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वर्तमान जीवन और उसकी सुख-सुविधाओं का उपयोग कैसे किया जाए
अध्याय 10.
वर्तमान जीवन और उसकी सुख-सुविधाओं का उपयोग कैसे किया जाए।
इस अध्याय के विभाग ये हैं: I. इस शिक्षा की आवश्यकता और उपयोगिता। यदि हमें वर्तमान जीवन और उसकी सुख-सुविधाओं का ठीक उपयोग करना है तो किन अतियों से बचना चाहिए, खण्ड 1, 2। II. इनमें से एक अति, अर्थात् शरीर के असंयम, से सावधानी से बचना है। ऐसा करने की चार विधियाँ क्रम से बताई गई हैं, खण्ड 3-6।
खण्ड।
1. इस शिक्षा की आवश्यकता। वर्तमान जीवन की वस्तुओं का उपयोग। जिन अतियों से बचना है: 1. अत्यधिक कठोरता। 2. शारीरिक असंयम और विलासिता।
2. परमेश्वर ने इतनी दयाएँ रचकर केवल हमारी आवश्यकताओं का ही नहीं, वरन् हमारे सुख और आनन्द का भी ध्यान रखा। भजन संहिता के एक अंश से और अनुभव से इसकी पुष्टि।
3. इसलिए अत्यधिक कठोरता से बचना चाहिए। वैसे ही शरीर की उच्छृंखलता से भी। 1. सृष्टि की वस्तुएँ हमें सृष्टिकर्ता को जानने, उससे प्रेम रखने और उसका आदर करने के लिए बुलाती हैं। 2. दुष्ट लोग ऐसा नहीं करते; वे इन लौकिक दयाओं का केवल दुरुपयोग करते हैं।
4. स्वर्गीय जीवन की तुलना में सब सांसारिक आशीषों को तुच्छ जानना चाहिए। सृजी हुई वस्तुओं के अत्यधिक मोह से इस जीवन की अभिलाषा नष्ट हो जाती है। पहली बात: असंयम।
5. दूसरी बात: अधीरता और असंयमित लालसा। इन बुराइयों का उपचार। सृजी हुई वस्तुएँ हमारे उपयोग के लिए ठहराई गई हैं। मनुष्य उनके उपयोग के लिए अब भी उत्तरदायी है।
6. परमेश्वर चाहता है कि हम अपने सब कामों में उसकी बुलाहट का ध्यान रखें। इस शिक्षा का उपयोग। यह सान्त्वना से भरपूर है।
1. ऐसी आरम्भिक बातों से पवित्रशास्त्र हमें साथ ही सांसारिक आशीषों के उचित उपयोग की भी भली शिक्षा देता है; और जीवन की योजना बनाते समय इस विषय की किसी भी रीति से उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। क्योंकि यदि हमें जीना है तो जीवन के लिए आवश्यक सहारों का उपयोग करना ही होगा; और जो वस्तुएँ आवश्यकता से अधिक आनन्द के काम की जान पड़ती हैं, उनसे भी हम बच नहीं सकते। इसलिए हमें एक मध्यम मार्ग अपनाना चाहिए, ताकि हम चाहे आवश्यकता के लिए, चाहे आनन्द के लिए, शुद्ध विवेक के साथ उनका उपयोग कर सकें। प्रभु अपने वचन में यही ठहराता है, जब वह कहता है कि उसके लोगों के लिए वर्तमान जीवन एक प्रकार की यात्रा है, जिसके द्वारा वे स्वर्गीय राज्य की ओर शीघ्रता से बढ़ रहे हैं। यदि हमें पृथ्वी से केवल होकर गुज़रना है, तो इसमें कोई सन्देह नहीं कि हमें इसकी आशीषों का उपयोग उतना ही करना चाहिए जितना वे हमारी यात्रा में सहायक हों, न कि उसे धीमा करें। इसी कारण पौलुस बिना कारण नहीं चिताता कि हम इस संसार का उपयोग करें पर दुरुपयोग न करें, और सम्पत्ति ऐसे मोल लें मानो उसे बेच रहे हों (1 कुरिन्थियों 7:30, 31)। परन्तु यह फिसलनेवाली जगह है और दोनों ओर गिरने का बड़ा भय है; इसलिए हम अपने पाँव वहाँ जमाएँ जहाँ सुरक्षित खड़ा हुआ जा सके। कुछ भले और पवित्र मनुष्य ऐसे हुए हैं जिन्होंने जब देखा कि कड़ाई से रोके बिना असंयम और विलासिता सदा हद से बढ़ती जाती हैं, और वे इस घातक बुराई को सुधारना चाहते थे, तो उन्होंने यही कल्पना की कि इसका और कोई उपाय नहीं कि मनुष्य को शारीरिक वस्तुओं का उपयोग केवल उतना ही करने दिया जाए जितना अनिवार्य है। यह परामर्श भक्तिपूर्ण तो है, परन्तु अनावश्यक रूप से कठोर; क्योंकि यह एक अत्यन्त खतरनाक काम करता है, अर्थात् विवेकों को उन बन्धनों से भी अधिक कसकर बाँधता है जिनमें वे परमेश्वर के वचन से बँधे हैं। फिर उनके अनुसार अनिवार्यता का अर्थ400 था हर उस वस्तु से परहेज़ जिसके बिना काम चल सके, यहाँ तक कि वे रोटी और पानी में कुछ भी जोड़ना मुश्किल से ही उचित समझते थे। कुछ और भी अधिक कठोर थे, जैसा थेबी क्रातेस के विषय में बताया जाता है, जिसने अपना धन समुद्र में फेंक दिया, क्योंकि वह सोचता था कि यदि उसने उसे नष्ट न किया तो वह उसे नष्ट कर देगा। आज भी बहुत से लोग बाहरी वस्तुओं के उपयोग में शारीरिक असंयम का बहाना खोजते हुए और साथ ही स्वेच्छाचार का मार्ग बनाते हुए यह बात मानकर चलते हैं, जिसे मैं किसी रीति से स्वीकार नहीं करता, कि इस स्वतंत्रता पर किसी प्रकार की सीमा नहीं लगाई जानी चाहिए, वरन् यह हर मनुष्य के विवेक पर छोड़ दी जाए कि वह उनका उपयोग जहाँ तक उचित समझे करे। मैं मानता हूँ कि इस विषय में विवेकों को निश्चित और बँधे हुए नियमों से न बाँधा जा सकता है, न बाँधा जाना चाहिए; परन्तु चूँकि पवित्रशास्त्र ने उचित उपयोग के लिए सामान्य नियम ठहरा दिए हैं, इसलिए हमें उन्हीं की बताई सीमाओं के भीतर रहना चाहिए।
2. हमारा सिद्धान्त यह हो कि हम विधान के दानों के उपयोग में तब भूल नहीं करते जब हम उन्हें उस उद्देश्य की ओर लगाते हैं जिसके लिए उनके रचयिता ने उन्हें बनाया और ठहराया है, क्योंकि उसने उन्हें हमारी भलाई के लिए रचा है, हमारे विनाश के लिए नहीं। जो मनुष्य इस उद्देश्य को ध्यान से सामने रखेगा, वही सच्चे मार्ग पर सबसे अच्छी रीति से बना रहेगा। अब यदि हम विचार करें कि उसने भोजन किस उद्देश्य से बनाया, तो पाएँगे कि उसने केवल हमारी आवश्यकता का ही नहीं, वरन् हमारे आनन्द और सुख का भी ध्यान रखा। इसी प्रकार वस्त्र में आवश्यकता के अतिरिक्त शोभा और मर्यादा उद्देश्य थी; और जड़ी-बूटियों, फलों और वृक्षों में उनके नाना उपयोगों के अतिरिक्त रूप की सुन्दरता और गन्ध की मिठास। यदि ऐसा न होता तो भविष्यद्वक्ता परमेश्वर की दयाओं में “दाखमधु जो मनुष्य के मन को आनन्दित करता है, और तेल जिससे उसका मुख चमकता है” की गिनती न करता (भजन संहिता 104:15)। पवित्रशास्त्र उसकी भलाई की प्रशंसा में जगह-जगह यह न कहता कि उसने मनुष्यों को ऐसी वस्तुएँ दी हैं। वस्तुओं के स्वाभाविक गुण स्वयं ही दिखाते हैं कि उनका किस उद्देश्य से और कहाँ तक उचित रूप से आनन्द लिया जा सकता है। क्या प्रभु ने फूलों को वह सारी सुन्दरता पहनाई जो अपने आप आँखों के सामने आ जाती है, और वह मीठी सुगन्ध दी जो नासिका को भाती है, और फिर भी उस सुन्दरता और सुगन्ध का आनन्द लेना हमारे लिए अनुचित होगा? क्या? क्या उसने रंगों में ऐसा भेद नहीं किया कि कुछ दूसरों से अधिक सुहावने हैं? क्या उसने सोने-चाँदी, हाथीदाँत और संगमरमर को ऐसे गुण नहीं दिए जिनसे वे अन्य धातुओं या पत्थरों से अधिक मूल्यवान हो गए? संक्षेप में, क्या उसने बहुत सी वस्तुओं को बिना किसी अनिवार्य उपयोग के भी मूल्य नहीं दिया?
400 देखिए Chrysost. ad इब्रानियों 11। थेबी क्रातेस के विषय में देखिए Plutarch, Lib. de Vitand. ære alien. और Philostratus in Vita Apollonii।
3. इसलिए उस अमानवीय दर्शन को छोड़ दो, जो सृष्टि की वस्तुओं का उपयोग आवश्यकता के सिवा किसी और बात के लिए नहीं होने देता; वह न केवल बैर से हमें ईश्वरीय उदारता के उचित फल से वंचित करता है, वरन् मनुष्य की सारी इन्द्रियाँ छीनकर उसे लकड़ी का कुन्दा बनाए बिना उसका निभाना सम्भव ही नहीं। परन्तु दूसरी ओर, हम शरीर की अभिलाषाओं से भी उतनी ही सावधानी से बचे रहें, जो यदि व्यवस्था में न रखी जाएँ तो सब सीमाएँ तोड़ डालती हैं, और जैसा मैं कह चुका हूँ, उन लोगों द्वारा उचित ठहराई जाती हैं जो स्वतंत्रता के बहाने अपने को हर प्रकार की उच्छृंखलता की छूट दे देते हैं। पहली रोक तब लगती है जब हम यह मानते हैं कि सब वस्तुओं की रचना का उद्देश्य यह था कि हम उनके रचयिता को जानें और उसकी कृपा के लिए कृतज्ञ हों। यदि तुम भोज और दाखमधु से ऐसे ठूँस लो या सुध-बुध खो बैठो कि भक्ति के कामों या अपनी बुलाहट के कर्तव्यों के योग्य न रहो, तो कृतज्ञता कहाँ रही? यदि शरीर अत्यधिक भोग-विलास से वासना में उबलकर मन को अपनी अशुद्धता से ऐसा संक्रमित कर दे कि वह आदर और खरेपन का विवेक खो दे, तो परमेश्वर की पहचान कहाँ रही? यदि भड़कीले वस्त्रों के कारण हम अपने ऊपर रीझें और दूसरों को तुच्छ जानें, यदि दिखावे और चमक-दमक के प्रेम से हम निर्लज्जता का मार्ग बनाएँ, तो वस्त्र के लिए परमेश्वर के प्रति धन्यवाद कहाँ रहा? यदि इन वस्तुओं की चकाचौंध हमारे मन को मोह ले, तो हमारी परमेश्वर की पहचान कहाँ रही? क्योंकि बहुत से लोग अपनी सब इन्द्रियों में विलासिता में ऐसे डूबे हैं कि उनका मन दबा पड़ा है; बहुत से संगमरमर, सोने और चित्रों से ऐसे मोहित हैं कि वे पत्थरदिल हो जाते हैं, मानो धातु में बदल गए हों और रंगी हुई मूर्तियों के समान बन गए हों। रसोई अपनी स्वादिष्ट गन्धों से उन्हें ऐसा घेर लेती है कि उनमें आत्मिक स्वाद रहता ही नहीं। यही बात और विषयों में भी देखी जा सकती है। इसलिए स्पष्ट है कि यहाँ उच्छृंखल दुरुपयोग को रोकने की और पौलुस के इस नियम के अनुसार चलने की बड़ी आवश्यकता है: “शरीर की अभिलाषाओं को पूरा करने का उपाय न करो” (रोमियों 13:14)। जहाँ उन्हें बहुत छूट दी जाती है, वहाँ वे बिना माप और रोक के फूट निकलती हैं।
4. इसे पूरा करने का इससे अधिक निश्चित या शीघ्र मार्ग कोई नहीं कि हम वर्तमान जीवन को तुच्छ जानें और स्वर्गीय अमरता की अभिलाषा रखें। क्योंकि इसी से दो नियम निकलते हैं: पहला, “शेष यह है कि जिनकी पत्नियाँ हों, वे ऐसे हों मानो उनकी पत्नी नहीं,” “और जो इस संसार का उपयोग करते हैं, वे ऐसे हों कि उसका दुरुपयोग न करें” (1 कुरिन्थियों 7:29, 31)। दूसरा, हमें अभाव सहने में उतना ही शान्त और धीरजवन्त होना सीखना चाहिए जितना सम्पन्नता के भोग में संयमी। जो मनुष्य इस संसार का उपयोग ऐसे करने का नियम बनाता है मानो वह उसका उपयोग न करता हो, वह खाने-पीने में सब लोलुपता को, और अपनी मेज़, अपने घर और अपने वस्त्रों के विषय में सब सुकुमारता, महत्त्वाकांक्षा, घमण्ड, अत्यधिक दिखावे और ठाठ को ही नहीं काट डालता, वरन् हर उस चिन्ता और लगाव को भी दूर कर देता है जो उसे स्वर्गीय जीवन की अभिलाषा से और अपनी आत्मा के हित को बढ़ाने से हटा या रोक सके।401 केटो ने भली बात कही: विलासिता बड़ी चिन्ता उत्पन्न करती है, और सद्गुण के विषय में बड़ी लापरवाही पैदा करती है; और यह पुरानी कहावत भी है कि जो लोग देह की चिन्ता में बहुत लगे रहते हैं, वे प्रायः आत्मा की चिन्ता बहुत कम करते हैं। इसलिए यद्यपि बाहरी बातों में मसीही की स्वतंत्रता को कठोर नियम में नहीं बाँधा जाना चाहिए, फिर भी वह इस व्यवस्था के अधीन है कि वह यथासम्भव कम भोग करे; और दूसरी ओर, उसका सदा यही लक्ष्य हो कि वह न केवल विलासिता को रोके, वरन् फ़ालतू समृद्धि के सब दिखावे को भी काट डाले, और सावधान रहे कि कहीं सहायता को बाधा में न बदल दे। 5. एक और नियम यह है कि तंगी और अभाव में पड़े लोग अपनी कमियों को धीरज से सहना सीखें, ताकि वे वस्तुओं के लिए अत्यधिक लालायित न हो जाएँ, जिनका संयमित उपयोग ही मसीह की पाठशाला में कोई छोटी उन्नति नहीं दर्शाता। क्योंकि सांसारिक भलाई की लालसा के साथ चलनेवाले अनेक दूसरे दोषों के अतिरिक्त, जो निर्धनता में अधीर होता है, वह प्रायः सम्पन्नता में उलटा रोग प्रकट करता है। मेरा तात्पर्य यह है कि जो फटे-पुराने वस्त्र से लज्जित होता है, वह भड़कीले वस्त्र पर घमण्ड करेगा; जो साधारण भोजन से सन्तुष्ट न होकर अधिक विलासी भोजन के अभाव से खिन्न होता है, वह उसे पाकर अपनी विलासिता का असंयम से दुरुपयोग करेगा; जिसे साधारण और दीन दशा में रहना कठिन लगता है और जो उससे असन्तुष्ट है, वह सम्मान पाकर घमण्ड से बच नहीं सकेगा। जो भी सच्चे मन से भक्ति की इच्छा रखते हैं, उनका लक्ष्य यह हो कि वे प्रेरित के उदाहरण के अनुसार “तृप्त होना भी और भूखा रहना भी, बढ़ना भी और घटना भी” सीखें (फिलिप्पियों 4:12)। इसके अतिरिक्त पवित्रशास्त्र में सांसारिक आशीषों के उपयोग को संयमित करने के लिए एक तीसरा नियम भी है। हम दान के कर्तव्यों पर विचार करते समय उसका उल्लेख कर चुके हैं। क्योंकि वह घोषणा करता है कि वे सब हमें परमेश्वर की कृपा से दी गई हैं और हमारे उपयोग के लिए इस शर्त पर ठहराई गई हैं कि उन्हें धरोहर माना जाए, जिसका हमें एक दिन हिसाब देना होगा। इसलिए हमें उनका प्रबन्ध ऐसे करना चाहिए मानो ये शब्द निरन्तर हमारे कानों में गूँज रहे हों: “अपने भण्डारीपन का लेखा दे।” साथ ही, हम स्मरण रखें कि लेखा किससे लिया जाना है, अर्थात् उससे जो संयम, सादगी, किफ़ायत और मर्यादा की इतनी ऊँची प्रशंसा करता है, और विलासिता, घमण्ड, दिखावे और व्यर्थता से घृणा करता है; जो उसी प्रबन्ध को स्वीकार करता है जो दान के साथ जुड़ा हो; जो अपने ही मुँह से उन सब सुखों को दोषी ठहरा चुका है जो हृदय को पवित्रता और शुद्धता से हटाते हैं या बुद्धि को अन्धकारमय करते हैं।
401 फ्रेंच: “Parer notre ame de ses vrais ornemens”;—अपनी आत्मा को उसके सच्चे आभूषणों से सजाओ।
6. ध्यान देने की अन्तिम बात यह है कि प्रभु हम में से हर एक को आज्ञा देता है कि जीवन के सब कामों में अपनी बुलाहट का ध्यान रखें। वह मानव मन की उबलती बेचैनी को जानता है, उसकी चंचलता को जिससे वह इधर-उधर बहता फिरता है, एक ही समय में विरोधी बातों को मुट्ठी में रखने की उसकी उतावली को, और उसकी महत्त्वाकांक्षा को। इसलिए कि हमारी मूर्खता और उतावलेपन से सब कुछ उलट-पुलट न हो जाए, उसने जीवन के अलग-अलग ढंगों में हर एक को अलग-अलग कर्तव्य सौंपे हैं। और ताकि कोई अपनी उचित सीमा लाँघने का साहस न करे, उसने जीवन के भिन्न-भिन्न ढंगों को बुलाहट का नाम दिया है। इसलिए हर मनुष्य का जीवन-ढंग एक प्रकार का पद है जो प्रभु ने उसे सौंपा है, कि वह सदा यों ही भटकता न फिरे। यह भेद इतना आवश्यक है कि उसकी दृष्टि में हमारे सब काम इसी से आँके जाते हैं, और प्रायः उस रीति से बहुत भिन्न रीति से जिससे मानवीय बुद्धि या दर्शन उन्हें आँकेगा। देश को अत्याचार से छुड़ाने से बढ़कर कोई यशस्वी कार्य दार्शनिकों में भी नहीं माना जाता, फिर भी जो साधारण व्यक्ति अत्याचारी को छुरा घोंपता है, उसे स्वर्गीय न्यायी की वाणी खुलेआम दोषी ठहराती है। परन्तु मैं विशेष उदाहरणों पर रुकना नहीं चाहता; इतना जान लेना पर्याप्त है कि हर बात में प्रभु की बुलाहट ही उचित कार्य की नींव और आरम्भ है। जो उसका ध्यान रखकर काम नहीं करता, वह कर्तव्य निभाने में कभी सही मार्ग पर नहीं रहेगा। वह कभी-कभी किसी प्रशंसनीय बात का आभास दे सकेगा, परन्तु मनुष्य की दृष्टि में वह चाहे जैसा हो, परमेश्वर के सिंहासन के सामने वह अस्वीकार किया जाएगा; और इसके अतिरिक्त उसके जीवन के भिन्न-भिन्न भागों में कोई सामंजस्य नहीं होगा। इसलिए केवल वही जो अपने जीवन को इस उद्देश्य की ओर लगाता है, उसे ठीक रूप से गढ़ पाएगा; क्योंकि उतावलेपन के आवेग से मुक्त होकर वह अपनी बुलाहट के औचित्य से अधिक का प्रयास नहीं करेगा, यह जानते हुए कि ठहराई हुई सीमाओं को लाँघना अनुचित है। जो साधारण है, वह एकान्त जीवन अपनाने से इनकार नहीं करेगा, ताकि उस चौकी को न छोड़े जहाँ परमेश्वर ने उसे रखा है। फिर, अपनी सब चिन्ताओं, परिश्रमों, कष्टों और अन्य बोझों में यह जानना कोई छोटी राहत नहीं होगी कि ये सब परमेश्वर की देखरेख में हैं। हाकिम अपना कार्य अधिक प्रसन्नता से करेगा और गृहस्थ अपने उचित दायरे में रहेगा। हर कोई अपने विशेष जीवन-ढंग में उसकी असुविधाओं, चिन्ताओं, बेचैनी और व्याकुलता को बिना कुड़कुड़ाए सहेगा, यह मानकर कि बोझ परमेश्वर ने रखा है। यह भी एक अद्भुत सान्त्वना देगा कि अपनी उचित बुलाहट का पालन करते हुए कोई काम इतना तुच्छ और घिनौना नहीं होगा कि परमेश्वर की दृष्टि में उसकी शोभा और मूल्य न हो।
