पुस्तक III · अध्याय 12

परमेश्वर के न्यायासन पर विचार करने की आवश्यकता, ताकि निःशुल्क धर्मी ठहराए जाने के सिद्धान्त का गम्भीरता से निश्चय हो

Institutes of the Christian Religion · John Calvin

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परमेश्वर के न्यायासन पर विचार करने की आवश्यकता, ताकि निःशुल्क धर्मी ठहराए जाने के सिद्धान्त का गम्भीरता से निश्चय हो

अध्याय 12।

परमेश्वर के न्यायासन पर विचार करने की आवश्यकता, ताकि निःशुल्क धर्मी ठहराए जाने के सिद्धान्त का गम्भीरता से निश्चय हो।

इस अध्याय के विभाग ये हैं,—I. परमेश्वर की धार्मिकता पर विचार कर्मों की धार्मिकता को उलट देता है, जैसा कि पवित्रशास्त्र के अंशों और सन्तों के अंगीकार और उदाहरण से स्पष्ट है, खण्ड 1-3। II. यही प्रभाव विवेक की गम्भीर जाँच और ईश्वरीय न्यायालय के सामने निरन्तर उपस्थित होने से उत्पन्न होता है, खण्ड 4 और 5। III. इससे भक्तों के हृदयों में कपट या पुण्य की व्यर्थ धारणा नहीं, परन्तु सच्ची दीनता उत्पन्न होती है। यह पवित्रशास्त्र के अधिकार और चुंगी लेनेवाले के उदाहरण से स्पष्ट किया गया है, खण्ड 6, 7। IV. निष्कर्ष—अहंकार और निश्चिन्तता को त्याग देना चाहिए, क्योंकि जितना कोई अपने ऊपर भरोसा रखता है उतना ही वह ईश्वरीय भलाई के मार्ग में बाधा डालता है।

खण्ड।

419 फ्रेंच में: “Sous la robbe;”—वस्त्र के नीचे।

1. धर्मी ठहराए जाने के विषय में भूल का स्रोत। कुतर्कशास्त्री ऐसे बोलते हैं मानो प्रश्न किसी मानवीय न्यायालय के सामने विचारा जाना हो। यह परमेश्वर की महिमा और न्याय से सम्बन्ध रखता है। इसलिए पूर्ण सिद्धता के बिना कुछ भी स्वीकार नहीं किया जाता। इस सिद्धान्त की पुष्टि करनेवाले अंश। यदि हम व्यवस्था की धार्मिकता तक उतरें, तो श्राप तुरन्त प्रकट हो जाता है।

2. कपटपूर्ण भरोसे का स्रोत। एक उपमा से स्पष्ट किया गया। उपदेश। अय्यूब, दाऊद और पौलुस की गवाही।

3. अगस्तीन और बर्नार्ड का अंगीकार।

4. कर्मों की धार्मिकता को उलट देनेवाला एक और साधन—अर्थात् विवेक की गम्भीर जाँच, और परमेश्वर की सिद्धता तथा मनुष्य की अपूर्णता की तुलना।

5. हम अपने कर्मों की इस काल्पनिक धारणा में इतना क्यों लिप्त हो जाते हैं। इसका उचित उपचार परमेश्वर की महिमा और अपनी दुर्दशा पर विचार करने में मिलता है। इस दुर्दशा का वर्णन।

6. मसीही दीनता अपनी धार्मिकता के काल्पनिक विचार को त्याग देने और मसीह में विश्वास के द्वारा ग्रहण की गई परमेश्वर की दया पर पूरी तरह भरोसा रखने में है। इस दीनता का वर्णन। पवित्रशास्त्र के अंशों से प्रमाणित।

7. चुंगी लेनेवाले के दृष्टान्त की व्याख्या।

8. अहंकार, निश्चिन्तता और आत्म-भरोसा को त्याग देना चाहिए। सामान्य नियम, या ऊपर के सिद्धान्त का सार।

1. यद्यपि ऊपर के सिद्धान्त की पूर्ण सत्यता पवित्रशास्त्र के स्पष्ट अंशों से प्रमाणित है, तो भी हम यह स्पष्ट नहीं देख सकते कि यह कितना आवश्यक है, जब तक हम उन नींवों को स्पष्ट रूप से सामने न लाएँ जिन पर सारी चर्चा टिकनी चाहिए। इसलिए पहले हम स्मरण रखें कि जिस धार्मिकता पर हम विचार कर रहे हैं वह मानवीय नहीं, परन्तु स्वर्गीय न्यायालय की है; और इसलिए उस सिद्धता को, जिससे परमेश्वर का न्याय सन्तुष्ट होना है, अपने छोटे-से मापदण्ड से नापने से सावधान रहें। यह आश्चर्य की बात है कि इसे साधारणतः कितनी उतावली और ढिठाई से परिभाषित किया जाता है। वरन् हम देखते हैं कि कर्मों की धार्मिकता की बात सबसे अधिक आत्मविश्वास से, या यूँ कहें कि सबसे अधिक डींग मारते हुए, वे ही करते हैं जिनके रोग सबसे प्रत्यक्ष और दोष सबसे स्पष्ट हैं। वे ऐसा इसलिए करते हैं कि वे मसीह की धार्मिकता पर विचार नहीं करते, जिसका यदि उन्हें थोड़ा-सा भी बोध होता, तो वे उसका इतना अपमान कभी न करते। वह निश्चय ही तुच्छ ठहराई जाती है यदि उसे इतनी सिद्ध न माना जाए कि कोई ऐसी बात स्वीकार नहीं की जा सकती जो हर रूप में पूर्ण और निरपेक्ष, और किसी अशुद्धता से कलंकित न हो; ऐसी, जैसी मनुष्य में कभी नहीं पाई गई और न कभी पाई जाएगी। विद्यालयों की सीमा के भीतर किसी भी मनुष्य के लिए धर्मी ठहराए जाने के लिए कर्मों की पर्याप्तता की बात करना सरल है; परन्तु जब हम परमेश्वर की उपस्थिति में आते हैं, तब ऐसी बातों को विराम देना ही होगा। वहाँ विषय गम्भीरता से विचारा जाता है, और वह अब रंगमंच का शब्द-युद्ध नहीं रह जाता। यदि हम सच्ची धार्मिकता के विषय में कुछ सार्थक पूछना चाहते हैं, तो हमें अपना मन यहाँ ही लगाना होगा; प्रश्न यह होना चाहिए: जब स्वर्गीय न्यायी हमसे लेखा माँगेगा तब हम उसे क्या उत्तर देंगे? हम उस न्यायी का चिन्तन वैसा न करें जैसा हमारी अपनी असहाय बुद्धि उसकी कल्पना करती है, परन्तु वैसा जैसा वह पवित्रशास्त्र में हमारे सामने चित्रित किया गया है (विशेष रूप से अय्यूब की पुस्तक देखो): एक ऐसे तेज के साथ जो तारों को मलिन कर देता है, एक ऐसी शक्ति के साथ जो पहाड़ों को गला देती है, एक ऐसे क्रोध के साथ जो पृथ्वी को हिला देता है, एक ऐसी बुद्धि के साथ जो बुद्धिमानों को उनकी चतुराई में फँसा लेती है, एक ऐसी पवित्रता के साथ जिसके सामने सब कुछ अशुद्ध हो जाता है, एक ऐसी धार्मिकता के साथ जिसकी बराबरी स्वर्गदूत भी नहीं कर सकते (दोषी को निर्दोष ठहराना तो उससे बहुत दूर की बात है), एक ऐसे बदले के साथ जो एक बार भड़कने पर गहरे से गहरे नरक तक जलता है (निर्गमन 34:7; नहूम 1:3; व्यवस्थाविवरण 32:22)। मैं कहता हूँ, वह मनुष्यों के कामों का न्याय करने बैठे, तो कौन उसके सिंहासन के सामने खड़े होकर निश्चिन्त रहेगा? भविष्यद्वक्ता कहता है, “हम में से कौन प्रचण्ड आग के साथ रह सकता है? हम में से कौन सदा जलते रहनेवाले ज्वाला के साथ रह सकता है? वह जो धर्म से चलता और सीधी बातें बोलता है,” इत्यादि (यशायाह 33:14, 15)। जो चाहे वह आगे आए। वरन् उत्तर दिखाता है कि कोई मनुष्य ऐसा नहीं कर सकता। क्योंकि दूसरी ओर हम यह भयानक वाणी सुनते हैं: “हे याह, यदि तू अधर्म के कामों का लेखा ले, तो हे प्रभु, कौन खड़ा रह सकेगा?” (भजन संहिता 130:3)। जैसा अय्यूब घोषित करता है, सब तुरन्त नष्ट हो जाएँगे, “क्या मरणहार मनुष्य परमेश्वर से अधिक धर्मी होगा? क्या मनुष्य अपने सृजनहार से अधिक पवित्र हो सकता है? देखो, वह अपने सेवकों पर भरोसा नहीं रखता, और अपने स्वर्गदूतों पर मूर्खता का आरोप लगाता है: फिर उन पर क्या भरोसा जो मिट्टी के घरों में रहते हैं, जिनकी नींव धूल में डाली गई है, जो पतंगे से भी पहले कुचले जाते हैं? वे भोर से साँझ तक नष्ट होते रहते हैं” (अय्यूब 4:17-20)। फिर, “देखो, वह अपने पवित्र लोगों पर भी भरोसा नहीं रखता; वरन् स्वर्ग भी उसकी दृष्टि में निर्मल नहीं हैं। फिर मनुष्य, जो अधर्म को पानी के समान पीता है, कितना अधिक घृणित और अशुद्ध है?” (अय्यूब 15:15, 16)। मैं मानता हूँ कि अय्यूब की पुस्तक में उस धार्मिकता का उल्लेख है जो व्यवस्था के पालन से अधिक उच्च कोटि की है। इस भेद पर ध्यान देना महत्त्वपूर्ण है; क्योंकि यदि मनुष्य व्यवस्था को पूरा भी कर दे, तो भी वह उस धार्मिकता की जाँच में नहीं टिक सकता जो हमारे सब विचारों से परे है। इसलिए यद्यपि अय्यूब को अपने किसी अपराध का बोध नहीं था, तो भी वह विस्मय से मूक हो जाता है, क्योंकि वह देखता है कि यदि स्वर्गदूतों के काम भी उस परम तराज़ू पर तौले जाएँ, तो परमेश्वर उनकी पवित्रता से भी प्रसन्न नहीं किया जा सकता। परन्तु इस अथाह धार्मिकता की चर्चा को और आगे न बढ़ाते हुए मैं केवल यह कहता हूँ कि यदि हमारे जीवन को लिखित व्यवस्था की कसौटी पर लाया जाए, तो हम सचमुच जड़ ही हैं यदि हम उन अनेक श्रापों से भयभीत न हों जिन्हें परमेश्वर ने हमें जगाने के लिए प्रयोग किया है, और उनमें से यह एक सामान्य श्राप: “श्रापित वह जो इस व्यवस्था की बातों को पूरा करने के लिये उन पर स्थिर न रहे” (व्यवस्थाविवरण 27:26)। संक्षेप में, इस विषय की सारी चर्चा नीरस और व्यर्थ होगी, जब तक हम अपने आप को स्वर्गीय न्यायी के सामने न खड़ा करें, और अपने छुटकारे के लिए चिन्तित होकर स्वेच्छा से अपने आप को दीन न करें, और अपनी शून्यता को स्वीकार न करें।

2. इसलिए हमें अपनी आँखें इसी प्रकार उठानी चाहिए, कि हम व्यर्थ में आनन्द करने के बदले काँपना सीखें। जब तुलना मनुष्यों के बीच की जाती है, तब यह सचमुच सरल है कि हर कोई अपने किसी ऐसे गुण पर इतराए जिसे दूसरों को तुच्छ नहीं समझना चाहिए; परन्तु जब हम परमेश्वर तक पहुँचते हैं, तब वह भरोसा तुरन्त गिरकर मिट जाता है। परमेश्वर के सम्बन्ध में आत्मा की दशा दृश्य आकाशमण्डल के सम्बन्ध में शरीर की दशा से बहुत मिलती-जुलती है। शारीरिक आँख, जब तक पास की वस्तुओं को देखने में लगी रहती है, अपनी पैनी दृष्टि से प्रसन्न रहती है; परन्तु जब वह सूर्य की ओर उठाई जाती है, तब उसके तेज से चौंधियाकर और अभिभूत होकर वह अपनी निर्बलता का उतना ही कायल हो जाती है जितना वह पहले छोटी वस्तुओं को देखने की अपनी शक्ति का था। इसलिए, कि हम व्यर्थ भरोसे से अपने आप को धोखा न दें, स्मरण रखें कि यद्यपि हम अपने आप को दूसरे मनुष्यों के बराबर या उनसे श्रेष्ठ समझें, तो भी परमेश्वर के लिए यह कुछ नहीं, जिसके न्याय से निर्णय होना है। परन्तु यदि हमारा अहंकार इन बातों से नहीं झुकता, तो वह हमें वैसा ही उत्तर देगा जैसा उसने फरीसियों को दिया था, “तुम वे हो जो मनुष्यों के सामने अपने आप को धर्मी ठहराते हो; परन्तु परमेश्वर तुम्हारे हृदयों को जानता है: क्योंकि जो वस्तु मनुष्यों की दृष्टि में महान है, वह परमेश्वर के निकट घृणित है” (लूका 16:15)। अब जाओ और मनुष्यों के बीच अपनी धार्मिकता की डींग मारो, जबकि स्वर्ग में परमेश्वर उससे घृणा करता है। परन्तु परमेश्वर के सेवकों की, जो उसके आत्मा से सच्ची शिक्षा पाए हुए हैं, क्या भावनाएँ हैं? “अपने दास का न्याय न कर; क्योंकि तेरे सामने कोई जीवित मनुष्य धर्मी नहीं ठहर सकता” (भजन संहिता 143:2)। एक और, यद्यपि कुछ भिन्न अर्थ में, कहता है, “मनुष्य परमेश्वर के सामने कैसे धर्मी ठहरे? यदि वह उससे वाद-विवाद करना चाहे, तो हज़ार बातों में से एक का भी उत्तर न दे सकेगा” (अय्यूब 9:2, 3)। यहाँ हमें स्पष्ट बताया गया है कि परमेश्वर की धार्मिकता क्या है, अर्थात् ऐसी धार्मिकता जिसे कोई मानवीय काम सन्तुष्ट नहीं कर सकता, जो हम पर हज़ार पापों का दोष लगाती है, जबकि एक भी पाप क्षम्य नहीं ठहराया जा सकता। इस धार्मिकता का सही बोध पौलुस को था, जो परमेश्वर का चुना हुआ पात्र था, जब उसने घोषित किया, “मेरा विवेक मुझे दोषी नहीं ठहराता, परन्तु इससे मैं धर्मी नहीं ठहरता” (1 कुरिन्थियों 4:4)।

3. ऐसे उदाहरण केवल पवित्र पुस्तक में ही नहीं हैं; सब भक्त लेखक दिखाते हैं कि उनका भी यही मत था। इस प्रकार अगस्तीन कहता है, “नाशमान शरीर के इस बोझ और इस जीवन की दुर्बलताओं के नीचे कराहनेवाले सब भक्तों की एकमात्र आशा यही है कि हमारा एक मध्यस्थ है, यीशु मसीह धर्मी, और वह हमारे पापों के लिए बिनती करता है” (August. ad Bonif. lib. 3, c. 5)। हम क्या सुनते हैं? यदि यही उनकी एकमात्र आशा है, तो कर्मों पर उनका भरोसा कहाँ है? जब वह कहता है एकमात्र, तब वह कोई और नहीं छोड़ता। बर्नार्ड कहता है, “और वास्तव में निर्बलों को दृढ़ सुरक्षा और निश्चिन्त विश्राम कहाँ मिले, सिवाय उद्धारकर्ता के घावों में? इसलिए जितना वह बचाने में सामर्थी है, उतनी ही दृढ़ता से उसे थामे रहो। संसार भृकुटि चढ़ाता है, देह दबाती है, शैतान फन्दे बिछाता है: मैं नहीं गिरता, क्योंकि मैं एक दृढ़ चट्टान पर स्थित हूँ। मैं ने घोर पाप किया है: विवेक व्याकुल है, परन्तु वह दब नहीं जाएगा, क्योंकि मैं प्रभु के घावों को स्मरण करूँगा।” वह आगे निष्कर्ष निकालता है, “इसलिए मेरा पुण्य प्रभु की करुणा है; स्पष्ट है कि मैं पुण्य से रहित नहीं हूँ जब तक वह करुणा से रहित नहीं। परन्तु यदि प्रभु की दया बहुत है, तो मेरे पुण्य भी उतने ही बहुत हैं। क्या मैं अपनी धार्मिकता का गुणगान करूँ? हे प्रभु, मैं केवल तेरी ही धार्मिकता का उल्लेख करूँगा। वह धार्मिकता मेरी भी है, क्योंकि परमेश्वर ने उसे मेरी बनाया है” (Bernard, Serm. 61, in Cantic)। फिर एक और अंश में, “मनुष्य का सारा पुण्य यही है कि वह अपनी सारी आशा उस पर रखे जो सारे मनुष्य को सुरक्षित करता है” (in Psal. Qui Habitat. Serm. 15)। इसी प्रकार, शान्ति को अपने लिए रखकर वह महिमा परमेश्वर के लिए छोड़ देता है: “तेरी महिमा अक्षुण्ण रहे: मेरे लिए भला है यदि मुझे शान्ति मिले; मैं घमण्ड को सर्वथा त्यागता हूँ, कहीं ऐसा न हो कि जो मेरा नहीं है उसे हड़पने से मैं वह भी खो दूँ जो मुझे दिया जा रहा है” (Serm. 13, in Cantic)। वह एक और स्थान पर और भी स्पष्ट कहता है: “कलीसिया पुण्यों के विषय में क्यों चिन्तित है? परमेश्वर जान-बूझकर उसे घमण्ड करने का और भी दृढ़ और सुरक्षित आधार देता है। यह पूछने का कोई कारण नहीं कि हम किन पुण्यों से आशीषों की आशा करें, विशेषकर जब तुम भविष्यद्वक्ता में सुनते हो, ‘प्रभु यहोवा यों कहता है, हे इस्राएल के घराने, मैं यह तुम्हारे निमित्त नहीं, परन्तु अपने पवित्र नाम के निमित्त करता हूँ,’ (यहेजकेल 36:22, 32)। पुण्य के लिए यही जानना पर्याप्त है कि पुण्य पर्याप्त नहीं हैं; परन्तु जैसे पुण्य के लिए यह पर्याप्त है कि वह पुण्य पर भरोसा न करे, वैसे ही दण्ड के लिए पुण्यों का न होना ही पर्याप्त है” (Bernard, Serm. 68)। भले कामों के लिए पुण्य शब्द का मुक्त प्रयोग रीति के कारण क्षम्य मानना चाहिए। बर्नार्ड का उद्देश्य उन कपटियों को चौंकाना था जिन्होंने परमेश्वर के अनुग्रह को स्वच्छन्दता में बदल दिया था, जैसा कि वह थोड़ी ही देर बाद समझाता है: “धन्य है वह कलीसिया जिसे न बिना घमण्ड के पुण्य की कमी है, न बिना पुण्य के घमण्ड की। उसके पास घमण्ड करने का आधार है, परन्तु पुण्य नहीं। उसके पास पुण्य है, घमण्ड करने के नहीं, योग्य ठहरने के पुण्य। क्या घमण्ड का न होना स्वयं एक पुण्य नहीं है? इसलिए वह जिसके लिए प्रभु की अनेक दयाएँ घमण्ड करने के भरपूर आधार जुटाती हैं, इस बात में और भी निश्चिन्त होकर घमण्ड करता है कि वह घमण्ड नहीं करता” (Bernard, Serm. 68)।

4. वास्तव में ऐसा ही है। जागे हुए विवेक, जब उन्हें परमेश्वर से काम पड़ता है, यही एकमात्र शरण पाते हैं जिसमें वे सुरक्षित साँस ले सकें। क्योंकि यदि रात में सबसे तेज चमकनेवाले तारे सूर्य के प्रकट होने पर अपनी चमक खो देते हैं, तो हम क्या सोचें कि जब मनुष्य की उच्चतम शुद्धता की तुलना परमेश्वर की शुद्धता से की जाएगी तब क्या होगा? क्योंकि जाँच अत्यन्त कठोर होगी, जो हृदय के गुप्ततम विचारों तक भेदेगी। जैसा पौलुस कहता है, वह “अन्धकार की गुप्त बातों को ज्योति में लाएगा और हृदय की मन्त्रणाओं को प्रगट करेगा” (1 कुरिन्थियों 4:5); वह अनिच्छुक और छल करनेवाले विवेक को सब कुछ सामने लाने के लिए विवश करेगा, यहाँ तक कि वे बातें भी जो अब हमारी स्मृति से निकल चुकी हैं। शैतान, उन सब अधर्मों से अवगत जिन्हें उसने हमसे करवाया, अभियोक्ता के रूप में प्रकट होगा; भले कामों का बाहरी दिखावा, जो अब एकमात्र विचारणीय बात है, तब किसी काम का न होगा; माँगी जानेवाली एकमात्र बात इच्छा का सच्चा अभिप्राय होगी। इसलिए कपट, न केवल वह जिसमें मनुष्य, परमेश्वर के सामने जानबूझकर दोषी होते हुए भी, मनुष्य के सामने दिखावा करता है, परन्तु वह भी जिसमें हर कोई परमेश्वर के सामने अपने आप को धोखा देता है (हम अपने आप को बहलाने और चापलूसी करने में इतने प्रवृत्त हैं), अब चाहे वह घमण्ड और अहंकार से कितना ही फूला हो, लज्जित होकर गिर पड़ेगा। जो लोग इस दृश्य की ओर अपने विचार नहीं मोड़ते, वे क्षण भर के लिए शान्ति और सन्तोष से अपने लिए एक धार्मिकता खड़ी कर सकते हैं; परन्तु परमेश्वर का न्याय उसे तुरन्त उलट देगा, जैसे स्वप्न में इकट्ठा किया गया बड़ा धन जागते ही लुप्त हो जाता है। जो लोग, मानो परमेश्वर की उपस्थिति में, धार्मिकता के सच्चे मापदण्ड की गम्भीरता से खोज करते हैं, वे निश्चय पाएँगे कि मनुष्यों के सब काम, यदि अपने ही मूल्य से आँके जाएँ, तो घृणा और अशुद्धता के सिवा कुछ नहीं हैं; कि जिसे साधारणतः न्याय समझा जाता है वह परमेश्वर के निकट केवल अधर्म है; जिसे खराई समझा जाता है वह अशुद्धता है; जिसे महिमा समझा जाता है वह अपमान है।

5. आइए, हम ईश्वरीय सिद्धता के इस चिन्तन से उतरकर, बिना चापलूसी या अन्धे आत्म-प्रेम के, अपने भीतर देखने से मुँह न मोड़ें। यह आश्चर्य की बात नहीं कि हम इस विषय में इतने धोखे में हैं, क्योंकि हम में से कोई उस घातक आत्म-तुष्टि से नहीं बच सकता जो, जैसा पवित्रशास्त्र घोषित करता है, स्वभाव से सब में बसी हुई है: सुलैमान कहता है, “मनुष्य का हर एक चालचलन उसकी अपनी दृष्टि में ठीक होता है” (नीतिवचन 21:2)। और फिर, “मनुष्य के सब चालचलन अपनी दृष्टि में पवित्र ठहरते हैं” (नीतिवचन 16:2)। तो क्या? क्या यह भ्रम उसे निर्दोष ठहराता है? कदापि नहीं, जैसा सुलैमान तुरन्त जोड़ता है, “यहोवा मन को जाँचता है”; अर्थात् जब मनुष्य धार्मिकता का बाहरी मुखौटा पहनकर अपनी चापलूसी करता है, तब प्रभु हृदय की छिपी हुई अशुद्धता को अपनी तराज़ू में तौलता है। इसलिए, यह देखते हुए कि ऐसी चापलूसी से कुछ प्राप्त नहीं होता, हम अपने ही विनाश के लिए स्वेच्छा से अपने आप को धोखा न दें। अपने आप को ठीक से जाँचने के लिए हमारे विवेक को परमेश्वर के न्यायासन पर बुलाया जाना चाहिए। दुष्टता के उन गुप्त कोनों को प्रकट करने के लिए जो अन्यथा बहुत गहरे छिपे रहते हैं, उसकी ज्योति आवश्यक है। तभी हम स्पष्ट देखेंगे कि हमारे कर्मों का मूल्य क्या है; कि मनुष्य, परमेश्वर के सामने धर्मी होना तो दूर, केवल सड़न और कीड़ा है, घृणित और व्यर्थ है, जो “अधर्म को पानी के समान पीता है।” क्योंकि “अशुद्ध वस्तु से शुद्ध वस्तु कौन निकाल सकता है? कोई नहीं” (अय्यूब 14:5)। तब हम उस बात की सच्चाई का अनुभव करेंगे जो अय्यूब ने अपने विषय में कही: “यदि मैं अपने आप को निर्दोष ठहराऊँ, तो मेरा ही मुँह मुझे दोषी ठहराएगा; यदि मैं कहूँ कि मैं सिद्ध हूँ, तो वह मुझे कुटिल ठहराएगा” (अय्यूब 9:20)। और जो शिकायत भविष्यद्वक्ता ने इस्राएल के विषय में की वह केवल एक युग पर लागू नहीं होती। यह हर युग के विषय में सत्य है कि “हम सब भेड़ों के समान भटक गए थे; हम में से हर एक अपने अपने मार्ग की ओर फिरा” (यशायाह 53:6)। वास्तव में, वह वहाँ उन सब को सम्मिलित करता है जिन तक छुटकारे का दान पहुँचना था। और जाँच की कठोरता तब तक जारी रहनी चाहिए जब तक वह हमें पूरी तरह भयभीत न कर दे, और इस प्रकार हमें मसीह का अनुग्रह पाने के लिए तैयार न कर दे। क्योंकि वह धोखे में है जो सोचता है कि वह उसका आनन्द ले सकता है, जब तक उसने मन की सारी ऊँचाई को त्याग न दिया हो। एक सुप्रसिद्ध घोषणा है, “परमेश्वर अभिमानियों का विरोध करता है, परन्तु दीनों पर अनुग्रह करता है” (1 पतरस 5:5)।

6. परन्तु यदि हम अपनी पूर्ण दरिद्रता और अभाव के द्वारा परमेश्वर की दया के लिए मार्ग न बनाएँ, तो हमें दीन करने का और क्या उपाय है? क्योंकि जब तक हम सोचते हैं कि हममें कोई भलाई शेष है, तब तक मैं उसे दीनता नहीं कहता। जिन लोगों ने इन दो बातों को जोड़ दिया है, कि परमेश्वर के सामने अपने विषय में दीनता से सोचना और फिर भी अपनी धार्मिकता को कुछ मूल्य देना, उन्होंने अब तक एक घातक कपट सिखाया है। क्योंकि यदि हम परमेश्वर के सामने अपनी अनुभूति के विपरीत अंगीकार करें, तो हम उससे दुष्टता से झूठ बोलते हैं; परन्तु हम जैसा चाहिए वैसा अनुभव तब तक नहीं कर सकते जब तक हम न देखें कि घमण्ड के आधार जैसी हर बात पूरी तरह कुचल दी गई है। इसलिए जब तुम भविष्यद्वक्ताओं से सुनते हो “तू दुःखी लोगों को बचाएगा; परन्तु घमण्डियों की आँखें नीची करेगा” (भजन संहिता 18:27), तो पहले यह विचार करो कि जब तक सारा अभिमान त्यागकर सच्ची दीनता को न अपनाया जाए, तब तक उद्धार तक पहुँचने का कोई मार्ग नहीं; दूसरे, कि वह दीनता किसी प्रकार की संयम-वृत्ति नहीं है जिसमें तुम परमेश्वर के सामने अपने अधिकार की कोई बात छोड़ देते हो (इस प्रकार मनुष्य एक-दूसरे के सम्बन्ध में तब दीन कहे जाते हैं जब वे अपने आप को घमण्ड से नहीं चलाते और दूसरों का अपमान नहीं करते, चाहे उनमें अब भी अपनी श्रेष्ठता का कुछ बोध बना रहे), परन्तु वह अपनी घटी और दुर्दशा के गम्भीर बोध से दबे हुए मन की निष्कपट अधीनता है। परमेश्वर के वचन में सब जगह यही वर्णन मिलता है। जब सपन्याह में प्रभु यों कहता है, “मैं तेरे बीच से तेरे घमण्ड पर प्रसन्न होनेवालों को दूर करूँगा, और तू मेरे पवित्र पर्वत पर फिर कभी घमण्ड न करेगा। मैं तेरे बीच में दीन और दरिद्र लोगों को बचा रखूँगा, और वे यहोवा के नाम पर भरोसा रखेंगे” (सपन्याह 3:11, 12), तो क्या वह स्पष्ट नहीं दिखाता कि दीन कौन हैं—अर्थात् वे जो अपनी निर्धनता के बोध से पीड़ित पड़े हैं? इसके विपरीत वह घमण्डियों का वर्णन आनन्द मनानेवालों (exultantes) के रूप में करता है, क्योंकि समृद्धि में मनुष्य अपना हर्ष इसी प्रकार प्रकट किया करते हैं। जिन दीनों को वह बचाना चाहता है, उनके लिए वह प्रभु में आशा के सिवा कुछ नहीं छोड़ता। इसी प्रकार यशायाह में भी, “मैं उसी की ओर दृष्टि करूँगा जो दीन और खेदित मन का हो, और मेरे वचन से थरथराता हो” (यशायाह 66:2)। फिर, “क्योंकि जो महान और उत्तम, और सनातन में वास करता है, जिसका नाम पवित्र है, वह यों कहता है: मैं ऊँचे और पवित्र स्थान में वास करता हूँ, और उसके संग भी रहता हूँ जो खेदित और नम्र हृदय का हो, कि नम्र लोगों के हृदय और खेदित लोगों के मन को हर्षित करूँ” (यशायाह 57:15)। खेद (contrition) शब्द से, जो तुम इतनी बार सुनते हो, एक घायल हृदय समझो, जो मनुष्य को भूमि तक दीन करके उसे उठने नहीं देता। यदि तुम परमेश्वर की घोषणा के अनुसार दीनों के साथ ऊँचे किए जाना चाहते हो, तो तुम्हारे हृदय को ऐसे ही खेद से घायल होना चाहिए। यदि ऐसा नहीं है, तो परमेश्वर के सामर्थी हाथ के द्वारा तुम लज्जा और अपमान के साथ दीन किए जाओगे।

7. हमारे दिव्य गुरु ने केवल शब्दों तक अपने को सीमित न रखकर, एक दृष्टान्त के द्वारा, मानो चित्र में, सच्ची दीनता का स्वरूप हमारे सामने रखा है। वह एक चुंगी लेनेवाले को प्रस्तुत करता है, जो दूर खड़ा रहा, और स्वर्ग की ओर आँख उठाने का भी साहस न करके छाती पीटता, ऊँचे स्वर में विलाप करता, और कहता है, “हे परमेश्वर, मुझ पापी पर दया कर” (लूका 18:13)। हम यह न समझें कि जब वह पास आने या स्वर्ग की ओर आँख उठाने का साहस नहीं करता, परन्तु छाती पीटकर अपने आप को पापी मानता है, तब वह दिखावटी नम्रता के चिह्न दे रहा है; हम जानें कि ये उसकी आन्तरिक अनुभूति के प्रमाण हैं। उसके साथ हमारा प्रभु उस फरीसी की तुलना करता है, जो परमेश्वर को धन्यवाद देता है, “मैं और मनुष्यों के समान, अन्धेर करनेवाला, अन्यायी, व्यभिचारी नहीं हूँ, और न इस चुंगी लेनेवाले के समान हूँ। मैं सप्ताह में दो बार उपवास करता हूँ, मैं अपनी सब कमाई का दसवाँ अंश देता हूँ।” इस सार्वजनिक अंगीकार में वह मानता है कि जो धार्मिकता उसके पास है वह परमेश्वर का दान है; परन्तु अपने धर्मी होने के भरोसे के कारण वह परमेश्वर की उपस्थिति से अस्वीकृत और घृणित होकर चला जाता है। अपना अधर्म स्वीकार करनेवाला चुंगी लेनेवाला धर्मी ठहराया जाता है। इससे हम देख सकते हैं कि हमारी दीनता प्रभु की दृष्टि में कितनी मूल्यवान है: हमारा हृदय उसकी दया को तब तक ग्रहण नहीं कर सकता जब तक वह अपने मूल्य की सब धारणा से पूरी तरह खाली न हो जाए। जब ऐसी धारणा रखी जाती है, तब दया का द्वार बन्द हो जाता है। ताकि इस विषय में कोई सन्देह न रहे, मसीह को उसके पिता ने जिस कार्य के लिए जगत में भेजा था वह यह था, “नम्र लोगों को सुसमाचार सुनाऊँ,” “खेदित मनवालों को चंगा करूँ, बन्दियों के लिए स्वतन्त्रता और कैदियों के लिए छुटकारे का प्रचार करूँ; प्रभु के प्रसन्न रहने के वर्ष और हमारे परमेश्वर के बदला लेने के दिन का प्रचार करूँ; सब शोक करनेवालों को शान्ति दूँ; सिय्योन के शोक करनेवालों के लिए राख के बदले सुन्दर पगड़ी, विलाप के बदले हर्ष का तेल, और उदासी की आत्मा के बदले स्तुति का ओढ़ना दूँ” (यशायाह 61:1-3)। उस कार्य की पूर्ति में, वह अपनी उदारता में सहभागी होने के लिए केवल “थके और बोझ से दबे हुए” लोगों को ही बुलाता है। एक और अंश में वह कहता है, “मैं धर्मियों को नहीं, परन्तु पापियों को मन फिराने के लिये बुलाने आया हूँ” (मत्ती 11:28; 9:13)।

8. इसलिए यदि हम मसीह की बुलाहट के लिए मार्ग बनाना चाहते हैं, तो हमें सब अहंकार और निश्चिन्तता को अपने से दूर करना होगा। पहला अपनी धार्मिकता की मूर्खतापूर्ण धारणा से उत्पन्न होता है, जब मनुष्य सोचता है कि उसके भीतर कुछ ऐसा है जो उचित रूप से उसे परमेश्वर के निकट ग्रहणयोग्य ठहराता है; दूसरा कर्मों पर किसी भरोसे के बिना भी हो सकता है।420 क्योंकि बहुत-से पापी, पाप के सुखों में मतवाले होकर, परमेश्वर के न्याय का विचार ही नहीं करते। मानो किसी जड़ता से स्तब्ध पड़े हुए, वे प्रस्तावित दया की अभिलाषा नहीं करते। इस प्रकार की सुस्ती को झटक देना उतना ही आवश्यक है जितना अपने ऊपर हर प्रकार के भरोसे को, ताकि हम बिना बोझ के मसीह के पास दौड़ें, और भूखे और खाली होते हुए उसकी आशीषों से भरे जाएँ। हम उस पर पर्याप्त भरोसा तब तक कभी नहीं रखेंगे जब तक हम अपने ऊपर पूरी तरह अविश्वासी न हों; हम उसमें तब तक साहस नहीं पाएँगे जब तक हम पहले अपने विषय में निराश न हो जाएँ; हम उसमें पूर्ण शान्ति तब तक कभी नहीं पाएँगे जब तक हमारे पास अपने में कोई भी शान्ति रखना बन्द न हो जाए। जब हमने सब आत्म-भरोसा पूरी तरह त्याग दिया हो, और केवल उसकी भलाई की निश्चयता पर भरोसा रखें, तब हम परमेश्वर के अनुग्रह को ग्रहण करने और पाने के योग्य होते हैं। जैसा अगस्तीन कहता है, “जब हम अपने पुण्यों को भूलकर मसीह के दानों को गले लगाते हैं, क्योंकि यदि वह हममें पुण्य खोजता तो हम उसके दान न पाते” (August. de Verb. Apost. 8)। इससे बर्नार्ड की सुन्दर सहमति है, जो उन अभिमानियों की, जो अपने पुण्यों पर थोड़ा भी भरोसा रखते हैं, तुलना उन विश्वासघाती सेवकों से करता है जो केवल उनके द्वारा होकर गुज़रनेवाली कृपा का श्रेय दुष्टता से अपने ऊपर ले लेते हैं, जैसे कोई दीवार उस किरण को उत्पन्न करने का घमण्ड करे जो उसे खिड़की से मिलती है (Bernard, Serm. 13, in Cant)। यहाँ और न रुकते हुए, हम यह संक्षिप्त परन्तु निश्चित और सामान्य नियम स्थापित करें कि ईश्वरीय दया के फल काटने के लिए वही तैयार है जिसने अपने आप को पूरी तरह खाली कर दिया है, मैं यह नहीं कहता कि धार्मिकता से (उसके पास वह है ही नहीं), परन्तु धार्मिकता के व्यर्थ और डींग भरे दिखावे से; क्योंकि जिस मात्रा में कोई मनुष्य अपने आप में विश्राम करता है, उसी मात्रा में वह परमेश्वर की उदारता में बाधा डालता है।

420 फ्रेंच में: “Par arrogance j’enten l’orgueil qui s’engendre d’une fole persuasion de justice, quand l’homme pense avoir quelque chose, dont il merite d’estre agreable à Dieu; par presomption j’enten une nonchalance charnelle, qui peut estre sans aucune fiance des œuvres;”—अहंकार से मेरा अर्थ वह घमण्ड है जो धार्मिकता की एक मूर्खतापूर्ण धारणा से उत्पन्न होता है, जब मनुष्य सोचता है कि उसके पास कुछ ऐसा है जिसके कारण वह परमेश्वर को ग्रहणयोग्य ठहरता है। निश्चिन्तता से मैं एक शारीरिक उदासीनता समझता हूँ, जो कर्मों पर किसी भरोसे के बिना भी हो सकती है।

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