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ऊपरी कोठरी (जारी)
और बुद्धिमान थे, जितने कि वे कोई भी धर्मशास्त्री जिन्होंने बपतिस्मा द्वारा नया जन्म होने की शिक्षा दी। इतना कहना पर्याप्त है कि आर्चबिशप क्रैन्मर, व्हिटगिफ्ट, अशर और लेटन, तथा अध्यक्ष लैटिमर, रिडले, ज्यूएल, डेवनेंट, कार्लेटन, हॉपकिन्स और रॉबर्ट एबट ने स्पष्ट प्रमाण छोड़ा है कि वे आत्मिक नया जन्म के अनुग्रह को अनिवार्य रूप से और सदा बपतिस्मा से बँधा हुआ नहीं मानते थे। आख़िर ऐसे प्रश्नों में हमें किसी मनुष्य को गुरु नहीं कहना चाहिए। मनुष्य क्या कहता है, इससे कुछ अन्तर नहीं पड़ता। पवित्रशास्त्र क्या कहता है?
17. परन्तु नया जन्म की इस धारणा के अनुसार, जिसमें बहुत से बपतिस्मा पाए हुए लोग नया जन्म पाए हुए होते ही नहीं और अपने बपतिस्मा से कोई लाभ नहीं पाते, क्या मसीह के एक संस्कार का बड़ा अनादर नहीं होता और क्या वह तुच्छ समझे जाने की ओर नहीं ले जाती?
बिलकुल नहीं। सच्चाई ठीक इसके उलट है। यह कहना कि शिशु-बपतिस्मा अनुग्रह को यंत्रवत् प्रदान करता है, जैसे कोई रासायनिक घोल फ़ोटोग्राफ़ की प्लेट पर असर डालता है, और यह कि यदि किसी विचारहीन, लापरवाह पादरी द्वारा विचारहीन, अज्ञानी माता-पिता के बच्चे पर जल और कुछ शब्दों का प्रयोग कर दिया जाए तो वह बच्चा तुरन्त नया जन्म पा लेता है, फिर यह कहना कि बपतिस्मा से बहुत बड़ा आत्मिक प्रभाव उत्पन्न होता है जबकि कोई भी प्रभाव दिखाई नहीं देता, ये सब बातें बहुत से विचारशील लोगों को बपतिस्मा का मान घटानेवाली लगती हैं! इससे देखनेवालों को यह लगने लगता है कि बपतिस्मा व्यर्थ है, या नया जन्म का कोई अर्थ ही नहीं है। जो बपतिस्मा का आदर करना चाहता है, उसे मानना चाहिए कि यह एक उच्च और पवित्र विधि है, जिसे मसीह की ठहराई हुई हर विधि की नाईं गंभीर श्रद्धा के बिना छूना नहीं चाहिए; और जब तक उसे मन, ज्ञान, विश्वास और प्रार्थना के साथ न किया जाए और बपतिस्मा पाए हुए बच्चे का भक्तिपूर्ण पालन-पोषण न किया जाए, तब तक किसी आशीष की आशा नहीं की जा सकती। सबसे बढ़कर उसे यह मानना चाहिए कि जब बपतिस्मा से भला होता है, तो वह भला बपतिस्मा पाए हुए व्यक्ति के जीवन और चाल-चलन में दिखाई देगा। जो लोग इस विषय में सन्तुष्ट नहीं हैं, वे भविष्यद्वक्ता यशायाह में उस कठोर भाषा का ध्यानपूर्वक अध्ययन करें जो परमेश्वर ने अपनी ही विधियों के विषय में तब कही है जब वे औपचारिक और लापरवाह ढंग से निभाई जाती हैं (यशायाह 1:11-12)।
भविष्यद्वक्ता ने जब ये शब्द लिखे तो उसका क्या अभिप्राय था: "तुम्हारे बहुत से बलिदानों से मुझे क्या काम? यहोवा कहता है, मैं बैलों के लहू से, और भेड़ के बच्चों से प्रसन्न नहीं होता"? उसका स्पष्ट अभिप्राय यह था कि परमेश्वर की अपनी विधियाँ मनुष्य के दुरुपयोग से बिलकुल निष्फल बनाई जा सकती हैं।
