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परमेश्वर का ज्ञान, अज्ञानता या दुर्भावना से, दबा दिया गया या बिगाड़ दिया गया
अध्याय 4।
परमेश्वर का ज्ञान, अज्ञानता या दुर्भावना से, दबा दिया गया या बिगाड़ दिया गया।
खण्ड।
1. परमेश्वर का ज्ञान अज्ञानता से दब जाता है, और बहुत-से लोग अन्धविश्वास में जा गिरते हैं। फिर भी ऐसे लोग निरुत्तर हैं, क्योंकि उनकी भूल अभिमान और हठ के साथ जुड़ी है।
2. हठ अधर्म का साथी है।
3. कोई बहाना अन्धविश्वास को उचित नहीं ठहरा सकता। यह पहले तर्क से, और फिर पवित्रशास्त्र से सिद्ध किया गया।
4. दुष्ट लोग कभी अपनी इच्छा से परमेश्वर की उपस्थिति में नहीं आते। इसी से उनका कपट है। इसी से उनका ईश्वरत्व का बोध किसी भले परिणाम तक नहीं पहुँचता।
1. परन्तु यद्यपि अनुभव गवाही देता है कि धर्म का बीज परमेश्वर की ओर से सब में बोया गया है, तो भी सौ में मुश्किल से एक ऐसा मिलता है जो उसे अपने हृदय में सँजोए रखता हो, और ऐसा एक भी नहीं जिसमें वह परिपक्व हो, अपने समय पर फल देना तो दूर रहा। इसके अतिरिक्त, जहाँ कुछ लोग अन्धविश्वासी रीतियों में खो जाते हैं, और दूसरे जान-बूझकर दुष्टता से परमेश्वर से विद्रोह करते हैं, परिणाम यह होता है कि उसके सच्चे ज्ञान के विषय में सब इतने बिगड़ गए हैं कि संसार के किसी भाग में सच्ची भक्ति नहीं पाई जाती। यह कहने में कि कुछ लोग अन्धविश्वास में जा गिरते हैं, मेरा संकेत यह नहीं कि उनकी अत्यधिक मूर्खता उन्हें दोष से मुक्त कर देती है; क्योंकि जिस अन्धेपन में वे पड़े हैं, वह प्रायः सदा व्यर्थ अभिमान और हठ के साथ रहता है। व्यर्थता और अभिमान का मेल इसमें दिखाई देता है कि जब दुखी मनुष्य परमेश्वर को खोजते हैं, तब जैसा उन्हें करना चाहिए था वैसे अपने से ऊँचे उठने के बदले वे उसे अपनी शारीरिक जड़ता के माप से नापते हैं, और ठोस खोज की उपेक्षा करके व्यर्थ कल्पना में अपनी जिज्ञासा को तृप्त करने उड़ चलते हैं। इसलिए वे उसकी उस स्वरूप में धारणा नहीं करते जिसमें वह प्रकट हुआ है, वरन् उसे वही मान लेते हैं जो उनकी अपनी उतावली ने गढ़ लिया है। यह गड्ढा खुला होने से वे एक पग भी नहीं चल सकते बिना सीधे विनाश की ओर दौड़े। परमेश्वर की ऐसी धारणा के साथ, आराधना या आज्ञाकारिता के रूप में वे जो कुछ भी चढ़ाने का यत्न करें, उसका उसकी दृष्टि में कोई मूल्य नहीं हो सकता, क्योंकि वे उसकी नहीं, वरन् उसके स्थान पर अपने ही हृदय के स्वप्न और कल्पना की उपासना करते हैं। इस भ्रष्ट व्यवहार का पौलुस ने अद्भुत वर्णन किया है, जब वह कहता है कि “अपने आप को बुद्धिमान जताकर वे मूर्ख बन गए” (रोमियों 1:22)। उसने पहले कहा था कि “वे अपने विचारों में व्यर्थ हो गए,” परन्तु कोई उन्हें निर्दोष न समझ ले, इसलिए उसने आगे जोड़ा कि वे उचित रीति से अन्धे किए गए, क्योंकि वे संयमी खोज से सन्तुष्ट न होकर, अपने लिए उससे अधिक अधिकार जताकर जितना उन्हें प्राप्त है, स्वयं अपनी इच्छा से अन्धकार को गले लगाते हैं, वरन् टेढ़े और खोखले दिखावे से अपने को मोहित कर लेते हैं। इसी कारण उनकी मूर्खता, जो केवल व्यर्थ जिज्ञासा का ही नहीं, वरन् निषिद्ध ज्ञान की खोज में स्वच्छन्द कामना और घमण्डी भरोसे का परिणाम है, क्षमा के योग्य नहीं।
2. दाऊद का यह कथन (भजन संहिता 14:1, 53:1), “मूर्ख ने अपने मन में कहा है, कोई परमेश्वर नहीं है,” मुख्यतः उन पर लागू होता है जो, जैसा शीघ्र ही और स्पष्ट होगा, प्रकृति के प्रकाश को दबाते हैं और जान-बूझकर अपने को जड़ बना लेते हैं। हम बहुतों को देखते हैं कि दुस्साहसी पाप के मार्ग में कठोर हो जाने के बाद वे परमेश्वर की सब स्मृति को पागलपन से निकाल फेंकते हैं, यद्यपि वह भीतर से, स्वाभाविक बोध द्वारा, उनके मन में आप ही आप उठती है। यह दिखाने के लिए कि यह पागलपन कितना घृणित है, भजनकार उन्हें स्पष्ट रूप से यह नकारते हुए प्रस्तुत करता है कि परमेश्वर है, क्योंकि यद्यपि वे उसके अस्तित्व का इन्कार नहीं करते, तो भी वे उसकी धार्मिकता और विधान को उससे छीन लेते हैं, और उसे स्वर्ग में निठल्ला बैठा हुआ ठहराते हैं। परमेश्वर के स्वभाव से इससे अधिक असंगत और कुछ नहीं कि वह जगत के शासन को त्यागकर उसे संयोग के भरोसे छोड़ दे, और मनुष्यों के अपराधों की ओर से आँखें इस प्रकार मूँद ले कि वे दण्ड के भय बिना बुरे मार्गों में मनमानी करें; इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि हर वह मनुष्य जो ईश्वरीय न्याय के सारे भय को बुझाकर निश्चिन्त बना रहता है, वास्तव में इसी बात का इन्कार करता है कि परमेश्वर है। दुष्टों के उचित दण्ड के रूप में, जब वे अपनी ही आँखें मूँद लेते हैं, तब परमेश्वर उनके हृदयों को मन्द और भारी कर देता है, और इसलिए वे देखते हुए भी नहीं देखते। दाऊद सचमुच अपने ही अर्थ का सर्वोत्तम व्याख्याकार है, जब वह दूसरी जगह कहता है कि दुष्ट के “सामने परमेश्वर का भय नहीं” (भजन संहिता 36:1); और फिर, “उसने अपने मन में कहा है, परमेश्वर भूल गया है; उसने अपना मुँह छिपा लिया है; वह कभी न देखेगा।” इस प्रकार यद्यपि वे यह मानने को विवश हैं कि कोई परमेश्वर है, तो भी उसकी सामर्थ्य को नकारकर वे उसकी महिमा उससे छीन लेते हैं। क्योंकि जैसा पौलुस घोषित करता है, “यदि हम विश्वासघाती भी हों, तौभी वह विश्वासयोग्य बना रहता है, वह अपने आप का इन्कार नहीं कर सकता,” (2 तीमुथियुस 2:13); वैसे ही जो अपने लिए एक मरी हुई और गूँगी मूर्ति गढ़ लेते हैं, उनके विषय में सच ही कहा जाता है कि वे परमेश्वर का इन्कार करते हैं। इसके अतिरिक्त यह भी ध्यान देने योग्य है कि यद्यपि वे अपनी ही धारणाओं से लड़ते हैं, और चाहते हैं कि परमेश्वर को न केवल अपने मन से, वरन् स्वर्ग से भी निकाल दें, तो भी उनकी जड़ता कभी इतनी पूर्ण नहीं होती कि वे कभी-कभी ईश्वरीय न्यायालय के सामने खींचे जाने से बच सकें। फिर भी, जब तक वे उस अन्धे आवेग में बहते हैं, तब तक कोई भय उन्हें परमेश्वर के मुँह पर हिंसक रीति से टूट पड़ने से नहीं रोकता, इसलिए इसका इन्कार नहीं किया जा सकता कि उसके विषय में उनके मन की प्रबल दशा पशुवत् विस्मृति है।
3. इस रीति से वह व्यर्थ बहाना ढह जाता है जिसे बहुत-से लोग अपने अन्धविश्वास को ढँकने के लिए काम में लाते हैं। वे समझते हैं कि इतना काफ़ी है कि उन्हें धर्म के लिए किसी प्रकार का उत्साह हो, चाहे वह कितना ही बेतुका क्यों न हो, और यह नहीं देखते कि सच्चा धर्म परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप होना चाहिए, जो उसका अचूक मापदण्ड है; कि वह कभी अपना इन्कार नहीं कर सकता, और कोई भूत या छाया नहीं है जो हर किसी की मनमानी से रूप बदलता रहे। यह देखना सरल है कि अन्धविश्वास अपनी झूठी व्याख्याओं के साथ परमेश्वर का उपहास करता है, जबकि उसे प्रसन्न करने का यत्न करता है। प्रायः वह केवल उन बातों पर अटक जाता है जिनका उसने स्वयं कहा है कि उनका उसकी दृष्टि में कोई मूल्य नहीं, और जिन बातों की उसने स्पष्ट आज्ञा दी है, या जिनमें हमें निश्चय दिलाया गया है कि वह प्रसन्न होता है, उन्हें या तो तिरस्कार से अनदेखा कर देता है, या खुले रूप से ठुकरा देता है। इसलिए जो लोग कल्पित आराधना खड़ी करते हैं, वे केवल अपनी ही उन्मत्त कल्पनाओं की उपासना और आराधना करते हैं; वरन् यदि उन्होंने पहले उसे अपनी बचकानी धारणाओं के अनुसार न गढ़ लिया होता, तो वे कभी परमेश्वर के साथ ऐसा खिलवाड़ करने का साहस न करते। इसी कारण ईश्वरत्व की वह अस्पष्ट और भटकती हुई धारणा एक प्रेरित द्वारा परमेश्वर की अज्ञानता घोषित की गई है: “तौभी उस समय जब तुम परमेश्वर को नहीं जानते थे, तब तुम उनके दास थे जो स्वभाव से देवता नहीं हैं।” और वह दूसरी जगह घोषित करता है कि इफिसियों के लोग “परमेश्वर से रहित” थे (इफिसियों 2:12) उस समय जब वे उसके किसी सही ज्ञान के बिना भटकते फिरते थे। कम-से-कम इस विषय में इससे कुछ अन्तर नहीं पड़ता कि तुम एक परमेश्वर के अस्तित्व को मानो या बहुत देवताओं के, क्योंकि दोनों ही अवस्थाओं में, सच्चे परमेश्वर से हटकर तुम्हारे पास एक घृणित मूर्ति के सिवा कुछ नहीं बचता। इसलिए लैक्टैंशियस के साथ (Instit. Div. lib 1:2, 6) यही निष्कर्ष निकालना शेष रहता है, “कोई धर्म सच्चा नहीं जो सत्य के अनुरूप न हो।”
4. इस दोष में वे एक दूसरा जोड़ते हैं—अर्थात् जब वे परमेश्वर का विचार करते भी हैं तो अपनी इच्छा के विरुद्ध; वे कभी उसके पास आते ही नहीं जब तक घसीटकर उसकी उपस्थिति में न लाए जाएँ, और वहाँ पहुँचकर ईश्वरीय प्रताप के प्रति श्रद्धा से उपजनेवाले स्वेच्छा के भय के स्थान पर केवल वह विवश और दासवत् भय अनुभव करते हैं जो ईश्वरीय न्याय उनसे निकलवाता है—वह न्याय जिससे बच निकलना असम्भव होने के कारण उन्हें डरना पड़ता है, परन्तु जिससे वे डरते हुए साथ ही घृणा भी करते हैं। अधर्म के लिए, और केवल उसी के लिए, स्टेशियस का यह कथन ठीक बैठता है: “भय ने ही सबसे पहले जगत में देवता उत्पन्न किए,” (Theb. lib. 1)। जिनकी रुचियाँ परमेश्वर की धार्मिकता से विरोध में हैं, वे यह जानकर कि उसका न्यायासन अपराध को दण्ड देने के लिए स्थापित किया गया है, गम्भीरता से चाहते हैं कि वह न्यायासन उलट दिया जाए। इस भावना के वश में वे वास्तव में परमेश्वर से युद्ध कर रहे हैं, क्योंकि धार्मिकता उसके आवश्यक गुणों में से एक है। यह देखकर कि वे सदा उसकी सामर्थ्य की पहुँच के भीतर हैं, कि प्रतिरोध और बच निकलना दोनों समान रूप से असम्भव हैं, वे डरते और काँपते हैं। इसलिए उस प्रताप की निन्दा करते दिखाई देने से बचने के लिए, जिससे सब आतंकित हैं, वे किसी-न-किसी प्रकार के धार्मिक अनुष्ठान का सहारा लेते हैं, और इस बीच हर प्रकार के पाप से अपने को अशुद्ध करना, और अपराध पर अपराध जोड़ना नहीं छोड़ते, जब तक कि वे प्रभु की पवित्र व्यवस्था को उसकी हर माँग में भंग न कर दें, और उसकी सम्पूर्ण धार्मिकता को तुच्छ न कर दें; किसी भी दशा में, उनके भय का दिखावा उन्हें इतना नहीं रोकता कि वे अधर्म में मौज और आनन्द न लें, और वे अपनी शारीरिक प्रवृत्तियों को पवित्र आत्मा की लगाम से थामने के बजाय उन्हें खुली छूट देना पसन्द करते हैं। परन्तु क्योंकि धर्म की यह छाया (जिसे छाया कहलाने का भी मुश्किल से अधिकार है) झूठी और व्यर्थ है, इसलिए यह अनुमान करना सरल है कि परमेश्वर का यह उलझा हुआ ज्ञान उस भक्ति से कितना भिन्न है जो विश्वासियों के हृदयों में बोई जाती है, और जिससे ही सच्चा धर्म उपजता है। तो भी कपटी लोग टेढ़े-मेढ़े घुमावों से उसी समय परमेश्वर के निकट होने का दिखावा करना चाहते हैं जब वे उससे भाग रहे होते हैं। क्योंकि जबकि सारा जीवन आज्ञाकारिता का एक निरन्तर क्रम होना चाहिए, वे अपने लगभग सब कार्यों में निडर होकर विद्रोह करते हैं, और कुछ तुच्छ बलिदानों से उसे मनाना चाहते हैं; जबकि उन्हें मन की निष्कपटता और जीवन की पवित्रता से उसकी सेवा करनी चाहिए, वे उसकी कृपा तुच्छ युक्तियों और निरर्थक औपचारिकताओं से पाने का यत्न करते हैं। वरन् वे अपने नीच भोग-विलासों में और अधिक छूट ले लेते हैं, क्योंकि वे समझते हैं कि बेतुके प्रायश्चित्तों से वे उसके प्रति अपना कर्तव्य पूरा कर सकते हैं; संक्षेप में, जबकि उनका भरोसा उसी पर टिका होना चाहिए था, वे उसे एक ओर रखकर अपने ही पर या सृष्टि पर टिके रहते हैं। अन्त में वे अपने को भूल के ऐसे भूलभुलैया में उलझा लेते हैं कि अज्ञानता का अन्धकार उन चिंगारियों को धुँधला कर देता है, और अन्ततः बुझा देता है, जो उन्हें परमेश्वर की महिमा दिखाने के लिए ठहराई गई थीं। फिर भी यह धारणा कि कोई ईश्वरत्व है, बनी रहती है, एक ऐसे पौधे के समान जो कभी पूरी रीति से उखाड़ा नहीं जा सकता, यद्यपि इतना बिगड़ा हुआ है कि वह केवल निकृष्टतम फल ही उत्पन्न कर सकता है। वरन् जिस प्रस्ताव का मैं अब समर्थन कर रहा हूँ—अर्थात् कि ईश्वरत्व का बोध स्वभावतः मानव हृदय पर खुदा हुआ है—उसका और भी प्रबल प्रमाण इस तथ्य में है कि त्यागे हुए लोग भी उसे मानने को विवश हैं। जब वे सुख-चैन में होते हैं, तब वे परमेश्वर के विषय में ठट्ठा कर सकते हैं, और उसकी सामर्थ्य को घटाते हुए धृष्टता और बड़बोलेपन से बोल सकते हैं; परन्तु यदि किसी कारण निराशा उन पर आ पड़े, तो वह उन्हें उसे खोजने को उकसाएगी, और छोटी-छोटी पुकारें सुझाएगी, जिससे प्रमाणित होता है कि वे परमेश्वर से पूरी तरह अनजान न थे, वरन् उन्होंने उन भावनाओं को टेढ़ाई से दबा रखा था जिन्हें पहले ही प्रकट हो जाना चाहिए था।
