पुस्तक IV · अध्याय 11

कलीसिया के अधिकार-क्षेत्र और उसके दुरुपयोग के विषय में, जैसा कि पोप-तन्त्र में दिखाई देता है

Institutes of the Christian Religion · John Calvin

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कलीसिया के अधिकार-क्षेत्र और उसके दुरुपयोग के विषय में, जैसा कि पोप-तन्त्र में दिखाई देता है

अध्याय 11।

कलीसिया के अधिकार-क्षेत्र और उसके दुरुपयोग के विषय में, जैसा कि पोप-तन्त्र में दिखाई देता है।

खण्ड।

1. अधिकार-क्षेत्र के विषय में कलीसिया की शक्ति। इस अधिकार-क्षेत्र की आवश्यकता, उत्पत्ति और स्वरूप। कुंजियों की शक्ति पर दो दृष्टियों से विचार किया जाना चाहिए। पहली दृष्टि की व्याख्या।

2. दूसरी दृष्टि की व्याख्या। कलीसिया अनुशासन के रूप में कैसे बाँधती और खोलती है। पोप-तन्त्र में कुंजियों का दुरुपयोग।

3. बहिष्कार का अनुशासन सदा बना रहनेवाला है। नागरिक और कलीसियाई शक्ति में भेद।

4. बहिष्कार के अनुशासन का सदा बना रहना प्रमाणित किया गया। सम्राटों और मसीही हाकिमों के अधीन वह उचित रीति से व्यवस्थित किया गया।

5. आदि कलीसिया में कलीसियाई अधिकार-क्षेत्र का उद्देश्य और उपयोग। आत्मिक शक्ति तलवार की शक्ति से पूर्णतः अलग रखी गई थी।

6. आत्मिक शक्ति का संचालन किसी एक व्यक्ति द्वारा नहीं, वरन् वैध सभा द्वारा होता था। क्रमशः परिवर्तन। पहले कलीसिया की न्यायिक कार्यवाही में केवल पादरी-वर्ग हस्तक्षेप करता था। बाद में अध्यक्ष ने उसे अपने ही अधिकार में ले लिया।

7. अध्यक्षों ने बाद में इस प्रकार हथियाए हुए अधिकार अपने अधिकारियों को सौंप दिए और आत्मिक अधिकार-क्षेत्र को एक सांसारिक न्यायालय में बदल दिया।

8. सारांश। पोप की शक्ति का खण्डन। मसीह ने चाहा कि वचन के सेवक नागरिक शासन और सांसारिक सत्ता से दूर रहें।

9. पोप-मतवादियों की आपत्तियाँ। 1. इस बाहरी तड़क-भड़क से मसीह की महिमा प्रकट होती है। 2. इससे उनके बुलाहट के कर्तव्यों में बाधा नहीं पड़ती। दोनों आपत्तियों का उत्तर।

10. पोप-तन्त्र के अत्याचार का आरम्भ और क्रमिक विकास। कारण: 1. जिज्ञासा; 2. महत्त्वाकांक्षा; 3. हिंसा; 4. कपट; 5. अधर्म।

11. अन्तिम कारण: अधर्म का भेद, और मसीह-विरोधी का सांसारिक प्रभुता हथियाने में शैतानी उन्माद। पोप दोनों तलवारों का दावा करता है।

12. कॉन्स्टैंटाइन के कथित दान की व्यर्थता का भण्डाफोड़।

13. रोमी पोप शाही प्रतिष्ठा तक कब और किन उपायों से पहुँचे। हिल्डेब्रांड उसका संस्थापक।

14. उन्होंने रोम और अन्य प्रदेशों पर किन कार्यों से अधिकार जमाया। लज्जाजनक लूट-खसोट।

15. नागरिक अधिकार-क्षेत्र से छूट का दावा। इस कथित छूट और आदि अध्यक्षों की संयमशीलता के बीच अन्तर।

16. आदि अध्यक्षों ने नागरिक अतिक्रमण का दृढ़ता से विरोध करने में किस उद्देश्य को सामने रखा।

1. अब कलीसियाई शक्ति के तीसरे भाग पर विचार करना शेष है, जो वास्तव में, जब सब बातें भली रीति से व्यवस्थित हों, मुख्य भाग है, और जैसा हम कह चुके हैं, अधिकार-क्षेत्र में निहित है। अब कलीसिया का सारा अधिकार-क्षेत्र अनुशासन से सम्बन्ध रखता है, जिसकी हम शीघ्र ही चर्चा करेंगे। क्योंकि जैसे कोई नगर या गाँव बिना हाकिम और शासन के टिक नहीं सकता, वैसे ही परमेश्वर की कलीसिया को, जैसा मैं पहले सिखा चुका हूँ, परन्तु फिर दोहराने को विवश हूँ, एक प्रकार के आत्मिक शासन की आवश्यकता है। यह नागरिक शासन से सर्वथा भिन्न है, और उसमें बाधा डालना या उसे हानि पहुँचाना तो दूर, उलटे उसकी सहायता करने और उसे बढ़ाने में बहुत कुछ करता है। इसलिए अधिकार-क्षेत्र की यह शक्ति, एक शब्द में, आत्मिक व्यवस्था की रक्षा के लिए ठहराई गई विधि के सिवा और कुछ नहीं है। इसी उद्देश्य से कलीसिया में आरम्भ से ऐसे न्यायालय स्थापित किए गए जो आचरण की जाँच करें, दोषों को दण्ड दें और कुंजियों के कार्य को निभाएँ। पौलुस कुरिन्थियों की पहली पत्री में इस व्यवस्था का उल्लेख “प्रबन्ध” के नाम से करता है (1 कुरिन्थियों 12:28); इसी प्रकार रोमियों की पत्री में, जब वह कहता है, “जो अगुआई करे, वह उत्साह से करे” (रोमियों 12:8)। क्योंकि वह हाकिमों से बात नहीं कर रहा, जिनमें से उस समय कोई मसीही नहीं था, वरन् उनसे जो कलीसिया के आत्मिक शासन में पासबानों के साथ जुड़े थे। तीमुथियुस को लिखी पत्री में भी वह दो प्रकार के प्राचीनों का उल्लेख करता है, कुछ जो वचन में परिश्रम करते हैं, और कुछ जो प्रचार का कार्य नहीं करते, परन्तु भली रीति से अगुआई करते हैं (1 तीमुथियुस 5:17)। इस दूसरे वर्ग से उसका अभिप्राय निःसन्देह उनसे है जो आचरण की देखरेख और कुंजियों के पूरे प्रयोग के लिए ठहराए गए थे। क्योंकि जिस शक्ति की हम चर्चा कर रहे हैं वह पूरी तरह उन कुंजियों पर निर्भर है जो मसीह ने मत्ती के अठारहवें अध्याय में कलीसिया को दीं, जहाँ वह आज्ञा देता है कि जो लोग निजी चेतावनी को तुच्छ जानें उन्हें सब के सामने कड़ी फटकार दी जाए, और यदि वे अपनी हठ पर अड़े रहें तो विश्वासियों की संगति से निकाल दिए जाएँ। फिर, ये चेतावनियाँ और सुधार बिना जाँच-पड़ताल के नहीं हो सकते, और इसीलिए किसी न्यायिक कार्यवाही और व्यवस्था की आवश्यकता है। इसलिए यदि हम कुंजियों की प्रतिज्ञा को निष्फल न करें और बहिष्कार, गम्भीर चेतावनियों और इस प्रकार की सब बातों को पूरी तरह मिटा न दें, तो हमें अवश्य ही कलीसिया को कुछ अधिकार-क्षेत्र देना होगा। पाठक ध्यान दे कि हम यहाँ शिक्षा के सामान्य अधिकार की चर्चा नहीं कर रहे, जैसा मत्ती 21 और यूहन्ना 20 में है, वरन् यह स्थापित कर रहे हैं कि महासभा का अधिकार मसीह के झुण्ड को सौंप दिया गया है। उस समय तक शासन की शक्ति यहूदियों के पास थी। मसीह इसे अपनी कलीसिया में स्थापित करता है, जहाँ तक वह एक शुद्ध संस्था थी, और एक भारी दण्ड-विधान के साथ। ऐसा ही होना उचित था, क्योंकि अन्यथा एक दीन और तुच्छ समझी जानेवाली कलीसिया के निर्णय को उतावले और घमण्डी लोग ठुकरा सकते थे। और इस बात से पाठक को कोई कठिनाई न हो कि मसीह उन्हीं शब्दों में दोनों बातों के बीच काफ़ी अन्तर करता है, इसलिए यहाँ इसे समझा देना उचित होगा। बाँधने और खोलने के विषय में दो अंश हैं। एक मत्ती 16 में है, जहाँ मसीह पतरस को स्वर्ग के राज्य की कुंजियाँ देने की प्रतिज्ञा करके तुरन्त जोड़ता है, “जो कुछ तू पृथ्वी पर बाँधेगा वह स्वर्ग में बँधेगा; और जो कुछ तू पृथ्वी पर खोलेगा वह स्वर्ग में खुलेगा” (मत्ती 16:19)। इन शब्दों का अर्थ ठीक वही है जो यूहन्ना के सुसमाचार के उन शब्दों का है, जहाँ चेलों को प्रचार करने भेजने से पहले, उन पर फूँककर, वह कहता है, “जिनके पाप तुम क्षमा करो वे उनके लिये क्षमा किए गए हैं; जिनके तुम रखो वे रखे गए हैं” (यूहन्ना 20:23)। मैं ऐसी व्याख्या दूँगा जो न सूक्ष्म है, न खींची-तानी हुई, न तोड़ी-मरोड़ी हुई, वरन् सच्ची, स्वाभाविक और स्पष्ट है। पाप क्षमा करने और रखने की यह आज्ञा, और पतरस से बाँधने और खोलने की वह प्रतिज्ञा, वचन की सेवकाई के सिवा किसी और बात से सम्बन्धित नहीं मानी जानी चाहिए। जब प्रभु ने यह सेवकाई प्रेरितों को सौंपी, तब साथ ही उन्हें बाँधने और खोलने की यह शक्ति भी दी। क्योंकि सुसमाचार का सार इसके सिवा और क्या है कि सब लोग, जो पाप और मृत्यु के दास हैं, यीशु मसीह में जो छुटकारा है उसके द्वारा खोले और स्वतंत्र किए जाते हैं, जबकि जो मसीह को छुड़ानेवाले और उद्धारकर्ता के रूप में ग्रहण नहीं करते और नहीं मानते वे अनन्त बेड़ियों के लिए दोषी ठहराए जाते हैं? जब प्रभु ने यह सन्देश अपने प्रेरितों को सौंपा कि वे इसे सब जातियों में ले जाएँ, तो यह प्रमाणित करने के लिए कि यह उसी का सन्देश है और उसी की ओर से आया है, उसने इसे इस विशेष गवाही से आदर दिया, और यह स्वयं प्रेरितों के लिए भी और उन सब के लिए भी, जिनके पास यह पहुँचना था, एक अद्भुत पुष्टि थी। प्रेरितों के लिए अपने प्रचार के विषय में निरन्तर और पूर्ण निश्चयता रखना आवश्यक था, जिसे उन्हें न केवल अपार परिश्रम, चिन्ता, कष्ट और संकट के साथ करना था, वरन् अन्त में अपने लहू से मुहरबन्द भी करना था। इसलिए कि वे जान लें कि वह व्यर्थ या निष्फल नहीं, वरन् सामर्थ्य और प्रभाव से भरा है, यह आवश्यक था, मैं कहता हूँ, कि अपनी सब चिन्ताओं, संकटों और कठिनाइयों के बीच वे इस बात के कायल रहें कि वे परमेश्वर का कार्य कर रहे हैं; कि चाहे सारा संसार उनका सामना और विरोध करे, वे जानें कि परमेश्वर उनके पक्ष में है; कि अपने सिद्धान्त के रचयिता मसीह को पृथ्वी पर देह में उपस्थित न पाकर, वे समझें कि वह स्वर्ग में है ताकि उस सिद्धान्त की सच्चाई की पुष्टि करे जो उसने उन्हें सौंपा था। दूसरी ओर, यह आवश्यक था कि उनके सुननेवाले इस बात के विषय में पूरी तरह निश्चित हों कि सुसमाचार का सिद्धान्त प्रेरितों का वचन नहीं, वरन् स्वयं परमेश्वर का वचन है; पृथ्वी से उठी हुई वाणी नहीं, वरन् स्वर्ग से उतरी हुई। क्योंकि पापों की क्षमा, अनन्त जीवन की प्रतिज्ञा और उद्धार का सन्देश जैसी बातें मनुष्य के अधिकार में नहीं हो सकतीं। इसलिए मसीह ने गवाही दी कि सुसमाचार के प्रचार में प्रेरित केवल सेवक के रूप में कार्य करते थे; कि वही था जो उनके मुँह को साधन बनाकर सब कुछ कहता और प्रतिज्ञा करता था; इसलिए जिस पापक्षमा की वे घोषणा करते थे वह परमेश्वर की सच्ची प्रतिज्ञा थी; जिस दण्ड की आज्ञा वे सुनाते थे वह परमेश्वर का निश्चित न्याय था। यह गवाही सब युगों के लिए दी गई, और दृढ़ बनी हुई है, जो सब को निश्चय और सुरक्षा देती है कि सुसमाचार का वचन, चाहे किसी के भी द्वारा प्रचार किया जाए, स्वयं परमेश्वर का वचन है, जो सर्वोच्च न्यायासन पर घोषित किया गया, जीवन की पुस्तक में लिखा गया, और स्वर्ग में दृढ़ और अटल ठहराया गया। अब हम समझते हैं कि कुंजियों की शक्ति केवल उन स्थानों में सुसमाचार का प्रचार है, और जहाँ तक मनुष्यों का सम्बन्ध है, वह शक्ति कम और सेवकाई अधिक है। ठीक कहें तो मसीह ने यह शक्ति मनुष्यों को नहीं, वरन् अपने वचन को दी, जिसका सेवक उसने मनुष्यों को बनाया।

2. दूसरा अंश, जिसमें बाँधने और खोलने का उल्लेख है, मत्ती के अठारहवें अध्याय में है, जहाँ मसीह कहता है, “यदि वह उनकी भी न माने, तो कलीसिया से कह दे; और यदि वह कलीसिया की भी न माने, तो तू उसे अन्यजाति और चुंगी लेनेवाले के समान जान। मैं तुम से सच कहता हूँ, जो कुछ तुम पृथ्वी पर बाँधोगे वह स्वर्ग में बँधेगा, और जो कुछ तुम पृथ्वी पर खोलोगे वह स्वर्ग में खुलेगा” (मत्ती 18:17, 18)। यह अंश पहले अंश के बिलकुल समान नहीं है, वरन् इसे कुछ भिन्न रीति से समझना चाहिए। परन्तु जब मैं कहता हूँ कि वे भिन्न हैं, तो मेरा अर्थ यह नहीं कि उनमें बहुत समानता नहीं है। पहले, वे इसमें समान हैं कि दोनों सामान्य कथन हैं, कि बाँधने और खोलने की शक्ति सदा वही है (अर्थात् परमेश्वर के वचन के द्वारा), वही आज्ञा, वही प्रतिज्ञा। वे इसमें भिन्न हैं कि पहला अंश विशेष रूप से उस प्रचार से सम्बन्ध रखता है जो वचन के सेवक करते हैं, और दूसरा बहिष्कार के उस अनुशासन से जो कलीसिया को सौंपा गया है। अब कलीसिया उसे बाँधती है जिसे वह बहिष्कृत करती है, इस प्रकार नहीं कि उसे अनन्त विनाश और निराशा में डुबो दे, वरन् इस प्रकार कि उसके जीवन और आचरण को दोषी ठहराती है और उसे चेतावनी देती है कि यदि वह पश्चाताप न करे तो दण्ड के योग्य ठहराया गया है। वह उसे खोलती है जिसे वह संगति में ग्रहण करती है, क्योंकि वह उसे मानो उस एकता का सहभागी बनाती है जो उसे यीशु मसीह में प्राप्त है। इसलिए कोई भी हठपूर्वक कलीसिया के निर्णय को तुच्छ न जाने, और न इसे छोटी बात समझे कि विश्वासियों के मतों से वह दोषी ठहराया गया है। प्रभु गवाही देता है कि विश्वासियों का ऐसा निर्णय उसके अपने दण्डादेश की घोषणा के सिवा और कुछ नहीं है, और जो कुछ वे पृथ्वी पर करते हैं वह स्वर्ग में दृढ़ ठहरता है। क्योंकि उनके पास परमेश्वर का वचन है जिससे वे हठीलों को दोषी ठहराते हैं; उनके पास वह वचन है जिससे वे पश्चाताप करनेवालों को फिर अनुग्रह में ले लेते हैं। अब वे भूल नहीं कर सकते, न परमेश्वर के निर्णय से असहमत हो सकते हैं, क्योंकि वे केवल परमेश्वर की व्यवस्था के अनुसार न्याय करते हैं, जो कोई अनिश्चित या सांसारिक मत नहीं, वरन् परमेश्वर की पवित्र इच्छा, स्वर्ग का एक वचन है। इन दो अंशों पर, जिनकी व्याख्या मेरे विचार में मैंने संक्षेप में, सरल रीति से और सच्चाई के साथ की है, ये उन्मादी लोग, अपने चक्कर खाते हुए आत्मा के बहकाए बिना किसी भेद के, कभी पापस्वीकार, कभी बहिष्कार, कभी अधिकार-क्षेत्र, कभी व्यवस्था बनाने का अधिकार, और कभी क्षमा-पत्रों की नींव रखने का प्रयत्न करते हैं। पहले अंश को वे रोमी पीठ की प्रधानता खड़ी करने के लिए प्रस्तुत करते हैं। कुंजियाँ उन्हें इतनी भली-भाँति जानी हुई हैं जिन्होंने उनमें ताले और किवाड़ लगाना उचित समझा, कि तुम कहोगे कि उनका सारा जीवन कारीगरी में ही बीता है।

3. कुछ लोग यह कल्पना करके कि ये सब बातें अस्थायी थीं, क्योंकि हाकिम तब भी हमारे धर्म से अनजान थे, कलीसियाई और नागरिक शक्ति के बीच के भेद और असमानता पर ध्यान न देकर भटक जाते हैं। क्योंकि कलीसिया को दण्ड देने या रोकने के लिए तलवार का अधिकार नहीं, बलपूर्वक दबाने की कोई शक्ति नहीं, न कारागार है और न वे अन्य दण्ड जो हाकिम देने का अभ्यस्त होता है। फिर उद्देश्य पापी को उसकी इच्छा के विरुद्ध दण्ड देना नहीं, वरन् स्वेच्छा से किए गए ताड़न द्वारा पश्चाताप का अंगीकार प्राप्त करना है। इसलिए दोनों बातें बहुत भिन्न हैं, क्योंकि न तो कलीसिया अपने ऊपर वह कुछ लेती है जो हाकिम का है, और न हाकिम उस कार्य के योग्य है जो कलीसिया करती है। यह एक उदाहरण से और स्पष्ट हो जाएगा। क्या कोई मतवाला हो जाता है? सुव्यवस्थित नगर में उसका दण्ड कारावास होगा। क्या उसने व्यभिचार किया है? दण्ड वैसा ही होगा, या उससे भी कठोर। इस प्रकार व्यवस्थाओं, हाकिमों और बाहरी न्यायालय की सन्तुष्टि हो जाएगी। परन्तु परिणाम यह होगा, कि अपराधी पश्चाताप का कोई चिह्न नहीं दिखाएगा, वरन् झुँझलाएगा और बड़बड़ाएगा। क्या कलीसिया यहाँ हस्तक्षेप नहीं करेगी? ऐसे लोगों को मसीह और उसकी पवित्र संस्था को हानि पहुँचाए बिना प्रभु-भोज में सम्मिलित नहीं किया जा सकता। विवेक यह माँग करता है कि जो अपने बुरे उदाहरण से कलीसिया को ठोकर खिलाता है, वह पश्चाताप की औपचारिक घोषणा द्वारा उस ठोकर को दूर करे जो उसने उत्पन्न की है। विरोधी मत रखनेवालों का दिया हुआ तर्क फीका है। वे कहते हैं कि मसीह ने यह कार्य कलीसिया को तब सौंपा जब इसे करनेवाला कोई हाकिम नहीं था। परन्तु प्रायः ऐसा होता है कि हाकिम लापरवाह होता है, वरन् कभी-कभी स्वयं उसे ताड़ना की आवश्यकता होती है; जैसा सम्राट थियोडोसियस के साथ हुआ। फिर, यही बात वचन की सारी सेवकाई के विषय में भी कही जा सकती है। तो अब उस मत के अनुसार पासबान प्रकट अधर्मों की निन्दा करना छोड़ दें, डाँटना, दोष लगाना और फटकारना छोड़ दें। क्योंकि मसीही हाकिम हैं जिन्हें इन बातों को व्यवस्थाओं और तलवार से सुधारना चाहिए। परन्तु जैसे हाकिम को चाहिए कि शारीरिक दण्ड और बलप्रयोग से कलीसिया को ठोकरों से शुद्ध करे, वैसे ही सेवक को चाहिए कि अपनी ओर से हाकिम की सहायता करे ताकि अपराधियों की संख्या घटे। इस प्रकार उन्हें अपने प्रयत्न मिलाने चाहिए, एक दूसरे के लिए बाधा नहीं, वरन् सहायक बनकर।

4. और वास्तव में, मसीह के शब्दों पर अधिक ध्यान देने से यह सरलता से प्रकट हो जाएगा कि वहाँ वर्णित कलीसिया की दशा और व्यवस्था स्थायी है, अस्थायी नहीं। क्योंकि यह अनुचित होता कि जो हमारी चेतावनियों को मानने से इनकार करते हैं उन्हें हाकिम के हाथ सौंप दिया जाए, परन्तु यदि वह कलीसिया का स्थान लेनेवाला होता तो यही करना आवश्यक होता। “मैं तुम से सच कहता हूँ, जो कुछ तुम पृथ्वी पर बाँधोगे,” यह प्रतिज्ञा एक या कुछ वर्षों तक ही क्यों सीमित हो? फिर, मसीह ने यहाँ कोई नया विधान नहीं बनाया, वरन् उस रीति का अनुसरण किया जो अपनी प्राचीन प्रजा की कलीसिया में सदा से चली आई थी, और इस प्रकार संकेत दिया कि कलीसिया उस आत्मिक अधिकार-क्षेत्र के बिना नहीं रह सकती जो आरम्भ से विद्यमान था। इसकी पुष्टि सब युगों की सहमति से हुई है। क्योंकि जब सम्राटों और हाकिमों ने मसीही नाम धारण करना आरम्भ किया, तब आत्मिक अधिकार-क्षेत्र तुरन्त समाप्त नहीं कर दिया गया, वरन् केवल इस प्रकार व्यवस्थित किया गया कि वह किसी भी बात में नागरिक अधिकार-क्षेत्र को हानि न पहुँचाए, और न उससे गड्डमड्ड हो। और यह उचित भी है। क्योंकि हाकिम, यदि वह भक्त है, तो परमेश्वर की सन्तानों की उस साझी अधीनता से अपने आपको मुक्त करने की इच्छा नहीं रखेगा, जिसका एक मुख्य भाग परमेश्वर के वचन के अनुसार न्याय करनेवाली कलीसिया के अधीन होना है; उस निर्णय को मिटा देना उसका कर्तव्य होना तो दूर की बात है। क्योंकि जैसा अम्ब्रोस कहता है, “सम्राट के लिए इससे अधिक आदरणीय उपाधि क्या हो सकती है कि वह कलीसिया का पुत्र कहलाए? अच्छा सम्राट कलीसिया के भीतर होता है, कलीसिया के ऊपर नहीं” (अम्ब्रोस, वैलेन्टीनियन को पत्र 32)। इसलिए जो लोग हाकिम को सुशोभित करने के लिए कलीसिया से यह शक्ति छीन लेते हैं, वे न केवल झूठी व्याख्या से मसीह के आशय को बिगाड़ते हैं, वरन् प्रेरितों के दिनों से हुए उन अनेक पवित्र अध्यक्षों पर भी भारी दोष लगाते हैं कि उन्होंने झूठे बहाने से नागरिक हाकिम का सम्मान और पद हथिया लिया।

5. परन्तु दूसरी ओर, यह देखना उचित होगा कि प्राचीन काल में कलीसियाई अनुशासन का सच्चा उपयोग क्या था, और कितने बड़े दुरुपयोग घुस आए, ताकि हम जान सकें कि प्राचीन प्रथा में से क्या त्यागना और क्या फिर स्थापित करना चाहिए, यदि हम मसीह-विरोधी के राज्य को उलटकर मसीह के सच्चे राज्य को फिर खड़ा करना चाहते हैं। पहले, उद्देश्य यह है कि ठोकरों को होने से रोका जाए, और जब वे उत्पन्न हों तो उन्हें दूर किया जाए। इसके प्रयोग में दो बातों पर विचार करना है: पहली, कि यह आत्मिक शक्ति तलवार की शक्ति से पूर्णतः अलग हो; दूसरी, कि वह किसी एक व्यक्ति की इच्छा से नहीं, वरन् वैध सभा द्वारा संचालित हो (1 कुरिन्थियों 5:4)। कलीसिया के अधिक शुद्ध समयों में दोनों का पालन किया जाता था। क्योंकि पवित्र अध्यक्ष अपनी शक्ति का प्रयोग जुर्माने, कारावास या अन्य नागरिक दण्डों से नहीं करते थे, वरन् जैसा उन्हें शोभा देता था, केवल परमेश्वर के वचन का प्रयोग करते थे। क्योंकि कलीसिया का सबसे कठोर दण्ड, और मानो उसका अन्तिम वज्र, बहिष्कार है, जिसका प्रयोग आवश्यकता के बिना नहीं किया जाता।586 फिर, इसके लिए न हिंसा की आवश्यकता है न शारीरिक बल की, वरन् वह परमेश्वर के वचन के सामर्थ्य से सन्तुष्ट रहता है।587 संक्षेप में, प्राचीन कलीसिया का अधिकार-क्षेत्र और कुछ नहीं था (यदि मैं ऐसा कह सकूँ) सिवा उसके जो पौलुस पासबानों की आत्मिक शक्ति के विषय में सिखाता है, उसकी व्यावहारिक घोषणा। “हमारी लड़ाई के हथियार शारीरिक नहीं, पर गढ़ों को ढा देने के लिए परमेश्वर के द्वारा सामर्थी हैं; इन से हम कल्पनाओं का, और हर एक ऊँची बात का, जो परमेश्वर की पहचान के विरोध में उठती है, खण्डन करते हैं; और हर एक भावना को कैद करके मसीह का आज्ञाकारी बना देते हैं; और तैयार रहते हैं कि हर प्रकार के आज्ञा-उल्लंघन का पलटा लें” (2 कुरिन्थियों 10:4-6)। जैसे यह सिद्धान्त के प्रचार से होता है, वैसे ही इसलिए कि सिद्धान्त उपहास का विषय न बने, जो लोग विश्वास के घराने के होने का दावा करते हैं उनका न्याय सिखाए गए सिद्धान्त के अनुसार होना चाहिए। अब यह तभी हो सकता है जब सेवकाई के पद के साथ यह अधिकार जोड़ा जाए कि जिन्हें निजी रूप से चेतावनी या कड़ी फटकार दी जानी है उन्हें बुलाया जाए, और जिन्हें प्रभु-भोज की इस उच्च विधि को अपवित्र किए बिना सम्मिलित नहीं किया जा सकता उन्हें उससे दूर रखा जाए। इसलिए जब पौलुस अन्यत्र पूछता है, “मुझे बाहरवालों का न्याय करने से क्या काम?” (1 कुरिन्थियों 5:12), तब वह कलीसिया के सदस्यों को उनके दोषों के सुधार के लिए ताड़नाओं के अधीन ठहराता है, और ऐसे न्यायालयों के अस्तित्व का संकेत देता है जिनसे कोई विश्वासी मुक्त नहीं है।

6. यह शक्ति, जैसा हम पहले कह चुके हैं, किसी एक व्यक्ति की नहीं थी जो उसे अपनी इच्छानुसार चलाए, वरन् प्राचीनों की सभा की थी, जो कलीसिया में वही थी जो नगर में परिषद होती है। सिप्रियन, जब अपने समय में इसे चलानेवालों का उल्लेख करता है, तो प्रायः सारे पादरी-वर्ग को अध्यक्ष के साथ जोड़ता है (सिप्रियन, पुस्तक 3, पत्र 14, 19)। एक और स्थान पर वह दिखाता है कि यद्यपि पादरी-वर्ग अध्यक्षता करता था, तथापि लोग उसी समय जाँच से बाहर नहीं रखे जाते थे; क्योंकि वह यों लिखता है:—“अपने अध्यक्षपद के आरम्भ से मैंने निश्चय किया कि पादरी-वर्ग की सलाह के बिना कुछ नहीं, और लोगों की सहमति के बिना कुछ नहीं करूँगा।” परन्तु इस अधिकार-क्षेत्र के प्रयोग की सामान्य और प्रचलित रीति प्राचीनों की सभा द्वारा थी, जिनके, जैसा मैं कह चुका हूँ, दो वर्ग थे। कुछ सिखाने के लिए थे, दूसरे केवल आचरण के निरीक्षक थे। यह संस्था धीरे-धीरे अपने आदि रूप से बिगड़ती गई, यहाँ तक कि अम्ब्रोस के समय में कलीसियाई मामलों की जाँच केवल पादरी-वर्ग के हाथ में थी। वह इसकी इन शब्दों में शिकायत करता है:—“प्राचीन आराधनालय में, और फिर कलीसिया में, प्राचीन होते थे, जिनकी सलाह के बिना कुछ नहीं किया जाता था; यह चलन अब लुप्त हो गया है, न जाने किसके दोष से, सिवा इसके कि शिक्षकों के आलस्य से, या कहें उनके घमण्ड से, जो चाहते हैं कि केवल वे ही कुछ समझे जाएँ” (अम्ब्रोस, 1 तीमुथियुस 5 की टीका में)। हम देखते हैं कि यह पवित्र जन इस बात से कितना क्रुद्ध था कि उत्तम दशा कुछ मात्रा में बिगड़ गई थी, फिर भी उस समय जो व्यवस्था थी वह कम से कम सहने योग्य थी। तो यदि वह उन बेडौल खण्डहरों को देखता जिनमें प्राचीन भवन का कोई चिह्न नहीं दिखता, तो क्या होता? वह कितना विलाप करता? पहले तो, जो उचित और वैध था उसके विरुद्ध, अध्यक्ष ने वह अपने ही लिए ले लिया जो सारी कलीसिया को दिया गया था। यह वैसा ही है मानो कौंसल ने सीनेट को निकालकर सारे साम्राज्य को हथिया लिया हो। क्योंकि जैसे वह पद में औरों से बड़ा है, वैसे ही सभा का अधिकार एक व्यक्ति के अधिकार से बड़ा है। इसलिए यह घोर अन्याय था जब एक मनुष्य ने साझी शक्ति को अपने हाथ में करके अत्याचारी स्वेच्छाचार का मार्ग खोल दिया, कलीसिया से उसका अपना छीन लिया, और मसीह के आत्मा द्वारा ठहराई गई सभा को दबा दिया और त्याग दिया।

586 अगस्तीन के इस कथन (पत्र 119) में इसके विरुद्ध कुछ नहीं है कि जैसे उदार कलाओं और विद्याओं के शिक्षक, वैसे ही अध्यक्ष भी अपनी न्यायिक कार्यवाही में प्रायः छड़ी से दण्ड देने के अभ्यस्त थे।

587 यह सचमुच खेदजनक है कि इन खरे विचारों पर स्वयं कैल्विन ने ध्यान नहीं दिया, जबकि ठीक छः वर्ष पहले, इससे पूर्व कि 1559 का यह अन्तिम संस्करण प्रकाशित हुआ, उसने जिनेवा की परिषदों से विधर्मी माइकल सर्वेटस को गिरफ़्तार करने को कहा, उस पर आरोप लगाए, यह सिद्ध करने के लिए बहस चलाई कि उसकी झूठी शिक्षा मसीह की कलीसिया के लिए संकट है, और उसे मृत्युदण्ड देने के निर्णय का समर्थन किया (यद्यपि उसने जलाए जाने के स्थान पर सिर काटे जाने का आग्रह किया)। कैल्विन ने तो सर्वेटस को दिए गए मृत्युदण्ड के समर्थन में एक छोटी पुस्तक भी लिखी। आज चैम्पेल की उस पहाड़ी पर, जहाँ सर्वेटस ज्वालाओं में नष्ट हुआ, एक स्मारक खड़ा है। वह उस प्राणदण्ड की 350वीं वर्षगाँठ पर कैल्विन के अनुयायियों द्वारा बनवाया गया था। उस पर यह लेख है: हम, अपने महान धर्म-सुधारक कैल्विन के श्रद्धालु और कृतज्ञ पुत्र, उसकी उस भूल का, जो उसके युग की भूल थी, परित्याग करते हुए, और धर्म-सुधार तथा सुसमाचार के सच्चे सिद्धान्तों के अनुसार, विवेक की स्वतंत्रता को दृढ़ता से थामे हुए, 27 अक्टूबर 1903 के इस दिन मेल-मिलाप का यह स्मारक खड़ा करते हैं।

7. परन्तु जैसे बुराई सदा बुराई को जन्म देती है, अध्यक्षों ने इस अधिकार-क्षेत्र को अपनी देखरेख के अयोग्य समझकर तुच्छ जाना और इसे दूसरों के सिर डाल दिया। इसी से उनका स्थान सँभालने के लिए अधिकारियों की नियुक्ति हुई। मैं अभी इस वर्ग के लोगों के चरित्र की बात नहीं कर रहा; मैं केवल इतना कहता हूँ कि वे नागरिक न्यायाधीशों से किसी बात में भिन्न नहीं हैं। फिर भी वे इसे आत्मिक अधिकार-क्षेत्र कहते हैं, जबकि सारे मुक़दमे सांसारिक बातों से सम्बन्ध रखते हैं। यदि इसमें और कोई बुराई न भी होती, तो वे एक झगड़ालू न्यायालय को कलीसियाई अदालत कहने का साहस कैसे करते हैं? परन्तु वहाँ चेतावनियाँ हैं; वहाँ बहिष्कार है। परमेश्वर का उपहास इसी प्रकार किया जाता है। क्या कोई दीन मनुष्य कुछ रुपया देनदार है? उसे बुलाया जाता है; यदि वह उपस्थित हो तो दोषी पाया जाता है; दोषी पाए जाने पर, यदि वह भुगतान न करे, तो उसे चेतावनी दी जाती है। दूसरी चेतावनी के बाद अगला कदम बहिष्कार है। यदि वह उपस्थित न हो, तो उसे उपस्थित होने की चेतावनी दी जाती है; यदि वह देर करे, तो उसे चेतावनी दी जाती है, और शीघ्र ही बहिष्कृत कर दिया जाता है। मैं पूछता हूँ, क्या इसमें और मसीह की संस्था, या प्राचीन प्रथा, या कलीसियाई कार्यविधि में कोई भी समानता है? परन्तु कहा जाएगा कि वहाँ भी दोषों की निन्दा होती है। व्यभिचार, कामुकता, मतवालापन और ऐसे ही अधर्मों को वे न केवल सहते हैं, वरन् एक प्रकार की मौन स्वीकृति से बढ़ावा देते और पक्का करते हैं, और यह केवल लोगों में नहीं, पादरी-वर्ग में भी है। बहुतों में से वे थोड़ों को बुलाते हैं, या तो इसलिए कि वे आँखें मूँदते हुए बहुत स्पष्ट न दिखें, या इसलिए कि उनसे धन का जुर्माना ले सकें। मैं वहाँ होनेवाली लूट, छीना-झपटी, गबन और मन्दिर-चोरी के विषय में कुछ नहीं कहता। मैं उन लोगों के विषय में भी कुछ नहीं कहता जो प्रायः इस पद पर नियुक्त किए जाते हैं। इतना ही नहीं, इससे अधिक ही पर्याप्त है कि जब रोमवादी अपने आत्मिक अधिकार-क्षेत्र पर घमण्ड करते हैं, तब हम यह दिखाने को तैयार हैं कि कोई बात मसीह द्वारा ठहराई गई कार्यविधि के इससे अधिक विपरीत नहीं, और प्राचीन प्रथा से उसकी समानता उतनी ही है जितनी अन्धकार की प्रकाश से।

8. यद्यपि जो कुछ यहाँ कहा जा सकता था वह सब हमने नहीं कहा, और जो कहा भी गया है उसे केवल संक्षेप में छुआ गया है, तथापि मेरा विश्वास है कि इतना कहा जा चुका है कि किसी को सन्देह न रहे कि जिस आत्मिक शक्ति पर पोप अपने सब अनुयायियों समेत इतराता है, वह परमेश्वर के वचन का अधर्मी विरोध और उसकी प्रजा पर अन्यायपूर्ण अत्याचार है। आत्मिक शक्ति के नाम के अन्तर्गत मैं उनके नए सिद्धान्त गढ़ने के दुस्साहस को सम्मिलित करता हूँ, जिनके द्वारा उन्होंने दुखी लोगों को परमेश्वर के वचन की सच्ची शुद्धता से भटका दिया, उन अधर्मी परम्पराओं को जिनसे उन्होंने उन्हें फँसाया, और उस झूठे कलीसियाई अधिकार-क्षेत्र को जो वे सहायक अध्यक्षों और अधिकारियों के द्वारा चलाते हैं। क्योंकि यदि हम मसीह को अपने बीच राज्य करने दें, तो वह सारा प्रभुत्व तुरन्त ही ढह और गिर पड़ेगा। तलवार का अधिकार, जिसका दावा भी वे अपने लिए करते हैं, चूँकि विवेकों के विरुद्ध नहीं चलाया जाता, इसलिए यहाँ विचार करने के योग्य नहीं ठहरता। फिर भी यहाँ यह देखना उचित है कि वे सदा अपने ही समान रहते हैं, और वे जो दिखना चाहते हैं अर्थात् कलीसिया के पासबान, उससे अधिक अलग उनके समान कोई नहीं। मैं व्यक्ति-विशेष के दोषों की बात नहीं करता, वरन् सामान्य दुष्टता की, और इसलिए सारे वर्ग की विषैली प्रकृति की, जो धन और अहंकार भरी उपाधियों से विशिष्ट न हो तो अंगहीन समझा जाता है। यदि इस विषय में हम मसीह का अधिकार खोजें, तो इसमें कोई सन्देह नहीं कि उसने अपने वचन के सेवकों को नागरिक प्रभुता और सांसारिक सत्ता से रोकना चाहा, जब उसने कहा, “अन्यजातियों के राजा उन पर प्रभुता करते हैं, और जो उन पर अधिकार रखते हैं, वे उपकारक कहलाते हैं। परन्तु तुम ऐसे न होना” (मत्ती 20:25, 26)। क्योंकि वह न केवल यह संकेत देता है कि पासबान का पद शासक के पद से भिन्न है, वरन् यह भी कि ये बातें इतनी दूर-दूर हैं कि एक ही व्यक्ति में नहीं मिल सकतीं। मूसा ने सचमुच दोनों को धारण किया (निर्गमन 18:16); परन्तु पहले, यह एक अनोखे चमत्कार का परिणाम था; और दूसरे, यह अस्थायी था, जब तक कि बातें भली रीति से व्यवस्थित न हो जाएँ। क्योंकि जब प्रभु द्वारा एक निश्चित रूप ठहरा दिया गया, तब नागरिक शासन मूसा के पास रहने दिया गया, और उसे आज्ञा दी गई कि याजक का पद अपने भाई को सौंप दे। और यह उचित भी था; क्योंकि एक मनुष्य का दोनों बोझ उठाना स्वभाव की सामर्थ्य से परे है। कलीसिया में यह सब युगों में सावधानी से माना गया है। जब तक कलीसिया का कोई सच्चा रूप बना रहा, कभी किसी अध्यक्ष ने तलवार का अधिकार हथियाने की बात नहीं सोची; यहाँ तक कि अम्ब्रोस के युग में यह एक प्रचलित कहावत थी कि सम्राट याजकपद के लिए उतने ललचाते थे जितने याजक शाही सत्ता के लिए नहीं।588 क्योंकि वह वाक्य जो उसने आगे जोड़ा, सब के मन में बैठ गया था: राजमहल सम्राट के हैं, गिरजाघर याजक के।

9. परन्तु जब ऐसी विधि निकाली गई जिससे अध्यक्ष बिना बोझ और चिन्ता के अपने पद का नाम, सम्मान और धन रख सकें, ताकि वे पूरी तरह निठल्ले छोड़ दिए जाएँ, तब तलवार का अधिकार उन्हें दिया गया, या कहें उन्होंने स्वयं उसे हथिया लिया। वे इस निर्लज्जता का बचाव किस बहाने से करेंगे? क्या अध्यक्षों का यह काम था कि वे मुक़दमों की जाँच और नगरों तथा प्रान्तों के प्रबन्ध में उलझें और ऐसे कामों को अपनाएँ जो उनके लिए सर्वथा पराए हैं, उन अध्यक्षों का, जिन्हें अपने ही पद में इतना समय और परिश्रम चाहिए कि यद्यपि वे उसमें परिश्रमपूर्वक और पूरी तरह लगे रहें, दूसरे कामों से विचलित हुए बिना, तो भी वे मुश्किल से पर्याप्त होते हैं? परन्तु उनकी हठ ऐसी है कि वे यह डींग मारने में नहीं झिझकते कि इसी प्रकार मसीह के राज्य की गरिमा उचित रीति से बनी रहती है, और साथ ही वे अपनी बुलाहट से अलग भी नहीं किए जाते। पहले दावे के विषय में, यदि पवित्र पद की शोभा इसी में है कि उसके धारण करनेवाले इतने ऊँचे उठाए जाएँ कि बड़े से बड़े राजाओं के लिए भी भयंकर हो जाएँ, तो उन्हें मसीह से शिकायत करने का आधार है, जिसने इस बात में उनके सम्मान को बुरी तरह घटा दिया है। क्योंकि उनके मत में, इन शब्दों से अधिक अपमानजनक और क्या हो सकता है, “अन्यजातियों के राजा उन पर प्रभुता करते हैं”? “परन्तु तुम ऐसे न होना” (लूका 22:25, 26)। और फिर भी वह अपने सेवकों पर इससे कठोर नियम नहीं रखता जो उसने पहले अपने ऊपर रखा था। वह कहता है, “किसने मुझे तुम्हारे ऊपर न्यायी या बाँटनेवाला नियुक्त किया है?” (लूका 12:14) हम देखते हैं कि वह न्याय करने के पद से स्पष्ट इनकार करता है; और यदि यह बात उसके पद के अनुकूल होती तो वह ऐसा न करता। जिस अधीनता में प्रभु ने स्वयं को इस प्रकार रखा, क्या उसके सेवक उसे स्वीकार नहीं करेंगे? दूसरी बात के विषय में मैं चाहता हूँ कि वे उसे अनुभव से उतनी ही सरलता से सिद्ध करें जितनी सरलता से वे उसे कहते हैं। परन्तु जैसे प्रेरितों को परमेश्वर का वचन छोड़कर भोजन परोसना अच्छा न लगा, वैसे ही ये लोग इसके द्वारा यह मानने को विवश हैं, यद्यपि वे सीखना नहीं चाहते, कि एक ही व्यक्ति के लिए अच्छा अध्यक्ष और अच्छा शासक होना सम्भव नहीं है। क्योंकि यदि वे लोग, जो अपने प्राप्त वरदानों की प्रचुरता के कारण अपने बाद आनेवाले किसी भी जन की अपेक्षा कहीं अधिक और भारी चिन्ताओं को सँभालने में समर्थ थे, यह मान गए कि वचन की सेवकाई और भोजन परोसने की सेवा दोनों को वे बोझ के नीचे दबे बिना नहीं निभा सकते, तो ये लोग, जो प्रेरितों की तुलना में कुछ भी मनुष्य नहीं हैं, परिश्रम में उनसे सौ गुना कैसे आगे निकल सकते हैं? यह प्रयत्न ही अत्यन्त निर्लज्ज और दुस्साहसपूर्ण धृष्टता है। फिर भी हम देखते हैं कि यह हो रहा है; किस सफलता से, यह प्रकट है। परिणाम यह होना ही था कि उन्होंने अपने ही कार्य छोड़ दिए और दूसरी छावनी में चले गए। 588 यह अम्ब्रोस ने कहा है, उपदेश: गिरजाघर सौंपने के विषय में। देखिए अगस्तीन भी, विश्वास और कर्मों के विषय में, अध्याय 4।

10. इसमें कोई सन्देह नहीं कि यह बड़ी उन्नति छोटी शुरुआतों से हुई है। वे एक ही कदम में इतनी दूर नहीं पहुँच सकते थे, वरन् कभी चालाकी और धूर्त कला से गुप्त रूप से अपने आपको ऊँचा उठाते रहे, इससे पहले कि कोई देख पाए कि क्या होनेवाला है; कभी, जब अवसर मिला, धमकियों और आतंक के द्वारा हाकिमों से शक्ति की कुछ वृद्धि छीन ली; और कभी, जब उन्होंने देखा कि हाकिम उदारता से देने को तैयार हैं, तो उनकी मूर्खतापूर्ण और अविचारी सरलता का दुरुपयोग किया। प्राचीन काल के भक्त लोग, जब कोई विवाद उठता, तो मुक़दमेबाज़ी की आवश्यकता से बचने के लिए निर्णय अध्यक्ष पर छोड़ देते थे, क्योंकि उन्हें उसकी खरेपन पर कोई सन्देह नहीं था। प्राचीन अध्यक्ष प्रायः ऐसे मामलों में उलझाए जाने से बहुत अप्रसन्न होते थे, जैसा अगस्तीन कहीं घोषित करता है; परन्तु इसलिए कि पक्षकार किसी झगड़ालू न्यायालय की ओर न दौड़ पड़ें, उन्होंने अनिच्छा से यह झंझट सह लिया। इन स्वैच्छिक निर्णयों को, जो न्यायालय के झगड़े से सर्वथा भिन्न थे, इन लोगों ने साधारण अधिकार-क्षेत्र में बदल दिया। जब नगर और ज़िले कुछ समय तक नाना कठिनाइयों से दबे रहने पर अध्यक्षों के संरक्षण की शरण में गए और अपने आपको उनकी सुरक्षा पर छोड़ दिया, तो इन लोगों ने एक विचित्र चाल से संरक्षकों से अपने आपको स्वामी बना लिया। इसका इनकार नहीं किया जा सकता कि उन्होंने गुटबाज़ी की हिंसा से एक बड़ा भाग हथिया लिया। फिर, जिन हाकिमों ने स्वेच्छा से अध्यक्षों को अधिकार-क्षेत्र दिया, वे नाना कारणों से इसके लिए प्रेरित हुए। यद्यपि उनकी उदारता में भक्ति का कुछ आभास था, तथापि इस अनुचित दानशीलता से उन्होंने कलीसिया के हितों का सर्वोत्तम ध्यान नहीं रखा, जिसके प्राचीन और सच्चे अनुशासन को उन्होंने इस प्रकार बिगाड़ दिया, वरन् सच कहें तो पूरी तरह मिटा दिया। जो अध्यक्ष हाकिमों की भलाई का अपने ही लाभ के लिए दुरुपयोग करते हैं, उन्होंने अपने आचरण के इसी एक नमूने से पर्याप्त से अधिक प्रमाण दे दिया कि वे बिलकुल सच्चे अध्यक्ष नहीं थे। यदि उनमें प्रेरितों की आत्मा की एक चिंगारी भी होती, तो वे निःसन्देह पौलुस के शब्दों में उत्तर देते, “हमारी लड़ाई के हथियार शारीरिक नहीं,” वरन् आत्मिक हैं (2 कुरिन्थियों 10:4)। परन्तु अन्धी लालसा के बहाव में वे अपने आपको, अपनी आनेवाली पीढ़ियों को, और कलीसिया को खो बैठे।

11. अन्त में रोमी पोप ने, सीमित प्रदेशों से सन्तुष्ट न होकर, पहले राज्यों पर और फिर साम्राज्य पर हाथ डाला। और ताकि वह किसी न किसी बहाने से उस पर अधिकार बनाए रखे जो उसने केवल लूट से पाया है, वह कभी डींग मारता है कि वह उसे ईश्वरीय अधिकार से रखता है, कभी कॉन्स्टैंटाइन के दान का दिखावा करता है, और कभी किसी और दावे का। पहले, मैं बर्नार्ड के साथ उत्तर देता हूँ, “मान लें कि किसी न किसी आधार पर वह इसका दावा कर सकता है, तो भी यह प्रेरितिक अधिकार से नहीं है। क्योंकि पतरस वह दे नहीं सकता था जो उसके पास न था, परन्तु जो उसके पास था वह उसने अपने उत्तराधिकारियों को दिया, अर्थात् कलीसियाओं की चिन्ता। परन्तु जब हमारा प्रभु और स्वामी कहता है कि वह दो के बीच न्यायी नियुक्त नहीं किया गया, तो सेवक और चेले को सब का न्यायी न होना अनुचित नहीं समझना चाहिए” (बर्नार्ड, विचार के विषय में, पुस्तक 2)। बर्नार्ड नागरिक निर्णयों के विषय में बोल रहा है, क्योंकि वह आगे कहता है, “इसलिए तुम्हारी शक्ति पापों में है, सम्पत्ति के अधिकारों में नहीं, क्योंकि पहली के लिए, दूसरी के लिए नहीं, तुम्हें स्वर्ग के राज्य की कुंजियाँ मिली थीं। इन दोनों में से कौन-सी तुम्हें ऊँची प्रतिष्ठा लगती है, पापों को क्षमा करना या भूमि बाँटना? इसकी कोई तुलना नहीं। इन तुच्छ सांसारिक बातों के न्यायी पृथ्वी के राजा और हाकिम हैं। तुम दूसरों के प्रदेशों पर क्यों चढ़ाई करते हो?” इत्यादि। फिर, “तुम्हें ऊँचा किया गया है” (वह पोप यूजीनियस को सम्बोधित कर रहा है), “किसलिए? मैं मानता हूँ, प्रभुता जमाने के लिए नहीं। इसलिए हम चाहे अपने को कितना भी बड़ा समझें, स्मरण रखें कि हम पर सेवकाई रखी गई है, प्रभुता दी नहीं गई। सीखो कि भविष्यद्वक्ता का कार्य करने के लिए तुम्हें एक पतली छड़ी की आवश्यकता है, राजदण्ड की नहीं।” फिर, “यह स्पष्ट है कि प्रेरितों को प्रभुता चलाने से रोका गया है। इसलिए जाओ और साहस करो कि अपने लिए या तो प्रभुता सहित प्रेरिताई हथिया लो, या प्रेरिताई सहित प्रभुता।” तुरन्त बाद वह कहता है, “प्रेरितिक रूप यह है; प्रभुता मना है, सेवकाई की आज्ञा है।” यद्यपि बर्नार्ड ऐसा कहता है, और ऐसे कहता है कि सब पर प्रकट हो जाए कि वह सच कहता है, वरन् बिना एक शब्द के भी बात स्वयं प्रकट है, फिर भी रोमी पोप को आर्ल की महासभा में यह ठहराते हुए लज्जा नहीं आई कि दोनों तलवारों का सर्वोच्च अधिकार ईश्वरीय अधिकार से उसका है।

12. जहाँ तक कॉन्स्टैंटाइन के दान का सम्बन्ध है, जिन्हें उस समय के इतिहास का थोड़ा-बहुत भी ज्ञान है उन्हें यह बताने की आवश्यकता नहीं कि वह दावा न केवल कल्पित वरन् बेतुका भी है। परन्तु इतिहास की बात छोड़ दें तो इस विषय में अकेला ग्रेगोरी ही पर्याप्त और पूर्ण गवाह है। क्योंकि जहाँ कहीं वह सम्राट की बात करता है, उसे “मेरे परम शान्त प्रभु” कहता है, और अपने आपको उसका अयोग्य सेवक।589 फिर, एक और स्थान पर वह कहता है, “सांसारिक सत्ता की दृष्टि से हमारा प्रभु याजकों से बहुत शीघ्र अप्रसन्न न हो, वरन् उत्तम विचार के साथ, उसके कारण जिसके वे सेवक हैं, उन पर शासन करते हुए उनका उचित आदर भी करे।” हम देखते हैं कि वह साझी अधीनता में अपने आपको प्रजा में से एक गिना जाना चाहता है। क्योंकि वह वहाँ दूसरे का नहीं, अपना ही पक्ष प्रस्तुत करता है। फिर, “मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर पर भरोसा रखता हूँ कि वह भक्त शासकों को लम्बी आयु देगा, और अपनी दया के अनुसार हमें आपके हाथ के नीचे रखेगा।” मैंने ये बातें यहाँ कॉन्स्टैंटाइन के दान के प्रश्न पर पूरी चर्चा करने के विचार से नहीं रखीं, वरन् केवल प्रसंगवश अपने पाठकों को दिखाने के लिए कि जब रोमवादी अपने पोप के लिए सांसारिक साम्राज्य का दावा करने का प्रयत्न करते हैं तो वे कितने बचकाने ढंग से झूठ बोलते हैं। और भी नीच है ऑगस्टीन स्टेउकस की निर्लज्जता, जिसने ऐसे हताश पक्ष में रोमी पोप के लिए अपना श्रम और अपनी जीभ उधार देने का साहस किया। वल्ला ने, जैसा एक विद्वान और तीक्ष्ण बुद्धि मनुष्य के लिए सरल था, इस कहानी का पूरी तरह खण्डन कर दिया था। फिर भी, क्योंकि वह कलीसियाई मामलों से कम परिचित था, उसने वह सब नहीं कहा था जो विषय से सम्बन्धित था। स्टेउकस घुस आता है, और अपनी निकम्मी हुज्जतें बिखेरता है, स्पष्ट प्रकाश को दबाने का प्रयत्न करते हुए। और निश्चय ही वह अपने स्वामी का पक्ष उतना ही फीके ढंग से रखता है जितना कोई चतुर जन उसी मत का बचाव करने के बहाने वल्ला का पक्ष ले लेता। परन्तु पक्ष योग्य है, जिसके बचाव के लिए पोप ऐसे समर्थकों को भाड़े पर रखे; वैसे ही योग्य हैं वे भाड़े के बकवादी जिन्हें लाभ की आशा धोखा दे सकती है, जैसा यूगुबिनस के साथ हुआ। 589 ग्रेगोरी, पुस्तक 2, पत्र 5; पुस्तक 3, पत्र 20; पुस्तक 2, पत्र 61; पुस्तक 4, पत्र 31, 34।

13. यदि कोई पूछे कि यह कल्पित साम्राज्य किस काल में उभरना आरम्भ हुआ, तो अभी पाँच सौ वर्ष भी नहीं बीते कि रोमी पोप सम्राटों के अधीन थे, और कोई भी पोप सम्राट के अधिकार के बिना नहीं चुना जाता था। इस व्यवस्था में नवीनता लाने का अवसर हेनरी चतुर्थ ने ग्रेगोरी सप्तम को दिया, जो एक चंचल और उतावला मनुष्य था, जिसमें विवेक न था, साहस बहुत था, और जीवन दुराचारी था। जब उसने जर्मनी के सारे अध्यक्षपद के पद अपने दरबार में, कुछ बिकाऊ और कुछ लूट के लिए खुले, रख छोड़े थे, तब हिल्डेब्रांड ने, जो उससे चिढ़ा हुआ था, अपना दावा जताने का एक मनभावना बहाना पकड़ा। चूँकि उसका पक्ष भला और भक्तिपूर्ण दिखता था, उसे बड़ी कृपा की दृष्टि से देखा गया, जबकि हेनरी अपने शासन की ढिठाई के कारण हाकिमों में सामान्यतः घृणा का पात्र था। अन्त में हिल्डेब्रांड ने, जिसने ग्रेगोरी सप्तम नाम धारण किया, एक अशुद्ध और दुष्ट मनुष्य होकर, अपने कुटिल इरादे प्रकट कर दिए। इस पर बहुत-से लोग जो उसके षड्यन्त्र में उसके साथ जुड़े थे, उसे छोड़ गए। फिर भी उसने इतना पा लिया कि उसके उत्तराधिकारी न केवल बिना दण्ड के जूए को उतार फेंक सके, वरन् सम्राटों को भी अपने अधीन कर सके। इसके अतिरिक्त, बाद के अनेक सम्राट यूलियस कैसर के बजाय हेनरी के अधिक समान थे। इन्हें हराना कठिन न था, जब वे घर में सुस्त और निश्चिन्त बैठे थे, और पोपों के लोभ को सब वैध उपायों से दबाने के लिए, जैसा अत्यन्त आवश्यक था, ज़ोर-शोर से प्रयत्न नहीं कर रहे थे। हम देखते हैं कि कॉन्स्टैंटाइन के उस महान दान का क्या आधार है, जिसके द्वारा पोप दिखावा करता है कि पश्चिमी साम्राज्य उसे दिया गया था।

14. इस बीच पोप ने छल से, या विश्वासघात से, या शस्त्रों से, दूसरों के प्रदेशों पर चढ़ाई करना न छोड़ा। रोम स्वयं, जो तब स्वतंत्र था, उसे उन्होंने लगभग एक सौ तीस वर्ष पहले अपने अधिकार में कर लिया। अन्त में उन्होंने वह प्रभुता पा ली जो अब उनके पास है, और उसे बनाए रखने या बढ़ाने के लिए, अब दो सौ वर्ष से (वे नगर की प्रभुता हथियाने से पहले ही आरम्भ कर चुके थे) उन्होंने मसीही जगत को इतना सताया है कि उसे लगभग नष्ट कर डाला। पहले, ग्रेगोरी के समय में, जब कलीसियाई सम्पत्ति के रखवाले उन भूमियों पर, जिन्हें वे कलीसिया की समझते थे, अधिकार जमाते और राजकोष की रीति पर अपने दावे की गवाही में उन पर अपनी मुहरें लगाते थे, तो ग्रेगोरी ने अध्यक्षों की एक महासभा बुलाकर उस अपवित्र प्रथा की कड़ी निन्दा की, और पूछा कि क्या वे उस कलीसियाई जन को शापित न ठहराएँगे जो अपनी इच्छा से किसी सम्पत्ति पर नाम की पट्टी लगाकर अधिकार जमाने का प्रयत्न करे, और इसी प्रकार उस अध्यक्ष को जो ऐसा करने की आज्ञा दे, या उसकी आज्ञा के बिना किए जाने पर उसे दण्ड न दे। सब ने शाप सुनाया। यदि किसी कलीसियाई जन का नाम की पट्टी लगाकर सम्पत्ति का दावा करना शाप के योग्य अपराध है, तो अब जब दो सौ वर्ष से पोप युद्ध और रक्तपात, सेनाओं के विनाश, नगरों की लूट, जातियों के विनाश या उलट-फेर, और राज्यों के उजाड़ने के सिवा कुछ नहीं सोचते, केवल इसलिए कि वे दूसरों की सम्पत्ति के स्वामी बन जाएँ, तब ऐसे आचरण को कौन-से शाप पर्याप्त दण्ड दे सकते हैं? निश्चय ही यह बिलकुल प्रकट है कि जिस बात की उन्हें सबसे कम चिन्ता है वह मसीह की महिमा है। क्योंकि यदि वे स्वेच्छा से अपनी सांसारिक सत्ता का एक-एक भाग छोड़ दें, तो परमेश्वर की महिमा पर कोई संकट नहीं, खरी शिक्षा पर कोई संकट नहीं, कलीसिया की सुरक्षा पर कोई संकट नहीं आता; परन्तु वे सत्ता की लालसा में अन्धे और बेतहाशा बहे जाते हैं, यह समझते हुए कि जब तक वे शासन न करें कुछ भी सुरक्षित नहीं, जैसा भविष्यद्वक्ता कहता है, “कठोरता और कड़ाई से” (यहेजकेल 34:4)।

15. अधिकार-क्षेत्र के साथ वह छूट जुड़ी है जिसका दावा रोमी पादरी-वर्ग करता है। वे निजी मुक़दमों में भी नागरिक न्यायाधीश के सामने उत्तर देना अपने लिए अनुचित समझते हैं, और कलीसिया की स्वतंत्रता और प्रतिष्ठा साधारण न्यायालयों और व्यवस्थाओं से छूट में ही मानते हैं। परन्तु प्राचीन अध्यक्ष, जो अन्यथा कलीसिया के अधिकारों का दावा करने में अत्यन्त दृढ़ थे, प्रजा के रूप में आचरण करने को अपने और अपने वर्ग के लिए कोई हानि नहीं समझते थे। भक्त सम्राट भी, जब-जब अवसर हुआ, पादरियों को अपने न्यायालयों में बुलाते थे, और उन्हें कोई विरोध नहीं मिला। क्योंकि कॉन्स्टैंटाइन नीकोमीदिया के लोगों को लिखे एक पत्र में यों कहता है:—“यदि अध्यक्षों में से कोई अविचार से उपद्रव खड़ा करे, तो उसका दुस्साहस परमेश्वर के सेवक द्वारा, अर्थात् मेरे अधिकारी द्वारा, रोका जाएगा” (थियोडोरेट, पुस्तक 1, अध्याय 20)। वैलेन्टीनियन कहता है, “अच्छे अध्यक्ष सम्राट की शक्ति पर कोई निन्दा नहीं डालते, वरन् सच्चाई से महान राजा परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करते और हमारी व्यवस्थाओं को मानते हैं” (थियोडोरेट, पुस्तक 4, अध्याय 8)। निःसन्देह उस समय सब का यही मत था। कलीसियाई मामले, सचमुच, अध्यक्ष के न्यायालय के सामने लाए जाते थे; जैसे जब किसी पादरी ने अपराध किया, परन्तु व्यवस्थाओं के विरुद्ध नहीं, तो उस पर केवल नियमों (कैनन) के अनुसार आरोप लगाया जाता था; और नागरिक न्यायालय में बुलाए जाने के बजाय उस विशेष मामले में अध्यक्ष उसका न्यायी होता था। इसी प्रकार, जब विश्वास का कोई प्रश्न उठाया जाता, या ऐसा कोई प्रश्न जो वास्तव में कलीसिया से सम्बन्ध रखता था, तब जाँच का अधिकार कलीसिया पर छोड़ दिया जाता था। इसी अर्थ में अम्ब्रोस के शब्दों को समझना चाहिए: “आपके पिता ने, जिनकी स्मृति पूजनीय है, न केवल शब्दों में उत्तर दिया, वरन् व्यवस्था बनाकर ठहराया कि विश्वास के प्रश्न में न्यायी वह हो जो न पद से असमान हो, न अपने अधिकार-क्षेत्र की प्रकृति से अयोग्य” (अम्ब्रोस, पत्र 32)। फिर, “यदि हम पवित्रशास्त्र या प्राचीन उदाहरणों पर ध्यान दें, तो कौन इनकार कर सकता है कि विश्वास के प्रश्न में, मैं कहता हूँ विश्वास के प्रश्न में, अध्यक्ष ही मसीही सम्राटों का न्याय करते आए हैं, सम्राट अध्यक्षों का नहीं?” फिर, “हे सम्राट, मैं आपकी सभा के सामने आ जाता, यदि अध्यक्ष या लोग मुझे आने देते: वे कहते हैं कि विश्वास का प्रश्न कलीसिया में लोगों के सामने विचारा जाना चाहिए।” वह सचमुच यह दृढ़ता से कहता है कि आत्मिक मामला, अर्थात् जो धर्म से सम्बन्ध रखता है, नागरिक न्यायालय के सामने नहीं लाया जाना चाहिए, जहाँ सांसारिक विवाद निपटाए जाते हैं। इस विषय में उसकी दृढ़ता की सब उचित रूप से प्रशंसा करते हैं। फिर भी, यद्यपि उसका पक्ष भला है, वह यहाँ तक कहता है कि यदि बल और हिंसा की बात आए तो वह झुक जाएगा। “मैं अपने सौंपे हुए स्थान को नहीं छोड़ूँगा, परन्तु यदि विवश किया गया तो विरोध नहीं करूँगा: प्रार्थनाएँ और आँसू हमारे हथियार हैं” (अम्ब्रोस, उपदेश: गिरजाघर सौंपने के विषय में)। आइए इस पवित्र जन के अनोखे संयम को देखें, उसमें विवेक, उदारचित्तता और साहस का मेल। सम्राट की माता जस्टीना, उसे आरियस के पक्ष में न ला सकने के कारण, उसे कलीसिया के संचालन से निकालना चाहती थी। और यही होता यदि वह बुलाए जाने पर अपना पक्ष रखने राजमहल चला जाता। इसलिए वह दृढ़ता से कहता है कि सम्राट ऐसे विवाद का निर्णय करने के योग्य नहीं है। यह उस समय की आवश्यकता और बात का स्वभाव, दोनों ही माँगते थे। उसने सोचा कि ऐसा उदाहरण आनेवाली पीढ़ियों को सौंपने की सहमति देने से उसका मर जाना अच्छा है; फिर भी यदि हिंसा की जाए तो वह विरोध करने का विचार नहीं करता। क्योंकि वह कहता है कि विश्वास और कलीसिया के अधिकारों की रक्षा शस्त्रों से करना अध्यक्ष का काम नहीं। परन्तु अन्य सब मामलों में वह घोषणा करता है कि सम्राट जो भी आज्ञा दे उसे करने को वह तैयार है। “यदि वह कर माँगे तो हम इनकार नहीं करते: कलीसिया की भूमि कर देती है। यदि वह भूमि माँगे तो उसे बेदखल करने का अधिकार है; हम में से कोई बीच में नहीं पड़ता।” ग्रेगोरी भी इसी प्रकार बोलता है। “मैं अपने परम शान्त प्रभु के मन से अनजान नहीं हूँ: वह याजकीय मामलों में हस्तक्षेप करने का अभ्यस्त नहीं, ऐसा न हो कि किसी मात्रा में हमारे पापों का बोझ अपने ऊपर ले ले।” वह सम्राट को याजकों का न्याय करने से सामान्य रूप में नहीं रोकता, परन्तु कहता है कि कुछ मामले हैं जिन्हें उसे कलीसियाई न्यायालय पर छोड़ देना चाहिए।

16. और इसलिए इन पवित्र जनों ने इस अपवाद के द्वारा जो कुछ चाहा वह केवल यह था कि अधर्मी हाकिम अपनी अत्याचारी सनक और हिंसा से कलीसिया को उसके कर्तव्य के निर्वाह में बाधा न डालें। जब हाकिम कलीसियाई मामलों में अपना अधिकार चलाते थे तब वे इसे अस्वीकार नहीं करते थे, बशर्ते यह कलीसिया की व्यवस्था को बनाए रखने के लिए हो, बिगाड़ने के लिए नहीं, अनुशासन को स्थापित करने के लिए हो, नष्ट करने के लिए नहीं। क्योंकि चूँकि कलीसिया के पास बलपूर्वक दबाने की शक्ति नहीं है, और न उसे उसकी इच्छा करनी चाहिए (मैं नागरिक बल-प्रयोग की बात करता हूँ), इसलिए भक्त राजाओं और हाकिमों का काम है कि व्यवस्थाओं, आदेशों और निर्णयों के द्वारा धर्म को बनाए रखें। इसी प्रकार, जब सम्राट मौरिस ने कुछ अध्यक्षों को आज्ञा दी कि बर्बरों द्वारा निकाले गए अपने पड़ोसी सहकर्मियों को ग्रहण करें, तो ग्रेगोरी ने उस आज्ञा की पुष्टि की और उन्हें मानने का आग्रह किया।590 जब उसी सम्राट ने उसे चेतावनी दी कि कुस्तुनतुनिया के अध्यक्ष यूहन्ना के साथ अच्छी समझ पर लौट आए, तब उसने स्वयं यह दिखाने का प्रयत्न किया कि वह दोषी नहीं है; परन्तु सांसारिक न्यायालय से छूट की डींग मारने के बजाय, उसने वचन दिया कि जहाँ तक विवेक अनुमति दे वह मान लेगा: साथ ही वह कहता है कि मौरिस ने याजकों को ये आज्ञाएँ देकर एक धार्मिक शासक के योग्य कार्य किया था।

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