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प्रार्थना—विश्वास का एक निरन्तर अभ्यास। उससे प्राप्त होनेवाले दैनिक लाभ (भाग 2/4)
14. यह आश्चर्य की बात है कि ये मनोहर प्रतिज्ञाएँ हमें ठण्डे रूप में ही प्रभावित करती हैं, या लगभग बिलकुल प्रभावित नहीं करतीं, इसलिए अधिकांश मनुष्य जीवन के जल के सोते को छोड़कर इधर-उधर भटकना और अपने लिए फटे हुए हौद खोदना पसन्द करते हैं, बजाय इसके कि उस ईश्वरीय उदारता को ग्रहण करें जो स्वेच्छा से उन्हें दी जा रही है। सुलैमान कहता है, “प्रभु का नाम दृढ़ गढ़ है; धर्मी उसमें भागकर सुरक्षित रहता है।” योएल ने निकट आ रही भयंकर विपत्ति की भविष्यद्वाणी करके यह यादगार वाक्य जोड़ा है: “और ऐसा होगा कि जो कोई प्रभु का नाम लेगा वह उद्धार पाएगा।” हम जानते हैं कि यह वास्तव में सुसमाचार के युग के विषय में है। सौ में से मुश्किल से एक मनुष्य परमेश्वर की उपस्थिति में आने को प्रेरित होता है, यद्यपि वह स्वयं यशायाह के द्वारा पुकारकर कहता है, “और ऐसा होगा कि उनके पुकारने से पहले ही मैं उन्हें उत्तर दूँगा; और वे अभी बोल ही रहे होंगे कि मैं सुन लूँगा।” यही आदर वह अन्यत्र सारी कलीसिया को सामान्य रूप से देता है, मानो वह मसीह के सब अंगों का हो: “वह मुझे पुकारेगा, और मैं उसे उत्तर दूँगा; मैं संकट में उसके साथ रहूँगा; मैं उसे छुड़ाऊँगा, और उसका आदर करूँगा।”467 तथापि मेरा अभिप्राय, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, सब अंशों को गिनाना नहीं, वरन् केवल कुछ अद्भुत अंशों को नमूने के रूप में चुनना है, कि परमेश्वर हमें अपनी ओर कितनी कृपा से खींचता है, और जब ऐसे सामर्थी उद्देश्यों के होते हुए भी हमारी सुस्ती हमें रोके रखती है तो हमारी कृतघ्नता कितनी अधिक होगी। इसलिए ये शब्द सदा हमारे कानों में गूँजते रहें: “यहोवा उन सब के निकट रहता है जो उसको पुकारते हैं, उन सब के जो उसे सच्चाई से पुकारते हैं,” (भजन संहिता 145:18)। इसी प्रकार वे अंश भी जो हमने यशायाह और योएल से उद्धृत किए, जिनमें परमेश्वर घोषणा करता है कि उसका कान हमारी प्रार्थनाओं के लिए खुला है, और जब हम अपनी चिन्ता उस पर डालते हैं तो वह सुखदायक सुगन्धवाली भेंट के समान आनन्दित होता है। इन प्रतिज्ञाओं का विशेष लाभ हम तब पाते हैं जब हम अपनी प्रार्थना भयभीत या सन्देहग्रस्त होकर नहीं करते, वरन् उसके वचन पर भरोसा रखकर, जिसकी महिमा अन्यथा हमें डरा देती, उसे पिता कहकर पुकारने का साहस करते हैं, क्योंकि वह स्वयं यह अति मनोहर नाम हमें सुझाने की कृपा करता है। ऐसे निमन्त्रणों से सुदृढ़ होकर हमें यह जान लेना शेष रहता है कि इनमें हमारे पास प्रार्थना के लिए पर्याप्त आधार है, क्योंकि हमारी प्रार्थनाएँ हमारे किसी पुण्य पर निर्भर नहीं हैं, वरन् उनका सारा मूल्य और सफलता की आशा परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं पर स्थापित और निर्भर है, इसलिए उन्हें किसी और सहारे की आवश्यकता नहीं, और उन्हें इधर-उधर ऊपर-नीचे ताकने की आवश्यकता भी नहीं। इसलिए हमारे मन में यह जमा रहे कि यद्यपि हम कुलपतियों, भविष्यद्वक्ताओं और प्रेरितों की सराही हुई पवित्रता की बराबरी नहीं करते, तो भी जैसे प्रार्थना की आज्ञा उनके समान हमारे लिए भी है, और विश्वास भी साझा है, वैसे ही यदि हम परमेश्वर के वचन पर टिके हैं तो इस विशेषाधिकार में हम उनके सहभागी हैं। क्योंकि परमेश्वर, जैसा पहले देखा जा चुका है, घोषणा करता है कि वह सब की सुनेगा और सब पर अनुग्रह करेगा, इसलिए वह अति दुखियों को भी आशा दिलाता है कि जो वे माँगेंगे वह पाएँगे; और इसलिए हमें सामान्य कथनों पर ध्यान देना चाहिए, जो, जैसा सामान्यतः कहा जाता है, आदि से अन्त तक किसी को बाहर नहीं रखते; बस हृदय में सच्चाई, अपने से असन्तोष, नम्रता और विश्वास हो, ताकि हम छल-भरी प्रार्थना के पाखण्ड से परमेश्वर के नाम को अपवित्र न करें। हमारा परम दयालु पिता उन्हें ठुकराएगा नहीं जिन्हें वह न केवल आने के लिए प्रोत्साहित करता है, वरन् हर सम्भव रीति से आग्रह भी करता है। 467 यिर्मयाह 2:13; नीतिवचन 18:10; योएल 2:32; यशायाह 65:24; भजन संहिता 91:15; 145:18। इसीलिए दाऊद की प्रार्थना की वह रीति, जिसका मैंने अभी उल्लेख किया: “और अब, हे प्रभु परमेश्वर, तू ही परमेश्वर है, और तेरे वचन सत्य हैं, और तूने अपने दास से यह भलाई करने की प्रतिज्ञा की है, कि वह सदा तेरे सामने बनी रहे” (2 शमूएल 7:28)। इसी प्रकार अन्यत्र, “तेरी करुणा मेरी शान्ति के लिए हो, जैसा तूने अपने दास से कहा है,” (भजन संहिता 119:76)। और इस्राएल की सारी जाति, जब-जब वाचा के स्मरण से अपने आपको दृढ़ करती है, स्पष्ट घोषणा करती है कि जब परमेश्वर ने ऐसा ठहराया है तो उन्हें भयभीत होकर प्रार्थना नहीं करनी चाहिए (उत्पत्ति 32:13)। इसमें उन्होंने कुलपतियों के उदाहरण का अनुसरण किया, विशेषकर याकूब के, जो यह मान लेने के बाद कि वह प्रभु के हाथ से पाई हुई इतनी दयाओं के योग्य नहीं, कहता है कि उसे और बड़े निवेदन करने का साहस इसलिए मिलता है कि परमेश्वर ने प्रतिज्ञा की थी कि वह उन्हें पूरा करेगा। परन्तु अविश्वासी चाहे जो बहाने बनाएँ, जब आवश्यकता दबाव डालती है तब भी वे परमेश्वर की ओर नहीं भागते, न उसे खोजते, न उसकी सहायता माँगते, तो वे उसे उसके योग्य आदर से वैसे ही वंचित करते हैं मानो वे अपने लिए नए देवता और मूर्तियाँ गढ़ रहे हों, क्योंकि इस प्रकार वे इनकार करते हैं कि परमेश्वर उनकी सब आशीषों का कर्ता है। इसके विपरीत, भक्त हृदयों को हर सन्देह से मुक्त करने में इससे बढ़कर कुछ प्रभावी नहीं कि वे इस विचार से सुसज्जित हों कि जब वे परमेश्वर की आज्ञा का पालन कर रहे हैं तब कोई बाधा उन्हें न रोके, क्योंकि वह घोषणा करता है कि आज्ञाकारिता से बढ़कर उसे कुछ प्रिय नहीं। इसलिए जो मैं पहले कह चुका हूँ वह और भी स्पष्ट हो जाता है, कि प्रार्थना में साहसी आत्मा भय, श्रद्धा और चिन्ता के साथ भली-भाँति मेल खाती है, और जब परमेश्वर औंधे गिरे हुओं को उठाता है तो इसमें कोई असंगति नहीं। इस प्रकार प्रत्यक्षतः असंगत कथन आपस में अद्भुत रीति से मेल खाते हैं। यिर्मयाह और दाऊद अपनी विनतियों को परमेश्वर के सामने नम्रता से रखने की बात करते हैं।468 एक अन्य स्थान में यिर्मयाह कहता है, “हम बिनती करते हैं, हमारी विनती तेरे सामने ग्रहण हो, और अपने परमेश्वर यहोवा से हमारे लिए, अर्थात् इस सारे बचे हुए दल के लिए, प्रार्थना कर।” दूसरी ओर, विश्वासियों के विषय में प्रायः कहा जाता है कि वे प्रार्थना उठाते हैं। हिजकिय्याह भविष्यद्वक्ता से मध्यस्थता का काम अपने ऊपर लेने को कहते समय ऐसा ही बोलता है। और दाऊद कहता है, “मेरी प्रार्थना तेरे सामने धूप के समान, और मेरा हाथ फैलाना सन्ध्याकाल के बलिदान के समान ठहरे।”469 इसका स्पष्टीकरण यह है कि यद्यपि विश्वासी परमेश्वर के पैतृक प्रेम पर निश्चय करके प्रसन्नता से उसकी सच्चाई पर भरोसा रखते हैं, और जो सहायता वह स्वेच्छा से देता है उसे माँगने में हिचकते नहीं, तो भी वे लापरवाह या ढीठ निश्चिन्तता से फूले नहीं समाते; वरन् प्रतिज्ञाओं की सीढ़ी पर चढ़ते हुए भी नम्र और दीन विनती करनेवाले ही बने रहते हैं।
15. यहाँ आपत्ति के रूप में कई प्रश्न उठाए जाते हैं। पवित्रशास्त्र बताता है कि परमेश्वर ने कभी-कभी ऐसी प्रार्थनाओं को स्वीकार किया जो ऐसे मनों से निकली थीं जो उचित रीति से शान्त या संयमित नहीं थे। यह सच है कि योताम ने शेकेम के निवासियों पर जो विपत्ति बाद में आई उसका शाप जिस कारण से दिया वह भली-भाँति स्थापित था; तो भी वह क्रोध और बदले से भड़का हुआ था (न्यायियों 9:20); और इसलिए परमेश्वर शाप को पूरा करके मानो आवेशपूर्ण आवेगों का अनुमोदन करता दिखाई देता है। ऐसा ही आवेश शिमशोन पर भी छाया, जब उसने प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, मैं बिनती करता हूँ, केवल इस बार मुझे बल दे, कि मैं पलिश्तियों से अपनी दोनों आँखों का एक ही बार बदला ले लूँ” (न्यायियों 16:28)। क्योंकि यद्यपि उसमें कुछ भले उत्साह का मिश्रण था, तो भी उसकी प्रबल भावना तीव्र, और इसलिए दूषित, बदले की लालसा की थी। 469 यिर्मयाह 42:9; दानिय्येल 9:18; यिर्मयाह 42:2; 2 राजाओं 19:4; भजन संहिता 144:2। परमेश्वर स्वीकार करता है, और इसलिए प्रत्यक्षतः यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि प्रार्थनाएँ प्रभावशाली होती हैं, चाहे वे वचन के नियम के अनुसार न ढाली गई हों। परन्तु मेरा उत्तर यह है, पहला, कि एकाकी उदाहरणों से कोई सनातन नियम निरस्त नहीं होता; और दूसरा, कि कभी-कभी कुछ गिने-चुने व्यक्तियों को विशेष प्रेरणाएँ दी गई हैं, जिनके कारण उनका मामला साधारण मनुष्यों से भिन्न हो जाता है। क्योंकि हमें उस उत्तर पर ध्यान देना चाहिए जो हमारे उद्धारकर्ता ने अपने चेलों को दिया जब उन्होंने बिना सोचे-समझे एलिय्याह के उदाहरण की नकल करना चाहा, “तुम नहीं जानते कि तुम कैसी आत्मा के हो” (लूका 9:55)। फिर भी हमें और आगे बढ़कर यह कहना चाहिए कि जिन इच्छाओं को परमेश्वर स्वीकार करता है वे सदा उसे प्रसन्न करनेवाली नहीं होतीं; परन्तु वह स्वीकार इसलिए करता है कि उदाहरण के रूप में पवित्रशास्त्र के उस सिद्धान्त का स्पष्ट प्रमाण देना आवश्यक है—अर्थात् कि वह दुखियों की सहायता करता है, और उन लोगों की कराहें सुनता है जो अन्यायपूर्वक पीड़ित होकर उससे सहायता माँगते हैं: और इसलिए वह अपने न्यायदण्ड तब पूरे करता है जब दरिद्रों की शिकायतें, यद्यपि अपने आप में ध्यान देने योग्य नहीं, उस तक पहुँचती हैं। क्योंकि कितनी ही बार दुष्टों को क्रूरता, लूट, हिंसा, वासना और अन्य अपराधों का दण्ड देने में, ढिठाई और उन्माद पर लगाम लगाने में, और अत्याचारी सत्ता को उलटने में, उसने प्रकट किया है कि वह उन लोगों की सहायता करता है जिन पर अनुचित अत्याचार हुआ, चाहे वे किसी अनजाने देवता को पुकारकर केवल हवा को ही पीट रहे हों? एक भजन है जो स्पष्ट सिखाता है कि प्रार्थनाएँ निष्फल नहीं जातीं, चाहे वे विश्वास के द्वारा स्वर्ग तक न पहुँचें (भजन संहिता 107:6, 13, 19)। क्योंकि वह उन प्रार्थनाओं को गिनाता है जिन्हें स्वाभाविक प्रवृत्ति से आवश्यकता अविश्वासियों से भी उसी प्रकार निकलवाती है जैसे विश्वासियों से, और जिनके विषय में वह घटना से दिखाता है कि परमेश्वर फिर भी अनुग्रहकारी है। क्या इस प्रकार सुनने की तत्परता से यह प्रमाणित करना है कि उनकी प्रार्थनाएँ उसे प्रिय हैं? नहीं; वरन् पहले तो इस बात से अपनी दया को बड़ा करके दिखाना है कि अविश्वासियों की इच्छाएँ भी ठुकराई नहीं जातीं; और दूसरे, अपने सच्चे आराधकों को अधिक आग्रहपूर्ण प्रार्थना के लिए उभारना है, जब वे देखते हैं कि कभी-कभी दुष्टों का विलाप भी निष्फल नहीं जाता। फिर भी इसका यह कारण नहीं कि विश्वासी उस नियम से हट जाएँ जो परमेश्वर ने उन पर ठहराया है, या अविश्वासियों से डाह करें, मानो वे जो चाहते थे उसे पाकर बहुत कुछ पा गए। हमने देखा है (अध्याय 3, खण्ड 25) कि इसी प्रकार परमेश्वर अहाब के बनावटी पश्चाताप के आगे झुका, कि वह दिखाए कि जब उसके चुने हुए सच्चे पछतावे के साथ उसकी कृपा चाहते हैं तब वह उनकी सुनने को कितना तत्पर है। इसलिए वह यहूदियों को डाँटता है कि अपनी प्रार्थनाओं के सुने जाने की उसकी तत्परता का अनुभव करने के थोड़े ही समय बाद वे अपनी हठीली प्रवृत्तियों की ओर लौट गए। न्यायियों की पुस्तक से भी स्पष्ट है कि जब-जब वे रोए, चाहे उनके आँसू छल-भरे थे, वे अपने शत्रुओं के हाथ से छुड़ाए गए। इसलिए, जैसे परमेश्वर अपना सूर्य बुरों और भलों दोनों पर बिना भेद के उदय करता है, वैसे ही वह उनके आँसुओं को तुच्छ नहीं जानता जिनका पक्ष भला है और जिनका दुःख राहत के योग्य है। इस बीच, यद्यपि वह उनकी सुनता है, उसका उद्धार से उससे अधिक सम्बन्ध नहीं जितना उस भोजन की आपूर्ति का जो वह अपनी भलाई को तुच्छ जाननेवाले अन्य लोगों को देता है। अब्राहम और शमूएल के विषय में अधिक कठिन प्रश्न प्रतीत होता है, जिनमें से एक ने परमेश्वर के वचन की किसी शिक्षा के बिना सदोमवासियों के पक्ष में प्रार्थना की, और दूसरे ने स्पष्ट निषेध के विरुद्ध शाऊल के पक्ष में प्रार्थना की (उत्पत्ति 18:23; 1 शमूएल 15:11)। ऐसा ही मामला यिर्मयाह का है, जिसने प्रार्थना की कि नगर नष्ट न हो (यिर्मयाह 32:16)। यह सच है कि उनकी प्रार्थनाएँ अस्वीकार हुईं, परन्तु यह कहना कठोर प्रतीत होता है कि उन्होंने बिना विश्वास के प्रार्थना की। विनम्र पाठक, मुझे आशा है, इस समाधान से सन्तुष्ट होंगे—अर्थात् कि उस सामान्य सिद्धान्त पर झुकते हुए जिसके अनुसार परमेश्वर हमें अयोग्यों पर भी दयालु होने की आज्ञा देता है, वे विश्वास से सर्वथा रहित नहीं थे, यद्यपि इस विशेष अवसर पर उनकी इच्छा पूरी नहीं हुई। अगस्तीन चतुराई से टिप्पणी करता है, “सन्त विश्वास में प्रार्थना कैसे करते हैं जब वे परमेश्वर से उसके ठहराए हुए के विपरीत माँगते हैं? इसी कारण कि वे उसकी इच्छा के अनुसार प्रार्थना करते हैं, उसकी गुप्त और अटल इच्छा के अनुसार नहीं, वरन् उस इच्छा के अनुसार जो वह उन्हें सुझाता है, ताकि वह उनकी किसी और रीति से सुने; जैसा वह बुद्धिमानी से भेद करता है,” (August. de Civit. Dei, Lib. 22 c. 2)। यह सच कहा गया है: क्योंकि अपनी अगम्य युक्ति में वह घटनाओं को ऐसा नियन्त्रित करता है कि सन्तों की प्रार्थनाएँ, चाहे उनमें विश्वास और भूल का मिश्रण हो, व्यर्थ नहीं जातीं। फिर भी इससे उनका अनुकरण करने की अनुमति उतनी ही नहीं मिलती जितनी स्वयं सन्तों को क्षमा मिलती है, जिनके विषय में मैं इनकार नहीं करता कि वे उचित सीमा से आगे बढ़ गए। इसलिए, जहाँ कोई निश्चित प्रतिज्ञा न हो, वहाँ परमेश्वर से हमारी बिनती के साथ कोई शर्त जुड़ी होनी चाहिए। यहाँ हम दाऊद की प्रार्थना का उल्लेख कर सकते हैं, “मेरे लिए जाग, उस न्याय के लिए जिसकी तूने आज्ञा दी है,” (भजन संहिता 7:6); क्योंकि वह हमें स्मरण दिलाता है कि उसे सांसारिक आशीष के लिए प्रार्थना करने की विशेष शिक्षा मिली थी।470 16. यह भी ध्यान देने योग्य है कि प्रार्थना के जिन चार नियमों की मैंने चर्चा की है वे इतनी कठोरता से लागू नहीं किए जाते कि परमेश्वर उन प्रार्थनाओं को ठुकरा दे जिनमें उसे उत्कट उत्साह और उचित रीति से ढली इच्छाओं के साथ पूर्ण विश्वास या पश्चाताप न मिले। हमने कहा है (खण्ड 4) कि यद्यपि प्रार्थना विश्वासियों का परमेश्वर के साथ घनिष्ठ वार्तालाप है, तो भी श्रद्धा और संकोच का पालन करना चाहिए: हमें अपनी इच्छाओं को खुली लगाम नहीं देनी चाहिए, न उससे आगे कुछ चाहना चाहिए जितना परमेश्वर की अनुमति है; और इसके अतिरिक्त, ऐसा न हो कि परमेश्वर की महिमा तुच्छ ठहरे, हमारे मनों को शुद्ध और पवित्र श्रद्धा की ओर उठाया जाना चाहिए। यह किसी मनुष्य ने कभी उचित पूर्णता से नहीं किया। क्योंकि साधारण मनुष्यों की बात छोड़ दें, दाऊद की शिकायतों में कितनी ही बार असंयम की गन्ध आती है? ऐसा नहीं कि वह वास्तव में परमेश्वर से झगड़ना या उसके न्यायों पर कुड़कुड़ाना चाहता है, परन्तु दुर्बलता के कारण चूककर वह अपने दुःखों को अपने स्वर्गीय पिता की गोद में उँडेल देने से बढ़कर कोई सान्त्वना नहीं पाता। वरन् हमारा तुतलाना भी परमेश्वर सह लेता है, और जब-जब हमसे कोई बात उतावली में निकल जाती है तो हमारी अज्ञानता क्षमा की जाती है: सचमुच, इस कृपा के बिना हमें प्रार्थना करने की कोई स्वतन्त्रता ही न रहती। परन्तु यद्यपि दाऊद का अभिप्राय अपने आपको पूरी तरह परमेश्वर की इच्छा के अधीन कर देना था, और उसने जितने धीरज से उतने ही उत्साह से प्रार्थना की, फिर भी अनियमित भावनाएँ प्रकट होती हैं, वरन् कभी-कभी फूट पड़ती हैं—ऐसी भावनाएँ जो उस पहले नियम से, जो हमने ठहराया, कम विरोध नहीं रखतीं। विशेषकर, उनतालीसवें भजन के एक वाक्यांश में हम देख सकते हैं कि यह सन्त अपने शोक की प्रचण्डता में किस प्रकार बह गया और सीमा के भीतर न रह सका। “मुझे छोड़ दे,471 कि मैं बल पा सकूँ, इससे पहले कि मैं यहाँ से चला जाऊँ और फिर न रहूँ,” (भजन संहिता 39:13)। तुम इसे उस निराश मनुष्य की भाषा कहोगे जिसकी और कोई इच्छा नहीं थी सिवाय इसके कि परमेश्वर हट जाए और उसे उसके कष्टों में ही चैन लेने के लिए छोड़ दे। ऐसा नहीं कि उसका भक्त मन ऐसे असंयम में जा गिरता है, या, जैसा निकम्मे लोग करते हैं, वह परमेश्वर से पीछा छुड़ाना चाहता है; वह केवल शिकायत करता है कि ईश्वरीय क्रोध उसकी सहन-शक्ति से अधिक है। उन परीक्षाओं के समय प्रायः ऐसी इच्छाएँ निकल पड़ती हैं जो वचन के नियम के अनुरूप नहीं होतीं, और जिनमें सन्त यह ठीक से नहीं सोचते कि क्या उचित और हितकर है। ऐसे दोषों से दूषित प्रार्थनाएँ सचमुच ठुकराए जाने के योग्य हैं; फिर भी यदि सन्त विलाप करें, अपने आपको सुधारें और अपने होश में लौट आएँ, तो परमेश्वर क्षमा कर देता है। दूसरे नियम के विषय में भी (जिसके लिए खण्ड 6 देखें) ऐसे ही दोष होते हैं, क्योंकि सन्तों को प्रायः अपनी ही ठण्डक से जूझना पड़ता है, उनकी घटी और दुर्दशा उन्हें गम्भीर प्रार्थना के लिए पर्याप्त रूप से प्रेरित नहीं करती। प्रायः ऐसा भी होता है कि उनके मन भटक जाते हैं और लगभग खो जाते हैं; इसलिए इस बात में भी क्षमा की आवश्यकता है, ऐसा न हो कि उनकी प्रार्थनाएँ, शिथिल या अधूरी, या बीच में टूटी और भटकती होने के कारण, अस्वीकार हो जाएँ। परमेश्वर ने हमारे मन में जो स्वाभाविक भावनाएँ डाली हैं उनमें से एक यह है कि प्रार्थना तब तक सच्ची नहीं होती जब तक विचार ऊपर की ओर न उठाए जाएँ। इसी से हाथ उठाने की वह रीति चली, जिसका हम उल्लेख कर चुके हैं, जो सब युगों और जातियों में जानी जाती है और आज भी सामान्य प्रचलन में है। परन्तु हाथ उठाते समय कौन है जो सुस्ती का अनुभव नहीं करता, हृदय के पृथ्वी से चिपके रहने का? पापों की क्षमा की बिनती के विषय में (खण्ड 8), यद्यपि कोई विश्वासी उसे छोड़ता नहीं, तो भी वे सब जो सचमुच प्रार्थना का अभ्यास करते हैं अनुभव करते हैं कि वे उस बलिदान का मुश्किल से दसवाँ भाग लाते हैं जिसकी बात दाऊद करता है, “परमेश्वर के बलिदान टूटा हुआ मन हैं: हे परमेश्वर, तू टूटे और पिसे हुए हृदय को तुच्छ न जानेगा,” (भजन संहिता 51:17)। इस प्रकार दुहरी क्षमा सदा माँगनी चाहिए; पहली इसलिए कि वे बहुत-से दोषों के प्रति सचेत हैं, जिनका बोध फिर भी उन्हें इस प्रकार नहीं छूता कि वे अपने आप से उतने असन्तुष्ट हों जितना उन्हें होना चाहिए; और दूसरी इसलिए कि जितना वे पश्चाताप और परमेश्वर के भय में आगे बढ़ पाए हैं, उतना वे अपने अपराधों के लिए उचित शोक से दीन हो जाते हैं, और न्यायी से दण्ड की क्षमा की प्रार्थना करते हैं। प्रार्थना को सबसे अधिक दूषित करनेवाली वस्तु, यदि परमेश्वर कृपापूर्वक बीच में न पड़े, विश्वास की दुर्बलता या अपूर्णता है; परन्तु यह आश्चर्य की बात नहीं कि यह दोष परमेश्वर द्वारा क्षमा किया जाता है, जो अपने लोगों को प्रायः कठिन परीक्षाओं में डालता है, मानो वह वास्तव में उनके विश्वास को बुझा देना चाहता हो। ऐसी परीक्षाओं में सबसे कठिन वह है जब विश्वासियों को पुकारना पड़ता है, “हे सेनाओं के प्रभु परमेश्वर, तू अपनी प्रजा की प्रार्थना पर कब तक क्रोधित रहेगा?” (भजन संहिता 80:4), मानो उनकी प्रार्थनाएँ ही उसे अप्रसन्न करती हों। इसी प्रकार, जब यिर्मयाह कहता है “मैं चाहे दुहाई दूँ और चिल्लाऊँ, वह मेरी प्रार्थना को रोक देता है” (विलापगीत 3:8), तब इसमें कोई सन्देह नहीं कि वह अत्यन्त व्याकुलता में था। इसी प्रकार के असंख्य उदाहरण पवित्रशास्त्र में मिलते हैं, जिनसे प्रकट है कि सन्तों के विश्वास में प्रायः सन्देह और भय मिले रहते थे, ऐसे कि विश्वास और आशा रखते हुए भी वे कुछ अंश तक अविश्वास प्रकट कर देते थे। परन्तु क्योंकि वे उस सीमा तक नहीं पहुँचते जितनी वांछनीय है, यह उनके लिए अपने दोषों को सुधारने में और अधिक परिश्रम करने का एक अतिरिक्त कारण है, ताकि वे प्रतिदिन प्रार्थना के सिद्ध नियम के और निकट पहुँचें, और साथ ही यह अनुभव करें कि वे लोग बुराइयों की कैसी गहरी खाई में डूबे हैं जो अपने उपचारों में ही अपने ऊपर नए रोग ले आते हैं: क्योंकि कोई प्रार्थना ऐसी नहीं जिसे परमेश्वर उचित रीति से तुच्छ न ठहराता, यदि वह उन दोषों को अनदेखा न करता जिनसे सब प्रार्थनाएँ दूषित हैं। मैं ये बातें इसलिए नहीं कहता कि विश्वासी अपने किए किसी भी दोष के लिए निश्चिन्त होकर अपने आपको क्षमा कर दें, वरन् इसलिए कि वे अपने आपसे कठोर लेखा लें, और इस प्रकार इन बाधाओं को पार करने का यत्न करें; और यद्यपि शैतान उन्हें प्रार्थना करने से रोकने के लिए सब मार्ग बन्द करने का प्रयत्न करता है, तो भी वे उन्हें तोड़कर निकल जाएँ, यह दृढ़ विश्वास रखते हुए कि यद्यपि वे सब रुकावटों से मुक्त नहीं हैं, उनके प्रयास परमेश्वर को प्रिय हैं, और उनकी इच्छाएँ स्वीकार की जाती हैं, बशर्ते वे आगे बढ़ते रहें और अपना लक्ष्य बनाए रखें, चाहे तुरन्त उस तक न पहुँचें। 471 लैटिन: “Desine a me.” फ्रेंच: “Retire-toy;”—मुझसे हट जा।
468 लैटिन: “prosternere preces”; फ्रेंच: “mettent bas leurs prieres;”—अपनी प्रार्थनाओं को नीचे रखते हैं।
470 फ्रेंच में जोड़ा गया है, “dequel il n’eust pas autrement esté asseuré;”—जिसके विषय में उसे अन्यथा निश्चय न होता।
17. परन्तु क्योंकि कोई भी मनुष्य अपने ही नाम से आगे आने और परमेश्वर की उपस्थिति में प्रकट होने के योग्य नहीं, इसलिए हमारे स्वर्गीय पिता ने, हमें उस भय और लज्जा से एकदम छुड़ाने के लिए, जिससे सब को दबा हुआ महसूस करना चाहिए,472 अपना पुत्र यीशु मसीह हमारा प्रभु हमें हमारे सहायक और मध्यस्थ के रूप में दिया है, ताकि उसकी अगुवाई में हम निडर होकर निकट जाएँ, इस भरोसे के साथ कि उसके मध्यस्थ होने पर जो कुछ हम उसके नाम से माँगेंगे वह हमें अस्वीकार न होगा, क्योंकि ऐसा कुछ नहीं जो पिता उसे अस्वीकार कर सके (1 तीमुथियुस 2:5; 1 यूहन्ना 2:1; खण्ड 36, 37 देखें)। विश्वास के विषय में जो कुछ हमने पहले सिखाया है उस सबको इसी से जोड़ना आवश्यक है; क्योंकि जैसे प्रतिज्ञा हमें मसीह को हमारे मध्यस्थ के रूप में देती है, वैसे ही यदि जो हम माँगते हैं उसे पाने की हमारी आशा उसी पर आधारित न हो, तो वह हमें प्रार्थना के विशेषाधिकार से वंचित कर देती है। क्योंकि परमेश्वर की भयावह महिमा का विचार करके भय से भर जाए बिना रहना असम्भव है; और इसलिए जब तक मसीह बीच में आकर भयावह महिमा के सिंहासन को अनुग्रह के सिंहासन में न बदल दे, तब तक हमारी अपनी अयोग्यता का बोध हमें दूर रखे रहेगा, जैसा प्रेरित सिखाता है कि इस प्रकार हम “अनुग्रह के सिंहासन के निकट हियाव बाँधकर आएँ, कि हम पर दया हो, और वह अनुग्रह पाएँ जो आवश्यकता के समय हमारी सहायता करे,” (इब्रानियों 4:16)। और जैसे प्रार्थना के विषय में एक नियम ठहराया गया है, जैसे यह प्रतिज्ञा दी गई है कि प्रार्थना करनेवालों की सुनी जाएगी, वैसे ही हमें विशेष रूप से आज्ञा दी गई है कि हम मसीह के नाम से प्रार्थना करें, इस प्रतिज्ञा के साथ कि जो हम उसके नाम से माँगेंगे वह पाएँगे। हमारा उद्धारकर्ता कहता है, “जो कुछ तुम मेरे नाम से माँगोगे, वही मैं करूँगा; कि पिता पुत्र में महिमा पाए;” “अब तक तुमने मेरे नाम से कुछ नहीं माँगा; माँगो तो पाओगे, कि तुम्हारा आनन्द पूरा हो जाए,” (यूहन्ना 14:13; 16:24)। इसलिए यह निर्विवाद रूप से स्पष्ट है कि जो लोग मसीह के नाम को छोड़ किसी और नाम से परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं वे हठपूर्वक उसकी आज्ञाओं को झुठलाते हैं, और उसकी इच्छा को कुछ नहीं समझते, जबकि उनके पास पाने की कोई प्रतिज्ञा नहीं। क्योंकि, जैसा पौलुस कहता है, “परमेश्वर की सब प्रतिज्ञाओं के लिए उसी में ‘हाँ’ है, और उसी में ‘आमीन’ है;” (2 कुरिन्थियों 1:20), अर्थात् वे उसी में पुष्ट और पूरी होती हैं।
18. और हमें समय की बात पर ध्यान से विचार करना चाहिए। मसीह अपने चेलों को आज्ञा देता है कि स्वर्ग में चढ़ जाने के बाद वे उसकी मध्यस्थता की शरण लें: “उस दिन तुम मेरे नाम से माँगोगे,” (यूहन्ना 16:26)। यह निश्चित है कि आरम्भ से ही जिन्होंने कभी प्रार्थना की उनकी सुनी गई तो केवल मध्यस्थ के कारण। इसी कारण परमेश्वर ने व्यवस्था में आज्ञा दी थी कि केवल याजक पवित्रस्थान में प्रवेश करे, अपने कन्धों पर इस्राएल के बारह गोत्रों के नाम और अपनी छाती पर उतने ही बहुमूल्य रत्न लिए हुए, जबकि लोग दूर बाहरी आँगन में खड़े रहें और फिर अपनी प्रार्थनाएँ याजक की प्रार्थना के साथ मिलाएँ। वरन् बलिदान का भी यह प्रभाव था कि वह उनकी प्रार्थनाओं को प्रमाणित और पक्का करता था। इसलिए व्यवस्था की उस छायारूप विधि ने सिखाया, पहला, कि हम सब परमेश्वर के मुख के सामने से बहिष्कृत हैं, और इसलिए एक मध्यस्थ की आवश्यकता है जो हमारे नाम से प्रकट हो, और हमें अपने कन्धों पर उठाए और अपनी छाती पर बाँधे रखे, कि हम उसी के व्यक्तित्व में सुने जाएँ; और दूसरा, कि हमारी प्रार्थनाएँ, जो, जैसा कहा गया है, अन्यथा कभी अशुद्धता से मुक्त न होतीं, उसके लहू के छिड़काव से शुद्ध की जाती हैं। और हम देखते हैं कि सन्तों ने, जब कुछ पाना चाहा, तो बलिदानों पर अपनी आशा रखी, क्योंकि वे जानते थे कि बलिदान से सब प्रार्थनाएँ पक्की की जाती हैं: दाऊद कहता है, “वह तेरी सब भेंटों को स्मरण करे, और तेरे होमबलि को ग्रहण करे,” (भजन संहिता 20:3)। इससे हम निष्कर्ष निकालते हैं कि अपने लोगों की प्रार्थनाएँ ग्रहण करने में परमेश्वर आरम्भ से ही मसीह की मध्यस्थता से प्रसन्न होता रहा है। तो फिर मसीह एक नए समय (“उस दिन”) की बात क्यों करता है जब चेलों को उसके नाम से प्रार्थना करनी आरम्भ करनी थी, यदि इसलिए नहीं कि यह अनुग्रह, अब अधिक उज्ज्वल रूप से प्रकट होकर, हमारे यहाँ भी अधिक आदर के योग्य ठहरे? इसी अर्थ में उसने थोड़ा पहले कहा था, “अब तक तुमने मेरे नाम से कुछ नहीं माँगा; माँगो।” ऐसा नहीं कि वे मध्यस्थ के काम से सर्वथा अनजान थे (सब यहूदी इन आरम्भिक बातों में शिक्षित थे), परन्तु वे स्पष्ट रूप से नहीं समझते थे कि मसीह अपने स्वर्गारोहण के द्वारा पहले से अधिक कलीसिया का सहायक होगा। इसलिए अपनी अनुपस्थिति पर उनके शोक को किसी असाधारण परिणाम से सान्त्वना देने के लिए, वह अपने सहायक होने के काम का दावा करता है, और कहता है कि अब तक वे उस विशेष लाभ से रहित रहे थे जिसका आनन्द लेना उनका विशेषाधिकार होगा, जब उसकी मध्यस्थता की सहायता पाकर वे और अधिक स्वतन्त्रता से परमेश्वर को पुकारेंगे। इसी अर्थ में प्रेरित कहता है कि हमें “यीशु के लहू के द्वारा उस नए और जीवते मार्ग से पवित्रस्थान में प्रवेश करने का हियाव है, जो उसने हमारे लिए प्रतिष्ठित किया,” (इब्रानियों 10:19, 20)। इसलिए यदि हम (जैसा कहा जाता है) दोनों हाथों से उस अनमोल दान को ग्रहण न करें जो विशेष रूप से हमारे लिए ठहराया गया है, तो हम और भी निरुत्तर ठहरते हैं।
472 फ्रेंच: “Confusion que nous avons, ou devons avoir en nousmesmes;”—वह लज्जा जो हमारे अपने भीतर है, या होनी चाहिए।
19. इसके अतिरिक्त, क्योंकि वही एकमात्र मार्ग और एकमात्र द्वार है जिससे हम परमेश्वर के निकट आ सकते हैं, इसलिए जो इस मार्ग से हट जाते और इस द्वार को ठुकराते हैं, उनके पास कोई और नहीं बचता; उसका सिंहासन क्रोध, न्याय और भय के सिवा कुछ नहीं दिखाता। संक्षेप में, क्योंकि पिता ने उसे हमारा अगुवा और सिर ठहराया है, इसलिए जो उसे किसी भी रीति से छोड़ते या उससे फिरते हैं वे, जहाँ तक उनसे हो सके, उस मुहर को मैला करने और मिटाने का यत्न करते हैं जो परमेश्वर ने लगाई है। इसलिए मसीह ही एकमात्र मध्यस्थ है जिसकी मध्यस्थता से पिता अनुग्रहकारी और विनती सुननेवाला बनता है (1 तीमुथियुस 2:5)। क्योंकि यद्यपि सन्तों को अब भी मध्यस्थता की प्रार्थनाएँ करने की अनुमति है, जिनके द्वारा वे एक-दूसरे के उद्धार के लिए परमेश्वर से बिनती करते हैं, और जिनका उल्लेख प्रेरित करता है (इफिसियों 6:18, 19; 1 तीमुथियुस 2:1); तो भी वे उसी एक मध्यस्थता पर निर्भर हैं, और उसमें कुछ घटाने से कोसों दूर हैं। क्योंकि जैसे एक देह के अंगों के रूप में हम एक-दूसरे के लिए जो मध्यस्थता की प्रार्थनाएँ करते हैं वे प्रेम की भावना से उपजती हैं, वैसे ही उनका सम्बन्ध इसी एक सिर से है। इस प्रकार मसीह के नाम से किए जाने पर वे और क्या करती हैं सिवाय यह घोषित करने के कि मसीह की मध्यस्थता के बिना कोई मनुष्य किसी प्रार्थना से तनिक भी लाभ नहीं पा सकता? जैसे मसीह की मध्यस्थता में ऐसा कुछ नहीं जो कलीसिया के भिन्न-भिन्न अंगों को एक-दूसरे के लिए प्रार्थना करने से रोके, वैसे ही यह निश्चित सिद्धान्त माना जाए कि कलीसिया में इस प्रकार की जानेवाली सब मध्यस्थता की प्रार्थनाओं का सम्बन्ध उस एक मध्यस्थता से होना चाहिए। वरन् हमें विशेष रूप से इसी कारण अपनी कृतज्ञता प्रकट करने में सावधान रहना चाहिए कि परमेश्वर हमारी अयोग्यता को क्षमा करके न केवल प्रत्येक व्यक्ति को अपने लिए प्रार्थना करने देता है, वरन् सब को एक-दूसरे के लिए मध्यस्थता करने देता है। परमेश्वर ने अपनी कलीसिया में ऐसे मध्यस्थता करनेवालों को स्थान दिया है जो अपने लिए निजी रूप से प्रार्थना करते हुए अस्वीकार किए जाने के योग्य होते, तो इस कृपा का दुरुपयोग करके मसीह के आदर को धुँधला करना कितना ढिठाई का काम होगा?
20. इसके अतिरिक्त, सोफ़िस्ट लोग निरी बकवास करते हैं जब वे कहते हैं कि मसीह छुटकारे का मध्यस्थ है, परन्तु विश्वासी मध्यस्थता की प्रार्थना के मध्यस्थ हैं; मानो मसीह ने केवल एक अस्थायी मध्यस्थता की हो, और एक सनातन और अविनाशी मध्यस्थता अपने सेवकों के लिए छोड़ दी हो। सचमुच, उन लोगों से उसे यही व्यवहार मिलता है जो केवल उसके आदर का एक छोटा-सा अंश छीनने का बहाना करते हैं। पवित्रशास्त्र की भाषा बहुत भिन्न है, जिसकी सरलता से हर भक्त मनुष्य सन्तुष्ट रहेगा, इन ठगों की कोई परवाह किए बिना। क्योंकि जब यूहन्ना कहता है, “यदि कोई पाप करे, तो पिता के पास हमारा एक सहायक है, अर्थात् धार्मिक यीशु मसीह,” (1 यूहन्ना 2:1), तो क्या उसका अभिप्राय केवल यह है कि कभी हमारा एक सहायक था; क्या वह उसे निरन्तर मध्यस्थता का श्रेय नहीं देता? पौलुस जब घोषणा करता है कि वह “परमेश्वर के दाहिने हाथ पर भी है, और हमारे लिए मध्यस्थता भी करता है,” (रोमियों 8:32), तो उसका क्या अर्थ है? और जब एक अन्य स्थान में वह घोषणा करता है कि वही परमेश्वर और मनुष्यों के बीच एकमात्र मध्यस्थ है (1 तीमुथियुस 2:5), तो क्या वह उन विनतियों की ओर संकेत नहीं कर रहा जिनका उसने थोड़ा पहले उल्लेख किया था? पहले यह कहकर कि प्रार्थनाएँ सब मनुष्यों के लिए की जाएँ, वह उसी कथन की पुष्टि में तुरन्त जोड़ता है कि परमेश्वर एक है, और परमेश्वर और मनुष्यों के बीच मध्यस्थ भी एक है। अगस्तीन भी कोई भिन्न व्याख्या नहीं देता जब वह कहता है, “मसीही मनुष्य अपनी प्रार्थनाओं में एक-दूसरे को सौंपते हैं। परन्तु वह जिसके लिए कोई मध्यस्थता नहीं करता, जबकि वह स्वयं सब के लिए मध्यस्थता करता है, वही एकमात्र सच्चा मध्यस्थ है। यद्यपि प्रेरित पौलुस उस सिर के अधीन एक प्रमुख अंग था, तो भी क्योंकि वह मसीह की देह का अंग था, और जानता था कि कलीसिया का सबसे सच्चा महायाजक आकृति के रूप में नहीं, भीतरी परदे के पार परमपवित्र स्थान में नहीं गया, वरन् दृढ़ और स्पष्ट सत्य के रूप में स्वर्ग के भीतरी पवित्रस्थान में पवित्रता के लिए गया, ऐसी पवित्रता जो काल्पनिक नहीं, वरन् सनातन है, इसलिए वह भी अपने आपको विश्वासियों की प्रार्थनाओं को सौंपता है। वह अपने आपको परमेश्वर और लोगों के बीच मध्यस्थ नहीं बनाता, वरन् माँगता है कि मसीह की देह के सब अंग एक-दूसरे के लिए प्रार्थना करें, क्योंकि अंग एक-दूसरे के साथ सहानुभूति रखते हैं: यदि एक अंग दुःख पाता है तो दूसरे उसके साथ दुःख पाते हैं। और इस प्रकार पृथ्वी पर अब भी परिश्रम करनेवाले सब अंगों की पारस्परिक प्रार्थनाएँ उस सिर तक पहुँचती हैं जो स्वर्ग में पहले जा चुका है, और जिसमें हमारे पापों के लिए प्रायश्चित है। क्योंकि यदि पौलुस मध्यस्थ होता, तो अन्य प्रेरित भी होते, और इस प्रकार बहुत-से मध्यस्थ होते, और पौलुस का यह कथन टिक न पाता, ‘परमेश्वर एक ही है, और परमेश्वर और मनुष्यों के बीच में एक ही मध्यस्थ भी है, अर्थात् मसीह यीशु जो मनुष्य है;’ जिसमें हम भी एक हैं यदि हम शान्ति के बन्धन में विश्वास की एकता बनाए रखें,”473 (August. Contra Parmenian, Lib. 2 cap. 8)। इसी प्रकार एक अन्य स्थान में अगस्तीन कहता है, “यदि तू याजक चाहता है, तो वह आकाशों के ऊपर है, जहाँ वह उनके लिए मध्यस्थता करता है जो पृथ्वी पर तेरे लिए मरे,” (अगस्तीन, भजन संहिता 94 पर)—यह कल्पना न कर कि वह अपने पिता के घुटनों पर गिरकर विनती-भरी मध्यस्थता करता है; परन्तु हम प्रेरित के साथ यह समझते हैं कि वह परमेश्वर की उपस्थिति में प्रकट होता है, और उसकी मृत्यु की सामर्थ्य का प्रभाव हमारे लिए एक निरन्तर मध्यस्थता का है; कि ऊपरी पवित्रस्थान में प्रवेश करके, वही जगत के अन्त तक अपने लोगों की प्रार्थनाएँ प्रस्तुत करता रहता है, जो बाहरी आँगन में दूर खड़े हैं।
21. जो सन्त देह में मर चुके हैं और मसीह में जीवित हैं, उनके विषय में, यदि हम उन्हें प्रार्थना का श्रेय देते हैं, तो हम यह कल्पना न करें कि परमेश्वर से बिनती करने का उनके पास मसीह के सिवा कोई और मार्ग है जो अकेला मार्ग है, या कि उनकी प्रार्थनाएँ परमेश्वर के यहाँ किसी और नाम से ग्रहण होती हैं। इसलिए, जब पवित्रशास्त्र हमें और सबसे हटाकर केवल मसीह की ओर बुलाता है, जब हमारे स्वर्गीय पिता ने सब कुछ उसी में एकत्र करना चाहा है, तब दूसरों के द्वारा पहुँच पाने का यत्न करना, जिससे हम उससे खिंच जाएँ जिसके बिना पहुँच नहीं मिल सकती, पागलपन नहीं तो अत्यन्त मूर्खता है। परन्तु कौन इनकार कर सकता है कि कई युगों तक यही रीति रही, और जहाँ-जहाँ पोप-तन्त्र का बोलबाला है वहाँ अब भी यही रीति है? परमेश्वर की कृपा पाने के लिए मनुष्यों के पुण्य बार-बार सामने रखे जाते हैं, और अकसर मसीह को छोड़कर उन्हीं के नाम से परमेश्वर से बिनती की जाती है। मैं पूछता हूँ, क्या यह उस एकमात्र मध्यस्थता का काम उन्हें सौंप देना नहीं जिसका दावा हमने ऊपर मसीह के लिए किया है? फिर कौन स्वर्गदूत या शैतान ने कभी किसी मनुष्य को उस काल्पनिक मध्यस्थता के विषय में एक शब्द भी बताया? पवित्रशास्त्र में इस विषय पर एक शब्द भी नहीं है। तो इस कल्पना का आधार क्या था? निश्चय ही, जब मानव मन इस प्रकार अपने लिए ऐसी सहायता ढूँढ़ता है जिसकी परमेश्वर के वचन से अनुमति नहीं, तो वह स्पष्ट अपना अविश्वास प्रकट करता है (खण्ड 27 देखें)। परन्तु यदि हम उन सब के विवेक से अपील करें जो सन्तों की मध्यस्थता में आनन्द लेते हैं, तो हम पाएँगे कि उसका उनके पास केवल यही कारण है, कि वे चिन्ता से भरे हैं, मानो वे समझते हों कि मसीह अपर्याप्त या अत्यन्त कठोर है। 473 इब्रानियों 9:11, 24; रोमियों 15:30; इफिसियों 6:19; कुलुस्सियों 4:3; 1 कुरिन्थियों 12:25; 1 तीमुथियुस 2:5; इफिसियों 4:3।
इस चिन्ता से वे मसीह का अनादर करते हैं, और उसे उसकी एकमात्र मध्यस्थ की उपाधि से वंचित करते हैं, वह उपाधि जो पिता ने उसे उसके विशेष अधिकार के रूप में दी, और जिसे किसी और को नहीं सौंपना चाहिए। ऐसा करके वे उसके जन्म की महिमा को धुँधला करते और उसके क्रूस को व्यर्थ ठहराते हैं; संक्षेप में, जो कुछ उसने किया या सहा उस सबसे उचित प्रशंसा छीन लेते और उसे उससे ठग लेते हैं, क्योंकि जो कुछ उसने किया और सहा वह सब यही दिखाता है कि वह एकमात्र मध्यस्थ है और उसे ऐसा ही माना जाना चाहिए। साथ ही, वे परमेश्वर की उस कृपा को ठुकराते हैं जिससे उसने अपने आपको उन पर पिता के रूप में प्रकट किया, क्योंकि यदि वे मसीह को अपना भाई नहीं मानते तो वह उनका पिता नहीं है। यह वे स्पष्ट रूप से करने से इनकार करते हैं यदि वे यह नहीं सोचते कि वह उनके लिए भाई का-सा स्नेह रखता है; ऐसा स्नेह जिससे अधिक कोमल और ममतामय कोई नहीं हो सकता। इसलिए पवित्रशास्त्र केवल उसी को प्रस्तुत करता है, हमें उसी के पास भेजता है, और हमें उसी में स्थिर करता है। अम्बर्स कहता है, “वह हमारा मुँह है जिससे हम पिता से बोलते हैं; हमारी आँख है जिससे हम पिता को देखते हैं; हमारा दाहिना हाथ है जिससे हम अपने आपको पिता के सामने अर्पित करते हैं। उसकी मध्यस्थता को छोड़ न हमारा, न किसी सन्त का, परमेश्वर से कोई सम्पर्क है,” (Ambros. Lib. de Isaac et Anima)। यदि वे यह आपत्ति करें कि कलीसियाओं में जो सार्वजनिक प्रार्थनाएँ की जाती हैं वे इन शब्दों पर समाप्त होती हैं, हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा, तो यह व्यर्थ का बहाना है; क्योंकि मसीह की मध्यस्थता को मृतकों की प्रार्थनाओं और पुण्यों के साथ मिला देने से उसका उतना ही अपमान होता है जितना उसे बिलकुल छोड़कर केवल मृतकों का उल्लेख करने से। फिर उनकी सब प्रार्थनावलियों, भजनों और स्तुतिगानों में, जहाँ मृत सन्तों का हर प्रकार से सम्मान किया जाता है, मसीह का कोई उल्लेख नहीं।
22. परन्तु यहाँ मूर्खता इस सीमा तक पहुँच गई है कि अन्धविश्वास की प्रतिभा प्रकट हो जाती है, जो एक बार लगाम उतार फेंकने पर बिना सीमा के उछल-कूद करने लगता है। जब लोग सन्तों की मध्यस्थता की ओर देखने लगे, तो धीरे-धीरे हर एक को एक विशेष कार्यभार सौंपा गया, ऐसे कि काम की भिन्नता के अनुसार कभी एक, कभी दूसरे मध्यस्थ को पुकारा जाने लगा। फिर व्यक्तियों ने विशेष सन्तों को अपना लिया, और उन पर विश्वास रखा, मानो वे संरक्षक देवता हों। और इस प्रकार न केवल नगरों की संख्या के अनुसार देवता खड़े किए गए (वही आरोप जो भविष्यद्वक्ता ने प्राचीन काल में इस्राएल पर लगाया, यिर्मयाह 2:28; 11:13), वरन् व्यक्तियों की संख्या के अनुसार भी। परन्तु जबकि सन्त अपनी सब इच्छाओं में केवल परमेश्वर की इच्छा की ओर देखते, उसी को निहारते और उसी में सन्तुष्ट रहते हैं, तो भी उन्हें परमेश्वर के राज्य के आगमन की लालसा की प्रार्थना के सिवा कोई और प्रार्थना सौंपना उनके विषय में मूर्खता, शारीरिक और अपमानजनक रीति से सोचना है। इस दृष्टिकोण से अधिक दूर कुछ नहीं हो सकता कि प्रत्येक सन्त निजी भावना के वश होकर अपने ही आराधकों पर सबसे अधिक कृपालु होने को प्रवृत्त है। अन्त में बड़ी संख्या में लोग इस भयंकर निन्दा में जा गिरे हैं कि उन्हें केवल सहायक के रूप में नहीं, वरन् अपने उद्धार के अधिष्ठाता के रूप में पुकारते हैं। देखो कि अभागे मनुष्य कितनी गहराई तक गिरते हैं जब वे अपना उचित स्थान, अर्थात् परमेश्वर का वचन, छोड़ देते हैं। मैं अधर्म के उन अधिक भयावह नमूनों की बात नहीं करता जो परमेश्वर, स्वर्गदूतों और मनुष्यों के लिए घृणित होते हुए भी वे स्वयं उनसे कोई पीड़ा या लज्जा नहीं अनुभव करते। बारबरा या कैथरीन, और उनके जैसों की मूर्ति या चित्र के सामने दण्डवत् होकर वे पातर नॉस्टर बुदबुदाते हैं;474 और उनके पासबान475 इस उन्मत्त चाल को चंगा करने या रोकने से इतने दूर हैं कि लाभ की गन्ध से लुभाकर वे उसका अनुमोदन और समर्थन करते हैं। परन्तु इस नीच और अपराधपूर्ण व्यवहार के कलंक से अपने आपको मुक्त करना चाहते हुए भी वे किस बहाने से इस रीति का बचाव कर सकते हैं कि एलोई (एलिजियस) या मेदार को पुकारें कि वे उनके सेवकों की ओर देखें और स्वर्ग से उन्हें सहायता भेजें, या पवित्र कुँवारी को कि वह अपने पुत्र को आज्ञा दे कि वह उनकी माँगें पूरी करे?476 कार्थेज की महासभा ने वेदी पर सन्तों से सीधी प्रार्थना करने को मना किया। सम्भव है कि इन पवित्र पुरुषों ने, बिगड़ी हुई प्रथा के बल को पूरी तरह दबा न पाने के कारण, यह रोक इसलिए लगाई कि सार्वजनिक प्रार्थनाएँ Sancte Petre, ora pro nobis—सन्त पतरस, हमारे लिए प्रार्थना कर जैसे वाक्यांशों से दूषित न हों। परन्तु यह शैतानी अतिशयता कितनी आगे बढ़ गई है जब मनुष्य मृतकों को मसीह और परमेश्वर के विशेष गुण सौंपने में भी नहीं हिचकते!
23. यह प्रमाणित करने का प्रयत्न करते हुए कि ऐसी मध्यस्थता को पवित्रशास्त्र से कुछ समर्थन मिलता है, वे व्यर्थ परिश्रम करते हैं। हम (वे कहते हैं) प्रायः स्वर्गदूतों की प्रार्थनाओं के विषय में पढ़ते हैं, और केवल इतना ही नहीं, वरन् कहा जाता है कि विश्वासियों की प्रार्थनाएँ उनके हाथों परमेश्वर की उपस्थिति में पहुँचाई जाती हैं। परन्तु यदि वे परलोक सिधारे सन्तों की तुलना स्वर्गदूतों से करना चाहते हैं, तो यह प्रमाणित करना आवश्यक होगा कि सन्त सेवा करनेवाली आत्माएँ हैं, जिन्हें हमारे उद्धार की देखरेख का काम सौंपा गया है, जिन्हें हमारे सब मार्गों में हमारी अगुवाई करने, हमें घेरे रहने, चेताने और सान्त्वना देने, हमारी रखवाली करने का क्षेत्र दिया गया है। ये सब स्वर्गदूतों को सौंपे गए हैं, परन्तु इनमें से कोई सन्तों को नहीं। वे परलोक सिधारे सन्तों को स्वर्गदूतों के साथ कितने बेतुके ढंग से मिला देते हैं, यह उन अनेक भिन्न-भिन्न कामों से भली-भाँति प्रकट है जिनके द्वारा पवित्रशास्त्र एक को दूसरे से अलग करता है। कोई भी बिना अनुमति पाए किसी पार्थिव न्यायी के सामने पैरवीकार का काम करने का साहस नहीं करेगा; तो फिर कीड़ों को यह छूट कहाँ से मिली कि वे अपने आपको परमेश्वर पर मध्यस्थ बनाकर थोपें, जबकि उन्हें ऐसा कोई काम सौंपा ही नहीं गया? परमेश्वर ने स्वर्गदूतों को हमारी सुरक्षा का भार सौंपना चाहा है। इसीलिए वे हमारी पवित्र सभाओं में उपस्थित रहते हैं, और कलीसिया उनके लिए एक रंगमंच है जिसमें वे परमेश्वर की नाना प्रकार की बुद्धि को देखते हैं (इफिसियों 3:10)। जो लोग इस काम को, जो उन्हीं का विशेष काम है, दूसरों को सौंप देते हैं, वे निश्चय ही उस व्यवस्था को बिगाड़ते और उलट देते हैं जो परमेश्वर ने स्थापित की है और जो अटल रहनी चाहिए। इसी चतुराई से वे अन्य अंशों को भी उद्धृत करते हैं। परमेश्वर ने यिर्मयाह से कहा, “यदि मूसा और शमूएल भी मेरे सामने खड़े होते, तो भी मेरा मन इन लोगों की ओर न फिरता,” (यिर्मयाह 15:1)। वे पूछते हैं कि वह मृतकों के विषय में ऐसा कैसे कह सकता था, सिवाय इसके कि वह जानता था कि वे जीवितों के लिए मध्यस्थता करते हैं? मेरा निष्कर्ष इसके विपरीत यह है: जब इस प्रकार प्रकट होता है कि न मूसा ने, न शमूएल ने इस्राएल के लोगों के लिए मध्यस्थता की, तो मृतकों की कोई मध्यस्थता नहीं थी। क्योंकि सन्तों में से कौन लोगों के उद्धार के लिए परिश्रम करता सोचा जा सकता है जब मूसा, जो जीवित रहते इस विषय में सब से बहुत आगे था, कुछ नहीं करता? इसलिए यदि वे इस तुच्छ तर्क पर अड़े रहें कि मृतक जीवितों के लिए मध्यस्थता करते हैं, क्योंकि प्रभु ने कहा, “यदि वे मेरे सामने खड़े होते,” (intercesserint), तो मैं कहीं अधिक विश्वासयोग्य रीति से यह तर्क दूँगा: मूसा, जिसके विषय में कहा गया है, “यदि उसने मध्यस्थता की होती,” उसने लोगों की अत्यन्त आवश्यकता में उनके लिए मध्यस्थता नहीं की: इसलिए सम्भावना यही है कि कोई और सन्त भी मध्यस्थता नहीं करता, क्योंकि सब मनुष्यत्व, भलाई और पैतृक चिन्ता में मूसा से बहुत पीछे हैं। इस प्रकार अपनी छिद्रान्वेषण से उन्हें बस इतना ही मिलता है कि वे उन्हीं हथियारों से घायल होते हैं जिनसे वे अपने को भली-भाँति सुरक्षित समझते हैं। परन्तु इस सीधे-सादे वाक्य को इस प्रकार तोड़ना-मरोड़ना अत्यन्त हास्यास्पद है; क्योंकि प्रभु केवल यह घोषणा करता है कि वह लोगों के अधर्म को न छोड़ेगा, चाहे कोई मूसा या शमूएल, जिनकी प्रार्थनाओं के प्रति वह इतना कृपालु दिखा चुका था, उनके लिए मध्यस्थता करे। यह अर्थ यहेजकेल के एक समान अंश से अत्यन्त स्पष्ट रूप से निकलता है: “चाहे नूह, दानिय्येल और अय्यूब, ये तीनों पुरुष उसमें होते, तो भी वे अपनी धार्मिकता के द्वारा केवल अपने ही प्राण बचा सकते, प्रभु यहोवा की यह वाणी है,” (यहेजकेल 14:14)। यहाँ कोई सन्देह नहीं कि हमें इन शब्दों को ऐसे समझना है मानो कहा गया हो, यदि नामित व्यक्तियों में से दो फिर जी उठते; क्योंकि तीसरा तब भी जीवित था, अर्थात् दानिय्येल, जिसने, यह सर्वविदित है, तब जवानी की फूल-सी अवस्था में अतुलनीय भक्ति का प्रदर्शन किया था। इसलिए हम उन्हें छोड़ दें जिनके विषय में पवित्रशास्त्र घोषणा करता है कि उन्होंने अपनी दौड़ पूरी कर ली। इसीलिए जब पौलुस दाऊद के विषय में बोलता है, तो वह यह नहीं कहता कि उसने अपनी प्रार्थनाओं से आनेवाली पीढ़ी की सहायता की, वरन् केवल यह कि उसने “अपने समय के लोगों की सेवा की,” (प्रेरितों के काम 13:36)।
474 इरैस्मस, यद्यपि स्पष्ट उजाले में लड़खड़ाता और आँखों पर पट्टी बाँधे चलता है, 1530 में सैडोलेट को लिखे एक पत्र में इस प्रकार लिखने का साहस करता है: “Primum, constat nullum esse locum in divinis voluminibus, qui permittat invocare divos, nisi fortasse detorquere huc placet, quod dives in Evangelica parabola implorat opem Abrahæ. Quanquam autem in re tanta novare quicquam præter auctoritatem Scripturæ, merito periculosum videri possit, tamen invocationem divorum nusquam improbo,” &c.—पहली बात, यह स्पष्ट है कि पवित्र ग्रन्थ में कोई ऐसा अंश नहीं जो सन्तों को पुकारने की अनुमति देता हो, जब तक कि हम उस बात को, जो दृष्टान्त में धनवान के अब्राहम से सहायता माँगने के विषय में कही गई है, इस ओर खींचना न चाहें। परन्तु यद्यपि ऐसे गम्भीर विषय में पवित्रशास्त्र के अधिकार के बिना कुछ भी नया चलाना उचित रूप से जोखिम-भरा प्रतीत हो सकता है, तो भी मैं सन्तों को पुकारने की कभी निन्दा नहीं करता, इत्यादि।
475 लैटिन: “Pastores;”—फ्रेंच: “ceux qui se disent prelats, curés ou precheurs;”—जो अपने आपको प्रधान याजक, पल्ली-पुरोहित या प्रचारक कहते हैं।
476 फ्रेंच: “Mais encore qu’ils taschent de laver leurs mains d’un si vilain sacrilege, comme s’il ne se commettoit point en leurs serviteurs pour les aider? mesmes où ils supplient la vierge Marie de commander a son fils qu’il leur ottroye leurs requestes?”—परन्तु यद्यपि वे अपने हाथ ऐसे नीच अपवित्र कर्म से धोने का यत्न करते हैं, क्योंकि वह उनके मिस्साओं या सन्ध्याकालीन प्रार्थनाओं में नहीं किया जाता, तो वे उन निन्दाओं का किस बहाने से बचाव करेंगे जिन्हें वे पूरे गले से दोहराते हैं, जिनमें वे सन्त एलोई या सन्त मेदार से प्रार्थना करते हैं कि स्वर्ग से उनके सेवकों की ओर देखें और सहायता करें; यहाँ तक कि कुँवारी मरियम से बिनती करते हैं कि वह अपने पुत्र को आज्ञा दे कि वह उनकी माँगें पूरी करे?
24. वे फिर आपत्ति करते हैं, क्या तब वे सब भक्ति की हर इच्छा से वंचित कर दिए गए, जिन्होंने अपने सारे जीवन में भक्ति और दया के सिवा कुछ साँस न लिया? मैं यह जिज्ञासापूर्वक झाँकना नहीं चाहता कि वे क्या करते या सोचते हैं; परन्तु सम्भावना यह है कि नाना प्रकार की और निजी इच्छाओं के आवेग के अधीन होने के बजाय वे एक स्थिर और अटल इच्छा से परमेश्वर के राज्य की लालसा करते हैं, जो दुष्टों के नाश में उतना ही है जितना विश्वासियों के उद्धार में। यदि ऐसा है, तो इसमें कोई सन्देह नहीं कि उनका प्रेम मसीह की देह की सहभागिता तक सीमित है, और उससे आगे नहीं बढ़ता जो उस सहभागिता के स्वभाव के अनुकूल है। परन्तु यद्यपि मैं मान लूँ कि इस रीति से वे हमारे लिए प्रार्थना करते हैं, तो भी वे अपनी विश्रान्ति नहीं खोते कि पार्थिव चिन्ताओं से विचलित हो जाएँ: इसलिए हमारा उन्हें पुकारना तो और भी दूर की बात है। न इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि ऐसा पुकारना अपनाया जाए, इस कारण कि जब मनुष्य पृथ्वी पर जीवित हैं तो एक-दूसरे की प्रार्थनाओं में अपने आपको सौंप सकते हैं। यह प्रेम की भावना को जीवित रखने का काम करता है, जब वे मानो एक-दूसरे की घटियों में हिस्सा बँटाते और एक-दूसरे का बोझ उठाते हैं। यह वे प्रभु की आज्ञा से करते हैं, और प्रतिज्ञा के बिना नहीं, जो प्रार्थना में सबसे प्रमुख दो बातें हैं। परन्तु ऐसे सब कारण मृतकों पर लागू नहीं होते, जिनसे प्रभु ने उन्हें हमारी संगति से हटाकर हमारे लिए सम्पर्क का कोई साधन नहीं छोड़ा (सभोपदेशक 9:5, 6), और जिन्हें, जहाँ तक हम अनुमान लगा सकते हैं, उसने हमारे साथ सम्पर्क का कोई साधन नहीं छोड़ा। परन्तु यदि कोई यह कहे कि वे निश्चय ही हमारे लिए वही प्रेम बनाए रखते होंगे, क्योंकि वे एक ही विश्वास में हमारे साथ जुड़े हैं, तो हमें किसने बताया है कि उनके कान हमारी आवाज़ की ध्वनि सुन सकने योग्य हैं, या उनकी आँखें हमारी आवश्यकताओं को देख सकने योग्य स्पष्ट हैं? हमारे विरोधी तो अपने विद्यालयों की छाया में किसी ऐसे प्रकाश की बात करते हैं जो परलोक सिधारे सन्तों पर परमेश्वर के मुख से चमकता है, और जिसमें, मानो दर्पण में, वे अपने उच्च निवास से मनुष्यों के कार्य देखते हैं; परन्तु इसे उस आत्मविश्वास से कहना जिसका ये लोग साहस करते हैं, अपने ही मस्तिष्क के उच्छृंखल स्वप्नों के बल पर, और बिना किसी अधिकार के, परमेश्वर के गुप्त न्यायों में झाँकना-घुसना और पवित्रशास्त्र को रौंदना चाहना है, जो इतनी बार घोषणा करता है कि हमारे शरीर की बुद्धि परमेश्वर की बुद्धि से बैर रखती है, हमारे मन की व्यर्थता की सर्वथा निन्दा करता है, और हमारी बुद्धि को नम्र करके हमें केवल परमेश्वर की इच्छा की ओर देखने को कहता है।
25. पवित्रशास्त्र के अन्य अंश जिन्हें वे अपनी भूल की रक्षा में काम में लाते हैं, उन्हें दुर्भाग्यपूर्ण रीति से तोड़ा-मरोड़ा गया है। याकूब (वे कहते हैं) यूसुफ़ के पुत्रों के लिए माँगता है, “मेरा नाम, और मेरे पितरों अब्राहम और इसहाक का नाम उनके द्वारा लिया जाए,” (उत्पत्ति 48:16)। पहले हम देखें कि इस्राएलियों में इस पुकारने का स्वरूप क्या था। वे अपने पितरों से विनती नहीं करते कि वे उनकी सहायता को आएँ, परन्तु वे परमेश्वर से बिनती करते हैं कि वह अपने सेवकों अब्राहम, इसहाक और याकूब को स्मरण करे। इसलिए उनका उदाहरण उन्हें कोई समर्थन नहीं देता जो स्वयं सन्तों को सम्बोधित करते हैं। परन्तु इन लट्ठों की जड़ता ऐसी है कि वे समझते ही नहीं कि याकूब के नाम को पुकारना क्या है, और क्यों पुकारा जाता है, इसलिए यह आश्चर्य नहीं कि वे उसे करने की रीति के विषय में ऐसी बचकानी भूल करते हैं। यह कथन पवित्रशास्त्र में बार-बार आता है। यशायाह स्त्रियों के पुरुषों के नाम से पुकारे जाने की बात करता है, जब वे उन्हें अपना पति रखती हैं और उनकी सुरक्षा में रहती हैं (यशायाह 4:1)। इस्राएलियों पर अब्राहम का नाम पुकारे जाने का अर्थ है उनकी जाति का मूल उसी में ठहराना, और उसे अपने कर्ता और पिता के रूप में विशेष रीति से स्मरण करना। याकूब ऐसा अपने नाम की प्रसिद्धि बढ़ाने की किसी चिन्ता से नहीं करता, वरन् इसलिए कि वह जानता है कि उसके वंश का सारा सुख उस वाचा की विरासत में है जो परमेश्वर ने उनके साथ बाँधी थी। यह देखकर कि इससे उन्हें सब आशीषों का सार मिलेगा, वह प्रार्थना करता है कि वे उसकी जाति के गिने जाएँ, जो वाचा का उत्तराधिकार उन्हें सौंपने के सिवा और कुछ नहीं। फिर वे, जब अपनी प्रार्थनाओं में इस विषय का उल्लेख करते हैं, तो मृतकों की मध्यस्थता की शरण नहीं लेते, वरन् उस वाचा को स्मरण करते हैं जिसमें उनका परम दयालु पिता अब्राहम, इसहाक और याकूब के कारण उन पर कृपालु और अनुग्रहकारी होने का वचन देता है। अन्य बातों में सन्तों ने अपने पितरों के पुण्यों पर कितना कम भरोसा किया, इसे कलीसिया की सार्वजनिक वाणी भविष्यद्वक्ताओं में घोषित करती है: “निश्चय तू हमारा पिता है, चाहे अब्राहम हमें न जाने, और इस्राएल हमें न पहचाने; हे प्रभु, तू हमारा पिता, हमारा छुड़ानेवाला है,” (यशायाह 63:16)। और जब कलीसिया इस प्रकार बोलती है, तब साथ ही जोड़ती है, “अपने सेवकों के निमित्त लौट आ,” मध्यस्थता जैसी किसी बात का विचार न करते हुए, केवल वाचा के लाभ पर ध्यान देते हुए। अब तो, जब हमारे पास प्रभु यीशु है, जिसके हाथ में दया की सनातन वाचा न केवल बाँधी गई वरन् पक्की भी की गई, तब अपनी प्रार्थनाओं में सामने रखने के लिए इससे उत्तम कौन-सा नाम हो सकता है? और क्योंकि वे भले विद्वान इन शब्दों से यह सिद्ध करना चाहते हैं कि कुलपति मध्यस्थ हैं, मैं चाहता हूँ कि वे मुझे बताएँ कि इतनी बड़ी भीड़ में477 कलीसिया के पिता अब्राहम को कोई स्थान क्यों नहीं दिया जाता? हम भली-भाँति जानते हैं कि वे अपने मध्यस्थ किस टोली में से चुनते हैं।478 तब वे मुझे बताएँ कि अब्राहम की उपेक्षा और उसे ठुकराने में क्या संगति है, जिसे परमेश्वर ने सब से बढ़कर चुना और सर्वोच्च आदर तक उठाया। इसका एकमात्र कारण यह है कि जब स्पष्ट था कि प्राचीन कलीसिया में ऐसी कोई रीति नहीं थी, तो उन्होंने उचित समझा कि कुलपतियों के विषय में कुछ न कहकर इस रीति की नवीनता को छिपा दें: मानो केवल नामों की भिन्नता से वे एक ऐसी रीति को क्षमा करा सकते हों जो एक साथ नई और अशुद्ध है। वे कभी-कभी यह आपत्ति भी करते हैं कि परमेश्वर से प्रार्थना की जाती है कि वह अपने लोगों पर “दाऊद के निमित्त” दया करे, (भजन संहिता 132:10; कैल्विन की टीका देखें)। यह उनकी भूल का समर्थन करने से इतना दूर है कि वह उसका सबसे सशक्त खण्डन है। हमें दाऊद की भूमिका पर विचार करना चाहिए। वह सारे विश्वासियों के समूह में से अलग किया गया है ताकि उस वाचा को स्थापित करे जो परमेश्वर ने उसके हाथ में बाँधी। इस प्रकार ध्यान व्यक्ति पर नहीं, वाचा पर है। उसके अधीन, प्रतिरूप के रूप में, मसीह की एकमात्र मध्यस्थता का दावा किया गया है। परन्तु जो दाऊद के लिए, मसीह के प्रतिरूप के रूप में, विशेष था वह निश्चय ही दूसरों पर लागू नहीं होता।
26. परन्तु कुछ लोग इस बात से प्रभावित होते प्रतीत होते हैं कि सन्तों की प्रार्थनाओं के विषय में प्रायः कहा गया है कि वे सुनी गईं। क्यों? क्योंकि उन्होंने प्रार्थना की। “उन्होंने तुझे पुकारा,” (भजनकार कहता है), “और वे छुड़ाए गए: उन्होंने तुझ पर भरोसा रखा, और लज्जित न हुए,” (भजन संहिता 22:5)। हम भी उनके उदाहरण पर प्रार्थना करें, कि उनकी नाईं हमारी भी सुनी जाए। इसके विपरीत, ये लोग बेतुका तर्क करते हैं कि केवल वे ही सुने जाएँगे जो पहले ही सुने जा चुके हैं। याकूब कितना बेहतर तर्क करता है, “एलिय्याह भी हमारे समान दुःख-सुख भोगी मनुष्य था, और उसने गिड़गिड़ाकर प्रार्थना की कि मेंह न बरसे; और साढ़े तीन वर्ष तक भूमि पर मेंह नहीं बरसा। फिर उसने प्रार्थना की, तो आकाश से वर्षा हुई, और भूमि फलवन्त हुई।” (याकूब 5:17, 18)। क्या? क्या वह यह निष्कर्ष निकालता है कि एलिय्याह के पास कोई विशेष अधिकार था, और उसके लाभ के लिए हमें उसकी शरण लेनी चाहिए? बिलकुल नहीं। वह शुद्ध और भक्तिपूर्ण प्रार्थना की निरन्तर प्रभावशीलता दिखाता है, ताकि हम भी उसी प्रकार प्रार्थना करने को प्रेरित हों। क्योंकि दूसरों की सुनने में परमेश्वर की कृपा और तत्परता की व्याख्या द्वेषपूर्ण ठहरती है, यदि उनका उदाहरण हमें उसकी प्रतिज्ञा में अधिक दृढ़ भरोसा न दे, क्योंकि उसकी घोषणा यह नहीं कि वह एक, दो या कुछ गिने-चुने लोगों की ओर कान लगाएगा, वरन् उन सब की ओर जो उसका नाम पुकारते हैं। इस अज्ञान में वे कम क्षम्य हैं, क्योंकि वे मानो खुल्लमखुल्ला पवित्रशास्त्र की अनेक चेतावनियों को तुच्छ जानते प्रतीत होते हैं। दाऊद परमेश्वर की सामर्थ्य से बार-बार छुड़ाया गया। क्या यह उस सामर्थ्य को उसे इसलिए देने के लिए था कि हम उसके निवेदन पर छुड़ाए जाएँ? उसका कथन बहुत भिन्न है: “धर्मी लोग मुझे घेर लेंगे; क्योंकि तू मेरी भलाई करेगा,” (भजन संहिता 142:7)। फिर, “धर्मी लोग भी देखकर डरेंगे, और उस पर हँसेंगे,” (भजन संहिता 52:6)। “इस दीन जन ने पुकारा, तो यहोवा ने सुन लिया, और उसको उसके सब संकटों से बचा लिया,” (भजन संहिता 34:6)। भजन संहिता में ऐसी बहुत-सी प्रार्थनाएँ हैं जिनमें दाऊद परमेश्वर को पुकारता है कि जो वह माँगता है वह उसे दे, इस कारण—अर्थात् कि धर्मी लज्जित न हों, वरन् उसके उदाहरण से आशा रखने को प्रोत्साहित हों। यहाँ एक अंश पर्याप्त होगा, “इस कारण हर एक भक्त तुझसे ऐसे समय में प्रार्थना करे जब तू मिल सकता है,” (भजन संहिता 32:6, कैल्विन की टीका)। मैंने इस अंश को और अधिक सहजता से उद्धृत किया है, क्योंकि वे बकवादी जो पोप-तन्त्र के बचाव में अपनी किराये की जीभें चलाते हैं, उसे मृतकों की मध्यस्थता के प्रमाण में प्रस्तुत करने में लज्जित नहीं होते। मानो दाऊद का अभिप्राय इसके सिवा कुछ और था कि वह उस लाभ को दिखाए जो सुने जाने पर उसे परमेश्वर की दया और कृपा से मिलेगा। सामान्य रूप से हमें यह मानना चाहिए कि परमेश्वर के अनुग्रह का अनुभव, चाहे अपने प्रति हो चाहे दूसरों के प्रति, उसकी प्रतिज्ञाओं में हमारे विश्वास को दृढ़ करने में कम काम नहीं करता। मैं वे बहुत-से अंश उद्धृत नहीं करता जिनमें दाऊद परमेश्वर की करुणा को अपने प्रति भरोसे का आधार बताता है, क्योंकि भजन संहिता के हर पाठक के मन में वे सहज ही आ जाएँगे। याकूब ने इससे पहले अपने उदाहरण से यही सिखाया था, “तेरी सब दया और सच्चाई में से, जो तूने अपने दास पर प्रकट की है, मैं एक के भी योग्य नहीं: क्योंकि मैं केवल अपनी लाठी लेकर इस यरदन के पार गया था, और अब मैं दो दल हो गया हूँ,” (उत्पत्ति 32:10)। वह प्रतिज्ञा का हवाला तो देता है, परन्तु केवल प्रतिज्ञा का नहीं; क्योंकि साथ ही वह परिणाम भी जोड़ता है, ताकि परमेश्वर की भावी कृपा में उसे और अधिक दृढ़ भरोसा हो। परमेश्वर उन मनुष्यों के समान नहीं जो अपनी उदारता से थक जाते हैं, या जिनके पास उसे दिखाने के साधन चुक जाते हैं; वरन् उसे उसके अपने स्वभाव से आँका जाना चाहिए, जैसा दाऊद उचित रूप से करता है जब वह कहता है, “हे सत्यवादी प्रभु परमेश्वर, तूने मुझे छुड़ा लिया है,” (भजन संहिता 31:5)। अपने उद्धार की प्रशंसा परमेश्वर को देने के बाद वह जोड़ता है कि वह सच्चा है: क्योंकि यदि वह सदा अपने ही समान न होता, तो उसकी पिछली कृपा भरोसे और प्रार्थना के लिए अचूक आधार न होती। परन्तु जब हम जानते हैं कि जितनी बार वह हमारी सहायता करता है, वह हमें अपनी भलाई और सच्चाई का नमूना और प्रमाण देता है, तब इस भय का कोई कारण नहीं कि हमारी आशा लज्जित या निष्फल होगी।
477 फ्रेंच में जोड़ा गया है, “et quasi en une fourmiliere de saincts;”—और मानो सन्तों की एक चींटियों की बाँबी में।
478 “C’est chose trop notoire de quel bourbieu de quelle racaille ils tirent leur saincts.”—यह बहुत प्रसिद्ध बात है कि वे अपने सन्तों को किस कीचड़ और किस कूड़े-कचरे में से निकालते हैं।
27. कुल मिलाकर, क्योंकि पवित्रशास्त्र आराधना का मुख्य भाग परमेश्वर को पुकारने में रखता है (यही वह भक्ति का काम है जो वह सब बलिदानों से बढ़कर हमसे चाहता है), इसलिए दूसरों से प्रार्थना करना स्पष्ट रूप से अपवित्र कर्म है। इसीलिए भजन में कहा गया है: “यदि हम अपने परमेश्वर का नाम भूल गए, या पराए देवता की ओर अपने हाथ फैलाए हों, तो क्या परमेश्वर इसका पता न लगाएगा?” (भजन संहिता 44:20, 21)। फिर, क्योंकि परमेश्वर केवल विश्वास में ही पुकारा जाना चाहता है, और वह स्पष्ट आज्ञा देता है कि हम अपनी प्रार्थनाओं को उसके वचन के नियम के अनुसार ढालें: अन्ततः, क्योंकि विश्वास वचन पर स्थापित है, और सच्ची प्रार्थना की जननी है, इसलिए जिस क्षण हम वचन से हटते हैं, हमारी प्रार्थनाएँ अशुद्ध हो जाती हैं। परन्तु हम पहले दिखा चुके हैं कि यदि हम पवित्रशास्त्र की सारी पुस्तक देखें, तो पाएँगे कि परमेश्वर यह आदर केवल अपने लिए माँगता है। मध्यस्थता के काम के विषय में भी हम देख चुके हैं कि वह मसीह का विशेष काम है, और कोई प्रार्थना परमेश्वर को प्रिय नहीं जिसे वह मध्यस्थ के रूप में पवित्र न करे। और यद्यपि विश्वासी अपने भाइयों के लिए परमेश्वर से एक-दूसरे के निमित्त प्रार्थनाएँ करते हैं, हम दिखा चुके हैं कि इससे मसीह की एकमात्र मध्यस्थता में किसी रीति से कमी नहीं आती, क्योंकि सब अपने आपको और दूसरों को परमेश्वर को सौंपने में उसी मध्यस्थता पर भरोसा करते हैं। इसके अतिरिक्त, हम दिखा चुके हैं कि यह अज्ञानता से मृतकों को सौंपा जाता है, जिनके विषय में हम कहीं नहीं पढ़ते कि उन्हें हमारे लिए प्रार्थना करने की आज्ञा दी गई थी। पवित्रशास्त्र हमें प्रायः एक-दूसरे के लिए प्रार्थना करने को उभारता है; परन्तु मृतकों के विषय में एक शब्द भी नहीं कहता; वरन् याकूब मौन रूप से मृतकों को बाहर रखता है जब वह दोनों बातों को जोड़ता है, “एक-दूसरे के सामने अपने पापों को मान लो, और एक-दूसरे के लिए प्रार्थना करो,” (याकूब 5:16)। इसलिए इस भूल की निन्दा करने के लिए यही पर्याप्त है कि सच्ची प्रार्थना का आरम्भ विश्वास से फूटता है, और विश्वास परमेश्वर के वचन के सुनने से आता है, जिसमें काल्पनिक मध्यस्थता का कोई उल्लेख नहीं, अन्धविश्वास ने उतावली में ऐसे मध्यस्थ अपना लिए हैं जो ईश्वरीय रीति से नियुक्त नहीं किए गए। जबकि पवित्रशास्त्र में प्रार्थना के नाना रूप भरे पड़े हैं, इस मध्यस्थता का, जिसके बिना पोप के अनुयायी समझते हैं कि कोई प्रार्थना नहीं, कोई उदाहरण हमें नहीं मिलता। इसके अतिरिक्त, यह स्पष्ट है कि यह अन्धविश्वास अविश्वास का परिणाम है, क्योंकि वे या तो मसीह को मध्यस्थ के रूप में पर्याप्त नहीं मानते, या उसे इस आदर से बिलकुल वंचित कर चुके हैं। यह अन्तिम बात उनकी इस ढिठाई से सहज ही प्रमाणित हो जाती है कि वे सन्तों की मध्यस्थता के पक्ष में अपने सब तर्कों में सबसे सशक्त तर्क यही देते हैं कि हम परमेश्वर तक घनिष्ठ पहुँच के योग्य नहीं हैं। यह, सचमुच, हम स्वीकार करते हैं कि अत्यन्त सत्य है, परन्तु इससे हम यही निष्कर्ष निकालते हैं कि वे मसीह के लिए कुछ नहीं छोड़ते, क्योंकि वे उसकी मध्यस्थता को कुछ नहीं मानते, जब तक कि उसमें जॉर्ज और हिपोलाइट और ऐसी ही छायाओं की मध्यस्थता न जोड़ी जाए।
28. यद्यपि प्रार्थना ठीक-ठीक मन्नतों और विनतियों तक सीमित है, तो भी याचना और धन्यवाद में इतना घना सम्बन्ध है कि दोनों को सुविधा से एक नाम के अन्तर्गत रखा जा सकता है। क्योंकि पौलुस जिन रूपों की गिनती करता है (1 तीमुथियुस 2:1) वे इस विभाजन के पहले भाग में आते हैं। प्रार्थना और विनती के द्वारा हम अपनी इच्छाएँ परमेश्वर के सामने उँडेलते हैं, उन बातों को भी माँगते हुए जो उसकी महिमा को बढ़ाने और उसका नाम प्रकट करने में सहायक हैं, और उन लाभों को भी जो हमारे हित में हैं। धन्यवाद के द्वारा हम अपने प्रति उसकी कृपाओं का उचित गुणगान करते हैं, अपने भाग्य में आनेवाली हर आशीष को उसकी उदारता का फल ठहराते हुए। इसीलिए दाऊद दोनों को एक वाक्य में सम्मिलित करता है, “संकट के दिन मुझे पुकार: मैं तुझे छुड़ाऊँगा, और तू मेरी महिमा करेगा,” (भजन संहिता 50:15)। पवित्रशास्त्र बिना कारण नहीं आज्ञा देता कि हम दोनों का निरन्तर उपयोग करें। हमारी घटी की महानता का वर्णन हम पहले कर चुके हैं, और अनुभव स्वयं घोषणा करता है कि जो संकट हमें चारों ओर से दबाते हैं वे इतने अनेक और इतने बड़े हैं कि सब के पास बिना रुके परमेश्वर की ओर आहें और कराहें भेजने और विनती करने का पर्याप्त कारण है। क्योंकि यदि वे विपत्ति से मुक्त भी हों, तो भी सबसे पवित्र जनों को पहले अपने पापों से, और दूसरे परीक्षा के असंख्य आक्रमणों से, उपचार की लालसा करने को उभरना चाहिए। स्तुति और धन्यवाद का बलिदान बिना दोष के कभी रोका नहीं जा सकता, क्योंकि परमेश्वर कृपा पर कृपा हम पर लादना कभी नहीं छोड़ता, ऐसे कि हम कितने ही मन्द और सुस्त हों, कृतज्ञता के लिए विवश हो जाएँ। संक्षेप में, हमारे प्रति उसकी उदारता की सम्पत्ति इतनी बड़ी और इतनी विस्तृत है, और जो आश्चर्यकर्म हम चारों ओर देखते हैं वे इतने अद्भुत और विस्मयकारी हैं कि हमारे पास स्तुति और धन्यवाद के लिए विषय और सामग्री की कभी कमी हो ही नहीं सकती। इसे कुछ और स्पष्ट करने के लिए: क्योंकि हमारी सब आशाएँ और साधन परमेश्वर में रखे हैं (यह पहले पूरी तरह प्रमाणित हो चुका है), ऐसे कि न हमारा व्यक्तित्व, न हमारे हित उसकी आशीष के बिना फल-फूल सकते हैं, इसलिए हमें अपने आपको और अपना सब कुछ निरन्तर उसके अधीन रखना चाहिए। फिर जो कुछ हम विचारें, कहें या करें वह सब उसके हाथ और इच्छा के अधीन, अन्ततः उसकी सहायता की आशा में, विचारा, कहा और किया जाना चाहिए। परमेश्वर ने उन सब पर श्राप सुनाया है जो अपने पर या दूसरों पर भरोसा करके योजनाएँ और निश्चय बनाते हैं, जो उसकी इच्छा का ध्यान किए बिना या उसकी सहायता माँगे बिना कुछ योजना बनाते या पूरा करने का प्रयत्न करते हैं (याकूब 4:14; यशायाह 30:1; 31:1)। और क्योंकि, जैसा पहले देखा जा चुका है, वह तब उचित आदर पाता है जब उसे सब भलाई का कर्ता माना जाए, इसलिए इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि सब भलाई उसी के हाथ से पाते हुए हमें निरन्तर अपनी कृतज्ञता प्रकट करनी चाहिए, और जो लाभ उसकी उदारता से आते हैं उनका उपयोग करने का हमें कोई अधिकार नहीं, यदि हम परिश्रम से उसकी स्तुति की घोषणा न करें और उसे धन्यवाद न दें, क्योंकि वे इन्हीं उद्देश्यों के लिए दिए गए हैं। जब पौलुस घोषणा करता है कि परमेश्वर की हर सृष्टि “परमेश्वर के वचन और प्रार्थना से पवित्र की जाती है” (1 तीमुथियुस 4:5), तो वह यह संकेत करता है कि वचन और प्रार्थना के बिना उनमें से कोई पवित्र और शुद्ध नहीं, वचन शब्द यहाँ लक्षणा से विश्वास के लिए प्रयुक्त है। इसीलिए दाऊद, प्रभु की करुणा का अनुभव करके, सुन्दर रीति से घोषणा करता है, “उसने मेरे मुँह में नया गीत डाला,” (भजन संहिता 40:3); यह संकेत करते हुए कि जब हम उसकी आशीषों की स्तुति नहीं करते तो हमारी चुप्पी द्वेषपूर्ण होती है, क्योंकि उसकी दी हुई हर आशीष धन्यवाद के लिए एक नया आधार है। इसी प्रकार यशायाह, परमेश्वर की अनोखी दयाओं की घोषणा करते हुए कहता है, “प्रभु के लिए नया गीत गाओ (यशायाह 42:10)।” इसी अर्थ में दाऊद एक अन्य स्थान में कहता है, “हे प्रभु, मेरे होंठ खोल दे; तब मेरा मुँह तेरा गुणगान करेगा,” (भजन संहिता 51:15)। इसी प्रकार हिजकिय्याह और योना घोषणा करते हैं कि वे अपने छुटकारे का उद्देश्य यही मानेंगे कि “परमेश्वर की भलाई का उसके मन्दिर में गीतों के साथ बखान करें,” (यशायाह 38:20; योना 2:10)। दाऊद सब विश्वासियों के लिए इन शब्दों में एक सामान्य नियम ठहराता है, “यहोवा के सब उपकारों का मैं उसे क्या बदला दूँ? मैं उद्धार का कटोरा उठाकर प्रभु का नाम लूँगा,” (भजन संहिता 116:12, 13)। इस नियम का पालन कलीसिया एक अन्य भजन में करती है, “हे प्रभु हमारे परमेश्वर, हमें बचा, और हमें जाति-जाति में से इकट्ठा कर, कि हम तेरे पवित्र नाम का धन्यवाद करें, और तेरी स्तुति करने में जयजयकार करें,” (भजन संहिता 106:47)। फिर, “वह दिवालियों की प्रार्थना की ओर ध्यान देगा, और उनकी प्रार्थना को तुच्छ न जानेगा। यह आनेवाली पीढ़ी के लिए लिखा जाएगा: और जो लोग उत्पन्न होंगे वे प्रभु की स्तुति करेंगे।” “कि सिय्योन में प्रभु के नाम का, और यरूशलेम में उसकी स्तुति का वर्णन किया जाए,” (भजन संहिता 102:18, 21)। वरन् जब-जब विश्वासी प्रभु से बिनती करते हैं कि वह कुछ अपने नाम के निमित्त करे, तो जैसे वे घोषणा करते हैं कि वे अपने नाम से उसे पाने के योग्य नहीं, वैसे ही अपने आपको धन्यवाद देने के लिए बाध्य करते हैं, और उसकी करुणा के प्रचारक बनकर उसका सही उपयोग करने की प्रतिज्ञा करते हैं। इसी प्रकार होशे, कलीसिया के भावी छुटकारे के विषय में कहता है, “सब अधर्म को दूर कर, और हमें अनुग्रहपूर्वक ग्रहण कर; तब हम अपने होंठों के बछड़े चढ़ाएँगे,” (होशे 14:2)। हमारी जीभें न केवल परमेश्वर की कृपा की घोषणा करती हैं, वरन् स्वाभाविक रूप से हमारे मन में उसके प्रति प्रेम भी जगाती हैं। “मैं यहोवा से प्रेम रखता हूँ, क्योंकि उसने मेरी आवाज़ और मेरे गिड़गिड़ाने को सुना है,” (भजन संहिता 116:1)। एक अन्य स्थान में, जो सहायता उसने अनुभव की उसके विषय में वह कहता है, “हे प्रभु, मेरे बल, मैं तुझ से प्रेम करूँगा,” (भजन संहिता 18:1)। कोई स्तुति परमेश्वर को कभी प्रसन्न न करेगी जो इस प्रेम की भावना से न निकले। वरन् हमें पौलुस की घोषणा पर ध्यान देना चाहिए कि वे सब इच्छाएँ दूषित और टेढ़ी हैं जिनके साथ धन्यवाद न हो। उसके शब्द ये हैं, “हर एक बात में प्रार्थना और विनती के द्वारा धन्यवाद के साथ तुम्हारे निवेदन परमेश्वर के सम्मुख उपस्थित किए जाएँ,” (फिलिप्पियों 4:6)। क्योंकि बहुत-से लोग चिड़चिड़ेपन, थकान, अधीरता, कड़वे शोक और भय के प्रभाव में अपनी प्रार्थनाओं में कुड़कुड़ाहट भर देते हैं, इसलिए वह आज्ञा देता है कि हम अपनी भावनाओं को ऐसा नियन्त्रित करें कि जो हम माँगते हैं उसे पाने से पहले ही प्रसन्नता से परमेश्वर को धन्य कहें। परन्तु यदि लगभग विपरीत बातों के बीच यह सम्बन्ध सदा पूरे बल से बना रहना चाहिए, तो जब परमेश्वर हमारी बिनतियाँ पूरी करता है तब उसकी स्तुति का गुणगान करने का बन्धन और भी पवित्र है। और जैसे हम पहले दिखा चुके हैं कि हमारी प्रार्थनाएँ, जो अन्यथा दूषित होतीं, मसीह की मध्यस्थता से पवित्र की जाती हैं, वैसे ही प्रेरित, जब हमें आज्ञा देता है कि मसीह के द्वारा “परमेश्वर के लिए स्तुतिरूपी बलिदान सर्वदा चढ़ाएँ” (इब्रानियों 13:15), तो हमें स्मरण दिलाता है कि उसके याजकपद के बीच में आए बिना हमारे होंठ परमेश्वर के नाम का गुणगान करने के लिए पर्याप्त शुद्ध नहीं। इससे हम निष्कर्ष निकालते हैं कि पोप के अनुयायियों में एक विकराल भ्रम फैला है, जिनमें से अधिकांश यह सुनकर चकित होते हैं कि मसीह को मध्यस्थ कहा जाता है। पौलुस जो आज्ञा देता है, “निरन्तर प्रार्थना में लगे रहो; हर बात में धन्यवाद करो,” (1 थिस्सलुनीकियों 5:17, 18), उसका कारण यह है कि वह चाहता है कि हम अत्यन्त परिश्रम से, सब समय, सब स्थान में, सब बातों में, और सब परिस्थितियों में, अपनी प्रार्थनाएँ परमेश्वर की ओर करें, जो कुछ हम चाहते हैं उसकी आशा उसी से रखें, और पा लेने पर उसका श्रेय उसी को दें; इस प्रकार प्रार्थना और स्तुति के लिए निरन्तर आधार जुटाते रहें।
