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ऊपरी कोठरी (जारी)
उसके खाने की क्रिया क्या हो सकती है, क्योंकि शरीर से कुछ लाभ नहीं।"
"इसलिए जिस प्रकार हमारे प्रभु ने स्वयं कहा, 'मैं वह सच्ची रोटी हूँ जो स्वर्ग से उतरी' (इसका अर्थ यह नहीं कि वह पकाए हुए आटे का पिण्ड या मन्ना था, परन्तु यह कि वह मनुष्य के सच्चे जीवन को, जो आत्मिक है, शारीरिक नहीं, थामे रखने का सच्चा साधन है), उसी प्रकार प्रभु-भोज में योग्य रीति से ग्रहण करनेवाले को पवित्र किए गए तत्त्व, यद्यपि अपने स्वभाव में केवल रोटी और दाखरस हैं, तथापि सचमुच, वास्तव में और प्रभावशाली रीति से क्रूस पर चढ़ाए गए मसीह की देह और लहू के रूप में दिए जाते हैं; वही देह और लहू जो मनुष्य के छुटकारे के साधन हैं, और जिन पर हमारा आत्मिक जीवन और बल पूर्णतः निर्भर है। इसी अर्थ में क्रूस पर चढ़ाया गया यीशु अपने भोज के संस्कार में उपस्थित है; रोटी और दाखरस में, या उनके साथ, या उनके रूप के नीचे नहीं, परन्तु सहभागियों के प्राणों में; शारीरिक रीति से नहीं, परन्तु प्रभावशाली और विश्वासयोग्य रीति से, और इसलिए अत्यन्त वास्तविक रीति से।" -- फिलपॉट्स का बटलर को पत्र, 8vo संस्करण 1825, पृ. 235, 236।
46. 1868 में अपनी मृत्यु के बाद छपे और प्रकाशित अपने अन्तिम आदेश-पत्र में आर्चबिशप लॉन्गली ने क्या कहा?
"वास्तविक उपस्थिति का सिद्धान्त एक अर्थ में इंग्लैंड की कलीसिया का सिद्धान्त है। वह कहती है कि मसीह की देह और लहू प्रभु-भोज में विश्वासियों के द्वारा 'सचमुच और वास्तव में लिए और ग्रहण किए जाते हैं।' और वह समान रूप से यह भी कहती है कि ऐसी उपस्थिति भौतिक या शारीरिक नहीं है, परन्तु मसीह की देह भोज में 'केवल स्वर्गीय और आत्मिक रीति से दी, ली और खाई जाती है' (अनुच्छेद 28)। मसीह की उपस्थिति उन सब उद्देश्यों और प्रयोजनों के लिए प्रभावशाली है जिनके लिए उसकी देह तोड़ी गई और उसका लहू बहाया गया। जहाँ तक विश्वासी के हृदय के अतिरिक्त कहीं और उपस्थिति का प्रश्न है, इंग्लैंड की कलीसिया मौन है, और इसलिए हूकर के शब्द उसके विचारों को प्रकट करते हैं: 'मसीह की परम धन्य देह और लहू की वास्तविक उपस्थिति संस्कार में नहीं, परन्तु संस्कार को योग्य रीति से ग्रहण करनेवाले में खोजी जानी चाहिए।'"
47. शेपर्ड बनाम बेनेट के प्रसिद्ध मुकदमे में प्रिवी काउंसिल की न्यायिक समिति ने क्या घोषित किया?
"किसी पादरी के लिए यह सिखाना वैध नहीं है कि क्रूस पर मसीह का बलिदान और भेंट, या उसके द्वारा सिद्ध किया गया छुटकारा, प्रायश्चित या सन्तुष्टि, प्रभु-भोज की विधि में दोहराई जाती है या दोहराई जा सकती है;
