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बपतिस्मा के विषय में
अध्याय 15।
बपतिस्मा के विषय में।
इस अध्याय के दो भाग हैं,—I. बपतिस्मा के दो उद्देश्यों पर विवेचन, खण्ड 1-13। II. दूसरे भाग को चार शीर्षकों में समेटा जा सकता है। बपतिस्मा के उपयोग के विषय में, खण्ड 14, 15। सेवक की योग्यता या अयोग्यता के विषय में, खण्ड 16-18। उन बिगाड़ों के विषय में जिनसे यह संस्कार अशुद्ध किया गया, खण्ड 19। प्रशासन में किसे ध्यान में रखा जाता है, खण्ड 20-22।
खण्ड।
1. बपतिस्मा की परिभाषा। उसका प्रमुख उद्देश्य। यह तीन बातों में निहित है। 1. पापों की क्षमा की गवाही देना।
2. पवित्रशास्त्र के वे अंश जो पापों की क्षमा को प्रमाणित करते हैं।
3. क्षमा केवल बीते पापों की ही नहीं, वरन् आगे के पापों की भी है। इससे पाप करने की छूट को कोई प्रोत्साहन नहीं मिलता।
4. उन लोगों का खण्डन जो क्षमा को बपतिस्मा और पश्चाताप के बीच बाँटते हैं।
5. बपतिस्मा में दूसरी बात—अर्थात् यह सिखाना कि हम शरीर को मारने और नए जीवन के लिए मसीह में कलम लगाए गए हैं।
6. बपतिस्मा में तीसरी बात—अर्थात् यह सिखाना कि हम मसीह के साथ इस प्रकार एक किए गए हैं कि उसकी सब आशीषों के भागी हों। दूसरी और तीसरी बातें यूहन्ना और प्रेरितों, दोनों के बपतिस्मा में स्पष्ट दिखाई देती हैं।
7. यूहन्ना और प्रेरितों के बपतिस्मा की एकता।
8. इसके विरुद्ध एक आपत्ति का खण्डन।
9. बपतिस्मा की आशीषें इस्राएलियों को लाल समुद्र के पार जाने और बादल के खम्भे के द्वारा पूर्वचित्रित की गईं।
10. उन लोगों की आपत्ति जो मानते हैं कि बपतिस्मा के बाद किसी प्रकार का सिद्ध नवीनीकरण होता है। मूल भ्रष्टता बपतिस्मा के बाद भी बनी रहती है। शिशुओं में उसका अस्तित्व। बपतिस्मा के बाद चुने हुए लोग इस जीवन में केवल आरोपण के द्वारा ही धर्मी हैं।
11. मूल भ्रष्टता भक्तों के लिए उनके जीवन भर कष्टदायक रहती है। इस कारण वे पाप की छूट नहीं खोजते। वे उलटे प्रभु के मार्गों में अधिक सावधानी और सुरक्षा से चलते हैं।
12. भ्रष्टता से उत्पन्न कष्ट, जैसा प्रेरित पौलुस के उदाहरण और गवाही से दिखाया गया है।
13. बपतिस्मा का एक और उद्देश्य मनुष्यों के सामने हमारे अंगीकार के रूप में काम आना है।
14. अध्याय का दूसरा भाग। बपतिस्मा हमारे विश्वास की पुष्टि के रूप में।
15. इसका स्पष्टीकरण कुरनेलियुस और पौलुस के उदाहरणों से। विश्वास के अंगीकार के रूप में बपतिस्मा के उपयोग के विषय में।
ऊपर बताई गई परिभाषाओं और उनसे सूचित अर्थ को कैल्विन दृढ़ता से अस्वीकार करते हैं। संस्कारों में अनुग्रह को आत्मा में उत्पन्न करने की कोई अन्तर्निहित शक्ति नहीं है, और न वे उस मानवीय पुण्य के किसी मिश्रण से प्रभावकारी बनाए जाते हैं जो पापी मनुष्यों द्वारा उनके पास लाया जाता है। 621 फ्रेंच में यह जोड़ा गया है, “J’appel le acte passif, pourceque Dieu fait le tout, et seulement nous recevons.”—मैं इस क्रिया को निष्क्रिय कहता हूँ, क्योंकि परमेश्वर ही सब कुछ करता है, और हम केवल ग्रहण करते हैं।
16. बपतिस्मा सेवक की योग्यता या अयोग्यता से प्रभावित नहीं होता। इसलिए जिनका बपतिस्मा पोप-तन्त्र के अधीन हुआ, उन्हें फिर बपतिस्मा देने की कोई आवश्यकता नहीं।
17. इस तर्क में कुछ बल नहीं कि इस प्रकार बपतिस्मा पाए लोग कई वर्ष तक अन्धे और अविश्वासी बने रहे। परमेश्वर की प्रतिज्ञा अटल बनी रहती है। परमेश्वर यहूदियों को पश्चाताप के लिए बुलाते समय उन्हें फिर से खतना कराने की आज्ञा नहीं देता।
18. यह कहने का कोई आधार नहीं कि पौलुस ने यूहन्ना के कुछ चेलों को फिर बपतिस्मा दिया। यूहन्ना का बपतिस्मा। मसीह के नाम में बपतिस्मा लेने का क्या अर्थ है।
19. बपतिस्मा में घुस आए बिगाड़। शुद्ध मसीही बपतिस्मा का स्वरूप। डुबकी या छिड़काव को स्वतंत्र छोड़ देना चाहिए।
20. बपतिस्मा देने का अधिकार किसका है। निजी व्यक्तियों या स्त्रियों का नहीं, वरन् कलीसिया के सेवकों का। निजी व्यक्तियों और स्त्रियों के बपतिस्मा का उद्गम। इसके पक्ष में एक तर्क का खण्डन।
21. इसे टर्टुलियन और एपिफ़ानियस ने भी निरस्त किया है।
22. सिप्पोरा के उदाहरण पर आधारित आपत्ति। उत्तर। बपतिस्मा से पहले मरनेवाले बच्चे स्वर्ग से बाहर नहीं रखे जाते, बशर्ते उसका न होना लापरवाही या तिरस्कार के कारण न हुआ हो।
1. बपतिस्मा वह आरम्भिक चिह्न है जिसके द्वारा हम कलीसिया की सहभागिता में प्रवेश पाते हैं, कि मसीह में कलम लगाए जाकर हम परमेश्वर की सन्तान गिने जाएँ। फिर, जिस उद्देश्य से परमेश्वर ने इसे दिया है (जिसे मैं सब रहस्यों के लिए एक समान बता चुका हूँ), वह पहले तो यह है कि यह उस पर हमारे विश्वास के काम आए; और दूसरे यह कि मनुष्यों के बीच अंगीकार का काम दे। हम दोनों संस्थाओं का स्वरूप क्रम से समझाएँगे। बपतिस्मा हमारे विश्वास को तीन बातें देता है, जिन पर अलग-अलग विचार करना आवश्यक है। इसलिए पहला उद्देश्य, जिसके लिए प्रभु ने इसे ठहराया है, यह है कि यह हमारी शुद्धि का चिह्न और प्रमाण हो; या (अपना आशय और भली-भाँति समझाने के लिए कहूँ तो) यह एक मुहरबन्द दस्तावेज़ के समान है जिसके द्वारा वह हमें निश्चय दिलाता है कि हमारे सब पाप ऐसे मिटा दिए, ढाँप दिए और धो डाले गए हैं कि वे कभी उसकी दृष्टि में नहीं आएँगे, कभी उनकी चर्चा नहीं होगी, कभी वे गिने नहीं जाएँगे। क्योंकि उसकी इच्छा है कि जितने विश्वास करें, वे पापों की क्षमा के लिए बपतिस्मा लें। इसलिए जिन्होंने यह समझा है कि बपतिस्मा और कुछ नहीं, केवल वह चिह्न और छाप है जिससे हम मनुष्यों के सामने अपने धर्म का अंगीकार करते हैं, जैसे सैनिक अपने सेनापति के चिह्न धारण करके अपने पक्ष की गवाही देते हैं, उन्होंने इस पर ध्यान नहीं दिया कि बपतिस्मा में मुख्य बात क्या थी; और वह यह है कि हमें इसे उस प्रतिज्ञा के साथ ग्रहण करना है, “जो विश्वास करे और बपतिस्मा ले उसी का उद्धार होगा” (मरकुस 16:16)।
2. इसी अर्थ में पौलुस का यह कथन समझना चाहिए कि “मसीह ने कलीसिया से प्रेम करके अपने आप को उसके लिये दे दिया, कि उसको वचन के द्वारा जल के स्नान से शुद्ध करके पवित्र बनाए” (इफिसियों 5:25, 26); और फिर, “न कि धर्म के कामों के कारण जो हमने किए, पर अपनी दया के अनुसार उसने नए जन्म के स्नान और पवित्र आत्मा के हमें नया बनाने के द्वारा हमारा उद्धार किया” (तीतुस 3:5)। पतरस भी कहता है कि “बपतिस्मा भी, अब तुम्हारा उद्धार करता है” (1 पतरस 3:21)। क्योंकि उसका आशय यह जताना नहीं था कि हमारी धुलाई और हमारा उद्धार जल से पूरा होता है, या जल में अपने आप शुद्ध करने, नया जन्म देने और नया बनाने की शक्ति है; और न उसका यह अर्थ है कि वह उद्धार का कारण है, वरन् केवल यह कि इन दानों का ज्ञान और निश्चय इस संस्कार में अनुभव किया जाता है। यह बात शब्दों से ही स्पष्ट दिखाई देती है। क्योंकि पौलुस जीवन के वचन और जल के बपतिस्मा को एक साथ जोड़ता है, मानो उसने कहा हो कि सुसमाचार के द्वारा हमारी धुलाई और पवित्रीकरण का सन्देश सुनाया जाता है; बपतिस्मा के द्वारा इस सन्देश पर मुहर लगाई जाती है। और पतरस तुरन्त जोड़ता है कि वह बपतिस्मा “शरीर के मैल को दूर करने का नहीं, परन्तु परमेश्वर के सम्मुख एक शुद्ध विवेक का उत्तर है, जो विश्वास से उत्पन्न होता है।” वरन् बपतिस्मा जिस एकमात्र शुद्धि की प्रतिज्ञा करता है, वह मसीह के लहू के छिड़काव के द्वारा है, जिसे शुद्ध करने और धोने की समानता के कारण जल के द्वारा दर्शाया गया है। तो फिर कौन कह सकता है कि हम उस जल से शुद्ध किए जाते हैं जो निश्चय ही यह गवाही देता है कि मसीह का लहू हमारा सच्चा और एकमात्र स्नान है? इसलिए उन लोगों के भ्रम का खण्डन करने के लिए, जो सब कुछ जल की शक्ति को देते हैं, हमारे पास इससे अच्छा तर्क नहीं हो सकता जो हम बपतिस्मा के अर्थ से ही पाते हैं, जो हमें उस दृश्य तत्त्व से जो हमारी आँखों के सामने रखा जाता है, और अन्य सब साधनों से भी दूर ले जाकर हमारा मन केवल मसीह पर लगाता है।
3. यह भी न मान लेना चाहिए कि बपतिस्मा केवल बीते पापों के सम्बन्ध में दिया जाता है, मानो बपतिस्मा के बाद जिन नए पतनों में हम पड़ते हैं, उनके लिए हमें तथाकथित अन्य संस्कारों में प्रायश्चित के नए उपाय ढूँढ़ने पड़ें, जैसे बपतिस्मा की शक्ति पुरानी पड़ गई हो। प्राचीन काल में इसी भ्रम के कारण कुछ लोग तब तक बपतिस्मा लेने से इनकार करते थे जब तक उनका जीवन अत्यन्त संकट में न पड़ जाए और वे अन्तिम साँसें न ले रहे हों, कि इस प्रकार बीते सब पापों की क्षमा पा लें। इस उलटी सावधानी के विरुद्ध प्राचीन अध्यक्षों ने अपने लेखों में बार-बार कड़ी बातें कही हैं। हमें यह सोचना चाहिए कि हम चाहे जिस समय बपतिस्मा पाएँ, हम जीवन भर के लिए एक ही बार धोए और शुद्ध किए गए हैं। इसलिए जब-जब हम गिरें, तब-तब हमें अपने बपतिस्मा का स्मरण करना चाहिए, और इस प्रकार अपने मन को दृढ़ करना चाहिए, कि पापों की क्षमा के विषय में निश्चिन्त और सुरक्षित रहें। क्योंकि यद्यपि एक बार दिए जाने पर वह बीत गया-सा दिखता है, फिर भी बाद के पापों से वह मिट नहीं जाता। क्योंकि उसमें मसीह की पवित्रता हमें अर्पित की गई, वह सदा प्रभावी रहती है, और किसी दाग से नष्ट नहीं होती: वह हमारी सब मलिनताओं को पोंछती और धो डालती है। न ही इससे हमें आगे के लिए पाप करने की छूट मान लेनी चाहिए (इसमें ऐसे दुस्साहस का समर्थन करनेवाली कोई बात निश्चय ही नहीं है), परन्तु यह सिद्धान्त केवल उनके लिए है जो पाप कर बैठने पर अपने पापों के बोझ से दबे और पीड़ित होकर कराहते हैं, कि उनके पास अपने को सँभालने और सान्त्वना देने का साधन रहे, और वे निराशा में औंधे मुँह न जा गिरें। इसी प्रकार पौलुस कहता है कि मसीह बीते पापों की क्षमा के लिए हमारे निमित्त प्रायश्चित-बलि ठहराया गया (रोमियों 3:25)। इससे वह इनकार नहीं करता कि इसके द्वारा मृत्यु तक पापों की निरन्तर और स्थायी क्षमा मिलती है: वह केवल यह जताता है कि पिता ने इसे उन दीन पापियों के लिए ठहराया है जो विवेक की चुभन से घायल होकर वैद्य के लिए आहें भरते हैं। इन्हीं को परमेश्वर की दया दी जाती है। जो दण्ड से बचे रहने की आशा में पाप की छूट चाहते हैं, वे परमेश्वर के क्रोध और न्याय को ही भड़काते हैं।
4. मैं जानता हूँ कि यह आम धारणा है कि वह क्षमा, जो हमें अपने पहले नए जन्म में केवल बपतिस्मा से मिलती है, बपतिस्मा के बाद पश्चाताप और कुंजियों के द्वारा प्राप्त की जाती है (देखिए अध्याय 19, खण्ड 17)। परन्तु जो लोग यह कल्पना मानते हैं, वे इस बात पर विचार न करने के कारण भूल करते हैं कि कुंजियों की वह शक्ति, जिसकी वे बात करते हैं, बपतिस्मा पर इस प्रकार निर्भर है कि उसे किसी भी प्रकार उससे अलग नहीं किया जाना चाहिए। पापी को क्षमा कलीसिया की सेवकाई के द्वारा मिलती है; अर्थात् सुसमाचार के प्रचार के बिना नहीं। और यह प्रचार किस प्रकार का है? यह कि हम मसीह के लहू से अपने पापों से धोए गए हैं। और उस धुलाई का चिह्न और प्रमाण क्या है, यदि बपतिस्मा नहीं? तो हम देखते हैं कि वह क्षमा बपतिस्मा से ही सम्बन्ध रखती है। इस भूल का उद्गम पश्चाताप के उस कल्पित संस्कार में था, जिसका उल्लेख मैं पहले कर चुका हूँ। जो शेष है वह उचित स्थान पर कहा जाएगा। यदि वे मनुष्य, जो अपने मन की स्थूलता के कारण बाहरी बातों से अत्यधिक चिपके रहते हैं, यहाँ भी अपनी इस कमी को प्रकट कर बैठे हैं,—यदि वे परमेश्वर की शुद्ध संस्था से सन्तुष्ट न होकर अपने ही गढ़े हुए नए सहारे ले आए हैं, मानो बपतिस्मा स्वयं पश्चाताप का संस्कार न हो, तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं। परन्तु यदि पश्चाताप की सिफ़ारिश जीवन भर के लिए की जाती है, तो बपतिस्मा की शक्ति का विस्तार भी उतना ही होना चाहिए। इसलिए इसमें कोई सन्देह नहीं कि सब भक्त लोग अपने जीवन भर, जब-जब पापों के बोध से व्याकुल हों, अपने बपतिस्मा का स्मरण कर सकते हैं, कि उसके द्वारा वे अपने को उस एकमात्र और स्थायी धुलाई का निश्चय दिला सकें जो हमें मसीह के लहू में मिली है।
5. बपतिस्मा का एक और लाभ यह है कि वह हमें मसीह में हमारा शरीर को मारा जाना और उसमें नया जीवन दिखाता है। प्रेरित कहता है, “क्या तुम नहीं जानते कि हम जितनों ने मसीह यीशु का बपतिस्मा लिया, उसकी मृत्यु का बपतिस्मा लिया? सो उस मृत्यु का बपतिस्मा पाने से हम उसके साथ गाड़े गए, ताकि हम भी नए जीवन की सी चाल चलें” (रोमियों 6:3, 4)। इन शब्दों से वह हमें केवल मसीह के अनुकरण के लिए नहीं उभारता, मानो उसने कहा हो कि बपतिस्मा से हमें चेताया जाता है कि जैसे मसीह मरा, वैसे हम भी अपनी अभिलाषाओं के लिए मरें, और जैसे वह जी उठा, वैसे हम भी धार्मिकता के लिए जी उठें; वरन् वह इस बात को बहुत ऊँचे स्तर तक ले जाता है, कि मसीह ने बपतिस्मा के द्वारा हमें अपनी मृत्यु का भागी बनाया है और हमें उसमें कलम लगाया है। और जैसे डाली उस जड़ से, जिससे वह जुड़ी है, रस और पोषण पाती है, वैसे ही जो सच्चे विश्वास से बपतिस्मा लेते हैं, वे अपने शरीर के मारे जाने में मसीह की मृत्यु की प्रभावशीलता और आत्मा के द्वारा जिलाए जाने में उसके पुनरुत्थान की प्रभावशीलता का सचमुच अनुभव करते हैं। इसी पर वह अपनी यह उपदेश-बात आधारित करता है कि यदि हम मसीही हैं तो हमें पाप के लिए मरा हुआ और धार्मिकता के लिए जीवित होना चाहिए। वह दूसरी जगह यही तर्क देता है—अर्थात् यह कि बपतिस्मा के द्वारा मसीह में गाड़े जाने के बाद हमारा खतना होता है और हम पुराने मनुष्यत्व को उतार फेंकते हैं (कुलुस्सियों 2:12)। और इसी अर्थ में, उस अंश में जिसे हम पहले उद्धृत कर चुके हैं, वह इसे “नए जन्म का स्नान और पवित्र आत्मा का नया बनाना” (तीतुस 3:5) कहता है। हमें पहले तो पापों की मुफ़्त क्षमा और धार्मिकता के आरोपण की प्रतिज्ञा मिलती है; और दूसरे, पवित्र आत्मा के अनुग्रह की, कि वह हमें नए जीवन के लिए फिर से गढ़े।
6. बपतिस्मा से हमारे विश्वास को जो अन्तिम लाभ मिलता है, वह यह है कि वह हमें केवल यही निश्चय नहीं दिलाता कि हम मसीह की मृत्यु और जीवन में कलम लगाए गए हैं, वरन् यह भी कि हम स्वयं मसीह के साथ ऐसे एक किए गए हैं कि उसकी सब आशीषों के भागी हैं। क्योंकि उसने बपतिस्मा को अपनी ही देह में पवित्र और समर्पित किया, कि वह उसे हमारे साथ साझा रखे, उस एकता और सहभागिता के सबसे दृढ़ बन्धन के रूप में जिसे उसने हमारे साथ बाँधना स्वीकार किया; और इसी से पौलुस हमें परमेश्वर की सन्तान ठहराता है, इस बात से कि हमने बपतिस्मा में मसीह को पहन लिया (गलातियों 3:27)। इस प्रकार हम अपने बपतिस्मा की पूर्ति मसीह में देखते हैं, जिसे इसी कारण हम बपतिस्मा का उचित लक्ष्य कहते हैं। इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं कि प्रेरितों के विषय में कहा गया है कि उन्होंने मसीह के नाम में बपतिस्मा दिया, यद्यपि उन्हें पिता और आत्मा के नाम में भी बपतिस्मा देने की आज्ञा थी (प्रेरितों के काम 8:16; 19:5; मत्ती 28:19)। क्योंकि बपतिस्मा में जो सब ईश्वरीय दान दिखाए जाते हैं, वे अकेले मसीह में ही पाए जाते हैं। फिर भी जो मसीह में बपतिस्मा देता है, वह साथ ही पिता और आत्मा का नाम लिए बिना नहीं रह सकता। क्योंकि हम उसके लहू से इसीलिए शुद्ध किए जाते हैं कि हमारा कृपालु पिता, अपनी अतुल्य दया से हमें अपनी कृपा में ग्रहण करने की इच्छा करके, उसे मध्यस्थ ठहरा चुका है कि वह हमारा अपने साथ मेल करा दे। नया जन्म हमें केवल उसकी मृत्यु और पुनरुत्थान से मिलता है, जब उसके आत्मा से पवित्र किए जाकर हम एक नए और आत्मिक स्वभाव से भर दिए जाते हैं। इसलिए हम अपनी शुद्धि और नए जन्म का कारण पिता में, सामग्री पुत्र में, और परिणाम आत्मा में पाते और एक प्रकार से स्पष्ट देखते हैं। इसी प्रकार पहले यूहन्ना ने बपतिस्मा दिया, और इसी प्रकार बाद में प्रेरितों ने पापों की क्षमा के लिए पश्चाताप के बपतिस्मा से दिया, पश्चाताप शब्द से नया जन्म और पापों की क्षमा से धुलाई का अर्थ लेते हुए।
7. इससे यह बिलकुल निश्चित हो जाता है कि यूहन्ना की सेवकाई ठीक वही थी जो बाद में प्रेरितों को सौंपी गई। क्योंकि जिन हाथों से बपतिस्मा दिया जाता है, वे उसे भिन्न बपतिस्मा नहीं बना देते, वरन् शिक्षा की समानता सिद्ध करती है कि वह वही है। यूहन्ना और प्रेरित एक ही शिक्षा पर सहमत थे। दोनों ने पश्चाताप के लिए बपतिस्मा दिया, दोनों ने पापों की क्षमा के लिए, दोनों ने मसीह के नाम में, जिससे पश्चाताप और पापों की क्षमा आती है। यूहन्ना ने उसकी ओर संकेत करके कहा कि वह परमेश्वर का मेम्ना है जो जगत का पाप उठा ले जाता है (यूहन्ना 1:29), और इस प्रकार उसे पिता का ग्रहण किया हुआ बलिदान, धार्मिकता का प्रायश्चित, और उद्धार का कर्ता बताया। प्रेरित इस अंगीकार में और क्या जोड़ सकते थे? इसलिए कोई इस बात से उलझन में न पड़े कि प्राचीन लेखक एक को दूसरे से भिन्न दिखाने का परिश्रम करते हैं। उनके विचार हमारी दृष्टि में इतने मान्य न हों कि पवित्रशास्त्र की निश्चयता को डिगा दें। क्योंकि कौन क्राइसोस्टम की सुनेगा जो इनकार करता है कि यूहन्ना के बपतिस्मा में पापों की क्षमा सम्मिलित थी (Hom. in Mt. 1:14), न कि लूका की, जो इसके विपरीत कहता है कि यूहन्ना ने “पापों की क्षमा के लिए मन फिराव के बपतिस्मा का प्रचार किया”? (लूका 3:3)। न हम अगस्तीन की वह सूक्ष्मता स्वीकार कर सकते हैं कि यूहन्ना के बपतिस्मा से पाप आशा में क्षमा हुए, पर मसीह के बपतिस्मा से वास्तव में क्षमा होते हैं। क्योंकि जब सुसमाचार-लेखक स्पष्ट घोषणा करता है कि यूहन्ना ने अपने बपतिस्मा में पापों की क्षमा की प्रतिज्ञा की, तब जहाँ कोई विवशता नहीं है, वहाँ इस प्रशंसा में से क्यों कुछ घटाया जाए? यदि कोई पूछे कि परमेश्वर के वचन के अनुसार क्या भेद है, तो वह पाएगा कि इसके सिवा कुछ नहीं कि यूहन्ना ने उसके नाम में बपतिस्मा दिया जो आनेवाला था, और प्रेरितों ने उसके नाम में जो प्रकट हो चुका था (लूका 3:16; प्रेरितों के काम 19:4)।
8. यह तथ्य कि मसीह के पुनरुत्थान के बाद आत्मा के दान अधिक उदारता से उँडेले गए, बपतिस्मा के भिन्न होने को सिद्ध नहीं करता। क्योंकि प्रेरितों द्वारा तब दिया गया बपतिस्मा, जब वह अभी पृथ्वी पर था, उसका बपतिस्मा कहलाता था, फिर भी उस पर आत्मा यूहन्ना के बपतिस्मा की अपेक्षा अधिक प्रचुरता से नहीं उँडेला गया। वरन् स्वर्गारोहण के बाद भी सामरियों ने आत्मा को पहले के विश्वासियों के सामान्य माप से अधिक तब तक नहीं पाया जब तक पतरस और यूहन्ना उन पर हाथ रखने को नहीं भेजे गए (प्रेरितों के काम 8:14-17)। मेरा अनुमान है कि जिस बात ने प्राचीन लेखकों को भ्रम में डाला, और उनसे यह कहलवाया कि एक बपतिस्मा केवल दूसरे की तैयारी था, वह यह थी कि उन्होंने पढ़ा कि जिन्होंने यूहन्ना का बपतिस्मा लिया था, उन्हें पौलुस ने फिर बपतिस्मा दिया (प्रेरितों के काम 19:3-5; मत्ती 3:11)। वे इसमें कितनी बड़ी भूल पर हैं, यह अपने उचित स्थान पर अत्यन्त स्पष्टता से समझाया जाएगा। तो फिर यूहन्ना ने यह क्यों कहा कि वह जल से बपतिस्मा देता है, पर एक आनेवाला है जो पवित्र आत्मा और आग से बपतिस्मा देगा? इसे थोड़े शब्दों में समझाया जा सकता है। उसका आशय एक बपतिस्मा को दूसरे से भिन्न दिखाना नहीं था, वरन् उसने अपने व्यक्ति की तुलना मसीह के व्यक्ति से की, यह कहकर कि जहाँ वह जल का सेवक था, वहाँ मसीह पवित्र आत्मा का देनेवाला था, और इस सामर्थ्य को उस दिन एक दृश्य चमत्कार से प्रकट करेगा जब वह प्रेरितों पर पवित्र आत्मा को आग की जीभों के रूप में भेजेगा। प्रेरित इससे बड़ा कौन-सा गर्व कर सकते थे, और आज के बपतिस्मा देनेवाले भी इससे बड़ा क्या? क्योंकि वे केवल बाहरी चिह्न के सेवक हैं, जबकि मसीह भीतरी अनुग्रह का कर्ता है, जैसा वे ही प्राचीन लेखक एक स्वर से सिखाते हैं, और विशेष रूप से अगस्तीन, जो डोनेटिस्टों के खण्डन में मुख्यतः इसी सिद्धान्त पर टिकता है, कि बपतिस्मा चाहे कोई दे, अकेला मसीह ही अध्यक्षता करता है।
9. जो बातें हमने शरीर को मारे जाने और धुलाई के विषय में कही हैं, वे इस्राएल के लोगों में छाया-रूप में दिखाई गई थीं, जिन्हें इसी कारण प्रेरित ने बादल और समुद्र में बपतिस्मा पाया हुआ बताया है (1 कुरिन्थियों 10:2)। शरीर को मारे जाने का चित्रण तब हुआ जब प्रभु ने उन्हें फ़िरौन के हाथ से और क्रूर दासत्व से छुड़ाकर लाल समुद्र में से मार्ग बनाया, और स्वयं फ़िरौन को और उनके पीछे-पीछे दबाते और विनाश की धमकी देते हुए मिस्री शत्रुओं को डुबो दिया। क्योंकि इसी प्रकार वह हमें भी बपतिस्मा में प्रतिज्ञा देता है, और एक दिए हुए चिह्न से दिखाता है कि हम उसकी सामर्थ्य से मिस्र की बन्धुआई, अर्थात् पाप की दासता से, छुड़ाए जाते हैं, और हमारा फ़िरौन डुबो दिया जाता है; अर्थात् शैतान, यद्यपि वह हमें परखने और सताने से नहीं रुकता। परन्तु जैसे वह मिस्री समुद्र की गहराई में नहीं डुबाया गया, वरन् किनारे पर फेंक दिया गया, और फिर भी अपनी भयंकर दृष्टि से इस्राएलियों को डराता रहा, यद्यपि उन्हें हानि न पहुँचा सका, वैसे ही हमारा शत्रु अब भी धमकाता है, अपने हथियार दिखाता है और अनुभव में आता है, पर जीत नहीं सकता। बादल शुद्धि का प्रतीक था (गिनती 9:18)। क्योंकि जैसे तब प्रभु ने उन्हें सामने के एक बादल से ढाँपा और ठण्डा रखा, कि वे सूर्य की जलाती किरणों में मूर्छित न हों या सूख न जाएँ; वैसे ही बपतिस्मा में हम देखते हैं कि हम मसीह के लहू से ढाँपे और सुरक्षित रखे जाते हैं, ऐसा न हो कि परमेश्वर का क्रोध, जो सचमुच असह्य ज्वाला है, हम पर टिका रहे। यद्यपि वह रहस्य तब धुँधला था और थोड़ों को ही ज्ञात था, फिर भी चूँकि उद्धार पाने का इन दो अनुग्रहों के सिवा और कोई उपाय नहीं है, परमेश्वर की इच्छा थी कि प्राचीन पूर्वज, जिन्हें उसने उत्तराधिकारी के रूप में अपनाया था, दोनों चिह्नों से सुसज्जित हों।
10. अब स्पष्ट है कि वह शिक्षा कितनी झूठी है जो कुछ लोगों ने बहुत पहले सिखाई, और दूसरे अब भी उस पर अड़े हैं, कि बपतिस्मा से हम मूल पाप से और उस भ्रष्टता से, जो आदम से उसकी सारी सन्तान में फैली, मुक्त और छूटे हुए हैं, और हम उसी धार्मिकता और स्वभाव की शुद्धता में लौटा दिए गए हैं जो आदम को मिलती यदि वह उस खराई को बनाए रखता जिसमें वह सृजा गया था। इस प्रकार के शिक्षक कभी नहीं समझते कि मूल पाप, मूल धार्मिकता, या बपतिस्मा के अनुग्रह का क्या अर्थ है। अब, पहले दिखाया जा चुका है (पुस्तक 2, अध्याय 1, खण्ड 8), कि मूल पाप हमारे स्वभाव की बिगड़ी हुई दशा और भ्रष्टता है, जो पहले हमें परमेश्वर के क्रोध का पात्र बनाती है, और फिर हम में वे कर्म उत्पन्न करती है जिन्हें पवित्रशास्त्र शरीर के कर्म कहता है (गलातियों 5:19)। इसलिए दो बातें स्पष्ट रूप से देखनी चाहिए—अर्थात् यह कि हम अपने स्वभाव के सब अंगों में बिगड़े और टेढ़े हो चुके हैं, और फिर इसी भ्रष्टता के कारण परमेश्वर के सामने उचित रूप से दोषी और अपराधी ठहराए जाते हैं, जिसे शुद्धता, निर्दोषता और धार्मिकता के सिवा कुछ भाता नहीं। और इसलिए शिशु भी अपनी माता के गर्भ से ही अपना दण्ड साथ लाते हैं; क्योंकि यद्यपि उन्होंने अब तक अपने अधर्म के फल नहीं दिखाए, उसका बीज उनमें समाया हुआ है। वरन् उनका सारा स्वभाव मानो पाप का बीज ही है, और इसलिए परमेश्वर के लिए घृणित और कुत्सित हुए बिना नहीं रह सकता। विश्वासी बपतिस्मा से निश्चय पाते हैं कि यह दण्ड उन पर से पूरी तरह हटा लिया गया है, क्योंकि (जैसा कहा जा चुका है) प्रभु इस चिह्न के द्वारा प्रतिज्ञा करता है कि दोष की, जो हम पर आरोपित था, और दोष से उत्पन्न दण्ड की, पूर्ण और सम्पूर्ण क्षमा हो चुकी है। वे धार्मिकता को भी ग्रहण करते हैं, परन्तु ऐसी धार्मिकता जैसी परमेश्वर के लोग इस जीवन में पा सकते हैं—अर्थात् केवल आरोपण के द्वारा, परमेश्वर अपनी दया से उन्हें धर्मी और निर्दोष गिनता है।
11. दूसरी बात यह है कि यह भ्रष्टता हम में कभी थमती नहीं, वरन् निरन्तर नए फल उत्पन्न करती रहती है—अर्थात् शरीर के वे कर्म जिनका वर्णन हम पहले कर चुके हैं, जैसे जलती भट्ठी निरन्तर लपट और चिंगारियाँ छोड़ती है, या सोता सदा जल उँडेलता रहता है। क्योंकि अभिलाषा मनुष्यों में कभी पूरी तरह मरती या बुझती नहीं, जब तक वे मृत्यु के द्वारा मृत्यु की देह से छूटकर अपने स्वभाव को पूरी तरह उतार न दें (पुस्तक 3, अध्याय 3, खण्ड 10-13)। बपतिस्मा सचमुच हमें बताता है कि हमारा फ़िरौन डुबो दिया गया है और पाप मारा गया है; परन्तु ऐसा नहीं कि वह अब रहे ही नहीं, या कोई कष्ट न दे, केवल इतना कि प्रभुता न करे। क्योंकि जब तक हम देह के इस बन्दीगृह में बन्द जीते हैं, पाप के अवशेष हम में बसे रहते हैं, परन्तु यदि हम उस प्रतिज्ञा को, जो परमेश्वर ने हमें बपतिस्मा में दी है, विश्वासपूर्वक थामे रहें, तो वे न शासन करेंगे, न राज्य करेंगे। परन्तु कोई अपने आप को धोखा न दे, कोई अपने रोग को सन्तोष से न देखे, जब वह सुनता है कि पाप सदा हम में बसा रहता है। जब हम ऐसा कहते हैं, तो इसलिए नहीं कि वे लोग, जो वैसे ही पाप की ओर बहुत झुके हैं, अपने पापों में निश्चिन्त सोते रहें, वरन् केवल इसलिए कि जो शरीर से परखे और डसे जाते हैं, वे मूर्छित और निराश न हो जाएँ। वे इसके बदले यह सोचें कि वे अभी मार्ग में हैं, और यह समझें कि उन्होंने बड़ी उन्नति की है जब वे अनुभव करें कि उनकी अभिलाषा दिन-प्रतिदिन कुछ घटती जा रही है, जब तक वे उस बिन्दु पर न पहुँच जाएँ जिसकी ओर वे बढ़ रहे हैं—अर्थात् शरीर की अन्तिम मृत्यु; ऐसी मृत्यु जो इस नश्वर जीवन के अन्त पर पूरी होगी। इस बीच वे दृढ़ता से संघर्ष करना न छोड़ें, और आगे बढ़ने के लिए अपने आप को उत्साहित करें, और पूर्ण विजय की ओर बढ़ते चलें। इस विचार से उनके प्रयत्नों को प्रेरणा मिलनी चाहिए कि लम्बे संघर्ष के बाद भी बहुत कुछ करना शेष है। हमें यह मानना चाहिए कि हम अपने शरीर को मारने के लिए बपतिस्मा पाते हैं, जो बपतिस्मा में आरम्भ होता है, प्रतिदिन आगे बढ़ाया जाता है, और तब पूरा होगा जब हम इस जीवन से प्रभु के पास जाने को कूच करेंगे।
12. यहाँ हम उससे अधिक कुछ नहीं कहते जो प्रेरित पौलुस ने रोमियों की पत्री के छठे और सातवें अध्याय में अत्यन्त स्पष्टता से समझाया है। वह मुफ़्त धर्मी ठहराए जाने की चर्चा कर चुका था, परन्तु जब कुछ दुष्टों ने इससे यह निष्कर्ष निकाला कि वे जैसा चाहें वैसा जीवन बिताएँ, क्योंकि परमेश्वर के यहाँ उनकी स्वीकृति कर्मों के पुण्य से नहीं मिली, तब वह जोड़ता है कि जो मसीह की धार्मिकता के वस्त्र पहने हैं, वे साथ ही आत्मा से नया जन्म पाए हुए हैं, और इस नए जन्म की अग्रिम गारंटी हमें बपतिस्मा में मिलती है। इसलिए वह विश्वासियों को उभारता है कि वे पाप को अपने अंगों में राज्य न करने दें। और क्योंकि वह जानता था कि विश्वासियों में सदा कोई-न-कोई दुर्बलता रहती है, इसलिए कि वे इस कारण हताश न हों, वह उनकी सान्त्वना के लिए जोड़ता है कि वे व्यवस्था के अधीन नहीं हैं। फिर, जब यह खतरा दिख सकता था कि मसीही लोग इसलिए ढीठ हो जाएँगे कि वे व्यवस्था के जूए के नीचे नहीं हैं, तब वह दिखाता है कि उसके रद्द होने का स्वरूप क्या है, और साथ ही व्यवस्था का उपयोग क्या है। इस प्रश्न को वह पहले ही दूसरी बार टाल चुका था। सार यह है कि हम व्यवस्था की कठोरता से इसलिए छुड़ाए गए हैं कि मसीह से लगे रहें, और व्यवस्था का काम हमें हमारी भ्रष्टता का कायल करना, और हमसे अपनी असमर्थता और दुर्दशा स्वीकार कराना है। फिर, क्योंकि स्वभाव की यह बुराई उस अधर्मी मनुष्य में इतनी सहज प्रकट नहीं होती जो परमेश्वर के भय के बिना अपनी वासनाओं में लिप्त रहता है, इसलिए वह नया जन्म पाए हुए मनुष्य का, अर्थात् अपना ही उदाहरण देता है। इसलिए वह कहता है कि उसे अपने शरीर के अवशेषों से निरन्तर संघर्ष करना पड़ता था, और वह दयनीय बन्धन में रखा गया था, इतना कि वह अपने आप को पूरी तरह परमेश्वर की व्यवस्था की आज्ञाकारिता में नहीं लगा पाता था। इसी से उसे कराहना और पुकारना पड़ता है, “मैं कैसा अभागा मनुष्य हूँ! मुझे इस मृत्यु की देह से कौन छुड़ाएगा?” (रोमियों 7:24)। परन्तु यदि परमेश्वर के बच्चे जब तक जीते हैं बन्दीगृह में बन्दी रखे जाते हैं, तो वे अपने संकट का विचार करके अवश्य अत्यन्त चिन्तित होंगे, जब तक उनके भय दूर न किए जाएँ। इसी एकमात्र उद्देश्य से वह यह सान्त्वना जोड़ता है कि “अब जो मसीह यीशु में हैं, उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं” (रोमियों 8:1)। इसलिए वह सिखाता है कि जिन्हें प्रभु ने एक बार अपनी कृपा में ग्रहण कर लिया, और मसीह की सहभागिता में कलम लगा दिया, और बपतिस्मा के द्वारा कलीसिया की संगति में ले लिया, वे जब तक मसीह के विश्वास में बने रहते हैं, दोष और दण्ड से छुड़ाए हुए हैं, चाहे पाप उन्हें घेरे और वे इस प्रकार पाप को अपने साथ लिए फिरते हों। यदि पौलुस के आशय की यही सरल और सच्ची व्याख्या है, तो हम यह नहीं सोच सकते कि जो शिक्षा वह यहाँ देता है उसमें कुछ अनोखा है।622
13. बपतिस्मा मनुष्यों के सामने हमारे अंगीकार का काम करता है, क्योंकि यह वह चिह्न है जिससे हम खुलकर यह घोषणा करते हैं कि हम परमेश्वर के लोगों में गिने जाना चाहते हैं, जिससे हम गवाही देते हैं कि हम सब मसीहियों के साथ एक ही परमेश्वर की आराधना और एक ही धर्म में सहमत हैं; जिससे, संक्षेप में, हम सबके सामने अपने विश्वास की घोषणा करते हैं, ताकि न केवल हमारे हृदय, वरन् हमारी जीभें और हमारी देह के सब अंग भी, जिस प्रकार भी बन पड़े, परमेश्वर की स्तुति का प्रचार करें। इस प्रकार, जैसा उचित है, हमारे पास जो कुछ है वह सब परमेश्वर की महिमा के अधीन किया जाता है, जो सब जगह प्रकट होनी चाहिए, और दूसरे हमारे उदाहरण से उसी मार्ग के लिए उभारे जाते हैं। इसी की ओर पौलुस का संकेत था जब उसने कुरिन्थियों से पूछा कि उन्होंने मसीह के नाम में बपतिस्मा लिया है या नहीं (1 कुरिन्थियों 1:13); यह जताते हुए कि उसके नाम में बपतिस्मा पाने की इसी बात से उन्होंने अपने आप को उसे समर्पित कर दिया था, मनुष्यों के सामने उसके प्रति निष्ठा की शपथ खाई और अपने को उससे बाँध लिया था, ताकि वे अकेले मसीह के सिवा और किसी का अंगीकार न कर सकें, जब तक वे उस अंगीकार से मुकर न जाएँ जो उन्होंने बपतिस्मा में किया था।
14. अब जब वह उद्देश्य समझा दिया गया है जो प्रभु के ध्यान में बपतिस्मा की स्थापना करते समय था, तो यह निर्णय करना सरल है कि हमें इसका उपयोग और ग्रहण किस प्रकार करना चाहिए। क्योंकि चूँकि यह हमारे विश्वास को ऊपर उठाने, पोषित करने और दृढ़ करने के लिए ठहराया गया है, इसलिए हमें इसे इसके कर्ता के हाथ से ग्रहण करना चाहिए, यह दृढ़ता से मानते हुए कि वही चिह्न के द्वारा हमसे बोलता है; कि वही हमें धोता और शुद्ध करता है, और हमारे अपराधों का स्मरण मिटा देता है; कि वही हमें अपनी मृत्यु का भागी बनाता है, शैतान के राज्य को नष्ट करता है, अभिलाषा की शक्ति को दबाता है, वरन् हमें अपने साथ एक करता है, कि उसे पहन लेने से हम परमेश्वर की सन्तान गिने जाएँ। इन बातों को, मैं कहता हूँ, हमें अपने मन में उतनी ही सच्चाई और निश्चय से अनुभव करना चाहिए जितना हम अपनी देह को जल से धोया जाता, डुबोया जाता और घिरा हुआ देखते हैं। क्योंकि संस्कारों में यही समानता या उपमा सबसे निश्चित नियम देती है—अर्थात् यह कि शारीरिक वस्तुओं में हमें आत्मिक वस्तुएँ देखनी हैं, मानो वे सचमुच हमारी आँखों के सामने प्रस्तुत की जा रही हों, क्योंकि प्रभु ने उन्हें ऐसे रूपकों से दर्शाना चाहा है; इसलिए नहीं कि ऐसे अनुग्रह संस्कार में समाए और बँधे हों, कि उसकी प्रभावशीलता से दिए जाएँ, वरन् केवल इसलिए कि इस चिह्न से प्रभु हमें बताता है कि वह ये सब बातें हमें देने से प्रसन्न है। और वह हमारी आँखों को केवल खाली दिखावे से नहीं भरता; वह हमें वास्तविक वस्तु तक ले जाता है, और जो दर्शाता है उसे प्रभावशाली रूप से पूरा भी करता है।
15. इसका प्रमाण हमें सूबेदार कुरनेलियुस में मिलता है, जो पहले पवित्र आत्मा के अनुग्रहों से भरपूर किया जा चुका था, फिर पापों की क्षमा के लिए बपतिस्मा पाया, बपतिस्मा से अधिक पूर्ण क्षमा पाने के लिए नहीं, वरन् विश्वास के अधिक निश्चित अभ्यास के लिए; वरन् एक प्रतिज्ञा-चिह्न से निश्चय का तर्क पाने के लिए। शायद यह आपत्ति की जाए कि हनन्याह ने पौलुस से क्यों कहा कि उसने बपतिस्मा के द्वारा उसके पाप धो डाले (प्रेरितों के काम 22:16), यदि पाप बपतिस्मा की शक्ति से नहीं धुलते? मैं उत्तर देता हूँ, हमारे विषय में कहा जाता है कि हम पाते, प्राप्त करते और ग्रहण करते हैं वह सब कुछ जो हमारे विश्वास की अनुभूति के अनुसार प्रभु की ओर से हमारे सामने प्रस्तुत किया जाता है, चाहे वह उसे तब पहली बार प्रमाणित करे, या जो उसने पहले प्रमाणित किया था उसे और दृढ़ करे। इसलिए हनन्याह के कहने का आशय बस इतना था, पौलुस, बपतिस्मा ले, कि तुझे निश्चय हो जाए कि तेरे पाप क्षमा हो गए हैं। बपतिस्मा में प्रभु पापों की क्षमा की प्रतिज्ञा करता है: उसे ग्रहण कर, और निश्चिन्त रह। फिर भी मेरा बपतिस्मा की शक्ति को घटाने का कोई इरादा नहीं है। मैं केवल इतना जोड़ना चाहता हूँ कि चिह्न के साथ सार और वास्तविकता भी हो, क्योंकि परमेश्वर बाहरी साधनों से कार्य करता है। परन्तु इस संस्कार से, जैसे अन्य सब से, हमें कुछ नहीं मिलता, सिवाय उस सीमा के जहाँ हम विश्वास से ग्रहण करें। यदि विश्वास नहीं है, तो यह हमारी कृतघ्नता का प्रमाण होगा, जिससे हम परमेश्वर के सामने दोषी ठहरते हैं, क्योंकि हमने वहाँ दी गई प्रतिज्ञा पर विश्वास नहीं किया। जहाँ तक यह हमारे अंगीकार का चिह्न है, हमें इसके द्वारा गवाही देनी चाहिए कि हम परमेश्वर की दया पर भरोसा रखते हैं, और उस पापों की क्षमा के द्वारा शुद्ध हैं जो यीशु मसीह ने हमारे लिए प्राप्त की है; कि हम परमेश्वर की कलीसिया में इसलिए आए हैं कि विश्वास और प्रेम की एक सहमति से सब विश्वासियों के साथ मेल से जीवन बिताएँ। यही अन्तिम बात पौलुस का आशय थी जब उसने कहा कि “हम सब ने एक ही आत्मा के द्वारा एक देह होने के लिये बपतिस्मा लिया” (1 कुरिन्थियों 12:13)।
622 फ्रेंच में: “Nous suivons donc de mot à mot la doctrine de Sainct Paul, en ce que nous disons que le peché est remis au Baptesme, quant à la coulpe, mais qu’il demeure toujours quant à la matière, en tous Chretiens jusques à la mort.”—इसलिए हम सन्त पौलुस की शिक्षा का शब्द-शब्द अनुसरण करते हैं, जब हम कहते हैं कि बपतिस्मा में पाप दोष की दृष्टि से क्षमा हो जाता है, परन्तु सार की दृष्टि से वह सब मसीहियों में मृत्यु तक सदा बना रहता है।
16. फिर, यदि हमने ठीक निर्धारित किया है कि संस्कार का मूल्य उसके देनेवाले के हाथ से नहीं आँका जाता, वरन् उसे स्वयं परमेश्वर के हाथ से लिया जाना चाहिए, जिससे वह निस्सन्देह आया, तो हम इससे यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि उसकी गरिमा न देनेवाले से बढ़ती है, न घटती है। और जैसे मनुष्यों में, जब कोई पत्र भेजा गया हो, यदि हाथ और मुहर पहचानी जाए, तो इससे ज़रा भी अन्तर नहीं पड़ता कि सन्देशवाहक कौन या कैसा था; वैसे ही हमारे लिए इतना पर्याप्त होना चाहिए कि हम अपने प्रभु के संस्कारों में उसका हाथ और उसकी मुहर पहचान लें, चाहे देनेवाला कोई भी हो। इससे डोनेटिस्टों की भूल का खण्डन होता है, जो संस्कार की प्रभावशीलता और मूल्य को सेवक की गरिमा से नापते थे। आज के हमारे कैटाबैप्टिस्ट (पुनर्बपतिस्मावादी) ऐसे ही हैं, जो इनकार करते हैं कि हमारा बपतिस्मा ठीक हुआ, क्योंकि हमें पोप-तन्त्र में दुष्ट और मूर्तिपूजक मनुष्यों ने बपतिस्मा दिया; इसलिए वे उग्रता से फिर बपतिस्मा देने पर अड़े हैं। इन बेतुकी बातों के विरुद्ध हम यह सोचकर पर्याप्त रूप से सुरक्षित हो जाएँगे कि बपतिस्मा के द्वारा हम किसी मनुष्य के नाम में नहीं, वरन् पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम में दाखिल किए गए; और इसलिए बपतिस्मा मनुष्य का नहीं, परमेश्वर का है, चाहे वह किसी के भी द्वारा दिया गया हो। मान लें कि जिन्होंने हमें बपतिस्मा दिया वे परमेश्वर और सब भक्ति से अत्यन्त अनजान थे, या तिरस्कार करनेवाले थे, फिर भी उन्होंने हमें अपनी अज्ञानता या अपवित्रता की सहभागिता में नहीं, वरन् यीशु मसीह के विश्वास में बपतिस्मा दिया, क्योंकि जिस नाम को उन्होंने पुकारा वह उनका अपना नहीं, परमेश्वर का था, और उन्होंने किसी अन्य नाम में बपतिस्मा नहीं दिया। परन्तु यदि बपतिस्मा परमेश्वर का था, तो उसमें निश्चय ही पाप की क्षमा, शरीर को मारे जाने, आत्मा के द्वारा जिलाए जाने और मसीह की सहभागिता की प्रतिज्ञा सम्मिलित थी। इसी प्रकार यहूदियों की कोई हानि नहीं हुई कि उनका खतना अशुद्ध और धर्मत्यागी याजकों ने किया। इससे वह चिह्न निरर्थक नहीं हुआ कि उसे दोहराना आवश्यक हो। उसके सच्चे उद्गम की ओर लौट आना ही पर्याप्त था। यह आपत्ति कि बपतिस्मा भक्तों की सभा में मनाया जाना चाहिए, यह सिद्ध नहीं करती कि वह अपनी सारी प्रभावशीलता खो देता है क्योंकि वह आंशिक रूप से त्रुटिपूर्ण है।
जब हम दिखाते हैं कि बपतिस्मा को शुद्ध और हर दाग से मुक्त रखने के लिए क्या किया जाना चाहिए, तब हम परमेश्वर की संस्था को रद्द नहीं करते, चाहे मूर्तिपूजक उसे बिगाड़ दें। खतना प्राचीन काल में बहुत-से अन्धविश्वासों से दूषित हो गया था, फिर भी वह अनुग्रह का चिह्न गिने जाने से नहीं रुका; और न योशिय्याह और हिजकिय्याह ने, जब उन्होंने समस्त इस्राएल में से उन लोगों को इकट्ठा किया जो परमेश्वर से विद्रोह कर चुके थे, उन्हें नए सिरे से खतना कराने को बुलाया।
17. फिर, जब वे हमसे पूछते हैं कि हमारे बपतिस्मा के बाद कई वर्ष तक कौन-सा विश्वास रहा, ताकि इससे सिद्ध करें कि हमारा बपतिस्मा व्यर्थ था, क्योंकि जब तक प्रतिज्ञा के वचन को विश्वास से ग्रहण न किया जाए, वह पवित्र नहीं किया जाता, तो हमारा उत्तर यह है कि अन्धे और अविश्वासी होने के कारण हम बहुत समय तक उस प्रतिज्ञा को थामे नहीं रहे जो हमें बपतिस्मा में दी गई थी, परन्तु फिर भी वह प्रतिज्ञा, क्योंकि वह परमेश्वर की थी, सदा स्थिर, दृढ़ और सच्ची बनी रही। यद्यपि सब मनुष्य झूठे और विश्वासघाती हों, तो भी परमेश्वर सच्चा रहने से नहीं रुकता (रोमियों 3:3, 4); चाहे सब नष्ट हो जाएँ, मसीह सुरक्षित रहता है। इसलिए हम मानते हैं कि उस समय बपतिस्मा से हमें कुछ लाभ नहीं हुआ, क्योंकि हम में वह प्रस्तुत की गई प्रतिज्ञा, जिसके बिना बपतिस्मा कुछ नहीं, उपेक्षित पड़ी रही। अब, जब परमेश्वर के अनुग्रह से हम पश्चाताप करने लगते हैं, तो हम अपने अन्धेपन और मन की कठोरता को दोष देते हैं कि हम उसकी इतनी बड़ी भलाई के प्रति इतने समय तक कृतघ्न रहे। परन्तु हम यह नहीं मानते कि प्रतिज्ञा स्वयं लुप्त हो गई, वरन् हम यह विचार करते हैं: परमेश्वर बपतिस्मा में पापों की क्षमा की प्रतिज्ञा करता है, और निस्सन्देह जो उसने सब विश्वासियों से प्रतिज्ञा की है उसे पूरा करेगा। वह प्रतिज्ञा हमें बपतिस्मा में प्रस्तुत की गई थी, इसलिए आओ हम उसे विश्वास से अपना लें। हमारे विषय में तो वह अविश्वास के कारण बहुत समय तक दबी रही; अब इसलिए हम विश्वास के साथ उसे ग्रहण करें। इसलिए जब प्रभु यहूदी लोगों को पश्चाताप के लिए बुलाता है, तो वह किसी और खतने की आज्ञा नहीं देता, यद्यपि (जैसा हम कह चुके हैं) उनका खतना दुष्ट और अपवित्र हाथ ने किया था, और वे बहुत समय तक उसी अभक्ति में जीते रहे थे। वह केवल मन के फिरने पर बल देता है। क्योंकि उनके द्वारा वाचा चाहे जितनी तोड़ी गई हो, वाचा का चिह्न प्रभु की ठहराई विधि के अनुसार सदा दृढ़ और अटूट बना रहा। इसलिए केवल पश्चाताप की शर्त पर ही वे उस वाचा में लौटाए गए जो परमेश्वर ने उनसे खतने में एक बार बाँधी थी, यद्यपि उन्होंने उसे, जो उन्होंने वाचा तोड़नेवाले याजक के हाथ से पाया था, अपनी ओर से जितना बन पड़ा, अशुद्ध और बुझा डाला था।
18. परन्तु वे समझते हैं कि जिस हथियार को वे लहराते हैं वह अजेय है, जब वे कहते हैं कि पौलुस ने उन्हें फिर बपतिस्मा दिया जिन्होंने यूहन्ना का बपतिस्मा पाया था (प्रेरितों के काम 19:3, 5)। क्योंकि यदि हमारे अंगीकार के अनुसार यूहन्ना का बपतिस्मा हमारे बपतिस्मा के समान ही था, तो जैसे वे लोग, जिन्हें अनुचित शिक्षा दी गई थी, सच्चा विश्वास सीखने पर उसमें फिर बपतिस्मा पाए, वैसे ही क्या वह बपतिस्मा, जो सच्ची शिक्षा के बिना था, कुछ नहीं गिना जाना चाहिए, और इसलिए क्या हमें उस सच्चे धर्म में नए सिरे से बपतिस्मा लेना चाहिए जिससे हम अब पहली बार सींचे गए हैं? कुछ लोगों को लगता है कि वह यूहन्ना का कोई मूर्ख अनुकरणकर्ता था, जिसने पहले बपतिस्मा से उन्हें व्यर्थ अन्धविश्वास में दीक्षित किया था। इसका अनुमान इस बात से लगाया जाता है कि उन्होंने पवित्र आत्मा के विषय में अपनी पूरी अज्ञानता स्वीकार की, ऐसी अज्ञानता जिसमें यूहन्ना कभी अपने चेलों को न छोड़ता। परन्तु यह सम्भव नहीं कि यहूदी, चाहे उन्होंने बपतिस्मा बिलकुल न भी लिया होता, आत्मा के विषय में सारे ज्ञान से रहित होते, जिसकी चर्चा पवित्रशास्त्र के इतने अंशों में हुई है। इसलिए उनका यह उत्तर कि वे नहीं जानते थे कि आत्मा है भी या नहीं, इस प्रकार समझा जाना चाहिए मानो उन्होंने कहा हो कि उन्होंने अब तक यह नहीं सुना था कि आत्मा के वे दान, जिनके विषय में पौलुस ने उनसे पूछा था, मसीह के चेलों को दिए गए हैं या नहीं। मैं मानता हूँ कि यूहन्ना का बपतिस्मा सच्चा था, और मसीह के बपतिस्मा के साथ एक ही था। परन्तु मैं इनकार करता हूँ कि उन्हें फिर बपतिस्मा दिया गया (देखिए Calv. Instruct. adv. Anabapt.)। तब इन शब्दों का क्या अर्थ है, “उन्होंने प्रभु यीशु के नाम में बपतिस्मा लिया”? कुछ लोग यह व्याख्या करते हैं कि पौलुस ने उन्हें केवल खरी शिक्षा सिखाई; परन्तु मैं अधिक सीधी व्याख्या करना चाहूँगा, कि पवित्र आत्मा का बपतिस्मा, अर्थात् पवित्र आत्मा के दृश्य दान, हाथ रखने के द्वारा दिए गए। इन्हें कभी-कभी बपतिस्मा के नाम से पुकारा जाता है। इसी प्रकार पिन्तेकुस्त के दिन प्रेरितों के विषय में कहा गया है कि उन्हें आत्मा और आग के बपतिस्मा के विषय में प्रभु के वचन याद आए। और पतरस बताता है कि जब उसने ये दान कुरनेलियुस और उसके घराने और सम्बन्धियों पर उँडेले जाते देखे, तो उसे वही वचन याद आए। इस व्याख्या के विरुद्ध इस बात में कुछ नहीं है कि आगे जोड़ा गया है, “जब पौलुस ने उन पर हाथ रखे, तब पवित्र आत्मा उन पर उतरा” (प्रेरितों के काम 19:6)। क्योंकि लूका दो भिन्न बातों का वर्णन नहीं करता, वरन् इब्रानियों की उस सामान्य वर्णन-शैली का अनुसरण करता है, जो पहले सार देते हैं और फिर अधिक पूर्णता से समझाते हैं। इसे कोई भी केवल सन्दर्भ से देख सकता है। क्योंकि वह कहता है, “यह सुनकर उन्होंने प्रभु यीशु के नाम में बपतिस्मा लिया। और जब पौलुस ने उन पर हाथ रखे, तो पवित्र आत्मा उन पर उतरा।” इस अन्तिम वाक्य में वर्णन है कि वह बपतिस्मा किस प्रकार का था। परन्तु यदि अज्ञानता पहले बपतिस्मा को बिगाड़ देती है, और दूसरे बपतिस्मा से सुधारी जानी चाहिए, तो सबसे पहले प्रेरितों को फिर बपतिस्मा दिया जाना चाहिए था, क्योंकि अपने बपतिस्मा के बाद पूरे तीन वर्ष से अधिक तक उन्हें शुद्ध शिक्षा का कोई थोड़ा-सा अंश भी मुश्किल से मिला था। फिर अज्ञानता के कार्य इतने अनेक हैं जो परमेश्वर की दया से प्रतिदिन हम में सुधारे जाते हैं, कि इतने बार-बार के बपतिस्माओं के लिए कितनी नदियाँ पर्याप्त होंगी?
19. संस्कार का बल, गरिमा, उपयोगिता और उद्देश्य अब, यदि मैं भूल नहीं करता, पर्याप्त स्पष्ट होना चाहिए। बाहरी चिह्न के विषय में, मैं चाहता कि मनुष्यों के दुस्साहस को रोकने के लिए मसीह की सच्ची संस्था बनी रहती। मानो मसीह की आज्ञा के अनुसार जल से बपतिस्मा लेना कोई तुच्छ बात थी, जल के सच्चे पवित्रीकरण को दूषित करने के लिए एक आशीर्वचन, या कहिए मन्त्र-पाठ, गढ़ा गया। बाद में मोमबत्ती और अभिषेक का तेल जोड़ा गया, जबकि भूत-निकाला623 बपतिस्मा के लिए द्वार खोलनेवाला माना गया। यद्यपि मैं अनजान नहीं कि इस बाहर से जोड़ी गई खिचड़ी का उद्गम कितना पुराना है, फिर भी मुझे और सब भक्तों को यह अधिकार है कि मसीह की संस्था में जो कुछ मनुष्यों ने जोड़ने की धृष्टता की, उसे ठुकरा दें। जब शैतान ने देखा कि जगत की मूर्ख भोली-भाली मान्यता के कारण सुसमाचार के आरम्भ में उसके छल लगभग बिना विरोध स्वीकार कर लिए गए, तो वह और भद्दे उपहास पर उतर आया: इसी से थूक और अन्य मूर्खताएँ, बपतिस्मा के खुले अपमान के साथ, बेलगाम छूट से चलाई गईं।624 उनके अनुभव से हम सीखें कि अकेले मसीह के अधिकार से सन्तुष्ट रहने से अधिक पवित्र, उत्तम या सुरक्षित कुछ नहीं है। इसलिए यह कितना अच्छा है कि सारा नाटकीय आडम्बर, जो सीधे-सादे लोगों की आँखें चकाचौंध करता और उनके मन को मन्द करता है, छोड़ दिया जाए, और जब किसी को बपतिस्मा लेना हो तो उसे आगे लाकर परमेश्वर के सामने प्रस्तुत किया जाए, सारी कलीसिया गवाह के रूप में देखती हो और उसके लिए प्रार्थना करती हो; विश्वास का वह अंगीकार सुनाया जाए जिसकी शिक्षा नए विश्वासी को दी गई है, बपतिस्मा में दी जानेवाली प्रतिज्ञाएँ समझाई जाएँ, फिर पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम में बपतिस्मा दिया जाए, और प्रार्थना और धन्यवाद से समाप्त किया जाए। इस प्रकार कोई उचित बात छूटेगी नहीं, और वह एकमात्र रीति, जो उसके ईश्वरीय कर्ता से आई, बाहरी विधियों से दबी या अशुद्ध न होकर सबसे उज्ज्वल रूप से चमकेगी। बपतिस्मा लेनेवाला पूरी तरह डुबोया जाए, और वह भी एक बार या तीन बार, या केवल उस पर जल छिड़का जाए, यह ज़रा भी महत्त्व नहीं रखता: जलवायु की भिन्नता के अनुसार कलीसियाओं को दोनों में से कोई अपनाने की स्वतन्त्रता होनी चाहिए, यद्यपि स्पष्ट है कि बपतिस्मा देना शब्द का अर्थ डुबोना है, और आदि कलीसिया में यही रीति प्रयोग होती थी।
623 लैटिन में, “Exsufflatio.”—फ्रेंच में, “Le souffle pour conjurer le diable.”
624 देखिए Calv. in Epist. de Fugiendis illicitis sacris. Item, Vera Ecclesia Reformandæ Ratio. यह भी देखिए आगे अध्याय 17, खण्ड 43। बपतिस्मा की रीति के विषय में देखिए Cyprian, Lib. 4 Ep. 7.
625 फ्रेंच में, “Au reste, c’est une chose de nulle importance, si on baptise en plongeant du tout dans l’eau celui qui est baptisé, ou en repandant seulement de l’eau sur lui: mais selon la diversité des regions cela doit demeura en la liberté des Eglises. Car le signe est representé en l’un et en l’autre. Combien que le mot mesme de Baptiser signifie du tout plonger et qu’il soit certain que la coustume d’ainsi totalement plonger ait eté anciennement observée en 1’Eglise.”—इसके अतिरिक्त, यह कोई महत्त्व की बात नहीं कि हम बपतिस्मा लेनेवाले को पूरी तरह जल में डुबोकर बपतिस्मा दें, या केवल उस पर जल छिड़ककर, परन्तु देशों की भिन्नता के अनुसार यह कलीसियाओं की स्वतन्त्रता पर रहना चाहिए। क्योंकि चिह्न दोनों में प्रदर्शित होता है। यद्यपि स्वयं बपतिस्मा देना शब्द का अर्थ पूरी तरह डुबोना है, और यह निश्चित है कि इस प्रकार पूरी तरह डुबोने की रीति प्राचीन काल में कलीसिया में मानी जाती थी।
626 इस वाक्य में कैल्विन तीन कथन करते हैं: (1) कि बपतिस्मा की रीति पूर्णतः उदासीन बात है (“ज़रा भी महत्त्व नहीं रखती”)। (2) कि यह स्पष्ट है कि “बपतिस्मा देना” शब्द का अर्थ डुबोना है। (3) कि आदि कलीसिया में डुबोने की रीति ही प्रयोग होती थी। ये कथन गम्भीर विचार के योग्य हैं। सम्भवतः ये टिप्पणियाँ सहायक होंगी: (1) रीति के प्रति कैल्विन की पूर्ण उदासीनता के पीछे एक महत्त्वपूर्ण भेद है—संस्कारों के सार या वस्तु और संस्कारों की रीति या रूप के बीच का भेद; या दूसरे शब्दों में, संस्कारों की अनिवार्य और आनुषंगिक बातों के बीच का भेद। कैल्विन के लिए बपतिस्मा के उचित संचालन के अनिवार्य तत्त्व ये हैं: (क) उचित समर्पण, जिसमें स्थापना के शब्द, संस्कार से जुड़ी प्रतिज्ञाएँ और दायित्व, और प्रार्थना सम्मिलित हैं; (ख) उचित वितरण, जिसमें त्रिएकता के नाम में जल का प्रयोग सम्मिलित है; और (ग) उचित ग्रहण, जो ग्रहण करनेवाले की ओर से (या शिशुओं की स्थिति में माता-पिता की ओर से) विश्वास, पश्चाताप और आज्ञाकारी आत्मा में निहित है। इनके अतिरिक्त संस्कार के अन्य पहलू “ज़रा भी महत्त्व नहीं रखते,” वरन् केवल सुविधा की बातें हैं (जैसे राष्ट्रीय या स्थानीय रीतियों की भिन्नता, या जलवायु की भिन्नता)। (2) यह मत कि “बपतिस्मा देना” के रूप में अनूदित शब्द का अर्थ डुबोना है, यूनानी क्लासिकी साहित्य में उसके अनेक प्रयोगों में सत्य है, जिनमें से बहुत-से सुधार-काल से पहले के पुनर्जागरण में फिर से खोजे गए थे। निस्सन्देह कैल्विन ने इन्हीं रचनाओं में “बपतिस्मा देना” शब्द का अर्थ “डुबोना” पाया था। परन्तु सेप्टुआजिन्ट (इब्रानी पुराने नियम का यूनानी अनुवाद, जो लगभग 250-200 ई.पू. में किया गया) में उसके प्रयोग के अध्ययन से, और नए नियम में उसके प्रयोग की सावधान परीक्षा से, हम पाते हैं कि इस शब्द ने अपने प्रयोग के इतिहास में अपने अर्थ का दायरा बढ़ाया, और अपनी क्लासिकी परिभाषा “डुबकी देना, डुबोना, और गोता देना” के साथ “जल में या जल से नहलाना, धोना” के और अर्थ भी सम्मिलित कर लिए। यह ध्यान देने योग्य है कि दो अत्यन्त प्रतिष्ठित यूनानी कोश—थेयर और आर्न्ट एवं जिंग्रिच—इस बढ़े हुए अर्थ-दायरे की गवाही देते हैं। जहाँ तक “बपतिस्मा देना” शब्द के नए नियम के अर्थ का सम्बन्ध है, उसका निर्णय प्रत्येक स्थान पर सन्दर्भ में उसके प्रयोग के अध्ययन से होना चाहिए। ऐसा अध्ययन प्रकट करता है कि “बपतिस्मा देना” शब्द का अर्थ डुबोना नहीं है (यद्यपि अनेक स्थानों में डुबोना प्रयुक्त हो सकता था)। दूसरी ओर, वही अध्ययन प्रकट करता है कि “बपतिस्मा देना” का अर्थ उँडेलना या छिड़कना भी नहीं है! यह शब्द, जैसा नए नियम में प्रयुक्त है, किसी विशेष रीति को नहीं दर्शाता। जब-जब वह मसीही जल-बपतिस्मा के लिए आता है, उसका अर्थ है “समर्पण, वितरण और ग्रहण के अपने अनिवार्य तत्त्वों के साथ दीक्षा की मसीही विधि को पूरा करना।” (3) यह मत कि डुबोने की रीति आदि कलीसिया में प्रयोग होती थी, हाल में कलीसिया के पिताओं की रचनाओं की तुलना उन पुरातात्त्विक प्रमाणों से करने के प्रकाश में, जो किसी भी प्रकार रीति से सम्बन्ध रखते हैं, प्रश्नगत हुआ है। ऐसी तुलना उँडेलने को प्रचलित रीति के रूप में पक्ष में दिखाती है, अन्य रीतियाँ भी प्रयोग में थीं। इस प्रश्न के उत्कृष्ट अध्ययन क्लेमेंट एफ़. रोजर्स की रचना बपतिस्मा और मसीही पुरातत्त्व (Baptism and Christian Archaeology, Oxford: The Clarendon Press, 1903) और जे. जी. डेविस की रचना बपतिस्मा की स्थापत्यगत पृष्ठभूमि (The Architectural Setting of Baptism, London, Barrie and Rockliff, 1962) में मिलते हैं।
20. यहाँ यह भी ध्यान देना उचित है कि निजी व्यक्तियों का बपतिस्मा देने का काम अपने ऊपर ले लेना अनुचित है; क्योंकि वह, प्रभु-भोज के संचालन की तरह, सेवकाई के पद का भाग है। क्योंकि मसीह ने किसी भी पुरुष या स्त्री को बपतिस्मा देने की आज्ञा नहीं दी, केवल उन्हें जिन्हें उसने प्रेरित ठहराया था। और जब उसने प्रभु-भोज के संचालन में अपने चेलों को आज्ञा दी कि जो उन्होंने उसे करते देखा वही करें (क्योंकि उसने वैध संचालक का भाग निभाया था), तो उसका निस्सन्देह यह आशय था कि इसमें वे उसके उदाहरण का अनुकरण करें। वह प्रथा जो अनेक युगों से, और कलीसिया के आरम्भ से लगभग ही, चली आ रही है, कि मृत्यु के संकट में, जब सेवक समय पर उपस्थित न हो सके, तब साधारण विश्वासी बपतिस्मा दें, मेरे विचार में पर्याप्त आधारों पर उचित नहीं ठहराई जा सकती। जिन आरम्भिक मसीहियों ने इस प्रथा को माना या सहा, वे भी स्पष्ट नहीं थे कि यह ठीक किया गया या नहीं। यह सन्देह अगस्तीन ने इन शब्दों में व्यक्त किया है, “यद्यपि किसी साधारण विश्वासी ने विवशता में बपतिस्मा दिया हो, तो मैं नहीं जानता कि कोई भक्तिपूर्वक यह कह सकता है कि उसे दोहराया जाना चाहिए। क्योंकि यदि यह बिना किसी विवशता के किया जाए, तो यह दूसरे के पद का हड़पना है; परन्तु यदि विवशता हो, तो या तो कोई दोष नहीं, या क्षम्य दोष है” (August. Cont. Epist. Parmen. Lib. 2 c. 13)। स्त्रियों के विषय में कार्थेज की महासभा (cap. 100) में बिना किसी अपवाद के यह ठहराया गया कि वे बपतिस्मा देने का साहस बिलकुल न करें। परन्तु यह खतरा है कि रोगी, यदि बपतिस्मा के बिना मर जाए, तो नए जन्म के दान से वंचित रह जाएगा! बिलकुल नहीं। हमारे बच्चों को, उनके जन्म से पहले ही, परमेश्वर घोषित करता है कि वह उन्हें अपना ठहराता है, जब वह प्रतिज्ञा करता है कि वह हमारा और हमारे बाद हमारी सन्तान का परमेश्वर होगा। इस प्रतिज्ञा में उनका उद्धार समाविष्ट है। कोई ऐसा साहस न करेगा कि परमेश्वर का ऐसा अपमान करे कि यह इनकार करे कि वह अपनी प्रतिज्ञा को पूरा करने में समर्थ है। इस सिद्धान्त के, जिसे बुरी तरह समझाया गया है, कि बपतिस्मा उद्धार के लिए आवश्यक है, कितनी बुराई हुई है, यह थोड़े ही लोग देखते हैं, और इसलिए सावधानी को कम आवश्यक समझते हैं। क्योंकि जब यह मत प्रचलित हो जाता है कि वे सब नष्ट हैं जो जल में डुबकी नहीं पाते, तब हमारी दशा परमेश्वर के प्राचीन लोगों से भी बुरी हो जाती है, मानो उसका अनुग्रह व्यवस्था के अधीन की अपेक्षा अधिक संकुचित हो। उस दशा में मसीह के विषय में यह सोचा जाएगा कि वह प्रतिज्ञाओं को पूरा करने नहीं, वरन् रद्द करने आया, क्योंकि जो प्रतिज्ञा तब आठवें दिन से पहले उद्धार देने में अपने आप में प्रभावशाली थी, वह अब चिह्न की सहायता के बिना प्रभावशाली न होगी।
21. अगस्तीन के दिनों से पहले क्या रीति थी, यह पहले तो टर्टुलियन से जाना जाता है, जो कहता है कि स्त्री को कलीसिया में बोलने की अनुमति नहीं, न सिखाने की, न बपतिस्मा देने की, न भेंट चढ़ाने की, ताकि वह पुरुष के, याजक के तो क्या कहें, किसी भी पद को अपना न ठहराए (Tertull. Cont. Hæres. Lib. 1)। इसी बात की पर्याप्त गवाही हमें एपिफ़ानियस में मिलती है, जब वह मार्सियन को इस बात पर डाँटता है कि उसने स्त्रियों को बपतिस्मा देने की अनुमति दी। मैं उस उत्तर से अनजान नहीं जो वे देते हैं जो विपरीत मत रखते हैं —अर्थात् कि सामान्य प्रयोग उस असाधारण उपाय से बहुत भिन्न है जो अत्यन्त आवश्यकता के दबाव में काम में लाया जाता है—परन्तु क्योंकि वह स्त्रियों को बपतिस्मा देने की अनुमति को उपहास की बात घोषित करता है, और कोई अपवाद नहीं बनाता, इसलिए यह पर्याप्त स्पष्ट है कि इस बिगाड़ को किसी भी बहाने से क्षमा के अयोग्य ठहराया गया है। अपनी तीसरी पुस्तक में भी, जब वह कहता है कि मसीह की पवित्र माता को भी यह अनुमति नहीं थी, तो वह कोई अपवाद नहीं रखता।
22. सिप्पोरा का उदाहरण (निर्गमन 4:25) असंगत रूप से उद्धृत किया जाता है। क्योंकि परमेश्वर का दूत उसके पत्थर लेकर अपने पुत्र का खतना करने के बाद शान्त हुआ, इससे भूल से यह निष्कर्ष निकाला जाता है कि उसके काम को परमेश्वर ने स्वीकार किया। यदि ऐसा हो, तो हमें कहना पड़ेगा कि परमेश्वर उस पूजा से प्रसन्न हुआ जो अन्यजाति लोग अश्शूर से लाए और सामरिया में स्थापित की।627 परन्तु अन्य ठोस कारण सिद्ध करते हैं कि एक मूर्ख स्त्री ने जो किया, उसे अज्ञानवश उदाहरण बना लिया गया है। यदि मैं कहूँ कि इस घटना में कुछ विशेष बात थी जो इसे उदाहरण बनाने के अयोग्य करती है—और विशेषकर यह कि हम कहीं नहीं पढ़ते कि खतना करने की आज्ञा विशेष रूप से याजकों को दी गई थी, इसलिए बपतिस्मा और खतना की स्थितियाँ भिन्न हैं—तो मैं पर्याप्त खण्डन कर दूँगा। क्योंकि मसीह के शब्द स्पष्ट हैं: “इसलिये तुम जाकर सब जातियों के लोगों को चेला बनाओ, और उन्हें बपतिस्मा दो” (मत्ती 28:19)। चूँकि उसने उन्हीं व्यक्तियों को सुसमाचार के प्रचारक और बपतिस्मा के संचालक नियुक्त किया—और कलीसिया में, जैसा प्रेरित घोषित करता है, “कोई अपने आप यह आदर नहीं लेता” (इब्रानियों 5:4), “वरन् जब तक हारून के समान परमेश्वर की ओर से बुलाया न जाए”—इसलिए जो कोई वैध बुलाहट के बिना बपतिस्मा देता है, वह दूसरे के पद को हड़पता है। पौलुस घोषित करता है कि जो कुछ हम सन्दिग्ध विवेक से करने का प्रयास करते हैं, चाहे अत्यन्त छोटी बातों में, जैसे खाने-पीने में, वह पाप है (रोमियों 14:23)। इसलिए स्त्रियों द्वारा बपतिस्मा में पाप और भी बड़ा है, जब यह स्पष्ट है कि मसीह का दिया हुआ नियम तोड़ा जा रहा है, क्योंकि हम जानते हैं कि जिसे परमेश्वर ने जोड़ा है उसे अलग करना अनुचित है। परन्तु यह सब मैं छोड़ देता हूँ; केवल इतना चाहता हूँ कि मेरे पाठक ध्यान दें कि सिप्पोरा का सबसे अन्तिम आशय परमेश्वर की कोई सेवा करना था। अपने पुत्र को संकट में देखकर वह झुँझलाती और बड़बड़ाती है, और क्रोध में आकर खलड़ी को भूमि पर फेंक देती है; इस प्रकार अपने पति को ताना मारती और परमेश्वर से नाराज़ होती है। संक्षेप में, स्पष्ट है कि उसका सारा आचरण आवेश से प्रेरित है: वह अपने पति और परमेश्वर दोनों के विरुद्ध शिकायत करती है, क्योंकि उसे अपने पुत्र का लहू बहाना पड़ रहा है। हम यह भी जोड़ सकते हैं कि अन्य सब बातों में उसने चाहे जितना अच्छा आचरण किया हो, फिर भी इसमें उसका दुस्साहस अक्षम्य है कि उसने अपने पति की उपस्थिति में अपने पुत्र का खतना किया, और वह पति कोई साधारण निजी व्यक्ति नहीं, वरन् मूसा था, परमेश्वर का प्रधान भविष्यद्वक्ता, जिससे बड़ा इस्राएल में कोई नहीं उठा। यह उसके लिए उतना ही अनुचित था जितना आज स्त्रियों के लिए अध्यक्ष की आँखों के सामने होगा। परन्तु यह विवाद तुरन्त निपट जाएगा जब हम यह दृढ़ता से कहें कि जो बच्चे जल में डुबोने का अवसर मिलने से पहले इस जीवन से चले जाते हैं, वे स्वर्ग के राज्य से बाहर नहीं रखे जाते। अब देखा जा चुका है कि यदि हम इस बात को न मानें, तो परमेश्वर की वाचा की बड़ी हानि होती है, मानो वह अपने आप में दुर्बल हो, जबकि उसका प्रभाव न बपतिस्मा पर निर्भर है, न किसी सहायक बात पर। संस्कार बाद में एक प्रकार की मुहर के रूप में जोड़ा जाता है, प्रतिज्ञा को प्रभावशाली बनाने के लिए नहीं, मानो वह अपने आप में निर्बल हो, वरन् केवल हमारे लिए उसे पक्का करने के लिए। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि विश्वासियों के बच्चों को बपतिस्मा इसलिए नहीं दिया जाता कि जो पहले कलीसिया से परे थे वे तब पहली बार परमेश्वर की सन्तान बनें, वरन् इसलिए कि वे एक औपचारिक चिह्न के द्वारा कलीसिया में ग्रहण किए जाते हैं, क्योंकि प्रतिज्ञा के बल से वे पहले ही मसीह की देह के थे। इसलिए यदि चिह्न को छोड़ने में न आलस्य है, न तिरस्कार, न लापरवाही, तो हम सब खतरे से सुरक्षित हैं। इसलिए कहीं अधिक अच्छा मार्ग यह है कि परमेश्वर की विधि का ऐसा आदर किया जाए कि संस्कारों को उस स्थान के सिवा कहीं और न खोजा जाए जहाँ प्रभु ने उन्हें रखा है।
627 फ्रेंच में, “Car par une mesme raison il faudroit dire, le service meslé que dresserent en Samarie ceux qui etoient la envoyés d’Orient, eut eté agreable a Dieu, veu que depuis ils ne furent plus molestes des betes sauvages.”—क्योंकि इसी तर्क से यह कहना पड़ेगा कि पूर्व से वहाँ भेजे गए लोगों ने सामरिया में जो मिश्रित पूजा स्थापित की, वह परमेश्वर को प्रिय थी, क्योंकि उसके बाद उन्हें जंगली पशु फिर नहीं सताते थे।
जब हम उन्हें कलीसिया से ग्रहण नहीं कर सकते, तब परमेश्वर का अनुग्रह उनसे इतना अविभाज्य रूप से जुड़ा नहीं है कि हम उसे उसके वचन के अनुसार विश्वास से न पा सकें।
