पुस्तक IV · अध्याय 18

पोप-सम्बन्धी मिस्सा। वह प्रभु-भोज को केवल अपवित्र ही नहीं करता, वरन् उसे मिटा देता है

Institutes of the Christian Religion · John Calvin

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पोप-सम्बन्धी मिस्सा। वह प्रभु-भोज को केवल अपवित्र ही नहीं करता, वरन् उसे मिटा देता है

अध्याय 18।653

पोप-सम्बन्धी मिस्सा। वह प्रभु-भोज को केवल अपवित्र ही नहीं करता, वरन् उसे मिटा देता है।

इस अध्याय के प्रधान भाग ये हैं।—I. मिस्सा की घृणित बात, खण्ड 1। उसकी बहुविध अभक्ति, जो पाँच शीर्षकों के अन्तर्गत आती है, खण्ड 2-7। उसके मूल का वर्णन, खण्ड 8, 9। II. उस बलिदान के नाम के विषय में जो प्राचीन लोगों ने पवित्र भोज को दिया, खण्ड 10-12। बलिदान पर एक उपयुक्त विवेचन, जिसमें मिस्सा के बलिदान के लिए पोप के अनुयायियों के तर्कों का खण्डन किया गया है, खण्ड 13-18। III. संस्कारों के विषय में मसीही कलीसिया की शिक्षा का सार, जो आगे के पाँच झूठे नामवाले संस्कारों की चर्चा का मार्ग तैयार करता है, खण्ड 19, 20।

खण्ड।

1. प्रभु-भोज के विरोध में खड़ी की गई सब घृणित बातों में सबसे बड़ी पोप का मिस्सा है। उसका वर्णन।

2. उसकी अभक्ति पाँच प्रकार की है। 1. उस एकमात्र याजक के स्थान पर याजकों को बैठाने की उसकी असह्य निन्दा। पोप के अनुयायियों की आपत्तियों का उत्तर।

3. मिस्सा की अभक्ति जारी। 2. वह वेदी खड़ी करके मसीह के क्रूस को उलट देता है। आपत्तियों का उत्तर।

4. अन्य आपत्तियों का उत्तर।

5. मिस्सा की अभक्ति जारी। 3. वह मसीह की मृत्यु के स्मरण को निकाल बाहर करता है। वह मसीह को फिर से क्रूस पर चढ़ाता है। आपत्तियों का उत्तर।

6. मिस्सा की अभक्ति जारी। 4. वह हमें मसीह की मृत्यु के लाभ से वंचित करता है।

7. मिस्सा की अभक्ति जारी। 5. वह प्रभु-भोज को मिटा देता है। प्रभु-भोज में पिता मसीह को हमें देता है; मिस्सा में छोटे-मोटे याजक मसीह को पिता के सामने चढ़ाते हैं। प्रभु-भोज सब मसीहियों का साझा संस्कार है; मिस्सा एक ही याजक तक सीमित है।

8. मिस्सा का मूल। निजी मिस्साएँ प्रभु-भोज का अभक्तिपूर्ण अपवित्रीकरण हैं।

9. यह घृणित बात शुद्धतर कलीसिया को अज्ञात थी। परमेश्वर के वचन में उसकी कोई नींव नहीं।

10. अध्याय का दूसरा भाग। प्राचीन लोगों में से कुछ प्रभु-भोज को बलिदान कहते हैं, परन्तु प्रायश्चित का बलिदान नहीं, जैसा पोप के अनुयायी मिस्सा को कहते हैं। यह अगस्तीन के अंशों से प्रमाणित किया गया।

11. ऐसा प्रतीत होता है कि प्राचीन लोगों में से कुछ व्यवस्था की छायाओं की ओर बहुत झुक गए।

12. मूसा के बलिदानों और प्रभु-भोज में, जिसे धन्यवाद का बलिदान कहा जाता है, बड़ा भेद करना चाहिए। इस विवेचन में भी वही नियम।

13. बलिदान और याजक शब्द। बलिदानों के भिन्न-भिन्न प्रकार। 1. प्रायश्चित का। 2. धन्यवाद का। मसीह की मृत्यु को छोड़ कोई प्रायश्चित का बलिदान नहीं।

14. प्रभु-भोज को ठीक अर्थ में प्रायश्चित का बलिदान नहीं कहा जा सकता, और पोप के मिस्सा को तो और भी नहीं। जो लोग मिस्सा बुदबुदाते हैं उन्हें याजक नहीं कहा जा सकता।

15. उनकी व्यर्थता प्लेटो से भी प्रमाणित होती है।

16. धन्यवाद के बलिदान के वर्ग में भक्ति और दया के सब कार्य आते हैं। इस प्रकार के बलिदान का परमेश्वर को शान्त करने से कोई सम्बन्ध नहीं।

17. प्रार्थना, धन्यवाद और भक्ति के अन्य अभ्यास बलिदान कहलाते हैं। इसी अर्थ में प्रभु-भोज को यूकैरिस्ट कहा जाता है। इसी अर्थ में सब विश्वासी याजक हैं।

18. निष्कर्ष। मिस्सा को दिए गए नाम।

19. अध्याय का अन्तिम भाग, जिसमें बपतिस्मा और प्रभु-भोज के विषय में जो मत रखने चाहिए उनका सार दिया गया है। प्रभु-भोज क्यों दोहराया जाता है और बपतिस्मा क्यों नहीं।

20. मसीहियों को इन दो संस्कारों से सन्तुष्ट रहना चाहिए। मनुष्यों द्वारा ठहराए गए संस्कारों से ये दोनों मिट जाते हैं।

653 देखिए, Calv. Ep. de Fugiend. Illic. Sacris. और, De Sacerdotiis Eccles. Papal. और, De Necessitate Reform. Eccles. और, Epist. ad Sadoletum।

1. इन तथा इन जैसी कल्पनाओं के द्वारा शैतान ने मसीह के पवित्र भोज को मानो घने अन्धकार में लपेटकर बिगाड़ने का प्रयत्न किया है, ताकि कलीसिया में उसकी शुद्धता बनी न रह सके। परन्तु इस घृणित वस्तु का शिखर तब खड़ा हुआ जब उसने ऐसा चिह्न उठाया जिससे प्रभु-भोज केवल धुँधला और विकृत ही नहीं हुआ, वरन् पूरी तरह मिटा और रद्द कर दिया गया, और मनुष्यों की स्मृति से लुप्त हो गया—अर्थात् जब उसने अत्यन्त घातक भूल से लगभग सारे संसार को अन्धा करके यह विश्वास करा दिया कि मिस्सा पापों की क्षमा पाने के लिए बलिदान और चढ़ावा है। विद्वत्तावादियों में जो अधिक संयत थे, उन्होंने आरम्भ में इस सिद्धान्त को किस रीति से ग्रहण किया, इस विषय में मैं कुछ नहीं कहता।654 उन्हें मैं उनकी उलझाऊ सूक्ष्मताओं के साथ छोड़ता हूँ, जिनका बचाव चाहे कुतर्क से किया जाए, तौभी सब भले लोगों को उन्हें ठुकरा देना चाहिए, क्योंकि वे केवल इतना करती हैं कि प्रभु-भोज की ज्योति को गहरे अन्धकार में लपेट देती हैं। इसलिए उन्हें विदा करके मेरे पाठक यह समझ लें कि मैं यहाँ उस मत से लड़ रहा हूँ जिससे रोमी मसीह-विरोधी और उसके भविष्यद्वक्ताओं ने सारे संसार को भर दिया है—अर्थात् यह कि मिस्सा ऐसा कर्म है जिसके द्वारा मसीह को चढ़ानेवाला याजक, और वे दूसरे जो उस चढ़ावे में उसे ग्रहण करते हैं, परमेश्वर के सम्मुख पुण्य अर्जित करते हैं, अथवा यह कि वह प्रायश्चित की ऐसी बलि है जिससे वे परमेश्वर की कृपा फिर पा लेते हैं। और यह केवल साधारण लोगों की सामान्य धारणा ही नहीं है, वरन् क्रिया ही इस प्रकार रची गई है कि वह एक प्रकार का प्रायश्चित हो, जिसके द्वारा जीवितों और मृतकों के लिए परमेश्वर को सन्तुष्टि दी जाती है। प्रयुक्त शब्दों से भी यही प्रकट होता है, और नित्य के व्यवहार से भी यही निष्कर्ष निकलता है। मैं जानता हूँ कि इस महामारी ने कितनी गहरी जड़ें जमा ली हैं; यह भलाई के कैसे रूप में अपना सच्चा स्वभाव छिपाती है, मसीह का नाम अपने आगे धारण करती है, और बहुतों को यह विश्वास दिलाती है कि अकेले मिस्सा नाम में सारे विश्वास का सार समाया हुआ है। परन्तु जब परमेश्वर के वचन से अत्यन्त स्पष्टता से सिद्ध हो जाएगा कि यह मिस्सा, चाहे कितना ही सजा-धजा और भव्य हो, मसीह का घोर अपमान करता है, उसके क्रूस को दबाता और गाड़ देता है, उसकी मृत्यु को विस्मृति के हवाले कर देता है, उस लाभ को छीन लेता है जिसे पहुँचाने के लिए वह ठहराया गया था, उस संस्कार को निर्बल करके बिखेर देता है जिसके द्वारा उसकी मृत्यु का स्मरण बना रहता था—तब क्या इसकी जड़ें इतनी गहरी रहेंगी कि परमेश्वर के वचन की यह परम शक्तिशाली कुल्हाड़ी उन्हें काटकर नष्ट न कर सके? क्या कोई रूप इतना मोहक होगा कि यह ज्योति छिपी हुई बुराई को प्रकट न कर दे?

2. इसलिए, जैसा पहले प्रस्तावित था, आइए हम दिखाएँ कि मिस्सा में मसीह के प्रति असह्य निन्दा और अपमान किया जाता है। क्योंकि पिता ने उसे केवल एक समय के लिए याजक और महायाजक नहीं ठहराया,655 जैसे पुराने नियम में याजक ठहराए जाते थे। उनका जीवन नश्वर था, इसलिए उनका याजकपद अमर नहीं हो सकता था, और इसी कारण उत्तराधिकारियों की आवश्यकता थी, जो समय-समय पर मरे हुओं के स्थान पर रखे जाएँ। परन्तु मसीह अमर होने के कारण उसके स्थान पर किसी प्रतिनिधि को रखने की तनिक भी आवश्यकता न थी। इसलिए उसके पिता ने उसे मलिकिसिदक की रीति पर सर्वदा के लिए याजक ठहराया, ताकि वह अनन्तकाल तक स्थायी याजकपद का निर्वाह करे। इस भेद का पूर्वचित्रण बहुत पहले मलिकिसिदक में हो चुका था, जिसे पवित्रशास्त्र ने एक बार जीवित परमेश्वर के याजक के रूप में प्रस्तुत करके फिर कभी उसका उल्लेख नहीं किया, मानो उसके जीवन का कोई अन्त ही न था। इस प्रकार मसीह के विषय में कहा जाता है कि वह उसकी रीति पर याजक है। परन्तु जो प्रतिदिन बलि चढ़ाते हैं, उन्हें अपनी भेंटों का भार अवश्य ही

654 फ्रांसीसी में यह जोड़ा गया है, “qui ont parlé un petit plus passablement que leur successeurs qui sont venus depuis”;—अर्थात् जिन्होंने अपने बाद आए उत्तराधिकारियों की अपेक्षा कुछ अधिक सहनीय रीति से बात की।

655 इब्रानियों 5:5-10; 7:17; 21; 9:11; 10:21; भजन संहिता 110:4; उत्पत्ति 14:18। उन याजकों को सौंपना पड़ता है जिन्हें वे मसीह के प्रतिनिधि और उत्तराधिकारी के रूप में उसके स्थान पर रखते हैं। इस प्रतिस्थापन के द्वारा वे न केवल मसीह को उसके सम्मान से वंचित करते और उससे अनन्त याजकपद का अधिकार छीनते हैं, वरन् उसे उसके पिता के दाहिने हाथ से हटाने का प्रयत्न करते हैं, जहाँ वह अनन्त याजक हुए बिना अमर होकर बैठ नहीं सकता। और वे यह भी न कहें कि उनके छोटे-मोटे याजक मसीह के स्थान पर इसलिए नहीं रखे जाते मानो वह मर चुका हो, वरन् केवल उस अनन्त याजकपद में प्रतिनिधि हैं, जो इस कारण समाप्त नहीं होता। प्रेरित के शब्द इतने कठोर हैं कि उन्हें बच निकलने का कोई मार्ग नहीं देते—अर्थात् “वे तो बहुत से याजक बनते आए, इसलिये कि मृत्यु उन्हें रहने नहीं देती; पर यह इसलिये कि वह सर्वदा बना रहता है, उसका याजकपद अटल है” (इब्रानियों 7:23, 24)। तौभी उनकी बेईमानी ऐसी है कि अपनी अभक्ति के बचाव के लिए वे मलिकिसिदक का उदाहरण हथियार बना लेते हैं। क्योंकि कहा गया है कि उसने “रोटी और दाखरस निकाला (obtulisse)” (उत्पत्ति 14:18), वे निष्कर्ष निकालते हैं कि यह उनके मिस्सा की भूमिका थी, मानो रोटी और दाखरस चढ़ाने में उसमें और मसीह में कोई समानता हो। यह इतना मूर्खतापूर्ण और तुच्छ है कि इसके खण्डन की आवश्यकता नहीं। मलिकिसिदक ने अब्राहम और उसके साथियों को रोटी और दाखरस इसलिए दिया कि कूच और युद्ध से थके हुए उन लोगों को ताज़ा करे। इसका बलिदान से क्या सम्बन्ध? मूसा उस पवित्र राजा की मानवता की प्रशंसा करता है; ये लोग बेतुके ढंग से ऐसा भेद गढ़ते हैं जिसका कोई उल्लेख नहीं। फिर भी वे अपनी भूल पर एक और मुलम्मा चढ़ाते हैं, क्योंकि तुरन्त जोड़ा गया है कि वह “परमप्रधान परमेश्वर का याजक” था। मैं उत्तर देता हूँ कि जो बात प्रेरित आशीष के विषय में कहता है, उसे वे भूल से रोटी और दाखरस की ओर खींच ले जाते हैं। “यह मलिकिसिदक, शालेम का राजा, परमप्रधान परमेश्वर का याजक, जिसने अब्राहम से भेंट की,” “और उसे आशीष दी।” इसी से वही प्रेरित (और इससे उत्तम व्याख्याता चाहा भी नहीं जा सकता) उसकी श्रेष्ठता का निष्कर्ष निकालता है। “निर्विवाद है कि छोटा बड़े से आशीष पाता है।” परन्तु यदि मलिकिसिदक का चढ़ावा मिस्सा के बलिदान का चित्र था, तो मैं पूछता हूँ, क्या वह प्रेरित, जो छोटी से छोटी बातों में जाता है, इतनी गम्भीर और महत्त्वपूर्ण बात को भूल जाता? अब वे चाहे जितनी कुतर्क करें, उस तर्क को नष्ट करने का उनका प्रयत्न व्यर्थ है जो स्वयं प्रेरित ने दिया है—अर्थात् यह कि याजकपद का अधिकार और सम्मान नश्वर मनुष्यों में समाप्त हो गया है, क्योंकि अमर मसीह ही एकमात्र सदा बना रहनेवाला याजक है।

3. मिस्सा पर लगनेवाला एक और अधर्म यह है कि वह मसीह के क्रूस और दुःखभोग को डुबोकर गाड़ देता है। यह तो अत्यन्त निश्चित है—जिस क्षण वेदी खड़ी की जाती है, उसी क्षण मसीह का क्रूस उलट दिया जाता है। क्योंकि यदि उसने क्रूस पर अपने आप को बलिदान चढ़ाया कि हमें सर्वदा के लिए पवित्र करे और हमारे लिए अनन्त छुटकारा मोल ले,656 तो निःसन्देह उसके बलिदान की शक्ति और प्रभाव बिना अन्त के बना रहता है। नहीं तो हमें मसीह के विषय में उन बैलों और बछड़ों से अधिक ऊँचा विचार नहीं रखना चाहिए जो व्यवस्था के अधीन चढ़ाए जाते थे, जिनकी भेंट बार-बार चढ़ाए जाने के कारण निर्बल और निष्फल प्रमाणित होती है। इसलिए यह मानना पड़ेगा कि या तो जो बलिदान मसीह ने क्रूस पर चढ़ाया उसमें अनन्त शुद्धि की शक्ति न थी, या उसने अपने उस एक ही बलिदान से यह सदा के लिए एक बार में पूरा कर दिया। इसी कारण प्रेरित कहता है, “अब युग के अन्त में एक बार प्रगट हुआ ताकि अपने ही बलिदान के द्वारा पाप को दूर कर दे।” फिर: “उसी इच्छा से हम यीशु मसीह की देह के एक ही बार बलिदान चढ़ाए जाने के द्वारा पवित्र किए गए हैं।” फिर: “क्योंकि उसने एक ही चढ़ावे के द्वारा उन्हें जो पवित्र किए जाते हैं, सर्वदा के लिये सिद्ध कर दिया है।” इसके साथ वह वह प्रसिद्ध अंश जोड़ता है:

656 इब्रानियों 9:11, 12, 26; 10:10, 14, 16।

“और जहाँ इन की क्षमा है, वहाँ पाप का फिर कोई बलिदान नहीं।” यही बात मसीह ने अपने अन्तिम वचन से जताई, जब प्राण त्यागते समय उसने पुकारा, “पूरा हुआ।” हम मरते हुए लोगों के अन्तिम शब्दों को भविष्यवाणी के समान मानने के अभ्यस्त हैं। मसीह मरते समय घोषणा करता है कि हमारे उद्धार के लिए जो कुछ आवश्यक था वह उसके एक ही बलिदान से सिद्ध और पूरा हो गया। जिस बलिदान की सिद्धता को उसने इतने स्पष्ट रूप से घोषित किया, क्या हम उसे मानो अधूरा समझकर प्रतिदिन उसमें असंख्य बलिदान जोड़ देने का साहस करेंगे? जब परमेश्वर का पवित्र वचन न केवल कहता है, वरन् घोषणा और गवाही देता है कि यह बलिदान एक बार पूरा हो चुका और सदा के लिए प्रभावशाली रहता है, तो क्या जो दूसरा माँगते हैं वे उस पर अधूरेपन और निर्बलता का आरोप नहीं लगाते? परन्तु जो मिस्सा ठहराया गया है कि प्रतिदिन एक लाख बलिदान किए जाएँ, उसका लक्ष्य हमारे प्रभु के उस दुःखभोग को गाड़ने और दबाने के सिवा और क्या है जिसमें उसने अपने आप को एकमात्र बलि करके अपने पिता को चढ़ाया? अन्धे के सिवा कौन नहीं देखता कि इतने स्पष्ट और पारदर्शी सत्य का विरोध करना शैतानी ढिठाई है? मैं उन छलों से अनजान नहीं हूँ जिनसे झूठ का पिता अपने धोखे को ढाँकता है—अर्थात् यह कि बलिदान भिन्न या अनेक नहीं हैं, परन्तु वही एक बलिदान दोहराया जाता है। ऐसा धुआँ आसानी से छँट जाता है। प्रेरित अपने सारे वर्णन में न केवल यह तर्क देता है कि कोई और बलिदान नहीं हैं, वरन् यह भी कि वह एक ही बार चढ़ाया गया, और अब दोहराया नहीं जाना है। जो अधिक चतुर हैं वे और भी तंग छेद से निकल भागने का यत्न करते हैं—अर्थात् यह कि यह दोहराना नहीं, परन्तु लागू करना है। परन्तु इस कुतर्क का खण्डन करना भी उतना ही सरल है। क्योंकि मसीह ने अपने आप को एक बार इस दृष्टि से नहीं चढ़ाया कि उसके बलिदान की प्रतिदिन नई भेंटों से पुष्टि की जाए, वरन् इस दृष्टि से कि सुसमाचार के प्रचार और पवित्र भोज के वितरण के द्वारा उसका लाभ हमें पहुँचाया जाए। इसलिए पौलुस कहता है कि “हमारा भी फसह जो मसीह है, बलिदान हुआ है,” और हमें “उत्सव मनाने” को कहता है (1 कुरिन्थियों 5:7, 8)। मैं कहता हूँ, मसीह का क्रूस हम पर उचित रीति से तब लागू होता है जब उसका आनन्द हमें पहुँचाया जाता है और हम उसे सच्चे विश्वास से ग्रहण करते हैं।

4. परन्तु यह सुनना उचित है कि इसके अतिरिक्त वे मिस्सा के अपने बलिदान की और कौन-सी नींव खड़ी करते हैं। इसके लिए वे मलाकी की भविष्यद्वाणी घसीट लाते हैं, जिसमें प्रभु प्रतिज्ञा करता है कि “हर कहीं मेरे नाम पर धूप और शुद्ध भेंट चढ़ाई जाएगी” (मलाकी 1:11)। मानो भविष्यद्वक्ताओं के लिए यह कोई नई या अनोखी बात हो कि जब वे अन्यजातियों की बुलाहट की चर्चा करते हैं, तब परमेश्वर की उस आत्मिक आराधना को जिसके लिए वे उन्हें बुलाते हैं, व्यवस्था की बाहरी विधियों से बताते हैं, ताकि अपने समय के लोगों को अधिक परिचित रीति से जताएँ कि उन्हें धर्म की सच्ची सहभागिता में बुलाया जाना है, ठीक वैसे ही जैसे वे सामान्यतः सुसमाचार के द्वारा प्रकट सत्य को अपने समय के प्रतीकों से वर्णन करते हैं। इस प्रकार वे प्रभु की ओर फिरने के लिए यरूशलेम को चढ़ जाने की, परमेश्वर की आराधना के लिए सब प्रकार की भेंटें लाने की, और उस अधिक पूर्ण ज्ञान के लिए स्वप्नों और दर्शनों की बात करते हैं जिससे विश्वासी मसीह के राज्य में भरपूर किए जाने को थे। जो अंश वे मलाकी से उद्धृत करते हैं, वह यशायाह के उस अंश के समान है जिसमें भविष्यद्वक्ता अश्शूर, मिस्र और यहूदिया में तीन वेदियाँ खड़ी किए जाने की बात कहता है। पहले मैं पूछता हूँ कि क्या वे मानते हैं या नहीं कि यह भविष्यद्वाणी मसीह के राज्य में पूरी होती है? दूसरे, वे वेदियाँ कहाँ हैं, या वे कब खड़ी की गईं? तीसरे, क्या वे समझते हैं कि एक राज्य के लिए एक ही मन्दिर ठहराया गया है, जैसा यरूशलेम का था? यदि वे इन बातों पर विचार करें तो, मेरे विचार में, मान लेंगे कि भविष्यद्वक्ता ने अपने समय के अनुकूल प्रतीकों में सारे संसार में परमेश्वर की आत्मिक आराधना के फैलने की भविष्यद्वाणी की। यह वह उत्तर है जो हम उन्हें देते हैं; परन्तु पवित्रशास्त्र में जगह-जगह स्पष्ट उदाहरण मिलते हैं, इसलिए मैं उनकी और लम्बी गिनती देने को उत्सुक नहीं हूँ; यद्यपि वे इसमें भी बुरी तरह भ्रम में पड़े हैं कि वे मिस्सा के बलिदान के सिवा और कोई बलिदान नहीं मानते, जबकि सच्चाई यह है कि विश्वासी अब परमेश्वर को बलिदान चढ़ाते और उसे शुद्ध भेंट अर्पित करते हैं, जिसकी चर्चा हम आगे करेंगे।

5. अब मैं मिस्सा के तीसरे भाग पर आता हूँ, जिसके विषय में हमें समझाना है कि वह मसीह की सच्ची और एकमात्र मृत्यु को कैसे मिटा देता है और मनुष्यों की स्मृति से निकाल देता है। क्योंकि जैसे मनुष्यों में वसीयतनामे की पुष्टि वसीयत करनेवाले की मृत्यु पर निर्भर होती है, वैसे ही जिस वसीयतनामे से उसने हमें पापों की क्षमा और अनन्त धार्मिकता दी, उसकी पुष्टि हमारे प्रभु ने अपनी मृत्यु से की है। जो इस वसीयतनामे में कोई परिवर्तन या नवीनता लाने का साहस करते हैं, वे उसकी मृत्यु का इनकार करते हैं और उसे तुच्छ मानते हैं। अब मिस्सा एक नए और सर्वथा भिन्न वसीयतनामे के सिवा और क्या है? क्या? क्या हर मिस्सा पापों की नई क्षमा और धार्मिकता की नई प्राप्ति की प्रतिज्ञा नहीं करता, ताकि अब जितने मिस्सा हैं उतने ही वसीयतनामे हों? तो फिर मसीह फिर आए, और दूसरी मृत्यु के द्वारा इस नए वसीयतनामे को स्थापित करे; या यों कहें, असंख्य मृत्युओं के द्वारा मिस्सा के असंख्य वसीयतनामों की पुष्टि करे। तो क्या मैंने आरम्भ में सच नहीं कहा था कि मसीह की एकमात्र सच्ची मृत्यु मिस्सा के द्वारा मिटाई जाती है? क्योंकि मिस्सा का सीधा लक्ष्य, यदि सम्भव होता, मसीह को फिर से मार डालने के सिवा और क्या है? क्योंकि प्रेरित कहता है, “क्योंकि जहाँ वसीयतनामा है वहाँ वसीयत करनेवाले की मृत्यु का समझ लेना भी आवश्यक है” (इब्रानियों 9:16)। मिस्सा की नवीनता स्वयं यह प्रकट करती है कि वह मसीह का एक वसीयतनामा है, और इसलिए उसकी मृत्यु की माँग करता है। इसके अतिरिक्त, यह आवश्यक है कि जो बलि चढ़ाई जाए वह मारी और होम की जाए। यदि हर मिस्सा में मसीह बलिदान किया जाता है, तो उसे हर क्षण हज़ार स्थानों में निर्दयता से मारा जाना चाहिए। यह मेरा तर्क नहीं, प्रेरित का है: “यह नहीं कि वह अपने आप को बार बार भेंट चढ़ाए;” “नहीं तो जगत की उत्पत्ति से लेकर उसको बार बार दुःख उठाना पड़ता” (इब्रानियों 9:25, 26)। मैं मानता हूँ कि उनके पास उत्तर तैयार है, जिससे वे हम पर निन्दा का भी आरोप लगाते हैं; क्योंकि वे कहते हैं कि हम उन पर वह दोष लगाते हैं जो उन्होंने कभी सोचा नहीं और सोच भी नहीं सकते थे। हम जानते हैं कि मसीह का जीवन और मृत्यु बिलकुल उनके हाथ में नहीं हैं। वे उसे मारना चाहते हैं या नहीं, इसकी हमें चिन्ता नहीं: हमारा उद्देश्य केवल उस बेतुकेपन को दिखाना है जो उनके अभक्त और शापित सिद्धान्त से निकलता है। यह मैं प्रेरित के मुख से प्रमाणित करता हूँ। वे सौ बार जोर दें कि यह बलिदान रक्तहीन है, तो भी मैं उत्तर दूँगा कि बलिदान के स्वभाव को बदलना मनुष्य की इच्छा पर निर्भर नहीं, क्योंकि ऐसा करने से परमेश्वर की पवित्र और अटल विधि गिर जाएगी। इसलिए यह निष्कर्ष निकलता है कि प्रेरित का सिद्धान्त दृढ़ खड़ा है, “बिना लहू बहाए क्षमा नहीं होती” (इब्रानियों 9:22)।

6. मिस्सा का चौथा गुण, जिस पर हमें विचार करना है, यह है कि वह हमें उस लाभ से वंचित करता है जो मसीह की मृत्यु से हमें मिला, क्योंकि वह हमें उसे पहचानने और उसका विचार करने से रोकता है। क्योंकि जब कोई मिस्सा में एक नया छुटकारा देखता है, तो कौन सोच सकता है कि वह मसीह की मृत्यु से छुड़ाया गया है? जब कोई नई क्षमा देखता है, तो कौन विश्वास कर सकता है कि उसके पाप क्षमा हो गए हैं? यह कहने से काम नहीं चलेगा कि मिस्सा में पापों की क्षमा हमें केवल इसलिए मिलती है कि वह पहले ही मसीह की मृत्यु से मोल ली जा चुकी है। क्योंकि यह तो यह कहने के बराबर है कि हम मसीह के द्वारा इस शर्त पर छुड़ाए गए हैं कि हम अपने आप को छुड़ाएँ। क्योंकि शैतान के सेवकों द्वारा फैलाया जानेवाला सिद्धान्त, और जिसका वे आज शोर, आग और तलवार से बचाव करते हैं, यह है कि जब हम मिस्सा में मसीह को पिता के सामने चढ़ाते हैं, तब चढ़ावे के इस कर्म से हम पापों की क्षमा पाते हैं और मसीह के दुःखों के सहभागी बनते हैं। तब मसीह के दुःखों के लिए इसके सिवा क्या बचा कि वे छुटकारे का एक उदाहरण हों, ताकि उससे हम अपने ही छुड़ानेवाले बनना सीखें? स्वयं मसीह, जब वह प्रभु-भोज में हमारे क्षमा के निश्चय पर मुहर लगाता है, अपने चेलों से उसी कर्म पर रुक जाने को नहीं कहता, वरन् उन्हें अपनी मृत्यु के बलिदान की ओर भेजता है; यह जताते हुए कि प्रभु-भोज वह स्मारक है, या जैसा सामान्यतः कहा जाता है, स्मरण-चिह्न है, जिससे वे सीख सकें कि जिस प्रायश्चित की बलि से परमेश्वर को शान्त होना था वह केवल एक ही बार चढ़ाई जानी थी। क्योंकि इतना मान लेना पर्याप्त नहीं कि मसीह ही एकमात्र बलि है, यह भी जोड़ना आवश्यक है कि उसी की एकमात्र आहुति है, ताकि हमारा विश्वास उसके क्रूस से बँधा रहे।

7. अब मैं चरम बिन्दु पर आता हूँ—अर्थात् यह कि वह पवित्र भोज, जिस पर प्रभु ने अपने दुःखभोग का स्मारक रचकर अंकित छोड़ा था, मिस्सा के खड़े होते ही हटा दिया गया, छिपा दिया गया और नष्ट कर दिया गया। जबकि प्रभु-भोज स्वयं परमेश्वर का दान है, जिसे धन्यवाद के साथ ग्रहण करना था, मिस्सा का बलिदान परमेश्वर को मूल्य देने का ढोंग करता है कि वह सन्तुष्टि के रूप में ग्रहण किया जाए। जितना देने और पाने में अन्तर है, उतना ही बलिदान और प्रभु-भोज के संस्कार में अन्तर है।

परन्तु यहीं मनुष्य की दयनीय कृतघ्नता प्रकट होती है,—कि जब परमेश्वर की भलाई की उदारता को पहचानना और धन्यवाद देना चाहिए था, तब वह परमेश्वर को अपना देनदार बना देता है। संस्कार ने प्रतिज्ञा की कि मसीह की मृत्यु के द्वारा हम केवल एक बार जीवन में नहीं लौटाए गए, वरन् निरन्तर जिलाए जाते हैं, क्योंकि हमारे उद्धार के सब अंश तब पूरे हो चुके। मिस्सा का बलिदान बहुत भिन्न भाषा बोलता है—अर्थात् यह कि मसीह को प्रतिदिन बलिदान किया जाना चाहिए, ताकि वह हमें कुछ उधार दे। प्रभु-भोज कलीसिया की सार्वजनिक सभा में बाँटा जाना था, ताकि हमें उस सहभागिता का स्मरण कराए जिससे हम सब मसीह यीशु में एक किए गए हैं। इस सहभागिता को मिस्सा का बलिदान भंग करके फाड़ डालता है। क्योंकि जब यह झूठी शिक्षा प्रबल हुई कि लोगों के लिए बलिदान चढ़ाने को याजक होने चाहिए, मानो प्रभु-भोज उन्हीं को सौंप दिया गया हो, तब प्रभु की आज्ञा के अनुसार वह विश्वासियों की सभा में बाँटा जाना बन्द हो गया। निजी मिस्साओं ने प्रवेश पाया, जो प्रभु की ठहराई हुई उस सहभागिता की अपेक्षा एक प्रकार के बहिष्कार से अधिक मिलती-जुलती हैं, जब वह छोटा-सा याजक, अपनी बलि को अलग बैठकर निगलने को, अपने आप को विश्वासियों की सारी देह से अलग कर लेता है। कोई भूल न हो, इसलिए मैं उसे निजी मिस्सा कहता हूँ जब भी विश्वासियों के बीच प्रभु-भोज की सहभागिता नहीं होती, चाहे उसी समय लोगों की बड़ी भीड़ उपस्थित क्यों न हो।

8. मिस्सा नाम का मूल मैं कभी निश्चित रूप से जान नहीं पाया। सम्भव प्रतीत होता है कि वह उन भेंटों से निकला जो इकट्ठी की जाती थीं। इसी से प्राचीन लोग उसे प्रायः बहुवचन में कहते हैं। परन्तु नाम के विषय में कोई विवाद उठाए बिना, मेरा मत है कि निजी मिस्साएँ मसीह की विधि के सर्वथा विपरीत हैं, और इसलिए पवित्र भोज का अभक्तिपूर्ण अपवित्रीकरण हैं। क्योंकि प्रभु ने क्या आज्ञा दी थी? क्या यह नहीं कि लो और आपस में बाँट लो? इस आज्ञा के पालन के विषय में पौलुस क्या सिखाता है? क्या यह नहीं कि रोटी का तोड़ना देह और लहू की सहभागिता है? (1 कुरिन्थियों 10:16)। इसलिए जब कोई बिना बाँटे ले लेता है, तो समानता कहाँ रही? परन्तु वह एक पूरी कलीसिया के नाम पर करता है। किस आज्ञा से? क्या यह खुलेआम परमेश्वर का उपहास करना नहीं कि जो बहुतों में बाँटा जाना चाहिए था, उसे कोई अकेले अपने लिए छीन ले? परन्तु जब हमारे उद्धारकर्ता और पौलुस, दोनों के शब्द पर्याप्त स्पष्ट हैं, तो हमें संक्षेप में यह निष्कर्ष निकालना चाहिए कि जहाँ विश्वासियों की सहभागिता के लिए रोटी का तोड़ना नहीं, वहाँ प्रभु का भोज नहीं, वरन् भोज की झूठी और उलटी नकल है।

परन्तु झूठी नकल मिलावट है। फिर इस ऊँची विधि की मिलावट अभक्ति से रहित नहीं। इसलिए निजी मिस्साओं में अभक्तिपूर्ण दुरुपयोग है: और जैसे धर्म में एक दोष बार-बार दूसरे को जन्म देता है, वैसे ही जब बिना सहभागिता के चढ़ाने की प्रथा घुस आई, तो वे धीरे-धीरे कलीसियाओं के अलग-अलग कोनों में असंख्य मिस्साएँ करने लगे, और लोगों को इधर-उधर खींचने लगे, जब उन्हें एक सभा बनकर अपनी एकता के भेद को पहचानना चाहिए था। अब वे जाकर अपनी मूर्तिपूजा का इनकार करें, जब वे अपनी मिस्साओं में रोटी इसलिए दिखाते हैं कि मसीह के स्थान पर उसकी आराधना की जाए। मसीह की उपस्थिति की उन प्रतिज्ञाओं की वे व्यर्थ चर्चा करते हैं, जो, उन्हें चाहे जैसे समझा जाए, निश्चय ही इसलिए नहीं दी गई थीं कि अशुद्ध और अपवित्र मनुष्य जितनी बार चाहें और जिस दुरुपयोग के लिए चाहें, मसीह की देह बना लें; वरन् इसलिए कि विश्वासी, भक्ति के साथ प्रभु-भोज मनाने में मसीह की आज्ञा का पालन करते हुए, उसकी सच्ची सहभागिता का आनन्द उठाएँ।

9. हम यह भी जोड़ सकते हैं कि यह उलटी रीति शुद्धतर कलीसिया को अज्ञात थी। क्योंकि हमारे विरोधियों में जो अधिक निर्लज्ज हैं वे बात पर चाहे कितना ही मुलम्मा चढ़ाने का यत्न करें, यह बिलकुल निश्चित है कि सारी प्राचीनता उनके विरुद्ध है, जैसा ऊपर अन्य उदाहरणों में दिखाया जा चुका है, और पिताओं को परिश्रम से पढ़ने से और भी निश्चित रूप से जाना जा सकता है।657 परन्तु समाप्त करने से पहले मैं अपने मिस्सा-ग्रन्थों के उन पण्डितों से पूछता हूँ, जब वे जानते हैं कि आज्ञा मानना बलिदान से उत्तम है, और परमेश्वर हमें बलिदान चढ़ाने की अपेक्षा अपनी वाणी सुनने की आज्ञा देता है (1 शमूएल 15:22),—तो वे कैसे विश्वास कर सकते हैं कि बलिदान चढ़ाने की यह रीति परमेश्वर को भाती है, जबकि यह निश्चित है कि वह इसकी आज्ञा नहीं देता, और वे पवित्रशास्त्र के एक अक्षर से भी इसका समर्थन नहीं कर सकते? इसके अतिरिक्त, जब वे प्रेरित को यह घोषणा करते सुनते हैं कि “कोई भी यह आदर का पद अपने आप से नहीं लेता, जब तक कि हारून की नाईं परमेश्वर की ओर से ठहराया न जाए,” वैसे ही मसीह ने भी महायाजक बनने की बड़ाई अपने आप से नहीं ली, पर उसी ने दी जिसने उससे कहा, “तू मेरा पुत्र है, आज मैं ही ने तुझे जन्माया है” (इब्रानियों 5:4, 5)। उन्हें या तो यह सिद्ध करना होगा कि परमेश्वर उनके याजकपद का कर्ता और स्थापक है, या यह मानना होगा कि उस पद में परमेश्वर की ओर से कोई सम्मान नहीं, जिसमें वे बिना बुलाए दुष्ट दुःसाहस से कूद पड़े हैं। वे अपने याजकपद के समर्थन में पवित्रशास्त्र की एक मात्रा भी नहीं दिखा सकते। और क्या बलिदान व्यर्थ न होंगे, जबकि वे बिना याजक के चढ़ाए नहीं जा सकते?

10. यदि कोई यहाँ प्राचीन लोगों के संक्षिप्त वाक्य सामने रखे, और उनके अधिकार के बल पर तर्क करे कि प्रभु-भोज में जो बलिदान किया जाता है उसे उससे भिन्न रूप में समझना चाहिए जैसा हमने समझाया है, तो हमारा संक्षिप्त उत्तर यह हो,—कि यदि प्रश्न बलिदान की उस कल्पना के अनुमोदन का है जैसी पोप के अनुयायियों ने मिस्सा में गढ़ी है, तो पिताओं में ऐसा कुछ नहीं जो उस ईशनिन्दा का समर्थन करे। वे बलिदान शब्द का प्रयोग तो करते हैं, परन्तु साथ ही समझाते हैं कि उनका अभिप्राय केवल उस एक सच्चे बलिदान के स्मरण से है जो मसीह, हमारे एकमात्र बलिदान ने (जैसा वे स्वयं सर्वत्र घोषणा करते हैं) क्रूस पर पूरा किया। अगस्तीन कहता है (Cont. Faust. Lib. 20 c. 18), “इब्रानी लोग पशुओं की उन बलियों में जो वे परमेश्वर को चढ़ाते थे, उस आनेवाली बलि की भविष्यवाणी का उत्सव मनाते थे जो मसीह ने चढ़ाई: मसीही अब पूरे हो चुके बलिदान के स्मरण का उत्सव मनाते हैं, मसीह की देह के पवित्र चढ़ावे और सहभागिता के द्वारा।” यहाँ वह निश्चय ही वही सिद्धान्त सिखाता है जो उपयाजक पतरस को लिखे विश्वास पर ग्रन्थ में, उसका लेखक चाहे जो भी रहा हो, अधिक विस्तार से दिया गया है। शब्द ये हैं, “दृढ़ता से थामे रहो, और तनिक भी सन्देह न करो, कि एकलौता हमारे लिए देहधारी हुआ, कि उसने अपने आप को हमारे लिए परमेश्वर को सुगन्धित भेंट और बलिदान करके चढ़ाया; जिसे पिता और पवित्र आत्मा के साथ, पुराने नियम के समय में पशुओं का बलिदान चढ़ाया जाता था, और जिसे अब पिता और पवित्र आत्मा के साथ (जिनके साथ एक ही ईश्वरत्व है) सारे संसार में पवित्र कलीसिया रोटी और दाखरस का बलिदान चढ़ाना नहीं छोड़ती। क्योंकि उन शारीरिक बलियों में मसीह की उस देह का पूर्वचित्रण था जो वह स्वयं हमारे पापों के लिए चढ़ाने को था, और उस लहू का जो वह पापों की क्षमा के लिए बहाने को था। परन्तु इस बलिदान में मसीह की उस देह का धन्यवाद और स्मरण है जो उसने हमारे लिए चढ़ाई, और उस लहू का जो उसने हमारे लिए बहाया।” इसलिए स्वयं अगस्तीन कई अंशों में (Ep. 120, ad Honorat. Cont. Advers. Legis.) समझाता है कि यह स्तुति के बलिदान के सिवा और कुछ नहीं। संक्षेप में, उसकी रचनाओं में तुम जगह-जगह पाओगे कि प्रभु-भोज को बलिदान कहे जाने का एकमात्र कारण यही है कि वह उस अद्वितीय, सच्चे और एकमात्र बलिदान का स्मरण, प्रतिरूप और साक्षी है जिससे मसीह ने हमारा दोष मिटाया। क्योंकि एक स्मरणीय अंश है (De Trinitate, Lib. 4 c. 24), जहाँ एकमात्र बलिदान की चर्चा करके वह इस प्रकार निष्कर्ष निकालता है: “चूँकि बलिदान में चार बातें देखी जाती हैं—अर्थात् वह किसको चढ़ाया जाता है, किसके द्वारा, क्या, और किनके लिए, वही एक सच्चा मध्यस्थ, मेल-मिलाप के बलिदान के द्वारा हमें परमेश्वर से मिलाता हुआ, उसके साथ एक बना रहा जिसे उसने चढ़ाया, उनके साथ अपने आप को एक किया जिनके लिए उसने चढ़ाया, स्वयं वही है जिसने चढ़ाया, और वही एक वस्तु है जो उसने चढ़ाई।” क्राइसोस्टम भी इसी आशय की बात कहता है। वे याजकपद का सम्मान अकेले मसीह के लिए इतने दृढ़ता से मानते हैं कि अगस्तीन घोषित करता है कि किसी का किसी अध्यक्ष को परमेश्वर और मनुष्य के बीच मध्यस्थ बनाना मसीह-विरोधी के बराबर होगा (August. Cont. Parmen. Lib. 2 c. 8)।658

657 इस वाक्य का फ्रांसीसी रूप यह है, “Car combien que ceux qui sont les plus effrontées entre les Papistes fassent un bouclier des anciens docteurs, abusant faussement de leurs tesmoignages, toutesfois c’est une chose claire comme le soleil en plein midi, que ce qu’ils font est tout contraire a l’usage ancien: et que c’est un abus qui est venu en avant du temps que tout etoit depravé et corrompu en l’Eglise.”—अर्थात् “क्योंकि यद्यपि पोप के अनुयायियों में जो सबसे ढीठ हैं वे प्राचीन शिक्षकों को ढाल बनाते हैं, उनकी गवाही का झूठा दुरुपयोग करते हैं, तौभी यह दोपहर के सूर्य के समान स्पष्ट है कि वे जो करते हैं वह प्राचीन व्यवहार के सर्वथा विपरीत है, और यह ऐसा दुरुपयोग है जो उस समय से ठीक पहले आया जब कलीसिया में सब कुछ बिगड़ और भ्रष्ट हो गया था।”

11. और फिर भी हम इससे इनकार नहीं करते कि प्रभु-भोज में मसीह का बलिदान इतने जीवन्त रूप से प्रदर्शित होता है कि लगभग क्रूस का दृश्य हमारी आँखों के सामने रख देता है, ठीक जैसे प्रेरित गलातियों से कहता है कि यीशु मसीह उनकी आँखों के सामने प्रत्यक्ष रूप से प्रदर्शित किया गया था, जब क्रूस का प्रचार उनके सामने किया गया (गलातियों 3:1)। परन्तु क्योंकि मैं देखता हूँ कि उन प्राचीन लेखकों ने इस स्मरण को ईश्वरीय विधि के अनुकूल उद्देश्य से भिन्न उद्देश्य की ओर मोड़ दिया (उन्हें किसी न किसी रीति से प्रभु-भोज में बार-बार किए गए, या कम से कम नवीकृत, होम का रूप प्रतीत हुआ), भक्तों के लिए इससे सुरक्षित कुछ नहीं कि वे परमेश्वर की शुद्ध और सरल विधि से सन्तुष्ट रहें, जिसका यह भोज कहा गया है, ठीक इसलिए कि उसमें केवल उसी का अधिकार प्रकट होना चाहिए। चूँकि उन्होंने सारी विधि के विषय में भक्तिपूर्ण और सच्चा दृष्टिकोण बनाए रखा—और मुझे ऐसा कुछ नहीं मिलता कि वे प्रभु के एक ही बलिदान की किंचित् भी हानि करना चाहते थे—मैं उन पर किसी अभक्ति का आरोप नहीं लगा सकता, तौभी मेरा विचार है कि कार्य की रीति में उनसे कुछ भूल हुई, इससे वे निर्दोष नहीं ठहराए जा सकते। उन्होंने यहूदी बलिदान-रीति की उतनी निकट नकल की जितनी न मसीह ने ठहराई थी, न सुसमाचार का स्वभाव अनुमति देता था। इसलिए जिस एक बात के लिए उन्हें उचित रूप से दोषी ठहराया जा सकता है वह यही उलटी समानता है कि मसीह की सरल और सच्ची विधि से सन्तुष्ट न होकर वे व्यवस्था की छायाओं की ओर बहुत झुक गए।

12. जो कोई ध्यान से विचार करेगा, वह देखेगा कि प्रभु का वचन मूसा के बलिदानों और हमारे धन्यवाद-भोज में यह भेद करता है—कि यद्यपि पहले यहूदी प्रजा के सामने मसीह की मृत्यु के उसी प्रभाव को दर्शाते थे जो अब हमारे सामने प्रभु-भोज में प्रदर्शित होता है, तौभी दर्शाने का रूप भिन्न था। वहाँ लेवीय याजकों को आज्ञा थी कि उस बलिदान का पूर्वचित्रण करें जो मसीह को पूरा करना था; मसीह के स्थान पर कार्य करने को एक बलि रखी जाती थी; एक वेदी खड़ी की जाती थी जिस पर उसका बलिदान होना था; संक्षेप में सब कुछ इस प्रकार किया जाता था कि परमेश्वर को प्रायश्चित के लिए चढ़ाए जानेवाले बलिदान का चित्र आँखों के सामने आ जाए। परन्तु अब जब बलिदान पूरा हो चुका, प्रभु ने हमारे लिए भिन्न रीति ठहराई है—अर्थात् अपने विश्वासी लोगों को उस बलिदान का लाभ पहुँचाना जो उसके पुत्र ने उसे चढ़ाया। इसलिए प्रभु ने हमें एक मेज़ दी है जिस पर हम भोज कर सकें, वेदी नहीं जिस पर बलि चढ़ाई जाए; उसने बलिदान चढ़ाने के लिए याजक नहीं ठहराए, वरन् पवित्र भोज बाँटने के लिए सेवक। यह भेद जितना उदात्त और पवित्र है, उसे उतनी ही भक्ति और श्रद्धा से बरतना चाहिए। इसलिए इससे सुरक्षित कुछ नहीं कि मानवीय बुद्धि की सारी ढिठाई को निकाल फेंका जाए और केवल वही थामे रहें जो पवित्रशास्त्र देता है। और निश्चय ही, यदि हम विचार करें कि यह प्रभु का भोज है, मनुष्यों का नहीं, तो हम मनुष्य के किसी अधिकार या प्रथा की लम्बाई के कारण पवित्रशास्त्र से नाखून भर भी क्यों हटने दें?659 इसी कारण प्रेरित ने, कुरिन्थ की कलीसिया में घुसे दोषों को पूरी तरह दूर करने की इच्छा में, सबसे शीघ्र उपाय के रूप में उन्हें स्वयं उस विधि की ओर लौटाया, यह दिखाते हुए कि वहीं से एक स्थायी नियम निकालना चाहिए।

13. कोई झगड़ालू मनुष्य बलिदान और याजक शब्दों के विषय में हमसे विवाद न उठाए, इसलिए मैं संक्षेप में समझाऊँगा कि इस सारे विवेचन में हम बलिदान से क्या और याजक से क्या समझते हैं। कुछ लोग, किस तर्कसंगत आधार पर मैं नहीं देखता, बलिदान शब्द को सब पवित्र विधियों और धार्मिक कार्यों तक फैलाते हैं। हम जानते हैं कि पवित्रशास्त्र के एकसमान प्रयोग से बलिदान का नाम उस वस्तु को दिया जाता है जिसे यूनानी लोग कभी एक, कभी दूसरे, कभी तीसरे शब्द से कहते हैं। यह अपने सामान्य अर्थ में हर उस वस्तु को सम्मिलित करता है जो परमेश्वर को चढ़ाई जाती है। इसलिए हमें भेद करना चाहिए, परन्तु इस प्रकार कि वह भेद मूसा की व्यवस्था के बलिदानों से सादृश्य ले, जिसकी छायाओं के नीचे प्रभु ने अपने लोगों के सामने बलिदानों की सारी वास्तविकता प्रदर्शित करना चाहा। यद्यपि वे रूप में अनेक थे, तौभी सब दो वर्गों में रखे जा सकते हैं। क्योंकि या तो पाप के लिए किसी प्रकार की सन्तुष्टि के द्वारा चढ़ावा चढ़ाया जाता था, जिससे परमेश्वर के सामने दण्ड चुकाया जाए, या वह धर्म और ईश्वरीय आराधना का चिह्न और साक्षी होता था, कभी विनती के रूप में, परमेश्वर की कृपा माँगने के लिए; कभी धन्यवाद के रूप में, पाए हुए उपकारों के लिए परमेश्वर के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए; कभी भक्ति के सादे अभ्यास के रूप में, वाचा की पुष्टि को नया करने के लिए, जिस अन्तिम शाखा में होमबलि, पेयबलि, भेंटें, प्रथम फल और मेलबलि आते थे। इसलिए हम भी उन्हें दो वर्गों में बाँटें। दूसरे वर्ग को समझाने के उद्देश्य से हम उसे धन्यवाद-सम्बन्धी (यूकैरिस्टिक) कहें, क्योंकि वह उस श्रद्धा और आराधना से बनता है जो विश्वासी परमेश्वर के प्रति ऋणी भी हैं और अर्पित भी करते हैं; या यदि आप चाहें तो उसे यही कहें, क्योंकि वह परमेश्वर को उन्हीं के द्वारा अर्पित किया जाता है जो उसके असीम उपकारों से धनी होकर बदले में अपने आप को और अपने सब कार्यों को उसे अर्पित करते हैं। दूसरे वर्ग को हम शान्तिकारक या प्रायश्चित-सम्बन्धी कहें। प्रायश्चित का बलिदान वह है जिसका उद्देश्य परमेश्वर के क्रोध को शान्त करना, उसके न्याय को सन्तुष्ट करना, और इस प्रकार उन पापों को पोंछकर धो देना है जिनसे शुद्ध और पवित्र किया गया पापी परमेश्वर की कृपा में लौट सके। इसी से व्यवस्था में उन बलियों को यह नाम दिया गया जो पाप के प्रायश्चित के लिए चढ़ाई जाती थीं (निर्गमन 29:36); इसलिए नहीं कि वे परमेश्वर की कृपा लौटाने और दोष मिटाने के लिए पर्याप्त थीं, वरन् इसलिए कि वे इस प्रकार के उस सच्चे बलिदान का पूर्वचित्रण करती थीं, जो अन्ततः वास्तव में केवल मसीह के द्वारा पूरा किया गया; उसी के द्वारा, क्योंकि और कोई नहीं कर सकता था, और एक ही बार, क्योंकि मसीह के द्वारा किए गए उस एक बलिदान का प्रभाव और सामर्थ्य अनन्त है, जैसा उसने अपनी वाणी से घोषित किया जब कहा, “पूरा हुआ;” अर्थात् पिता की कृपा फिर पाने, पापों की क्षमा, धार्मिकता और उद्धार प्राप्त करने के लिए जो कुछ आवश्यक था, वह सब उसकी एक ही आहुति से पूरा और सम्पन्न हो गया, और इसलिए कुछ भी अधूरा नहीं रहा। किसी दूसरे बलिदान के लिए स्थान नहीं छोड़ा गया।

658 फ्रांसीसी में यह अन्तिम वाक्य खण्ड 11 का पहला वाक्य बनता है। 659 फ्रांसीसी में, “n’ancun authorite humaine, ne longeur de temps, ne toutes autres apparences;”—अर्थात् कोई मानवीय अधिकार नहीं, न समय की लम्बाई, न कोई और दिखावे।

14. इसलिए मैं निष्कर्ष निकालता हूँ कि यह घृणित अपमान और असह्य ईशनिन्दा है, मसीह के प्रति भी और उस बलिदान के प्रति भी जो उसने अपनी मृत्यु के द्वारा क्रूस पर हमारे लिए पूरा किया, कि कोई आहुति को दोहराने, पापों की क्षमा मोल लेने, परमेश्वर को शान्त करने और धर्मी ठहराया जाना प्राप्त करने का विचार करे। परन्तु मिस्सा में इसके सिवा और क्या किया जाता है कि नई आहुति के द्वारा हमें मसीह के दुःखों का सहभागी बनाया जाए? और उनकी उच्छृंखलता की कोई सीमा न रहे, इसलिए उन्होंने यह कहना थोड़ा समझा कि वह ठीक अर्थ में सारी कलीसिया के लिए साझा बलिदान बनता है, यह जोड़े बिना कि उसे अपनी इच्छा से किसी विशेष व्यक्ति पर लागू करना उनके अधिकार में है; या यों कहें, उस किसी भी व्यक्ति पर जो मूल्य चुकाकर उनसे उनका माल खरीदने को तैयार हो। फिर, जब वे यहूदा के मोल तक नहीं पहुँच सके, तौभी किसी न किसी रीति से अपने कर्ता का हवाला देने के लिए उन्होंने समानता गिनती में रख दी। उसने तीस चाँदी के सिक्कों में बेचा: वे, गणना की फ्रांसीसी रीति के अनुसार, तीस ताँबे के सिक्कों में बेचते हैं। उसने एक बार किया: वे जितनी बार कोई खरीदार मिल जाए। हम इस अर्थ में उन्हें याजक होने से इनकार करते हैं—अर्थात् कि ऐसी आहुतियों से वे लोगों के लिए परमेश्वर के सामने मध्यस्थता करते हैं, कि परमेश्वर को शान्त करके पापों का प्रायश्चित करते हैं। मसीह ही नई वाचा का एकमात्र महायाजक और याजक है: उसी को सब याजकीय कार्य सौंपे गए, और उसी में वे समाप्त और पूर्ण हुए। यदि पवित्रशास्त्र मसीह के अनन्त याजकपद का उल्लेख न भी करता, तो भी, चूँकि परमेश्वर ने उन प्राचीन बलिदानों को हटाने के बाद कोई नया याजक नहीं ठहराया, प्रेरित का तर्क अजेय रहता है, “कोई भी यह आदर का पद अपने आप से नहीं लेता, जब तक कि हारून की नाईं परमेश्वर की ओर से ठहराया न जाए” (इब्रानियों 5:4)। तो वे ईशनिन्दक लोग, जो अपने ही कथन के अनुसार मसीह के हत्यारे हैं, अपने आप को जीवित परमेश्वर के याजक कहने का साहस कैसे करते हैं?

15. प्लेटो की रिपब्लिक की दूसरी पुस्तक में एक अत्यन्त सुन्दर अंश है। प्राचीन प्रायश्चित-विधियों की चर्चा करते हुए, और दुष्ट तथा अधर्मी मनुष्यों के मूर्खतापूर्ण भरोसे की हँसी उड़ाते हुए, जो समझते थे कि उनके द्वारा, मानो परदों के द्वारा, वे अपने अपराध देवताओं से छिपा लेते हैं; और मानो उन्होंने देवताओं से सन्धि कर ली हो, अधिक निश्चिन्त होकर मनमानी करते थे, वह आज संसार में जैसा मिस्सा के प्रायश्चित का प्रयोग है, उसका ठीक वर्णन करता प्रतीत होता है। सब जानते हैं कि किसी को ठगना और उसके साथ छल करना अवैध है। विधवाओं के साथ अन्याय करना, अनाथों को लूटना, गरीबों को सताना, दुष्ट युक्तियों से दूसरों की सम्पत्ति हड़पना, छल और झूठी शपथ से किसी की उत्तराधिकार-सम्पत्ति पर अधिकार जमाना, बल और अत्याचारी आतंक से दबाना, इन सबको सब अभक्ति मानते हैं। तो फिर इतने लोग मानो दण्ड से निश्चिन्त होकर ये सब काम करने का साहस कैसे करते हैं? निःसन्देह, यदि हम ठीक से विचार करें तो पाएँगे कि उन्हें इतना साहस देनेवाली एकमात्र बात यह है कि वे मिस्सा के बलिदान से, मूल्य चुकाकर, परमेश्वर को सन्तुष्ट कर लेंगे, या कम से कम उसके साथ सौदा करने का कोई उपाय सरलता से पा लेंगे। फिर प्लेटो उन लोगों की घोर मूर्खता का उपहास करता है जो ऐसे प्रायश्चितों से उन दण्डों को छुड़ा लेने की सोचते हैं जो उन्हें अन्यथा मृत्यु के बाद भोगने पड़ते। और आज वार्षिक स्मरण-मिस्साओं और अधिकांश मिस्साओं का अर्थ इसके सिवा और क्या है कि जो लोग जीवन भर सबसे क्रूर अत्याचारी, या सबसे लुटेरे डाकू, या सब प्रकार की दुष्टता में निपुण रहे हैं, वे मानो इस मूल्य पर छुड़ाए जाकर शुद्धिकरण-स्थान की आग से बच निकलें?

16. दूसरे प्रकार के बलिदान के अन्तर्गत, जिसे हमने धन्यवाद का बलिदान कहा है, दया के वे सब कार्य आते हैं जिनमें हम अपने भाइयों को अपनाते हुए स्वयं प्रभु का उसके अंगों में आदर करते हैं; संक्षेप में, हमारी सब प्रार्थनाएँ, स्तुतियाँ, धन्यवाद, और आराधना का हर कार्य जो हम परमेश्वर के प्रति करते हैं। ये सब उस बड़े बलिदान पर निर्भर हैं जिसके द्वारा हम अपने आप को, आत्मा और देह सहित, प्रभु के पवित्र मन्दिर के रूप में समर्पित करते हैं। क्योंकि यह पर्याप्त नहीं कि हमारे बाहरी कार्य आज्ञाकारिता के अनुसार ढाले जाएँ, परन्तु हमें पहले अपने आप को, और दूसरे अपना सब कुछ समर्पित और पवित्र करना चाहिए, ताकि हम में जो कुछ है वह उसकी महिमा के अधीन हो और उसे बड़ा ठहराने को उभारा जाए। इस प्रकार के बलिदान का परमेश्वर को शान्त करने, पापों की क्षमा पाने, धर्मी ठहराया जाना प्राप्त करने से कोई सम्बन्ध नहीं, वरन् वह पूर्णतः परमेश्वर की बड़ाई और स्तुति में लगा रहता है, क्योंकि वह परमेश्वर को केवल उन्हीं के हाथ से प्रिय और ग्रहण योग्य हो सकता है जो पापों की क्षमा पाकर पहले ही मेल-मिलाप पा चुके और दोष से छूट चुके हैं। यह कलीसिया के लिए इतना आवश्यक है कि इसके बिना काम नहीं चल सकता। इसलिए यह सदा बना रहेगा, जब तक परमेश्वर के लोग बने रहेंगे, जैसा हम ऊपर भविष्यद्वक्ता से देख चुके हैं। क्योंकि इसी अर्थ में हम इस भविष्यद्वाणी को समझ सकते हैं, “क्योंकि उदयाचल से लेकर अस्ताचल तक जाति जाति में मेरा नाम महान् है; और हर कहीं मेरे नाम पर धूप और शुद्ध भेंट चढ़ाई जाती है: क्योंकि जाति जाति में मेरा नाम महान् है, सेनाओं के यहोवा का यही वचन है” (मलाकी 1:11); हम इस बलिदान को मिटाने से इतनी दूर हैं। इसी प्रकार पौलुस हमसे परमेश्वर की दया स्मरण दिलाकर विनती करता है कि हम अपने शरीरों को “जीवित, और पवित्र, और परमेश्वर को भावता हुआ बलिदान” करके चढ़ाएँ, जो हमारी “तर्कसंगत सेवा” है (रोमियों 12:1)। यहाँ वह बहुत अर्थपूर्ण बात कहता है जब जोड़ता है कि यह सेवा तर्कसंगत है, क्योंकि वह परमेश्वर की आराधना की आत्मिक रीति की ओर संकेत करता है और चुपचाप उसे मूसा की व्यवस्था के शारीरिक बलिदानों के विरुद्ध रखता है। इसी प्रकार भलाई करना और उदारता न भूलना उन बलिदानों में गिना गया है जिनसे परमेश्वर प्रसन्न होता है (इब्रानियों 13:16)। इसी प्रकार फिलिप्पियों की उस कृपा को, जिससे उन्होंने पौलुस की घटी पूरी की, “सुगन्ध और ग्रहण करने योग्य बलिदान, जो परमेश्वर को भाता है” कहा गया है (फिलिप्पियों 4:18); और इसी प्रकार विश्वासियों के सब भले कर्म आत्मिक बलिदान कहलाते हैं।

17. और मैं गिनती क्यों करूँ? अभिव्यक्ति का यह रूप पवित्रशास्त्र में निरन्तर आता है। वरन् जब परमेश्वर के लोग व्यवस्था की बाहरी देख-रेख में रखे गए थे, तब भी भविष्यद्वक्ताओं ने स्पष्ट रूप से प्रकट किया कि इन शारीरिक बलिदानों के नीचे एक वास्तविकता है जो यहूदी प्रजा और मसीही कलीसिया दोनों के लिए साझी है। इसी कारण दाऊद ने प्रार्थना की, “मेरी प्रार्थना तेरे सामने सुगन्ध-द्रव्य के रूप में ठहरे” (भजन संहिता 141:2)। और होशे धन्यवादों को “होंठों के बछड़े” (होशे 14:3) नाम देता है, जिन्हें दाऊद अन्यत्र “स्तुति के बलिदान” कहता है; प्रेरित, उसका अनुकरण करते हुए, “स्तुतिरूपी बलिदान” चढ़ाने की बात करता है, जिसका अर्थ वह यह बताता है, “उन होठों का फल जो उसके नाम का धन्यवाद करते हैं” (इब्रानियों 13:15)। इस प्रकार का बलिदान प्रभु-भोज में अनिवार्य है, जिसमें हम उसकी मृत्यु को प्रकट करते और उसे धन्यवाद देते हुए स्तुति के बलिदान के सिवा कुछ नहीं चढ़ाते। इस बलिदान चढ़ाने के कार्य के कारण सब मसीही “राजकीय याजकों का समाज” कहलाते हैं, क्योंकि हम मसीह के द्वारा स्तुति का वह बलिदान चढ़ाते हैं जिसकी चर्चा प्रेरित करता है, अर्थात् उन होठों का फल जो उसके नाम का धन्यवाद करते हैं (1 पतरस 2:9; इब्रानियों 13:15)। हम अपनी भेंटें लेकर परमेश्वर के सामने बिना मध्यस्थ के नहीं आते। मसीह हमारा मध्यस्थ है, जिसकी मध्यस्थता से हम अपने आप को और अपना सब कुछ पिता को चढ़ाते हैं; वह हमारा महायाजक है, जो ऊपर के पवित्रस्थान में प्रवेश करके हमारे लिए मार्ग खोलता है; वह वेदी है जिस पर हम अपनी भेंटें रखते हैं, ताकि जो कुछ हम करने का यत्न करें, उसी में करें;

मैं कहता हूँ, वही है जिसने “हमें एक राज्य और अपने पिता परमेश्वर के लिये याजक भी बना दिया” (प्रकाशितवाक्य 1:6)।

18. अब अन्धों के देखने, बहिरों के सुनने, यहाँ तक कि बच्चों के भी समझ जाने के लिए इसके सिवा और क्या रह गया कि मिस्सा की यह घृणित बात, जो सोने के प्याले में दिखाई गई,660 इसने पृथ्वी के सब राजाओं और जातियों को, ऊँचे से ऊँचे से लेकर नीचे से नीचे तक, ऐसा मतवाला कर दिया है; उन्हें ऐसा जड़ और चकरा दिया है कि निम्न पशुओं से भी अधिक मन्द होकर उन्होंने अपने उद्धार का पात्र इसी घातक भँवर में रख दिया है। निश्चय ही शैतान ने मसीह के राज्य पर आक्रमण करने और उसे धावा करके लेने के लिए इससे अधिक शक्तिशाली यन्त्र कभी नहीं लगाया। यही वह हेलेन है जिसके लिए आज सत्य के शत्रु इतने क्रोध, उन्माद और क्रूरता से लड़ते हैं; और सचमुच वही हेलेन जिसके साथ वे सब से घृणित आत्मिक व्यभिचार करते हैं। मैं यहाँ उन स्थूल दुरुपयोगों पर अपनी छोटी उँगली भी नहीं रखता, जिनके बहाने वे यह दावा कर सकते हैं कि उनके पवित्र मिस्सा की शुद्धता भ्रष्ट की जाती है; न उस नीच व्यापार पर जो वे चलाते हैं; न उस घिनौने लाभ पर जो वे कमाते हैं; न उस लोभ पर जिससे वे अपनी तृष्णा को तृप्त करते हैं। मैं केवल, और थोड़े और सरल शब्दों में, यह संकेत करता हूँ कि मिस्सा की पवित्रता कितनी पवित्र है, कितने युगों से वह कैसी भली रीति से सराहे जाने और श्रद्धा से पूजे जाने योग्य ठहरी है! इन बड़े भेदों को जैसा उनके योग्य है वैसा स्पष्ट करना और बड़ा काम होगा, और मैं उनकी अश्लील अशुद्धियों को छूना नहीं चाहता, जो प्रतिदिन सबकी आँखों और चेहरों के सामने हैं, ताकि यह समझा जाए कि मिस्सा, अपने सब से उत्तम रूप में, जिसमें वह बिना किसी जोड़-घटाव के प्रस्तुत किया जा सकता है, सिर से पाँव तक सब प्रकार की अभक्ति, ईशनिन्दा, मूर्तिपूजा और अपवित्रता से भरा है।

19. मेरे पाठकों के सामने उन सब बातों का संक्षिप्त चित्र है जिन्हें इन दो संस्कारों के विषय में जानना मैंने महत्त्वपूर्ण समझा, जो मसीही कलीसिया को नई व्यवस्था के आरम्भ से संसार के अन्त तक प्रयोग के लिए सौंपे गए हैं; बपतिस्मा कलीसिया में एक प्रकार का प्रवेश, विश्वास में दीक्षा है, और प्रभु-भोज वह निरन्तर आहार है जिससे मसीह अपने विश्वासियों के परिवार को आत्मिक रीति से खिलाता है। इसलिए जैसे परमेश्वर एक है, विश्वास एक है, मसीह एक है, कलीसिया एक है जो उसकी देह है, वैसे ही बपतिस्मा एक है, और दोहराया नहीं जाता। परन्तु प्रभु-भोज बार-बार बाँटा जाता है, यह जताने के लिए कि जो एक बार कलीसिया में खींच लिए गए हैं उन्हें मसीह निरन्तर खिलाता है। इन दो के सिवा परमेश्वर ने कोई और संस्कार नहीं ठहराया, और विश्वासियों की सभा द्वारा कोई और स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। संस्कार मनुष्यों की इच्छा से ठहराए और खड़े नहीं किए जाते, यह बात वह सरलता से समझ लेता है जिसे ऊपर पर्याप्त स्पष्टता से समझाई गई बात स्मरण हो—अर्थात् कि संस्कार परमेश्वर ने हमें अपनी प्रतिज्ञा सिखाने और हमारे प्रति अपनी भली इच्छा की गवाही देने के लिए ठहराए हैं; और जो इसके अतिरिक्त यह भी विचार करता है कि प्रभु का कोई सलाहकार नहीं (यशायाह 40:13; रोमियों 11:34); तो कौन हमें उसकी इच्छा के विषय में कोई निश्चय दे सकता है, या हमें आश्वस्त कर सकता है कि वह हमारे प्रति कैसा मन रखता है, क्या देना चाहता है और क्या रोकना? इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि कोई मनुष्य ऐसा चिह्न खड़ा नहीं कर सकता जो उसकी इच्छा और किसी प्रतिज्ञा का साक्षी हो। चिह्न वही दे सकता है, और अपनी गवाही स्वयं दे सकता है। मैं इसे और संक्षेप में, सम्भवतः अधिक साधारण परन्तु अधिक स्पष्ट शब्दों में कहूँगा,—उद्धार की प्रतिज्ञा के बिना कभी कोई संस्कार नहीं हो सकता। सब मनुष्य एक में इकट्ठे होकर भी स्वयं हमें उद्धार की कोई प्रतिज्ञा नहीं दे सकते, और इसलिए वे स्वयं कोई संस्कार नहीं दे और खड़ा कर सकते।

20. इसलिए इन दो से मसीही कलीसिया सन्तुष्ट रहे, और न केवल इस समय किसी तीसरे को स्वीकार या मान्य न करे, वरन् संसार के अन्त तक उसकी इच्छा या आशा भी न करे। क्योंकि यद्यपि यहूदियों को अपने सामान्य संस्कारों के अतिरिक्त समय के स्वभाव के अनुसार कुछ भिन्न अन्य संस्कार भी दिए गए थे (जैसे मन्ना, चट्टान से निकलनेवाला पानी, पीतल का साँप, और इसी प्रकार के),661 तौभी इस विविधता से उन्हें यह स्मरण कराया गया कि ऐसे प्रतीकों पर रुक न जाएँ, जिनकी दशा स्थायी नहीं हो सकती थी, परन्तु परमेश्वर से कुछ उत्तम की प्रतीक्षा करें, जो बिना क्षय और बिना अन्त के बना रहे। हमारी दशा बहुत भिन्न है। हमारे लिए मसीह प्रकट किया गया है। उसमें बुद्धि और ज्ञान के सारे भण्डार छिपे हैं (कुलुस्सियों 2:3), ऐसी सम्पन्नता और बहुतायत में कि इन भण्डारों में किसी नई वृद्धि को माँगना या आशा रखना सचमुच परमेश्वर को अप्रसन्न करना और उसे अपने विरुद्ध भड़काना है। हमें केवल मसीह के लिए भूखा होना, उसी को खोजना, उसी की ओर देखना, उसी से सीखना और फिर सीखना उचित है, उस महान दिन के आने तक जब प्रभु अपने राज्य की महिमा पूरी रीति से प्रकट करेगा, और अपने आप को जैसा वह है वैसा हमारी चकित आँखों के सामने प्रस्तुत करेगा (1 यूहन्ना 3:2)। और इसी कारण हमारा यह युग पवित्रशास्त्र में662 अन्तिम घड़ी, अन्तिम दिन, अन्तिम समय कहलाता है, ताकि कोई किसी नए सिद्धान्त या प्रकाशन की व्यर्थ आशा से अपने को धोखा न दे। हमारा स्वर्गीय पिता, जिसने “पूर्वकाल में बापदादों से थोड़ा थोड़ा करके और भाँति भाँति से भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा बातें करके, इन अन्तिम दिनों में हम से” अपने प्रिय पुत्र के द्वारा बातें की हैं, जो अकेला पिता को प्रकट कर सकता है, और वास्तव में उसे उस सीमा तक पूरी रीति से प्रकट कर चुका है जहाँ तक हमारे लिए महत्त्वपूर्ण है, जब कि हम उसे अब दर्पण में देखते हैं। अब, चूँकि मनुष्यों को परमेश्वर की कलीसिया में नए संस्कार बनाने की शक्ति से वंचित किया गया है, यह चाहने योग्य है कि जो परमेश्वर के हैं उनमें मानवीय कल्पना का मिश्रण जितना हो सके उतना कम हो। क्योंकि जैसे पानी डालने से दाखरस पतला हो जाता है, और खमीर डालने से सारा आटा खमीर हो जाता है, वैसे ही जब भी मनुष्य अपनी ओर से कुछ जोड़ता है, परमेश्वर की विधियों की शुद्धता घट जाती है। और फिर भी हम देखते हैं कि आजकल प्रयुक्त संस्कार अपनी वास्तविक शुद्धता से कितने

660 फ्रांसीसी में समझाया गया है, “c’est à dire, sous le nom de la parole de Dieu;”—अर्थात्, परमेश्वर के वचन के नाम के अधीन। 661 निर्गमन 16:13-15; 17:6; गिनती 20:8., 21:9; 1 कुरिन्थियों 10:4; यूहन्ना 3:14।

662 1 यूहन्ना 2:18; 1 पतरस 1:20; लूका 10:22, इब्रानियों 1:1; 1 कुरिन्थियों 13:12। भ्रष्ट होकर अपनी वास्तविक शुद्धता से गिर गए हैं। सर्वत्र आडम्बर, रीति-रिवाज और हाव-भाव आवश्यकता से अधिक हैं, जबकि परमेश्वर के वचन का कोई हिसाब नहीं लिया जाता, न उसका उल्लेख होता है, जिसके बिना संस्कार स्वयं भी संस्कार नहीं हैं। वरन् ऐसी भीड़ में परमेश्वर की ठहराई हुई विधियाँ भी सिर नहीं उठा सकतीं, परन्तु मानो दबी पड़ी रहती हैं। बपतिस्मा में, जैसा हमने अन्यत्र उचित रूप से शिकायत की है, उसमें जो अकेला चमकना और दिखाई देना चाहिए, अर्थात् बपतिस्मा स्वयं, उसका कितना कम दिखाई देता है? प्रभु-भोज तो पूरी तरह गाड़ दिया गया जब उसे मिस्सा बना दिया गया। अधिक से अधिक यह साल में एक बार दिखाई देता है, पर विकृत, कटे-छँटे और फटे हुए रूप में।663

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