पुस्तक II · अध्याय 8

नैतिक व्यवस्था की व्याख्या (भाग 2/3)

Institutes of the Christian Religion · John Calvin

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नैतिक व्यवस्था की व्याख्या (भाग 2/3)

20. पहले हम यह जाँचें कि ऐसा दण्ड ईश्वरीय न्याय के विरुद्ध तो नहीं है। यदि मानव स्वभाव सर्वत्र दोषी ठहराया जा चुका है, तो जिन्हें प्रभु अपने अनुग्रह की सहभागिता नहीं देता, वे नाश के लिए ठहरे हुए होंगे; फिर भी वे अपनी ही अधर्मिता से नष्ट होते हैं, परमेश्वर की ओर से किसी अन्यायपूर्ण बैर के कारण नहीं। यहाँ शिकायत करने और यह पूछने की कोई गुंजाइश नहीं कि परमेश्वर का अनुग्रह उनके उद्धार को क्यों नहीं बढ़ाता, जैसा वह औरों के उद्धार को बढ़ाता है। इसलिए जब परमेश्वर दुष्टों और घोर अपराधियों को उनके अपराधों का दण्ड इस प्रकार देता है कि उनके घरानों को अनेक पीढ़ियों तक अपने अनुग्रह से वंचित रखता है, तो इस परम धर्ममय प्रतिशोध के विषय में कौन उस पर दोष लगाने का साहस करेगा? परन्तु कहा जाएगा कि प्रभु तो इसके विपरीत घोषणा करता है कि पुत्र पिता के पाप का दण्ड नहीं भोगेगा (यहेजकेल 18:20)। उस खण्ड का आशय देखिए। इस्राएली लोग, लम्बे समय तक लगातार विपत्तियों के अधीन रहने के बाद, यह कहावत कहने लगे थे कि पितरों ने खट्टे अंगूर खाए और बच्चों के दाँत खट्टे हो गए; उनका अर्थ यह था कि वे स्वयं धर्मी और निर्दोष होते हुए भी अपने माता-पिता के किए पापों का दण्ड भोग रहे हैं, और यह परमेश्वर की उचित रूप से संयमित कठोरता से अधिक उसके अटल क्रोध के कारण है। भविष्यद्वक्ता घोषणा करता है कि बात ऐसी नहीं थी: वे अपनी ही दुष्टता के कारण दण्डित हुए; परमेश्वर के न्याय के अनुसार यह नहीं था कि धर्मी पुत्र दुष्ट पिता की अधर्मिता के लिए दुःख उठाए; और जो कुछ उन्होंने सहा उसमें ऐसी कोई बात दिखाई नहीं दी। क्योंकि यदि जिस दण्ड-भोग की हम अब चर्चा कर रहे हैं वह तब पूरा होता है जब परमेश्वर दुष्टों की सन्तान से अपने सत्य का प्रकाश और उद्धार के अन्य साधन हटा लेता है, तो वे अपने पितरों की दुष्टता के कारण केवल इसी रीति से शापित ठहरते हैं कि परमेश्वर द्वारा अन्धे कर दिए जाते और त्याग दिए जाते हैं, और इस प्रकार अपने माता-पिता के पदचिह्नों पर चलने के लिए छोड़ दिए जाते हैं। इस प्रकार वे इस जीवन में जो दुःख भोगते हैं और जिस विनाश के लिए अन्त में ठहराए जाते हैं, वे ईश्वरीय न्याय से दिए गए दण्ड हैं—दूसरों के पापों के लिए नहीं, बल्कि उनकी अपनी अधर्मिता के लिए।

21. दूसरी ओर, हज़ारों पर दया की प्रतिज्ञा है—ऐसी प्रतिज्ञा जिसका पवित्रशास्त्र में बार-बार उल्लेख है और जो कलीसिया के साथ बाँधी गई गम्भीर वाचा का एक अनुच्छेद है—मैं “तेरा और तेरे पश्चात् तेरे वंश का परमेश्वर” ठहरूँगा (उत्पत्ति 17:7)। इसी के सन्दर्भ में सुलैमान कहता है, “जो धर्मी अपनी खराई पर चलता है, उसके पश्चात् उसके पुत्र धन्य होते हैं” (नीतिवचन 20:7); केवल धार्मिक शिक्षा के कारण नहीं (यद्यपि वह निश्चय ही कम महत्त्व की नहीं), परन्तु वाचा में प्रतिज्ञा किए गए आशीर्वाद के कारण—अर्थात् कि ईश्वरीय कृपा धर्मियों के घरानों में सदा बनी रहेगी। इसमें विश्वासियों के लिए उत्तम सान्त्वना है और दुष्टों के लिए भय का बड़ा आधार; क्योंकि यदि मृत्यु के पश्चात् धार्मिकता और अधर्म की स्मृति-मात्र का परमेश्वर के व्यवहार पर ऐसा प्रभाव पड़ता है कि उसका आशीर्वाद धर्मियों की सन्तान पर और उसका शाप दुष्टों की सन्तान पर ठहरता है, तो स्वयं उन व्यक्तियों के सिर पर वह कहीं अधिक ठहरेगा। तो भी कभी-कभी दुष्टों की सन्तान सुधर जाती है और विश्वासियों की सन्तान बिगड़ जाती है; क्योंकि सर्वशक्तिमान ने यहाँ कोई ऐसा अटल नियम नहीं ठहराया जो उसके स्वतन्त्र चुनाव को घटाए। धर्मियों की सान्त्वना और पापी के भय के लिए इतना ही पर्याप्त है कि चेतावनी स्वयं व्यर्थ या निष्फल नहीं है, यद्यपि वह सदा पूरी नहीं होती। क्योंकि जैसे कुछ दुष्टों पर आए सांसारिक दण्ड पाप के विरुद्ध परमेश्वर के क्रोध के, और उस भावी न्याय के प्रमाण हैं जो अन्त में सब पापियों पर आएगा, यद्यपि बहुतेरे जीवन के अन्त तक बिना दण्ड के बच निकलते हैं, वैसे ही जब प्रभु एक उदाहरण देता है कि पिता के कारण पुत्र को आशीष दी, और दया तथा कृपा से उसकी सुधि ली, तो यह अपने आराधकों के प्रति उसकी निरन्तर और अटल कृपा का प्रमाण है। दूसरी ओर, जब किसी एक उदाहरण में वह पिता की अधर्मिता का दण्ड पुत्र को देता है, तो वह उस न्याय का संकेत देता है जो सब त्यागे हुओं की अपनी अधर्मिता के लिए उनकी प्रतीक्षा करता है। इसकी निश्चितता ही यहाँ सिखाई जानेवाली मुख्य बात है। फिर, प्रभु मानो प्रसंगवश अपनी दया की समृद्धि की प्रशंसा करता है, क्योंकि उसे वह हज़ारों तक पहुँचाता है, जबकि अपना प्रतिशोध चार पीढ़ियों तक सीमित रखता है।

तीसरी आज्ञा।

तू अपने परमेश्वर यहोवा का नाम व्यर्थ न लेना।

22. इस आज्ञा का आशय यह है कि परमेश्वर के नाम की महिमा को पवित्र माना जाए। अतः सार यह है कि हमें उसे अनादर या तिरस्कार के साथ प्रयोग करके अपवित्र नहीं करना चाहिए। इस निषेध में एक अनुरूप विधि निहित है—अर्थात् हमारा यत्न और चिन्ता यह हो कि उसके नाम के साथ धार्मिक श्रद्धा का व्यवहार करें। इसलिए हमारे लिए उचित है कि हम अपने मन और अपनी जीभ को ऐसा नियन्त्रित रखें कि परमेश्वर और उसके भेदों के विषय में कभी बिना आदर और गहरी गम्भीरता के न सोचें, न बोलें, और उसके कामों को आँकते समय उसके प्रति गहरी श्रद्धा के सिवा कोई और भाव कभी न रखें। मैं कहता हूँ कि हमें इन तीन बातों का दृढ़ता से पालन करना चाहिए:—पहली, हमारा मन उसके विषय में जो कुछ सोचे, हमारी जीभ जो कुछ कहे, वह उसकी उत्कृष्टता को प्रकट करे और उसके पवित्र नाम की उच्चता के अनुरूप हो; संक्षेप में, उसकी महानता को ऊँचा उठाने के योग्य हो। दूसरी, हम उसके पवित्र वचन और आराध्य भेदों को उतावली और उलटे ढंग से महत्त्वाकांक्षा, लोभ या मनोरंजन के प्रयोजनों के लिए न मरोड़ें, बल्कि जहाँ-जहाँ वे उसकी गरिमा की छाप धारण करते हैं, उन्हें सदा उचित आदर और सम्मान में रखें। अन्त में, हम उसके कामों की निन्दा या अपयश न करें, जैसा दुखी मनुष्य अपमानपूर्वक करने के आदी हैं, बल्कि जो-जो कार्य हम उसके ठहराएँ उन सब की बुद्धिमान, धर्ममय और भला कहकर स्तुति करें। यही परमेश्वर के नाम को पवित्र ठहराना है। जब हम इसके विपरीत करते हैं, तो उसका नाम व्यर्थ और दुष्ट दुरुपयोग से अपवित्र किया जाता है, क्योंकि वह ऐसे प्रयोजन में लगाया जाता है जो उस प्रयोजन से भिन्न है जिसके लिए वह समर्पित है। और कुछ बुरा न भी हो, तो अपनी गरिमा से वंचित होकर वह धीरे-धीरे तिरस्कार का विषय बन जाता है। परन्तु यदि ईश्वरीय नाम के उतावले और बेमौके प्रयोग में इतनी बुराई है, तो उसके कुकर्मी प्रयोजनों के लिए प्रयोग में और भी अधिक बुराई है, जैसा वे लोग करते हैं जो उसे प्रेतसिद्धि, कोसने, अवैध भूत-झाड़ और अन्य अधर्मी मन्त्रों में लगाते हैं। परन्तु यह आज्ञा विशेष रूप से शपथों के प्रसंग को लक्ष्य करती है, जिनमें ईश्वरीय नाम का विकृत प्रयोग विशेष रूप से घृणित है; और यह वह इसलिए करती है कि हमें हर प्रकार की अपवित्रता से और भी प्रभावशाली रीति से रोक सके। यहाँ जो आज्ञा दी गई है वह परमेश्वर की आराधना और उसके नाम के प्रति देय श्रद्धा से सम्बन्ध रखती है, उस न्याय से नहीं जो मनुष्यों को परस्पर बरतना है—यह इसी से प्रकट है कि आगे दूसरी पटिया में उस झूठी शपथ और झूठी गवाही की निन्दा है जिससे मानव समाज को हानि पहुँचती है, और यदि इस आज्ञा में प्रेम के कर्तव्य का वर्णन होता तो वह पुनरावृत्ति निरर्थक होती। फिर यह भेद के लिए भी आवश्यक है, क्योंकि, जैसा कहा गया, परमेश्वर ने उचित कारण से अपनी व्यवस्था को दो पटियाओं में बाँटा है।

अतः निष्कर्ष यह निकलता है कि परमेश्वर यहाँ अपने ही अधिकार का दावा करता है और अपने पवित्र नाम की रक्षा करता है, परन्तु यह नहीं सिखाता कि मनुष्यों का मनुष्यों के प्रति क्या कर्तव्य है।

23. पहले हमें विचार करना चाहिए कि शपथ क्या है। शपथ परमेश्वर को इस बात का साक्षी ठहराना है कि जो हम कहते हैं वह सत्य है। कोसना तो प्रकट ही परमेश्वर का अपमान है, इसलिए उसे शपथों में गिनना योग्य नहीं। उचित रीति से ली गई शपथ परमेश्वर की आराधना का एक रूप है, यह पवित्रशास्त्र के अनेक खण्डों से प्रकट होता है; जैसे जब यशायाह अश्शूरियों और मिस्रियों के वाचा में सहभागी किए जाने की भविष्यद्वाणी करता है, तब कहता है, “उस दिन मिस्र देश में पाँच नगर होंगे जो कनान की भाषा बोलेंगे और सेनाओं के यहोवा की शपथ खाएँगे” (यशायाह 19:18)। यहाँ यहोवा के नाम की शपथ खाने का अर्थ यह है कि वे धर्म का अंगीकार करेंगे। इसी प्रकार छुड़ानेवाले के राज्य के विस्तार के विषय में कहा गया है, “जो कोई पृथ्वी पर अपने को धन्य कहेगा वह सत्य के परमेश्वर के नाम से अपने को धन्य कहेगा; और जो कोई पृथ्वी पर शपथ खाए वह सत्य के परमेश्वर की शपथ खाएगा” (यशायाह 65:16)। यिर्मयाह में कहा गया है, “यदि वे मेरी प्रजा की चाल चलन यत्न से सीखें, और मेरे नाम की शपथ खाकर कहें, ‘यहोवा जीवित है,’ जैसे उन्होंने मेरी प्रजा को बाल की शपथ खाना सिखाया था, तो वे मेरी प्रजा के बीच बसाए जाएँगे” (यिर्मयाह 12:16)। यहोवा के नाम की दुहाई देकर और उसे साक्षी ठहराकर हम उचित ही अपनी धार्मिक श्रद्धा प्रकट करनेवाले कहे जाते हैं। क्योंकि इस प्रकार हम स्वीकार करते हैं कि वह अनन्त और अटल सत्य है, क्योंकि हम न केवल औरों को छोड़कर उसे सत्य के योग्य साक्षी के रूप में पुकारते हैं, बल्कि उसे उसका एकमात्र प्रमाणकर्ता मानते हैं, जो छिपी बातों को प्रकाश में ला सकता है और हृदयों का जाँचनेवाला है। जब मनुष्यों की गवाही नहीं चलती, तब हम परमेश्वर को साक्षी के रूप में पुकारते हैं, विशेषकर जब प्रमाणित की जानेवाली बात विवेक में छिपी हो। इसी कारण प्रभु उन पर बहुत क्रोधित होता है जो पराए देवताओं की शपथ खाते हैं, और ऐसी शपथ को खुले विद्रोह का प्रमाण समझता है, “तेरे लड़के मुझे छोड़कर उनकी शपथ खाने लगे हैं जो ईश्वर नहीं हैं” (यिर्मयाह 5:7)। इस अपराध की गम्भीरता उस दण्ड से प्रकट होती है जो उसके विरुद्ध घोषित हुआ, “मैं उन्हें नाश करूँगा जो यहोवा की शपथ खाते और मल्कम की भी शपथ खाते हैं” (सपन्याह 1:4, 5)।

24. यह समझकर कि प्रभु चाहता है कि हमारी शपथें परमेश्वर की आराधना का एक रूप हों, हमें और भी सावधान रहना चाहिए कि उनमें आराधना के स्थान पर अपमान, तिरस्कार और निन्दा न हो। उसकी शपथ खाकर झूठ बोलना कोई छोटा अपमान नहीं: इसी कारण व्यवस्था में इसे अपवित्र करना कहा गया है (लैव्यव्यवस्था 19:12)। क्योंकि यदि परमेश्वर से उसका सत्य छीन लिया जाए, तो फिर क्या बचता है? सत्य के बिना वह परमेश्वर हो ही नहीं सकता। परन्तु निश्चय ही उसका सत्य उससे तब छीना जाता है जब उसे झूठ का समर्थक और साक्षी बनाया जाता है। इसी कारण जब यहोशू आकान से सच कहलवाने का यत्न करता है, तो कहता है, “हे मेरे बेटे, इस्राएल के परमेश्वर यहोवा की महिमा कर” (यहोशू 7:19); यह जताते हुए कि जब मनुष्य उसकी झूठी शपथ खाते हैं तो परमेश्वर का भारी अनादर होता है। और यह आश्चर्य की बात नहीं; क्योंकि जहाँ तक उनसे बन पड़ता है, उसके पवित्र नाम पर मानो झूठ का कलंक लगा दिया जाता है। यह कथन-शैली यहूदियों में तब सामान्य थी जब किसी से शपथ ली जाती; यह उस मिलती-जुलती सौगन्ध से प्रकट है जो फरीसियों ने खाई और जो यूहन्ना में दी गई है (यूहन्ना 9:24); पवित्रशास्त्र हमें उस सावधानी की याद दिलाता है जो हमें बरतनी चाहिए, जब वह ऐसे वाक्यांश प्रयोग करता है:—“यहोवा के जीवन की शपथ;” “परमेश्वर मुझ से ऐसा ही, वरन इससे भी बढ़कर करे;” “मैं अपने प्राण की शपथ खाकर परमेश्वर को साक्षी ठहराता हूँ।”204 ऐसे वाक्यांश यह संकेत देते हैं कि हम परमेश्वर को अपने कथन का साक्षी तब तक नहीं ठहरा सकते जब तक झूठ होने की दशा में झूठी शपथ के लिए उसके प्रतिशोध का आह्वान स्वयं पर न करें। 204 1 शमूएल 14:44; 2 राजाओं 5:31; 2 कुरिन्थियों 1:23.

25. परमेश्वर का नाम तब भी साधारण और तुच्छ कर दिया जाता है जब उसे ऐसी शपथों में प्रयोग किया जाता है जो सच्ची होने पर भी अनावश्यक हैं। यह भी उसका नाम व्यर्थ लेना है। इसलिए झूठी शपथ से बचना ही पर्याप्त नहीं, जब तक हम साथ ही यह स्मरण न रखें कि शपथ क्रोध या आनन्द के लिए नहीं, बल्कि आवश्यकता के लिए ठहराई और मानी गई है; और इसलिए जो उसे आवश्यक अवसरों के सिवा किसी और अवसर पर प्रयोग करता है, वह उसका स्वच्छन्द प्रयोग करता है। फिर, आवश्यकता का कोई प्रसंग तब तक नहीं ठहराया जा सकता जब तक धर्म या प्रेम का कोई प्रयोजन सिद्ध न होता हो। आज के दिनों में इस विषय में बड़ा पाप किया जाता है—ऐसा पाप जो इसी कारण और भी असह्य है कि उसकी बारम्बारता के कारण उसे दोष गिनना ही छोड़ दिया गया है, यद्यपि परमेश्वर के न्याय-आसन के सामने वह निश्चय ही तुच्छ नहीं गिना जाता। परमेश्वर का नाम तुच्छ बातचीत में बिना भेद के घुसेड़ देने से सर्वत्र अपवित्र किया जाता है; और इस बुराई की उपेक्षा की जाती है क्योंकि वह लम्बे समय से और ढिठाई से बिना दण्ड के चलती आई है। तो भी प्रभु की आज्ञा बनी हुई है; दण्ड भी बना हुआ है और किसी दिन पूरा होगा। जिन्होंने परमेश्वर का नाम व्यर्थ लिया है उन पर विशेष प्रतिशोध किया जाएगा। उल्लंघन का एक और रूप तब दिखाई देता है जब हम प्रकट अधर्म के साथ अपनी शपथों में परमेश्वर के स्थान पर उसके पवित्र सेवकों को रख देते हैं,205 और इस प्रकार उसके ईश्वरत्व की महिमा उन्हें दे देते हैं। प्रभु ने विशेष आज्ञा से हमसे अपने नाम की शपथ खाने को कहा और विशेष निषेध से दूसरे देवताओं की शपथ खाने से मना किया है, तो यह अकारण नहीं।206 प्रेरित इसी आशय की स्पष्ट गवाही देता है, जब वह कहता है कि “मनुष्य तो अपने से बड़े की शपथ खाया करते हैं,” परन्तु “जब परमेश्वर ने अब्राहम को प्रतिज्ञा दी, तो इसलिए कि और कोई बड़ा न था जिसकी शपथ खाता, उसने अपनी ही शपथ खाई” (इब्रानियों 6:16, 13)।

26. पुनर्बपतिस्मावादी शपथों के इस संयमित प्रयोग से सन्तुष्ट नहीं, और हमारे उद्धारकर्ता के सामान्य निषेध के आधार पर बिना किसी अपवाद के सब शपथों की निन्दा करते हैं, “मैं तुम से कहता हूँ कि कभी शपथ न खाना:” “तुम्हारी बात हाँ की हाँ, या नहीं की नहीं हो; क्योंकि जो कुछ इस से अधिक होता है वह बुराई से होता है” (मत्ती 5:34; याकूब 5:12)। इस प्रकार वे बिना सोचे-समझे मसीह को ठोकर का पत्थर बना देते हैं, उसे पिता के विरोध में खड़ा करते हैं, मानो वह उसके आदेशों को रद्द करने के लिए जगत में उतरा हो। व्यवस्था में सर्वशक्तिमान शपथ को उचित बात मानकर न केवल अनुमति देता है (यही पर्याप्त होता), बल्कि आवश्यकता की दशा में उसकी वास्तव में आज्ञा देता है (निर्गमन 22:11)। फिर मसीह घोषणा करता है कि वह और उसका पिता एक हैं; कि वह केवल वही सुनाता है जिसकी आज्ञा उसे पिता से मिली है; कि उसकी शिक्षा उसकी अपनी नहीं, बल्कि उसकी है जिसने उसे भेजा है (यूहन्ना 10:18, 30; 7:16)। तो फिर? क्या वे परमेश्वर को अपना ही खण्डन करनेवाला ठहराएँगे, कि जिस बात का वह एक समय अनुमोदन और आज्ञा देता है, उसी का वह बाद में निषेध और निन्दा करे? परन्तु चूँकि शपथ खाने के विषय में हमारे उद्धारकर्ता के कथन में कुछ कठिनाई है, इसलिए उस पर थोड़ा विचार कर लेना उचित होगा। तथापि हम यहाँ सच्चे अर्थ तक तब तक कभी नहीं पहुँचेंगे जब तक मसीह के उद्देश्य और जिस विषय की वह चर्चा कर रहा है उस पर ध्यान न दें। उसका उद्देश्य न व्यवस्था को ढीला करना था न घटाना, बल्कि उसके सच्चे और वास्तविक अर्थ को पुनः स्थापित करना था, जो शास्त्रियों और फरीसियों की झूठी व्याख्याओं से बहुत बिगाड़ दिया गया था। यदि हम इस पर ध्यान दें तो हम यह न समझेंगे कि मसीह ने सब शपथों की निन्दा की, बल्कि केवल उन्हीं की जो व्यवस्था के नियम का उल्लंघन करती थीं। स्वयं शपथों से प्रकट है कि लोग यह सोचने के आदी हो गए थे कि झूठी शपथ से बच जाना ही काफ़ी है, जबकि व्यवस्था केवल झूठी शपथ का ही नहीं, बल्कि व्यर्थ और अनावश्यक शपथों का भी निषेध करती है। इसलिए हमारा प्रभु, जो व्यवस्था का सर्वोत्तम व्याख्याकार है, उन्हें स्मरण दिलाता है कि पाप केवल झूठी शपथ में ही नहीं, शपथ खाने में भी है। शपथ खाने में कैसे? अर्थात् व्यर्थ शपथ खाने में। परन्तु जो शपथें व्यवस्था से प्रमाणित हैं, उन्हें वह सुरक्षित और स्वतन्त्र छोड़ देता है। जो शपथों की निन्दा करते हैं वे समझते हैं कि उनका तर्क अकाट्य है जब वे कभी नहीं इस अभिव्यक्ति पर अड़ जाते हैं। यह अभिव्यक्ति शपथ खाना शब्द पर नहीं, बल्कि आगे जोड़े गए शपथ-रूपों पर लागू होती है। क्योंकि भूल का एक अंश यह था कि वे समझते थे कि जब वे स्वर्ग और पृथ्वी की शपथ खाते हैं तो परमेश्वर के नाम को छूते नहीं। इसलिए प्रभु टालमटोल के मुख्य स्रोत को काटकर उन्हें सब बहानों से वंचित कर देता है, और चेतावनी देता है कि परमेश्वर का नाम छिपाने और स्वर्ग तथा पृथ्वी की दुहाई देने से वे दोष से नहीं बचते। क्योंकि यहाँ प्रसंगवश यह देखना चाहिए कि यद्यपि परमेश्वर का नाम प्रकट नहीं किया जाता, तथापि अप्रत्यक्ष रूपों का प्रयोग करते हुए मनुष्य उसी की शपथ खाते हैं, जैसे जब वे जीवन के प्रकाश की, अपने खाए हुए रोटी की, अपने बपतिस्मा की, या अपने प्रति परमेश्वर की उदारता के किसी और प्रमाण की शपथ खाते हैं। कुछ लोग भूल से सोचते हैं कि हमारा उद्धारकर्ता उस खण्ड में स्वर्ग, पृथ्वी और यरूशलेम की शपथ खाने से मना करके अन्धविश्वास को डाँटता है। वह तो बल्कि उन लोगों की कुतर्क-भरी चतुराई का खण्डन करता है जो अप्रत्यक्ष शपथें व्यर्थ में उच्चारित करने को कुछ नहीं समझते थे, यह कल्पना करके कि इस प्रकार वे परमेश्वर के पवित्र नाम को बचा रहे हैं, जबकि वह नाम उसकी प्रत्येक दया पर अंकित है। बात तब भिन्न है जब कोई जीवित या मृत मनुष्य, या कोई स्वर्गदूत, परमेश्वर के स्थान पर रखा जाता है, जैसे अन्यजाति राष्ट्रों में चापलूसी से गढ़े गए उस नीच रूप में, “राजा के प्राण या प्रतिभा की सौगन्ध”; क्योंकि इस दशा में झूठा देवत्व-आरोपण एकमात्र परमेश्वर की महिमा को धुँधला और क्षीण कर देता है। परन्तु जब मंशा केवल इतनी हो कि परमेश्वर के पवित्र नाम की दुहाई देकर कही हुई बात की पुष्टि की जाए, चाहे वह अप्रत्यक्ष रूप से ही क्यों न की जाए, तब भी सब तुच्छ शपथों से उसकी महिमा का अपमान होता है। मसीह जब कहता है “कभी शपथ न खाना” तो इस दुरुपयोग से हर व्यर्थ बहाना छीन लेता है।

205 फ्रेंच में जोड़ा गया है, “jurans par S. Jaques ou S. Antoine;”—सन्त याकूब या सन्त अन्तोनी की शपथ खाते हुए।

206 निर्गमन 23:13; व्यवस्थाविवरण 6:13; 10:20; इब्रानियों 6:13. इसी आशय का वह खण्ड भी है जिसमें याकूब हमारे उद्धारकर्ता के ऊपर उद्धृत शब्दों का प्रयोग करता है (याकूब 5:12)। क्योंकि यह उतावली शपथ जगत में सदा से प्रचलित रही है, यद्यपि वह परमेश्वर के नाम को अपवित्र करना है। यदि आप “कभी नहीं” शब्दों को स्वयं कर्म से जोड़ें, मानो बिना अपवाद हर शपथ अवैध हो, तो उस व्याख्या का क्या प्रयोजन रह जाएगा जो तुरन्त आगे आती है—न स्वर्ग की, न पृथ्वी की, आदि? ये शब्द स्पष्ट करते हैं कि लक्ष्य उन कुतर्कों का सामना करना था जिनसे यहूदी समझते थे कि वे अपना दोष घटा सकते हैं।

27. अब हर सुविचारी व्यक्ति को देखना चाहिए कि उस खण्ड में हमारे प्रभु ने केवल उन्हीं शपथों की निन्दा की जो व्यवस्था द्वारा निषिद्ध थीं। क्योंकि जिसने अपने जीवन में उस सिद्धता का नमूना दिखाया जो उसने सिखाई, उसने अवसर माँगने पर शपथों पर आपत्ति नहीं की; और चेलों ने, जो निश्चय ही सब बातों में अपने स्वामी की आज्ञा मानते थे, यही नियम अपनाया। कौन कहने का साहस करेगा कि यदि शपथ बिल्कुल निषिद्ध होती तो पौलुस शपथ खाता (रोमियों 1:9; 2 कुरिन्थियों 1:23)? परन्तु जब अवसर माँगता है तो वह बिना किसी संकोच के सौगन्ध देता है, और कभी-कभी तो अपने ऊपर शाप भी बुलाता है। फिर भी प्रश्न का अभी निपटारा नहीं हुआ। क्योंकि कुछ लोग सोचते हैं कि निषेध से केवल सार्वजनिक शपथें छूट पाती हैं, जैसी हाकिम हमें दिलाता है, या स्वतन्त्र राज्य सन्धियों की पुष्टि में करते हैं, या प्रजा अपने शासक के प्रति राजभक्ति की शपथ में लेती है, या सिपाही सैनिक शपथ में लेता है, और ऐसी ही अन्य। इसी श्रेणी में वे (और ठीक ही) पौलुस के लेखों की उन घोषणाओं को रखते हैं जो सुसमाचार की गरिमा की पुष्टि करती हैं; क्योंकि प्रेरित अपने पद का निर्वाह करते समय निजी व्यक्ति नहीं, बल्कि परमेश्वर के सार्वजनिक सेवक थे। मैं निश्चय ही इससे इनकार नहीं करता कि ऐसी शपथें सबसे सुरक्षित हैं क्योंकि उन्हें पवित्रशास्त्र के खण्डों का सबसे सुदृढ़ समर्थन प्राप्त है। हाकिम को आज्ञा दी गई है कि सन्देहपूर्ण मामले में गवाह को शपथ दिलाए; और गवाह को भी बदले में शपथ पर उत्तर देना है; और एक प्रेरित कहता है कि इस रीति से सब झगड़े का अन्त हो जाता है (इब्रानियों 6:16)। इस आज्ञा में दोनों पक्ष पूर्णतः स्वीकृत हैं। बल्कि हम देखते हैं कि प्राचीन अन्यजातियों में सार्वजनिक और गम्भीर शपथ का बड़ा आदर था, जबकि वे साधारण शपथें जो बिना भेद के खाई जाती थीं, बहुत कम या कुछ भी मूल्यवान न समझी जाती थीं, मानो वे सोचते हों कि उनके विषय में परमेश्वर बीच में नहीं आता। निजी शपथें, जब आवश्यक अवसरों पर संयम, पवित्रता और श्रद्धा से खाई जाएँ, तो उनकी निन्दा करना जोखिम भरा है, क्योंकि वे तर्क और उदाहरण से समर्थित हैं। क्योंकि यदि निजी व्यक्तियों को किसी गम्भीर और भारी मामले में परमेश्वर की दुहाई न्यायी के रूप में देने की अनुमति है, तो साक्षी के रूप में देने की अनुमति तो और भी अधिक है। आपका भाई आप पर विश्वासघात का आरोप लगाता है। आप, प्रेम के कर्तव्यों से बँधे होने के कारण, उस आरोप से अपने को निर्दोष ठहराने का यत्न करते हैं। वह किसी भी प्रकार सन्तुष्ट नहीं होता। यदि उसकी हठीली द्वेष-भावना के कारण आपका सुनाम जोखिम में पड़ जाए, तो आप बिना अपराध के परमेश्वर के न्याय की दुहाई दे सकते हैं, कि वह समय आने पर आपकी निर्दोषता प्रकट करे। यदि शब्दों को तौला जाए, तो पाया जाएगा कि उसे साक्षी होने के लिए पुकारना छोटी बात है; और इसलिए मैं नहीं देखता कि ऐसा करना अवैध कैसे कहा जा सकता है। और उदाहरणों की भी कमी नहीं। यदि यह बहाना किया जाए कि जो शपथ अब्राहम और इसहाक ने अबीमेलेक के साथ खाई वह सार्वजनिक प्रकृति की थी, तो वह शपथ जिससे याकूब और लाबान ने आपसी सन्धि में अपने को बाँधा, निजी थी। बोअज़ ने निजी मनुष्य होते हुए भी रूत से विवाह की अपनी प्रतिज्ञा इसी रीति से पक्की की। ओबद्याह ने भी, जो धर्मी और परमेश्वर का भय माननेवाला था, निजी व्यक्ति होकर, एलिय्याह को मनाने का यत्न करते समय शपथ के साथ दृढ़ता से कहा।207 अतः मेरा मत है कि इससे उत्तम कोई नियम नहीं कि हम अपनी शपथों को ऐसा नियन्त्रित रखें कि वे न उतावली, न तुच्छ, न बिना भेद की, न क्रोधपूर्ण हों, बल्कि किसी उचित आवश्यकता की सेवा में लगें; अर्थात् परमेश्वर की महिमा का समर्थन करने या भाई की उन्नति करने के लिए। यही इस आज्ञा का लक्ष्य है।

चौथी आज्ञा।

सब्त के दिन को पवित्र मानने के लिए स्मरण रखना। छः दिन तक तू परिश्रम करके अपना सब काम काज करना: पर सातवाँ दिन तेरे परमेश्वर यहोवा के लिए विश्रामदिन है। उसमें तू किसी प्रकार का काम न करना, आदि।

28. इस आज्ञा का आशय यह है कि अपनी ही भावनाओं और कामों के प्रति मरकर हम परमेश्वर के राज्य का ध्यान करें, और ऐसे ध्यान के लिए उन साधनों का सहारा लें जिन्हें उसने ठहराया है। परन्तु चूँकि यह आज्ञा औरों से अलग विशेष परिस्थितियों में स्थित है, इसलिए इसकी व्याख्या की रीति कुछ भिन्न होनी चाहिए। आरम्भिक मसीही लेखक इसे प्रतीकात्मक कहने के आदी हैं, क्योंकि इसमें एक ऐसे दिन का बाहरी पालन है जो मसीह के आने पर अन्य प्रतीकों के साथ रद्द हो गया। यह सच तो है, परन्तु इससे आधी बात अछूती रह जाती है। इसलिए व्याख्या के लिए हमें गहराई में देखना चाहिए, और उन तीन बातों पर ध्यान देना चाहिए जिनमें मुझे इस आज्ञा का पालन निहित प्रतीत होता है। पहले, सातवें दिन के विश्राम के अन्तर्गत दिव्य व्यवस्था-दाता का अभिप्राय इस्राएल की प्रजा को उस आत्मिक विश्राम का प्रतीक देना था जिससे विश्वासी अपने कामों से विश्राम लें और परमेश्वर को अपने भीतर काम करने दें। दूसरे, उसका अभिप्राय यह था कि एक निश्चित दिन हो जिसमें वे व्यवस्था सुनने और धार्मिक विधियाँ पूरी करने के लिए इकट्ठे हों, या कम से कम जिसे वे विशेष रूप से उसके कामों के ध्यान में लगाएँ और इस प्रकार भक्ति में प्रशिक्षित हों। तीसरे, उसका अभिप्राय यह था कि दास, और वे जो दूसरों के अधिकार में जीते हैं, एक दिन के विश्राम की छूट पाएँ और इस प्रकार परिश्रम से कुछ अवकाश पाएँ।

207 उत्पत्ति 21:24; 26:31; 31:53; रूत 3:13; 1 राजाओं 18:10.

29. हमें अनेक खण्डों में208 सिखाया गया है कि आत्मिक विश्राम की यह छाया सब्त में प्रमुख स्थान रखती थी। सचमुच कोई ऐसी आज्ञा नहीं जिसके पालन पर सर्वशक्तिमान अधिक कठोरता से बल देता हो। जब वह भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा यह जताना चाहता है कि धर्म पूरी तरह उलट दिया गया है, तो वह शिकायत करता है कि उसके विश्रामदिन अपवित्र किए गए, तोड़े गए, माने नहीं गए, पवित्र नहीं ठहराए गए; मानो उसकी उपेक्षा के बाद कोई ऐसी बात बची ही न हो जिसमें उसका आदर हो सके। उसके पालन की वह अत्यन्त ऊँचे शब्दों में प्रशंसा करता है, और इसी कारण परमेश्वर के अन्य विशेषाधिकारों के बीच विश्वासी सब्त के प्रकाशन को असाधारण मूल्य देते हैं। नहेम्याह में लेवीय सार्वजनिक सभा में यों कहते हैं: “तू ने उन्हें अपने पवित्र विश्रामदिन का ज्ञान दिया, और अपने दास मूसा के द्वारा उन्हें आज्ञाएँ, विधियाँ और व्यवस्था दीं।” आप देखते हैं कि व्यवस्था की सब आज्ञाओं में उसका कितना अनुपम सम्मान है। यह सब उस भेद की गरिमा को ऊँचा करने की ओर ले जाता है, जो मूसा और यहेजकेल के द्वारा अत्यन्त उत्तम रीति से व्यक्त हुआ है। इसी प्रकार निर्गमन में: “निश्चय तुम मेरे विश्रामदिनों को मानना, क्योंकि तुम्हारे और मेरे बीच पीढ़ी-पीढ़ी तक यह एक चिह्न ठहरा है, जिससे तुम जानो कि मैं यहोवा तुम्हारा पवित्र करनेवाला हूँ। इसलिए तुम विश्रामदिन को मानना, क्योंकि वह तुम्हारे लिए पवित्र है; जो कोई उसे अशुद्ध करे वह निश्चय मार डाला जाए; जो कोई उस दिन कुछ काम करे वह प्राणी अपने लोगों में से नाश किया जाए। छः दिन काम काज किया जाए, पर सातवाँ दिन परमविश्राम का और यहोवा के लिए पवित्र है; जो कोई विश्रामदिन को काम करे वह निश्चय मार डाला जाए। इसलिए इस्राएली विश्रामदिन को माना करें, और पीढ़ी-पीढ़ी तक उसे सदा की वाचा जानकर मानें। वह मेरे और इस्राएलियों के बीच सदा एक चिह्न रहेगा” (निर्गमन 31:13–17)। यहेजकेल इससे भी अधिक विस्तार से कहता है, परन्तु उसके कथन का सार यह है कि सब्त एक चिह्न है जिससे इस्राएल जान सके कि परमेश्वर उनका पवित्र करनेवाला है। यदि हमारा पवित्रीकरण अपनी इच्छा को मारने में निहित है, तो बाहरी चिह्न और चिह्नित वस्तु के बीच का साम्य अत्यन्त उपयुक्त है। हमें पूर्णतः विश्राम करना चाहिए, ताकि परमेश्वर हमारे भीतर काम करे; हमें अपनी इच्छा त्याग देनी, अपना हृदय सौंप देना और शरीर की सब अभिलाषाओं को छोड़ देना चाहिए। संक्षेप में, हमें अपने मन के सब कार्यों से रुक जाना चाहिए, ताकि परमेश्वर हमारे भीतर काम करे और हम उसमें विश्राम पाएँ, जैसा प्रेरित भी सिखाता है (इब्रानियों 3:13; 4:3, 9)।

30. इस पूर्ण विराम को यहूदियों के सामने सात में से एक दिन के पालन से दर्शाया गया, जिसकी अधिक श्रद्धा से पालना हो सके, इसलिए प्रभु ने उसे अपने ही उदाहरण से अनुशंसित किया। क्योंकि मनुष्य के उत्साह के लिए यह जानना कोई छोटी प्रेरणा नहीं कि वह अपने सृष्टिकर्ता का अनुकरण करने में लगा है। यदि कोई सात की संख्या में, जो पवित्रशास्त्र में सिद्धता की संख्या है, कोई गुप्त अर्थ ढूँढ़े, तो सम्भव है कि वह अनन्तता को सूचित करने के लिए बिना कारण नहीं चुनी गई। इसी के अनुसार मूसा दिन और रात के क्रम का अपना वर्णन उसी दिन पूरा करता है जिस दिन वह बताता है कि प्रभु अपने कामों से विश्राम पा गया। इस संख्या का एक और सम्भाव्य कारण यह हो सकता है कि प्रभु का अभिप्राय था कि सब्त अन्तिम दिन के आने से पहले कभी पूरा न हो।

208 गिनती 13:22; यहेजकेल 20:12; 22:8; 23:38; यिर्मयाह 27:21, 22, 27; यशायाह 55:2; नहेम्याह 9:14. हम यहाँ उसमें अपना धन्य विश्राम आरम्भ करते हैं और प्रतिदिन उसमें नई प्रगति करते हैं; परन्तु क्योंकि हमें अब भी शरीर के साथ निरन्तर युद्ध करना है, इसलिए वह तब तक पूर्ण नहीं होगा जब तक यशायाह की यह भविष्यद्वाणी पूरी न हो जाए: “एक नए चाँद से दूसरे नए चाँद तक, और एक विश्रामदिन से दूसरे विश्रामदिन तक, सब प्राणी मेरे सामने दण्डवत् करने आया करेंगे, यहोवा का यही वचन है” (यशायाह 66:23); अर्थात् जब परमेश्वर “सब में सब कुछ” होगा (1 कुरिन्थियों 15:28)। इसलिए ऐसा प्रतीत हो सकता है कि प्रभु ने सातवें दिन के द्वारा अपने लोगों के लिए अन्तिम दिन पर अपने सब्त की भावी सिद्धता का चित्र खींचा, ताकि सब्त के निरन्तर ध्यान से वे अपने सारे जीवन भर इस सिद्धता की आकांक्षा करें।

31. यदि संख्या के विषय में ये बातें किसी को कुछ खींची-तानी लगें, तो मुझे इस पर कोई आपत्ति नहीं कि वे इसे अधिक सरल रूप में लें: कि प्रभु ने एक निश्चित दिन ठहराया जिसमें उसके लोग व्यवस्था के संरक्षण में आत्मिक विश्राम का निरन्तर ध्यान करने का प्रशिक्षण पाएँ, और सातवाँ दिन इसलिए चुना कि या तो उसने पहले से देख लिया कि वह पर्याप्त होगा, या इसलिए कि उसका अपना उदाहरण प्रबल प्रेरणा का काम करे; या कम से कम मनुष्यों को स्मरण दिलाने के लिए कि सब्त इसी उद्देश्य से ठहराया गया था कि उन्हें उनके सृष्टिकर्ता के अनुरूप बनाए। इनमें से कौन अपनाया जाए, यह बहुत महत्त्व की बात नहीं, बशर्ते हम उस मुख्य बात को आँख से ओझल न करें जो चित्रित है—अर्थात् अपने कामों से निरन्तर विश्राम का भेद। इसी पर मनन करने के लिए भविष्यद्वक्ता यहूदियों को समय-समय पर बुलाते रहे, ताकि वे कामकाज से शारीरिक रुकावट को पर्याप्त न समझ बैठें। ऊपर उद्धृत खण्डों के अतिरिक्त यह भी है: “यदि तू विश्रामदिन को अशुद्ध करने से, और मेरे पवित्र दिन में अपनी इच्छा पूरी करने से अपना पाँव रोके; और विश्रामदिन को आनन्द का दिन और यहोवा का पवित्र और आदरयोग्य दिन कहे; और उसका आदर करके अपने मार्गों पर न चले, न अपनी इच्छा पूरी करे, न अपनी बातें करे; तो तू यहोवा के कारण सुखी होगा” (यशायाह 58:13, 14)। फिर भी इसमें कोई सन्देह नहीं कि हमारे प्रभु यीशु मसीह के आगमन पर इस आज्ञा का विधि-सम्बन्धी भाग रद्द हो गया। वही सत्य है, जिसकी उपस्थिति में सब प्रतीक मिट जाते हैं; वही देह है, जिसे देखकर छायाएँ लोप हो जाती हैं। मैं कहता हूँ कि वही सब्त की सच्ची पूर्ति है: “हम उसके साथ बपतिस्मा के द्वारा मृत्यु में गाड़े गए, ताकि जैसे मसीह पिता की महिमा के द्वारा मरे हुओं में से जिलाया गया, वैसे ही हम भी नए जीवन की सी चाल चलें” (रोमियों 6:4)। इसीलिए, जैसा प्रेरित अन्यत्र कहता है, “इसलिए खाने-पीने या पर्व या नए चाँद या सब्त के विषय में कोई तुम्हें दोषी न ठहराए; ये आनेवाली बातों की छाया हैं, पर देह मसीह की है” (कुलुस्सियों 2:16, 17); देह से उसका अर्थ सत्य का सम्पूर्ण सार है, जैसा उस खण्ड में भली-भाँति समझाया गया है। यह एक दिन से सन्तुष्ट नहीं होता, बल्कि हमारे जीवन का सारा क्रम माँगता है, जब तक हम अपने प्रति पूर्णतः मरकर परमेश्वर के जीवन से भर न जाएँ। इसलिए मसीहियों को दिनों के अन्धविश्वासी पालन से कोई सरोकार नहीं होना चाहिए।

32. शेष दो बातों को प्राचीन छायाओं में नहीं गिनना चाहिए, वे तो हर युग के अनुकूल हैं। सब्त के रद्द हो जाने पर भी हमारे बीच अब भी अवसर है, पहले, निश्चित दिनों में वचन सुनने, रहस्यमय रोटी तोड़ने और सार्वजनिक प्रार्थना के लिए इकट्ठे होने का; और दूसरे, अपने सेवकों और मज़दूरों को परिश्रम से विश्राम देने का। इसमें सन्देह नहीं हो सकता कि प्रभु ने सब्त की आज्ञा में दोनों का प्रबन्ध किया था। पहली बात यहूदियों के व्यवहार मात्र से भली-भाँति प्रमाणित होती है। दूसरी को मूसा ने व्यवस्थाविवरण में इन शब्दों में व्यक्त किया है: “सातवाँ दिन तेरे परमेश्वर यहोवा के लिए विश्रामदिन है: उसमें न तू, न तेरा बेटा, न तेरी बेटी, न तेरा दास, न तेरी दासी कोई काम करे;—ताकि तेरा दास और तेरी दासी भी तेरे समान विश्राम करें” (व्यवस्थाविवरण 5:14)। इसी प्रकार निर्गमन में, “ताकि तेरा बैल और तेरा गदहा विश्राम करें, और तेरी दासी का बेटा और परदेशी भी ताज़ा दम हो जाएँ” (निर्गमन 23:12)। कौन इनकार कर सकता है कि दोनों बातें जैसे यहूदियों पर वैसे ही हम पर भी लागू होती हैं? धार्मिक सभाओं की हमें परमेश्वर के वचन से आज्ञा मिली है; उनकी आवश्यकता का अनुभव स्वयं पर्याप्त प्रमाण देता है। परन्तु जब तक ये सभाएँ निश्चित न हों, और उनके लिए दिन ठहराए न गए हों, वे कैसे हो सकती हैं? प्रेरित के शब्दों में हमें सब कुछ शिष्टता और क्रम से करना चाहिए (1 कुरिन्थियों 14:40)। परन्तु इस व्यवस्थित प्रबन्ध के बिना शिष्टता और क्रम को बनाए रखना इतना असम्भव है कि इसके हट जाने से तुरन्त कलीसिया में उपद्रव और विनाश आ जाएगा। परन्तु यदि जिस कारण से प्रभु ने यहूदियों के लिए सब्त ठहराया वह हम पर भी समान रूप से लागू होता है, तो कोई यह नहीं कह सकता कि यह ऐसी बात है जिससे हमारा कोई सरोकार नहीं। हमारे अत्यन्त दूरदर्शी और कृपालु पिता ने हमारी आवश्यकताओं का प्रबन्ध भी वैसा ही करना चाहा जैसा यहूदियों की आवश्यकताओं का। कोई पूछ सकता है कि हम प्रतिदिन सभा क्यों नहीं करते और इस प्रकार दिनों का भेद क्यों नहीं मिटा देते? काश हमें यह अधिकार मिला होता! आत्मिक ज्ञान निश्चय ही इस योग्य है कि हर दिन का कुछ भाग उसे दिया जाए। परन्तु यदि बहुतों की दुर्बलता के कारण प्रतिदिन सभाएँ नहीं की जा सकतीं, और प्रेम हमें उनसे अधिक की माँग करने नहीं देता, तो हम उस नियम को क्यों न अपनाएँ जो परमेश्वर की इच्छा ने स्पष्ट रूप से हम पर ठहराया है?

33. मुझे इस पर कुछ और देर तक ठहरना पड़ता है क्योंकि कुछ अशान्त आत्माएँ अब प्रभु के दिन के पालन के विषय में शोर मचा रही हैं। वे शिकायत करती हैं कि मसीही लोगों को यहूदी मत में प्रशिक्षित किया जाता है, क्योंकि दिनों का कुछ पालन बना रखा गया है। मेरा उत्तर यह है कि हम उन दिनों का पालन यहूदी मत के बिना करते हैं, क्योंकि इस विषय में हम यहूदियों से बहुत भिन्न हैं। हम उसे अत्यन्त सूक्ष्म औपचारिकता के साथ ऐसी विधि के रूप में नहीं मनाते जिससे हम कल्पना करें कि कोई आत्मिक भेद प्रतीक रूप में दर्शाया गया है, बल्कि हम उसे कलीसिया में क्रम बनाए रखने के आवश्यक उपाय के रूप में अपनाते हैं। पौलुस हमें बताता है कि मसीहियों को उसके पालन के विषय में दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए, क्योंकि वह आनेवाली बात की छाया है (कुलुस्सियों 2:16); और इसी कारण वह यह भय प्रकट करता है कि गलातियों के बीच उसका परिश्रम कहीं व्यर्थ न ठहरे, क्योंकि वे अब भी दिनों को मानते थे (गलातियों 4:10, 11)। और वह रोमियों से कहता है कि एक दिन को दूसरे से भिन्न ठहराना अन्धविश्वास है (रोमियों 14:5)। परन्तु उन अशान्त मनुष्यों को छोड़कर कौन नहीं देखता कि प्रेरित किस पालन की बात करता है? वे लोग उस व्यवस्थित और कलीसियाई प्रबन्ध का कोई ध्यान नहीं रखते थे,209 बल्कि दिनों को आत्मिक बातों के प्रतीक के रूप में बनाए रखकर उतने ही अंश में मसीह की महिमा और सुसमाचार के प्रकाश को धुँधला करते थे। वे हाथ के परिश्रम से इसलिए नहीं रुकते थे कि वह पवित्र अध्ययन और ध्यान में बाधा डालता है, बल्कि एक प्रकार की धार्मिक विधि के रूप में; क्योंकि वे सपना देखते थे कि परिश्रम से रुककर वे उन भेदों की उपासना कर रहे हैं जो प्राचीन काल से उन्हें सौंपे गए थे। मैं कहता हूँ कि प्रेरित दिनों के इसी उलटे पालन के विरुद्ध गरजता है, उस वैध चुनाव के विरुद्ध नहीं जो मसीही समाज की शान्ति की सेवा करता है। क्योंकि उसके द्वारा स्थापित कलीसियाओं में सब्त इसी प्रयोग के लिए रखा गया था। वह कुरिन्थियों से कहता है कि यरूशलेम में अपने भाइयों की सहायता के लिए चन्दा इकट्ठा करने के लिए सप्ताह का पहला दिन अलग रखो (1 कुरिन्थियों 16:2)। यदि अन्धविश्वास का डर है, तो यहूदी सब्त के पालन में प्रभु के दिन के पालन से, जैसा अब मसीही करते हैं, अधिक संकट था। अन्धविश्वास को उखाड़ना उचित था, इसलिए यहूदी पवित्र दिन रद्द किया गया; और कलीसिया में शिष्टता, क्रम और शान्ति बनाए रखने के लिए जो आवश्यक था, उसके लिए दूसरा दिन ठहराया गया।

209 “Finem istum politicum et ecclesiasticum ordinem.” फ्रेंच में, “la police et ordre en l’Eglise;” अर्थात् कलीसिया में व्यवस्था और क्रम।

34. परन्तु आरम्भिक मसीहियों ने जिसे हम प्रभु का दिन कहते हैं उसे सब्त के स्थान पर बिना कारण नहीं रखा। हमारे प्रभु का पुनरुत्थान उस सच्चे विश्राम का अन्त और पूर्ति है जिसका प्राचीन सब्त प्रतीक था; इसलिए यह दिन, जिसके द्वारा प्रतीक रद्द हुए, मसीहियों को छायारूप विधि से चिपके रहने के विरुद्ध चेतावनी देने का काम करता है। मैं सात की संख्या से इतना नहीं चिपका हूँ कि कलीसिया को उसकी दासता में डालूँ, और न मैं उन कलीसियाओं की निन्दा करता हूँ जो अन्य पवित्र दिनों में अपनी सभाएँ करती हैं, बशर्ते वे अन्धविश्वास से सावधान रहें। वे ऐसा तब करेंगी जब उन दिनों का प्रयोग केवल अनुशासन और नियमित क्रम के पालन के लिए करें। सारांश यों दिया जा सकता है: जैसे सत्य यहूदियों को प्रतीक रूप में दिया गया, वैसे ही हमें बिना आकृति के दिया गया है; पहले, ताकि अपने सारे जीवन भर हम अपने कामों से निरन्तर विश्राम का लक्ष्य रखें, कि प्रभु अपने आत्मा के द्वारा हमारे भीतर काम करे; दूसरे, कि हर व्यक्ति, जैसा उसे अवसर मिले, निजी रूप में परमेश्वर के कामों के भक्तिपूर्ण ध्यान में परिश्रम से लगे, और साथ ही सब लोग वचन सुनने, संस्कारों के संचालन और सार्वजनिक प्रार्थना के लिए कलीसिया द्वारा ठहराए गए वैध क्रम का पालन करें; और तीसरे, कि जो हमारे अधीन हैं उन्हें दबाने से हम बचें। इस प्रकार हम उन झूठे भविष्यद्वक्ताओं की बकवास से छूट जाते हैं जिन्होंने बाद के समयों में लोगों में यहूदी विचार भर दिए, यह कहते हुए कि आज्ञा में से केवल विधि-सम्बन्धी भाग रद्द हुआ है,210 (जिसे वे अपनी भाषा में सातवें दिन का कर निर्धारण कहते हैं), जबकि नैतिक भाग बना हुआ है—अर्थात् सात में से एक दिन का पालन।211 परन्तु यह यहूदियों का उपहास करने के सिवा और कुछ नहीं, कि दिन बदल दिया जाए, फिर भी मन में उसे वही पवित्रता दी जाए; इस प्रकार दिनों का वही प्रतीकात्मक भेद बनाए रखा जाए जो यहूदियों में था। और सचमुच हम देखते हैं कि उन्होंने ऐसे सिद्धान्त से क्या लाभ उठाया है। जो अपने विधानों से चिपके रहते हैं वे सब्तवाद के स्थूल और शारीरिक अन्धविश्वास में यहूदियों से तीन गुना आगे निकल गए हैं; इसलिए जो झिड़कियाँ हम यशायाह में पढ़ते हैं (यशायाह 1:13; 58:13) वे आज के लोगों पर212 उतनी ही लागू होती हैं जितनी उन पर जिनसे भविष्यद्वक्ता ने ये बातें कही थीं। फिर भी हमें सामान्य सिद्धान्त पर ध्यान देने में सावधान रहना चाहिए—अर्थात् कि धर्म हमारे बीच न खोए और न मुरझाए, इसके लिए हमें अपनी धार्मिक सभाओं में परिश्रम से उपस्थित रहना और उन बाहरी सहायताओं का उचित लाभ उठाना चाहिए जो परमेश्वर की आराधना को बढ़ावा देती हैं।

210 इस स्वतन्त्रता के विषय में देखिए Socrates, Hist. Trip. Lib. 9 c. 38.

211 फ्रेंच में, “ne discernans entre le Dimanche et le Sabbath autrement, sinon que le septiéme jour estoit abrogé qu’on gardoit pour lors, mais qu’il on faloit, neantmoins garder un;”—रविवार और सब्त में इसके सिवा कोई और भेद न करना कि सातवाँ दिन, जो तब तक माना जाता था, रद्द हो गया, परन्तु फिर भी कोई एक दिन तो अवश्य मानना चाहिए।

212 फ्रेंच में, “leur conviendroyent mieux;”—उन पर और अधिक लागू होंगी।

पाँचवीं आज्ञा।

अपने पिता और अपनी माता का आदर करना, जिससे जो देश तेरा परमेश्वर यहोवा तुझे देता है उसमें तू बहुत दिन तक रहने पाए।

35. इस आज्ञा का उद्देश्य यह है कि चूँकि प्रभु अपने ही ठहराए विधान के बने रहने से प्रसन्न होता है, इसलिए उसके ठहराए गए पद-क्रम की मर्यादा अटूट रखी जाए। अतः आज्ञा का सार यह होगा कि जिन्हें प्रभु ने हमारे ऊपर ठहराया है, उनकी ओर हम आदर, कृतज्ञता और आज्ञाकारिता प्रकट करते हुए दृष्टि उठाएँ। इससे यह निकलता है कि तिरस्कार, कृतघ्नता या अनाज्ञाकारिता की हर बात निषिद्ध है। क्योंकि पवित्रशास्त्र में आदर शब्द का इतना ही विस्तृत अर्थ है। इसलिए जब प्रेरित कहता है, “जो प्राचीन अच्छी रीति से अगुआई करते हैं, वे दो गुने आदर के योग्य समझे जाएँ” (1 तीमुथियुस 5:17), तो वह केवल उस श्रद्धा की बात नहीं करता जो उनका हक़ है, बल्कि उस प्रतिफल की भी जिसके उनकी सेवा अधिकारी है। परन्तु चूँकि अधीन होने की यह आज्ञा मानव मन की हठीलेपन के बहुत विरुद्ध है (जो महत्त्वाकांक्षी लालसाओं से फूलकर मुश्किल से ही अधीन होना स्वीकार करता है), इसलिए वह श्रेष्ठता जो सबसे आकर्षक और सबसे कम खटकनेवाली है, एक ऐसे उदाहरण के रूप में रखी गई है जो हमारे मनों को नरम करके अधीनता की आदतों की ओर झुकाए। उस अधीनता से जो सबसे सरलता से सही जाती है, प्रभु हमें धीरे-धीरे हर प्रकार की वैध अधीनता का अभ्यस्त बनाता है, क्योंकि सब पर एक ही सिद्धान्त शासन करता है। क्योंकि जिन्हें वह ऊँचे पदों पर उठाता है उन्हें अपना अधिकार उतना ही देता है जितना उनके पद को बनाए रखने के लिए आवश्यक है। पिता, परमेश्वर और प्रभु की उपाधियाँ अकेले उसी में मिलती हैं, इसलिए जब भी उनमें से कोई उल्लिखित हो, हमारा मन उसी श्रद्धा के भाव से प्रभावित होना चाहिए। इसलिए जिन्हें वह ऐसी उपाधियाँ देता है, उन्हें अपनी तेजस्विता की किसी छोटी चिंगारी से विशिष्ट करता है, ताकि वे अपने-अपने स्थान में आदर के अधिकारी हों। इसी रीति से हमें मानना चाहिए कि हमारे सांसारिक पिता में कुछ दिव्य स्वभाव है, क्योंकि उसके दिव्य उपाधि धारण करने का कोई कारण है; और जो हमारा राजकुमार और शासक है वह परमेश्वर के साथ आदर की किसी सहभागिता में लिया गया है।

36. इसलिए हमें इसमें कोई सन्देह नहीं होना चाहिए कि प्रभु यहाँ यह सार्वभौमिक नियम ठहराता है—अर्थात् यह जानते हुए कि प्रत्येक व्यक्ति उसकी नियुक्ति से हमारे ऊपर ठहराया गया है, हम उसका आदर, उसके प्रति कृतज्ञता, आज्ञाकारिता और अपनी शक्ति में हर कर्तव्य निभाएँ। और इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता कि जिन पर यह आदर रखा गया है वे योग्य हैं या नहीं। वे जैसे भी हों, सर्वशक्तिमान उन्हें उनका पद देकर दिखाता है कि वह चाहता है कि उनका आदर हो। आज्ञा विशेष रूप से उनके प्रति देय श्रद्धा का उल्लेख करती है जिनसे हमें अपना अस्तित्व मिला है। यह तो स्वयं प्रकृति को भी कुछ हद तक हमें सिखाना चाहिए। क्योंकि वे मनुष्य नहीं, राक्षस हैं जो चिड़चिड़ेपन और अपमान से पिता के अधिकार का उल्लंघन करते हैं। इसी कारण प्रभु उन सब को जो अपने माता-पिता से विद्रोह करते हैं, मार डालने का आदेश देता है, क्योंकि वे, मानो, प्रकाश के योग्य ही नहीं, जो उन्हें जिनके कारण वे उसे देखते हैं, कोई आदर नहीं देते। और व्यवस्था के अनेक परिशिष्टों से प्रकट है कि हमने ठीक कहा था कि यहाँ जिस आदर की बात है वह तीन भागों से बना है: श्रद्धा, आज्ञाकारिता और कृतज्ञता। इनमें से पहले पर प्रभु तब बल देता है जब वह आज्ञा देता है कि जो अपने पिता या माता को कोसे वह मार डाला जाए। इस प्रकार वह अपमान और तिरस्कार का बदला लेता है। दूसरे पर वह तब बल देता है जब वह अनाज्ञाकारी और विद्रोही सन्तान के लिए मृत्युदण्ड की घोषणा करता है। तीसरे का सम्बन्ध हमारे उद्धारकर्ता की उस घोषणा से है कि परमेश्वर हमसे माँग करता है कि हम अपने माता-पिता की भलाई करें (मत्ती 15)। और जब कभी पौलुस इस आज्ञा का उल्लेख करता है, तो वह इसकी व्याख्या आज्ञाकारिता की आज्ञा के रूप में करता है।213

37. एक प्रतिज्ञा अनुशंसा के रूप में जोड़ी गई है, ताकि हमें और भी अच्छी तरह स्मरण रहे कि यहाँ माँगी गई अधीनता परमेश्वर को कितनी प्रिय है। पौलुस हमें हमारी सुस्ती से जगाने के लिए इसी प्रेरणा का प्रयोग करता है, जब वह इसे प्रतिज्ञा सहित पहली आज्ञा कहता है; पहली पटिया में दी गई प्रतिज्ञा किसी एक आज्ञा के लिए विशेष रूप से नहीं ठहराई गई, बल्कि सारी व्यवस्था तक फैलाई गई है। इसके अतिरिक्त, प्रतिज्ञा का जिस अर्थ में अर्थ लिया जाना चाहिए वह यह है:—प्रभु ने इस्राएलियों से विशेष रूप से उस देश की बात कही जिसकी उसने उनसे अधिकार के रूप में प्रतिज्ञा की थी। यदि देश का अधिकार ईश्वरीय कृपा की बयाना था, तो इसमें आश्चर्य नहीं कि प्रभु ने दीर्घायु देकर अपनी कृपा की गवाही देना चाहा, क्योंकि इस रीति से वे देर तक उसकी भलाई का आनन्द ले सकते थे। इसलिए अर्थ यह है: अपने पिता और अपनी माता का आदर कर, ताकि तू लम्बे जीवन के क्रम में उस देश के अधिकार का आनन्द ले सके जो मेरी कृपा की गवाही में तुझे दिया जाएगा। परन्तु चूँकि सारी पृथ्वी विश्वासियों के लिए आशीषमय है, इसलिए हम इस वर्तमान जीवन को ईश्वरीय आशीषों में गिनते हैं, और यह उचित भी है। इसलिए यह प्रतिज्ञा उसी प्रकार हम से भी सम्बन्ध रखती है, क्योंकि वर्तमान जीवन की अवधि हमारे प्रति ईश्वरीय उदारता का प्रमाण है। यह हमारे लिए, या यहूदियों के लिए, इस रूप में प्रतिज्ञा नहीं की गई कि मानो अपने आप में वह सुख हो, बल्कि इसलिए कि वह भक्तों के प्रति ईश्वरीय कृपा का एक साधारण चिह्न है। इसलिए यदि माता-पिता की आज्ञा माननेवाला कोई परिपक्व आयु से पहले कट जाए (ऐसा बात कम नहीं होती), तो भी प्रभु अपनी प्रतिज्ञा पर वैसे ही दृढ़ रहता है जैसे तब जब जहाँ उसने केवल एक एकड़ की प्रतिज्ञा की थी वहाँ वह सौ एकड़ दे देता है। सारा सार इसमें है: हमें विचार करना चाहिए कि दीर्घायु की प्रतिज्ञा केवल इसी अंश में है कि वह परमेश्वर की ओर से आशीष है, और वह आशीष केवल इसी अंश में है कि वह ईश्वरीय कृपा का प्रकटीकरण है। परन्तु इसकी गवाही वह अपने सेवकों को मृत्यु के द्वारा और अधिक समृद्ध और ठोस रूप में देता और सचमुच प्रकट करता है।

38. फिर, प्रभु जब उन सन्तानों को वर्तमान जीवन की आशीष की प्रतिज्ञा देता है जो अपने माता-पिता का उचित आदर करती हैं, तब साथ ही यह भी जताता है कि विद्रोही और अनाज्ञाकारी लोगों पर अनिवार्य शाप लटका है; और कि वह पूरा हुए बिना न रहे, इसलिए वह अपनी व्यवस्था में उन पर मृत्युदण्ड की आज्ञा सुनाता है और उसे पूरा करने का आदेश देता है। यदि वे उस दण्ड से बच जाएँ, तो वह किसी न किसी रीति से बदला लेगा। क्योंकि हम देखते हैं कि इस प्रकार के कितने ही लोग या तो युद्ध में या झगड़ों में गिर जाते हैं; औरों पर असाधारण विपत्तियाँ आ पड़ती हैं, और लगभग सब इस बात का प्रमाण हैं कि चेतावनी व्यर्थ नहीं दी गई। परन्तु यदि कोई अत्यन्त वृद्धावस्था तक बच भी जाएँ, तो भी चूँकि वे इस जीवन में परमेश्वर की आशीष से वंचित हैं, केवल दुष्टता में ही मुरझाते जाते हैं, और आनेवाले जगत में कठोरतर दण्ड के लिए रख छोड़े गए हैं, वे आज्ञाकारी सन्तानों से प्रतिज्ञा की गई आशीष के भागी होने से बहुत दूर हैं। प्रसंगवश यह भी देखना चाहिए कि हमें माता-पिता की आज्ञा केवल प्रभु में माननी है। यह पहले ठहराए गए सिद्धान्त से स्पष्ट है: क्योंकि जो स्थान उनके पास है वह वही है जिस तक प्रभु ने उन्हें ऊँचा उठाया है, अपने आदर का एक अंश उन्हें देकर। इसलिए उनके प्रति जो अधीनता दी जाए, वह परम पिता तक पहुँचने की हमारी सीढ़ी का एक पद हो, और इसलिए यदि वे हमें व्यवस्था तोड़ने के लिए उकसाएँ, तो वे माता-पिता के रूप में गिने जाने के योग्य नहीं, बल्कि उन परायों के समान हैं जो हमें हमारे सच्चे पिता की आज्ञाकारिता से बहकाने का यत्न करते हैं। यही बात शासकों, स्वामियों और हर प्रकार के बड़ों के विषय में भी है। क्योंकि यह अशोभनीय और बेतुका होगा कि उनके ऊँचे उठाए जाने से परमेश्वर का आदर घटे—ऐसा उठाया जाना, जो उसी से मिला है, हमें उसी तक ले जाना चाहिए।214 213 निर्गमन 21:17; लैव्यव्यवस्था 20:9; नीतिवचन 20:20; व्यवस्थाविवरण 21:18; मत्ती 25:4; इफिसियों 6:1; कुलुस्सियों 3:20.

छठी आज्ञा।

तू हत्या न करना।

39. इस आज्ञा का आशय यह है कि चूँकि प्रभु ने सारी मानव जाति को एक प्रकार की एकता में बाँधा है, इसलिए सब की सुरक्षा प्रत्येक को सौंपी गई समझी जानी चाहिए। इसलिए सामान्य रूप से हर प्रकार की हिंसा और अन्याय, और हर वह हानि जिससे हमारे पड़ोसी के शरीर को दुःख पहुँचता है, निषिद्ध है। तदनुसार हमसे माँग की जाती है कि हम अपने पड़ोसी के प्राण की रक्षा के लिए अपनी शक्ति भर विश्वासयोग्यता से करें; जो कुछ उसकी शान्ति के लिए हितकर हो उसे बढ़ावा दें, हानि को टालने में सजग रहें, और जब संकट आए तो उसे दूर करने में सहायता दें। यह स्मरण रखते हुए कि दिव्य व्यवस्था-दाता यों बोलता है, यह भी विचार करें कि वह आपसे अपने मन को नियन्त्रित करने में भी यही नियम लगाने की माँग करता है। यह हास्यास्पद होगा कि वह, जो हृदय के विचारों को देखता और उन पर विशेष ध्यान रखता है, केवल शरीर को ही सीधाई में प्रशिक्षित करे। इसलिए यह आज्ञा हृदय की हत्या का निषेध करती है और अपने भाई के प्राण की रक्षा की सच्ची इच्छा माँगती है। हाथ तो हत्या करता है, परन्तु मन क्रोध और बैर के वश होकर उसे गर्भ में धारण करता है। आप अपने भाई पर क्रोधित होकर उसकी हानि की तीव्र लालसा के बिना कैसे रह सकते हैं? यदि आपको उस पर क्रोध नहीं करना है, तो उससे बैर भी नहीं रखना है, क्योंकि बैर पुराने क्रोध के सिवा और कुछ नहीं। आप चाहे इस बात को कितना भी छिपाएँ या व्यर्थ बहानों से उससे बचने का यत्न करें। जहाँ क्रोध या बैर है, वहाँ हानि करने की प्रवृत्ति है। यदि आप फिर भी टालमटोल करते रहें, तो आत्मा के मुख ने घोषणा कर दी है कि “जो कोई अपने भाई से बैर रखता है वह हत्यारा है” (1 यूहन्ना 3:15); और हमारे उद्धारकर्ता के मुख ने घोषणा की है कि “जो कोई अपने भाई पर क्रोध करेगा वह कचहरी में दण्ड के योग्य होगा; और जो कोई अपने भाई को निकम्मा कहेगा वह महासभा में दण्ड के योग्य होगा; और जो कोई कहे ‘अरे मूर्ख,’ वह नरक की आग के दण्ड के योग्य होगा” (मत्ती 5:22)।

40. पवित्रशास्त्र दोहरे न्याय की ओर संकेत करता है जिस पर यह आज्ञा आधारित है। मनुष्य परमेश्वर का स्वरूप भी है और हमारा अपना शरीर भी। इसलिए यदि हम परमेश्वर के स्वरूप को भंग नहीं करना चाहते, तो हमें मनुष्य की देह को पवित्र मानना चाहिए—यदि हम अपनी मानवता से वंचित नहीं होना चाहते, तो हमें अपने शरीर का पालन-पोषण करना चाहिए। मसीह के छुटकारे और दान से जो व्यावहारिक निष्कर्ष निकलता है, उस पर अन्यत्र विचार किया जाएगा।215 प्रभु ने हमारा ध्यान इन दो स्वाभाविक विचारों की ओर दिलाना चाहा, कि वे हमें अपने पड़ोसी के संरक्षण पर चौकस रहने के लिए प्रेरित करें—अर्थात् उस पर अंकित ईश्वरीय स्वरूप का आदर करना, और अपने शरीर को अपनाना। हत्या के दोष से मुक्त होने के लिए मनुष्य का लहू बहाने से रुक जाना पर्याप्त नहीं। यदि आप कर्म में दूसरे की सुरक्षा के विरुद्ध कुछ करते हैं, यत्न में उसकी योजना बनाते हैं, इच्छा और मंशा में उसे मन में रखते हैं, तो आप पर हत्या का दोष है। दूसरी ओर, यदि आप अपनी सामर्थ्य और अवसर के अनुसार उसकी सुरक्षा की रक्षा के लिए यत्न नहीं करते, तो उस निर्दयता से आप व्यवस्था को भंग करते हैं। परन्तु यदि शरीर की सुरक्षा का इतना ध्यान रखा गया है, तो इससे हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि आत्मा की सुरक्षा के लिए कितनी चिन्ता और प्रयत्न देय है, जो परमेश्वर की दृष्टि में अथाह रूप से अधिक मूल्यवान है।

214 फ्रेंच में जोड़ा गया है, “et la doit plustost augmenter, qu’amoindrir confirmer que viloer;”—और उसे घटाने के बजाय बढ़ाना चाहिए, भंग करने के बजाय दृढ़ करना चाहिए। 215 पुस्तक 3, अध्याय 7, खण्ड 4—7; अध्याय 20, खण्ड 38, 45; पुस्तक 4, अध्याय 1, खण्ड 13—19; अध्याय 17, खण्ड 38, 40.

सातवीं आज्ञा।

तू व्यभिचार न करना।

41. इस आज्ञा का आशय यह है कि चूँकि परमेश्वर शुद्धता और पवित्रता से प्रेम करता है, इसलिए हमें हर प्रकार की अशुद्धता से सावधान रहना चाहिए। अतः आज्ञा का सार यह है कि हम अपने को किसी अशुद्धता या कामुक अति से अपवित्र न करें। इसके अनुरूप विधि यह है कि हम अपने आचरण के हर भाग को शुद्धता और संयम से नियन्त्रित करें। जिस बात का स्पष्ट निषेध किया गया है वह व्यभिचार है, जिसकी ओर वासना स्वभाव से झुकती है, ताकि उसकी घिनौनी प्रकृति (जो अधिक स्थूल और प्रत्यक्ष रूप की है, क्योंकि वह शरीर पर भी कलंक लगाती है) हमें वासना के हर रूप से घृणा करने की ओर प्रवृत्त करे। मनुष्य को जिस व्यवस्था के अधीन रचा गया वह यह थी कि वह अकेला जीवन न बिताए, बल्कि उसके लिए एक योग्य सहायक हो, और जब से वह शाप के अधीन आया तब से इस जीवन-रीति की आवश्यकता और बढ़ गई है; इसलिए प्रभु ने विवाह की संस्था के द्वारा इस विषय में हमारे लिए आवश्यक प्रबन्ध किया, जिसे अपने अधिकार के अधीन किए जाने पर उसने अपनी आशीष से पवित्र भी ठहराया है। इसलिए यह स्पष्ट है कि विवाह से भिन्न सहवास का हर रूप उसकी दृष्टि में शापित है, और दाम्पत्य सम्बन्ध हमें अनियन्त्रित वासना में गिरने से रोकने के आवश्यक साधन के रूप में ठहराया गया था। इसलिए हम भोग-विलास के आगे झुकने से सावधान रहें, क्योंकि हमें निश्चय दिलाया गया है कि परमेश्वर का शाप हर उस स्त्री-पुरुष पर है जो विवाह के बिना साथ रहता है।

42. अब, चूँकि स्वाभाविक भावना और पतन से उत्पन्न कामनाएँ विवाह-बन्धन को दुगुना आवश्यक बना देती हैं, उनको छोड़कर जिन्हें परमेश्वर ने विशेष अनुग्रह से छूट दी है, इसलिए हर व्यक्ति विचार करे कि उसकी अपनी दशा क्या है। मैं मानता हूँ कि कुँवारापन ऐसा गुण है जिसे तुच्छ नहीं जानना चाहिए; परन्तु चूँकि वह कुछ को नहीं दिया गया, और औरों को केवल एक समय के लिए दिया जाता है, इसलिए जो असंयम से घिरे हों और उससे सफलतापूर्वक युद्ध न कर सकें, वे विवाह के उपाय की शरण लें, और इस प्रकार अपनी बुलाहट के मार्ग में शुद्धता का पालन करें। जो आत्म-संयम में अक्षम हैं, यदि वे असंयम के लिए अनुमत और प्रदान किए गए उपाय को काम में न लाएँ, तो वे परमेश्वर से युद्ध करते और उसके विधान का विरोध करते हैं। और कोई मुझसे यह न कहे (जैसा आज कितने ही कहते हैं) कि परमेश्वर की सहायता से वह सब कुछ कर सकता है! परमेश्वर की सहायता केवल उन्हीं के साथ है जो उसके मार्गों पर चलते हैं (भजन संहिता 91:14), अर्थात् उसकी बुलाहटों में, जिनसे वे सब हट जाते हैं जो परमेश्वर के दिए उपायों को छोड़कर व्यर्थ और ढिठाई से अपनी स्वाभाविक भावनाओं से जूझने और उन पर विजय पाने का यत्न करते हैं। कि संयम परमेश्वर का विशेष वरदान है, और उन वरदानों में से है जो सारी कलीसिया को बिना भेद के नहीं, बल्कि उसके कुछ ही सदस्यों को दिए जाते हैं, इसकी पुष्टि हमारा प्रभु करता है (मत्ती 19:12)। वह पहले ऐसे लोगों का एक वर्ग बताता है जिन्होंने स्वर्ग के राज्य के लिए अपने आप को नपुंसक बना लिया; अर्थात् ताकि वे अधिक स्वतन्त्रता और कम रुकावट के साथ स्वर्गीय बातों में लग सकें। परन्तु कोई यह न समझे कि ऐसा बलिदान हर किसी के सामर्थ्य में है, उसने कुछ पहले ही दिखा दिया था कि सब इसके योग्य नहीं, केवल वे जिन्हें ऊपर से विशेष रूप से दिया गया है। इसलिए वह निष्कर्ष निकालता है, “जो इसे ग्रहण कर सकता है, वह ग्रहण करे।” पौलुस इसी बात को और भी स्पष्ट रूप से कहता है, जब वह कहता है, “हर एक को परमेश्वर की ओर से अपना-अपना बरदान मिला है; किसी को किसी प्रकार का, और किसी को किसी और प्रकार का” (1 कुरिन्थियों 7:7)।

43. चूँकि हमें स्पष्ट घोषणा से स्मरण दिलाया गया है कि अविवाहित रहकर पवित्र जीवन बिताना हर मनुष्य के सामर्थ्य में नहीं, चाहे उसका सबसे गम्भीर यत्न और लक्ष्य वही क्यों न हो—कि यह विशेष अनुग्रह है जो प्रभु केवल कुछ ही व्यक्तियों को देता है, ताकि वे उसकी सेवा में कम बोझिल हों—तो क्या हम परमेश्वर का, और उसके ठहराए हुए स्वभाव का, विरोध नहीं करते यदि हम अपनी जीवन-रीति को अपनी सामर्थ्य के माप के अनुसार नहीं ढालते? प्रभु व्यभिचार का निषेध करता है, इसलिए वह शुद्धता और पवित्रता माँगता है। उसे बनाए रखने का हर एक के पास एकमात्र उपाय यह है कि वह अपने आप को अपनी क्षमता के माप से नापे। कोई मनुष्य विवाह को अपने लिए व्यर्थ या अनावश्यक समझकर उतावली से तुच्छ न जाने; कोई अविवाहित रहने की लालसा न करे जब तक वह विवाहित दशा के बिना निर्वाह न कर सके। यहाँ भी वह शरीर की शान्ति या सुविधा का विचार न करे, केवल इतना कि इस बन्धन से मुक्त होकर वह भक्ति के सब कामों के लिए अधिक तत्पर और तैयार हो। और चूँकि बहुत से हैं जिन्हें यह आशीष केवल कुछ समय के लिए दी जाती है, इसलिए हर कोई विवाह से परहेज़ तभी तक करे जब तक वह अविवाहित रहने को सह सकने के योग्य है। यदि उसमें अपनी वासना को वश में करने की सामर्थ्य नहीं, तो वह समझे कि प्रभु ने उसके लिए विवाह करना अनिवार्य ठहराया है। प्रेरित यह दिखाता है जब वह आज्ञा देता है: “तौभी व्यभिचार से बचने के लिए हर पुरुष की अपनी पत्नी और हर स्त्री का अपना पति हो।” “यदि वे संयम न कर सकें, तो विवाह करें।” वह पहले यह जताता है कि अधिकांश मनुष्य असंयम के वश में हैं; और फिर जो उसके वश में हैं उन सब को, बिना अपवाद, उस एकमात्र उपाय की शरण लेने की आज्ञा देता है जिससे अशुद्धता का निवारण हो सकता है। इसलिए असंयमी लोग इस उपाय से अपनी दुर्बलता का इलाज करने की उपेक्षा करके प्रेरित की आज्ञा न मानने की इसी बात से पाप करते हैं। और कोई अपने को यह कहकर न बहलाए कि चूँकि वह बाहरी कर्म से परहेज़ करता है इसलिए उस पर अशुद्धता का दोष नहीं लगाया जा सकता। इस बीच उसका मन भीतर वासना से जल रहा हो सकता है। क्योंकि पौलुस के अनुसार शुद्धता की परिभाषा मन की पवित्रता है, जो देह की पवित्रता के साथ जुड़ी हो। “अविवाहित स्त्री प्रभु की बातों की चिन्ता में रहती है, ताकि देह और आत्मा दोनों में पवित्र हो” (1 कुरिन्थियों 7:34)। इसलिए जब वह पहली आज्ञा का कारण देता है, तो केवल यही नहीं कहता कि व्यभिचार में जीने से विवाह करना अच्छा है, बल्कि यह कि जलने से विवाह करना अच्छा है।

44. फिर, जब पति-पत्नी को यह बताया जाता है कि उनका मेल प्रभु से आशीषित है, तो इससे उन्हें स्मरण दिलाया जाता है कि वे असंयमित और अनियन्त्रित भोग-विलास में न पड़ें। क्योंकि यद्यपि आदरणीय विवाह असंयम की घिनौनी प्रकृति को ढाँप देता है, इसका यह अर्थ नहीं कि वह तुरन्त उसके लिए प्रेरणा बन जाए। इसलिए पति-पत्नी विचार करें कि उनके लिए सब कुछ उचित नहीं। पति का पत्नी के प्रति और पत्नी का बदले में पति के प्रति व्यवहार संयमित हो; दोनों ऐसा आचरण करें कि वैवाहिक जीवन की गरिमा और संयम के अनुपयुक्त कुछ न हो। प्रभु में किया गया विवाह मर्यादा और शालीनता दिखाए—कामुकता की अति तक न दौड़े। इस अति की अम्ब्रोस ने गम्भीर, पर अनुचित नहीं, भर्त्सना की, जब उसने उस मनुष्य को जो दाम्पत्य सहवास में कोई शालीनता या शोभनीयता नहीं दिखाता, अपनी पत्नी के साथ व्यभिचार करनेवाला बताया।216 अन्त में, हम विचार करें कि वह व्यवस्था-दाता कौन है जो इस प्रकार व्यभिचार की निन्दा करता है: वही जो, चूँकि वह हमें पूर्णतः अपना बनाने का अधिकारी है, देह, प्राण और आत्मा की खराई माँगता है। इसलिए जब वह व्यभिचार का निषेध करता है, तो साथ ही हमें यह भी निषेध करता है कि हम कामुक पहनावे, अश्लील हाव-भाव और अशुद्ध बातचीत के द्वारा अपने पड़ोसी की शुद्धता के लिए फन्दे बिछाएँ। आर्केलाउस ने एक ऐसे युवक से जो स्त्रैण और अत्यधिक विलासी वस्त्र पहने था, जो कहा वह उचित था कि इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता कि उसकी कामुकता किस अंग में प्रकट होती है। हमें परमेश्वर का ध्यान रखना चाहिए, जो हर प्रकार की अशुद्धता से घृणा करता है, चाहे वह प्राण या शरीर के किसी भी अंग में प्रकट हो। और ताकि इसमें कोई सन्देह न रहे, हम स्मरण रखें कि प्रभु यहाँ जिसकी अनुशंसा करता है वह शुद्धता है। यदि वह शुद्धता माँगता है, तो वह हर उस बात की निन्दा करता है जो उसके विरुद्ध है। इसलिए यदि आप आज्ञाकारिता की आकांक्षा रखते हैं, तो आपका मन भीतर बुरी लालसा से न जले, आपकी आँखें भ्रष्ट करनेवाली वस्तुओं के पीछे न भटकें, और आपका शरीर लुभाने के लिए न सजाया जाए; न आपकी जीभ गन्दी बातों से, न आपकी भूख असंयम से मन को उसी प्रकार के विचारों की ओर फुसलाए। इस प्रकार के सब दोष एक प्रकार के धब्बे हैं जो शुद्धता को उसकी निर्मलता से वंचित करते हैं। 216 देखिए अम्ब्रोस, Lib. de Philosoph., जिसे अगस्तीन ने अपनी पुस्तक Contra Julian, Lib. 2 में उद्धृत किया है।

आठवीं आज्ञा।

तू चोरी न करना।

45. आशय यह है कि चूँकि अन्याय परमेश्वर के लिए घृणित है, इसलिए हमें हर मनुष्य को उसका हक़ देना चाहिए। सार रूप में आज्ञा हमें दूसरों की सम्पत्ति की लालसा करने से रोकती है, और तदनुसार हर मनुष्य से माँग करती है कि वह ईमानदारी से अपनी सम्पत्ति के संरक्षण में यत्न करे। क्योंकि हमें विचार करना चाहिए कि प्रत्येक व्यक्ति के पास जो है वह संयोग से उसके पास नहीं आया, बल्कि सब के प्रभु-सम्प्रभु के वितरण से आया है, इसलिए कोई अपने साधनों को बुरे प्रयोजनों में लगाकर ईश्वरीय विधान के साथ छल किए बिना नहीं रह सकता। चोरी के बहुत-से प्रकार हैं। एक हिंसा में है, जैसे जब किसी मनुष्य की सम्पत्ति बलपूर्वक लूटकर ले जाई जाती है; दूसरा द्वेषपूर्ण धोखे में, जैसे जब वह छल से बीच में ही हथिया ली जाती है; तीसरा उस अधिक छिपी चालाकी में जो न्याय के रूप-रंग के साथ उस पर कब्ज़ा कर लेती है; और चौथा चापलूसी में, जो दान के बहाने उसे फुसलाकर ले लेती है। परन्तु वर्गों को गिनाने में अधिक देर न लगाकर हम जानते हैं कि वे सब चतुराइयाँ, जिनसे हम अपने पड़ोसियों की सम्पत्ति और धन पर अधिकार करते हैं, सच्चे स्नेह के स्थान पर उन्हें किसी भी रीति से धोखा देने या हानि पहुँचाने की उत्सुकता रखकर, चोरी गिनी जानी चाहिए। यद्यपि वे अदालती कार्रवाई से प्राप्त हो जाएँ, परमेश्वर का निर्णय भिन्न है। वह छल की उस लम्बी शृंखला को देखता है जिससे चालाक मनुष्य अपने अधिक सीधे पड़ोसी के लिए जाल बिछाना आरम्भ करता है, जब तक वह उसकी फाँस में उलझ न जाए—वह उन कठोर और क्रूर नियमों को देखता है जिनसे अधिक बलवान निर्बल को पीसता और कुचलता है—वह उन लुभावनों को देखता है जिनसे अधिक धूर्त कम सावधान के लिए काँटे में चारा लगाता है, यद्यपि ये सब मनुष्य के न्याय से बच जाते हैं और इनका कोई संज्ञान नहीं लिया जाता। न ही इस आज्ञा का उल्लंघन केवल धन, या व्यापारिक माल, या भूमि तक सीमित है, बल्कि वह हर प्रकार के अधिकार तक फैलता है; क्योंकि यदि हम उन कर्तव्यों में से किसी को निभाने से इनकार करें जो हमें अपने पड़ोसियों के प्रति निभाने हैं, तो हम उनकी हानि करके उन्हें ठगते हैं। यदि कोई कारिन्दा या आलसी भण्डारी अपने स्वामी की सम्पत्ति उड़ा दे, या उसके प्रबन्ध पर उचित ध्यान न दे; यदि वह अन्यायपूर्वक या विलासपूर्वक सौंपे गए साधनों को उड़ा दे; यदि कोई सेवक अपने स्वामी का उपहास करे, उसके भेद खोल दे, या किसी भी रीति से उसके प्राण या सम्पत्ति के प्रति विश्वासघात करे; यदि, दूसरी ओर, कोई स्वामी अपने घराने को क्रूरता से सताए, तो वह परमेश्वर के सामने चोरी का दोषी है; क्योंकि हर वह मनुष्य जो अपनी बुलाहट के निर्वाह में दूसरों के प्रति अपना देय नहीं निभाता, वह उसे रोक रखता है, या उसे हड़प लेता है जो उसका नहीं।

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