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रोमी पीठ की प्रधानता के विषय में
अध्याय 6।
रोमी पीठ की प्रधानता के विषय में।
इस अध्याय के विभाग ये हैं—I. प्रश्न का कथन, और पुराने नियम से रोमी पोप की प्रधानता के पक्ष में दिए गए तर्क का खण्डन, खण्ड 1, 2। II. “तू पतरस है,” आदि शब्दों पर आधारित पोप-तन्त्र के पक्ष में दिए गए विविध तर्कों का उत्तर, खण्ड 3-17।
खण्ड।
1. संक्षिप्त पुनरावलोकन। प्रधानता का विषय अब तक क्यों नहीं छेड़ा गया। पोप के अनुयायी इसे कलीसियाई एकता का बन्धन बताते हैं। इसी सिद्धान्त को लेकर वे अपने पदानुक्रम पर विवाद आरम्भ करते हैं।
2. प्रश्न का कथन। यहूदियों में महायाजक के पद से प्रमाण देने का प्रयत्न। दो उत्तर।
3. नए नियम से प्रधानता के पक्ष में तर्क। दो उत्तर।
4. एक और उत्तर। राज्य की कुंजियाँ पतरस के साथ अन्य प्रेरितों को भी दी गईं। दो अन्य तर्कों का उत्तर सिप्रियन और अगस्तीन के अंशों से।
5. एक और तर्क का उत्तर।
6. इस तर्क का उत्तर कि कलीसिया पतरस पर स्थापित है, क्योंकि कहा गया है, “इस चट्टान पर मैं अपनी कलीसिया बनाऊँगा।”
7. उत्तर की पुष्टि पवित्रशास्त्र के अंशों से।
8. यदि किसी बात में पतरस की श्रेष्ठता मान भी ली जाए, तो इससे रोमी पोप की प्रधानता सिद्ध नहीं होती। अन्य तर्कों का उत्तर।
9. नागरिक और कलीसियाई शासन में भेद। मसीह ही कलीसिया का एकमात्र सिर है। यह तर्क कि फिर भी एक सेवक-रूप सिर है, उसका उत्तर।
10. कलीसिया का चित्र खींचते समय पौलुस इस सेवक-रूप सिर का कोई उल्लेख नहीं करता।
11. यदि पतरस सेवक-रूप सिर होता भी, तो इससे यह नहीं निकलता कि पोप भी वैसा ही है। इस बात पर आधारित तर्क कि पौलुस रोम में रहा और वहीं मरा।
12. पोप के अनुयायियों की कल्पना के अनुसार प्रधानता अन्ताकिया की कलीसिया की ठहरती है।
13. पोप-तन्त्रीय कल्पना की असंगति।
14. पतरस रोम का अध्यक्ष नहीं था।
15. यही विषय जारी।
16. यह तर्क कि पृथ्वी पर एक सर्वोच्च सिर के बिना कलीसिया की एकता बनी नहीं रह सकती। उत्तर, जिसमें तीन कारण बताए गए हैं कि आरम्भिक काल में रोम की पीठ को इतना आदर क्यों दिया गया।
17. कलीसिया की एकता के विषय में आरम्भिक काल का मत। रोम की कलीसिया को कोई प्रधानता नहीं दी गई। केवल मसीह ही सार्वभौमिक कलीसिया का सिर माना गया।
1. अब तक हमने उन कलीसियाई पदों की समीक्षा की है जो आदि कलीसिया के शासन में थे; परन्तु वे समय के साथ बिगड़ते गए, फिर और भी अधिक दूषित हुए, और अब पोप की कलीसिया में केवल नाम भर रह गए हैं, वस्तुतः मुखौटों के सिवा कुछ नहीं, ताकि इस विरोधाभास से भक्त पाठक यह परख सके कि वह कैसी कलीसिया है जिसे छोड़ने के कारण हम पर फूट डालने का दोष लगाया जाता है। परन्तु सम्पूर्ण विषय के शिरोमणि और मुकुट को, अर्थात् रोमी पीठ की प्रधानता को, जिससे वे यह सिद्ध करने का बीड़ा उठाते हैं कि कैथोलिक कलीसिया केवल उन्हीं के पास पाई जाती है,557 हमने अब तक नहीं छुआ, क्योंकि उसका आरम्भ न मसीह की स्थापना से हुआ, न आदि कलीसिया की प्रथा से, जैसा कि उन अन्य अंशों का हुआ, जिनके विषय में हम यह दिखा चुके हैं कि वे आरम्भ में प्राचीन थे, परन्तु समय बीतते-बीतते पूरी तरह बिगड़ गए, वरन् बिलकुल नया रूप धारण कर बैठे। तो भी वे संसार को यह विश्वास दिलाने का यत्न करते हैं कि कलीसियाई एकता का मुख्य और एकमात्र बन्धन रोमी पीठ से जुड़े रहना और उसके अधीन बने रहना है। मैं कहता हूँ कि जब वे हमें कलीसिया से वंचित करके उसे अपने ही लिए हथियाना चाहते हैं, तब जिस टेक पर वे मुख्यतः टिकते हैं, वह यह है कि उनके पास वह सिर है जिस पर कलीसिया की एकता निर्भर है, और जिसके बिना वह अवश्य ही फट जाएगी और बिखर जाएगी। क्योंकि यदि कलीसिया रोमी पीठ को अपना सिर मानकर उसके अधीन न हो, तो वे उसे एक प्रकार का कटा-छँटा धड़ मानते हैं। इसलिए जब वे अपने पदानुक्रम पर विवाद करते हैं तो सदा इसी सिद्धान्त से आरम्भ करते हैं: रोमी पोप (मसीह का प्रतिनिधि होने के नाते, जो कलीसिया का सिर है) उसके स्थान पर सार्वभौमिक कलीसिया पर अध्यक्षता करता है, और कलीसिया तब तक ठीक रीति से गठित नहीं है जब तक वह पीठ सब अन्य पीठों पर प्रधानता न रखे। इसलिए इस दावे के स्वरूप पर विचार किया जाना चाहिए, ताकि कलीसिया के उचित शासन से सम्बन्ध रखनेवाली कोई बात छूट न जाए।
2. तो प्रश्न इस प्रकार रखा जा सकता है: क्या पदानुक्रम (जैसा कि वे इसे कहते हैं) की, अर्थात् कलीसियाई व्यवस्था की, सच्ची रीति के लिए यह आवश्यक है कि एक पीठ मर्यादा और अधिकार में दूसरों से बढ़कर हो, और इस प्रकार सारी देह का सिर हो? यदि हम परमेश्वर के वचन की अनुमति के बिना कलीसिया पर यह आवश्यकता थोपते हैं तो हम उसे अन्यायपूर्ण व्यवस्थाओं के अधीन करते हैं। इसलिए यदि हमारे विरोधी अपनी बात सिद्ध करना चाहते हैं, तो उनका पहला कर्तव्य है कि वे दिखाएँ कि यह प्रबन्ध मसीह का ठहराया हुआ है। इसके लिए वे व्यवस्था के अधीन महायाजक के पद का, और उस सर्वोच्च अधिकार-क्षेत्र का हवाला देते हैं जिसे परमेश्वर ने यरूशलेम में स्थापित किया था।558 परन्तु उत्तर सरल है, और यदि कोई एक से सन्तुष्ट न हो तो अनेक हैं। पहला, कोई कारण हमें बाध्य नहीं करता कि जो बात एक जाति के लिए उपयोगी थी उसे सारे संसार पर लागू करें; वरन् एक जाति का मामला और सारे संसार का मामला एक-दूसरे से बहुत भिन्न हैं। क्योंकि यहूदी चारों ओर से मूर्तिपूजकों से घिरे हुए थे, इसलिए परमेश्वर ने अपनी आराधना का स्थान पृथ्वी के मध्य प्रदेश में ठहराया, ताकि वे नाना प्रकार के धर्मों में भटक न जाएँ; वहाँ उसने एक याजक ठहराया जिसकी ओर वे सब देखें, कि एकता में भली-भाँति बने रहें। परन्तु अब जब सच्चा धर्म सारे भूमण्डल में फैल गया है, तो कौन नहीं देखता कि पूर्व और पश्चिम का शासन एक ही व्यक्ति को सौंप देना सर्वथा बेतुका है? यह ठीक वैसा ही है मानो कोई यह तर्क करे कि सारा संसार एक ही प्रशासक के शासन में होना चाहिए, क्योंकि एक जिले में कई प्रशासक नहीं हैं।559 परन्तु एक और कारण भी है कि उस विधान को आदर्श नहीं बनाया जाना चाहिए। सब जानते हैं कि महायाजक मसीह का एक प्रतिरूप था; अब, याजकपद के बदल जाने पर वह अधिकार भी बदल जाना अवश्य है। तो वह किसे सौंपा गया? निश्चय ही पोप को नहीं, जैसा कि वह निर्लज्जता से घमण्ड करता है जब यह उपाधि अपने लिए हथियाता है, परन्तु मसीह को, जो इस पद को अकेला बिना प्रतिनिधि या उत्तराधिकारी के धारण करता है और यह सम्मान किसी दूसरे को नहीं सौंपता। क्योंकि यह याजकपद केवल शिक्षा में नहीं, वरन् उस प्रायश्चित में है जो मसीह ने अपनी मृत्यु से किया, और उस मध्यस्थता में है जो वह अब पिता के सामने करता है (इब्रानियों 7:11)।
557 देखिए कैल्विन की रचनाएँ Adversus Concilium Tridentinum, तथा Adversus Theologos Parisienses।
3. इसलिए उस उदाहरण को, जो अस्थायी था, वे हम पर सदा की व्यवस्था की भाँति बाँधने का कोई अधिकार नहीं रखते। नए नियम में ऐसा कुछ नहीं जिसे वे अपने मत की पुष्टि में प्रस्तुत कर सकें, सिवा इसके कि एक से कहा गया था, “तू पतरस है, और इस चट्टान पर मैं अपनी कलीसिया बनाऊँगा” (मत्ती 16:18)। फिर, “हे यूहन्ना के पुत्र शमौन, क्या तू मुझसे प्रेम रखता है?” “मेरे मेमनों को चरा” (यूहन्ना 21:15)। परन्तु इन प्रमाणों में बल डालने के लिए उन्हें पहले यह दिखाना होगा कि जिसे मसीह की भेड़-बकरियों को चराने की आज्ञा दी गई है उसे सब कलीसियाओं पर अधिकार दिया गया है, और बाँधना और खोलना सारे संसार पर अध्यक्षता करने के सिवा और कुछ नहीं है। परन्तु जैसे पतरस ने प्रभु से आज्ञा पाई थी, वैसे ही वह अन्य सब प्राचीनों को भी कलीसिया को चराने का उपदेश देता है (1 पतरस 5:2)। इसलिए हम यह निष्कर्ष निकालने के अधिकारी हैं कि मसीह के उस कथन से पतरस को दूसरों से अधिक कुछ नहीं दिया गया, अथवा जो अधिकार पतरस को मिला था उसमें उसने दूसरों को भी बराबर साझी किया। परन्तु व्यर्थ तर्क न करते हुए, हमारे पास अन्यत्र स्वयं मसीह के मुख से इस बात की स्पष्ट व्याख्या है कि बाँधने और खोलने का क्या अर्थ है। वह यही है कि पाप रखना और क्षमा करना (यूहन्ना 10:23)। खोलने और बाँधने की रीति सारे पवित्रशास्त्र में समझाई गई है: परन्तु विशेष रूप से उस अंश में जहाँ पौलुस घोषणा करता है कि सुसमाचार के सेवक इसलिए नियुक्त किए गए हैं कि मनुष्यों को परमेश्वर से मेल-मिलाप कराएँ, और साथ ही उन पर अनुशासन भी चलाएँ जो इस अनुग्रह को ठुकराते हैं (2 कुरिन्थियों 5:18; 10:16)।
558 फ्रांसीसी में: “Pour ce faire, ils alleguent la pretrise souveraine qui etoit en la loy, et la jurisdiction souveraine du grand sacrificateur, que Dieu avoit establie en Jerusalem.”—इस उद्देश्य से वे व्यवस्था के अधीन सर्वोच्च याजकपद का, और महायाजक के उस सर्वोच्च अधिकार-क्षेत्र का हवाला देते हैं जिसे परमेश्वर ने यरूशलेम में स्थापित किया था।
559 “Car c’est tout ainsi comme si quelcun debattoit que le monde doit etre gouverné par un baillie ou seneschal parce que chacune province a le sien.”—क्योंकि यह ठीक वैसा ही है मानो कोई यह मत रखे कि सारा संसार एक बैली या सेनेशल के शासन में होना चाहिए, क्योंकि प्रत्येक प्रान्त का अपना एक है।
4. बाँधने और खोलने के अंशों को वे कितने अनुचित ढंग से तोड़ते-मरोड़ते हैं, इसकी ओर मैं अन्यत्र संकेत कर चुका हूँ, और थोड़े ही समय में अधिक पूर्णता से समझाऊँगा। अभी केवल यह देखना पर्याप्त होगा कि हमारे उद्धारकर्ता के पतरस को दिए गए उस प्रसिद्ध उत्तर से वे क्या निकाल सकते हैं। उसने उसे स्वर्ग के राज्य की कुंजियाँ देने की प्रतिज्ञा की, और कहा कि जो कुछ वह पृथ्वी पर बाँधेगा वह स्वर्ग में बँधेगा (मत्ती 16:19)। जैसे ही हम कुंजियों के अर्थ और बाँधने की रीति पर सहमत हो जाएँगे, सारा विवाद थम जाएगा। क्योंकि पोप प्रेरितों को सौंपे गए उस कार्य को खुशी से छोड़ देगा, जो परिश्रम और कष्ट से भरा होने के कारण उसके विलासों में बाधा डालता और कोई लाभ नहीं देता। चूँकि सुसमाचार की शिक्षा से हमारे लिए स्वर्ग खुलता है, इसलिए एक सुन्दर रूपक के द्वारा उसे कुंजियों का नाम दिया गया है। फिर, मनुष्य केवल इसी रीति से बाँधे और खोले जाते हैं कि खोलने की दशा में वे विश्वास के द्वारा परमेश्वर से मेल-मिलाप पाते हैं, और बाँधने की दशा में अविश्वास के द्वारा और भी कसकर बँध जाते हैं। यदि पोप केवल इतना ही अपने लिए चाहता, तो मेरा विश्वास है कि कोई उससे डाह करने या प्रश्न उठाने वाला न होता। परन्तु क्योंकि यह परिश्रम-भरा और लाभ से कोसों दूर उत्तराधिकार पोप को किसी प्रकार नहीं भाता, इसलिए तुरन्त यह विवाद उठ खड़ा होता है कि मसीह ने पतरस को क्या देने की प्रतिज्ञा की थी। मामले के स्वभाव से ही मैं यह निष्कर्ष निकालता हूँ कि इससे उस गरिमा के सिवा और कुछ नहीं बताया गया जो प्रेरिताई के बोझ से अलग नहीं की जा सकती। क्योंकि जो परिभाषा मैंने दी है उसे मानते हुए (और उसे बिना ढिठाई के ठुकराया नहीं जा सकता), यहाँ पतरस को ऐसा कुछ नहीं दिया गया जो उसके साथी प्रेरितों के साथ उसकी साझी न हो। अन्यथा न केवल उनके व्यक्तियों के साथ अन्याय होगा, वरन् शिक्षा की महिमा ही घट जाएगी। वे आपत्ति करते हैं; परन्तु भला इस चट्टान से टकराने में क्या मिलता है? अधिक से अधिक वे इतना ही सिद्ध कर सकते हैं कि जैसे उसी सुसमाचार का प्रचार सब प्रेरितों को सौंपा गया था, वैसे ही बाँधने और खोलने की शक्ति भी उन्हें साझी दी गई। वे कहते हैं कि मसीह ने कुंजियाँ देने की प्रतिज्ञा करते समय पतरस को सारी कलीसिया का प्रधान ठहराया। परन्तु जो उसने तब एक से प्रतिज्ञा की, वही अन्यत्र सब शेष को सौंपता है, और मानो उनके हाथ में दे देता है। यदि जो अधिकार एक से प्रतिज्ञा किया गया था वही सब को दिया गया, तो वह एक अपने साथियों से किस बात में श्रेष्ठ ठहरा? वे कहते हैं कि वह इसमें श्रेष्ठ है कि जो दूसरों को केवल साझे में दिया जाता है, वह उसे साझे में भी पाता है और अकेले भी। यदि मैं सिप्रियन और अगस्तीन के साथ यह उत्तर दूँ कि मसीह ने यह एक को दूसरे से बढ़ाने के लिए नहीं, वरन् अपनी कलीसिया की एकता को सराहने के लिए किया, तो क्या? क्योंकि सिप्रियन इस प्रकार कहता है: “एक मनुष्य के व्यक्तित्व में उसने सब को कुंजियाँ दीं, ताकि सब की एकता को दर्शाए; इसलिए शेष वही थे जो पतरस था, क्योंकि वे सम्मान और अधिकार की बराबर साझेदारी में लिए गए थे, परन्तु आरम्भ एकता से किया गया है, ताकि मसीह की कलीसिया एक दिखाई जाए” (सिप्रियन, de Simplic. Prælat.)। अगस्तीन के शब्द ये हैं, “यदि कलीसिया का भेद पतरस में न होता, तो हमारा प्रभु उससे यह न कहता कि मैं तुझे कुंजियाँ दूँगा। क्योंकि यदि यह पतरस ही से कहा गया, तो कलीसिया के पास वे नहीं हैं; परन्तु यदि कलीसिया के पास हैं, तो जब पतरस ने कुंजियाँ पाईं तब वह सारी कलीसिया का प्रतिनिधित्व कर रहा था” (August. Hom. in Joann. 50)। फिर, “पूछा सब से गया था, परन्तु अकेला पतरस उत्तर देता है, तू मसीह है; और उससे कहा जाता है, मैं तुझे कुंजियाँ दूँगा; मानो बाँधने और खोलने की शक्ति उसी अकेले ने पाई हो; जबकि उसने सब की ओर से कहा, और सब के साथ साझे में पाया, मानो वह एकता का प्रतिनिधि था। एक ने सब के लिए पाया, क्योंकि सब में एकता है” (Hom. 124)।
5. परन्तु हम कहीं नहीं पढ़ते कि किसी और से कहा गया हो, “तू पतरस है, और इस चट्टान पर मैं अपनी कलीसिया बनाऊँगा”! (मत्ती 16:18); मानो मसीह ने तब पतरस के विषय में कोई ऐसी बात कही जो पौलुस और स्वयं पतरस सब मसीहियों के विषय में नहीं कहते (इफिसियों 2:20; 1 पतरस 2:5)। पहला मसीह को प्रधान कोने का पत्थर बताता है, जिस पर वे सब बनाए जाते हैं जो प्रभु में एक पवित्र मन्दिर बनने के लिए बढ़ते जाते हैं; दूसरा हमें जीवते पत्थर बताता है जो उस चुने हुए और बहुमूल्य पत्थर पर नींव डाले गए हैं, और इस प्रकार जुड़कर और गठकर हमारे परमेश्वर से और एक-दूसरे से मिले हुए हैं। वे कहते हैं कि पतरस दूसरों से ऊपर है, क्योंकि यह नाम विशेष रूप से उसी को दिया गया था। मैं खुशी से पतरस को यह सम्मान देता हूँ कि कलीसिया के निर्माण में वह पहले लोगों में गिना जाए, अथवा (यदि वे चाहें) विश्वासियों में प्रथम हो; परन्तु मैं उन्हें इससे यह निष्कर्ष निकालने नहीं दूँगा कि दूसरों पर उसकी प्रधानता है। क्योंकि यह कैसा निष्कर्ष है? पतरस उत्साह की प्रचण्डता में, शिक्षा में, उदारता में दूसरों से बढ़कर है; इसलिए उन पर उसका अधिकार है: मानो हम इससे कहीं अधिक युक्तिसंगत रीति से यह निष्कर्ष न निकाल सकते कि अन्द्रियास क्रम में पतरस से पहले है, क्योंकि वह समय में उससे पहले आया और उसे मसीह के पास ले आया (यूहन्ना 1:40, 42); परन्तु इसे मैं छोड़ता हूँ। पतरस को श्रेष्ठता प्राप्त हो, तो भी पद के सम्मान और अधिकार के स्वामित्व में बड़ा भेद है। हम देखते हैं कि प्रेरित प्रायः सभा में बोलना पतरस पर छोड़ देते थे, और कुछ अंश में वृत्तान्त सुनाने, उपदेश देने और चेतावनी देने में उसे आगे रखते थे, परन्तु अधिकार की कोई बात हम कहीं बिलकुल नहीं पढ़ते।
6. यद्यपि हम वाद-विवाद के उस भाग तक अभी नहीं पहुँचे हैं, फिर भी इस समय मैं केवल इतना कहना चाहता हूँ कि जो लोग पतरस के नाम मात्र से सारी कलीसिया पर शासन का अधिकार खड़ा करना चाहते हैं, वे कितना निरर्थक तर्क करते हैं। क्योंकि वह पुरानी कुतर्क-बाज़ी जिसे उन्होंने आरम्भ में रंग चढ़ाने के लिए अपनाया था—अर्थात् कलीसिया पतरस पर स्थापित है, क्योंकि कहा गया है, “इस चट्टान पर,” आदि—ध्यान देने के योग्य नहीं, खण्डन की तो बात ही क्या। कुछ प्राचीन पिताओं ने ऐसी ही व्याख्या की थी!560 परन्तु जब सारा पवित्रशास्त्र उस व्याख्या के विरुद्ध है, तो परमेश्वर के विरोध में उनका अधिकार क्यों प्रस्तुत किया जाता है? वरन् हम इन शब्दों के अर्थ पर ऐसे क्यों झगड़ें मानो वह अस्पष्ट या दुविधापूर्ण हो, जबकि इससे अधिक स्पष्ट और निश्चित कुछ हो नहीं सकता? पतरस ने अपने और अपने भाइयों की ओर से अंगीकार किया था कि मसीह परमेश्वर का पुत्र है (मत्ती 16:16)। इसी चट्टान पर मसीह अपनी कलीसिया बनाता है, क्योंकि वही एकमात्र नींव है; जैसा पौलुस कहता है, “इसको छोड़ कोई दूसरी नींव नहीं डाल सकता” (1 कुरिन्थियों 3:11)। इसलिए मैं यहाँ प्राचीन पिताओं के अधिकार को इस कारण अस्वीकार नहीं करता कि मेरे पास अपनी बात के प्रमाण में उनके अंश नहीं हैं, यदि मैं उन्हें उद्धृत करना चाहूँ; परन्तु जैसा मैंने कहा, मैं इतने स्पष्ट विषय पर बहस करके अपने पाठकों को तंग करना नहीं चाहता, विशेषकर इसलिए कि हमारे लेखकों ने इस विषय को बहुत पहले पूर्ण रीति से सँभाल और समझा दिया है।
7. और तो भी सच तो यह है कि पवित्रशास्त्र से बढ़कर इस प्रश्न को कोई हल नहीं कर सकता, यदि हम उन सब अंशों की तुलना करें जिनमें वह दिखाता है कि प्रेरितों के बीच पतरस का क्या पद और अधिकार था, वह उनके बीच कैसे काम करता था, और उन्होंने उसे कैसे ग्रहण किया (प्रेरितों के काम 15:7)। इन सब अंशों को देख जाइए, तो अधिक से अधिक आप यही पाएँगे कि पतरस बारह में से एक था, उनका बराबर का साथी, उनका स्वामी नहीं। वह निश्चय ही कोई काम करना हो तो मामले को सभा के सामने रखता है, और जो आवश्यक है उसकी सम्मति देता है, परन्तु साथ ही वह दूसरों की भी सुनता है, उन्हें केवल अपने विचार प्रकट करने का अवसर ही नहीं देता, वरन् निर्णय करने भी देता है; और जब वे निर्णय कर लेते हैं तो वह पीछे चलता और मानता है। जब वह पासबानों को लिखता है, तो वह श्रेष्ठ की भाँति अधिकार से आज्ञा नहीं देता, वरन् उन्हें अपना साथी बनाता है, और बराबरी के लोगों की रीति पर नम्रता से सम्मति देता है (1 पतरस 5:1)। जब उस पर यह दोष लगाया जाता है कि वह अन्यजातियों के पास गया, यद्यपि यह दोष निराधार था, तब भी वह उसका उत्तर देता और अपनी सफाई देता है (प्रेरितों के काम 11:3)। जब उसके साथियों ने उसे यूहन्ना के साथ सामरिया जाने की आज्ञा दी, तो उसने इनकार नहीं किया (प्रेरितों के काम 8:14)। प्रेरित उसे भेजकर यह प्रकट करते हैं कि वे उसे किसी प्रकार श्रेष्ठ नहीं मानते, और वह आज्ञा मानकर और सौंपे हुए दूतकार्य को ग्रहण करके यह स्वीकार करता है कि वह उनके साथ मिला हुआ है और उन पर उसका कोई अधिकार नहीं। परन्तु यदि इनमें से कोई बात न भी होती, तो अकेली गलातियों की पत्री सब सन्देह को सरलता से दूर कर देती, क्योंकि उसके लगभग दो अध्यायों में पौलुस की सारी दलील केवल यही है कि प्रेरिताई के सम्मान में वह पतरस के बराबर है (गलातियों 1:18; 2:8)। इसलिए वह बताता है कि वह पतरस के पास अधीनता स्वीकार करने नहीं गया, वरन् केवल इसलिए कि सिद्धान्त में उनकी सहमति सब पर प्रकट हो जाए; कि पतरस ने स्वयं इस प्रकार की कोई स्वीकृति नहीं माँगी, वरन् उसे सहभागिता का दाहिना हाथ दिया, कि वे दोनों दाख की बारी में साझे के मजदूर हों; कि अन्यजातियों में उस पर कम अनुग्रह नहीं हुआ जितना यहूदियों में पतरस पर; अन्त में यह कि जब पतरस पूरी सच्चाई से व्यवहार नहीं कर रहा था तब उसने उसे डाँटा, और उसने उस डाँट को स्वीकार किया (गलातियों 2:11)। ये सब बातें प्रकट करती हैं कि या तो पौलुस और पतरस के बीच बराबरी थी, या कम से कम इतना कि पतरस का शेष प्रेरितों पर उससे अधिक अधिकार नहीं था जितना उनका उस पर था। इस बात को, जैसा मैंने कहा, पौलुस जानबूझकर उठाता है, ताकि प्रेरिताई के विषय में कोई उसकी अपेक्षा पतरस या यूहन्ना को श्रेष्ठता न दे, जो साथी थे, स्वामी नहीं।
560 फ्रांसीसी में: “Ils ont pour leur bouclier, qu’aucuns des Peres les ont ainsi exposees.”—वे इसे अपनी ढाल मानते हैं कि कुछ पिताओं ने उनकी ऐसी ही व्याख्या की है।
8. परन्तु पतरस के विषय में जो वे माँगते हैं, यदि मैं उसे उन्हें दे भी दूँ—अर्थात् कि वह प्रेरितों में प्रधान था और मर्यादा में दूसरों से बढ़कर था—तो भी एक विशेष उदाहरण से सार्वभौमिक नियम बनाने, या एक अकेली घटना को सदा की व्यवस्था में खींच लाने का कोई आधार नहीं, क्योंकि दोनों बातें एक-दूसरे से बहुत भिन्न हैं। एक प्रेरितों में प्रधान था, केवल इसलिए कि वे गिनती में थोड़े थे। यदि एक मनुष्य बारह पर अध्यक्षता करता था, तो क्या इससे यह निकलेगा कि एक को एक लाख पर अध्यक्षता करनी चाहिए? इसमें कुछ अनोखा नहीं कि बारह के बीच एक ऐसा था जो सब को दिशा दे। प्रकृति मानती है, मानव मन चाहता है, कि प्रत्येक सभा में, यद्यपि सब सामर्थ्य में बराबर हों, एक ऐसा हो जो एक प्रकार से संचालक हो, जिसकी ओर दूसरे देखें। कोई सीनेट बिना कौन्सल के नहीं, कोई न्यायाधीशों का आसन बिना सभापति या चान्सलर के नहीं, कोई महाविद्यालय बिना प्रधान के नहीं, कोई मण्डली बिना स्वामी के नहीं। इसलिए यदि हम मान लें कि प्रेरितों ने पतरस को ऐसी प्रधानता दी थी, तो इसमें कोई असंगति न होगी। परन्तु जो प्रबन्ध थोड़ों के बीच प्रभावी है, उसे तुरन्त सारे संसार में नहीं ले जाना चाहिए, जिसे कोई एक मनुष्य सँभाल नहीं सकता। परन्तु (वे कहते हैं) देखा जाता है कि समस्त प्रकृति में, और उसके प्रत्येक अंश में भी, एक ही सर्वोच्च सिर होता है। इसका प्रमाण वे सारसों और मधुमक्खियों से देना पसन्द करते हैं, जो सदा एक ही के मार्गदर्शन में रहती हैं, अनेक के नहीं। जो उदाहरण वे देते हैं, मैं उन्हें मानता हूँ; परन्तु क्या मधुमक्खियाँ एक रानी चुनने के लिए संसार के सब भागों से इकट्ठी होती हैं? प्रत्येक रानी अपने ही छत्ते से सन्तुष्ट रहती है। वैसे ही सारसों में प्रत्येक झुण्ड का अपना राजा होता है। इससे वे और क्या सिद्ध कर सकते हैं, सिवा इसके कि प्रत्येक कलीसिया का अपना अध्यक्ष होना चाहिए? वे हमें राज्यों के उदाहरणों की ओर भेजते हैं, और होमर के ये शब्द उद्धृत करते हैं, “बहुत सिरों का शासन अच्छा नहीं;” और राजतन्त्र की प्रशंसा में अन्यजाति लेखकों के ऐसे ही और अंश भी। उत्तर सरल है। होमर का यूलिसीस या दूसरे लोग राजतन्त्र की प्रशंसा इस अर्थ में नहीं करते कि एक ही व्यक्ति को सारे संसार पर शासन करना चाहिए; वरन् वे यह जताना चाहते हैं कि एक राज्य दो राजाओं को नहीं सह सकता, और साम्राज्य, जैसा कि एक कवि ने कहा है (Lucan. Lib. 1), साझीदार को नहीं सह सकता।
9. फिर भी, जैसा वे चाहते हैं वैसा ही हो (यद्यपि यह बात अत्यन्त बेतुकी है; फिर भी हो), कि सारे संसार का एक राजतन्त्र के अधीन होना भला और उपयोगी हो, तो भी मैं इसे नहीं मानूँगा कि यही बात कलीसिया के शासन में भी लागू हो। उसका एकमात्र सिर मसीह है, जिसके शासन में हम सब एक-दूसरे से उस क्रम और शासन-रीति के अनुसार जुड़े हैं जो उसने स्वयं ठहराई है। इसलिए जब वे इस बहाने से चाहते हैं कि एक मनुष्य सारी कलीसिया पर अध्यक्षता करे, तब वे मसीह का भारी अपमान करते हैं, क्योंकि कलीसिया कभी बिना सिर के नहीं हो सकती, अर्थात् “मसीह के, जिससे सारी देह हर एक जोड़ की सहायता से एक साथ मिलकर और गठकर, हर एक अंग के परिमाण के अनुसार प्रभावशाली कार्य के द्वारा, देह को बढ़ाती है” (इफिसियों 4:15, 16)। देखिए, किस प्रकार सब मनुष्य बिना किसी अपवाद के देह में रखे गए हैं, जबकि सिर का सम्मान और नाम केवल मसीह के लिए छोड़ा गया है। देखिए, किस प्रकार प्रत्येक अंग को एक निश्चित परिमाण, एक सीमित और मर्यादित कार्य सौंपा गया है, जबकि अनुग्रह की पूर्णता और शासन का सर्वोच्च अधिकार दोनों केवल मसीह में बसते हैं। मैं उस कुतर्क-भरी आपत्ति से अनजान नहीं जो वे प्रायः उठाते हैं—अर्थात् कि मसीह ठीक-ठीक एकमात्र सिर इसलिए कहलाता है कि वह अकेला अपने ही अधिकार से और अपने ही नाम में राज्य करता है; परन्तु इसमें ऐसी कोई बात नहीं जो उसके अधीन एक दूसरे, जिसे वे सेवक-रूप सिर कहते हैं, के होने और उसके स्थानापन्न होकर कार्य करने में बाधा बने। परन्तु यह कुतर्क उनके काम नहीं आ सकता, जब तक वे पहले यह न दिखाएँ कि यह पद मसीह का ठहराया हुआ है। क्योंकि प्रेरित सिखाता है कि सारी सेवकाई अंगों में फैली हुई है, जबकि सामर्थ्य एक ही स्वर्गीय सिर से बहती है;561 अथवा, यदि वे इसे और स्पष्ट रूप से चाहते हैं, तो जब पवित्रशास्त्र गवाही देता है कि मसीह सिर है, और यह सम्मान अकेले अपने लिए माँगता है, तो वह उसके सिवा किसी और को नहीं दिया जाना चाहिए जिसे मसीह ने स्वयं अपना प्रतिनिधि बनाया हो। परन्तु इस आशय का कोई अंश है ही नहीं, वरन् इसका बहुत से अंशों से भली-भाँति खण्डन किया जा सकता है।
10. पौलुस कभी-कभी कलीसिया का जीवित चित्र खींचता है, परन्तु किसी एक सिर का उल्लेख नहीं करता। इसके विपरीत, उसके वर्णन से हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि यह मसीह की स्थापना से पराया है। मसीह ने अपने स्वर्गारोहण से अपनी दृश्य उपस्थिति हमारे बीच से हटा ली, तो भी वह इसलिए ऊपर चढ़ा कि सब कुछ को भर दे: इसलिए अब वह कलीसिया में उपस्थित है, और सदा रहेगा। जब पौलुस यह दिखाना चाहता है कि वह किस रीति से अपने आप को प्रकट करता है, तो वह हमारा ध्यान उन सेवकाई के पदों की ओर खींचता है जिन्हें वह काम में लाता है: “हम में से हर एक को मसीह के दान के परिमाण के अनुसार अनुग्रह मिला है;” “और उसने कितनों को प्रेरित, और कितनों को भविष्यद्वक्ता, और कितनों को सुसमाचार सुनानेवाले, और कितनों को रखवाले और उपदेशक नियुक्त करके दे दिया।”562 (इफिसियों 4:10, 7, 11) वह यह क्यों नहीं कहता कि एक ही सब पर उसके प्रतिनिधि के रूप में कार्य करने के लिए अध्यक्ष था? इस अंश में विशेष रूप से इसकी आवश्यकता थी, और यदि यह सच होता तो इसे किसी भी हाल में छोड़ा नहीं जाना चाहिए था। वह कहता है कि मसीह हमारे साथ उपस्थित है। कैसे? उन मनुष्यों की सेवकाई के द्वारा जिन्हें उसने कलीसिया के शासन पर ठहराया। एक सेवक-रूप सिर के द्वारा क्यों नहीं, जिसे उसने अपना प्रतिनिधि ठहराया हो? वह एकता की बात करता है, परन्तु वह परमेश्वर में और मसीह के विश्वास में है। वह मनुष्यों को एक साझी सेवकाई के सिवा कुछ नहीं देता, और प्रत्येक को एक विशेष रीति देता है। जब वह इस प्रकार एकता की प्रशंसा करता है, तब “एक देह, एक आत्मा, जैसे तुम्हें अपनी बुलाहट की एक ही आशा के लिए बुलाया गया है, एक प्रभु, एक विश्वास, एक बपतिस्मा” (इफिसियों 4:4) कहने के बाद तुरन्त यह क्यों नहीं जोड़ता कि कलीसिया को एकता में रखने के लिए एक सर्वोच्च पोप? यदि सचमुच ऐसा ही होता तो इससे अधिक उपयुक्त बात और कुछ नहीं कही जा सकती थी। उस अंश पर परिश्रम से विचार किया जाए, तो इसमें सन्देह न रहेगा कि पौलुस का आशय वहाँ उस पवित्र कलीसियाई शासन का पूरा चित्र देना था जिसे आगे की पीढ़ियों ने पदानुक्रम का नाम दिया है। वह सेवकों के बीच राजतन्त्र रखता ही नहीं, वरन् यह भी जताता है कि कोई है ही नहीं। इसमें भी कोई सन्देह नहीं कि वह उस सम्बन्ध की रीति को व्यक्त करना चाहता था जिससे विश्वासी सिर मसीह से जुड़ते हैं। वहाँ वह न केवल किसी सेवक-रूप सिर का कोई उल्लेख नहीं करता, वरन् प्रत्येक अंग को उसे दिए गए अनुग्रह के परिमाण के अनुसार एक विशेष कार्य सौंपता है। न ही स्वर्गीय और पार्थिव पदानुक्रम के बीच दार्शनिक सूक्ष्म तुलनाओं का कोई आधार है। क्योंकि पहले के विषय में मर्यादा से अधिक बुद्धिमान बनना सुरक्षित नहीं है, और दूसरे को स्थापित करने में हमें केवल उसी नमूने का अनुसरण करना उचित है जो हमारे प्रभु ने स्वयं अपने वचन में खींचा है।
561 फ्रांसीसी में आगे जोड़ा गया है: “Vision receue du Seigneur; Le Seigneur des armees l’a dit,”—प्रभु से पाया हुआ दर्शन; सेनाओं के प्रभु ने यह कहा है। 562 इफिसियों 4:10, 7, 11।
11. अब मैं उन्हें एक और रियायत देता हूँ, जो वे स्वस्थ मन के लोगों से कभी न पाएँगे—अर्थात् कि कलीसिया की प्रधानता पतरस में इस उद्देश्य से स्थिर की गई कि वह सदा के लिए उत्तराधिकार से बनी रहे। फिर भी वे कैसे सिद्ध करेंगे कि उसकी पीठ रोम में इस प्रकार स्थिर हुई कि जो कोई उस नगर का अध्यक्ष बने वह सारे संसार पर अध्यक्षता करे? वे यह मर्यादा एक विशेष स्थान से किस अधिकार से जोड़ते हैं, जबकि वह बिना किसी स्थान के उल्लेख के दी गई थी? वे कहते हैं कि पतरस रोम में रहा और वहीं मरा। स्वयं मसीह ने क्या किया? क्या उसने जीवित रहते अपना अध्यक्षपद नहीं निभाया, और यरूशलेम में मरकर याजकपद का कार्य पूरा नहीं किया? पासबानों का प्रधान, मुख्य चरवाहा, कलीसिया का सिर, एक स्थान के लिए सम्मान न दिला सका, और पतरस, जो उससे इतना छोटा था, दिला सका! क्या यह बचकानी ठिठोली से भी बुरा नहीं? मसीह ने पतरस को प्रधानता का सम्मान दिया। पतरस की पीठ रोम में थी, इसलिए उसने प्रधानता का आसन वहीं स्थापित किया। इस रीति से तो प्राचीन काल के इस्राएलियों को प्रधानता का आसन जंगल में ठहराना चाहिए था, जहाँ मूसा ने, जो प्रधान शिक्षक और भविष्यद्वक्ताओं का प्रधान था, अपनी सेवकाई की और मर गया।
12. आइए देखें कि वे कितनी उत्तम युक्ति लगाते हैं। वे कहते हैं कि पतरस को प्रेरितों में पहला स्थान प्राप्त था; इसलिए जिस कलीसिया में वह बैठा उसे यह विशेषाधिकार मिलना चाहिए। परन्तु वह पहले कहाँ बैठा? वे कहते हैं कि अन्ताकिया में। तो अन्ताकिया की कलीसिया न्यायपूर्वक प्रधानता का दावा करती है। वे मानते हैं कि वह कभी पहली थी, परन्तु पतरस ने वहाँ से जाकर वह सम्मान जो वह अपने साथ लाया था रोम को पहुँचा दिया। क्योंकि पोप मार्सेलस के नाम से अन्ताकिया के प्राचीनों को लिखा एक पत्र मिलता है, जिसमें वह कहता है, “पतरस की पीठ आरम्भ में तुम्हारे पास थी, और फिर प्रभु की आज्ञा से यहाँ स्थानान्तरित कर दी गई।” इस प्रकार अन्ताकिया की कलीसिया, जो कभी पहली थी, रोम की पीठ के आगे झुक गई। परन्तु उस भले मनुष्य ने किस आकाशवाणी से जाना कि प्रभु ने ऐसा ठहराया है? क्योंकि यदि प्रश्न का निर्णय विधिवत् होना है, तो उन्हें बताना होगा कि वे इस विशेषाधिकार को व्यक्तिगत मानते हैं, या स्थानगत, या मिश्रित। तीनों में से कोई एक अवश्य होगा। यदि वे कहें व्यक्तिगत, तो उसका स्थान से कोई सम्बन्ध नहीं; यदि स्थानगत, तो एक बार किसी स्थान को दिए जाने पर वह व्यक्ति की मृत्यु या प्रस्थान से नहीं खोता। शेष यही रह जाता है कि वे उसे मिश्रित मानें; तब केवल स्थान का विचार पर्याप्त नहीं, जब तक व्यक्ति भी उसके अनुरूप न हो। वे जो चाहें चुन लें, मैं तुरन्त निष्कर्ष निकालूँगा और सरलता से सिद्ध करूँगा कि रोम को प्रधानता हथियाने का कोई आधार नहीं।
13. फिर भी, ऐसा ही सही। मान लें कि प्रधानता (जैसा वे व्यर्थ दावा करते हैं) अन्ताकिया से रोम को स्थानान्तरित हो गई। अन्ताकिया ने दूसरा स्थान क्यों नहीं रखा? क्योंकि यदि रोम को पहला स्थान केवल इसलिए मिला कि पतरस की पीठ जीवन के अन्त में वहाँ थी, तो दूसरा स्थान उस स्थान से पहले किसे दिया जाना चाहिए जहाँ उसकी पीठ पहले थी? तो फिर सिकन्दरिया अन्ताकिया से आगे कैसे निकल गया? एक चेले की कलीसिया पतरस की पीठ से ऊपर कैसे हो सकती है? यदि किसी कलीसिया का सम्मान उसके संस्थापक की मर्यादा के अनुसार देय है, तो अन्य कलीसियाओं के विषय में हम क्या कहेंगे? पौलुस तीन व्यक्तियों के नाम लेता है जो खम्भे समझे जाते थे—अर्थात् याकूब, पतरस और यूहन्ना (गलातियों 2:9)। यदि पतरस के सम्मान में रोमी पीठ को पहला स्थान दिया जाता है, तो क्या इफिसुस और यरूशलेम की कलीसियाएँ, जहाँ यूहन्ना और याकूब बसे थे, दूसरे और तीसरे स्थान के योग्य नहीं? परन्तु प्राचीन काल में यरूशलेम को पितृपीठों में अन्तिम स्थान मिला था, और इफिसुस सबसे निचला कोना भी न पा सका। और भी कलीसियाएँ मिट गईं, वे कलीसियाएँ जिन्हें पौलुस ने स्थापित किया था, और जिन पर प्रेरित अध्यक्षता करते थे। मरकुस की पीठ को, जो केवल चेलों में से एक था, सम्मान मिल गया। वे या तो मानें कि वह व्यवस्था बेतुकी थी, या यह स्वीकार करें कि यह सदा सत्य नहीं कि प्रत्येक कलीसिया उतने सम्मान की अधिकारी है जितना उसके संस्थापक को प्राप्त था।
14. परन्तु मुझे नहीं दिखता कि पतरस के रोमी पीठ पर बैठने के उनके दावे को कोई विश्वास दिया जाए। यह तो निश्चित है कि यूसेबियस का यह कथन कि उसने पच्चीस वर्ष उस पर अध्यक्षता की, सरलता से खण्डित हो जाता है। क्योंकि गलातियों के पहले और दूसरे अध्याय से प्रकट होता है कि वह मसीह की मृत्यु के लगभग बीस वर्ष बाद यरूशलेम में था, और उसके बाद अन्ताकिया आया।563 वह यहाँ कितने समय रहा, यह अनिश्चित है; ग्रेगोरी सात वर्ष गिनता है, और यूसेबियस पच्चीस। परन्तु हमारे उद्धारकर्ता की मृत्यु से नीरो के राज्य के अन्त तक (जिसके अधीन वे कहते हैं कि वह मारा गया), केवल सैंतीस वर्ष पाए जाएँगे।564 क्योंकि हमारे प्रभु ने तिबिरियुस के राज्य के अठारहवें वर्ष में दुख उठाया। यदि आप उन बीस वर्षों को घटा दें, जिनमें, जैसा पौलुस गवाही देता है, पतरस यरूशलेम में रहा, तो अधिक से अधिक सत्रह वर्ष बचेंगे; और इन्हें उसके दोनों अध्यक्षपदों में बाँटना होगा। यदि वह अन्ताकिया में बहुत समय रहा, तो रोम में उसकी पीठ अल्पकालीन रही होगी। इसे हम और भी स्पष्टता से दिखा सकते हैं। पौलुस ने रोमियों को तब लिखा जब वह यरूशलेम की यात्रा पर था, जहाँ वह पकड़ा गया और रोम ले जाया गया (रोमियों 15:15, 16)। इसलिए सम्भव है कि यह पत्र उसके रोम पहुँचने से चार वर्ष पहले लिखा गया।565 फिर भी पतरस का कोई उल्लेख नहीं है, जैसा कि अवश्य होता यदि वह उस कलीसिया पर शासन कर रहा होता। वरन् पत्री के अन्त में, जहाँ वह बहुत से व्यक्तियों की लम्बी सूची देकर उन्हें नमस्कार करने की आज्ञा देता है, और जिसमें सम्भवतः वह उन सब को सम्मिलित करता है जिन्हें वह जानता था, वह पतरस के विषय में कुछ भी नहीं कहता। स्वस्थ विवेक के मनुष्यों के लिए यहाँ लम्बे और सूक्ष्म प्रमाण की आवश्यकता नहीं; मामले का स्वभाव और पत्री का सारा विषय ही घोषणा करता है कि यदि वह रोम में होता तो पौलुस को पतरस को छोड़ना नहीं चाहिए था।
563 कैल्विन प्रतीत होता है मानता था कि पौलुस का मन-परिवर्तन मसीह की मृत्यु के लगभग तीन वर्ष बाद हुआ; कि पौलुस तीन वर्ष बाद यरूशलेम में पतरस से मिलने गया (गलातियों 1:18; प्रेरितों के काम 9:26); कि पौलुस ने चौदह वर्ष बाद यरूशलेम की सभा में पतरस को फिर देखा (गलातियों 2:1, 2:9; प्रेरितों के काम 15:1-11); और कि इन तीनों संख्याओं को जोड़ने का आशय था। इसलिए वह पतरस को मसीह की मृत्यु के लगभग बीस वर्ष बाद यरूशलेम में ठहराता है।
564 नीरो ने सन् 68 ई. में आत्महत्या की। सैंतीस वर्ष घटाने से हम मसीह की मृत्यु की तिथि सन् 31 ई. पर लौट आते हैं। बीस वर्ष जोड़ने से पतरस सन् 51 ई. तक यरूशलेम में ठहरता है। और इस तिथि के बाद पतरस अन्ताकिया गया।
565 पौलुस का बन्दी के रूप में रोम पहुँचना सन् 60 ई. में माना जाता है। यदि रोमियों को उसकी पत्री उससे चार वर्ष पहले लिखी गई, तो उस पुस्तक की तिथि सन् 56 ई. होनी चाहिए। इस पत्री में पतरस को कोई नमस्कार नहीं है (जैसा कि अपेक्षित होता यदि पतरस रोम का अध्यक्ष होता)। वास्तव में उसका तो उल्लेख तक नहीं है! (यद्यपि अन्तिम अध्याय में और बहुत से नाम आते हैं, जिनमें कुछ अप्रसिद्ध भी हैं)। यह निष्कर्ष कि पतरस इस समय (सन् 56 ई.) रोम में नहीं था, टालना कठिन प्रतीत होता है।
15. इसके बाद पौलुस बन्दी बनाकर रोम ले जाया जाता है। लूका बताता है कि भाइयों ने उसका स्वागत किया, परन्तु पतरस के विषय में कुछ नहीं कहता। रोम से वह बहुत सी कलीसियाओं को लिखता है। वह कुछ व्यक्तियों की ओर से नमस्कार भी भेजता है, परन्तु एक शब्द से भी नहीं जताता कि पतरस तब वहाँ था। भला कौन विश्वास करेगा कि यदि वह उपस्थित होता तो पौलुस उसके विषय में कुछ न कहता? वरन् फिलिप्पियों की पत्री में, यह कहने के बाद कि उसके पास तीमुथियुस के समान प्रभु के काम की इतनी सच्चाई से चिन्ता करनेवाला कोई नहीं, वह शिकायत करता है कि “सब अपने स्वार्थ की खोज में रहते हैं” (फिलिप्पियों 2:21)566। और तीमुथियुस को वह और भी दुखभरी शिकायत लिखता है कि अपने पहले उत्तर-कथन के समय कोई उसके साथ न था, सब ने उसे छोड़ दिया (2 तीमुथियुस 4:16)। तो पतरस कहाँ था?567 यदि वे कहें कि वह रोम में था, तो पौलुस का उस पर यह आरोप कि वह सुसमाचार को छोड़ भागनेवाला था, कितना लज्जाजनक है! क्योंकि वह विश्वासियों की बात कर रहा है, इसलिए कि वह आगे कहता है, “प्रभु इसका लेखा उनसे न ले।” तो किस समय, और कितने समय तक, पतरस उस पीठ पर रहा? लेखकों का एकमत यह है कि उसने उस कलीसिया पर अपनी मृत्यु तक शासन किया। परन्तु ये लेखक इस पर सहमत नहीं कि उसका उत्तराधिकारी कौन था। कुछ कहते हैं लाइनस, कुछ क्लेमेंट। और वे उसके और शमौन जादूगर के बीच हुए एक वाद-विवाद के विषय में बहुत सी बेतुकी कथाएँ सुनाते हैं। न ही अगस्तीन, जब वह अन्धविश्वास की चर्चा करता है, इस बात को छिपाता है कि एक उतावली में अपनाई गई धारणा के कारण रोम में उस दिन उपवास करने की प्रथा पड़ गई जिस दिन पतरस ने शमौन जादूगर से विजय का ताड़-पत्र छीन लिया था (August. ad Januar. Ep. 2)। संक्षेप में, उस काल के मामले मतों की विविधता से इतने उलझ गए हैं कि उसके विषय में जो कुछ हम पढ़ते हैं उस पर उतावली में विश्वास नहीं किया जाना चाहिए। और फिर भी, लेखकों की इस सहमति के कारण, मैं इस बात पर विवाद नहीं करता कि वह वहाँ मरा, परन्तु कि वह अध्यक्ष था, विशेषकर दीर्घकाल तक, यह मैं विश्वास नहीं कर सकता।568 परन्तु मैं इस बात को बहुत महत्त्व नहीं देता, क्योंकि पौलुस गवाही देता है कि पतरस की प्रेरिताई विशेष रूप से यहूदियों के लिए थी, परन्तु उसकी अपनी विशेष रूप से हमारे लिए। इसलिए ताकि वह वाचा जो उन्होंने आपस में बाँधी, वरन् पवित्र आत्मा का वह प्रबन्ध, हमारे बीच दृढ़ बना रहे, हमें पतरस की प्रेरिताई से अधिक पौलुस की प्रेरिताई का आदर करना चाहिए, क्योंकि पवित्र आत्मा ने उन्हें भिन्न-भिन्न क्षेत्र बाँटते हुए पतरस को यहूदियों के लिए और पौलुस को हमारे लिए ठहराया। इसलिए रोमी लोग अपनी प्रधानता परमेश्वर के वचन में नहीं, कहीं और खोजें, जो उसकी तनिक भी नींव नहीं देता।
566 रोम में अपने पहले कारावास के समय (सन् 60 से 62 ई. तक) पौलुस ने फिलिप्पियों को अपनी पत्री लिखी। उसमें पतरस का कोई उल्लेख नहीं है, परन्तु तीमुथियुस की दृढ़ सराहना है, जो न केवल रोम में पौलुस के साथ था, वरन् उसने उन बातों की भी खोज की जो मसीह की हैं (फिलिप्पियों 2:19-21)। पौलुस की अपनी पत्री के अतिरिक्त, लूका का वृत्तान्त जो रोम में पौलुस के दो वर्ष के कारावास का है (प्रेरितों के काम 28 में), पतरस के विषय में कुछ भी नहीं कहता। ऐसा प्रतीत होता है कि सन् 60 से 62 ई. तक पतरस रोम में नहीं था।
567 तीमुथियुस को पौलुस की दूसरी पत्री में (जो पौलुस की पत्रियों में अन्तिम है, और जिसकी तिथि सन् 67 ई. है), वह कहता है कि अपने पहले उत्तर-कथन के समय कोई उसके साथ खड़ा न हुआ, वरन् सब ने उसे छोड़ दिया (2 तीमुथियुस 4:17)। तो पतरस कहाँ था? इस प्रश्न के उत्तर में अनेक सिद्धान्त प्रस्तुत किए जा सकते हैं। आइए उन्हें जाँचें: (1) पतरस रोम में था, परन्तु छिपा हुआ। यह सिद्धान्त पतरस के लिए बहुत सम्मानजनक नहीं है, क्योंकि ऐसी दशा में उसे उन लोगों में होना पड़ेगा जिन्होंने पौलुस को छोड़ दिया, जिनके लिए पौलुस ने प्रार्थना की कि यह उन पर आरोपित न किया जाए (जिसका अर्थ है कि उनकी ओर से कोई अपराध हुआ था)। (2) 2 तीमुथियुस के लिखे जाने के समय (सन् 67 ई. में) पतरस अभी रोम नहीं पहुँचा था। यह सिद्धान्त मानेगा कि पतरस सन् 67 ई. में बाद में पहुँचा, और थोड़े ही समय बाद, सम्भवतः सन् 68 ई. के वसन्त में, पौलुस के साथ शहीद हुआ। इस मत की कठिनाई यह है कि 2 पतरस, जिसके विषय में माना जाता है कि पतरस ने रोम में लिखी, उसकी तिथि सन् 66 ई. है। (3) पतरस पहले ही शहीद हो चुका था, और इसलिए स्पष्ट है कि पौलुस के पहले उत्तर-कथन के समय उसके साथ खड़ा नहीं हो सकता था। यह सिद्धान्त रोम में पतरस की मृत्यु की तिथि सन् 64 ई. ठहराएगा, जब रोम की भीषण आग के बाद नीरो ने मसीहियों को सताया। फिर, यह मत भी 2 पतरस के लिखे जाने की तिथि, सन् 66 ई., से टकराता है। पतरस की दूसरी पत्री, जो स्पष्टतः पतरस की लिखी है, उसी प्रकार स्पष्टतः किसी ऐसे व्यक्ति की लिखी नहीं हो सकती जो उसे लिखने से दो वर्ष पहले मर चुका हो! (4) पतरस इस समय रोम में बन्दी था, और शीघ्र ही मार डाले जाने की प्रतीक्षा में था (देखिए 2 पतरस 1:14), और इसलिए पौलुस के साथ खड़ा होने में सरलता से असमर्थ था। इस सिद्धान्त में यद्यपि कुछ कठिनाइयाँ हैं, फिर भी इसके पक्ष में एक महत्त्वपूर्ण बात है। यह दो वर्ष के कारावास की अवधि (सन् 66-68 ई.) को, जो पतरस के मारे जाने पर समाप्त होती है (जिस अवधि में, सन् 67 ई. में, वह पौलुस के साथ खड़ा न हो सका), ध्यान में ले सकता है; और उस अवधि के भीतर पतरस की दूसरी पत्री (जिसकी तिथि सन् 66 ई. है) को भी समेट सकता है।
16. अब हम आदि कलीसिया की ओर आएँ, ताकि यह भी प्रकट हो जाए कि हमारे विरोधी उसके समर्थन पर उतना ही झूठा और अविवेकपूर्ण गर्व करते हैं जितना परमेश्वर के वचन की गवाही पर। जब वे यह सिद्धान्त ठहराते हैं कि कलीसिया की एकता तब तक बनी नहीं रह सकती जब तक पृथ्वी पर एक सर्वोच्च सिर न हो जिसकी आज्ञा सब अंग मानें; और कि इसलिए हमारे प्रभु ने प्रधानता पतरस को दी, और उसके बाद उत्तराधिकार के अधिकार से रोम की पीठ को, कि वह अन्त तक वहीं बनी रहे, तो वे दावा करते हैं कि आरम्भ से सदा ऐसा ही माना जाता रहा है। परन्तु क्योंकि वे बहुत से अंशों को अनुचित रीति से तोड़ते-मरोड़ते हैं, मैं पहले यह कहे देता हूँ कि मैं इससे इनकार नहीं करता कि आरम्भिक मसीही रोमी कलीसिया को सदा बड़ा आदर देते हैं, और उसकी चर्चा श्रद्धा से करते हैं। मेरा विचार है कि इसके मुख्यतः तीन कारण हैं। यह धारणा जो प्रचलित हो गई थी (मैं नहीं जानता कैसे) कि उस कलीसिया की स्थापना और गठन पतरस की सेवकाई से हुआ, उसके लिए प्रभाव और अधिकार दिलाने में बहुत प्रभावी हुई। इसी कारण पूर्व में उसे आदर-चिह्न के रूप में प्रेरितीय पीठ कहा गया। दूसरे, चूँकि साम्राज्य की राजधानी वहाँ थी, और इसी कारण यह मान लेना उचित था कि विद्या, विवेक, कौशल और अनुभव में सब से प्रतिष्ठित लोग अन्यत्र की अपेक्षा वहाँ अधिक होंगे, इस बात का उचित ध्यान रखा गया, ऐसा न हो कि नगर की प्रसिद्धि और परमेश्वर के कहीं अधिक उत्कृष्ट वरदान भी तुच्छ समझे जाते दिखाई दें। इनके साथ एक तीसरा कारण यह जुड़ा कि जब पूर्व की, यूनान की और अफ्रीका की कलीसियाएँ मतभेदों से निरन्तर उथल-पुथल में रहीं, तब रोम की कलीसिया अधिक शान्त और कम व्याकुल थी। इसी कारण भक्त और पवित्र अध्यक्ष, जब अपनी पीठों से निकाल दिए जाते, तो प्रायः शरण या बन्दरगाह के रूप में रोम की ओर जाते। क्योंकि जैसे पश्चिम के लोग एशिया या अफ्रीका के लोगों की अपेक्षा कम तीक्ष्ण और कम चंचल बुद्धि के हैं, वैसे ही वे नवीनताओं के भी कम अभिलाषी हैं। इसलिए रोमी कलीसिया को इससे बहुत अधिक अधिकार मिला कि उन अनिश्चित दिनों में वह दूसरों के समान डाँवाँडोल नहीं हुई, और एक बार सौंपी गई शिक्षा से अधिक दृढ़ता से लगी रही, जैसा कि अभी और भली-भाँति समझाया जाएगा। मैं कहता हूँ कि इन तीन कारणों से वह साधारण से बहुत ऊँचे सम्मान में रखी गई, और प्राचीन लेखकों से उसे अनेक प्रतिष्ठित गवाहियाँ मिलीं।
568 इस एक वाक्य में कैल्विन तीन भिन्न प्रश्नों पर अपने निष्कर्ष बताता है: (क) क्या पतरस रोम में मरा? (ख) क्या पतरस रोम का अध्यक्ष था? (ग) यदि पतरस रोम का अध्यक्ष था, तो क्या उसने यह पद दीर्घकाल तक धारण किया? पहले प्रश्न के विषय में कैल्विन इस दावे पर विवाद नहीं करता कि पतरस रोम में मरा। यद्यपि पवित्रशास्त्र में इस आशय का कोई स्पष्ट कथन नहीं है, फिर भी पतरस की उपस्थिति और शहादत की गवाही रोम के क्लेमेंट, इग्नेशियस, पापियास और आइरेनियस सहित इतने प्राचीन लेखकों ने दी है कि ऐसी परम्परा को ठुकराने का कोई ठोस कारण नहीं दिखता जिस पर इतने लेखक सहमत हैं। परन्तु दूसरे और तीसरे प्रश्नों के विषय में कैल्विन अनुभव नहीं करता कि वह स्वीकारात्मक उत्तर दे सकता है। उसके कारण उस तर्क में मिलते हैं जो उसने इस खण्ड और पिछले खण्ड में विकसित किया है। यदि इन खण्डों में कैल्विन का तर्क-विकास, और संलग्न टिप्पणियाँ, मूलतः सही हैं, तो प्रतीत होता है कि कम से कम तीन निष्कर्ष निकलते हैं: (1) इसका कोई प्रमाण नहीं कि पतरस ने रोम की कलीसिया की स्थापना की। (2) इसका कोई प्रमाण नहीं कि पतरस रोम में किसी उल्लेखनीय अवधि तक रहा। वह अधिक से अधिक छह वर्ष वहाँ रहा हो सकता है (यदि वह सन् 62 ई. में आया और सन् 68 ई. में मरा)। वह पाँच वर्ष वहाँ रहा हो सकता है (यदि वह सन् 66 ई. में पहुँचा और सन् 68 ई. में मारा गया)। (3) इसका कोई प्रमाण नहीं कि पतरस रोम का (पहला) अध्यक्ष था; या कि प्राचीन के पद से भिन्न ऐसा कोई पद इस आरम्भिक तिथि पर था भी। ऐसा पद, जो स्पष्टतः पवित्रशास्त्र के बाहर का है, कलीसिया के इतिहास में केवल बाद में प्रकट हुआ।
17. परन्तु क्योंकि हमारे विरोधी इसी पर अन्य कलीसियाओं के ऊपर प्रधानता और सर्वोच्च अधिकार खड़ा करना चाहते हैं, वे, जैसा मैंने कहा, भारी भूल करते हैं। यह और अच्छी तरह प्रकट हो, इसके लिए मैं पहले संक्षेप में दिखाऊँगा कि इस एकता के विषय में, जिस पर वे इतना बल देते हैं, प्राचीन लेखकों के क्या विचार हैं। जेरोम, नेपोतियन को लिखते हुए, एकता के अनेक उदाहरण गिनाकर अन्त में कलीसियाई पदानुक्रम पर उतरता है। वह कहता है, “प्रत्येक कलीसिया का प्रत्येक अध्यक्ष, प्रत्येक प्रधान प्राचीन, प्रत्येक प्रधान उपयाजक, और सारा कलीसियाई क्रम अपने ही शासकों पर निर्भर है।” यहाँ एक रोमी प्राचीन बोल रहा है और कलीसियाई क्रम में एकता की सराहना कर रहा है। वह यह क्यों नहीं बताता कि सब कलीसियाएँ एक सिर के द्वारा साझे बन्धन के रूप में बँधी हैं? प्रस्तुत विषय के लिए इससे अधिक उपयुक्त बात कोई नहीं थी, और यह नहीं कहा जा सकता कि उसने इसे भूल से छोड़ा; यदि तथ्य अनुमति देता तो इससे अधिक खुशी से वह किसी बात का उल्लेख न करता। इसलिए वह निस्सन्देह मानता है कि एकता की सच्ची रीति वही है जिसे सिप्रियन इन शब्दों में उत्तम रीति से वर्णन करता है: “अध्यक्षपद एक है, जिसका एक भाग प्रत्येक अध्यक्ष के पास पूरा-पूरा है, और कलीसिया एक है, जो उर्वरता की वृद्धि से संख्या में और अधिक फैलती है। जैसे सूर्य की किरणें अनेक हैं और प्रकाश एक, वृक्ष की डालियाँ अनेक हैं और तना एक, जो अपनी दृढ़ जड़ पर थमा है, और जैसे बहुत सी धाराएँ एक ही सोते से बहती हैं, और यद्यपि भरपूर बहाव की प्रचुरता से संख्या फैली दिखाई देती है, तो भी एकता स्रोत में पूरी की पूरी बनी रहती है, वैसे ही कलीसिया, प्रभु के प्रकाश से व्याप्त होकर, अपनी किरणें सारे भूमण्डल पर भेजती है, तो भी वह एक ही प्रकाश है, जो सर्वत्र फैलता है और देह की एकता को अलग नहीं करता, अपनी डालियाँ सारे भूमण्डल पर फैलाती है, और बहती हुई धाराएँ निकालती है; फिर भी सिर एक है, और स्रोत एक” (सिप्रियन, de Simplic. Prælat.)। इसके बाद वह कहता है, “मसीह की दुल्हिन व्यभिचारिणी नहीं हो सकती: वह एक ही घर को जानती है, और पवित्र लज्जा के साथ एक ही शय्या की पवित्रता को सँभालती है।” देखिए, वह कैसे अकेले मसीह के अध्यक्षपद को सार्वभौमिक ठहराता है, क्योंकि वह सारी कलीसिया को अपने अन्तर्गत समेटता है: देखिए, वह कैसे कहता है कि उसका एक भाग उन सब के पास पूरा-पूरा है जो इस सिर के अधीन अध्यक्ष का कार्य निभाते हैं। यदि पूरा अध्यक्षपद अकेले मसीह में है, और उसका एक भाग प्रत्येक के पास पूरा-पूरा, तो रोमी पीठ की प्रधानता कहाँ रही? इन टिप्पणियों से मेरा उद्देश्य यह है कि पाठक को चलते-चलते दिखा दूँ कि पदानुक्रम में सांसारिक एकता का वह सिद्धान्त, जिसे रोमी लोग स्वीकृत और निर्विवाद मानकर चलते हैं, आदि कलीसिया को बिलकुल अज्ञात था।
