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यह शीर्षक अध्याय 79 — ऊपरी कोठरी के उसी पृष्ठ पर आरम्भ होता है, जहाँ पूरा पाठ आगे चलता है।
ऊपरी कोठरी (जारी)
"अन्तर यह है: संस्कार एक प्रतीक या चिह्न है; मसीह की देह उस प्रतीक का विषय है। संस्कार की रोटी रोटी ही है, वह मसीह की देह नहीं है; मसीह की देह मांस है, वह रोटी नहीं है। रोटी नीचे है; देह ऊपर है। रोटी मेज़ पर है; देह स्वर्ग में है। रोटी मुँह में है; देह हृदय में है। रोटी देह को पोषण देती है; देह आत्मा को पोषण देती है। रोटी नष्ट हो जाएगी; देह अमर है और कभी नष्ट न होगी। रोटी तुच्छ है; मसीह की देह महिमामय है। देह के संस्कार-रूप रोटी और स्वयं मसीह की देह के बीच इतना अन्तर है। संस्कार को दुष्ट भी खाते हैं और विश्वासी भी; देह को केवल विश्वासी ही खाते हैं। संस्कार को न्याय के लिये भी खाया जा सकता है; देह को केवल उद्धार के लिये ही खाया जा सकता है। संस्कार के बिना हम उद्धार पा सकते हैं; पर मसीह की देह के बिना हमारे लिये कोई उद्धार नहीं: हम उद्धार नहीं पा सकते।" — ज्वेल की रचनाएँ, खण्ड 2, संस्कारों पर ग्रन्थ, पार्कर सोसाइटी संस्करण, पृ. 1121।
40. रिचर्ड हूकर अपनी "एक्लेज़ियास्टिकल पॉलिटी" में क्या कहता है?
"मसीह की परम धन्य देह और लहू की वास्तविक उपस्थिति को संस्कार में नहीं, बल्कि संस्कार को योग्य रीति से ग्रहण करनेवाले में खोजना चाहिए।
"और हमारे उद्धारकर्ता के वचनों का क्रम भी इसी से मेल खाता है। पहले, 'लो और खाओ;' फिर, 'यह मेरी देह है जो तुम्हारे लिये तोड़ी जाती है।' पहले, 'तुम सब इसमें से पीओ;' फिर आगे है, 'यह नई वाचा का मेरा लहू है, जो बहुतों के लिये पापों की क्षमा के निमित्त बहाया जाता है।' मैं नहीं देखता कि मसीह के वचनों से यह कैसे निकाला जा सकता है कि रोटी कब और कहाँ उसकी देह है, या दाखमधु उसका लहू, सिवाय उस मनुष्य के हृदय और आत्मा में जो उन्हें ग्रहण करता है। जहाँ तक संस्कारों का सम्बन्ध है, वे वास्तव में प्रदान तो करते हैं, परन्तु उनके विषय में जो लिखा है उससे जितना हम समझ सकते हैं, वे उस अनुग्रह को, जो परमेश्वर को उनके द्वारा या उनके साथ देना भाता है, अपने भीतर वास्तव में न तो रखते हैं और न ही रखने का काम करते हैं।" हूकर, एक्ल. पॉल., पुस्तक 5, पृ. 67।
41. जेरेमी टेलर अपनी पुस्तक वास्तविक उपस्थिति (संस्करण 1654, पृ. 13-15) में क्या कहता है?
"हम कहते हैं कि मसीह की देह संस्कार में वास्तव में है, परन्तु आत्मिक रीति से। रोमन कैथोलिक कहते हैं कि वह वहाँ वास्तव में है, परन्तु आत्मिक रीति से। क्योंकि बेलार्माइन साहसपूर्वक कहता है कि इस प्रश्न में यह शब्द स्वीकार किया जा सकता है।
