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व्यवस्था बनाने के अधिकार के विषय में। इस विषय में पोप और उसके अनुयायियों की क्रूरता, जो आत्माओं पर अत्याचार करके उन्हें कुचलते और नष्ट करते हैं (भाग 1/2)
अध्याय 10।
व्यवस्था बनाने के अधिकार के विषय में। इस विषय में पोप और उसके अनुयायियों की क्रूरता, जो आत्माओं पर अत्याचार करके उन्हें कुचलते और नष्ट करते हैं।
इस अध्याय में विचार किया गया है,—I. सामान्य रूप से मानवीय विधानों के विषय में। नागरिक और कलीसियाई व्यवस्थाओं के भेद के विषय में। विवेक के विषय में, और इस बात के विषय में कि सेवक विवेक पर व्यवस्थाएँ क्यों और किस अर्थ में नहीं थोप सकते, खण्ड 1-8। II. रीति-विधियों और अनुशासन से सम्बन्ध रखनेवाली परम्पराओं अथवा पोप-मतवादी विधानों के विषय में। उनमें निहित अनेक दोष, खण्ड 9-17। उन परम्पराओं के पक्ष में दिए गए तर्कों का खण्डन, खण्ड 17-26। III. उन कलीसियाई विधानों के विषय में जो भले और वैध हैं, खण्ड 27-32।
खण्ड।
1. व्यवस्था बनाने में कलीसिया का अधिकार। इसे मानवीय परम्पराओं का स्रोत बना दिया गया। इन परम्पराओं की अभक्ति।
2. पोप-मतवादी परम्पराओं में से अनेक का पालन न केवल कठिन, वरन असम्भव है।
3. प्रश्न को अधिक सरलता से समझाने के लिए विवेक के स्वरूप को परिभाषित करना आवश्यक है।
4. विवेक की परिभाषा की व्याख्या। परिभाषा को स्पष्ट करने के लिए उदाहरण।
5. विवेक के कारण हाकिमों के अधीन रहने की पौलुस की शिक्षा परम्पराओं के बन्धनकारी होने के पोप-मतवादी सिद्धान्त का किसी प्रकार समर्थन नहीं करती।
6. प्रश्न का कथन। उसके निर्णय की एक संक्षिप्त रीति।
7. जीवन का सिद्ध नियम व्यवस्था में है। परमेश्वर ही हमारा एकमात्र व्यवस्थादाता है।
8. पोप-तन्त्र की परम्पराएँ परमेश्वर के वचन के विरुद्ध हैं।
9. पोप-मतवादियों की रीति-विधिक परम्पराएँ। उनकी अभक्ति। परमेश्वर की सच्ची आराधना के स्थान पर इनकी स्थापना।
10. इन रीति-विधियों के द्वारा परमेश्वर की आज्ञा व्यर्थ ठहराई गई।
11. इन रीति-विधियों में से कुछ निरर्थक और बचकानी हैं। उनकी अन्तहीन विविधता। वे यहूदी मत को भीतर ले आती हैं।
12. यहूदी मत और अन्यजातियों के मत से उधार ली गई इन रीति-विधियों की विसंगति।
13. अगस्तीन द्वारा उनकी असह्य संख्या की निन्दा।
14. इससे कलीसिया की जो हानि हुई। उन्हें क्षमा नहीं किया जा सकता।
15. वे अन्धविश्वासियों को भटकाती हैं। वे एक प्रकार के प्रदर्शन और मन्त्र-पाठ के रूप में प्रयोग की जाती हैं। वे लाभ कमाने के लिए बेची जाती हैं।
16. इस प्रकार की सब परम्पराएँ एक-सी आपत्तियों के योग्य हैं।
17. परम्पराओं के पक्ष में दिए गए तर्कों का उत्तर।
18. उत्तर जारी।
19. प्रेरितों के समय में प्रभु-भोज के सीधे-सादे संचालन और पोप-मतवादियों की जटिल रीति-विधियों से एक दृष्टान्त।
20. पवित्र जल के प्रयोग से एक और दृष्टान्त।
21. यरूशलेम में प्रेरितों और प्राचीनों के निर्णय पर आधारित परम्पराओं के पक्ष में एक तर्क। इस निर्णय की व्याख्या।
22. निर्बल भाइयों के कारण पोप-तन्त्र की कुछ बातें कुछ समय के लिए स्वीकार की जा सकती हैं।
23. पोप-मतवादी परम्पराओं का पालन मसीही स्वतन्त्रता के विपरीत, विवेक के लिए पीड़ादायक और परमेश्वर का अपमान है।
24. धर्म में सब मानवीय आविष्कार परमेश्वर को अप्रिय हैं। कारण। एक उदाहरण से पुष्टि।
25. शमूएल और मानोह के उदाहरणों पर आधारित एक तर्क। उत्तर।
26. यह तर्क कि मसीह ने चाहा कि ऐसे बोझ उठाए जाएँ। उत्तर।
27. अध्याय का तीसरा भाग, जो वैध कलीसियाई व्यवस्थाओं के विषय में है। उनकी नींव इस सामान्य सिद्धान्त में है कि सब कुछ शिष्टता और क्रम से किया जाए। दो अतियों से बचना चाहिए।
28. सब कलीसियाई व्यवस्थाओं को इसी प्रकार परखा जाए। शिष्टता और क्रम से किए जाने का पौलुस का क्या अर्थ है।
29. पोप-मतवादी रीति-विधियों में कुछ भी शिष्ट नहीं। सच्ची शिष्टता का वर्णन। मसीही शिष्टता और क्रम के उदाहरण।
30. कोई व्यवस्था तब तक शिष्ट और क्रमबद्ध नहीं जब तक वह परमेश्वर के अधिकार पर आधारित और पवित्रशास्त्र से निकली न हो। इन विषयों में प्रेम सर्वोत्तम मार्गदर्शक है।
31. इस प्रकार बनाई गई व्यवस्थाओं की उपेक्षा या अवहेलना नहीं करनी चाहिए।
32. ऐसी व्यवस्थाओं के विषय में जिन सावधानियों का पालन करना चाहिए।
1. अब हम उस दूसरे भाग पर आते हैं जो उनके अनुसार अधिकार का वह अंग है जो व्यवस्था बनाने में निहित है, और जिस स्रोत से अनगिनत परम्पराएँ निकली हैं, जो अभागी आत्माओं के लिए उतने ही घातक फन्दे बन गई हैं। क्योंकि उन्होंने दूसरों के कन्धों पर बोझ लादने में शास्त्रियों और फरीसियों से कम कठोरता नहीं दिखाई, जिन्हें वे अपनी उँगली से भी छूना नहीं चाहते (मत्ती 23:4; लूका 11:16)। मैं अन्यत्र (पुस्तक 3 अध्याय 4 खण्ड 4-7) दिखा चुका हूँ कि कान में पाप-अंगीकार के अपने सिद्धान्त से वे कितनी क्रूर हत्या करते हैं। अन्य व्यवस्थाओं में वही हिंसा प्रकट नहीं है, परन्तु जो सबसे सहने योग्य प्रतीत होती हैं वे भी विवेक पर अत्याचार करके उसे दबाती हैं। मैं इस विषय में कुछ नहीं कहता कि वे परमेश्वर की आराधना में कैसी मिलावट करते हैं, और स्वयं परमेश्वर को, जो एकमात्र व्यवस्थादाता है, उसके अधिकार से वंचित करते हैं। जिस बात पर हमें अब विचार करना है वह यह है: क्या कलीसिया के लिए विवेक पर व्यवस्थाएँ बाँधना वैध है? इस चर्चा में नागरिक व्यवस्था को नहीं छुआ जाता; केवल यही विचार किया जाता है कि परमेश्वर ने जो नियम ठहराया है उसके अनुसार उसकी उचित आराधना कैसे की जाए, और परमेश्वर के सम्बन्ध में हमारी आत्मिक स्वतन्त्रता कैसे अखण्डित बनी रहे। साधारण भाषा में मानवीय परम्पराओं का नाम उन सब आज्ञाओं को दिया जाता है जो परमेश्वर की आराधना के विषय में मनुष्यों ने उसके वचन के अधिकार के बिना जारी की हैं। हम इन्हीं के विरुद्ध संघर्ष करते हैं, न कि कलीसिया के उन पवित्र और उपयोगी विधानों के विरुद्ध जिनका उद्देश्य अनुशासन, शिष्टता या शान्ति को बनाए रखना है। हमारा लक्ष्य उस असीम और बर्बर साम्राज्य पर अंकुश लगाना है जो उन लोगों ने आत्माओं पर जमा लिया है जो कलीसिया के पासबान समझे जाना चाहते हैं, परन्तु वास्तव में उसके सबसे क्रूर हत्यारे हैं। वे कहते हैं कि जो व्यवस्थाएँ वे बनाते हैं वे आत्मिक हैं, आत्मा से सम्बन्ध रखती हैं, और वे दावा करते हैं कि वे अनन्त जीवन के लिए आवश्यक हैं। परन्तु इस प्रकार, जैसा मैंने अभी कहा, मसीह के राज्य पर आक्रमण होता है; इस प्रकार वह स्वतन्त्रता, जो उसने विश्वासियों के विवेक को दी है, पूरी तरह दबा दी और उलट दी जाती है। मैं उस भारी अभक्ति के विषय में कुछ नहीं कहता जिसके साथ वे अपनी व्यवस्थाओं के पालन को स्वीकृति दिलाने के लिए घोषणा करते हैं कि उसी से वे पापों की क्षमा, धार्मिकता और उद्धार चाहते हैं, जबकि वे धर्म और भक्ति का सारा सार उसी में ठहराते हैं। मेरा तर्क यह है कि जिन बातों में मसीह ने विवेकों को स्वतन्त्र किया है उनमें उन पर आवश्यकता नहीं थोपी जानी चाहिए; और जब तक वे स्वतन्त्र न किए जाएँ, वे, जैसा हम पहले दिखा चुके हैं (पुस्तक 3 अध्याय 19), परमेश्वर के साथ शान्ति नहीं पा सकते। उन्हें अपने छुड़ानेवाले मसीह को अपना एकमात्र राजा स्वीकार करना होगा, और स्वतन्त्रता की एकमात्र व्यवस्था, अर्थात सुसमाचार के पवित्र वचन, के द्वारा शासित होना होगा, यदि वे उस अनुग्रह को बनाए रखना चाहते हैं जो उन्होंने एक बार मसीह में पाया है: उन्हें किसी दासत्व के अधीन नहीं होना चाहिए, किसी बेड़ी से बँधा नहीं होना चाहिए।
2. ये सोलोन सचमुच मानते हैं कि उनके विधान स्वतन्त्रता की व्यवस्थाएँ हैं, एक सुखद जूआ, एक हलका बोझ: परन्तु कौन नहीं देखता कि यह केवल झूठ है। वे स्वयं अपनी व्यवस्थाओं के बोझ को अनुभव नहीं करते। परमेश्वर का भय त्याग देने के कारण वे निश्चिन्त होकर अपनी व्यवस्थाओं की भी उतनी ही उपेक्षा करते हैं जितनी परमेश्वरीय व्यवस्थाओं की। परन्तु जिन्हें अपने उद्धार की कुछ भी चिन्ता है, वे जब तक इन फन्दों में फँसे हैं, अपने आप को स्वतन्त्र समझने से बहुत दूर हैं। हम देखते हैं कि पौलुस ने इस विषय में कितनी सावधानी बरती, और किसी एक बात में भी बेड़ी डालने का साहस नहीं किया; और यह उचित भी था: उसने निश्चय ही पहले से देख लिया था कि यदि वे बातें आवश्यक ठहराई जाएँ जिन्हें प्रभु ने स्वतन्त्र छोड़ा है तो विवेक पर कितना बड़ा घाव लगेगा। इसके विपरीत, उन विधानों को गिनना भी कठिन है जिन्हें इन लोगों ने अनन्त मृत्यु के दण्ड के साथ अत्यन्त कठोरता से लागू किया है, और जिन्हें वे उद्धार के लिए आवश्यक मानकर बड़ी कड़ाई से माँगते हैं। और जहाँ उनमें से बहुत-से पालन करने में अत्यन्त कठिन हैं, वहाँ सब मिलाकर वे असम्भव हैं; उनका ढेर ही इतना बड़ा है। तो फिर जिन पर कठिनाई का यह पहाड़ लदा है, वे अत्यन्त चिन्ता से घबराने और भय से भर जाने से कैसे बच सकते हैं? इसलिए यहाँ मेरा अभिप्राय इस प्रकार के विधानों का खण्डन करना है; अर्थात उन विधानों का जो परमेश्वर के सामने भीतर से विवेक को बाँधने और धार्मिक कर्तव्य थोपने के उद्देश्य से बनाए गए हैं, मानो वे उद्धार के लिए आवश्यक बातों की आज्ञा देते हों।
3. बहुत-से लोग इस प्रश्न से बहुत उलझन में पड़ जाते हैं, क्योंकि वे बाहरी न्यायालय और विवेक के न्यायालय582 (पुस्तक 3 अध्याय 19 खण्ड 15) में पर्याप्त सावधानी से भेद नहीं करते। इसके अतिरिक्त, जिन शब्दों में पौलुस हाकिमों की आज्ञा मानने का आदेश देता है, "केवल दण्ड के भय से नहीं, बरन विवेक के कारण भी" (रोमियों 13:5), उनसे कठिनाई और बढ़ जाती है; और उससे यह निष्कर्ष निकलेगा कि नागरिक व्यवस्थाएँ भी विवेक को बाँधती हैं। परन्तु यदि ऐसा होता, तो आत्मिक शासन के विषय में जो कुछ हमने पिछले अध्याय में कहा, और जो इस में कहनेवाले हैं, वह कुछ भी न टिकता। इस कठिनाई को सुलझाने के लिए हमें पहले यह समझना होगा कि विवेक का क्या अर्थ है। परिभाषा इस शब्द की व्युत्पत्ति से निकालनी चाहिए। जैसे जब मनुष्य मन और बुद्धि से वस्तुओं का ज्ञान ग्रहण करते हैं तो कहा जाता है कि वे जानते हैं, और इसी से विज्ञान या ज्ञान शब्द चलता है; वैसे ही जब इसके अतिरिक्त उन्हें परमेश्वर के न्याय का बोध होता है, जो ऐसे साक्षी के रूप में है जो उन्हें अपने पाप छिपाने नहीं देता, वरन उन्हें अपराधियों की नाईं न्यायी के न्यायासन के सामने ले आता है, तो उस बोध को विवेक कहा जाता है। क्योंकि वह परमेश्वर और मनुष्य के बीच एक प्रकार का मध्य स्थान ग्रहण करता है, और मनुष्य को वह दबाने नहीं देता जिसे वह अपने भीतर जानता है, वरन उसका पीछा करता रहता है जब तक कि उसे दोषी न ठहरा दे। पौलुस का यही अभिप्राय है जब वह कहता है कि विवेक गवाही देता है, "और उनके विचार आपस में दोष लगाते, या उन्हें निर्दोष ठहराते हैं" (रोमियों 2:15)। इसलिए सरल ज्ञान मनुष्य में मानो बन्द पड़ा रह सकता था, और इसी कारण वह बोध जो मनुष्यों को परमेश्वर के न्यायासन के सामने खड़ा करता है, उस पर पहरेदार के रूप में बैठाया गया है, कि उसके सब भेदों को देखे और खोज निकाले, ताकि कुछ भी अन्धकार में दबा न रह जाए। इसीलिए पुरानी कहावत है, विवेक हज़ार साक्षियों के बराबर है। इसी कारण पतरस भी "परमेश्वर के प्रति एक अच्छे विवेक के उत्तर" (1 पतरस 3:21) की बात करता है; अर्थात मन की उस शान्ति की, जब मसीह के अनुग्रह का निश्चय करके हम साहस के साथ अपने आप को परमेश्वर के सामने प्रस्तुत करते हैं। और इब्रानियों की पत्री का लेखक कहता है कि हमारा "फिर पापों का विवेक" नहीं रहा, अर्थात हम छुड़ाए या निर्दोष ठहराए गए हैं, ताकि पाप अब हम पर दोष न लगाए (इब्रानियों 10:2)।
582 फ्रेंच में: "परमेश्वर के न्याय-आसन के बीच, जो आत्मिक है, और मनुष्यों के पार्थिव न्याय के बीच;"—अर्थात परमेश्वर के न्यायासन और मनुष्यों के पार्थिव न्याय के बीच।
4. इसलिए, जैसे कर्मों का सम्बन्ध मनुष्यों से है, वैसे ही विवेक का सम्बन्ध परमेश्वर से है; और इसलिए अच्छा विवेक हृदय की आन्तरिक खराई के सिवा और कुछ नहीं। इसी अर्थ में पौलुस कहता है कि "आज्ञा का सारांश वह प्रेम है जो शुद्ध मन और अच्छे विवेक और विश्वास से उत्पन्न होता है" (1 तीमुथियुस 1:5)। इसी अध्याय में आगे चलकर वह दिखाता है कि वह बुद्धि से कितना भिन्न है, जब वह कहता है कि "कितनों ने" अच्छे विवेक को "दूर करके विश्वास के विषय में जहाज़ डुबा दिया"। क्योंकि इन शब्दों से वह सूचित करता है कि वह परमेश्वर की आराधना करने की एक जीवित प्रवृत्ति है, भक्ति और पवित्रता से जीवन बिताने की एक सच्ची अभिलाषा। कभी-कभी उसका विस्तार मनुष्यों तक भी किया जाता है, जैसे जब पौलुस घोषणा करता है, "इस कारण मैं आप भी यत्न करता हूँ कि परमेश्वर की और मनुष्यों की ओर मेरा विवेक सदा निर्दोष रहे" (प्रेरितों के काम 24:16)। परन्तु यह इसलिए कहा गया कि अच्छे विवेक के लाभ बाहर बहकर मनुष्यों तक भी पहुँचते हैं। फिर भी ठीक-ठीक कहें तो उसका सम्बन्ध केवल परमेश्वर से है, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ। इसलिए कहा जा सकता है कि कोई व्यवस्था विवेक को तब बाँधती है जब वह मनुष्य को केवल बाँध देती है, मनुष्यों का कोई हवाला दिए या उन्हें गिने बिना। उदाहरण के लिए, परमेश्वर हमें आज्ञा देता है कि न केवल अपने मन को सब वासनाओं से पवित्र और शुद्ध रखें, वरन वह वचन में हर प्रकार की अश्लीलता और सब बाहरी कामुकता को भी वर्जित करता है। इस व्यवस्था का पालन करने के लिए मेरा विवेक बँधा है, चाहे संसार में कोई दूसरा मनुष्य न हो। इस प्रकार जो असंयम से व्यवहार करता है वह न केवल अपने भाइयों के सामने बुरा उदाहरण रखकर पाप करता है, वरन परमेश्वर के सामने अपने विवेक में भी दोषी ठहरता है। उन बातों के विषय में जो अपने आप में उदासीन हैं, एक और नियम लागू होता है। क्योंकि जब वे ठोकर का कारण बनें तो हमें उनसे बचना चाहिए, परन्तु विवेक स्वतन्त्र है। इस प्रकार पौलुस मूर्तियों को चढ़ाए गए मांस के विषय में कहता है, "यदि कोई तुम से कहे, यह मूरत को बलि की हुई वस्तु है, तो उसके बताने के कारण, और विवेक के कारण न खाओ;" "मेरा अभिप्राय तेरे अपने विवेक से नहीं, परन्तु दूसरे के विवेक से है" (1 कुरिन्थियों 10:28, 29)। यदि कोई विश्वासी चेतावनी पाने के बाद भी इस प्रकार का मांस खाए तो वह पाप करेगा। परन्तु भाई के कारण परहेज़ चाहे प्रभु की आज्ञा के अनुसार कितना ही आवश्यक क्यों न हो, विवेक अपनी स्वतन्त्रता बनाए रखना नहीं छोड़ता। हम देखते हैं कि व्यवस्था बाहरी कर्म को बाँधते हुए भी विवेक को स्वतन्त्र छोड़ती है।
5. अब हम मानवीय व्यवस्थाओं की ओर लौटें। यदि वे धार्मिक बाध्यता उत्पन्न करने के उद्देश्य से थोपी जाती हैं, मानो उनका पालन अपने आप में आवश्यक हो, तो हम कहते हैं कि विवेक पर इस प्रकार लगाया गया बन्धन अवैध है। हमारे विवेकों का मनुष्यों से नहीं, केवल परमेश्वर से सरोकार है। इसीलिए पार्थिव न्यायालय और विवेक के न्यायालय का सामान्य भेद है।583 जब सारा संसार अज्ञानता के घने अन्धकार में लिपटा था, तब भी यह माना जाता रहा (मानो प्रकाश की एक छोटी किरण जो बुझी नहीं थी) कि विवेक सब मानवीय निर्णयों से ऊपर है। यद्यपि जो बात वचन में स्वीकार की जाती थी, उसका बाद में व्यवहार में उल्लंघन किया गया, फिर भी परमेश्वर की यह इच्छा थी कि तब भी स्वतन्त्रता की एक साक्षी विद्यमान रहे, जो विवेक को मनुष्य के अत्याचार से मुक्त रखे। परन्तु पौलुस के शब्दों से जो कठिनाई उत्पन्न होती है उसे हमने अभी नहीं सुलझाया है। क्योंकि यदि हमें हाकिमों की आज्ञा केवल दण्ड के भय से नहीं, वरन विवेक के कारण भी माननी है, तो ऐसा प्रतीत होता है कि हाकिमों की व्यवस्थाओं का विवेक पर अधिकार है। यदि यह सच है, तो वही बात कलीसियाई व्यवस्थाओं के विषय में भी कही जानी चाहिए। मैं उत्तर देता हूँ कि यहाँ सबसे पहले जाति और प्रजाति में भेद करना चाहिए। क्योंकि यद्यपि अलग-अलग व्यवस्थाएँ विवेक तक नहीं पहुँचतीं, तथापि हम परमेश्वर की उस सामान्य आज्ञा से बँधे हैं जो हमें हाकिमों के अधीन रहने का आदेश देती है। और पौलुस की चर्चा का केन्द्र यही बात है, अर्थात हाकिमों का आदर करना चाहिए क्योंकि वे परमेश्वर के ठहराए हुए हैं (रोमियों 13:1)। साथ ही, वह कहीं नहीं सिखाता कि उनके बनाए नियम आत्मा के आन्तरिक शासन तक पहुँचते हैं, क्योंकि वह सर्वत्र घोषणा करता है कि परमेश्वर की आराधना और धार्मिकता से जीवन बिताने का आत्मिक नियम मनुष्यों की सब आज्ञाओं से ऊपर है। एक और बात भी ध्यान देने योग्य है, जो पहले कही गई बात पर निर्भर है: मानवीय व्यवस्थाएँ, चाहे हाकिमों की बनाई हों या कलीसिया की (मैं उनकी बात करता हूँ जो न्यायसंगत और भली हैं), उनका पालन आवश्यक है, परन्तु इस कारण वे अपने आप में विवेक को नहीं बाँधतीं, क्योंकि उनके पालन की सारी आवश्यकता सामान्य उद्देश्य से सम्बन्ध रखती है, आज्ञा दी गई वस्तुओं में नहीं है। परन्तु उन व्यवस्थाओं की स्थिति बहुत भिन्न है जो परमेश्वर की आराधना का एक नया रूप ठहराती हैं और स्वतन्त्र बातों में आवश्यकता ला बैठाती हैं।
583 फ्रेंच में: "और वास्तव में, उस सामान्य भेद का, जो सब पाठशालाओं में माना गया है, यही अर्थ रहा है कि मानवीय और राजनीतिक न्यायाधिकार उन न्यायाधिकारों से बिलकुल भिन्न हैं जो विवेक को छूते हैं;"—अर्थात ऐसा वास्तव में उस सामान्य भेद का अर्थ रहा है जिसे सब पाठशालाओं ने माना है, कि मानवीय और नागरिक न्यायाधिकार उनसे बिलकुल भिन्न हैं जो विवेक को छूते हैं।
6. परन्तु आजकल पोप-तन्त्र जिन्हें कलीसियाई विधान कहता है और जिन्हें परमेश्वर की सच्ची और आवश्यक आराधना के अंग के रूप में आगे रखता है, वे ऐसे ही हैं। परन्तु जैसे वे असंख्य हैं, वैसे ही वे असंख्य बेड़ियाँ बनकर आत्मा को बाँधती और फँसाती हैं। यद्यपि व्यवस्था की व्याख्या करते समय हम इस विषय की ओर संकेत कर चुके हैं (पुस्तक 3 अध्याय 4 खण्ड 6), तथापि चूँकि इसकी पूरी चर्चा के लिए यही अधिक उचित स्थान है, इसलिए मैं अब इसका सार यथासम्भव सावधानी से देने का प्रयत्न करूँगा। परन्तु मैं उस शाखा को छोड़ दूँगा जो उस अत्याचार से सम्बन्ध रखती है जिसके साथ झूठे अध्यक्ष जो चाहें वह सिखाने का अधिकार अपने ऊपर ले लेते हैं, क्योंकि मैं उस पर उतना विचार कर चुका हूँ जितना आवश्यक प्रतीत हुआ, परन्तु उस अधिकार की विस्तार से चर्चा करूँगा जिसका दावा वे व्यवस्था बनाने के विषय में करते हैं। तो वह बहाना, जिसके आधार पर हमारे झूठे अध्यक्ष विवेक पर नई व्यवस्थाओं का बोझ डालते हैं, यह है कि प्रभु ने उन्हें आत्मिक व्यवस्थापक ठहराया है और कलीसिया का शासन उन्हें सौंपा है। इसलिए वे यह मानते हैं कि जो कुछ वे आज्ञा दें और ठहराएँ, उसका पालन मसीही लोगों को अनिवार्य रूप से करना चाहिए, और जो उनकी आज्ञाओं का उल्लंघन करता है वह दोहरी अवज्ञा का दोषी है, क्योंकि वह परमेश्वर और कलीसिया दोनों के विरुद्ध विद्रोही है। निश्चय ही, यदि वे सच्चे अध्यक्ष होते, तो मैं इस विषय में उन्हें कुछ अधिकार देता, उतना नहीं जितना वे माँगते हैं, परन्तु उतना जितना कलीसिया की व्यवस्था को उचित रूप से ठहराने के लिए आवश्यक है; परन्तु चूँकि वे वह सब कुछ हैं जो वे समझे जाना चाहते हैं उसके सिवा, इसलिए वे अपने ऊपर थोड़ा-सा भी कुछ नहीं ले सकते जो अति न हो। परन्तु इस बात को भी अन्यत्र दिखाया जा चुका है, इसलिए फिलहाल मान लें कि सच्चे अध्यक्षों के पास जो भी अधिकार होता है वह उनका न्यायोचित है, तब भी मैं इससे इनकार करता हूँ कि वे विश्वासियों के ऊपर इस रूप में ठहराए गए हैं कि वे व्यवस्थापक बनकर अपनी ओर से जीवन का नियम निर्धारित करें, या अपने सौंपे गए लोगों को अपनी आज्ञाओं से बाँधें। जब मैं यह कहता हूँ, तो मेरा अर्थ यह है कि उन्हें इस बात पर बल देने का कोई अधिकार नहीं कि जो कुछ वे परमेश्वर के वचन के अधिकार के बिना गढ़ें, उसका पालन कलीसिया अनिवार्यता के रूप में करे। चूँकि ऐसा अधिकार प्रेरितों को ज्ञात नहीं था, और स्वयं हमारे प्रभु ने कलीसिया के सेवकों को इसे इतनी बार देने से इनकार किया, इसलिए मुझे आश्चर्य होता है कि प्रेरितों के किसी उदाहरण के बिना और परमेश्वर की स्पष्ट मनाही के विरुद्ध किसी ने कैसे इसे हड़पने का साहस किया और आज भी इसका समर्थन करने का साहस करते हैं।
7. जीवन के सिद्ध नियम से सम्बन्ध रखनेवाली हर बात को प्रभु ने अपनी व्यवस्था में इस प्रकार समाहित कर दिया है कि वहाँ दिए गए सारांश में जोड़ने के लिए उसने मनुष्यों के लिए कुछ नहीं छोड़ा। ऐसा करने में उसका उद्देश्य, पहला, यह था कि चूँकि आचरण की सारी खराई हमारे सब कामों को उसकी इच्छा के मापदण्ड से नियमित करने में है, इसलिए केवल उसी को हमारे जीवन का स्वामी और मार्गदर्शक माना जाए; और दूसरा, यह कि वह दिखाए कि हम से वह आज्ञाकारिता से बढ़कर और कुछ नहीं चाहता। इसी कारण याकूब कहता है, "जो अपने भाई की बुराई करता, या भाई पर दोष लगाता है, वह व्यवस्था की बुराई करता, और व्यवस्था पर दोष लगाता है:" "व्यवस्था देनेवाला और न्यायी एक ही है, जिसे बचाने और नष्ट करने की सामर्थ्य है" (याकूब 4:11, 12)। हम सुनते हैं कि परमेश्वर अपनी व्यवस्थाओं के द्वारा हम पर शासन करने को अपना विशेष अधिकार ठहराता है। यह बात पहले यशायाह ने भी कही थी, यद्यपि कुछ अस्पष्ट रूप से, "यहोवा हमारा न्यायी, यहोवा हमारा हाकिम, यहोवा हमारा राजा है; वही हमारा उद्धार करेगा" (यशायाह 33:22)। दोनों वचन दिखाते हैं कि जीवन और मृत्यु की सामर्थ्य उसी की है जिसे आत्मा पर अधिकार है। वरन याकूब इसे स्पष्ट रूप से व्यक्त करता है। यह अधिकार कोई मनुष्य अपने ऊपर नहीं ले सकता। इसलिए परमेश्वर को, जिसके पास बचाने और नष्ट करने की सामर्थ्य है, आत्माओं का एकमात्र राजा स्वीकार करना चाहिए, या, जैसा यशायाह के शब्द व्यक्त करते हैं, वह हमारा राजा और न्यायी, और व्यवस्थादाता और उद्धारकर्ता है। इसी प्रकार पतरस जब पासबानों को उनके कर्तव्य की स्मरण दिलाता है, तो उन्हें उपदेश देता है कि झुण्ड की रखवाली करें, परन्तु विरासत पर अधिकार न जताएँ (1 पतरस 5:2); विरासत से उसका अर्थ विश्वासियों की मण्डली है। यदि हम भली-भाँति विचार करें कि जो बात परमेश्वर घोषणा करता है कि केवल उसी की है, उसे मनुष्य को सौंपना अवैध है, तो हम देखेंगे कि इससे उन सब लोगों का दावा किया हुआ अधिकार पूरी तरह कट जाता है जो परमेश्वर के वचन के अधिकार के बिना कलीसिया में कुछ भी ठहराने का साहस करते हैं। 8. इसके अतिरिक्त, चूँकि सारा प्रश्न इसी पर निर्भर है कि परमेश्वर ही एकमात्र व्यवस्थादाता है और मनुष्यों के लिए उस सम्मान को अपने ऊपर लेना अवैध है, इसलिए उन दो कारणों को स्मरण रखना उचित होगा जिनके लिए परमेश्वर इसे केवल अपने लिए ठहराता है। एक कारण यह है कि उसकी इच्छा हमारे लिए सब धार्मिकता और पवित्रता का सिद्ध नियम है, और इस प्रकार उसे जानने में हमें जीवन का सिद्ध नियम मिलता है। दूसरा कारण यह है कि जब उसकी आराधना की उचित और सही रीति का प्रश्न हो, तब वही जिसकी हमें आज्ञा माननी चाहिए और जिसकी इच्छा पर हमें निर्भर रहना चाहिए, हमारी आत्माओं पर अकेला अधिकार रखता है। जब इन दो कारणों पर ध्यान दिया जाए, तो यह निर्णय करना सरल होगा कि कौन-से मानवीय विधान प्रभु के वचन के विरुद्ध हैं। इस प्रकार के वे सब हैं जो परमेश्वर की सच्ची आराधना के अंग के रूप में गढ़े जाते हैं और जिनका पालन विवेक पर अनिवार्य बाध्यता के रूप में बाँधा जाता है। इसलिए हम सब मानवीय व्यवस्थाओं को इसी तराज़ू में तौलना स्मरण रखें, यदि हम एक ऐसी निश्चित कसौटी चाहते हैं जो हमें भटकने न दे। पहला कारण पौलुस ने कुलुस्सियों की पत्री में उन झूठे प्रेरितों के विरुद्ध दिया है जो कलीसियाओं पर नए बोझ लादने का प्रयत्न करते थे। दूसरा कारण वह गलातियों की पत्री में इसी प्रकार के मामले में अधिक बार देता है। तो कुलुस्सियों की पत्री में वह तर्क करता है कि परमेश्वर की सच्ची आराधना की शिक्षा मनुष्यों से नहीं खोजनी चाहिए, क्योंकि प्रभु ने हमें विश्वासयोग्यता और पूर्णता से सिखा दिया है कि उसकी आराधना किस प्रकार की जाए। इसे प्रमाणित करने के लिए वह पहले अध्याय में कहता है कि सुसमाचार में सारी बुद्धि समाई है, ताकि परमेश्वर का जन मसीह में सिद्ध किया जाए। दूसरे अध्याय के आरम्भ में वह कहता है कि बुद्धि और ज्ञान के सब भण्डार मसीह में छिपे हैं, और इससे वह निष्कर्ष निकालता है कि विश्वासियों को सावधान रहना चाहिए कि मनुष्यों के विधानों के अनुसार व्यर्थ दर्शन-शास्त्र से बहकाकर मसीह के झुण्ड से दूर न कर दिए जाएँ (कुलुस्सियों 2:10)। अध्याय के अन्त में वह और भी निर्णायक रूप से उस सब की निन्दा करता है जो मनमानी उपासना कहलाती है, अर्थात गढ़ी हुई आराधना के वे रूप जो मनुष्य स्वयं बनाते हैं या दूसरों से ग्रहण करते हैं, और वे सब आज्ञाएँ जो वे परमेश्वर की आराधना के विषय में अपनी ओर से देने का साहस करते हैं। इसलिए हम मानते हैं कि वे सब विधान अभक्तिपूर्ण हैं जिनके पालन में परमेश्वर की आराधना ठहराने का ढोंग किया जाता है। गलातियों के वे वचन, जिनमें वह इस पर बल देता है कि विवेक पर, जिस पर केवल परमेश्वर का शासन होना चाहिए, बेड़ियाँ नहीं बाँधनी चाहिए, पर्याप्त स्पष्ट हैं, विशेषकर अध्याय 5। इसलिए उनका हवाला देना ही काफ़ी है।
9. परन्तु ताकि सारा विषय उदाहरणों से और स्पष्ट हो जाए, आगे बढ़ने से पहले यह उचित होगा कि इस सिद्धान्त को अपने ही समय पर लागू करें। जिन विधानों को वे कलीसियाई कहते हैं, और जिनसे पोप अपने अनुयायियों के साथ कलीसिया को बोझिल करता है, उन्हें हम हानिकारक और अभक्तिपूर्ण मानते हैं, जबकि हमारे विरोधी उनका पवित्र और हितकर कहकर समर्थन करते हैं। अब वे दो प्रकार के हैं, कुछ रीति-विधियों और संस्कारों से सम्बन्ध रखते हैं, और कुछ विशेष रूप से अनुशासन से। तो क्या हमारे पास दोनों का विरोध करने का कोई उचित कारण है? निश्चय ही, जितना हम चाहते उससे अधिक उचित कारण है। पहले, क्या उनके रचयिता स्वयं स्पष्ट रूप से नहीं कहते कि परमेश्वर की आराधना का सार ही (यों कहें) उन्हीं में निहित है? वे अपनी रीति-विधियाँ किस उद्देश्य से आगे रखते हैं सिवाय इसके कि उनके द्वारा परमेश्वर की आराधना की जाए? और यह केवल अज्ञानी भीड़ की भूल से नहीं होता, वरन उनके अनुमोदन से होता है जो शिक्षकों का स्थान रखते हैं। मैं अभी उन घोर घृणित बातों की ओर संकेत नहीं कर रहा जिनके द्वारा उन्होंने सारी भक्ति में मिलावट करने की युक्ति रची, परन्तु यदि वे परमेश्वर की आराधना को अपनी कल्पनाओं के अधीन न करते, तो किसी तुच्छ परम्परा में भूल करने को वे इतना घोर अपराध न समझते। जब पौलुस घोषणा करता है कि परमेश्वर की वैध आराधना को मनुष्यों की इच्छा के अधीन करना असह्य है, तो आज इसे सहन न कर पाने में हम कहाँ भूल करते हैं? विशेषकर तब, जब हमें इस जगत की आदि-शिक्षाओं के अनुसार परमेश्वर की आराधना करने का आदेश दिया जाता है, जिसे पौलुस मसीह के विरुद्ध बताता है (कुलुस्सियों 2:20)। दूसरी ओर, जिस रीति से वे विवेकों पर यह कठोर अनिवार्यता डालते हैं कि जो कुछ वे आज्ञा दें उसका पालन करें, वह अज्ञात नहीं है। जब हम इसका विरोध करते हैं, तो हम पौलुस के साथ साझा पक्ष लेते हैं, जो किसी भी दशा में विश्वासियों के विवेकों को मनुष्यों के दासत्व के अधीन नहीं आने देता।
10. इसके अतिरिक्त, सबसे बुरी बात यह है कि जब एक बार धर्म इस प्रकार की व्यर्थ कल्पनाओं से रचा जाने लगता है, तो उस बिगाड़ के पीछे-पीछे तुरन्त वह घृणित भ्रष्टता आ जाती है जिसके लिए हमारा प्रभु फरीसियों को डाँटता है कि वे अपनी परम्पराओं से परमेश्वर की आज्ञा को व्यर्थ ठहराते हैं (मत्ती 15:3)। मैं अपने वर्तमान व्यवस्थापकों से अपने शब्दों में विवाद करना नहीं चाहता;—यदि वे मसीह के इस दोषारोपण से अपने आप को निर्दोष ठहरा सकें तो वे जीत जाएँ। परन्तु वे ऐसा कैसे कर सकते हैं, जबकि वे इसे अनुपम रूप से अधिक दुष्टता समझते हैं कि वर्ष कान में पाप-अंगीकार किए बिना बीत जाए, बजाय इसके कि वह घोर अधर्म में बिताया जाए: कि शुक्रवार को मांस का थोड़ा-सा स्वाद लेकर जीभ को अशुद्ध किया जाए, बजाय इसके कि प्रतिदिन सारे शरीर को व्यभिचार से अपवित्र किया जाए: कि उनके किसी न किसी छोटे सन्त को समर्पित दिन पर हाथ से ईमानदारी का परिश्रम किया जाए, बजाय इसके कि अपने सारे अंगों को निरन्तर घोर अपराधों में लगाए रखा जाए: कि किसी याजक का वैध विवाह में एक स्त्री से जुड़ना, बजाय इसके कि वह हज़ार व्यभिचारों में लगा रहे: कि मन्नत की तीर्थयात्रा पूरी न करना, बजाय इसके कि हर प्रतिज्ञा में विश्वासघात किया जाए: कि गिरजाघरों की भयंकर, अनावश्यक और व्यर्थ विलासिता पर खुले हाथ से धन न लुटाना, बजाय इसके कि गरीबों को उनकी सबसे बड़ी आवश्यकता में ठुकरा दिया जाए: कि किसी मूर्ति के पास से बिना आदर किए निकल जाना, बजाय इसके कि सारे मानव-जाति के साथ तिरस्कार का व्यवहार किया जाए: कि निश्चित समयों पर लम्बे अर्थहीन वाक्य न बुदबुदाना, बजाय इसके कि कभी एक भी उचित प्रार्थना न गढ़ी जाए? परमेश्वर के वचन को परम्परा से व्यर्थ ठहराने का क्या अर्थ है, यदि यह तब नहीं होता जब वे परमेश्वर की विधियों की सराहना तो केवल ठण्डे और औपचारिक ढंग से करते हैं, फिर भी अपनी विधियों के कड़े पालन पर उत्सुकता और चिन्ता के साथ बल देते हैं, मानो भक्ति की सारी शक्ति उन्हीं में निहित हो;—जब वे परमेश्वर की व्यवस्था के उल्लंघन का बचाव तुच्छ प्रायश्चितों से करते हैं, परन्तु अपनी किसी आज्ञा के छोटे-से-छोटे उल्लंघन को कारावास, देश-निकाले, आग या तलवार से कम दण्ड नहीं देते?—जब परमेश्वर का तिरस्कार करनेवालों के प्रति न कठोर और न अटल होकर, वे उन्हें जो स्वयं उनका तिरस्कार करते हैं, अटूट बैर से चरम सीमा तक सताते हैं, और उन सब को जिनकी सादगी को वे दासत्व में रखते हैं ऐसा सधा देते हैं कि वे परमेश्वर की सारी व्यवस्था को उलटा देख लें पर उसे जिसे वे कलीसिया की आज्ञाएँ कहते हैं उसकी एक मात्रा का भी उल्लंघन न देखें? पहली बात, इसमें घोर अपराध यह है कि कोई तुच्छ बातों के कारण, ऐसी बातों के कारण जो, यदि परमेश्वर के न्याय से निर्णय हो, स्वतन्त्र हैं, अपने पड़ोसी को तुच्छ जानता, दोषी ठहराता और त्याग देता है। परन्तु अब, मानो यह कोई छोटी बुराई हो, इस जगत की उन निरर्थक आदि-शिक्षाओं को (जैसा पौलुस उन्हें गलातियों की पत्री में कहता है, गलातियों 4:9) परमेश्वर की स्वर्गीय वाणी से अधिक मूल्यवान समझा जाता है। जो व्यभिचार के लिए लगभग निर्दोष ठहरा दिया जाता है वह मांस के विषय में दोषी ठहराया जाता है; और जिसे वेश्यागमन की अनुमति है उसे विवाह करने से रोका जाता है। यही, निश्चय, उस छलपूर्ण आज्ञाकारिता से प्राप्त होता है, जो जितना मनुष्यों की ओर झुकती है उतना ही परमेश्वर से विमुख हो जाती है।
11. इन विधानों में दो और गम्भीर दोष हैं जिन्हें हम अस्वीकार करते हैं। पहला, वे ऐसे पालन ठहराते हैं जो बहुत हद तक निरर्थक हैं, और कभी-कभी बेतुके; दूसरा, उनकी भारी संख्या से भक्त विवेक दब जाते हैं, और एक प्रकार के यहूदी मत की ओर वापस ले जाए जाकर परछाइयों से ऐसे चिपक जाते हैं कि मसीह के पास आ नहीं सकते। मेरा यह कथन कि वे निरर्थक और बेतुके हैं, मैं जानता हूँ, शारीरिक बुद्धि को कठिनाई से विश्वसनीय लगेगा, जिसे वे इतने भाते हैं कि जब वे हटा दिए जाएँ तो कलीसिया पूरी तरह विकृत प्रतीत होती है। परन्तु पौलुस यही तो कहता है कि उनमें "मनमानी उपासना, और नम्रता, और शारीरिक योग्यता के कारण बुद्धिमानी का नाम तो है" (कुलुस्सियों 2:23); एक अत्यन्त हितकर चेतावनी, जिसे हमें कभी आँखों से ओझल नहीं होने देना चाहिए। वह कहता है कि मानवीय परम्पराएँ बुद्धि के दिखावे से धोखा देती हैं। यह दिखावा कहाँ से आता है? बस इसी से कि मनुष्यों की गढ़ी होने के कारण मानव मन उनमें वह पहचान लेता है जो उसका अपना है, और पहचानकर उसे किसी भी उस भली बात से अधिक प्रसन्नता से अपनाता है जो उसकी घमण्ड-भरी प्रवृत्ति के कम अनुकूल हो। दूसरे, वे नम्रता के लिए उपयुक्त प्रशिक्षण प्रतीत होती हैं, क्योंकि वे मनुष्यों के मनों को अपने जूए के नीचे भूमि पर रेंगते रखती हैं; इसलिए उनके पक्ष में एक और बात है। अन्त में, क्योंकि वे शरीर की इच्छा पर अंकुश लगाने और उपवास की कठोरता से उसे दबाने की प्रवृत्ति रखती दिखती हैं, इसलिए वे बुद्धिमानी से रची प्रतीत होती हैं। परन्तु इस सब पर पौलुस क्या कहता है? क्या वह इन मुखौटों को नोच फेंकता है ताकि सीधे-सादे लोग झूठे बहाने से धोखा न खाएँ? उनके खण्डन के लिए इतना कहना पर्याप्त समझकर कि वे मनुष्यों की गढ़ी हुई बातें हैं, वह इन सब बातों को बिना खण्डन के निरर्थक जानकर आगे बढ़ जाता है। वरन इसलिए कि वह जानता था कि सब गढ़ी हुई आराधना कलीसिया में दोषी ठहराई जाती है, और जितनी अधिक वह मानव मन को भाती है उतनी ही अधिक विश्वासियों की दृष्टि में संदिग्ध है—क्योंकि वह जानता था कि बाहरी नम्रता का यह झूठा दिखावा सच्ची नम्रता से इतना भिन्न है कि उसे सरलता से पहचाना जा सकता है;—अन्त में, क्योंकि वह जानता था कि यह संरक्षकता शारीरिक अभ्यास से अधिक मूल्य की नहीं मानी जाती, उसने चाहा कि जिन्हीं बातों के कारण मानवीय परम्पराएँ अज्ञानियों के सामने सराही जाती हैं, उन्हीं को विश्वासी उनका खण्डन समझें।
12. इस प्रकार, आज न केवल अशिक्षित साधारण जन, वरन हर एक जो संसार की बुद्धि से जितना फूला है उतना ही रीति-विधियों की चमक-दमक से अद्भुत रूप से मोहित है, जबकि कपटी लोग और मूर्ख स्त्रियाँ सोचती हैं कि इनसे अच्छी या सुन्दर कोई वस्तु कल्पना नहीं की जा सकती। परन्तु जो उन्हें भली-भाँति जाँचते हैं और भक्ति के नियम के अनुसार अधिक सच्चाई से तौलते हैं, वे ऐसी सब रीति-विधियों के मूल्य के विषय में जानते हैं, पहला, कि वे निरर्थक तुच्छ बातें हैं; दूसरा, कि वे ऐसे धोखे हैं जो दर्शकों की आँखों को खोखले दिखावे से भरमाते हैं। मैं उन रीति-विधियों की बात कर रहा हूँ जिन्हें रोमी गुरु बड़े भेद मानने को कहते हैं, जबकि हम अनुभव से जानते हैं कि वे केवल उपहास हैं। न यह अचम्भे की बात है कि उनके रचयिता स्वयं को और दूसरों को केवल तुच्छ बातों से धोखा देने की सीमा तक पहुँच गए, क्योंकि उन्होंने अपना नमूना कुछ तो अन्यजातियों के स्वप्नों से लिया, और कुछ वानरों की नाईं मूसा की व्यवस्था के प्राचीन संस्कारों की उतावली से नकल की, जिनसे हमारा पशुओं की बलियों और ऐसी ही अन्य बातों से अधिक कोई सम्बन्ध नहीं है। निश्चय ही, यदि कोई और प्रमाण न होता, तो कोई स्वस्थ मनुष्य ऐसे बेमेल ढेर से कुछ भलाई की आशा न करता। और स्वयं स्थिति स्पष्ट दिखाती है कि बहुत-सी रीति-विधियों का और कोई उपयोग नहीं सिवाय इसके कि वे लोगों को सिखाने के बदले उन्हें जड़ बना दें। इसी प्रकार, उन नए नियमों को जो अनुशासन को बनाए रखने के बदले बिगाड़ते हैं, कपटी लोग बहुत महत्त्व देते हैं; परन्तु निकट से जाँचने पर दिखाई देगा कि वे अनुशासन की केवल छायामय और क्षणभंगुर छाया हैं।
13. दूसरे दोष पर आएँ, तो कौन नहीं देखता कि रीति-विधियाँ एक पर एक ढेर होकर इतनी बहुत हो गई हैं कि मसीही कलीसिया में उन्हें सहना असम्भव है? इसी से रीति-विधियों में यहूदी मत का एक अजीब मिश्रण दिखाई देता है, जबकि अन्य पालन भक्त मनों के लिए घातक फन्दा सिद्ध होते हैं। अगस्तीन ने शिकायत की कि उसके समय में, जबकि परमेश्वर की आज्ञाओं की उपेक्षा की जा रही थी, पूर्वाग्रह इतना सर्वत्र छाया था कि जो अष्टक के दिनों में नंगे पैर भूमि को छू ले उसकी निन्दा उससे अधिक कठोरता से की जाती थी जो अपनी बुद्धि को दाखमधु में डुबो दे। उसने शिकायत की कि कलीसिया, जिसे परमेश्वर ने दया करके स्वतन्त्र रखना चाहा था, इतनी दबाई गई थी कि यहूदियों की दशा अधिक सहने योग्य थी (अगस्तीन, Ep. 119)। यदि वह पवित्र जन हमारे दिनों में होता, तो अब विद्यमान दासत्व पर वह किन शब्दों में विलाप करता? क्योंकि संख्या दसगुनी अधिक है, और एक-एक मात्रा उस समय से सौ गुनी कठोरता से माँगी जाती है। यही सामान्य क्रम है; जब वे विकृत व्यवस्थापक एक बार अधिकार हड़प लेते हैं, तो अपनी आज्ञाओं और निषेधों का कोई अन्त नहीं करते जब तक कि कठोरता की चरम सीमा तक न पहुँच जाएँ। पौलुस ने इन शब्दों में इसे सुन्दरता से सूचित किया,—"जब तुम मसीह के साथ संसार की आदि-शिक्षा की ओर से मर गए, तो फिर उनकी नाईं जो संसार में जीवित हैं, क्यों विधानों के अधीन हो? कि 'यह न छूना, यह न चखना, और यह न हाथ लगाना'" (कुलुस्सियों 2:20, 21)। क्योंकि जब कि वह शब्द खाने और छूने दोनों का अर्थ रखता है, निस्सन्देह उसे पहले अर्थ में लिया गया है, ताकि अनावश्यक दोहराव न हो। यहाँ इसलिए वह झूठे प्रेरितों की प्रगति का अति उत्तम वर्णन करता है। अन्धविश्वास जिस प्रकार आरम्भ होता है वह यह है: वे न केवल खाना, वरन हलके से चबाना भी वर्जित करते हैं; यह प्राप्त कर लेने के बाद वे चखना भी वर्जित करते हैं। यह भी उन्हें मिल जाने पर, वे उँगली से भी छूना अवैध समझते हैं।
14. मानवीय विधानों में इस अत्याचार की हम उचित ही निन्दा करते हैं, जिसके कारण अभागे विवेक अनगिनत आज्ञाओं और उनकी अत्यधिक माँग से अजीब रीति से पीड़ित होते हैं। अनुशासन से सम्बन्ध रखनेवाले नियमों के विषय में हम अन्यत्र कह चुके हैं (ऊपर, खण्ड 12; और अध्याय 12 भी)। रीति-विधियों के विषय में मैं क्या कहूँ, जिनका प्रभाव यह हुआ है कि हमने मसीह को लगभग दफ़ना दिया है और यहूदी प्रतीकों की ओर लौट गए हैं? "हमारे प्रभु मसीह ने (अगस्तीन कहता है, Ep. 118) अपने नए लोगों की संगति को ऐसे संस्कारों से बाँधा जो गिनती में बहुत थोड़े, अर्थ में अति उत्तम, और पालन में अति सरल हैं।" यह सादगी उन रीतियों की भारी संख्या और विविधता से कितनी भिन्न है जिनमें आज हम कलीसिया को उलझी हुई देखते हैं, यह भली-भाँति बताया नहीं जा सकता। मैं उस चतुराई को जानता हूँ जिससे कुछ तीक्ष्ण बुद्धि लोग इस विकृति का बहाना बनाते हैं। वे कहते हैं कि हम में भी बहुत-से लोग इस्राएली प्रजा के किसी भी जन के समान अशिक्षित हैं, और उन्हीं के लिए यह संरक्षकता लाई गई है, जिसके बिना बलवान लोग रह तो सकते हैं, फिर भी उन्हें इसकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि यह निर्बल भाइयों के लिए उपयोगी है। मैं उत्तर देता हूँ कि हम निर्बल भाइयों के प्रति जो कर्तव्य है उसे नहीं भूले हैं, परन्तु दूसरी ओर हम आपत्ति करते हैं कि निर्बलों की चिन्ता करने की रीति उन्हें रीति-विधियों के भारी ढेर के नीचे दबा देना नहीं है। परमेश्वर ने हमारे और अपने प्राचीन लोगों के बीच बिना कारण भेद नहीं किया, कि उन्हें बालकों की नाईं चिह्नों और प्रतीकों के द्वारा प्रशिक्षित किया, और हमें इतने बाहरी दिखावे के बिना अधिक सादगी से प्रशिक्षित किया। पौलुस के शब्द हैं, "जब तक वारिस बालक है," "तब तक रखवालों और भण्डारियों के वश में रहता है" (गलातियों 4:1, 2)। व्यवस्था के अधीन यहूदियों की यही दशा थी। परन्तु हम उन वयस्कों के समान हैं जो संरक्षकता और अभिभावकता से मुक्त होकर बालोचित आरम्भिक शिक्षाओं की आवश्यकता नहीं रखते। परमेश्वर ने निश्चय पहले से देख लिया था कि वह अपनी कलीसिया में किस प्रकार के लोग रखेगा, और उन पर किस प्रकार शासन किया जाना है। अब उसने हमारे और यहूदियों के बीच उस रीति से भेद किया जिसका वर्णन किया गया है। इसलिए अज्ञानियों की चिन्ता करने की यह मूर्खतापूर्ण रीति है कि उस यहूदी मत को खड़ा किया जाए जिसे मसीह ने रद्द कर दिया है। प्राचीन और अपने नए लोगों के बीच इस असमानता को मसीह ने तब प्रकट किया जब उसने सामरी स्त्री से कहा, "वह समय आता है, वरन अब भी है, जिसमें सच्चे भक्त पिता की आराधना आत्मा और सच्चाई से करेंगे" (यूहन्ना 4:23)। निस्सन्देह यह सदा से होता आया था, परन्तु नए भक्त पुराने से इस बात में भिन्न हैं कि जब मूसा के अधीन परमेश्वर की आत्मिक आराधना पर छाया पड़ी थी और वह मानो बहुत-सी रीति-विधियों में उलझी थी, अब वे हटा दी गई हैं और आराधना अधिक सरल है। इसलिए जो इस भेद को मिला देते हैं, वे मसीह द्वारा ठहराई और स्थापित की गई व्यवस्था को उलट देते हैं। तो आप पूछेंगे, क्या अधिक अज्ञानियों को उनकी अज्ञानता में सहायता के लिए कोई रीति-विधि नहीं दी जानी चाहिए? मैं ऐसा नहीं कहता; क्योंकि मैं समझता हूँ कि इस प्रकार की सहायता उनके लिए बहुत उपयोगी है। मेरा तर्क केवल इतना है कि ऐसी मात्रा का प्रयोग हो जो मसीह को स्पष्ट करे, न कि धुँधला करे। इसीलिए थोड़ी-सी रीति-विधियाँ ईश्वरीय रीति से ठहराई गईं, और वे भी किसी प्रकार श्रमसाध्य नहीं, ताकि वे उपस्थित मसीह को प्रकट करें। यहूदियों को अधिक संख्या में दी गईं, ताकि वे अनुपस्थित मसीह की प्रतिमाएँ हों। जब मैं कहता हूँ कि वह अनुपस्थित था, तो मेरा अर्थ सामर्थ्य में नहीं, वरन अभिव्यक्ति की रीति में है। इसलिए उचित संयम बनाए रखने के लिए संख्या की वह अल्पता, पालन की वह सरलता, और अर्थ की वह सार्थकता जो स्पष्टता में निहित है, बनाए रखना आवश्यक है। यह कहने से क्या लाभ कि ऐसा नहीं किया जाता? बात हर आँख को स्पष्ट दिखाई देती है।
15. मैं यहाँ उन हानिकारक धारणाओं के विषय में कुछ नहीं कहता जिनसे मनुष्यों के मन भरे जाते हैं, जैसे कि ये ऐसे बलिदान हैं जिनसे परमेश्वर के साथ प्रायश्चित होता है, जिनसे पापों का प्रायश्चित किया जाता है, जिनसे धार्मिकता और उद्धार प्राप्त होता है। यह तर्क दिया जाएगा कि जो बातें अपने आप में भली हैं वे इस प्रकार की भूलों से बिगड़ती नहीं, क्योंकि जिन कामों की आज्ञा परमेश्वर ने स्पष्ट रूप से दी है उनमें भी ऐसी ही भूलें की जा सकती हैं। फिर भी इससे अनुचित कुछ नहीं कि मनुष्य की इच्छा से गढ़े गए कर्मों को इतना मूल्य दिया जाए कि वे अनन्त जीवन के योग्य समझे जाएँ। जिन कर्मों की आज्ञा परमेश्वर ने दी है उन्हें प्रतिफल मिलता है, क्योंकि स्वयं व्यवस्थादाता उन्हें आज्ञाकारिता के चिह्न के रूप में स्वीकार करता है। इसलिए वे अपनी गरिमा या अपने पुण्य से मूल्य नहीं पाते, वरन इसलिए कि परमेश्वर अपने प्रति हमारी आज्ञाकारिता का इतना ऊँचा मूल्य ठहराता है। मैं यहाँ कर्मों की उस सिद्धता की बात कर रहा हूँ जिसकी आज्ञा परमेश्वर देता है, परन्तु जो मनुष्यों से पूरी नहीं होती। व्यवस्था के कर्म केवल परमेश्वर की मुफ़्त कृपा से स्वीकार किए जाते हैं, क्योंकि आज्ञाकारिता निर्बल और अधूरी है। परन्तु चूँकि हम यहाँ यह विचार नहीं कर रहे कि मसीह के बिना कर्मों का कितना मूल्य है, इसलिए उस प्रश्न को छोड़ दें। मैं फिर दोहराता हूँ, क्योंकि यह वर्तमान विषय से उचित सम्बन्ध रखता है, कि कर्मों की जो भी प्रशंसा होती है वह आज्ञाकारिता के कारण है, जिस पर अकेला परमेश्वर दृष्टि रखता है, जैसा वह भविष्यद्वक्ता के द्वारा गवाही देता है, "मैंने तुम्हारे पुरखाओं से जब उनको मिस्र देश से निकाल लाया, तब होमबलि और मेलबलि के विषय में कुछ न कहा और न आज्ञा दी: परन्तु उनको यही आज्ञा दी, कि मेरी बात सुनो" (यिर्मयाह 7:22)। गढ़े हुए कर्मों के विषय में वह अन्यत्र कहता है, "तुम किस लिए अपना धन उसके लिए खर्च करते हो जो भोजन नहीं है?" (यशायाह 55:2; 29:13)। फिर, "ये व्यर्थ मेरी उपासना करते हैं, क्योंकि मनुष्यों की आज्ञाओं को धर्मोपदेश करके सिखाते हैं" (मत्ती 15:9)। इसलिए वे इस दोषारोपण से अपने आप को निर्दोष नहीं ठहरा सकते कि वे अभागे लोगों को इन बाहरी तुच्छ बातों में वह धार्मिकता खोजने देते हैं जिसे वे परमेश्वर के सामने प्रस्तुत कर सकें, और जिसके द्वारा स्वर्गीय न्यायासन के सामने खड़े हो सकें। इसके अतिरिक्त, क्या यह उचित रूप से निन्दनीय दोष नहीं कि वे अर्थहीन रीति-विधियों को एक प्रकार के नाटक या जादुई मन्त्र-पाठ के रूप में प्रदर्शित करते हैं? क्योंकि यह निश्चित है कि सब रीति-विधियाँ भ्रष्ट और हानिकारक हैं जो मनुष्यों को मसीह की ओर नहीं ले जातीं। परन्तु पोप-तन्त्र में प्रचलित रीति-विधियाँ शिक्षा से अलग कर दी गई हैं, ताकि वे मनुष्यों को पूर्णतः अर्थहीन चिह्नों में ही बाँध रखें। अन्त में (क्योंकि पेट चतुर आविष्कारक है), यह स्पष्ट है कि उनकी बहुत-सी रीति-विधियाँ लालची याजकों द्वारा धन पकड़ने के चारे के रूप में गढ़ी गई हैं। परन्तु उनकी उत्पत्ति जो भी हो, वे सब घृणित लाभ के लिए इस प्रकार बिकाऊ हो गई हैं कि यदि हम चाहते हैं कि कलीसिया में अपवित्र और ईश-निन्दक व्यापार न चलता रहे तो उनके बड़े भाग को रद्द करना होगा।
16. यद्यपि मैं मानवीय विधानों के विषय में सामान्य सिद्धान्त नहीं दे रहा प्रतीत होता, वरन अपना सारा कथन अपने ही युग के अनुकूल बना रहा हूँ, तथापि जो कुछ कहा गया है वह ऐसा नहीं जो सब युगों के लिए उपयोगी न हो। क्योंकि जब कभी मनुष्य अपनी कल्पनाओं से परमेश्वर की आराधना करने की अन्धविश्वासी प्रथा आरम्भ करते हैं, तो इस उद्देश्य से बनाई गई सब व्यवस्थाएँ तुरन्त उन घोर दुरुपयोगों में बदल जाती हैं। क्योंकि वह श्राप जो परमेश्वर सुनाता है—अर्थात जो उसकी आराधना मनुष्यों की शिक्षाओं से करते हैं उन्हें जड़ता और अन्धेपन से मारना—किसी एक युग तक सीमित नहीं है, वरन सब युगों पर लागू होता है। इस अन्धेपन का एकसमान परिणाम यह है कि कोई भी बेतुकापन ऐसा नहीं जिससे वे बच जाएँ, जो परमेश्वर की अनेक चेतावनियों को तुच्छ जानकर स्वेच्छा से इन घातक बेड़ियों में उलझ जाते हैं। परन्तु यदि परिस्थितियों का कोई विचार किए बिना आप केवल यह जानना चाहें कि उन मानवीय परम्पराओं का स्वरूप सदा कैसा होता है जिन्हें कलीसिया को ठुकरा देना चाहिए और सब भक्तों को दोषी ठहराना चाहिए,584 तो हमारी पहले दी हुई परिभाषा स्पष्ट और निश्चित है—अर्थात वे उन सब व्यवस्थाओं को सम्मिलित करती हैं जो मनुष्यों ने परमेश्वर के वचन के अधिकार के बिना बनाई हैं, या तो ईश्वरीय आराधना की रीति निर्धारित करने के लिए, या विवेक पर धार्मिक बाध्यता डालने के लिए, मानो वे उद्धार के लिए आवश्यक बातों की आज्ञा देती हों। यदि इनमें से एक या दोनों के साथ ये अन्य बुराइयाँ भी जुड़ी हों कि वे अपनी बहुतायत से सुसमाचार की स्पष्टता को धुँधला करती हैं, कोई उन्नति नहीं करतीं, भक्ति के सच्चे अभ्यासों के स्थान पर निरर्थक और तुच्छ व्यवसाय हैं, नीच उद्देश्यों और घृणित लाभ के लिए खड़ी की गई हैं, पालन करने में कठिन हैं, और हानिकारक अन्धविश्वासों से दूषित हैं, तो हमारे पास यह जाँचने का साधन होगा कि उनसे कितनी हानि होती है।
584 कलीसिया के सुधार की आवश्यकता के विषय में कैल्विन।
17. मैं समझता हूँ कि उनका उत्तर क्या होगा—अर्थात ये परम्पराएँ उनकी अपनी नहीं, परमेश्वर की ओर से हैं। क्योंकि कलीसिया को भूल से बचाने के लिए पवित्र आत्मा उसका मार्गदर्शन करता है, जिसका अधिकार उन्हीं में निवास करता है। इसे मान लेने पर साथ ही यह निष्कर्ष निकलता है कि उनकी परम्पराएँ पवित्र आत्मा के प्रकाशन हैं, और उनकी उपेक्षा अभक्ति और परमेश्वर के तिरस्कार के बिना नहीं की जा सकती। और ताकि ऐसा न लगे कि उन्होंने किसी ऊँचे अधिकार के बिना कुछ किया है, वे यह विश्वास कराना चाहेंगे कि उनके पालनों का बड़ा भाग प्रेरितों से आया है। क्योंकि वे तर्क करते हैं कि एक उदाहरण में उनके पास इसका पर्याप्त प्रमाण है कि प्रेरितों ने दूसरे मामलों में क्या किया। वह उदाहरण यह है कि जब प्रेरित महासभा में इकट्ठे हुए, तो उन्होंने सब अन्यजातियों को महासभा की सम्मति के रूप में घोषित किया कि वे "मूरतों की अशुद्धता से, और व्यभिचार से, और गला घोंटे हुए प्राणियों के मांस से, और लहू से परे रहें" (प्रेरितों के काम 15:20, 29)। हम पहले समझा चुके हैं कि अपने आप को ऊँचा ठहराने के लिए वे कलीसिया का नाम झूठे रूप से कैसे अपने ऊपर ले लेते हैं (अध्याय 8 खण्ड 10-13)। यदि वर्तमान मामले में हम सब मुखौटे और आवरण हटा दें (जो वास्तव में हमारी पहली चिन्ता और हमारा सबसे बड़ा हित होना चाहिए), और विचार करें कि मसीह कैसी कलीसिया चाहता है, ताकि हम अपने आप को उसके मापदण्ड के अनुसार ढालें और ठीक करें, तो यह सरलता से प्रकट हो जाएगा कि परमेश्वर के वचन की सीमाओं की उपेक्षा करना और नई व्यवस्थाएँ बनाने में उच्छृंखल और विलासी होना कलीसिया का गुण नहीं है। क्या वह व्यवस्था जो एक बार कलीसिया को दी गई थी सदा बनी नहीं रहती? "जो जो बात मैं तुम को आज्ञा देता हूँ उसे चौकसी से करना; न तो उसमें कुछ बढ़ाना और न उसमें से कुछ घटाना" (व्यवस्थाविवरण 12:32)। और एक अन्य स्थान पर, "उसके वचनों में कुछ न बढ़ाना, ऐसा न हो कि वह तुझे डाँटे और तू झूठा ठहरे" (नीतिवचन 30:6)। चूँकि वे इनकार नहीं कर सकते कि यह बात कलीसिया से कही गई थी, तो जब ऐसे निषेधों के होते हुए भी वे परमेश्वर की शिक्षा में जोड़ने का दावा करते हैं और अपनी बातें उसमें मिलाने का साहस करते हैं, तब वे अपनी हठधर्मी की घोषणा के सिवा और क्या करते हैं? हम से यह दूर रहे कि हम उस झूठ से सहमत हों जिससे वे कलीसिया का ऐसा अपमान करते हैं। हम समझें कि कलीसिया का नाम वहाँ झूठे रूप से ओढ़ा जाता है जहाँ मनुष्य उस उतावली मानवीय स्वच्छन्दता के लिए संघर्ष करते हैं जो परमेश्वर के वचन द्वारा निर्धारित सीमाओं के भीतर नहीं रह सकती, वरन चिड़चिड़ेपन से फूट निकलती है और अपने ही आविष्कारों की शरण लेती है। उपर्युक्त वचन में कुछ भी उलझा हुआ, अस्पष्ट या दुविधापूर्ण नहीं है; सारी कलीसिया को मना किया गया है कि परमेश्वर की आराधना और हितकर आज्ञाओं के सम्बन्ध में उसके वचन में कुछ जोड़े या उसमें से कुछ घटाए। परन्तु यह तो केवल व्यवस्था के विषय में कहा गया था, जिसके बाद भविष्यद्वक्ता और सुसमाचार की पूरी व्यवस्था आई! यह मैं मानता हूँ, परन्तु साथ ही जोड़ता हूँ कि ये व्यवस्था की पूर्तियाँ हैं, न कि जोड़ना या घटाना। अब, यदि प्रभु मूसा की सेवकाई में, जो अनेक परतों में, यों कहें, अस्पष्टता में लिपटी हुई थी, कुछ जोड़ने या घटाने की अनुमति नहीं देता, जब तक कि वह अपने सेवकों भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा, और अन्त में अपने प्रिय पुत्र के द्वारा, स्पष्ट शिक्षा न दे दे, तो हम क्यों न मानें कि हमें व्यवस्था, भविष्यद्वक्ताओं, भजनों और सुसमाचार में कुछ भी जोड़ने से कहीं अधिक कठोरता से रोका गया है? प्रभु अपने आप को भूल नहीं सकता, और उसने बहुत पहले घोषणा की है कि उसे कुछ भी इतना अप्रिय नहीं जितना मानवीय आविष्कारों से उसकी आराधना किया जाना। इसीलिए भविष्यद्वक्ताओं की वे प्रसिद्ध घोषणाएँ हैं जो निरन्तर हमारे कानों में गूँजती रहनी चाहिए, "मैंने तुम्हारे पुरखाओं को जब मैं उन्हें मिस्र देश से निकाल लाया, होमबलि और मेलबलि के विषय में न कुछ कहा और न आज्ञा दी; परन्तु उनको यह आज्ञा दी, कि मेरी बात सुनो, तब मैं तुम्हारा परमेश्वर रहूँगा, और तुम मेरी प्रजा ठहरोगे; और जिस मार्ग की आज्ञा मैं तुम्हें दूँ उसी पर चलो" (यिर्मयाह 7:22, 23)। "जिस दिन मैं तुम्हारे पुरखाओं को मिस्र देश से निकाल लाया, उस दिन से आज के दिन तक मैंने तड़के उठकर उन्हें चिताया, कि मेरी बात सुनो" (यिर्मयाह 11:7)। इसी प्रकार के और भी वचन हैं, परन्तु सबसे प्रसिद्ध यह है, "क्या यहोवा होमबलियों और मेलबलियों से उतना प्रसन्न होता है जितना अपनी बात के माने जाने से? सुन, आज्ञा मानना बलिदान से, और ध्यान देना मेढ़ों की चर्बी से उत्तम है। क्योंकि बलवा करना और भावी कहनेवाले की नाईं झूठ बोलना एक ही सा पाप है, और हठ करना मूरतों और गृहदेवताओं की पूजा के तुल्य है" (1 शमूएल 15: 22, 23)। इसलिए यह सिद्ध करना सरल है कि जब कभी इस विषय में मानवीय आविष्कारों का कलीसिया के अधिकार से बचाव किया जाता है, तो वे अभक्ति के दोषारोपण से मुक्त नहीं हो सकते, और कलीसिया का नाम झूठे रूप से ओढ़ा गया है।
18. इसी कारण हम मानवीय परम्पराओं के उस अत्याचार का खुलकर विरोध करते हैं जो कलीसिया के नाम पर अहंकार से हम पर थोपा जाता है। और न हम कलीसिया का उपहास करते हैं (जैसा हमारे विरोधी निन्दा उत्पन्न करने के उद्देश्य से हम पर अन्याय से आरोप लगाते हैं), वरन हम उसे आज्ञाकारिता की प्रशंसा का श्रेय देते हैं, जिससे बड़ी कोई बात वह स्वीकार नहीं करती। वे स्वयं ही कलीसिया के साथ विशेष रूप से अन्याय करते हैं, जब वे उसे अपने प्रभु के प्रति हठी ठहराते हैं, यह दिखावा करते हुए कि वह परमेश्वर के वचन की अनुमति से आगे जाती है; उनकी मिली-जुली निर्लज्जता और द्वेष का तो कहना ही क्या, जो कलीसिया के अधिकार के विषय में निरन्तर चिल्लाते रहते हैं, जबकि इसी बीच वे उस आज्ञा को भी छिपाते हैं जो प्रभु ने उसे दी है, और उस आज्ञाकारिता को भी जो उसे उस आज्ञा के प्रति देनी है। परन्तु यदि हमारी इच्छा, जैसी होनी चाहिए, कलीसिया से सहमत होने की है, तो इस आदेश पर विचार करना और उसे स्मरण रखना अधिक महत्त्वपूर्ण है जो प्रभु ने हमें और कलीसिया दोनों को दिया है कि हम एक मन होकर उसकी आज्ञा मानें। क्योंकि इसमें कोई सन्देह नहीं कि जब हम सब बातों में प्रभु के आज्ञाकारी ठहरेंगे तभी हम कलीसिया से सबसे अच्छी तरह सहमत होंगे। परन्तु जिन परम्पराओं से कलीसिया अब तक दबाई गई है उनकी उत्पत्ति प्रेरितों से बताना केवल धोखा है, क्योंकि प्रेरितों की शिक्षा का सारा सार यही है कि विवेक पर नए पालनों का बोझ न डाला जाए, और परमेश्वर की आराधना को हमारे आविष्कारों से दूषित न किया जाए। फिर, यदि प्राचीन इतिहासों और अभिलेखों को कुछ विश्वसनीय माना जाए, तो जो कुछ वे प्रेरितों के नाम लगाते हैं वह न केवल उन्हें अज्ञात था, वरन उन्होंने उसे कभी सुना भी नहीं था। और वे यह बहाना भी न बनाएँ कि उनकी अधिकतर आज्ञाएँ, यद्यपि लिखित रूप में नहीं दी गईं, प्रयोग और प्रथा से ग्रहण की गईं, वे बातें जो प्रेरित तब नहीं समझ सकते थे जब मसीह संसार में था, परन्तु जो उन्होंने उसके स्वर्गारोहण के बाद पवित्र आत्मा के प्रकाशन से सीखीं। उस वचन का अर्थ अन्यत्र समझाया जा चुका है (अध्याय 8 खण्ड 14)। वर्तमान प्रश्न के विषय में वे अपने आप को सचमुच हास्यास्पद बनाते हैं, क्योंकि यह स्पष्ट है कि वे सब भेद जो इतने समय तक प्रेरितों से छिपे रहे, कुछ तो यहूदी या अन्यजातियों के पालन हैं, जिनमें से पहले प्राचीन काल में यहूदियों के बीच और दूसरे सब अन्यजातियों के बीच प्रचारित हो चुके थे, और कुछ बेतुके हाव-भाव और खोखली रीति-विधियाँ हैं, जिन्हें मूर्ख याजक, जिनमें न बुद्धि है न शिक्षा, भली-भाँति कर सकते हैं; वरन जिन्हें बालक और मदारी इतनी उपयुक्त रीति से करते हैं कि ऐसी बलियों के लिए इनसे उपयुक्त याजक असम्भव प्रतीत होते हैं। यदि कोई अभिलेख न भी होते, तो समझदार मनुष्य स्वयं बात के स्वभाव से ही निर्णय कर लेते कि रीतियों और पालनों का ऐसा ढेर कलीसिया में एकाएक नहीं घुस आया, वरन धीरे-धीरे रेंगकर आया। क्योंकि यद्यपि आदरणीय अध्यक्षों ने, जो प्रेरितों के समय के सबसे निकट थे, व्यवस्था और अनुशासन से सम्बन्ध रखनेवाली कुछ बातें आरम्भ कीं, तथापि उनके बाद आनेवालों में, और उनके बाद फिर आनेवालों में, पर्याप्त विचार नहीं था, जबकि जिज्ञासा और लोभ बहुत था, और सबसे अन्त में आनेवाला सदा अपने पूर्ववर्तियों से मूर्खतापूर्ण होड़ करता रहा, ताकि नवीनताओं के आविष्कार में पीछे न रह जाए। और क्योंकि यह जोखिम था कि ये आविष्कार, जिनसे वे आनेवाली पीढ़ियों से प्रशंसा की आशा रखते थे, शीघ्र ही पुराने पड़ जाएँ, इसलिए उनके पालन पर बल देने में वे और भी कठोर हो गए। इसी झूठे उत्साह ने उन रीतियों का बड़ा भाग उत्पन्न किया है जिन्हें ये लोग प्रेरितिक बताते हैं। इतिहास इसकी गवाही देता है।
