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ऊपरी कोठरी
केवल एक रीति बना दिया जाए, और पवित्रशास्त्र तथा उनतालीस धर्म-सूत्रों (Thirty-nine Articles), दोनों का खण्डन किया जाए।
10. परन्तु क्या सब शिशु बपतिस्मा को योग्य रीति से ग्रहण नहीं करते, क्योंकि वे बपतिस्मा के अनुग्रह के मार्ग में कोई बाधा नहीं डालते? और क्या इसी कारण वे सब स्वाभाविक रूप से, बपतिस्मा पाते ही, नया जन्म नहीं पा लेते?
कदापि नहीं। कोई भी शिशु अपने आप में अनुग्रह पाने के योग्य नहीं है, क्योंकि जैसा प्रश्नोत्तरी कहती है, वह "पाप में जन्मा हुआ और क्रोध की सन्तान" है। उसे केवल उसके माता-पिता या प्रतिनिधियों (sponsors) के विश्वास और अंगीकार के आधार पर ही कलीसिया में लिया और बपतिस्मा दिया जा सकता है। कोई सच्चा मिशनरी बिना मित्रों या प्रतिनिधियों के अन्यजातियों के बच्चों को बपतिस्मा देने का विचार नहीं करता। कलीसिया की प्रश्नोत्तरी यह प्रश्न पूछती है, "शिशुओं को बपतिस्मा क्यों दिया जाता है?" परन्तु वह इसका उत्तर यह नहीं देती, "क्योंकि वे अनुग्रह के मार्ग में कोई बाधा नहीं डालते," — वरन् यह कि "क्योंकि वे अपने जामिनों (Sureties) के द्वारा मन फिराव और विश्वास की प्रतिज्ञा करते हैं।" हम सदा स्मरण रखें कि शिशु का बपतिस्मा पर कोई अधिकार नहीं, केवल उसके जामिनों के अंगीकार का आधार है। निश्चय ही जब ये जामिन मन फिराव या विश्वास के विषय में, या जो प्रतिज्ञा वे कर रहे हैं उसके विषय में कुछ नहीं जानते, तो सामान्य बुद्धि यही बताती है कि उस शिशु को उस संस्कार से कोई आन्तरिक लाभ मिलने की सम्भावना नहीं। सीधे शब्दों में, यदि माता-पिता या प्रतिनिधि घोर अज्ञानता में, बिना विश्वास, बिना प्रार्थना और बिना ज्ञान के शिशु को बपतिस्मा के लिए लाएँ, तो यह मान लेना भयंकर बात है कि उस शिशु को फिर भी नया जन्म अवश्य मिलेगा। इस हिसाब से तो इससे कोई अन्तर ही नहीं पड़ेगा कि संस्कारों का प्रयोग किस रीति से किया जाता है, अज्ञानता से या ज्ञान से, और इससे भी कुछ नहीं बनेगा बिगड़ेगा कि उनका प्रयोग करनेवाले भक्त हैं या अभक्त; विश्वासी और अविश्वासी माता-पिता के बच्चों को बपतिस्मा से ठीक एक-सा लाभ मिलेगा! ऐसा निष्कर्ष अनुचित और बेतुका जान पड़ता है।
11. परन्तु क्या पौलुस अपनी पत्रियों में यह नहीं कहता कि मसीही लोग "बपतिस्मा में मसीह के साथ गाड़े गए" हैं, और बपतिस्मा पाए हुए लोगों ने "मसीह को पहन लिया है"? (गलातियों 3:27; कुलुस्सियों 2:12)।
निःसन्देह पौलुस ऐसा कहता है। परन्तु जिन लोगों के विषय में उसने यह कहा, उन्हें शैशवावस्था में नहीं, वरन् बड़े होने पर बपतिस्मा दिया गया था, और ऐसे दिनों में, जब विश्वास और बपतिस्मा का सम्बन्ध इतना घनिष्ठ था कि मनुष्य जैसे ही विश्वास करता, वह बपतिस्मा के द्वारा अपने विश्वास का खुला अंगीकार कर लेता था। परन्तु नए नियम में एक भी ऐसा अनुच्छेद नहीं जो शिशु पर बपतिस्मा के प्रभाव का विस्तार से वर्णन करे, और न एक भी ऐसा पद है जो कहता हो कि सब शिशु
