पुस्तक II · अध्याय 8

नैतिक व्यवस्था की व्याख्या (भाग 3/3)

Institutes of the Christian Religion · John Calvin

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नैतिक व्यवस्था की व्याख्या (भाग 3/3)

46. अतः इस आज्ञा का हम तभी उचित रीति से पालन करेंगे, जब अपनी दशा में सन्तुष्ट रहकर हम केवल ईमानदार और वैध लाभ कमाने का यत्न करें; जब हम अन्याय से धनी बनने की लालसा न रखें, और अपने पड़ोसी को उसकी सम्पत्ति से लूटने की इच्छा न करें कि इस प्रकार हमारी अपनी बढ़ जाए; जब हम दूसरों के लहू से निर्दयतापूर्वक निचोड़ा हुआ धन बटोरने की जल्दी न करें; जब हम वैध और अवैध साधनों से अत्यधिक उतावलेपन के साथ वह सब न समेटें जिससे हमारा लोभ तृप्त हो या हमारी फ़िज़ूलख़र्ची पूरी हो। इसके विपरीत, हमारा निरन्तर लक्ष्य यह हो कि हम सब को विश्वासयोग्यता से अपनी सम्मति और सहायता दें, ताकि वे अपनी सम्पत्ति बनाए रख सकें; या यदि हमारा सामना विश्वासघातियों या चालाक लोगों से हो, तो उनसे झगड़ने की अपेक्षा हम अपने अधिकार का कुछ अंश छोड़ देने को तैयार रहें। और केवल इतना ही नहीं, वरन् जिन्हें हम कठिनाइयों के बोझ से दबा देखें, उनकी सहायता के लिए अपनी बहुतायत में से उनकी घटी पूरी करके योगदान दें। अन्त में, हम में से हर एक यह विचार करे कि वह दूसरों के प्रति कर्तव्य में कहाँ तक बँधा है, और सच्चाई से अपना देय चुका दे। इसी प्रकार प्रजा अपने शासकों को पूरा आदर दे, उनके अधिकार के अधीन धीरज से रहे, उनके कानूनों और आदेशों का पालन करे, और जिस किसी बात को परमेश्वर की कृपा गँवाए बिना सह सके, उससे इनकार न करे। शासक भी अपनी प्रजा की उचित देखभाल करें, सार्वजनिक शान्ति बनाए रखें, भलों की रक्षा करें, बुरों को रोकें, और सब बातों में अपना आचरण ऐसे लोगों के समान रखें जिन्हें अपने पद का लेखा सब के न्यायी परमेश्वर को देना है। कलीसियाओं के सेवक वचन की सेवकाई पर विश्वासयोग्यता से ध्यान दें, और उद्धार की शिक्षा को बिगाड़ें नहीं, परन्तु उसे परमेश्वर के लोगों के सामने शुद्ध और निष्कपट रूप से प्रस्तुत करें। वे केवल शिक्षा से ही नहीं, वरन् अपने उदाहरण से भी सिखाएँ; संक्षेप में, वे अपने झुण्डों के प्रति भले चरवाहों की भूमिका निभाएँ। प्रजा भी अपनी ओर से उन्हें परमेश्वर के सन्देशवाहक और प्रेरित जानकर ग्रहण करे, उन्हें वह आदर दे जो उनके परम स्वामी ने उन्हें दिया है, और उनके जीवन-निर्वाह के लिए आवश्यक वस्तुएँ उन्हें जुटाए। माता-पिता अपने बच्चों का पालन-पोषण करने, उनका मार्गदर्शन करने और उन्हें शिक्षा देने में सावधान रहें, क्योंकि वे उन्हें परमेश्वर की ओर से सौंपी हुई धरोहर हैं। वे निर्दयता से उन्हें चिढ़ाएँ या अपने से दूर न करें, वरन् अपने पद के योग्य कोमलता और ममता से उन्हें पालें और गले लगाएँ। बच्चों पर माता-पिता के प्रति जो आदर बनता है, उसकी चर्चा हम पहले कर चुके हैं। जवान लोग बड़ी आयु वालों का आदर करें, क्योंकि प्रभु ने उस आयु को आदरणीय ठहराया है। बूढ़े भी अपनी समझ और अनुभव से (जिसमें वे कहीं बढ़कर होते हैं) युवावस्था की निर्बलता का मार्गदर्शन करें; वे उन पर कठोर और कोलाहलपूर्ण डाँट-फटकार न बरसाएँ, वरन् कठोरता में सरलता और मधुरता मिलाएँ। सेवक अपने स्वामियों की आज्ञा मानने में परिश्रमी और आदरपूर्ण दिखाई दें, और यह दिखावे की सेवा से नहीं, वरन् हृदय से, परमेश्वर के दासों के समान करें। स्वामी भी अपने सेवकों के प्रति कठोर और अप्रिय न हों, न उन्हें अत्यधिक कड़ाई से सताएँ, न उनका अपमान करें, वरन् उन्हें भाई और अपने स्वर्गीय स्वामी के सहदास मानें, और इसलिए आपसी प्रेम और भलाई से उनके साथ व्यवहार करने के लिए बँधे रहें। मैं कहता हूँ कि हर एक इस प्रकार विचार करे कि अपने स्थान और श्रेणी में वह अपने पड़ोसियों का क्या देनदार है, और जो देना है उसे चुकाए। इसके अतिरिक्त, हमें सदैव व्यवस्था देनेवाले की ओर दृष्टि रखनी चाहिए, और इस प्रकार स्मरण रखना चाहिए कि अपने साथी मनुष्यों के हित और सुविधा को बढ़ाने और उसकी रक्षा करने की माँग करनेवाली व्यवस्था हमारे मन और हमारे हाथ दोनों पर समान रूप से लागू होती है।

नौवीं आज्ञा।

तू अपने पड़ोसी के विरुद्ध झूठी साक्षी न देना।

47. इस आज्ञा का आशय यह है: चूँकि परमेश्वर, जो सत्य है, झूठ से घृणा करता है, इसलिए हमें एक दूसरे के प्रति निष्कपट सच्चाई का अभ्यास करना चाहिए। अतः सार यह होगा कि हम निन्दा और झूठे आरोपों से अपने पड़ोसी के नाम को हानि न पहुँचाएँ, न झूठ से उसकी सम्पत्ति बिगाड़ें; संक्षेप में, उतावलेपन या बुराई करने के प्रेम के कारण किसी को हानि न पहुँचाएँ। इस निषेध के अनुरूप यह आज्ञा है कि हम अपने सामर्थ्य भर हर एक की भलाई और सम्पत्ति की रक्षा के लिए सत्य का पक्ष लेने में विश्वासयोग्यता से सहायता करें। प्रभु ने मानो इन शब्दों में इस आज्ञा की व्याख्या करनी चाही है: “तू झूठी बात न फैलाना; झूठा साक्षी होकर दुष्ट का साथ न देना।” “झूठे मामले से दूर रहना,” (निर्गमन 23:1, 7)। एक और स्थान पर वह न केवल उस प्रकार के झूठ को वर्जित करता है जो लोगों में चुगलखोर बनकर फिरने में है, वरन् यह भी कहता है, “तू अपने पड़ोसी के प्राण के विरुद्ध खड़ा न होना,” (लैव्यव्यवस्था 19:16)। दोनों अपराध स्पष्ट रूप से वर्जित हैं। वास्तव में इसमें कोई सन्देह नहीं कि जैसे पिछली आज्ञा में उसने क्रूरता, अशुद्धता और लोभ को वर्जित किया, वैसे ही यहाँ उस झूठ को वर्जित करता है जो उन दो भागों से बना है जिनकी हम चर्चा कर चुके। विद्वेषपूर्ण या दुष्टतापूर्ण निन्दा से हम अपने पड़ोसी के सुनाम के विरुद्ध पाप करते हैं; झूठ बोलकर, कभी-कभी उस पर कलंक लगाकर भी, हम उसकी सम्पत्ति को हानि पहुँचाते हैं। इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता कि आप यहाँ औपचारिक और न्यायालयीय गवाही समझें या निजी बातचीत में दी जानेवाली साधारण गवाही। क्योंकि हमें सदा इस विचार की ओर लौटना चाहिए कि हर प्रकार के अपराध के लिए उदाहरण के रूप में एक भेद रखा गया है, ताकि दूसरे भेद उससे जोड़े जा सकें, और जो भेद मुख्य रूप से चुना गया है वह वही है जिसमें अपराध की नीचता सबसे अधिक स्पष्ट दिखाई देती है। फिर भी इसे अधिक व्यापक रूप से निन्दा और उन कुटिल संकेतों तक बढ़ाना उचित जान पड़ता है जिनसे हमारे पड़ोसी अन्यायपूर्वक दुखी किए जाते हैं। क्योंकि न्यायालय में झूठ के साथ सदा झूठी शपथ भी जुड़ी रहती है। परन्तु झूठी शपथ के विरुद्ध, जहाँ तक वह परमेश्वर के नाम को अपवित्र और भंग करती है, तीसरी आज्ञा में पर्याप्त प्रबन्ध है। अतः इस आज्ञा का वैध पालन इसमें है कि जीभ को सत्य के पक्ष में लगाया जाए, ताकि हमारे पड़ोसी का सुनाम और उसकी समृद्धि दोनों को बढ़ावा मिले। इसका न्याय पूर्णतः स्पष्ट है। क्योंकि यदि सुनाम धन से अधिक मूल्यवान है, तो किसी मनुष्य को उसके सुनाम से वंचित करने से उसे उतनी ही हानि होती है जितनी उसकी सम्पत्ति लूटने से; और बाद वाली दशा में झूठी गवाही कभी-कभी हाथ से की गई लूट से कम हानिकारक नहीं होती।

48. फिर भी यह आश्चर्य की बात है कि इस विषय में लोग सब कहीं कितनी लापरवाह निश्चिन्तता से पाप करते हैं। वास्तव में बहुत थोड़े लोग मिलते हैं जो इस रोग से प्रत्यक्षतः पीड़ित न हों: हम अपने पड़ोसी के दोषों को टटोलने और उजागर करने में ऐसा विषैला आनन्द लेते हैं। हम यह न सोचें कि यह कहना पर्याप्त बहाना है कि बहुत अवसरों पर हमारी बातें झूठी नहीं होतीं। जो हमें झूठ के द्वारा अपने पड़ोसी की प्रतिष्ठा को कलंकित करने से रोकता है, वह चाहता है कि जहाँ तक सत्य अनुमति दे, हम उसे निष्कलंक रखें। यद्यपि आज्ञा केवल झूठ के विरुद्ध निर्देशित है, तो भी वह यह संकेत देती है कि हमारे पड़ोसी के सुनाम की रक्षा की सिफ़ारिश की गई है। हमारे पड़ोसी के सुनाम की रक्षा करने के लिए हमें यही कारण पर्याप्त होना चाहिए कि परमेश्वर उसमें रुचि रखता है। इसलिए सामान्य रूप से बुराई करना निःसन्देह निन्दित है। इसके अतिरिक्त, बुराई करने से हम वह डाँट नहीं समझते जो सुधार के उद्देश्य से दी जाती है; न वह आरोप या न्यायिक निर्णय जिससे बुराई को दूर करने का यत्न किया जाता है; न वह सार्वजनिक फटकार जो दूसरे अपराधियों में भय उत्पन्न करने के लिए होती है; न वह सूचना जो उन्हें दी जाती है जिनकी सुरक्षा पहले से चेताए जाने पर निर्भर है, कि कहीं वे अनजाने में खतरे में न पड़ जाएँ; वरन् वह घृणित दोषारोपण जो निन्दा के प्रति विद्वेषपूर्ण और उतावले प्रेम से उपजता है। यहाँ तक कि यह आज्ञा उस कटाक्षपूर्ण बनावटी शिष्टता तक भी पहुँचती है, जो निन्दा से भरी होती है और जिसके द्वारा हँसी-ठिठोली के रूप में दूसरों की कमज़ोरियों पर कटुता से प्रहार किया जाता है, जैसा कि कुछ लोग करने के आदी हैं, जो चातुर्य की प्रशंसा पाने के लिए चाहे किसी को लज्जा से लाल होना पड़े या कड़वी पीड़ा सहनी पड़े, उसकी परवाह नहीं करते। ऐसे उतावलेपन से हमारे भाई कभी-कभी गहरे घायल हो जाते हैं।217 परन्तु यदि हम व्यवस्था देनेवाले की ओर देखें, जिसका न्यायसंगत अधिकार जीभ ही पर नहीं, कानों और मन पर भी है, तो हम यह देखे बिना नहीं रह सकते कि निन्दा सुनने की उत्सुकता और आलोचनापूर्ण निर्णयों की अशोभनीय प्रवृत्ति भी यहाँ वर्जित है। यह मान लेना बेतुका होगा कि परमेश्वर जीभ में बुराई करने के रोग से तो घृणा करता है, फिर भी मन में उसकी विद्वेषपूर्णता को अस्वीकार नहीं करता। इसलिए यदि हम में परमेश्वर का सच्चा भय और प्रेम बसता है, तो जहाँ तक वैध और उचित है, और जहाँ तक प्रेम अनुमति देता है, हमें यत्न करना चाहिए कि हम न तो कटु और कठोर आरोपों को सुनें, न उन्हें मुँह से निकालें, और न उतावलेपन से बुरे सन्देहों को मन में रखें। दूसरे मनुष्यों के शब्दों और कार्यों के न्यायसंगत व्याख्याता होकर, आइए हम अपने निर्णय, अपने कान और अपनी जीभ से उनके योग्य आदर को खुले मन से बनाए रखें।

दसवीं आज्ञा।

तू अपने पड़ोसी के घर का लालच न करना; तू अपने पड़ोसी की पत्नी का, न उसके दास, न उसकी दासी, न उसके बैल, न उसके गधे का, न उसकी किसी भी वस्तु का लालच करना।

49. आशय यह है: चूँकि प्रभु चाहता है कि सारा मन प्रेम से व्याप्त हो, इसलिए विरोधी स्वभाव की हर भावना हमारे मनों से निकाल दी जानी चाहिए। अतः सार यह होगा कि कोई ऐसा विचार हमारे मनों में घुसने और उन्हें हमारे पड़ोसी की हानि की ओर ले जानेवाली हानिकारक अभिलाषा से भरने न पाए। इसके अनुरूप विपरीत आज्ञा यह है कि हम जो कुछ भी सोचें, विचारें, चाहें या योजना बनाएँ, वह हमारे पड़ोसी की भलाई और लाभ से जुड़ा हो। परन्तु यहाँ ऐसा प्रतीत होता है कि हमारे सामने एक बड़ी और उलझन-भरी कठिनाई खड़ी है। क्योंकि यदि ऊपर यह ठीक कहा गया था कि व्यभिचार और चोरी के शब्दों के अन्तर्गत वासना और हानि पहुँचाने तथा छल करने का इरादा वर्जित है, तो बाद में अपने पड़ोसी की सम्पत्ति के लिए लोभ भरी इच्छा को वर्जित करने के लिए एक अलग आज्ञा का प्रयोग अनावश्यक प्रतीत हो सकता है। यह कठिनाई इरादे और लोभ के बीच भेद करने से सरलता से दूर हो जाएगी।218 इरादा, जैसा हम पिछली आज्ञाओं में कह चुके हैं, मन पर आवेश के अधिकार कर लेने के बाद इच्छा की सोची-समझी सहमति है। लोभ ऐसी सोच-विचार और सहमति के बिना भी हो सकता है, जब मन केवल व्यर्थ और बिगड़ी हुई वस्तुओं से उभारा और गुदगुदाया जाता है। इसलिए जैसे प्रभु ने पहले आदेश दिया कि प्रेम हमारी इच्छाओं, यत्नों और कार्यों को नियन्त्रित करे, वैसे ही अब वह हमें आदेश देता है कि हम मन के विचारों को भी उसी प्रकार नियन्त्रित करें, ताकि उनमें से कोई भी बिगड़ा और टेढ़ा न हो जाए और मन को विपरीत झुकाव न दे दे। क्रोध, घृणा, व्यभिचार, चोरी और झूठ की ओर अपने मन को मोड़ने और झुकाने से रोककर, अब वह हमें अपने विचारों को वही दिशा देने से रोकता है।

217 फ्रेंच पाठ इस प्रकार है: “D’avantage ce precepte s’estend jusques là, que nous n’affections point une plaisanterie d’honnesteté et une grace de brocarder et mordre en riant les uns et les autres, comme sont aucuns, qui se bagnent quand ils peuvent faire vergogne à quelqu’un: car par telle intemperance souventes fois quelque marque demeure sur l’homme qu’on a ainsi noté.”—इसके अतिरिक्त, आज्ञा यहाँ तक पहुँचती है: हमें हँसी-मज़ाक की शिष्टता और उपनाम रखने की सुहावनी चतुराई का दिखावा नहीं करना चाहिए, और मुस्कुराकर दूसरों से चुभती बातें नहीं कहनी चाहिए, जैसा कि कुछ लोग करते हैं, जो किसी दूसरे को लज्जा से लाल कर पाने पर प्रसन्न होते हैं: क्योंकि ऐसे असंयम से अक्सर जिस व्यक्ति पर इस प्रकार प्रहार किया जाता है उस पर कलंक चिपक जाता है।

50. ऐसी सीधाई की माँग बिना कारण नहीं है। क्योंकि कौन इस बात की उपयुक्तता से इनकार कर सकता है कि मन की सारी शक्तियाँ प्रेम में लगी रहें? यदि वह प्रेम को अपना लक्ष्य बनाना छोड़ दे, तो कौन सन्देह करेगा कि वह रोगी है? ऐसा क्यों होता है कि आपके भाई के लिए हानिकारक इतनी इच्छाएँ आपके मन में आती हैं, सिवाय इसके कि उसकी उपेक्षा करके आप केवल अपने ही विषय में सोचते हैं? यदि आपका मन पूरी तरह प्रेम से भरा होता, तो ऐसे विचारों के प्रवेश के लिए उसका कोई अंश शेष न रहता। अतः जितना मन प्रेम से रहित है, उतना ही वह लोभ के प्रभाव में होगा। कोई आपत्ति करेगा कि जो कल्पनाएँ मन में अचानक उठती हैं और तुरन्त लुप्त हो जाती हैं, उन्हें ठीक-ठीक लोभ करके दोषी नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि लोभ का निवास हृदय में है। मैं उत्तर देता हूँ कि यहाँ प्रश्न ऐसी कल्पनाओं के वर्णन का है जो हमारे विचारों में प्रस्तुत होते हुए साथ ही मन पर लालसा की छाप और उत्तेजना भी डालती हैं, क्योंकि मन कभी कोई चुनाव करने की नहीं सोचता कि हृदय उत्तेजित होकर उसकी ओर न झुके। इसलिए परमेश्वर एक प्रबल और उत्कट भावना की आज्ञा देता है, ऐसी भावना जिसे लोभ का कोई भी अंश, चाहे कितना ही सूक्ष्म हो, रोक न सके। वह ऐसा उत्तम रीति से सजा हुआ मन माँगता है कि वह प्रेम की व्यवस्था के विरुद्ध ज़रा-सा भी प्रेरित न हो। कहीं आप यह न समझें कि इस दृष्टिकोण का कोई गम्भीर प्रमाण नहीं है, मैं बता दूँ कि पहले-पहल यह मुझे अगस्तीन से सूझा था।219 परन्तु यद्यपि परमेश्वर का अभिप्राय हर प्रकार की बिगड़ी हुई इच्छा को वर्जित करना था, फिर भी उदाहरण के रूप में वह हमारे सामने वे वस्तुएँ रखता है जो सामान्यतः सब से आकर्षक मानी जाती हैं: इस प्रकार उन बातों के निषेध से, जिनमें लालसा विशेष रूप से प्रसन्न होती और मौज उड़ाना पसन्द करती है, वह किसी भी प्रकार की लालसा के लिए स्थान नहीं छोड़ता।

यह है व्यवस्था की दूसरी पट्टी, जिसमें हमें उन कर्तव्यों की पर्याप्त शिक्षा मिलती है जो हम परमेश्वर के निमित्त मनुष्य के प्रति रखते हैं; क्योंकि उसके स्वरूप पर विचार करने से ही प्रेम की सारी प्रणाली की नींव पड़ती है। अतः इस पट्टी में सिखाए गए विविध कर्तव्यों का उपदेश देना व्यर्थ होगा, यदि आप अपनी शिक्षा को उसकी उचित नींव के रूप में परमेश्वर के भय और श्रद्धा पर न रखें। विचारशील पाठक से मुझे कहने की आवश्यकता नहीं कि जो लोग लोभ-निषेध की आज्ञा में से दो आज्ञाएँ बनाते हैं, वे एक ही बात को हठपूर्वक दो टुकड़ों में बाँट देते हैं। “तू लालच न करना” शब्दों की पुनरावृत्ति में कुछ भी नहीं है। पहले “घर” का उल्लेख किया गया, फिर उसके विभिन्न अंश गिनाए गए हैं, जो “पत्नी” से आरम्भ होते हैं; इसलिए यह स्पष्ट है कि सारी बात को लगातार पढ़ा जाना चाहिए, जैसा कि यहूदियों ने ठीक ही किया है। अतः पूरी आज्ञा का सार यह है कि हर एक व्यक्ति के पास जो कुछ है वह न केवल हानि से, या हानि पहुँचाने की इच्छा से, वरन् उस हल्के से हल्के लोभ-भाव से भी, जो मन में उठ सकता है, पूरा और सुरक्षित रहे।

218 देखिए ऊपर, अध्याय 2, खण्ड 24 का अन्त; और पुस्तक 3, अध्याय 3, खण्ड 11, 12, 13; और पुस्तक 4, अध्याय 15, खण्ड 11, 12।

219 देखिए August. Ep. 200, ad Asellicum, et Quæstio, Lib. 88, sub fin. Quæst. 66; परन्तु विशेषकर Conscio. 8, in भजन संहिता 118। इस विषय का स्पर्श भजन संहिता 142 और De Temp. Serm. 45, और Retract. Lib. 1 cap. 5, और De Continentia, cap. 8 में भी किया गया है।

51. अब पूरी व्यवस्था के सामान्य उद्देश्य को जान लेना कठिन न होगा—अर्थात् धार्मिकता की पूर्ति, कि मनुष्य अपना जीवन ईश्वरीय पवित्रता के आदर्श पर ढाले। क्योंकि उसमें परमेश्वर ने अपने स्वभाव का ऐसा चित्र खींचा है कि जो कोई आज्ञा की हुई बातों को कर्म में दिखाए, वह किसी हद तक परमेश्वर का जीवित स्वरूप प्रकट करेगा। इसीलिए मूसा ने, जब वह सारी बात का सार इस्राएलियों की स्मृति में बैठाना चाहता था, उनसे यों कहा, “अब, हे इस्राएल, तेरा परमेश्वर यहोवा तुझ से इसके सिवाय और क्या चाहता है, कि तू अपने परमेश्वर यहोवा का भय माने, उसके सब मार्गों पर चले, उससे प्रेम रखे, और अपने पूरे मन और अपने सारे प्राण से अपने परमेश्वर यहोवा की सेवा करे, और यहोवा की जो जो आज्ञाएँ और विधियाँ मैं आज तुझे तेरे भले के लिए सुनाता हूँ उनको माना करे?” (व्यवस्थाविवरण 10:12, 13)। और जब कभी उसे व्यवस्था के उद्देश्य का उल्लेख करने का अवसर मिला, उसने यही बात दोहराना न छोड़ा। व्यवस्था की शिक्षा इस पर इतना ध्यान देती है कि वह मनुष्य को जीवन की पवित्रता के द्वारा उसके परमेश्वर से जोड़ती है; और जैसा मूसा एक और स्थान पर कहता है (व्यवस्थाविवरण 6:5; 11:13), उसे उससे लिपटाए रखती है। इसके अतिरिक्त, जीवन की यह पवित्रता ऊपर कहे गए दो शीर्षकों में समाई हुई है। “तू अपने परमेश्वर यहोवा से अपने सारे मन, अपने सारे प्राण, अपनी सारी बुद्धि और अपनी सारी शक्ति से प्रेम रखना, और अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रखना।” पहले, हमारा मन परमेश्वर के प्रेम से पूरी तरह भर जाना चाहिए, और फिर यह प्रेम तुरन्त हमारे पड़ोसी की ओर बह निकलना चाहिए। प्रेरित यही दिखाता है जब वह कहता है, “आज्ञा का सारांश यह है कि शुद्ध मन और अच्छे विवेक और निष्कपट विश्वास से प्रेम उत्पन्न हो,” (1 तीमुथियुस 1:5)। आप देखते हैं कि विवेक और निष्कपट विश्वास सबसे पहले रखे गए हैं, अर्थात् सच्ची भक्ति; और उसी से यह प्रेम निकलता है। अतः यह समझना भूल है कि व्यवस्था में केवल धार्मिकता के आरम्भिक तत्त्व और प्रथम सिद्धान्त दिए गए हैं, मानो भले कर्मों की एक प्रकार की भूमिका बनाने के लिए, और उनके सिद्ध पालन की ओर मार्गदर्शन करने के लिए नहीं। सम्पूर्ण सिद्धता के लिए मूसा और पौलुस के इन अंशों में जो कहा गया है उससे अधिक कुछ और माँगा नहीं जा सकता। जो उस शिक्षा से सन्तुष्ट नहीं है जो मनुष्य को परमेश्वर के भय, आत्मिक आराधना, व्यावहारिक आज्ञाकारिता की ओर, और संक्षेप में विवेक की शुद्धता, निष्कपट विश्वास और प्रेम की ओर निर्देशित करती है, वह भला और कितनी दूर जाना चाहेगा? इससे व्यवस्था की उस व्याख्या की पुष्टि होती है जो उसकी आज्ञाओं में भक्ति और प्रेम के सब कर्तव्यों को खोजती और पाती है। जो लोग केवल सूखे और रूखे तत्त्व ढूँढ़ते हैं, मानो वह परमेश्वर की इच्छा आधी ही सिखाती हो, वे प्रेरित की साक्षी के अनुसार उसके उद्देश्य को बिलकुल नहीं समझते।

52. चूँकि व्यवस्था का सारांश देते समय मसीह और प्रेरित कभी-कभी पहली पट्टी को छोड़ देते हैं, इसलिए बहुत-से लोग यह भूल कर बैठते हैं कि उनके शब्द दोनों पट्टियों पर लागू होते हैं। मत्ती में मसीह “न्याय, दया और विश्वास” को “व्यवस्था की गम्भीर बातें” कहता है। मैं समझता हूँ कि यह स्पष्ट है कि यहाँ विश्वास से मनुष्यों के प्रति सच्चाई का अर्थ है। परन्तु इन शब्दों को पूरी व्यवस्था पर लागू करने के लिए कुछ लोग इससे परमेश्वर के प्रति भक्ति का अर्थ लेते हैं। यह निश्चय ही निरर्थक है। क्योंकि मसीह उन कर्मों की बात कर रहा है जिनके द्वारा मनुष्य को अपने आप को धर्मी प्रमाणित करना चाहिए। यदि हम इस पर ध्यान दें, तो हमें इस पर आश्चर्य करना छोड़ देना चाहिए कि जब एक और स्थान पर उस जवान ने उससे पूछा, “मैं कौन-सा भला काम करूँ कि अनन्त जीवन पाऊँ?” तो उसने केवल यह उत्तर दिया कि उसे आज्ञाओं का पालन करना चाहिए: “हत्या न करना, व्यभिचार न करना, चोरी न करना, झूठी साक्षी न देना, अपने पिता और अपनी माता का आदर करना; और, अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रखना,” (मत्ती 19:16, 18)। क्योंकि पहली पट्टी की आज्ञाकारिता लगभग पूरी तरह या तो हृदय की भीतरी भावना में थी, या रीति-रिवाजों में। हृदय की भावना दिखाई नहीं देती थी, और कपटी लोग रीति-रिवाजों के पालन में परिश्रमी थे; परन्तु प्रेम के कर्म ऐसे स्वभाव के थे कि वे धार्मिकता की ठोस साक्षी ठहरते थे। भविष्यद्वक्ताओं में भी यही बात इतनी बार आती है कि जिसे उनसे थोड़ा-बहुत भी परिचय है उसके लिए वह जानी-पहचानी होगी।220 क्योंकि वे लगभग हर अवसर पर, जब मनुष्यों को पश्चाताप के लिए समझाते हैं, तो पहली पट्टी को छोड़कर विश्वास, न्याय, दया और सच्चाई पर बल देते हैं। इस प्रकार वे परमेश्वर के भय को नहीं छोड़ते। वे केवल उसके चिह्नों से उसका गम्भीर प्रमाण माँगते हैं। यह तो प्रसिद्ध है कि जब वे व्यवस्था की चर्चा करते हैं, तो आम तौर पर दूसरी पट्टी पर बल देते हैं, क्योंकि उसी में धार्मिकता और खराई का अभ्यास सबसे अच्छी तरह प्रकट होता है। अंश उद्धृत करने की आवश्यकता नहीं। हर कोई स्वयं सरलता से मेरे कथन की सच्चाई देख सकता है।

53. तो क्या यह सच है, आप पूछेंगे, कि मनुष्यों के साथ निर्दोष जीवन बिताना परमेश्वर के प्रति भक्तिपूर्वक जीने से धार्मिकता का अधिक सम्पूर्ण सारांश है? कदापि नहीं; परन्तु क्योंकि कोई मनुष्य, स्वाभाविक रूप से, सब बातों में प्रेम का पालन तब तक नहीं करता जब तक वह गम्भीरता से परमेश्वर का भय न माने, इसलिए ऐसा पालन भक्ति का भी प्रमाण है। इसके अतिरिक्त, प्रभु भली-भाँति जानता है कि हमारा कोई भला कर्म उस तक नहीं पहुँच सकता (जैसा भजनकार घोषित करता है, भजन संहिता 16:2), इसलिए वह हम से अपने प्रति कर्तव्य नहीं माँगता, वरन् हमें अपने पड़ोसी के प्रति भले कामों में अभ्यास कराता है। इसीलिए प्रेरित बिना कारण नहीं, पवित्र लोगों की सारी सिद्धता को प्रेम में ठहराता है (इफिसियों 3:19; कुलुस्सियों 3:14)। और एक और स्थान पर वह उसे अनुचित रीति से नहीं, “व्यवस्था की पूर्ति” कहता है, और जोड़ता है कि “जो दूसरे से प्रेम रखता है उसने व्यवस्था पूरी की है,” (रोमियों 13:8)। और फिर, “सारी व्यवस्था इसी एक बात में पूरी होती है: तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख,” (गलातियों 5:14)। क्योंकि यही वह बात है जो स्वयं मसीह सिखाता है जब वह कहता है, “इसलिए जो कुछ तुम चाहते हो कि मनुष्य तुम्हारे साथ करें, तुम भी उनके साथ वैसा ही करो; क्योंकि व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं की शिक्षा यही है,” (मत्ती 7:12)। यह निश्चित है कि व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं में विश्वास, और परमेश्वर की उचित आराधना से सम्बन्ध रखनेवाली हर बात प्रथम स्थान रखती है, और प्रेम उसके अधीन रखा गया है; परन्तु हमारे प्रभु का अर्थ यह है कि व्यवस्था में मनुष्यों के प्रति न्याय और सच्चाई का पालन उस साधन के रूप में निर्धारित किया गया है जिसके द्वारा हमें परमेश्वर के भक्तिपूर्ण भय की साक्षी देनी है, यदि वह सचमुच हम में है।

54. अतः हम यह मानें कि हमारा जीवन परमेश्वर की इच्छा और उसकी व्यवस्था की माँगों के अनुसार सबसे उत्तम रीति से तब ढला होगा, जब वह हर प्रकार से हमारे भाइयों के लिए सबसे अधिक लाभकारी हो। परन्तु सारी व्यवस्था में एक भी शब्द ऐसा नहीं जो इस विषय में कोई नियम ठहराए कि मनुष्य अपनी शारीरिक प्रकृति के लाभ के लिए क्या करे या क्या छोड़े। और वास्तव में, चूँकि मनुष्य स्वभाव से ही अत्यधिक आत्म-प्रेम की ओर झुके हुए हैं, जो वे सदा बनाए रखते हैं, चाहे वे सत्य से कितनी ही दूर क्यों न भटक जाएँ, इसलिए पहले से ही अति मात्रा में विद्यमान प्रेम को भड़काने के लिए किसी व्यवस्था की आवश्यकता नहीं थी। इसलिए यह पूर्णतः स्पष्ट है,221 कि आज्ञाओं का पालन अपने आप से प्रेम में नहीं, वरन् परमेश्वर और अपने पड़ोसी के प्रेम में है; और वही सबसे उत्तम और पवित्र जीवन बिताता है जो जितना हो सके अपने लिए कम यत्न करता और कम जीता है; और उससे बुरा और अधर्मी जीवन कोई नहीं बिताता जो केवल अपने ही लिए यत्न करता और जीता है, और केवल अपने ही का खोजता और सोचता है। बल्कि, यह और अच्छी तरह प्रकट करने के लिए कि हमें अपने पड़ोसी से प्रेम करने की ओर कितनी दृढ़ता से झुकना चाहिए, प्रभु ने आत्म-प्रेम को मानो मापदण्ड बना दिया है, क्योंकि हमारे स्वभाव में उससे अधिक बलवान और प्रचण्ड कोई भावना नहीं है। इस अभिव्यक्ति के बल को ध्यान से तौलना चाहिए। क्योंकि वह (जैसा कुछ तर्कशास्त्रियों ने मूर्खतापूर्वक सोचा है) आत्म-प्रेम को पहला स्थान और प्रेम को दूसरा स्थान नहीं देता। वह तो उस प्रेम को, जो हम स्वभाव से अपने लिए अनुभव करते हैं, दूसरों की ओर मोड़ देता है। इसीलिए प्रेरित घोषित करता है कि प्रेम “अपनी भलाई नहीं चाहता,” (1 कुरिन्थियों 13:5)। और यह तर्क भी कौड़ी के मोल का नहीं कि नियन्त्रित वस्तु सदा नियम से निम्न होनी चाहिए। प्रभु ने आत्म-प्रेम को नियम इसलिए नहीं बनाया कि दूसरों के प्रति प्रेम उसके अधीन हो; परन्तु चूँकि स्वाभाविक भ्रष्टता के कारण प्रेम की भावना प्रायः हम ही पर टिकी रहती है, इसलिए वह दिखाता है कि उसे दूसरी दिशा में फैलना चाहिए—कि हम अपने पड़ोसी की भलाई करने के लिए उतनी ही तत्परता, उत्साह और चिन्ता से तैयार रहें जितनी अपनी भलाई के लिए।

220 यशायाह 1:17; 57:6; यिर्मयाह 7:5, 6; यहेजकेल 18:7, 8; होशे 6:6; जकर्याह 7:9, 10। 221 देखिए पुस्तक 3, अध्याय 7, खण्ड 4। और August. de Doctrina Christiana, Lib. 1 chap. 23 et seq.

55. हमारे उद्धारकर्ता ने सामरी के दृष्टान्त में (लूका 10:36) यह दिखा दिया है कि पड़ोसी शब्द में सबसे दूर का अजनबी भी आता है, इसलिए प्रेम की आज्ञा को अपने ही सम्बन्धियों तक सीमित करने का कोई कारण नहीं है। मैं इनकार नहीं करता कि सम्बन्ध जितना निकट हो, हमारी कृपा के कार्य उतने ही अधिक होने चाहिए। क्योंकि मानवीय दशा यह माँग करती है कि जो लोग रिश्ते, मित्रता या पड़ोस के बन्धनों से अधिक निकट जुड़े हैं, उनके बीच कर्तव्य अधिक साझे हों। और यह बिना परमेश्वर को अप्रसन्न किए होता है, जिसके विधान से हम एक प्रकार से ऐसा करने के लिए प्रेरित किए जाते हैं। परन्तु मैं कहता हूँ कि समस्त मानव-जाति को, बिना किसी अपवाद के, प्रेम की एक ही भावना में समेटना है: कि यहाँ यूनानी या बर्बर, योग्य या अयोग्य, मित्र या शत्रु का कोई भेद नहीं है, क्योंकि सब को उनके अपने आप में नहीं, वरन् परमेश्वर में देखना है। यदि हम इस दृष्टि से हट जाएँ, तो इसमें आश्चर्य नहीं कि हम भ्रम में उलझ जाएँ। इसलिए यदि हम प्रेम में सच्चे मार्ग पर चलना चाहते हैं, तो हमारा पहला कदम यह हो कि हम अपनी आँखें मनुष्य की ओर न फेरें, जिसे देखने से प्रेम की अपेक्षा घृणा अधिक बार उत्पन्न हो सकती है, वरन् परमेश्वर की ओर, जो माँगता है कि जो प्रेम हम उससे रखते हैं वह सारी मानव-जाति में फैले, ताकि हमारा मूल सिद्धान्त सदा यह रहे: मनुष्य जैसा भी हो, फिर भी वह प्रेम के योग्य है, क्योंकि परमेश्वर से प्रेम किया जाता है।

56. इसलिए विद्वत्तावादियों की अज्ञानता या दुष्टता से अधिक विनाशकारी कुछ नहीं हो सकता था, जिन्होंने बदला लेने और शत्रुओं से प्रेम करने सम्बन्धी आज्ञाओं को (जो पहले सब यहूदियों को दी गई थीं, और फिर सार्वभौमिक रूप से सब मसीहियों को दी गईं) ऐसी सलाहों में बदल दिया जिन्हें मानना या न मानना स्वतन्त्र था, और उनके अनिवार्य पालन को साधुओं तक सीमित कर दिया, जो केवल इस बात से कि उन्होंने स्वेच्छा से सलाहों का पालन करने का बन्धन अपने ऊपर लिया, साधारण मसीहियों से अधिक धर्मी ठहराए गए। उन्हें व्यवस्था के रूप में न मानने का जो कारण वे देते हैं, वह यह है कि वे बहुत भारी और बोझिल प्रतीत होती हैं, विशेषकर मसीहियों के लिए, जो अनुग्रह की व्यवस्था के अधीन हैं। क्या उन्हें सचमुच इतना साहस है कि वे अपने पड़ोसी के प्रेम सम्बन्धी परमेश्वर की सनातन व्यवस्था को नया रूप दें? क्या व्यवस्था का कोई ऐसा पन्ना है जिसमें कोई ऐसा भेद हो; या क्या हम हर पन्ने में ऐसी आज्ञाएँ नहीं पाते जो कठोरतम शब्दों में हम से शत्रुओं से प्रेम करने की माँग करती हैं? इस आज्ञा का क्या अर्थ है कि यदि हमारा शत्रु भूखा हो तो उसे खिलाएँ, यदि उसका बैल या गधा भटकता मिले तो उसे लौटा लाएँ, या यदि उसे बोझ के नीचे पड़ा देखें तो उसे उठाने में सहायता करें? (नीतिवचन 25:21; निर्गमन 23:4)। क्या हम मनुष्य के निमित्त पशुओं पर दया दिखाएँ, और स्वयं उसके प्रति कोई भली भावना न रखें? क्या? क्या प्रभु का यह वचन सनातन सत्य नहीं: “पलटा लेना मेरा काम है, मैं ही बदला दूँगा”? (व्यवस्थाविवरण 32:35)। यह एक और स्थान पर और अधिक स्पष्टता से कहा गया है: “तू अपने लोगों से बदला न लेना, और न उनके विरुद्ध मन में बैर रखना,” (लैव्यव्यवस्था 19:18)। या तो वे इन अंशों को व्यवस्था से मिटा दें, या प्रभु को व्यवस्था देनेवाले के रूप में स्वीकार करें, और उसे झूठमूठ केवल एक सलाहकार न बना डालें।

57. और भला उस अंश का क्या अर्थ है जिसका उन्होंने इस बेतुकी टीका से अपमान करने का साहस किया है? “अपने शत्रुओं से प्रेम रखो, जो तुम्हें श्राप दें उन्हें आशीष दो, जो तुम से बैर रखें उनका भला करो, और जो तुम्हारा अपमान करें और तुम्हें सताएँ उनके लिए प्रार्थना करो; जिससे तुम अपने स्वर्गीय पिता की सन्तान ठहरो,” (मत्ती 5:44, 45)। यहाँ कौन क्राइसोस्टम के उस तर्क से सहमत नहीं होगा (lib. de Compunctione Cordis, et ad रोमियों 7), कि उद्देश्य का स्वरूप ही स्पष्ट कर देता है कि ये उपदेश नहीं, आज्ञाएँ हैं? क्योंकि यदि हम परमेश्वर की सन्तान की गिनती से बाहर कर दिए जाएँ, तो हमारे पास क्या रह जाएगा? विद्वत्तावादियों के अनुसार केवल साधु ही स्वर्ग में हमारे पिता की सन्तान होंगे—केवल साधु ही परमेश्वर को अपना पिता कहकर पुकारने का साहस करेंगे। और इस बीच कलीसिया का क्या होगा? इसी नियम से वह अन्यजातियों और चुंगी लेनेवालों तक सीमित हो जाएगी। क्योंकि हमारा उद्धारकर्ता कहता है, “यदि तुम अपने प्रेम रखनेवालों ही से प्रेम रखो, तो तुम्हारे लिए क्या प्रतिफल होगा? क्या चुंगी लेनेवाले भी ऐसा ही नहीं करते?” यदि हमारे पास केवल मसीही नाम बचे और हम स्वर्ग के राज्य की मीरास से वंचित कर दिए जाएँ, तो हमारा बड़ा ही भला होगा! अगस्तीन का तर्क भी कम सशक्त नहीं: “जब प्रभु व्यभिचार को मना करता है, तो वह शत्रु की पत्नी के विषय में भी उसे उसी प्रकार मना करता है जैसे मित्र की पत्नी के विषय में; जब वह चोरी को मना करता है, तो वह किसी भी प्रकार की चोरी की अनुमति नहीं देता, चाहे मित्र से हो या शत्रु से,” (August. Lib. de Doctr. Christ)। अब, इन दो आज्ञाओं को, “चोरी न करना, व्यभिचार न करना,” पौलुस प्रेम के नियम के अधीन लाता है; बल्कि वह कहता है कि वे संक्षेप में इस वचन में समाई हैं, “तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख,” (रोमियों 13:9)। इसलिए या तो पौलुस व्यवस्था का झूठा व्याख्याकार होगा, या हमें अनिवार्य रूप से यह निष्कर्ष निकालना होगा कि इस आज्ञा के अधीन हम अपने शत्रुओं से भी उतना ही प्रेम रखने के लिए बँधे हैं जितना अपने मित्रों से। अतः जो लोग इस प्रकार उस जूए को उच्छृंखलता से उतार फेंकते हैं जो परमेश्वर की सन्तान के लिए साझा है, वे सचमुच शैतान की सन्तान ठहरते हैं। यह सन्देह किया जा सकता है कि इस सिद्धान्त को घोषित करने में उन्होंने अधिक मूर्खता दिखाई है या अधिक ढिठाई। कोई प्राचीन लेखक ऐसा नहीं जो इन्हें शुद्ध आज्ञाएँ न मानता हो। ग्रेगोरी के युग में भी इसमें सन्देह नहीं किया गया था, जैसा कि उसके निर्णायक कथन से स्पष्ट है; क्योंकि वह इसे निर्विवाद मानता है कि ये आज्ञाएँ हैं। और वे कितने मूर्खतापूर्ण तर्क देते हैं! वे कहते हैं कि यह बोझ मसीहियों के सहने के लिए बहुत कठिन होगा! मानो इससे अधिक कठिन कुछ कल्पना की जा सकती है कि प्रभु से अपने पूरे हृदय, प्राण और शक्ति से प्रेम किया जाए। इस व्यवस्था की तुलना में ऐसी कोई नहीं जो सरल न जान पड़े, चाहे वह अपने शत्रु से प्रेम करना हो, या अपने मन से बदले की हर भावना को निकाल देना। हमारी निर्बलता के लिए तो सब कुछ, व्यवस्था की सूक्ष्मतम बिन्दी तक, कठिन और दुष्कर है। प्रभु में हमारे पास सामर्थ्य है। जो वह आज्ञा देता है, उसे देना, और जो चाहता है उसकी आज्ञा देना, यह उसी का काम है। मसीहियों का अनुग्रह की व्यवस्था के अधीन होने का अर्थ यह नहीं कि वे बिना किसी व्यवस्था के निरंकुश भटकें, वरन् यह कि वे मसीह में कलम लगाए गए हैं, जिसके अनुग्रह से वे व्यवस्था के श्राप से छूटे हैं, और जिसके आत्मा के द्वारा उनके हृदयों में व्यवस्था लिखी हुई है। इस अनुग्रह को पौलुस ने, यद्यपि शब्द के उचित अर्थ में नहीं, एक व्यवस्था कहा है, परमेश्वर की व्यवस्था की ओर संकेत करते हुए, जिससे वह उसकी तुलना कर रहा था। विद्वत्तावादी व्यवस्था शब्द को पकड़कर उसे अपनी व्यर्थ कल्पनाओं की नींव बना लेते हैं।222

58. यही बात क्षम्य पाप शब्द के उनके प्रयोग के विषय में भी कहनी चाहिए, जो वे पहली पट्टी का उल्लंघन करनेवाली छिपी अभक्ति और दूसरी पट्टी की अन्तिम आज्ञा के सीधे उल्लंघन, दोनों के लिए करते हैं।223 वे क्षम्य पाप की यह परिभाषा देते हैं कि वह ऐसी इच्छा है जिसके साथ सोची-समझी सहमति नहीं होती और जो हृदय में देर तक नहीं रहती। परन्तु मैं कहता हूँ कि वह हृदय में प्रवेश भी नहीं कर सकती जब तक व्यवस्था में माँगी गई बातों की कमी न हो। हमें पराए देवता रखने से मना किया गया है। जब मन, अविश्वास के प्रभाव में, कहीं और देखता है या अचानक किसी इच्छा से पकड़ा जाता है कि अपना आनन्द किसी और ओर मोड़ दे, तो ये गतियाँ, चाहे कितनी ही क्षणिक हों, कहाँ से आती हैं, सिवाय इसके कि आत्मा में कोई खाली कोना है जो ऐसी परीक्षाओं को ग्रहण करता है? और चर्चा को लम्बा न करते हुए, हृदय, मन और प्राण से परमेश्वर से प्रेम करने की आज्ञा है; और इसलिए यदि प्राण की सारी शक्तियाँ परमेश्वर के प्रेम की ओर निर्देशित नहीं हैं, तो व्यवस्था की आज्ञाकारिता से विचलन है; क्योंकि वे भीतरी शत्रु जो परमेश्वर के शासन के विरुद्ध उठते हैं और उसके आदेशों को उलट देते हैं, यह प्रमाणित करते हैं कि उसका सिंहासन हमारे विवेकों में भली-भाँति स्थापित नहीं है। यह दिखाया जा चुका है कि अन्तिम आज्ञा यहाँ तक पहुँचती है। क्या हमारे मन में कोई अनुचित लालसा उठी है? तब हम लोभ के दोषी हैं, और व्यवस्था के उल्लंघनकारी ठहरते हैं। क्योंकि व्यवस्था हमें केवल अपने पड़ोसी की हानि पर विचार करने और योजना बनाने से ही नहीं रोकती, वरन् लोभ से उभारे और भड़काए जाने से भी रोकती है। परन्तु व्यवस्था का हर उल्लंघन हमें श्राप के अधीन करता है, और इसलिए अत्यन्त हल्की इच्छाएँ भी उस घातक दण्ड से मुक्त नहीं हो सकतीं। अगस्तीन कहता है, “अपने पापों को तौलने में हम धोखे का तराज़ू न लें, कि अपनी मर्ज़ी से जो चाहें और जैसे चाहें तौलें, इसे भारी और उसे हल्का कहें: परन्तु पवित्रशास्त्र का ईश्वरीय तराज़ू लें, जो प्रभु के भण्डार से लिया गया है, और उससे हर अपराध को तौलें, बल्कि तौलें नहीं, वरन् जो पहले ही प्रभु द्वारा तौला जा चुका है उसे पहचानें,” (August. De Bapt. cont. Donatist. Lib. 2 chap. 6)। और पवित्रशास्त्र क्या कहता है? निश्चय ही जब पौलुस कहता है कि “पाप की मजदूरी मृत्यु है,” (रोमियों 6:23), तो वह दिखाता है कि वह इस नीच भेद से बिलकुल अनजान था। चूँकि हम कपट की ओर बहुत ही झुके हुए हैं, इसलिए हमारे सुस्त विवेकों को सहलाने के लिए इस टुकड़े की बहुत ही कम आवश्यकता थी।

59. मैं चाहता हूँ कि वे विचार करें कि हमारे उद्धारकर्ता का क्या अर्थ था जब उसने कहा, “इसलिए जो कोई इन छोटी से छोटी आज्ञाओं में से किसी एक को तोड़े, और वैसा ही मनुष्यों को सिखाए, वह स्वर्ग के राज्य में सब से छोटा कहलाएगा,” (मत्ती 5:19)। क्या वे इसी गिनती में नहीं हैं जब वे व्यवस्था के उल्लंघन को घटाकर बताने का साहस करते हैं, मानो वह मृत्यु के योग्य नहीं? उचित मार्ग यह था कि हम केवल यह न विचारें कि क्या आज्ञा दी गई है, वरन् यह कि आज्ञा देनेवाला कौन है, क्योंकि उसकी व्यवस्था का हर छोटा-से-छोटा उल्लंघन उसके अधिकार को घटाता है। क्या वे किसी भी एक बात में परमेश्वर की महिमा का अपमान करना छोटी बात गिनते हैं? फिर, चूँकि परमेश्वर ने व्यवस्था में अपनी इच्छा स्पष्ट की है, इसलिए व्यवस्था के विपरीत हर बात उसे अप्रिय है। क्या वे यह कल्पना करेंगे कि परमेश्वर का क्रोध इतना निःशस्त्र हो गया है कि दण्ड के रूप में मृत्यु तुरन्त उसके पीछे नहीं आएगी? उसने स्पष्ट घोषणा की है (यदि उन्हें उसकी वाणी सुनने के लिए तैयार किया जा सके, उसके स्पष्ट सत्य को अपनी फीकी सूक्ष्मताओं से अँधेरा करने के बजाय), “जो प्राणी पाप करे वही मरेगा,” (यहेजकेल 18:20)। फिर, अभी उद्धृत किए गए अंश में, “पाप की मजदूरी मृत्यु है।” जिसे ये लोग पाप मानते हैं, क्योंकि वे उससे इनकार नहीं कर सकते, उसके विषय में वे तर्क देते हैं कि वह घातक नहीं। इस उन्माद को बहुत देर तक पाल चुकने के बाद, वे पश्चाताप करना सीखें; या यदि वे अपनी मूर्खता पर अड़े रहें, तो उन पर और ध्यान न देते हुए, परमेश्वर की सन्तान यह स्मरण रखें कि सब पाप घातक है, क्योंकि वह परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध विद्रोह है और अनिवार्य रूप से उसके क्रोध को भड़काता है; और क्योंकि वह व्यवस्था का उल्लंघन है, जिसके हर उल्लंघन के विरुद्ध, बिना किसी अपवाद के, परमेश्वर का न्याय सुनाया जा चुका है। पवित्र लोगों की त्रुटियाँ वास्तव में क्षम्य हैं, परन्तु अपने स्वभाव से नहीं, वरन् इसलिए कि परमेश्वर की दया से उन्हें क्षमा प्राप्त होती है।

222 फ्रेंच पाठ है “Ces folastres sans propos prennent un grand mystére en ce mot de Loy;” ये मूर्ख लोग बेतुके ढंग से इस शब्द “व्यवस्था” में कोई बड़ा रहस्य ढूँढ़ लेते हैं। 223 देखिए पुस्तक 3, अध्याय 4, खण्ड 28, जहाँ यह भी दिखाया गया है कि यह स्टोइकों का यह सिद्धान्त नहीं है कि सब पाप समान हैं।

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