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स्वतंत्र इच्छा के समर्थन में प्रायः दिए जानेवाले तर्कों का खण्डन (भाग 1/2)
अध्याय 5।
स्वतंत्र इच्छा के समर्थन में प्रायः दिए जानेवाले तर्कों का खण्डन।
आपत्तियाँ तीन प्रमुख शीर्षों में समेटी गई हैं:—I. इच्छा की दासता के विषय में खरे सिद्धान्त के विरोधियों द्वारा प्रस्तुत चार असंगतियाँ, उनका कथन और खण्डन, खण्ड 1-5। II. पवित्रशास्त्र के वे अंश जिन्हें वे अपनी भूल के पक्ष में तोड़-मरोड़ते हैं, जो पाँच शीर्षों में समेटे गए हैं, और उनकी व्याख्या, खण्ड 6-15। III. स्वतंत्र इच्छा के बचाव में उद्धृत पाँच अन्य अंशों की व्याख्या, खण्ड 16-19।
खण्ड।
1. विरोधियों की असंगत कल्पनाओं का पहले खण्डन, और फिर पवित्रशास्त्र के कुछ अंशों की व्याख्या। उत्तर नकारात्मक है। उत्तर की पुष्टि।
2. अरस्तू और पेलागियस की एक और असंगति। भेद करके उत्तर। उत्तर को अगस्तीन के अंशों से दृढ़ किया गया है और एक प्रेरित के अधिकार से समर्थित किया गया है।
3. क्राइसोस्टम के शब्दों से ली गई तीसरी असंगति। नकारात्मक उत्तर।
4. पेलागियसवादियों द्वारा प्राचीन काल में उठाई गई चौथी असंगति। अगस्तीन की रचनाओं से उत्तर। हमारे उद्धारकर्ता की साक्षी से स्पष्टीकरण। एक और उत्तर, जो उपदेशों के प्रयोजन को समझाता है।
5. तीसरा उत्तर, जिसमें दूसरे उत्तर की अधिक पूर्ण व्याख्या है। पिछले उत्तरों पर आपत्ति। आपत्ति का खण्डन। पिछले उत्तरों का सारांश।
6. नव-पेलागियसवादी स्वतंत्र इच्छा के बचाव में पवित्रशास्त्र से जो तर्क खींचते हैं, उनका पहला वर्ग। 1. व्यवस्था पूर्ण आज्ञाकारिता की माँग करती है, इसलिए या तो परमेश्वर हमारा उपहास करता है, या ऐसी बातें माँगता है जो हमारे वश में नहीं हैं। उत्तर: आज्ञाओं को तीन प्रकार का ठहराकर। इनमें से पहले प्रकार पर इस और अगले खण्ड में विचार किया गया है।
7. व्यवस्था से लिया गया यह सामान्य तर्क स्वतंत्र इच्छा के पक्षधरों के किसी काम का नहीं। आज्ञाओं के साथ जुड़ी प्रतिज्ञाएँ प्रमाणित करती हैं कि हमारा उद्धार परमेश्वर के अनुग्रह में ही पाया जाता है। आपत्ति कि व्यवस्था उसी समय के जीवित लोगों को दी गई थी। उत्तर, जिसकी पुष्टि अगस्तीन के अंशों से की गई है।
8. आज्ञाओं के तीनों वर्गों पर विशेष विचार, जो स्वतंत्र इच्छा के रक्षकों के किसी काम के नहीं। 1. परमेश्वर की ओर फिरने की आज्ञाएँ। 2. वे आज्ञाएँ जो केवल व्यवस्था के पालन की बात करती हैं। 3. वे आज्ञाएँ जो परमेश्वर के अनुग्रह में बने रहने का आग्रह करती हैं।
9. आपत्ति। उत्तर। यिर्मयाह से उत्तर की पुष्टि। एक और आपत्ति का खण्डन।
10. स्वतंत्र इच्छा के बचाव में तर्कों का दूसरा वर्ग, जो परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं से लिया गया है—अर्थात् यह कि जो परमेश्वर को खोजते हैं उनसे की गई प्रतिज्ञाएँ व्यर्थ हैं, यदि माँगी गई बात को करना या न करना हमारे वश में नहीं है। उत्तर, जो प्रतिज्ञाओं के प्रयोजन को समझाता है और कल्पित असंगति को दूर करता है।
177 फ्रांसीसी पाठ केवल यह है, “Car si cela pouvoit etre en l’homme, il ne seroit par moins libre enfermé en un prison que dominant par toute la terre.” यदि यह मनुष्य में हो सकता, तो वह कारागार में बन्द होकर भी उतना ही स्वतंत्र होता जितना सारी पृथ्वी पर शासन करते हुए।
11. तर्कों का तीसरा वर्ग, जो ईश्वरीय उलाहनों से लिया गया है,—कि जिन बुराइयों से बचना हमारे वश में नहीं, उनके लिए हमें उलाहना देना व्यर्थ है। उत्तर। पापी अपने ही विवेक से दोषी ठहरते हैं, इसलिए ईश्वरीय उलाहने न्यायसंगत हैं। इसके अतिरिक्त इन उलाहनों का दोहरा उपयोग है। पवित्रशास्त्र के कई अंशों की व्याख्या पूर्वोक्त उत्तरों की सहायता से।
12. मूसा के शब्दों पर आधारित आपत्ति। एक प्रेरित के शब्दों से खण्डन। तर्क से पुष्टि।
13. स्वतंत्र इच्छा के रक्षकों के तर्कों का चौथा वर्ग। परमेश्वर देखता रहता है कि पापी पश्चाताप करते हैं या नहीं; इसलिए वे पश्चाताप कर सकते हैं। द्विविधा के द्वारा उत्तर। होशे के अंश की व्याख्या।
14. स्वतंत्र इच्छा के बचाव में तर्कों का पाँचवाँ वर्ग। परमेश्वर के कर्म और बुरे कर्म दोनों हमारे अपने बताए जाते हैं, इसलिए हम दोनों के योग्य हैं। एक व्याख्या के द्वारा उत्तर, जो दिखाती है कि यह तर्क निष्फल है। सादृश्य से ली गई आपत्ति। उत्तर। चुने हुओं में ईश्वरीय कार्य का स्वरूप और रीति।
15. अन्तिम वर्ग के तर्कों के उत्तर का निष्कर्ष।
16. अध्याय का तीसरा और अन्तिम विभाग, जिसमें पवित्रशास्त्र के कुछ अंशों पर विचार है। 1. उत्पत्ति का एक अंश। उसका सच्चा अर्थ।
17. 2. रोमियों की पत्री का एक अंश। व्याख्या। एक आपत्ति का खण्डन। एक और खण्डन। अगस्तीन से तीसरा खण्डन। 3. 1 कुरिन्थियों का एक अंश। उसका उत्तर।
18. 4. सभोपदेशक का एक अंश। व्याख्या। एक और व्याख्या।
19. 5. लूका का एक अंश। व्याख्या। रूपकात्मक तर्क निर्बल हैं। एक और व्याख्या। तीसरी व्याख्या। अगस्तीन से चौथी।
स्वतंत्र इच्छा के सम्बन्ध में सम्पूर्ण विवेचन का निष्कर्ष और सारांश।
1. मनुष्य की इच्छा के विषय में जितना कहा जाना चाहिए था, वह पर्याप्त प्रतीत होता, यदि ऐसे लोग न होते जो स्वतंत्रता की झूठी धारणा के द्वारा उसे उसके विनाश की ओर उकसाना चाहते हैं, और साथ ही अपने मत के समर्थन में हमारे मत पर आक्रमण करते हैं। पहले तो वे कुछ असंगत निष्कर्ष इकट्ठे करते हैं, जिनसे वे हमारे सिद्धान्त को बदनाम करना चाहते हैं, मानो वह सामान्य बुद्धि के विपरीत हो, और फिर पवित्रशास्त्र के कुछ अंशों से उसका विरोध करते हैं (infra, खण्ड 6)। दोनों युक्तियों का हम क्रम से निपटारा करेंगे। वे कहते हैं, यदि पाप अनिवार्य है, तो वह पाप ही नहीं रह जाता; और यदि वह स्वैच्छिक है, तो उससे बचा जा सकता है। पेलागियस ने अगस्तीन पर इन्हीं हथियारों से आक्रमण किया था। परन्तु जब तक हम आपत्तियों का सन्तोषजनक निपटारा न कर लें, तब तक हम उन्हें उसके नाम के भार से कुचलना नहीं चाहते। इसलिए मैं इस बात से इनकार करता हूँ कि पाप इस कारण कम आरोपित किया जाना चाहिए कि वह अनिवार्य है; और दूसरी ओर, मैं इस निष्कर्ष से भी इनकार करता हूँ कि पाप से बचा जा सकता है क्योंकि वह स्वैच्छिक है। यदि कोई परमेश्वर से वाद-विवाद करे और यह बहाना बनाकर उसके न्याय से बचना चाहे कि वह और कुछ कर ही नहीं सकता था, तो पहले दिया गया उत्तर पर्याप्त है कि मनुष्य जो पाप का दास बन गया है और बुराई के सिवा कुछ नहीं चाह सकता, वह सृष्टि के कारण नहीं, वरन् स्वभाव की भ्रष्टता के कारण है। क्योंकि वह असमर्थता, जिसे दुष्ट लोग इतनी सरलता से बहाने के रूप में काम में लाते हैं, कहाँ से आई, सिवाय इसके कि आदम ने अपनी ही इच्छा से अपने आप को शैतान के अत्याचार के अधीन कर दिया? अतः वह भ्रष्टता, जिससे हम मानो जंजीरों में जकड़े हुए हैं, प्रथम मनुष्य के अपने सृष्टिकर्ता के विरुद्ध विद्रोह से उत्पन्न हुई। यदि सब मनुष्य इस विद्रोह के लिए न्यायपूर्वक दोषी ठहराए जाते हैं, तो वे अपने को उस अनिवार्यता के कारण निर्दोष न समझें जिसमें उन्हें अपने दण्ड का सबसे स्पष्ट कारण दिखाई देता है। परन्तु इसकी व्याख्या मैं ऊपर पूर्ण रूप से कर चुका हूँ; और स्वयं शैतान के उदाहरण में मैंने एक ऐसे का दृष्टान्त दिया है जो जितना अनिवार्यतः पाप करता है उतना ही स्वेच्छा से भी करता है। चुने हुए स्वर्गदूतों के उदाहरण में भी मैंने दिखाया है कि यद्यपि उनकी इच्छा भलाई से नहीं हट सकती, फिर भी वह इच्छा होना बन्द नहीं करती। बर्नार्ड यह बात चतुराई से समझाता है जब वह कहता है (Serm. 81, in Cantica) कि हम इसी में अधिक अभागे हैं कि यह अनिवार्यता स्वैच्छिक है; तो भी यह अनिवार्यता हम पर जो इसके अधीन हैं ऐसा बन्धन डालती है कि हम पाप के दास हैं, जैसा कि हम पहले कह चुके हैं। तर्क का दूसरा चरण दोषपूर्ण है, क्योंकि वह स्वैच्छिक से छलाँग लगाकर स्वतंत्र पर पहुँच जाता है; जबकि हम ऊपर प्रमाणित कर चुके हैं कि कोई कार्य स्वेच्छा से किया जा सकता है, चाहे वह स्वतंत्र चुनाव के अधीन न हो।
2. वे यह भी जोड़ते हैं कि यदि पुण्य और पाप स्वतंत्र चुनाव से नहीं उपजते, तो मनुष्य को दण्ड देना या उसे प्रतिफल देना, दोनों ही असंगत है। यद्यपि यह तर्क अरस्तू से लिया गया है, मैं मानता हूँ कि क्राइसोस्टम और जेरोम भी इसका प्रयोग करते हैं। परन्तु जेरोम यह नहीं छिपाता कि यह पेलागियसवादियों में प्रचलित था। वह उनके शब्द भी उद्धृत करता है, “यदि हम में अनुग्रह कार्य करता है, तो मुकुट अनुग्रह को मिलेगा, हमें नहीं जो काम करते हैं,” (Hieron. in Ep. ad Ctesiphont. et Dialog. 1)। दण्ड के विषय में मेरा उत्तर यह है कि वह उन्हीं को उचित रूप से दिया जाता है जिनके द्वारा दोष उत्पन्न हुआ है। इससे क्या अन्तर पड़ता है कि तुम स्वतंत्र निर्णय से पाप करते हो या दास बने हुए निर्णय से, जब तक तुम स्वेच्छा से पाप करते हो, विशेषकर जब मनुष्य के पापी होने का प्रमाण ही यह है कि वह पाप की दासता में है? धार्मिकता के प्रतिफल के विषय में, क्या यह मानना कोई बड़ी असंगति है कि वे हमारे पुण्य पर नहीं, वरन् परमेश्वर की कृपा पर निर्भर हैं? अगस्तीन में हमें यह कथन कितनी बार मिलता है,—“परमेश्वर हमारे पुण्यों को नहीं, वरन् अपने ही दानों को मुकुट पहनाता है; और प्रतिफल का नाम उसे नहीं दिया जाता जो हमारे पुण्यों के कारण देय है, वरन् पहले दिए गए अनुग्रह के बदले को?” कुछ लोग इस टिप्पणी में बड़ी चतुराई समझते हैं कि यदि भले कर्म स्वतंत्र इच्छा से, मानो उनके उचित स्रोत से, नहीं निकलते तो मन के लिए कोई स्थान ही नहीं रह जाता; परन्तु इसे इतना अनुचित समझने में वे बड़ी भूल करते हैं। अगस्तीन निरन्तर उसी बात को अनिवार्य कहने में नहीं हिचकिचाता जिसे स्वीकार करना वे अधर्म समझते हैं। इस प्रकार वह पूछता है, “मनुष्य का पुण्य क्या है? जो देय बदला देने नहीं, वरन् मुफ़्त अनुग्रह देने आया, वह स्वयं पाप से रहित और स्वतंत्रता का देनेवाला होते हुए भी सब मनुष्यों को पापी पाया,” (Augustin. in Psal. 31)। फिर, “यदि तुम्हें अपना देय मिलना है, तो तुम्हें दण्ड मिलना चाहिए। तो फिर क्या होता है? परमेश्वर ने तुम्हें देय दण्ड नहीं दिया, वरन् तुम पर अनुचित अनुग्रह करता है। यदि तुम अनुग्रह से पराए होना चाहते हो, तो अपने पुण्यों पर घमण्ड करो,” (in Psal. 70)। फिर, “तुम अपने आप में कुछ नहीं हो, पाप तुम्हारा है, पुण्य परमेश्वर का। दण्ड तुम्हारा देय है; और जब प्रतिफल आएगा, तब परमेश्वर अपने ही दानों को मुकुट पहनाएगा, तुम्हारे पुण्यों को नहीं,” (Ep. 52)। इसी आशय से वह एक और स्थान पर कहता है (De Verb. Apostol. Serm. 15) कि अनुग्रह पुण्य से नहीं, वरन् पुण्य अनुग्रह से है। और थोड़ी ही देर बाद वह निष्कर्ष निकालता है कि परमेश्वर अपने दानों के द्वारा हमारे सब पुण्य से पहले ही कार्य करता है, ताकि इस प्रकार वह अपनी ही योग्यता प्रकट करे और वह दे जो पूर्णतः मुफ़्त है, क्योंकि वह हम में ऐसा कुछ नहीं देखता जो उद्धार का आधार बन सके। परन्तु उद्धरणों की सूची को क्यों बढ़ाएँ, जब उसकी रचनाओं में ऐसे ही विचार बार-बार दिखाई देते हैं? इस भूल के पक्षधर इसका और भी अच्छा खण्डन देखते, यदि वे उस स्रोत पर ध्यान देते जिससे प्रेरित सन्तों की महिमा निकालता है,—“फिर जिन्हें उसने पहले से ठहराया, उन्हें बुलाया भी; और जिन्हें बुलाया, उन्हें धर्मी भी ठहराया; और जिन्हें धर्मी ठहराया, उन्हें महिमा भी दी,” (रोमियों 8:30)। तो फिर प्रेरित के न्यायी होने पर (2 तीमुथियुस 4:8), विश्वासियों को मुकुट किस आधार पर पहनाया जाता है? इसलिए कि परमेश्वर की दया से, न कि उनके अपने परिश्रम से, वे पूर्वनियत किए गए, बुलाए गए और धर्मी ठहराए गए। इसलिए उस व्यर्थ भय को दूर करो कि यदि स्वतंत्र इच्छा न टिकी तो फिर कोई पुण्य न रहेगा! उससे घबराना और उससे पीछे हटना जिसे पवित्रशास्त्र सिखाता है, अत्यन्त मूर्खता है। “तुझे ऐसा कौन सी वस्तु मिली है जो तू ने दूसरे से नहीं पाई? और जब तू ने दूसरे से पाई, तो ऐसा घमण्ड क्यों करता है मानो नहीं पाई?” (1 कुरिन्थियों 4:7)। तुम देखते हो कि स्वतंत्र इच्छा से सब कुछ इसीलिए छीना जाता है कि पुण्य के लिए कोई स्थान न रहे। और फिर भी, क्योंकि परमेश्वर की उदारता और दानशीलता अनेक और अक्षय है, इसलिए जो अनुग्रह वह हमें देता है, उसे हमारा अपना बनाकर वह उसका प्रतिफल ऐसे देता है मानो वे पुण्य-कर्म हमारे ही हों।
3. परन्तु फिर, ऐसे शब्दों में जो क्राइसोस्टम से लिए गए प्रतीत होते हैं (Homil. 22, in Genes.), यह कहा जाता है कि यदि हमारी इच्छा में भलाई या बुराई चुनने की सामर्थ्य नहीं है, तो एक ही स्वभाव में सहभागी सब लोग या तो समान रूप से भले होंगे या समान रूप से बुरे। इससे मिलता-जुलता एक विचार De Vocatione Gentium (lib. 4 c. 4) में मिलता है, जो प्रायः अम्ब्रोस की रचना मानी जाती है, जिसमें यह तर्क दिया गया है कि कोई भी विश्वास से कभी न गिरता, यदि परमेश्वर का अनुग्रह हमें परिवर्तनशील दशा में न छोड़ देता। आश्चर्य है कि ऐसे लोगों से ऐसी भूल हुई। क्राइसोस्टम को यह कैसे न सूझा कि मनुष्यों में भेद करनेवाला ईश्वरीय चुनाव है? पौलुस जिस बात का दृढ़ता से प्रतिपादन करता है, उसे मानने में हमें तनिक भी संकोच नहीं कि सब लोग, बिना किसी अपवाद के, भ्रष्ट हैं और दुष्टता के वश में कर दिए गए हैं; परन्तु साथ ही हम यह भी कहते हैं कि परमेश्वर की दया से सब दुष्टता में बने नहीं रहते। इसलिए यद्यपि हम सब स्वभाव से एक ही रोग से पीड़ित हैं, फिर भी स्वास्थ्य केवल उन्हीं को मिलता है जिन पर प्रभु अपना चंगा करनेवाला हाथ बढ़ाना चाहता है। शेष लोगों को, जिन्हें वह न्यायपूर्ण निर्णय से छोड़ देता है, वे गलते और सड़ते रहते हैं, जब तक कि नष्ट न हो जाएँ। और केवल यही कारण है कि कुछ अन्त तक स्थिर रहते हैं, और कुछ दौड़ आरम्भ करके गिर जाते हैं। अन्त तक स्थिर रहना परमेश्वर का दान है, जिसे वह सब पर अन्धाधुन्ध नहीं लुटाता, वरन् जिसे चाहता है उसे देता है। यदि पूछा जाए कि यह भेद कैसे होता है—कुछ क्यों दृढ़ता से स्थिर रहते हैं और दूसरे दृढ़ता में घट जाते हैं—तो हम इसके सिवा कोई और कारण नहीं दे सकते कि प्रभु अपनी सामर्थी शक्ति से पहलों को दृढ़ करता और थामे रखता है कि वे नष्ट न हों, जबकि वह दूसरों को वही सहायता नहीं देता, वरन् उन्हें अस्थिरता के स्मारक बनने के लिए छोड़ देता है।
4. फिर भी यह आग्रह किया जाता है कि यदि पापी में आज्ञा मानने की सामर्थ्य नहीं है, तो उपदेश व्यर्थ हैं, चेतावनियाँ अनावश्यक हैं और डाँट असंगत है। जब अगस्तीन के विरुद्ध ऐसी ही आपत्तियाँ उठाई गईं, तो उसे अपनी पुस्तक De Correptione et Gratia लिखनी पड़ी, जिसमें उसने उनका पूरा निपटारा किया है। अपने विरोधियों को दिए गए उसके उत्तर का सार यह है: “हे मनुष्य! आज्ञा से सीख कि तुझे क्या करना चाहिए; ताड़ना से सीख कि सामर्थ्य का न होना तेरा ही दोष है; और प्रार्थना में सीख कि वह सामर्थ्य तुझे कहाँ से मिल सकती है।” इसी से मिलता-जुलता उसकी पुस्तक De Spiritu et Litera का तर्क है, जिसमें वह दिखाता है कि परमेश्वर अपनी व्यवस्था की आज्ञाओं को मनुष्य के बल से नहीं मापता, वरन् जो उचित है उसकी आज्ञा देकर अपने चुने हुओं को उसे पूरा करने की सामर्थ्य मुफ़्त में देता है। विषय को वस्तुतः लम्बे विवेचन की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि हम अपने सिद्धान्त में अकेले नहीं हैं, वरन् मसीह और उसके सब प्रेरित हमारे साथ हैं। इसलिए हमारे विरोधी विचार करें कि वे ऐसे विरोधियों के साथ जिस संघर्ष में उतरे हैं, उसमें विजयी कैसे होंगे। मसीह घोषणा करता है, “मुझ से अलग होकर तुम कुछ नहीं कर सकते,” (यूहन्ना 20:5)। तो क्या वह उन्हें कम ताड़ना देता और दण्ड देता है जिन्होंने उसके बिना दुष्टता की? क्या वह हर एक को भले कामों में तत्पर रहने का कम उपदेश देता है? पौलुस कुरिन्थियों को प्रेम की कमी के लिए कितनी कठोरता से फटकारता है (1 कुरिन्थियों 3:3); और फिर भी साथ ही वह प्रार्थना करता है कि प्रभु उन्हें प्रेम दे। रोमियों की पत्री में वह घोषणा करता है कि “यह न तो चाहनेवाले की, न दौड़नेवाले की, परन्तु दया करनेवाले परमेश्वर की बात है,” (रोमियों 9:16)। तो भी वह उन्हें चेतावनी देने, समझाने और डाँटने से नहीं रुकता। तब वे परमेश्वर से यह शिकायत क्यों नहीं करते कि वह मनुष्यों से खिलवाड़ करता है, उनसे ऐसी बातें माँगकर जो केवल वही दे सकता है, और अपने अनुग्रह के अभाव में हुई भूलों के लिए उन्हें ताड़ना देकर? वे पौलुस को क्यों नहीं टोकते कि उन पर दया करे जिनके वश में चाहना या दौड़ना नहीं है, जब तक परमेश्वर की दया, जिसने उन्हें त्याग दिया है, पहले न आए? मानो यह सिद्धान्त सबसे दृढ़ तर्क पर आधारित न हो—ऐसा तर्क जिसे कोई गम्भीर खोजी देखे बिना नहीं रह सकता। शिक्षा, उपदेश और डाँट मन को बदलने में स्वयं कहाँ तक समर्थ हैं, यह पौलुस तब बताता है जब वह कहता है, “न तो लगानेवाला कुछ है, और न सींचनेवाला, परन्तु परमेश्वर जो बढ़ानेवाला है,” (1 कुरिन्थियों 3:7); इसी प्रकार हम देखते हैं कि मूसा व्यवस्था की आज्ञाएँ कठोर दण्ड-विधान के साथ देता है, और भविष्यद्वक्ता अपराधियों को ज़ोर देकर समझाते और धमकाते हैं, यद्यपि साथ ही वे मानते हैं कि मनुष्य तभी बुद्धिमान होते हैं जब उन्हें समझनेवाला हृदय दिया जाता है; कि हृदय का खतना करना और उसे पत्थर से माँस में बदलना परमेश्वर का ही काम है; कि अपनी व्यवस्था को उनके भीतर लिखना उसी का काम है; सारांश यह कि प्राणों को नया करना, ताकि शिक्षा में प्रभाव आए, उसी का काम है।
5. तो फिर उपदेशों का प्रयोजन क्या है? यह: क्योंकि दुष्ट लोग हठीले हृदय से उनका तिरस्कार करते हैं, इसलिए जब वे परमेश्वर के न्यायासन के सामने खड़े होंगे तब वे उनके विरुद्ध साक्षी होंगे; वरन् अभी भी वे उनके विवेक पर चोट करते और कोड़े लगाते हैं। क्योंकि चाहे वे कितनी ही ढिठाई से उनकी हँसी उड़ाएँ, वे उन्हें अनुचित नहीं ठहरा सकते। परन्तु तुम पूछोगे कि वह अभागा नश्वर प्राणी क्या करे, जब आज्ञाकारिता के लिए आवश्यक हृदय की कोमलता उसे दी ही नहीं गई? मैं उत्तर में पूछता हूँ, बहाने क्यों ढूँढ़ते हो, जब हृदय की कठोरता का दोष पापी के सिवा किसी और पर नहीं लगाया जा सकता? अधर्मी लोग, यद्यपि वे ईश्वरीय चेतावनियों से बचना चाहेंगे, चाहे या न चाहें, उनके प्रभाव को अनुभव करने को विवश हैं। परन्तु उनका मुख्य उपयोग विश्वासियों के विषय में दिखाई देता है, जिनमें प्रभु सदा अपने आत्मा के द्वारा कार्य करते हुए भी अपने वचन के साधन को नहीं छोड़ता, वरन् उसे काम में लाता है, और व्यर्थ नहीं। तो यह एक स्थिर सत्य ठहरे कि भक्तों की सम्पूर्ण सामर्थ्य परमेश्वर के अनुग्रह में है, भविष्यद्वक्ता के इन शब्दों के अनुसार, “मैं उन्हें एक ही हृदय दूँगा, और तुम्हारे भीतर नई आत्मा बसाऊँगा; और उनकी देह में से पत्थर का हृदय निकालकर माँस का हृदय उन्हें दूँगा, कि वे मेरी विधियों पर चलें,” (यहेजकेल 11:19, 20)। परन्तु पूछा जाएगा कि अब उन्हें उनके कर्तव्य की याद क्यों दिलाई जाती है, और उन्हें आत्मा के मार्गदर्शन पर क्यों नहीं छोड़ दिया जाता? उन्हें उपदेशों से क्यों प्रेरित किया जाता है, जब वे आत्मा के प्रेरित करने से अधिक तेज़ी से बढ़ ही नहीं सकते? और यदि वे कभी भटक जाएँ तो उन्हें ताड़ना क्यों दी जाती है, जबकि यह देह की अनिवार्य दुर्बलता से होता है? “हे मनुष्य, तू कौन है जो परमेश्वर का सामना करता है?” यदि परमेश्वर हमें उस अनुग्रह के लिए तैयार करने के लिए, जो हमें उपदेश मानने के योग्य बनाता है, उपदेश का प्रयोग करना उचित समझता है, तो इस व्यवस्था में तुम्हारे लिए ऐसा क्या है कि तुम उसमें दोष निकालो और उसका उपहास करो? यदि उपदेशों और डाँट का भक्तों के लिए और कोई लाभ न होता सिवाय इसके कि वे उन्हें पाप का कायल करते, तो भी उन्हें बिलकुल व्यर्थ नहीं ठहराया जा सकता था। अब जब परमेश्वर के आत्मा के भीतरी कार्य से उनका यह प्रभाव होता है कि वे भलाई की उनकी अभिलाषा को भड़काते हैं, उन्हें आलस्य से जगाते हैं, पाप के सुख और मीठे रस को नष्ट कर देते हैं और उसे घृणित और घिनौना बना देते हैं, तो कौन यह साहस करेगा कि उन्हें अनावश्यक कहकर उन पर आपत्ति करे?
यदि कोई अधिक स्पष्ट उत्तर चाहे, तो वह यह ले:—परमेश्वर अपने चुने हुओं में दो रीतियों से कार्य करता है: भीतर से अपने आत्मा के द्वारा; बाहर से अपने वचन के द्वारा। अपने आत्मा के द्वारा उनके मन को प्रकाशित करके और उनके हृदयों को धार्मिकता के अभ्यास में प्रशिक्षित करके वह उन्हें नई सृष्टि बना देता है, जबकि अपने वचन के द्वारा वह उन्हें इस नवीनीकरण की लालसा और खोज के लिए उभारता है। दोनों में वह अपने हाथ की सामर्थ्य उसी मात्रा में प्रकट करता है जिस मात्रा में वह उन्हें बाँटता है। वचन, जब त्यागे हुए लोगों से कहा जाता है, तो यद्यपि वह उनके सुधार के लिए प्रभावशाली नहीं होता, फिर भी उसका एक और उपयोग है। वह अभी उनके विवेक को झकझोरता है, और न्याय के दिन उन्हें और भी अधिक निरुत्तर कर देगा। इसी प्रकार हमारा उद्धारकर्ता, यह घोषणा करते हुए कि कोई उसके पास नहीं आ सकता जब तक पिता उसे न खींचे, और कि चुने हुए लोग पिता से सुनकर और सीखकर आते हैं (यूहन्ना 6:44, 45), शिक्षक का कार्य नहीं छोड़ देता, वरन् उन्हें भी ध्यान से बुलाता है जिन्हें कुछ लाभ पाने से पहले आत्मा के द्वारा भीतर से सिखाया जाना आवश्यक है। फिर त्यागे हुए लोगों को पौलुस यह स्मरण दिलाता है कि शिक्षा व्यर्थ नहीं है; क्योंकि जबकि वह उनमें मृत्यु के लिए मृत्यु की गन्ध है, फिर भी वह परमेश्वर के लिए सुखदायक सुगन्ध है (2 कुरिन्थियों 2:16)।
6. इस सिद्धान्त के शत्रु पवित्रशास्त्र के अंशों को इकट्ठा करने में बड़ा परिश्रम करते हैं, मानो वे अपने वज़न से कुछ न कर पाने के कारण हमें अपनी संख्या से दबा देना चाहते हों। परन्तु जैसे युद्ध में, जब हाथापाई की नौबत आती है, तो युद्ध-कला से अनजान भीड़ चाहे कितना ही ठाठ-बाट और दिखावा करे, कुछ ही प्रहारों के बाद हार मान लेती और भाग खड़ी होती है,178 वैसे ही यहाँ हमें अपने विरोधियों और उनकी सेना का निपटारा करने में थोड़ी ही कठिनाई होगी। जिन अंशों को वे हमारे विरोध में तोड़-मरोड़ते हैं, वे सब अपने आशय में बहुत मिलते-जुलते हैं; और इसलिए जब उन्हें उनके उचित शीर्षों के अन्तर्गत रखा जाए, तो एक ही उत्तर कई के लिए पर्याप्त होगा; प्रत्येक पर अलग से विचार करना आवश्यक नहीं है। आज्ञाएँ उनका गढ़ प्रतीत होती हैं। इन्हें वे हमारी सामर्थ्य के इतना अनुकूल समझते हैं कि स्वाभाविक रूप से यह निष्कर्ष निकलता है कि वे जो कुछ आज्ञा देती हैं, हम उसे पूरा कर सकते हैं। इसलिए वे सब आज्ञाओं पर दृष्टि दौड़ाते हैं, और उन्हीं से हमारी सामर्थ्य का माप ठहराते हैं। क्योंकि, वे कहते हैं, जब परमेश्वर नम्रता, अधीनता, प्रेम, पवित्रता, भक्ति और पवित्र जीवन की आज्ञा देता है, और क्रोध, अभिमान, चोरी, अशुद्धता, मूर्तिपूजा आदि को मना करता है, तो या तो वह हमारा उपहास करता है, या केवल वही माँगता है जो हमारे वश में है।
इस प्रकार जो सब आज्ञाएँ वे ढेर लगाते हैं, उन्हें तीन वर्गों में बाँटा जा सकता है। कुछ परमेश्वर की ओर प्रथम मन-फिराव की आज्ञा देती हैं, कुछ केवल व्यवस्था के पालन की बात करती हैं, और कुछ प्राप्त किए हुए अनुग्रह में स्थिर रहने का आग्रह करती हैं। हम पहले सामान्य रूप से आज्ञाओं पर विचार करेंगे, और फिर प्रत्येक वर्ग पर अलग-अलग। यह विचार कि मनुष्य की सामर्थ्य ईश्वरीय व्यवस्था की आज्ञाओं के बराबर है, बहुत समय से सामान्य रहा है, और उसमें कुछ सत्य का आभास भी है। परन्तु वह व्यवस्था की घोर अज्ञानता पर आधारित है। जो लोग यह कहने को कि व्यवस्था का पालन असम्भव है, एक प्रकार का पवित्र वस्तुओं का अपमान समझते हैं, वे अपने सबसे दृढ़ तर्क के रूप में यह आग्रह करते हैं कि यदि ऐसा है तो व्यवस्था व्यर्थ ही दी गई (infra, अध्याय 7, खण्ड 5)। क्योंकि वे ऐसे बोलते हैं मानो पौलुस ने व्यवस्था के विषय में कभी कुछ कहा ही न हो। परन्तु, कृपया बताइए, जब यह कहा जाता है कि व्यवस्था “अपराधों के कारण बाद में जोड़ी गई;” “व्यवस्था के द्वारा पाप की पहचान होती है;” “मैं पाप को न जानता यदि व्यवस्था से न जानता;” “व्यवस्था बीच में आ गई ताकि अपराध बहुत हो जाए,” (गलातियों 3:19; रोमियों 3:20; 7:7; 5:20) तो इसका क्या अर्थ है? क्या यह कि व्यवस्था को हमारी सामर्थ्य की सीमा में रखा जाना था, ताकि वह व्यर्थ न दी जाए? क्या यह नहीं कि वह हमसे बहुत ऊपर रखी गई, ताकि हम अपनी पूर्ण दुर्बलता के कायल हों? पौलुस सचमुच घोषणा करता है कि प्रेम व्यवस्था का अन्त और पूर्णता है (1 तीमुथियुस 1:5)। परन्तु जब वह प्रार्थना करता है कि थिस्सलुनीकियों के मन उससे भर जाएँ, तब वह स्पष्ट रूप से मान लेता है कि व्यवस्था हमारे कानों में बिना लाभ के गूँजती है, यदि परमेश्वर उसे हमारे हृदयों में भली-भाँति न बैठाए (1 थिस्सलुनीकियों 3:12)।
178 फ्रांसीसी पाठ यह है, “Mais c’est comme si un capitaine assembloit force gens qui ne fussent nullement duits ˆ la guerre pour espouvanter son ennemi. Avant que les mettre en œuvre, il feroient grande monstre; mais s’il faloit venir en bataille et joindre eontre son ennemi on les feroit fuir du premier coup.” परन्तु यह ऐसा है मानो कोई सेनापति शत्रु को चकित करने के लिए बहुत से ऐसे लोगों को इकट्ठा करे जिन्हें युद्ध का तनिक भी प्रशिक्षण न मिला हो। युद्ध में उतरने से पहले वे बड़ा दिखावा करते; परन्तु यदि उन्हें युद्ध में जाकर शत्रु से हाथापाई करनी पड़ती, तो पहले ही प्रहार में वे भाग खड़े होते।
7. मैं मानता हूँ कि यदि इस विषय पर पवित्रशास्त्र इसके सिवा और कुछ न सिखाता कि व्यवस्था जीवन का वह नियम है जिसके अनुसार हमें अपने कार्यों को ढालना चाहिए, तो मैं तुरन्त उनके मत से सहमत हो जाता; परन्तु क्योंकि वह ध्यानपूर्वक और स्पष्ट रूप से समझाता है कि व्यवस्था का उपयोग अनेक प्रकार का है, इसलिए उचित मार्ग यही है कि उसी व्याख्या से सीखा जाए कि मनुष्य में व्यवस्था की सामर्थ्य क्या है। वर्तमान प्रश्न के सम्बन्ध में, जबकि वह समझाती है कि हमारा कर्तव्य क्या है, वह यह भी सिखाती है कि उसे मानने की सामर्थ्य परमेश्वर की भलाई से आती है, और इसलिए वह हमसे आग्रह करती है कि हम प्रार्थना करें कि यह सामर्थ्य हमें दी जाए। यदि केवल आज्ञा होती और कोई प्रतिज्ञा न होती, तो यह परखना आवश्यक होता कि हमारा बल आज्ञा को पूरा करने के लिए पर्याप्त है या नहीं; परन्तु क्योंकि प्रतिज्ञाएँ जुड़ी हुई हैं, जो न केवल सहायता, वरन् यह भी घोषित करती हैं कि हमारी सम्पूर्ण सामर्थ्य ईश्वरीय अनुग्रह से आती है, इसलिए वे साथ ही भली-भाँति साक्षी देती हैं कि हम न केवल व्यवस्था का पालन करने में असमर्थ हैं, वरन् उसके विषय में नितान्त मूर्ख हैं। इसलिए हमारी सामर्थ्य और ईश्वरीय आज्ञाओं के बीच अनुपात की बात अब हमें और न सुननी पड़े, मानो प्रभु ने धार्मिकता का जो मानक वह व्यवस्था में देने को था, उसे हमारी दुर्बल क्षमताओं के अनुकूल बना दिया हो। हमें तो प्रतिज्ञाओं से यह सीखना चाहिए कि हम कितने दुर्दशाग्रस्त हैं, जिन्हें हर बात में अनुग्रह की इतनी आवश्यकता है। परन्तु वे कहते हैं, कौन विश्वास करेगा कि प्रभु ने अपनी व्यवस्था ठूँठों और पत्थरों के लिए दी? किसी से यह विश्वास कराने की कोई इच्छा नहीं है। अधर्मी लोग न ठूँठ हैं न पत्थर, जब व्यवस्था से यह सीखकर कि उनकी अभिलाषाएँ परमेश्वर को अप्रिय हैं, वे अपने ही अंगीकार से दोषी ठहरते हैं; और न भक्त लोग ठूँठ या पत्थर हैं, जब अपनी निर्बलता की चेतावनी पाकर वे अनुग्रह की शरण लेते हैं। इसी आशय से अगस्तीन की ये सारगर्भित उक्तियाँ हैं, “परमेश्वर वह आज्ञा देता है जो हम नहीं कर सकते, ताकि हम जानें कि हमें उससे क्या माँगना चाहिए। आज्ञाओं में बड़ा लाभ है, यदि स्वतंत्र इच्छा को जो कुछ दिया जाता है वह केवल ईश्वरीय अनुग्रह का और अधिक सम्मान करने के लिए है। व्यवस्था जो माँगती है, उसे विश्वास प्राप्त करता है; वरन् व्यवस्था इसीलिए माँगती है कि विश्वास वह प्राप्त करे जो इस प्रकार माँगा गया है; इतना ही नहीं, परमेश्वर हमसे विश्वास ही की माँग करता है, और जो वह इस प्रकार माँगता है उसे तब तक नहीं पाता जब तक देकर उसे पाया जाना सम्भव न बना दे।” फिर वह कहता है, “परमेश्वर जो आज्ञा देता है वह दे, और जो चाहता है उसकी आज्ञा दे।”179
8. यह बात आज्ञाओं के उन तीन वर्गों पर, जिनका हमने ऊपर उल्लेख किया, फिर से ध्यान देने से और स्पष्ट हो जाएगी। व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं, दोनों में परमेश्वर बार-बार हमें अपनी ओर फिरने को कहता है।180 परन्तु दूसरी ओर एक भविष्यद्वक्ता पुकार उठता है, “मुझे फेर, तब मैं फिरूँगा; क्योंकि तू मेरा परमेश्वर यहोवा है। निश्चय फिरने के बाद मैंने पश्चाताप किया।” वह हमें आज्ञा देता है कि हम अपने हृदय की खलड़ी का खतना करें; परन्तु मूसा घोषणा करता है कि वह खतना वह स्वयं अपने हाथ से करता है। बहुत से अंशों में वह नया हृदय माँगता है, परन्तु दूसरों में वह घोषणा करता है कि वह उसे देता है। जैसा अगस्तीन कहता है, “जिसकी प्रतिज्ञा परमेश्वर करता है, उसे हम स्वयं अपनी पसन्द या स्वभाव से नहीं करते, परन्तु वह स्वयं अनुग्रह से करता है।” यही टिप्पणी तब भी की गई है जब वह टिकोनियस के नियमों की गणना करते हुए उसके तीसरे नियम का सार यह बताता है—कि हम व्यवस्था और प्रतिज्ञाओं के बीच, अर्थात् आज्ञाओं और अनुग्रह के बीच, सावधानी से भेद करें (Augustin. de Doctrine Christiana, lib. 3)। अब वे जाएँ और आज्ञाओं से यह इकट्ठा करें कि मनुष्य की आज्ञाकारिता की सामर्थ्य क्या है, जबकि वे उस ईश्वरीय अनुग्रह को नष्ट करना चाहते हैं जिसके द्वारा आज्ञाएँ स्वयं पूरी होती हैं। दूसरे वर्ग की आज्ञाएँ केवल वे हैं
179 August. Enchir. ad Laurent. de Gratia et Liber. Arbit. cap. 16. Homil 29, in Joann. Ep. 24.
180 योएल 2:12; यिर्मयाह 31:18; व्यवस्थाविवरण 10:16; 30:6; यहेजकेल 36:26; यिर्मयाह 31:18। देखें Calvin. adv. Pighium. जो हमें परमेश्वर की आराधना करने, उसकी इच्छा को मानने और उससे लगे रहने, उसकी प्रसन्नता को पूरा करने और उसकी शिक्षा का अनुसरण करने की आज्ञा देती हैं। परन्तु असंख्य अंश साक्षी देते हैं कि शुद्धता, भक्ति, पवित्रता और धार्मिकता की जो भी मात्रा हमारे पास है, वह उसी का दान है। तीसरे वर्ग की आज्ञाओं में पौलुस और बरनबास का वह उपदेश है जो उन्होंने नए मत में आनेवालों को दिया, जैसा लूका ने लिखा है; उन्होंने “उन्हें परमेश्वर के अनुग्रह में बने रहने के लिए समझाया,” (प्रेरितों के काम 13:43)। परन्तु बने रहने की यह सामर्थ्य कहाँ से खोजी जाए, यह पौलुस अन्यत्र समझाता है, जब वह कहता है, “अन्त में, हे मेरे भाइयो, प्रभु में बलवन्त बनो,” (इफिसियों 6:10)। एक और स्थान पर वह कहता है, “परमेश्वर के पवित्र आत्मा को शोकित मत करो, जिससे तुम पर छुटकारे के दिन के लिए छाप दी गई है,” (इफिसियों 4:30)। परन्तु क्योंकि यहाँ जिस बात की आज्ञा दी गई है, वह मनुष्य से पूरी नहीं हो सकती थी, इसलिए वह थिस्सलुनीकियों के लिए प्रार्थना करता है कि परमेश्वर उन्हें “इस बुलाहट के योग्य ठहराए, और अपनी भलाई की सारी इच्छा और विश्वास के हर एक काम को सामर्थ्य सहित पूरा करे,” (2 थिस्सलुनीकियों 1:11)। इसी प्रकार, 2 कुरिन्थियों की पत्री में, दान के विषय में बात करते हुए, वह उनकी भली और भक्तिपूर्ण प्रवृत्ति की बार-बार प्रशंसा करता है। परन्तु थोड़ा आगे चलकर वह पुकार उठता है, “परमेश्वर का धन्यवाद हो, जिसने तीतुस के हृदय में तुम्हारे लिए वही उत्साह डाला है। क्योंकि उसने हमारा उपदेश स्वीकार किया,” (2 कुरिन्थियों 8:16, 17)। यदि तीतुस दूसरों को उपदेश देने के लिए मुँह का काम भी तभी तक कर सका जब तक परमेश्वर ने उसे सुझाया, तो यदि प्रभु यीशु उनके हृदयों को न सँभालता, तो दूसरे लोग कार्य करने में स्वेच्छा से कैसे चल सकते थे?
9. कुछ लोग, जो अपने को अधिक चतुर दिखाना चाहते हैं, इन सब अंशों से यह छल-भरी युक्ति लगाकर बचना चाहते हैं कि हमारे अपना भाग देने में कोई बाधा नहीं है, जबकि परमेश्वर साथ ही हमारी कमियों को पूरा करता है। इसके अतिरिक्त वे भविष्यद्वक्ताओं के वे अंश प्रस्तुत करते हैं जिनमें हमारे मन-फिराव का कार्य परमेश्वर और हमारे बीच बँटा हुआ प्रतीत होता है; “सेनाओं का यहोवा कहता है, तुम मेरी ओर फिरो, तब मैं तुम्हारी ओर फिरूँगा, सेनाओं का यहोवा यही कहता है,” (जकर्याह 1:3)। परमेश्वर हमें जिस प्रकार की सहायता देता है, वह ऊपर दिखाई जा चुकी है (खण्ड 7, 8), और उसे अब दोहराने की आवश्यकता नहीं। मैं केवल एक बात माने जाने का निवेदन करता हूँ कि यह सोचना व्यर्थ है कि हममें व्यवस्था को पूरा करने की सामर्थ्य है, केवल इसलिए कि हमें उसे मानने की आज्ञा दी गई है। क्योंकि ईश्वरीय आज्ञाओं को पूरा करने के लिए व्यवस्था-दाता का अनुग्रह आवश्यक भी है और हमसे प्रतिज्ञा भी किया गया है, इसलिए कम से कम यह तो स्पष्ट है कि हमसे उससे अधिक माँगा जाता है जितना हम चुका सकते हैं। और कोई भी कुतर्क यिर्मयाह की उस घोषणा से बच नहीं सकता कि जो वाचा परमेश्वर ने अपने प्राचीन लोगों से बाँधी थी वह तोड़ दी गई, क्योंकि वह केवल अक्षर की थी—कि उसे प्रभावशाली बनाने के लिए आवश्यक था कि आत्मा बीच में आकर हृदय को आज्ञाकारिता का प्रशिक्षण दे (यिर्मयाह 31:32)। जिस मत का हम अब विरोध कर रहे हैं, उसे इन शब्दों से कोई सहायता नहीं मिलती, “मेरी ओर फिरो, तब मैं तुम्हारी ओर फिरूँगा।” वहाँ जिस फिरने की बात है, वह वह नहीं जिससे परमेश्वर पश्चाताप के लिए हृदय को नया करता है; वरन् वह है जिसमें वह समृद्धि देकर अपनी कृपा और अनुग्रह प्रकट करता है, ठीक वैसे ही जैसे वह कभी-कभी विपत्ति भेजकर अपनी अप्रसन्नता प्रकट करता है। जब लोगों ने अपने ऊपर आई अनेक विपत्तियों में शिकायत की कि परमेश्वर ने उन्हें त्याग दिया है, तो वह उत्तर देता है कि उसकी कृपा उन पर से न हटेगी, यदि वे सही मार्ग पर, और उसकी ओर, जो धार्मिकता का मानक है, लौट आएँ। इसलिए उस अंश को उसके उचित अर्थ से खींच लिया जाता है जब उससे इस विचार का समर्थन कराया जाता है कि मन-फिराव का कार्य परमेश्वर और मनुष्य में बँटा हुआ है (supra, अध्याय 2, खण्ड 27)। हमने इस विषय को केवल संक्षेप में छुआ है, क्योंकि इसके लिए उचित स्थान तब आएगा जब हम व्यवस्था पर विचार करेंगे (अध्याय 7, खण्ड 2 और 3)।
10. आपत्तियों का दूसरा वर्ग पहले के समान ही है। वे उन प्रतिज्ञाओं को प्रस्तुत करते हैं जिनमें प्रभु हमारी इच्छा के साथ सन्धि करता है। ऐसी ये हैं: “भलाई को ढूँढ़ो, बुराई को नहीं, ताकि तुम जीवित रहो,” (आमोस 5:14)। “यदि तुम इच्छुक होकर मान जाओ, तो इस देश के उत्तम पदार्थ खाओगे; और यदि तुम इनकार करो और बलवा करो, तो तलवार से मारे जाओगे; क्योंकि यहोवा का यही वचन है,” (यशायाह 1:19, 20)। “यदि तू अपनी घिनौनी वस्तुओं को मेरे सामने से दूर करे, तो तू इधर-उधर न भटकेगा,” (यिर्मयाह 4:1)। “यदि तू अपने परमेश्वर यहोवा की बात ध्यान से सुने, और उसकी सारी आज्ञाओं को, जो मैं आज तुझे सुनाता हूँ, चौकसी से पूरा करे, तो यहोवा तेरा परमेश्वर तुझे पृथ्वी की सारी जातियों में श्रेष्ठ करेगा,” (व्यवस्थाविवरण 28:1)। ऐसे ही और अंश भी हैं (लैव्यव्यवस्था 26:3, इत्यादि)। वे समझते हैं कि इन प्रतिज्ञाओं में जो आशीषें हैं, वे हमारी इच्छा के सामने व्यर्थ और उपहास के रूप में रखी गई हैं, यदि उन्हें पाना या ठुकराना हमारे वश में नहीं है। इस विषय में विलाप-भरी बातें करना सचमुच सरल है, यह कहना कि प्रभु हमारा निर्दयता से उपहास करता है,181 जब वह घोषणा करता है कि उसकी कृपा हमारी इच्छाओं पर निर्भर है यदि हम अपनी इच्छाओं के स्वामी नहीं हैं—कि परमेश्वर की ओर से यह एक विचित्र उदारता होगी कि वह अपनी आशीषें हमारे सामने रखे, जबकि हममें उन्हें भोगने की सामर्थ्य नहीं है,—प्रतिज्ञाओं की यह एक विचित्र निश्चितता है, जो इसलिए कि कभी पूरी न हों, एक असम्भवता पर निर्भर कर दी गई हैं। इस प्रकार की प्रतिज्ञाओं के विषय में, जिनके साथ शर्त जुड़ी है, हम अन्यत्र बात करेंगे, और स्पष्ट करेंगे कि उनके पूरे होने की असम्भवता में कोई असंगति नहीं है। प्रस्तुत विषय के सम्बन्ध में मैं इस बात से इनकार करता हूँ कि परमेश्वर हमारा निर्दयता से उपहास करता है जब वह हमें उन आशीषों के योग्य बनने का निमन्त्रण देता है जिनके योग्य बनने में, जैसा वह जानता है, हम सर्वथा असमर्थ हैं। प्रतिज्ञाएँ विश्वासियों और अधर्मियों को समान रूप से दी जाती हैं, इसलिए दोनों के सम्बन्ध में उनका उपयोग है। जैसे परमेश्वर अपनी आज्ञाओं से अधर्मियों के विवेक को चुभोता है, ताकि वे अपने पापों का सुख न भोगें और उसके न्याय को याद न करें, वैसे ही अपनी प्रतिज्ञाओं में वह एक प्रकार से उन्हें साक्षी बनाता है कि वे उसकी कृपा के कितने अयोग्य हैं। कौन इनकार कर सकता है कि परमेश्वर के लिए यह अत्यन्त न्यायसंगत और उचित है कि वह अपने आराधकों का भला करे और अपनी महिमा का तिरस्कार करनेवालों को उचित कठोरता से दण्ड दे? इसलिए परमेश्वर उचित क्रम में चलता है, जब दुष्ट लोग पाप की बेड़ियों में जकड़े हुए हैं, तब भी वह अपनी प्रतिज्ञाओं में यह नियम ठहराता है कि वह उनका भला तभी करेगा जब वे अपनी दुष्टता से फिरें। यह उचित होता, चाहे उसका एकमात्र उद्देश्य उन्हें यह समझाना ही होता कि वे अपने सच्चे आराधकों के लिए निर्धारित कृपा से उचित रूप से वंचित हैं। दूसरी ओर, क्योंकि वह हर प्रकार से विश्वासियों को अपने अनुग्रह के लिए प्रार्थना करने को उभारना चाहता है, इसलिए यह निश्चय ही आश्चर्यजनक न लगना चाहिए कि वह प्रतिज्ञाओं के द्वारा वही प्राप्त करने का प्रयत्न करता है जो, जैसा हम दिखा चुके हैं, वह उनके बड़े लाभ के लिए आज्ञाओं के द्वारा प्राप्त करता है। आज्ञाओं से यह सीखकर कि परमेश्वर की इच्छा क्या है, हमें अपनी दुर्दशा का स्मरण होता है कि हम उस इच्छा से इतने पूर्णतः भिन्न हैं, और साथ ही हम इसके लिए भी उभारे जाते हैं कि सही मार्ग पर हमारी अगुवाई के लिए आत्मा की सहायता माँगें। परन्तु क्योंकि हमारा आलस्य आज्ञाओं से पर्याप्त रूप से नहीं जागता, इसलिए प्रतिज्ञाएँ जोड़ी गई हैं, ताकि वे अपनी मिठास से हमें खींचें और आज्ञा के प्रति प्रेम उत्पन्न करें। धार्मिकता के लिए हमारी अभिलाषा जितनी बड़ी होगी, परमेश्वर के अनुग्रह को पाने के लिए हमारी तत्परता भी उतनी ही बड़ी होगी। और इस प्रकार यह होता है कि इन घोषणाओं में, यदि हम इच्छुक हों, यदि तू सुने, प्रभु न तो हममें इच्छा करने और सुनने की पूर्ण सामर्थ्य मानता है, और न हमारी असमर्थता का उपहास करता है।182
181 फ्रांसीसी पाठ यह है, “Et de fait cette raison a grande apparence humainement. Car on peut deduire gue ce seroit une cruauté de Dieu,”&c.—और वास्तव में, मानवीय दृष्टि से इस तर्क में बड़ी विश्वसनीयता है। क्योंकि यह कहा जा सकता है कि यह परमेश्वर की ओर से निर्दयता होती, इत्यादि।
11. आपत्तियों का तीसरा वर्ग पहले दोनों से बहुत भिन्न नहीं है। क्योंकि वे ऐसे अंश प्रस्तुत करते हैं जिनमें परमेश्वर अपने लोगों को उनकी कृतघ्नता के लिए उलाहना देता है, यह संकेत करते हुए कि इसमें उसका दोष नहीं था कि उन्हें उसकी कृपा से हर प्रकार की आशीष नहीं मिली। ऐसे अंशों के उदाहरण ये हैं: “अमालेकी और कनानी तुम्हारे आगे हैं, और तुम तलवार से मारे जाओगे; क्योंकि तुम यहोवा के पीछे चलने से फिर गए हो, इसलिए यहोवा तुम्हारे साथ न होगा,” (गिनती 14:43)। “यहोवा कहता है, इसलिए कि तुम ने ये सब काम किए हैं, और मैं ने तुम से तड़के उठकर बातें कीं, परन्तु तुम ने न सुना; और मैं ने तुम्हें बुलाया, परन्तु तुम ने उत्तर न दिया; इस कारण जिस भवन पर मेरा नाम रखा गया है और जिस पर तुम भरोसा रखते हो, और जो स्थान मैं ने तुम को और तुम्हारे पितरों को दिया, उसकी दशा मैं वैसी ही कर दूँगा जैसी मैं ने शीलो की की,” (यिर्मयाह 7:13, 14)। “उन्होंने तेरी बात न मानी, और न तेरी व्यवस्था पर चले; जो कुछ तू ने उन्हें करने की आज्ञा दी थी उसमें से उन्होंने कुछ भी नहीं किया; इसलिए तू ने यह सारी विपत्ति उन पर डाली है,” (यिर्मयाह 32:23)। वे पूछते हैं, ऐसा उलाहना उन पर कैसे डाला जा सकता है जिनके वश में है कि वे तुरन्त उत्तर दें,—समृद्धि हमें प्रिय थी; हम विपत्ति से डरते थे; हमने एक को पाने और दूसरे से बचने के लिए प्रभु की आज्ञा नहीं मानी और उसकी बात नहीं सुनी, तो इसका कारण यह है कि पाप के प्रभुत्व के अधीन होने के कारण ऐसा करना हमारे लिए स्वतंत्र नहीं था; इसलिए उन बुराइयों के लिए हमें उलाहना देना व्यर्थ है जिनसे बचना हमारे वश में नहीं था। परन्तु अनिवार्यता के बहाने को छोड़ दें, जो उनके आचरण का एक निर्बल और खोखला बचाव है, मैं पूछता हूँ, क्या वे अपना दोष अस्वीकार कर सकते हैं? यदि वे किसी दोष के कारण दोषी ठहरते हैं, तो प्रभु इसमें अन्यायी नहीं कि वह उन्हें इस बात का उलाहना दे कि उन्होंने अपनी ही हठ से अपने आप को उसकी कृपा के लाभों से वंचित कर लिया। तो वे बताएँ कि क्या वे इनकार कर सकते हैं कि उनकी अपनी इच्छा ही उनके विद्रोह का भ्रष्ट कारण है। यदि उन्हें अपने ही भीतर दुष्टता का सोता मिलता है, तो वे बाहरी कारणों के विषय में बड़बड़ाते क्यों खड़े हैं, यह दिखाने के लिए कि वे अपने विनाश के कर्ता नहीं हैं? यदि यह सच है कि पापी दूसरे के दोषों के कारण ईश्वरीय कृपा से वंचित नहीं किए जाते और दण्ड नहीं भोगते, तो इसका उचित कारण है कि वे ये डाँट परमेश्वर के मुँह से सुनें। यदि वे हठपूर्वक अपने दुर्गुणों में बने रहें, तो वे अपनी विपत्तियों में सीखें कि अपनी ही दुष्टता पर दोष लगाएँ और उससे घृणा करें, बजाय इसके कि परमेश्वर पर निर्दयता और अन्याय का आरोप लगाएँ। यदि उन्होंने सिखाए जाने की तत्परता नहीं दिखाई, तो वे उन पापों से, जिन्हें वे अपनी दुर्दशा और विनाश का कारण देखते हैं, घृणा करके सही मार्ग पर लौट आएँ, और सच्चे पश्चाताप के साथ वही बात मान लें जिसका स्मरण प्रभु अपनी डाँट से दिलाता है। ऊपर उद्धृत भविष्यद्वक्ताओं के उलाहने विश्वासियों के लिए कितने उपयोगी हैं, यह दानिय्येल की उस गम्भीर प्रार्थना से प्रकट होता है जो उसके नौवें अध्याय में दी गई है। अधर्मियों के सम्बन्ध में उनका उपयोग हम यहूदियों में देखते हैं, जिनसे यिर्मयाह को आज्ञा दी गई कि उनकी विपत्तियों का कारण समझाए, यद्यपि परिणाम उससे भिन्न नहीं हो सकता था जो प्रभु ने पहले से कह दिया था। “इसलिए तू उनसे ये सब बातें कहेगा, परन्तु वे तेरी न सुनेंगे; तू उन्हें पुकारेगा, परन्तु वे तुझे उत्तर न देंगे,” (यिर्मयाह 7:27)। तो फिर बहरों से बात करने का क्या लाभ था? यह कि उन्हें अनिच्छा से भी यह समझ में आए
