनते हैं (Ambrose. de Vocat. Gentium, lib. 1, c. 2)।

10. कुछ लोग आपत्ति करते हैं कि परमेश्वर अपने ही से असंगत होगा, यदि वह बिना भेद के सब को निमन्त्रण देता है जबकि चुनता केवल थोड़ों को है। इस प्रकार, उनके अनुसार, प्रतिज्ञा की सार्वभौमिकता विशेष अनुग्रह के भेद को नष्ट कर देती है। कुछ संयमी लोग इस प्रकार इसलिए नहीं बोलते कि सत्य को दबाएँ, वरन् उलझन-भरे प्रश्नों से पीछा छुड़ाने और अत्यधिक जिज्ञासा पर लगाम लगाने के लिए। आशय सराहनीय है, परन्तु योजना किसी प्रकार स्वीकार करने योग्य नहीं, क्योंकि छल-कपट किसी समय क्षमा के योग्य नहीं। फिर जो लोग अपनी ढिठाई दिखाते हैं, उनमें हमें केवल एक घिनौना कुतर्क या लज्जाजनक भूल दिखाई देती है। जिस रीति से पवित्रशास्त्र इन दोनों बातों का मेल कराता है—अर्थात् यह कि बाहरी प्रचार से सब विश्वास और पश्चाताप के लिए बुलाए जाते हैं, और फिर भी विश्वास और पश्चाताप का आत्मा सब को नहीं दिया जाता—वह मैं पहले समझा चुका हूँ, और शीघ्र ही फिर दुहराऊँगा। परन्तु जो बात वे मान बैठे हैं उसे मैं दो रूपों में झूठी कहकर नकारता हूँ: क्योंकि जो धमकी देता है कि जब एक नगर पर मेंह बरसेगा तो दूसरे में अनावृष्टि होगी (आमोस 4:7); और एक और अंश में घोषणा करता है कि वचन का अकाल पड़ेगा (आमोस 8:11), वह अपने आप को सब को समान रूप से बुलाने के किसी निश्चित दायित्व के अधीन नहीं करता। और जो पौलुस को एशिया में प्रचार करने से रोकता है और बितूनिया से हटाकर मकिदुनिया ले जाता है (प्रेरितों के काम 16:6), वह दिखाता है कि निधि को जैसे चाहे बाँटना उसी का अधिकार है। परन्तु यशायाह के द्वारा वह और स्पष्टता से दिखाता है कि वह उद्धार की प्रतिज्ञाओं को विशेष रूप से चुने हुओं के लिए कैसे ठहराता है (यशायाह 8:16); क्योंकि वह घोषणा करता है कि उसके चेले केवल उन्हीं से बनेंगे, और बिना भेद के सारी मानवजाति से नहीं। इससे प्रकट है कि उद्धार की जो शिक्षा, कहा जाता है, केवल कलीसिया के पुत्रों के लिए अलग रखी गई है, उसका दुरुपयोग होता है जब उसे सब के लिए प्रभावी रूप से उपलब्ध दिखाया जाता है। अभी के लिए इतना देख लेना पर्याप्त हो कि यद्यपि सुसमाचार का वचन सब को सामान्य रूप से सम्बोधित है, फिर भी विश्वास का वरदान दुर्लभ है। यशायाह कारण बताता है जब वह कहता है कि प्रभु की भुजा सब पर प्रकट नहीं हुई (यशायाह 53:1)। यदि उसने कहा होता कि सुसमाचार की दुर्भाव और हठ से निन्दा की जाती है, क्योंकि बहुत लोग हठपूर्वक सुनने से इनकार करते हैं, तो शायद इस सार्वभौमिक बुलावे के लिए कुछ रंग होता। परन्तु भविष्यद्वक्ता का उद्देश्य मनुष्यों के दोष को घटाना नहीं है, जब वह उनके अन्धेपन का स्रोत यह बताता है कि परमेश्वर उन पर अपनी भुजा प्रकट करना नहीं भाता; वह केवल हमें स्मरण दिलाता है कि विश्वास एक विशेष वरदान है, इसलिए कान में बाहरी शिक्षा का गूँजना व्यर्थ है। परन्तु मैं उन गुरुओं से जानना चाहूँगा कि क्या केवल प्रचार मनुष्यों को परमेश्वर के पुत्र बनाता है या विश्वास। निश्चय ही जब कहा गया है, “जितनों ने उसे ग्रहण किया, उसने उन्हें परमेश्वर की सन्तान होने का अधिकार दिया, अर्थात् उन्हें जो उसके नाम पर विश्वास रखते हैं,” (यूहन्ना 1:12), तो हमारे सामने कोई गड्डमड्ड समूह नहीं रखा गया, वरन् विश्वासियों के लिए एक विशेष क्रम ठहराया गया है, जो “न तो लहू से, न शरीर की इच्छा से, न मनुष्य की इच्छा से, परन्तु परमेश्वर से उत्पन्न हुए हैं।”
498 लैटिन में, “a reliquis;” फ्रेंच में, “les autre Docteurs anciens;”—अन्य प्राचीन गुरु।

परन्तु कहा जाता है कि विश्वास और वचन के बीच पारस्परिक सहमति है। जहाँ कहीं विश्वास है वहाँ यह अवश्य होगी। परन्तु बीज का काँटों में या पथरीली भूमि पर गिरना कोई नई बात नहीं; न केवल इसलिए कि अधिकांश वास्तव में परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोही प्रतीत होते हैं, वरन् इसलिए भी कि सब को आँखें और कान नहीं दिए गए। तब यह संगत रूप से कैसे कहा जा सकता है कि परमेश्वर बुलाता है जबकि वह जानता है कि बुलाए हुए नहीं आएँगे? मेरी ओर से अगस्तीन उत्तर दे: “क्या तुम मुझसे विवाद करोगे? मेरे साथ आश्चर्य करो और पुकार उठो, ओह, कैसी गहराई! आओ हम दोनों भय में एकमत हों, ऐसा न हो कि भूल में नाश हो जाएँ,” (August. de Verb. Apost. Serm. 11)। फिर यदि चुनाव, जैसा पौलुस घोषणा करता है, विश्वास का जनक है, तो मैं तर्क को पलटकर कहता हूँ कि विश्वास सामान्य नहीं है, क्योंकि चुनाव विशेष है। क्योंकि कारणों और परिणामों की श्रृंखला से सहज ही निष्कर्ष निकलता है, जब पौलुस कहता है कि पिता ने हमें मसीह में स्वर्गीय स्थानों में हर प्रकार की आत्मिक आशीष दी है, जैसा उसने जगत की उत्पत्ति से पहले हमें उसमें चुन लिया, (इफिसियों 1:3, 4), कि ये धन सब के लिए सामान्य नहीं हैं, क्योंकि परमेश्वर ने केवल उन्हीं को चुना जिन्हें उसने चाहा। और एक और अंश में वह चुने हुओं के विश्वास की जो प्रशंसा करता है उसका कारण यह है कि कोई यह न समझे कि वह विश्वास अपने स्वभाव से प्राप्त करता है; क्योंकि जिन्हें उसने पहले से चुन लिया था उन्हें सेंतमेंत प्रकाशित करने की महिमा अकेले परमेश्वर की है (Tit. 1:1)। क्योंकि बर्नार्ड ने ठीक कहा है, “उसका मित्र अलग से सुने जब वह उनसे कहता है, हे छोटे झुण्ड, मत डर: तुम्हें परमेश्वर के राज्य के भेद जानने का अधिकार दिया गया है। ये कौन हैं? वे जिन्हें उसने पहले से जाना और अपने पुत्र के स्वरूप में ढलने के लिए पूर्वनियत किया। उसने अपनी बड़ी और गुप्त युक्ति प्रकट की है। प्रभु अपनों को जानता है, परन्तु जो परमेश्वर को ज्ञात था वह मनुष्यों पर प्रकट किया गया; और वह इस बड़े भेद की सहभागिता किसी को देना नहीं भाता सिवा उनके जिन्हें उसने पहले से जाना और अपना होने के लिए पूर्वनियत किया,” (Bernard. ad Thomas Præpos. Benerlae. Epist. 107)। थोड़ी देर बाद वह निष्कर्ष निकालता है, “प्रभु की दया उसके डरवैयों पर अनादिकाल से अनन्तकाल तक है; अनादिकाल से पूर्वनियति के द्वारा, अनन्तकाल तक महिमा देने के द्वारा: एक का आरम्भ नहीं जाना जाता, दूसरे का अन्त नहीं।” परन्तु बर्नार्ड को साक्षी के रूप में उद्धृत क्यों करें, जब हम अपने गुरु के मुख से सुनते हैं, “यह नहीं कि किसी ने पिता को देखा है, केवल वही जो परमेश्वर की ओर से है”? (यूहन्ना 6:46)। इन शब्दों से वह जताता है कि वे सब जो परमेश्वर द्वारा नया जन्म नहीं पाए, उसके मुख के तेज से चकित होते हैं। और सच तो यह है कि विश्वास चुनाव से उचित रीति से जुड़ा है, बशर्ते वह दूसरा स्थान ले। यह क्रम हमारे उद्धारकर्ता ने इन शब्दों में स्पष्ट व्यक्त किया है, “मेरे भेजनेवाले की इच्छा यह है कि जो कुछ उसने मुझे दिया है उसमें से मैं कुछ न खोऊँ;” “और मेरे भेजनेवाले की इच्छा यह है कि जो कोई पुत्र को देखे और उस पर विश्वास करे, वह अनन्त जीवन पाए,” (यूहन्ना 6:39, 40)। यदि वह चाहता कि सब बचें, तो वह अपने पुत्र को उनका रखवाला ठहराता, और विश्वास के पवित्र बन्धन से उन सब को अपनी देह में रोपता। अब यह स्पष्ट है कि विश्वास पितृवत् प्रेम का एक अनुपम बयाना है, जो उन पुत्रों के लिए सँजोया गया है जिन्हें उसने अपनाया है। इसी से मसीह कहीं और कहता है कि भेड़ें चरवाहे के पीछे चलती हैं क्योंकि वे उसकी आवाज़ पहचानती हैं, परन्तु पराए के पीछे नहीं चलेंगी, क्योंकि वे परायों की आवाज़ नहीं पहचानतीं (यूहन्ना 10:4)। परन्तु यह भेद कहाँ से, सिवा इसके कि उनके कान ईश्वरीय रीति से बेधे गए हैं? क्योंकि कोई अपने आप को भेड़ नहीं बनाता, वरन् स्वर्गीय अनुग्रह से गढ़ा जाता है। और प्रभु क्यों घोषणा करता है कि हमारा उद्धार सदा पक्का और निश्चित रहेगा, सिवा इसके कि वह परमेश्वर की अजेय सामर्थ्य से सुरक्षित है? (यूहन्ना 10:29)। इसलिए वह निष्कर्ष निकालता है कि अविश्वासी उसकी भेड़ों में से नहीं हैं (यूहन्ना 10:16)। कारण यह है कि वे उनकी संख्या में नहीं जो, जैसा प्रभु ने यशायाह के द्वारा प्रतिज्ञा की, उसके चेले होनेवाले थे। इसके अतिरिक्त, जो अंश मैंने उद्धृत किए हैं उनमें दृढ़ता निहित है, इसलिए वे चुनाव की अटल स्थिरता की गवाही भी हैं।

11. अब हम त्यागे हुओं पर आते हैं, जिनका उल्लेख प्रेरित साथ ही करता है (रोमियों 9:13)। क्योंकि जैसे याकूब, जिसने अभी भले कर्मों से कुछ नहीं कमाया था, कृपा में लिया गया; वैसे ही एसाव, जो अभी किसी अपराध से अशुद्ध नहीं हुआ था, अप्रिय ठहराया गया। यदि हम कर्मों की ओर दृष्टि फेरें, तो प्रेरित के प्रति अन्याय करते हैं, मानो वह उसे देखने से चूक गया जो हमारे लिए स्पष्ट है। इसके अतिरिक्त, इसका पूरा प्रमाण है कि उसने उसे नहीं देखा, क्योंकि वह स्पष्ट आग्रह करता है कि जब अभी उन्होंने न भला किया था न बुरा, तब एक चुना गया, दूसरा त्यागा गया, यह सिद्ध करने के लिए कि ईश्वरीय पूर्वनियति की नींव कर्मों में नहीं है। फिर, “क्या परमेश्वर अन्यायी है?” यह आपत्ति उठाकर, अपनी धार्मिकता का सबसे निश्चित और स्पष्ट बचाव अपनाने के बदले—अर्थात् यह कि परमेश्वर ने एसाव को उसकी दुष्टता के अनुसार बदला दिया—वह एक भिन्न समाधान से सन्तुष्ट है—अर्थात् यह कि त्यागे हुए स्पष्ट रूप से इसलिए खड़े किए गए हैं कि उससे परमेश्वर की महिमा प्रकट हो। अन्त में वह निष्कर्ष निकालता है कि परमेश्वर जिस पर चाहता है दया करता है, और जिसे चाहता है कठोर कर देता है (रोमियों 9:18)। तुम देखते हो कि वह दोनों को परमेश्वर की केवल सुइच्छा पर कैसे ठहराता है। इसलिए यदि हम उसके अपने लोगों पर दया करने का कोई कारण नहीं बता सकते, सिवा इसके कि उसे यही भाता है, तो न हमारे पास उसके दूसरों को त्यागने का कोई कारण हो सकता है सिवा उसकी इच्छा के। जब कहा जाता है कि परमेश्वर जिस पर चाहे दया से दृष्टि करता या कठोर कर देता है, तो मनुष्यों को स्मरण दिलाया जाता है कि वे उसकी इच्छा से परे कोई कारण न खोजें।

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