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पुराने नियम और नए नियम का अन्तर
अध्याय 11।
पुराने नियम और नए नियम का अन्तर।
234 “Animarum substantiam।” फ्रेंच में “immortalité des ames”—आत्माओं की अमरता।
इस अध्याय में मुख्यतः तीन भाग हैं। I. पुराने और नए नियम के बीच अन्तर की पाँच बातें, खण्ड 1–11। II. इन बातों में से अन्तिम बात यह है कि पुराना नियम केवल यहूदियों का था, जबकि नया नियम सब का है; इसी प्रसंग में अन्यजातियों की बुलाहट पर संक्षेप में विचार किया गया है, खण्ड 12। III. पुराने और नए नियम के अन्तर के विषय में यहाँ जो सिखाया गया है, उस पर सामान्यतः उठाई जानेवाली दो आपत्तियों का उत्तर, खण्ड 13, 14।
खण्ड।
1. पुराने और नए नियम के अन्तर की पाँच बातें। ये बातें सार से अधिक प्रबन्ध की रीति से सम्बन्ध रखती हैं।
पहला अन्तर। पुराने नियम में स्वर्गीय मीरास सांसारिक आशीषों के रूप में दिखाई गई है; नए नियम में इस प्रकार के सहारे काम में नहीं लाए जाते।
2. इस पहले अन्तर का प्रमाण उस वारिस की उपमा से जो अभी बालक है, जैसा गलातियों 4:1 में है।
3. इसी कारण व्यवस्था के अधीन पूर्वज इस जीवन और इसकी आशीषों को अधिक मूल्यवान समझते थे, और दण्डों से, जो और भी प्रत्यक्ष थे, अधिक डरते थे। व्यवस्था के अधीन कठोर और अचानक दण्ड क्यों थे।
4. दूसरा अन्तर। पुराना नियम मसीह को रीति-विधियों के रूप में दर्शाता था। नया नियम सीधा सत्य और सम्पूर्ण देह प्रस्तुत करता है। इस अन्तर को समझाने में इब्रानियों की पत्री का उद्देश्य। पुराने नियम की परिभाषा।
5. इसलिए व्यवस्था हमें मसीह तक पहुँचाने के लिए हमारी शिक्षक है।
6. तो भी व्यवस्था के अधीन रहनेवालों में विश्वास के कुछ सबसे सुदृढ़ उदाहरण दिखाई देते हैं, जिनके समान लोग मसीही कलीसिया में भी मुश्किल से मिलेंगे। यहाँ परमेश्वरीय प्रबन्ध की सामान्य रीति पर ध्यान देना चाहिए। ये उत्तम जन व्यवस्था के अधीन रखे गए और रीति-विधियों की सहायता पाते रहे, ताकि वे मसीह को दूर से देखें और उसका स्वागत करें।
7. तीसरा अन्तर। पुराना नियम अक्षर का है, नया आत्मा का। इस अन्तर पर पहले सामान्य रूप से विचार।
8. फिर प्रेरित के पाठ की सावधानी से जाँच करके विशेष रूप से इस पर विचार। तिहरा विरोध। पुराना नियम अक्षर का, मृत्यु देनेवाला और अस्थायी है। नया आत्मा का, जिलानेवाला और सनातन है। अक्षर और आत्मा का भेद।
9. चौथा अन्तर। पुराना नियम दासत्व का है, नया स्वतंत्रता का। पवित्रशास्त्र के तीन अंशों से इसकी पुष्टि। दो आपत्तियों का उत्तर।
10. पिछले तीन अन्तरों और पहले अन्तर के बीच भेद। अगस्तीन से ऊपर की बात की पुष्टि। पुराने नियम के अधीन पूर्वजों की दशा।
11. पाँचवाँ अन्तर। पुराना नियम केवल एक जाति का था, नया सब का।
12. अध्याय का दूसरा भाग, जो पिछले खण्ड पर आधारित है। अन्यजातियों की बुलाहट के विषय में। अन्यजातियों की बुलाहट प्रेरितों को इतनी अनोखी और नई क्यों लगी।
13. अध्याय का अन्तिम भाग। दो आपत्तियों पर विचार। 1. परमेश्वर अपरिवर्तनशील है, इसलिए जिस बात की उसने एक बार आज्ञा दी, उसे वह उचित रूप से अस्वीकार नहीं कर सकता। पवित्रशास्त्र के एक अंश से पुष्ट किया गया उत्तर।
14. आपत्तियाँ। 2. परमेश्वर आरम्भ में ही यहूदियों के साथ वैसा ही व्यवहार कर सकता था जैसा अब मसीहियों के साथ करता है। उत्तर, जिसमें इस आपत्ति की असंगति दिखाई गई है। परमेश्वर की इच्छा और अनुग्रह के प्रबन्ध पर उचित विचार पर आधारित एक और उत्तर।
1. तो फिर? तुम कहोगे, क्या पुराने और नए नियम में कोई अन्तर नहीं है? पवित्रशास्त्र के उन अनेक अंशों का क्या होगा जिनमें दोनों को एक-दूसरे से अत्यन्त भिन्न वस्तुओं के रूप में आमने-सामने रखा गया है? पवित्रशास्त्र में जो अन्तर बताए गए हैं, उन्हें मैं सहर्ष स्वीकार करता हूँ, परन्तु फिर भी मानता हूँ कि वे दोनों की स्थापित एकता को किसी भी रीति से घटाते नहीं, जैसा कि उन्हें क्रम से विचार लेने के बाद दिखाई देगा। ये अन्तर (जहाँ तक मैं उन्हें देख पाया हूँ और मुझे स्मरण है) मुख्यतः चार प्रतीत होते हैं, या यदि तुम पाँचवाँ भी जोड़ना चाहो तो मुझे कोई आपत्ति नहीं। मैं मानता हूँ, और समझता हूँ कि दिखा भी सकूँगा, कि वे सब सार से अधिक प्रबन्ध की रीति से सम्बन्ध रखते हैं। इस प्रकार उनमें ऐसा कुछ नहीं जो पुराने और नए नियम की प्रतिज्ञाओं को एक ही रहने से रोके, क्योंकि मसीह दोनों की नींव है। तो पहला अन्तर यह है कि यद्यपि प्राचीन काल में प्रभु ने अपनी प्रजा के विचारों को निर्देशित करना और उनके मनों को स्वर्गीय मीरास की ओर उठाना चाहा, तो भी, कि उसके विषय में उनकी आशा भली भाँति बनी रहे, उसने उसे पार्थिव आशीषों के रूप में उनके सामने रखा और एक प्रकार से उसका पूर्वस्वाद भी चखाया; जबकि भावी जीवन का वरदान, जो अब सुसमाचार के द्वारा अधिक स्पष्टता और उज्ज्वलता से प्रकट किया गया है, हमारे मनों को सीधे उसी पर मनन करने की ओर ले जाता है, और यहूदियों के विषय में पहले काम में लाई गई निम्न कोटि की शिक्षण-रीति अब त्याग दी गई है। जो लोग इस विषय में परमेश्वर के उद्देश्य पर ध्यान नहीं देते, वे समझते हैं कि परमेश्वर की प्राचीन प्रजा उन्हीं आशीषों से ऊपर नहीं चढ़ी जिनकी प्रतिज्ञा देह के लिए की गई थी। वे कनान देश का नाम इतनी बार सुनते हैं मानो वही ईश्वरीय व्यवस्था के आराधकों का विशेष और एक प्रकार से एकमात्र प्रतिफल हो; वे सुनते हैं कि प्रभु व्यवस्था के उल्लंघन करनेवालों को सबसे कठोर दण्ड यह देता है कि वे उस देश के अधिकार से निकाले जाएँ और अन्य देशों में बिखर जाएँ; वे देखते हैं कि यही मूसा द्वारा घोषित आशीषों और श्रापों का प्रायः सार है; और इन बातों से वे दृढ़ता के साथ यह निष्कर्ष निकालते हैं कि यहूदी दूसरी जातियों से अपने ही कारण अलग नहीं किए गए थे, परन्तु किसी और कारण से—अर्थात् इसलिए कि मसीही कलीसिया को एक ऐसा प्रतीक मिले जिसके बाहरी रूप में आत्मिक बातों का प्रमाण देखा जा सके। परन्तु जब पवित्रशास्त्र कभी-कभी यह प्रकट करता है कि इस प्रकार दी गई पार्थिव आशीषें स्वयं परमेश्वर की ओर से उन्हें स्वर्गीय आशा की ओर ले चलने के लिए थीं, तब इस प्रबन्ध-रीति पर ध्यान न देना बड़ी अनाड़ीपन की बात है, मूढ़ता कहना भी अनुचित न होगा। विवाद की जड़ यह है: हमारे विरोधी मानते हैं कि इस्राएलियों की दृष्टि में कनान देश परम और अन्तिम सुख था, और अब, जब से मसीह प्रकट हुआ, वह हमारे लिए स्वर्गीय मीरास का प्रतीक है; जबकि हम कहते हैं कि इस्राएली जिस पार्थिव अधिकार का आनन्द लेते थे, उसमें वे मानो दर्पण में उस भावी मीरास को देखते थे जो उनके विश्वास के अनुसार उनके लिए स्वर्ग में रखी गई थी।
2. यह उस उपमा से और स्पष्ट होगा जो पौलुस ने गलातियों में दी है (गलातियों 4:1)। वह यहूदी जाति की तुलना उस बालक वारिस से करता है जो अभी अपना शासन करने के योग्य नहीं, और उस शिक्षक या संरक्षक के निर्देश पर चलता है जिसकी देखरेख में उसे सौंपा गया है। यद्यपि यह उपमा विशेषकर रीति-विधियों से सम्बन्ध रखती है, तो भी इसे यहाँ भी अत्यन्त उचित रीति से लागू करने में कोई बाधा नहीं। जो मीरास हमारे लिए ठहराई गई थी वही उनके लिए भी ठहराई गई थी, परन्तु अल्पवयस्कता के कारण वे उसमें प्रवेश करने और उसे सँभालने के योग्य न थे। उनकी कलीसिया भी वही थी, यद्यपि वह अभी बाल्यावस्था में थी। इसलिए प्रभु ने उन्हें इसी संरक्षण में रखा, और उन्हें ऐसी आत्मिक प्रतिज्ञाएँ दीं जो स्पष्ट और सीधी नहीं, परन्तु पार्थिव वस्तुओं के प्रतीक में थीं। इसी कारण जब उसने अब्राहम, इसहाक और याकूब और उनके वंशजों को अमरता की आशा के लिए चुना, तो उसने उन्हें कनान देश मीरास में देने की प्रतिज्ञा की, इसलिए नहीं कि वह उनकी आशाओं की सीमा बने, परन्तु इसलिए कि उसे देखकर वे उस सच्ची मीरास की आशा में, जो अभी प्रकट न हुई थी, प्रशिक्षित और दृढ़ किए जाएँ। और भुलावे से बचाने के लिए उन्हें एक उत्तम प्रतिज्ञा मिली, जिसने प्रमाणित किया कि यह पृथ्वी परमेश्वर की कृपा का सबसे ऊँचा माप नहीं है। इसी प्रकार अब्राहम को अपने विचार प्रतिज्ञा की हुई भूमि तक ही सीमित रखने की अनुमति नहीं; एक बड़ी प्रतिज्ञा के द्वारा उसकी दृष्टि ऊपर प्रभु की ओर उठाई जाती है। उससे यों कहा जाता है, “हे अब्राम, मत डर; मैं तेरी ढाल और तेरा अत्यन्त बड़ा प्रतिफल हूँ,” (उत्पत्ति 15:1)। यहाँ हम देखते हैं कि अब्राहम से प्रतिज्ञा किया हुआ अन्तिम प्रतिफल स्वयं प्रभु है, ताकि वह इस संसार के तत्त्वों में किसी क्षणभंगुर और नश्वर प्रतिफल को न ढूँढ़े, परन्तु अविनाशी प्रतिफल पर दृष्टि रखे। देश की प्रतिज्ञा बाद में केवल इसी कारण जोड़ी गई कि वह परमेश्वर की कृपा का प्रतीक और स्वर्गीय मीरास का पूर्वरूप हो, जैसा कि सन्त जन स्वयं बताते हैं कि उन्होंने उसे समझा था। इसी प्रकार दाऊद सांसारिक आशीषों से उठकर सब से अन्तिम और सर्वोच्च आशीष तक पहुँचता है, “मेरा हृदय और मेरा शरीर दोनों हार गए हैं, परन्तु परमेश्वर सर्वदा के लिये मेरे हृदय की चट्टान और मेरा भाग है।” “मेरा हृदय और मेरा शरीर जीवते परमेश्वर के लिये पुकारते हैं,” (भजन संहिता 73:26; 84:2)। फिर, “यहोवा मेरा भाग और मेरे कटोरे का अंश है; मेरे भाग को तू स्थिर रखता है,” (भजन संहिता 16:5)। फिर, “हे यहोवा, मैंने तेरी दुहाई दी; मैंने कहा, तू मेरा शरणस्थान है, और जीवितों की भूमि में मेरा भाग है,” (भजन संहिता 142:5)। जो लोग ऐसी बातें कहने का साहस करते हैं, वे निश्चय ही यह घोषणा करते हैं कि उनकी आशा संसार और सांसारिक आशीषों से परे उठती है। परन्तु इस भावी आशीष को भविष्यद्वक्ता प्रायः उसी प्रतीक के रूप में वर्णित करते हैं जो प्रभु ने उन्हें सिखाया था। इसी प्रकार अय्यूब (अय्यूब 18:17) और यशायाह के उन अनेक अंशों को समझना चाहिए जिनका आशय यह है कि धर्मी पृथ्वी के अधिकारी होंगे, दुष्ट उसमें से निकाल दिए जाएँगे, यरूशलेम सब प्रकार की सम्पत्ति से भरपूर होगा, और सिय्योन हर प्रकार की बहुतायत से उमड़ेगा। ठीक अर्थ में ये सब बातें स्पष्टतः हमारी यात्रा की भूमि पर, न पार्थिव यरूशलेम पर, परन्तु विश्वासियों के सच्चे देश, स्वर्गीय नगर पर लागू होती हैं, जिसमें प्रभु ने सदा के लिए आशीष और जीवन की आज्ञा दी है (भजन संहिता 133:3)।
3. इसी से यह कारण समझ में आता है कि पुराने नियम के अधीन सन्त जन इस नश्वर जीवन और इसकी आशीषों को उतना अधिक मूल्यवान क्यों समझते थे जितना अब उचित होता। क्योंकि यद्यपि वे भली भाँति जानते थे कि अपनी दौड़ में उन्हें उसी पर लक्ष्य मानकर रुक नहीं जाना है, तो भी जब उन्होंने देखा कि प्रभु ने उनकी दुर्बलता के अनुसार अपने को ढालकर वहाँ अपनी कृपा की रूपरेखा अंकित कर दी है, तब वह उन्हें उससे अधिक आनन्द देती थी जितना वह केवल अपने आप में देखी जाने पर दे सकती। क्योंकि जैसे प्रभु विश्वासियों के प्रति अपनी भली इच्छा वर्तमान आशीषों के द्वारा प्रमाणित करता हुआ उस समय आत्मिक सुख को प्रतीकों और चिह्नों में दिखाता था, वैसे ही, इसके विपरीत, पार्थिव दण्डों के द्वारा उसने त्यागे हुओं के विरुद्ध अपने न्याय के प्रमाण दिए। इस प्रकार पार्थिव वस्तुओं के द्वारा प्रभु की कृपा भी प्रकट की गई और उसका दण्ड भी दिया गया। अनाड़ी लोग प्रतिफलों और दण्डों के बीच इस समानता और अनुरूपता (यदि यों कहूँ) पर ध्यान न देकर इस बात पर चकित होते हैं कि परमेश्वर में इतना अन्तर है कि जिन्हें प्राचीन काल में उनके अपराधों के लिए अचानक कठोर और भयानक दण्ड मिलते थे, उन्हें वह अब बहुत कम और कम कठोरता से दण्ड देता है, मानो उसने अपना पहला क्रोध त्याग दिया हो; और इसी कारण वे मनिकीवादियों की नाईं यह सोचे बिना नहीं रह सकते कि पुराने नियम का परमेश्वर नए नियम के परमेश्वर से भिन्न था। परन्तु यदि हम परमेश्वरीय प्रबन्ध की उस रीति पर ध्यान दें जिसका मैंने संकेत किया—कि परमेश्वर ने ठीक उस समय, जब वह अपनी वाचा इस्राएलियों को मानो एक परदे के नीचे सौंप रहा था, पार्थिव आशीषों के द्वारा भावी और अनन्त सुख के वरदान को, और शारीरिक दण्डों के द्वारा आत्मिक मृत्यु के भयानक स्वरूप को, दर्शाना और प्रतीक रूप में प्रस्तुत करना चाहा—तो हम ऐसे सन्देहों से सहज ही छूट जाएँगे।
4. पुराने और नए नियम के बीच एक और भेद प्रतीकों में है; पहला केवल सत्य की छवि दिखाता था जबकि वास्तविकता अनुपस्थित थी, अर्थात् सार के स्थान पर छाया; दूसरा पूर्ण सत्य और सम्पूर्ण देह दोनों प्रस्तुत करता है। जब कभी नए नियम की तुलना पुराने से की जाती है तब इसका उल्लेख हुआ करता है,235 परन्तु इसका इतना पूर्ण वर्णन कहीं नहीं मिलता जितना इब्रानियों की पत्री में (अध्याय 7–10)। वहाँ प्रेरित उन लोगों के विरोध में तर्क करता है जो समझते थे कि मूसा की व्यवस्था के पालनों को मिटाने से धर्म का सर्वनाश हो जाएगा। इस भ्रम का खण्डन करने के लिए वह उस ओर ध्यान दिलाता है जो भजनकार ने मसीह के याजकपद के विषय में पहले से कहा था (भजन संहिता 110:4)। चूँकि उसे एक सनातन याजकपद दिया गया है, इसलिए स्पष्ट है कि वह याजकपद जिसमें याजक प्रतिदिन एक के बाद एक आते थे, मिट गया। और वह प्रमाणित करता है कि इस नए याजक की नियुक्ति अवश्य प्रबल होगी, क्योंकि वह शपथ से पक्की की गई है। फिर वह यह जोड़ता है कि याजक के बदलने से वाचा का बदलना अनिवार्य हो गया। और इसकी आवश्यकता को वह इस कारण से पुष्ट करता है कि व्यवस्था की दुर्बलता ऐसी थी कि वह किसी वस्तु को सिद्ध नहीं कर सकती थी। फिर वह दिखाता है कि यह दुर्बलता किसमें है, अर्थात् यह कि उसमें बाहरी शारीरिक पालन थे जो आराधकों को विवेक के विषय में सिद्ध नहीं कर सकते थे, क्योंकि पशुओं के उसके बलिदान न तो पापों को दूर कर सकते थे, न सच्ची पवित्रता दिला सकते थे। इसलिए वह यह निष्कर्ष निकालता है कि वह आनेवाली अच्छी वस्तुओं की छाया थी, न कि उन वस्तुओं की असली प्रतिमा, और इसलिए उस उत्तम आशा की भूमिका बनने के सिवा उसका कोई और काम न था जो सुसमाचार में प्रस्तुत की गई है।
यहाँ हम देख सकते हैं कि व्यवस्था की वाचा की तुलना सुसमाचार की वाचा से, और मसीह की सेवकाई की तुलना मूसा की सेवकाई से किस अर्थ में की गई है। यदि तुलना प्रतिज्ञाओं के सार के विषय में होती, तो दोनों वाचाओं के बीच बड़ा विरोध होता; परन्तु चूँकि विषय की प्रकृति एक अलग दृष्टिकोण की ओर ले जाती है, इसलिए सत्य को पाने के लिए हमें उसी का अनुसरण करना होगा। इसलिए हम उस वाचा को सामने लाएँ जिसे परमेश्वर ने एक बार सनातन और अन्तहीन ठहराकर पक्का किया था। उसकी पूर्ति, जिससे वह स्थिर और पक्की ठहरती है, मसीह है। जब तक यह पूर्ति नहीं होती, प्रभु मूसा के द्वारा रीति-विधियाँ निर्धारित करता है, जो मानो पुष्टि के औपचारिक चिह्न हैं। विचारणीय प्रश्न यह था कि व्यवस्था में ठहराई गई रीति-विधियों को मसीह के लिए मार्ग देना अवश्य था या नहीं। यद्यपि ये वाचा के केवल आनुषंगिक अंश थे, या कम से कम जोड़ और परिशिष्ट, और जैसा कि उन्हें साधारणतः कहा जाता है, गौण बातें, तो भी चूँकि वे उसके प्रबन्ध के साधन थे, इसलिए उन पर वाचा का नाम लगाया गया, जैसा अन्य संस्कारों के विषय में भी किया जाता है।236 इसलिए सामान्य रूप से पुराना नियम उस गम्भीर रीति का नाम है जिससे रीति-विधियों और बलिदानों में निहित वाचा पक्की की जाती थी। चूँकि उसमें, जब तक हम उससे आगे न देखें, कोई सारभूत वस्तु नहीं है, इसलिए प्रेरित तर्क करता है कि उसका रद्द होना और पुराना पड़ जाना अवश्य था (इब्रानियों 7:22), ताकि उस उत्तम वाचा के जामिन और मध्यस्थ मसीह के लिए स्थान बने, जिसके द्वारा चुने हुओं का सनातन पवित्रीकरण एक ही बार मोल लिया गया और वे अपराध मिटाए गए जो व्यवस्था के अधीन बने रहे। परन्तु यदि तुम चाहो तो इसे यों लो: प्रभु की वाचा पुरानी थी, क्योंकि वह रीति-विधियों के छायामय और निष्प्रभाव पालन से ढकी हुई थी; इसलिए वह अस्थायी थी, और मानो तब तक अधर में थी जब तक उसे दृढ़ और सारभूत पुष्टि न मिली। तभी वह नई और सनातन बनी जब वह मसीह के लहू में पवित्र की और स्थापित की गई। इसी कारण उद्धारकर्ता ने अन्तिम भोज में अपने चेलों को कटोरा देते हुए उसे अपने लहू में नई वाचा का कटोरा कहा; इससे वह यह जता रहा था कि परमेश्वर की वाचा तब सचमुच पूरी हुई, नई और सनातन बनी जब वह उसके लहू से मुहरबन्द की गई।
235 फ्रेंच में है, “et à icelle se doivent reduire quasi tous les passages, auxquels le viel Testament est opposé au Nouveau par comparaison।”—और इसी की ओर, एक प्रकार से, उन सब अंशों को ले जाना चाहिए जिनमें पुराने नियम को तुलना के रूप में नए नियम के विरोध में रखा गया है।
236 “Qualiter et aliis Sacramentis dari solet।” फ्रेंच में, “comme l’Escriture a coustume d’attribuer aux sacremens le nom des choses qu’ils representent”—जैसे पवित्रशास्त्र संस्कारों को उन वस्तुओं के नाम देने का अभ्यासी है जिनका वे प्रतिनिधित्व करते हैं।
5. अब स्पष्ट है कि प्रेरित ने किस अर्थ में कहा (गलातियों 3:24; 4:1) कि यहूदी व्यवस्था की शिक्षकाई के द्वारा मसीह के देह में प्रकट होने से पहले उसकी ओर ले जाए गए। वह मानता है कि वे परमेश्वर के पुत्र और वारिस थे, यद्यपि अल्पवयस्कता के कारण वे एक शिक्षक की संरक्षकता में रखे गए थे। धार्मिकता का सूर्य अभी उदय नहीं हुआ था, इसलिए उचित था कि प्रकाशन का इतना प्रकाश और इतनी स्पष्ट समझ न हो। प्रभु ने अपने वचन का प्रकाश इस प्रकार बाँटा कि वे उसे दूर से और धुँधला देख सकें। इसलिए समझ की इस थोड़ी-सी मात्रा को पौलुस ने बाल्यावस्था शब्द से बताया है, जिसे प्रभु ने इस संसार की आदि शिक्षाओं और बाहरी पालनों से तब तक प्रशिक्षित करना चाहा जब तक मसीह प्रकट न हो। उसी के द्वारा विश्वासियों के ज्ञान को परिपक्व होना था। यह भेद हमारे उद्धारकर्ता ने स्वयं भी बताया जब उसने कहा कि व्यवस्था और भविष्यद्वक्ता यूहन्ना तक रहे, उस समय से परमेश्वर के राज्य का सुसमाचार प्रचार किया जाता है (मत्ती 11:13)। व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं ने अपने समय के लोगों को क्या दिया? उन्होंने उस बुद्धि का पूर्वस्वाद दिया जो किसी दिन स्पष्ट प्रकट होनी थी, और उसे दूर से दिखाया। परन्तु जहाँ मसीह को उँगली से दिखाया जा सकता है, वहाँ परमेश्वर का राज्य प्रकट है। उसी में बुद्धि और समझ के सारे भण्डार हैं, और उनके द्वारा हम स्वर्ग के गर्भगृह तक लगभग पहुँच जाते हैं।
6. इसके विपरीत इस बात से कुछ नहीं होता कि मसीही कलीसिया में विश्वास की उत्तमता में अब्राहम की तुलना किसी से मुश्किल से की जा सकती है, और भविष्यद्वक्ता आत्मा की सामर्थ्य से ऐसे विशिष्ट थे कि आज भी वे सारे संसार को प्रकाश देते हैं। क्योंकि यहाँ प्रश्न यह नहीं कि प्रभु ने थोड़े-से लोगों को कौन-सा अनुग्रह दिया, परन्तु यह कि लोगों को शिक्षा देने में उसकी साधारण रीति क्या थी, और जो उन भविष्यद्वक्ताओं के विषय में भी काम में लाई गई जिन्हें औरों से बढ़कर विशेष ज्ञान दिया गया था। क्योंकि उनका प्रचार दूर की वस्तुओं से सम्बन्ध रखने के कारण धुँधला था, और प्रतीकों में समाया हुआ था। और उनमें प्रकट ज्ञान चाहे जितना अद्भुत हो, तो भी चूँकि उन्हें सब लोगों की साझी शिक्षकाई के अधीन रहना पड़ा, इसलिए उनकी गणना भी बालकों में होनी चाहिए। अन्त में, उनमें से किसी को भी विवेक की ऐसी मात्रा न मिली कि वह उस युग की धुँधलाहट से थोड़ा भी अछूता रहे। इसी से हमारे उद्धारकर्ता के ये वचन हैं, “बहुत से राजा और भविष्यद्वक्ता चाहते थे कि जो तुम देखते हो, उसे देखें, पर न देखा; और जो तुम सुनते हो, उसे सुनें, पर न सुना। धन्य हैं तुम्हारी आँखें, कि वे देखती हैं, और तुम्हारे कान, कि वे सुनते हैं,” (मत्ती 13:17)। और उचित भी था कि मसीह की उपस्थिति की यही विशेषता हो कि उसके द्वारा स्वर्गीय भेदों का प्रकाशन अधिक पारदर्शी हो। इसी आशय का वह अंश है जो हमने पहले पतरस की पहली पत्री से उद्धृत किया, कि उन पर यह प्रकट किया गया कि उनका परिश्रम स्वयं उनके लिए उतना नहीं जितना हमारे युग के लिए उपयोगी होगा।
7. मैं तीसरे भेद पर आता हूँ, जिसे यिर्मयाह ने यों कहा है: “देख, प्रभु कहता है, ऐसे दिन आते हैं जब मैं इस्राएल के घराने और यहूदा के घराने के साथ नई वाचा बाँधूँगा; वैसी नहीं जैसी मैंने उनके पूर्वजों के साथ उस दिन बाँधी थी जब मैंने उनका हाथ पकड़कर उन्हें मिस्र देश से निकाला; (मेरी उस वाचा को उन्होंने तोड़ दिया, यद्यपि मैं उनका पति था, प्रभु कहता है); परन्तु जो वाचा मैं इस्राएल के घराने से बाँधूँगा वह यह होगी; उन दिनों के बाद, प्रभु कहता है, मैं अपनी व्यवस्था उनके भीतर रखूँगा, और उसे उनके हृदय पर लिखूँगा; और मैं उनका परमेश्वर ठहरूँगा, और वे मेरी प्रजा ठहरेंगे। और वे फिर एक दूसरे को, अर्थात् हर एक अपने पड़ोसी और हर एक अपने भाई को यह कहकर न सिखाएँगे कि यहोवा को जानो; क्योंकि छोटे से लेकर बड़े तक, सब मुझे जान लेंगे,” (यिर्मयाह 31:31–34)। इन वचनों से प्रेरित ने व्यवस्था और सुसमाचार की तुलना करने का अवसर लिया, एक को अक्षर की शिक्षा और दूसरे को आत्मा की शिक्षा कहा; एक को पत्थर की तख्तियों पर, दूसरे को हृदय की तख्तियों पर बना हुआ बताया; एक को मृत्यु का प्रचार, दूसरे को जीवन का; एक को दण्ड की आज्ञा का, दूसरे को धर्मी ठहराए जाने का; एक को मिटनेवाला, दूसरे को स्थायी (2 कुरिन्थियों 3:5, 6)। प्रेरित का उद्देश्य भविष्यद्वक्ता के अर्थ को समझाना है, इसलिए एक के शब्द हमें यह जाँचने के साधन देते हैं कि दोनों से क्या समझा गया। फिर भी दोनों में कुछ अन्तर है। क्योंकि प्रेरित व्यवस्था की चर्चा भविष्यद्वक्ता से अधिक हीन भाव से करता है। यह वह केवल व्यवस्था के विषय में नहीं करता, परन्तु इसलिए कि कुछ झूठे उत्साही लोग थे जिन्होंने रीति-विधियों के प्रति विपरीत उत्साह से सुसमाचार की स्पष्टता को ढक दिया; इसलिए वह उनकी भूल और मूर्खतापूर्ण लगाव को ध्यान में रखकर व्यवस्था के स्वरूप की चर्चा करता है। इसलिए पौलुस की इस विशेषता पर ध्यान देना उचित होगा। फिर भी, दोनों, जब वे पुराने और नए नियम की तुलना करते हैं, तब व्यवस्था में केवल वही देखते हैं जो उसका अपना विशेष गुण है। उदाहरणार्थ, व्यवस्था में जगह-जगह237 दया की प्रतिज्ञाएँ हैं; परन्तु चूँकि वे उसमें बाहर से आई हैं, इसलिए जब व्यवस्था को केवल उसके अपने स्वभाव में देखा जाता है तब वे उसके लेखे में नहीं आतीं। उसे केवल यही श्रेय दिया जाता है कि वह जो उचित है उसकी आज्ञा देती है, अपराधों को वर्जित करती है, धार्मिकता के अभ्यासियों को प्रतिफल दिखाती है, और अपराधियों को दण्ड की धमकी देती है, पर साथ ही उस हृदय की भ्रष्टता को न बदलती है, न सुधारती है जो स्वभावतः सब में बसी है।
8. आइए अब प्रेरित के विरोध को क्रम से समझाएँ। पुराना नियम अक्षर का है, क्योंकि वह आत्मा के प्रभाव के बिना घोषित किया गया; नया आत्मिक है, क्योंकि प्रभु ने उसे हृदय पर खोद दिया है। दूसरा विरोध मानो पहले की व्याख्या है। पुराना मृत्यु देनेवाला है, क्योंकि वह सारी मानव जाति को श्राप में लपेटने के सिवा कुछ नहीं कर सकता; नया जीवन का साधन है, क्योंकि जो श्राप से छुड़ाए गए हैं उन्हें वह परमेश्वर के अनुग्रह में लौटा लाता है। पहला दण्ड की आज्ञा की सेवकाई है, क्योंकि वह आदम की सारी सन्तान पर अपराध का दोष लगाता है; दूसरा धार्मिकता की सेवकाई है, क्योंकि वह परमेश्वर की उस दया को खोलता है जिससे हम धर्मी ठहराए जाते हैं। अन्तिम विरोध का सम्बन्ध रीति-सम्बन्धी व्यवस्था से मानना चाहिए। आनेवाली वस्तुओं की छाया होने के कारण समय पर उसका नष्ट होना और मिट जाना अवश्य था; जबकि सुसमाचार, चूँकि वह स्वयं देह को प्रस्तुत करता है, सदा के लिए दृढ़ता से स्थापित है। यिर्मयाह वास्तव में नैतिक व्यवस्था को भी एक दुर्बल और भंगुर वाचा कहता है; परन्तु दूसरे कारण से—अर्थात् इसलिए कि एक कृतघ्न प्रजा के अचानक विद्रोह से वह तुरन्त तोड़ दी गई; परन्तु चूँकि ऐसे उल्लंघन का दोष स्वयं लोगों पर है, इसलिए वह ठीक अर्थ में वाचा के विरुद्ध नहीं ठहराया जा सकता। इसके विपरीत, रीति-विधियाँ, चूँकि अपनी ही दुर्बलता के कारण मसीह के आगमन पर समाप्त कर दी गईं, उनमें दुर्बलता का कारण भीतर से ही था। इसके अतिरिक्त, आत्मा और अक्षर के भेद को यों न समझना चाहिए मानो प्रभु ने अपनी व्यवस्था यहूदियों को किसी भी अच्छे परिणाम के बिना दी हो; अर्थात् मानो उनमें से कोई उसकी ओर न फिरा हो। यह तुलना के रूप में उस अनुग्रह की प्रचुरता की प्रशंसा करने के लिए प्रयुक्त है जिससे वही व्यवस्था-दाता, मानो नया रूप धरकर, सुसमाचार के प्रचार को सम्मानित करता है। जब हम उन लोगों की संख्या पर विचार करते हैं जिन्हें उसने सुसमाचार के प्रचार से अपनी आत्मा द्वारा नया जन्म दिया और सब जातियों में से अपनी कलीसिया की सहभागिता में इकट्ठा किया, तो हम कह सकते हैं कि प्राचीन इस्राएल में जिन्होंने सच्चे और हार्दिक मन से प्रभु की वाचा को अपनाया वे थोड़े या कोई नहीं थे, यद्यपि जब उन्हें बिना तुलना के अपने आप में देखा जाए तो संख्या बड़ी है। [237 “Passim।” फ्रेंच में, “çà et là”—यहाँ-वहाँ।]
9. तीसरे भेद से चौथा निकलता है। पवित्रशास्त्र में दासत्व शब्द पुराने नियम पर लगाया गया है क्योंकि वह भय उत्पन्न करता है, और स्वतंत्रता शब्द नए नियम पर क्योंकि वह भरोसा और निश्चिन्तता उत्पन्न करता है। इसी से पौलुस रोमियों से कहता है, “तुम को दासत्व की आत्मा नहीं मिली कि फिर भयभीत हो, परन्तु लेपालकपन की आत्मा मिली है, जिससे हम हे अब्बा, हे पिता कहकर पुकारते हैं,” (रोमियों 8:15)। इसी आशय का वह अंश है जो इब्रानियों में है, “क्योंकि तुम उस पहाड़ के पास नहीं आए जो छुआ जा सकता था, और जो आग से जल रहा था, और न काली घटा, और अन्धकार, और आँधी, और तुरही के शब्द, और बोलनेवाले की ऐसी आवाज़ के पास, जिसे सुननेवालों ने विनती की कि अब हम से और बातें न की जाएँ (क्योंकि वे उस आज्ञा को न सह सके, कि यदि कोई पशु भी पहाड़ को छूए तो पत्थरवाह किया जाए, या बरछी से बेधा जाए; और वह दृश्य ऐसा भयंकर था कि मूसा ने कहा, मैं बहुत डरता और काँपता हूँ); परन्तु तुम सिय्योन पहाड़ के और जीवते परमेश्वर के नगर, स्वर्गीय यरूशलेम के पास आए हो,” इत्यादि (इब्रानियों 12:18–22)। जो बात पौलुस ने रोमियों से उद्धृत उस अंश में संक्षेप में कही, उसे गलातियों की पत्री में अधिक विस्तार से समझाता है, जहाँ वह अब्राहम के दो पुत्रों का रूपक यों बाँधता है: “हाजिरा तो अरब का सीनै पहाड़ है, और आज के यरूशलेम की जो अपने बालकों समेत दासत्व में है, समता में है। पर ऊपर की यरूशलेम स्वतंत्र है, और वह हमारी माता है,” (गलातियों 4:25, 26)। जैसे हाजिरा की सन्तान दासत्व में जन्मी और मीरास कभी न पा सकती थी, जबकि सारा की सन्तान स्वतंत्र थी और मीरास की अधिकारी थी, वैसे ही व्यवस्था के द्वारा हम दासत्व के अधीन किए जाते हैं, और केवल सुसमाचार के द्वारा स्वतंत्रता के लिए नया जन्म पाते हैं। सारांश यह है: पुराने नियम ने विवेक को भय और कम्पन से भर दिया—नया उसे आनन्द से भर देता है। पहले के द्वारा विवेक दासत्व में रखा जाता है, दूसरे के द्वारा वह छुड़ाया और स्वतंत्र किया जाता है। यदि यह आपत्ति की जाए कि इस्राएल के पवित्र पूर्वजों को, जैसे उनमें वही विश्वास की आत्मा थी, वैसे ही उसी स्वतंत्रता और आनन्द के भी भागी होना चाहिए था, तो हमारा उत्तर है कि इनमें से कोई भी व्यवस्था से नहीं मिला; परन्तु यह अनुभव करके कि व्यवस्था के द्वारा वे दासों के समान दबाए और अशान्त विवेक से सताए जा रहे हैं, उन्होंने सुसमाचार में शरण ली; और इसलिए सुसमाचार का विशेष लाभ यही था कि पुराने नियम के साधारण नियम के विपरीत, उसने अपने अधीन रहनेवालों को इन बुराइयों से छुड़ा दिया। फिर हम इससे भी इनकार करते हैं कि उनमें स्वतंत्रता और निश्चिन्तता की आत्मा इतनी मात्रा में थी कि उन्हें भय और दासत्व का कुछ अनुभव न हुआ हो। क्योंकि सुसमाचार के अनुग्रह से जो विशेषाधिकार उन्होंने पाया था उसका वे चाहे जितना आनन्द लेते रहे हों, तो भी वे अपनी जाति के अन्य लोगों के समान पालनों के उन्हीं बन्धनों और बोझों के अधीन थे। इसलिए जब वे रीति-विधियों के चिन्तापूर्ण पालन के लिए बाध्य थे (जो दासत्व की सीमा तक पहुँचनेवाली शिक्षकाई के चिह्न थे, और ऐसे हस्तलेख थे जिनसे वे अपना दोष मानते थे, परन्तु उससे बच न पाते थे), तो उचित ही कहा जाता है कि उस साझे प्रबन्ध के विषय में, जिसके अधीन यहूदी लोग उस समय रखे गए थे, वे तुलना में भय और दासत्व की वाचा के अधीन थे।
10. जिन तीन अन्तिम विरोधों का हमने संकेत किया (खण्ड 4, 7, 9), वे व्यवस्था और सुसमाचार के बीच हैं, और इसलिए इनमें व्यवस्था को पुराने नियम का और सुसमाचार को नए नियम का नाम दिया गया है। पहला अधिक व्यापक है (खण्ड 1), जिसके अन्तर्गत वे प्रतिज्ञाएँ भी आती हैं जो व्यवस्था से भी पहले दी गई थीं। जब अगस्तीन ने यह प्रतिपादित किया कि इन्हें पुराने नियम के नाम में सम्मिलित न किया जाए (August. ad Bonifac. lib. 3 c. 14), तो उसने अत्यन्त ठीक दृष्टिकोण अपनाया, और उसका आशय उससे भिन्न नहीं था जो हमने अभी सिखाया; क्योंकि उसके सामने यिर्मयाह और पौलुस के वे अंश थे जिनमें पुराने नियम को अनुग्रह और दया के वचन से अलग बताया गया है। उसी अंश में अगस्तीन बड़ी चतुराई से यह टिप्पणी करता है कि जगत के आरम्भ से प्रतिज्ञा की सन्तान, अर्थात् जिन्होंने परमेश्वर की ओर से नया जन्म पाया था, और जो प्रेम के द्वारा कार्य करनेवाले विश्वास से आज्ञाओं का पालन करते थे, नए नियम के थे; वे शारीरिक, पार्थिव और अस्थायी नहीं, परन्तु आत्मिक, स्वर्गीय और अनन्त आशीषों की आशा रखते थे, और विशेषकर एक मध्यस्थ पर विश्वास करते थे, जिसके द्वारा उन्हें इसमें सन्देह न था कि भला करने के योग्य बनानेवाली आत्मा भी उन्हें दी जाती थी और जितनी बार वे पाप करते थे उतनी बार क्षमा भी मिलती थी। इस प्रकार वह यही प्रतिपादित करना चाहता था कि पवित्रशास्त्र में जगत के आरम्भ से जितने सन्तों का उल्लेख परमेश्वर के विशेष रूप से चुने हुओं के रूप में किया गया है, वे सब हमारे समान ही अनन्त उद्धार की आशीष के भागी थे। हमारे विभाजन और अगस्तीन के विभाजन में केवल यही अन्तर है कि हमारा (हमारे उद्धारकर्ता के इन वचनों के अनुसार, “सब भविष्यद्वक्ता और व्यवस्था यूहन्ना तक भविष्यद्वाणी करते रहे,” मत्ती 11:13) सुसमाचार के प्रकाश और उससे पहले के वचन के उस अधिक धुँधले प्रबन्ध के बीच भेद करता है, जबकि दूसरा केवल व्यवस्था की दुर्बलता और सुसमाचार की सामर्थ्य के बीच भेद करता है। और यहाँ भी, पवित्र पूर्वजों के विषय में यह ध्यान देना चाहिए कि यद्यपि वे पुराने नियम के अधीन जीए, तो भी वे वहीं रुके नहीं, परन्तु सदा नए नियम की अभिलाषा करते रहे, और इस प्रकार उसके साथ निश्चित सहभागिता में प्रवेश किया। जो लोग वर्तमान छायाओं से सन्तुष्ट होकर अपने विचारों को मसीह तक न ले गए, उन पर प्रेरित अन्धेपन और श्राप का दोष लगाता है। और बातों को छोड़ भी दें तो इससे बड़ा अन्धापन क्या कल्पना किया जा सकता है कि कोई पशु के बलिदान से पाप के प्रायश्चित की आशा रखे, या जल से बाहरी धुलाई में मन की शुद्धि ढूँढ़े, या ठण्डी रीति-विधियों से परमेश्वर को मनाने का प्रयत्न करे, मानो वह उनसे बहुत प्रसन्न होता हो? ऐसी ही मूर्खताओं में वे गिरते हैं जो मसीह की ओर दृष्टि किए बिना व्यवस्था के पालनों से चिपके रहते हैं।
11. पाँचवाँ भेद, जो हमें जोड़ना है, इसमें है कि मसीह के आगमन तक प्रभु ने एक जाति को अलग रखा, और अपने अनुग्रह की वाचा को उसी तक सीमित किया। मूसा कहता है, “जब परमप्रधान ने जातियों को उनकी मीरास बाँट दी, जब उसने आदम की सन्तान को अलग-अलग किया, तब उसने इस्राएलियों की गिनती के अनुसार देश-देश के लोगों की सीमाएँ ठहराईं। क्योंकि यहोवा का अंश उसकी प्रजा है; याकूब उसकी मीरास का भाग है,” (व्यवस्थाविवरण 32:8, 9)। एक और स्थान पर वह लोगों से यों कहता है: “देख, स्वर्ग और सब से ऊँचे स्वर्ग, और पृथ्वी और जो कुछ उसमें है, वह सब तेरे परमेश्वर यहोवा ही का है। तौभी यहोवा ने तेरे पितरों से प्रेम करने को मन लगाया, और उनके पश्चात् उनके वंश को, अर्थात् तुम को, सब देशों के लोगों में से चुन लिया, जैसा आज के दिन है,” (व्यवस्थाविवरण 10:14, 15)। इसलिए उस जाति को, मानो वही मानव-जाति का एकमात्र भाग था जो उसका था, उसने अपने नाम के ज्ञान के लिए अकेले अपनाया; अपनी वाचा को मानो उनकी गोद में रखा, उन पर अपने ईश्वरत्व की उपस्थिति प्रकट की, और उन्हें सब विशेषाधिकारों से सम्मानित किया। परन्तु अन्य अनुग्रहों को छोड़ भी दें तो यहाँ जिस पर विचार किया जा रहा है, वह केवल यह है कि उसने उन्हें अपने वचन की सहभागिता से अपने साथ बाँध लिया, जिससे वह उनका परमेश्वर कहलाया और माना गया। इस बीच अन्य जातियों को, मानो उनका उससे कोई सम्बन्ध ही न रहा हो, उसने व्यर्थता में भटकने दिया, यहाँ तक कि उनके नाश को रोकने का एकमात्र साधन भी—अर्थात् अपने वचन का प्रचार—उन्हें न दिया। इस प्रकार इस्राएल प्रभु का प्रिय पुत्र था, बाकी परदेशी थे। इस्राएल जाना और विश्वास और संरक्षण में लिया गया, बाकी अन्धकार में छोड़े गए; इस्राएल पवित्र किया गया, बाकी अपवित्र थे; इस्राएल को परमेश्वर की उपस्थिति से सम्मान मिला, बाकी उससे दूर रखे गए। परन्तु जब सब कुछ नया करने के लिए ठहराया हुआ समय पूरा हुआ, जब परमेश्वर और मनुष्य के बीच का मध्यस्थ प्रकट हुआ, तब बीच की दीवार, जिसने बहुत समय से ईश्वरीय दया को इस्राएल की सीमाओं में रोक रखा था, ढा दी गई, दूर के लोगों को और निकटवालों को शान्ति का सुसमाचार सुनाया गया, ताकि वे सब मिलकर परमेश्वर से मेल-मिलाप पाकर एक प्रजा के रूप में एक हो जाएँ। इसलिए अब यहूदी या यूनानी, खतना या खतनारहित का कोई भेद नहीं, परन्तु मसीह सब कुछ और सब में है। उसी को अन्यजाति मीरास में और पृथ्वी की छोर तक उसकी निज भूमि के रूप में दी गई है (भजन संहिता 2:8), ताकि वह बिना भेद के “एक समुद्र से दूसरे समुद्र तक, और महानद से पृथ्वी के छोर तक” राज्य करे (भजन संहिता 72:8)।
12. इसलिए अन्यजातियों की बुलाहट नए नियम की पुराने नियम पर श्रेष्ठता को दर्शानेवाला एक विशेष चिह्न है। यह सच है कि भविष्यद्वक्ताओं ने इसे पहले ही अनेक और स्पष्ट अंशों में बता दिया था, परन्तु फिर भी इसकी पूर्ति मसीहा के राज्य के समय तक टाल दी गई। स्वयं मसीह ने भी अपनी सेवकाई के आरम्भ में इसे स्वीकार न किया, परन्तु तब तक टाले रखा जब तक उसने छुटकारे का सारा कार्य उसके सब अंगों में पूरा न कर लिया और अपने दीन होने का समय समाप्त न कर लिया; तब उसने पिता से “वह नाम पाया जो सब नामों में श्रेष्ठ है, कि यीशु के नाम पर हर एक घुटना झुके,” (फिलिप्पियों 2:9, 10)। इसलिए, समय अभी पूरा न होने के कारण, उसने कनानी स्त्री से कहा, “मैं इस्राएल के घराने की खोई हुई भेड़ों को छोड़ और किसी के पास नहीं भेजा गया,” (मत्ती 15:24)। और प्रेरितों को अपनी पहली आज्ञा में भी वह उन्हें इन्हीं सीमाओं से आगे जाने नहीं देता: “अन्यजातियों के मार्ग पर न जाना, और सामरियों के किसी नगर में प्रवेश न करना; परन्तु इस्राएल के घराने की खोई हुई भेड़ों के पास जाना,” (मत्ती 10:5, 6)। यद्यपि यह बात अनेक अंशों में स्पष्टता से कही गई थी, फिर भी जब यह प्रेरितों को सुनाई गई, तो उन्हें इतनी नई और अनोखी लगी कि वे उससे किसी राक्षसी बात की नाईं भयभीत हुए। अन्त में जब उन्होंने उस पर अमल किया, तो डरते-डरते और बिना अनिच्छा के नहीं। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं; क्योंकि बुद्धि के अनुसार यह किसी रीति से उचित न लगता था कि प्रभु, जिसने इतनी पीढ़ियों तक इस्राएल को शेष जातियों में से चुन रखा था, अचानक मानो अपना उद्देश्य बदल दे और अपना चुनाव त्याग दे। भविष्यद्वाणी ने इसे अवश्य पहले से बता दिया था, परन्तु वे भविष्यद्वाणियों पर इतना ध्यान न दे सकते थे कि इस प्रकार अपनी आँखों के सामने रखे गए नए दृश्य से कुछ चौंक न जाएँ। यह पर्याप्त न था कि परमेश्वर ने प्राचीन काल में अन्यजातियों की भावी बुलाहट के नमूने दिए थे। जिन्हें उसने इस प्रकार बुलाया वे बहुत थोड़े थे, और फिर, उसने उन्हें अपनी प्रजा के निकट आने देने से पहले एक प्रकार से अब्राहम के घराने में गोद ले लिया था। परन्तु इस सार्वजनिक बुलाहट से अन्यजातियाँ न केवल यहूदियों के बराबर की गईं, परन्तु उनके स्थान पर बैठाई हुई-सी दिखाई दीं, मानो यहूदी मर चुके हों।238 इसके अतिरिक्त, जिन परदेशियों को परमेश्वर ने पहले कलीसिया की देह में लिया था, वे कभी यहूदियों के बराबर की स्थिति में नहीं रखे गए थे। इसलिए पौलुस का इसे उस भेद के रूप में वर्णित करना, जो युगों और पीढ़ियों से गुप्त रहा परन्तु अब उसके पवित्र लोगों पर प्रकट हुआ है, निराधार नहीं है (कुलुस्सियों 1:26)।
13. पुराने और नए नियम का सारा अन्तर, मेरे विचार में, इन चार या पाँच शीर्षकों के अधीन, जहाँ तक साधारण शिक्षा के लिए आवश्यक है, पूरी तरह और विश्वासयोग्यता से समझा दिया गया है। परन्तु चूँकि कलीसिया के संचालन की यह विविधता, शिक्षा की रीति की यह भिन्नता, और रीतियों और विधियों में यह बड़ा परिवर्तन कुछ लोगों को असंगत लगता है, इसलिए आगे बढ़ने से पहले हमें उन्हें उत्तर देना चाहिए। और यह संक्षेप में हो सकता है, क्योंकि आपत्तियाँ इतनी सबल239 नहीं हैं कि उनके अत्यन्त सावधान खण्डन की आवश्यकता हो। वे कहते हैं कि यह मानना अनुचित है कि परमेश्वर, जो सदा अपने अनुरूप रहता है, ऐसे परिवर्तन की अनुमति दे कि जिस बात की उसने एक बार आज्ञा दी और सराहना की, उसे बाद में अस्वीकार करे। मेरा उत्तर यह है कि परमेश्वर को परिवर्तनशील नहीं समझना चाहिए क्योंकि वह भिन्न-भिन्न युगों के लिए भिन्न-भिन्न रूप ठहराता है, जैसा वह जानता है कि प्रत्येक के लिए उचित है। यदि किसान सर्दी में अपने घराने के लिए एक प्रकार के काम ठहराता है और गर्मी में दूसरे, तो हम इसी कारण उसे चंचल नहीं कहते, और न यह समझते हैं कि वह खेती के उन नियमों से हट रहा है जो प्रकृति के नियमित क्रम पर आधारित हैं। इसी प्रकार यदि घराने का पिता अपने बच्चों को शिक्षा देने, उन पर शासन करने और उनका प्रबन्ध करने में बाल्यावस्था में एक मार्ग, किशोरावस्था में दूसरा और पूर्ण युवावस्था में तीसरा अपनाता है, तो हम इसी कारण यह नहीं कहते कि वह चंचल है, या अपने विचार छोड़ देता है। तो फिर हम परमेश्वर पर अस्थिरता का दोष क्यों लगाते हैं जब वह समयों की भिन्नता के अनुसार उचित और अनुकूल प्रबन्ध करता है? यह दूसरी उपमा पूरी तरह सन्तोषजनक होनी चाहिए। पौलुस यहूदियों की तुलना बच्चों से और मसीहियों की तुलना प्रौढ़ों से करता है (गलातियों 4:1)। ईश्वरीय प्रबन्ध में क्या अनियमितता है, जिसने उन्हें उनकी आयु के योग्य आदि शिक्षाओं में सीमित रखा, और हमें अधिक दृढ़ और पुरुषोचित अनुशासन से प्रशिक्षित करता है? परमेश्वर की स्थिरता इसमें स्पष्ट है कि उसने सब युगों को एक ही शिक्षा दी, और अपने नाम की उसी आराधना की माँग पर अड़ा रहा जिसकी आज्ञा उसने आरम्भ में दी थी। बाहरी रूप और रीति बदलना यह नहीं दर्शाता कि वह परिवर्तन के अधीन है। इतने में उसने केवल अपने को मनुष्य की परिवर्तनशील और भिन्न-भिन्न क्षमताओं के अनुकूल बनाया है।
14. परन्तु कहा जाता है, इस विविधता का कारण परमेश्वर की अपनी इच्छा के सिवा और क्या है? क्या उसके लिए पहले से ही, मसीह के आगमन के बाद की नाईं, बिना किसी प्रतीक के स्पष्ट शब्दों में अनन्त जीवन प्रकट करना, थोड़े से स्पष्ट संस्कारों से अपनी प्रजा को शिक्षा देना, अपना पवित्र आत्मा देना और अपना अनुग्रह सारे भूमण्डल में फैलाना उतना ही सरल न होता? यह लगभग वैसा ही है जैसे परमेश्वर पर इसलिए दोष लगाना कि उसने जगत को इतनी देर से रचा, जबकि वह उसे पहले ही रच सकता था, या इसलिए कि उसने गर्मी और सर्दी, दिन और रात के बारी-बारी से बदलने का नियम ठहराया। हर भक्त मन की साझी भावना के साथ हम इसमें सन्देह न करें कि परमेश्वर ने जो कुछ किया है वह बुद्धि और न्याय से किया है, चाहे हम उस कारण से अनजान हों जिसने ऐसा करना आवश्यक ठहराया। हम अपने ऊपर बहुत अधिक अधिकार जताएँगे यदि हम परमेश्वर को यह न मानें कि उसके पास अपनी योजना के ऐसे कारण हो सकते हैं जिन्हें हम समझ नहीं सकते। वे कहते हैं, यह आश्चर्य की बात है कि वह अब पशुओं के बलिदानों को और उस लैव्य याजकपद के सारे आडम्बर को, जिसमें वह पहले प्रसन्न होता था, तिरस्कार और घृणा के साथ ठुकराता है। मानो वे बाहरी और क्षणिक बातें परमेश्वर को प्रसन्न कर सकती थीं, या किसी रीति से उसे प्रभावित कर सकती थीं!240 यह पहले ही बताया जा चुका है कि उसने इनमें से कुछ भी अपने लिए नहीं ठहराया, परन्तु सब मनुष्यों के उद्धार के लिए स्थापित किया। यदि कोई वैद्य सर्वोत्तम विधि अपनाकर किसी युवक को चंगा करे, और बाद में जब वही व्यक्ति बूढ़ा हो जाए और उसे फिर वही रोग हो, तो चंगा करने की दूसरी विधि अपनाए, तो क्या यह कहा जा सकता है कि वह उस विधि को ठुकराता है जिसे उसने पहले अनुमोदित किया था? नहीं, उसका अनुमोदन करते हुए वह केवल जीवन की भिन्न अवस्थाओं के अनुकूल अपने को ढालता है। इसी प्रकार, मसीह की अनुपस्थिति में उसका चित्रण करने और उसके भावी आगमन की भविष्यद्वाणी करने के लिए चिह्नों का ऐसा समूह काम में लाना आवश्यक था जो उन चिह्नों से भिन्न हो जो अब काम में लाए जाते हैं, जब उसका वास्तविक प्रकटीकरण सामने है। यह सच है कि मसीह के आगमन के बाद से परमेश्वर की बुलाहट सब जातियों को अधिक विस्तार से दी जाती है, और आत्मा के अनुग्रह पहले की अपेक्षा अधिक उदारता से दिए जाते हैं। परन्तु मैं पूछता हूँ, कौन परमेश्वर के इस अधिकार से इनकार कर सकता है कि वह अपने दानों का स्वतंत्र और अनियन्त्रित वितरण करे, कि जिन जातियों को वह प्रकाशित करना चाहे उन्हें चुने, जिन स्थानों को वह अपने वचन के प्रचार से प्रसिद्ध करना चाहे उन्हें चुने, और अपनी शिक्षा को जितनी प्रगति और सफलता देना चाहे उसकी रीति और मात्रा ठहराए,—कि संसार को उसकी कृतघ्नता का दण्ड देने के लिए कुछ युगों तक अपने नाम का ज्ञान उठा ले, और फिर जब चाहे दया से उसे लौटा दे? तो हम देखते हैं कि दुष्ट लोग इस विषय में जिन निन्दाओं से सीधे-सादे लोगों के मन को उलझाते हैं, उनमें ऐसा कुछ नहीं जो परमेश्वर के न्याय या पवित्रशास्त्र की सच्चाई पर सन्देह डाले।
238 “In demortuorum locum।” फ्रेंच में केवल, “en leur lieu”—उनके स्थान पर। 239 “Firmæ,” फ्रेंच में, “Ne si fortes, ne si urgentes”—न इतनी सबल, न इतनी ज़ोरदार।
