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ऊपरी कोठरी (जारी)
लोगों से यह कहना कि प्रभु-भोज की मेज़ पर आने से उनका भला होगा, उनकी सीधी हानि करना है। धर्मी ठहराया जाना संस्कारों से नहीं होता। रोटी खाना और दाखमधु पीना पापों की क्षमा या मन-परिवर्तन करानेवाले अनुग्रह को पाने का मार्ग नहीं है। इसके विपरीत, पौलुस कहता है कि मनुष्य अपने ही दण्ड के लिये खा और पी सकता है (1 कुरिन्थियों 11:29)। उनतीसवाँ अनुच्छेद कहता है कि "दुष्ट लोग, और वे जो जीवित विश्वास से रहित हैं, चाहे वे शारीरिक रीति से और प्रत्यक्ष रूप में मसीह की देह और लहू के संस्कार को अपने दाँतों से चबाएँ, तो भी किसी रीति से मसीह के सहभागी नहीं होते; वरन इतनी बड़ी बात के चिह्न या संस्कार को अपने ही दण्ड के लिये खाते और पीते हैं।"
13. परन्तु क्या सब लोगों को, बिना किसी अपवाद के, प्रभु-भोज की मेज़ पर आने के लिये आग्रह नहीं करना चाहिए, ताकि उनकी आत्माओं का उद्धार हो? क्या प्रभु-भोज में सम्मिलित होना पापों की क्षमा पाने और अनन्त जीवन पाने का सबसे सच्चा, सबसे छोटा और सबसे उत्तम मार्ग नहीं है? क्या हमारे प्रभु यीशु मसीह यूहन्ना के सुसमाचार के छठवें अध्याय में यह नहीं कहते, "जब तक तुम मनुष्य के पुत्र का मांस न खाओ और उसका लहू न पीओ, तुम में जीवन नहीं;" और फिर, "जो मेरा मांस खाता और मेरा लहू पीता है, अनन्त जीवन उसी का है"? (यूहन्ना 6:53-54)। क्या ये वचन प्रभु-भोज की ओर संकेत नहीं करते?
इन दोनों वचनों का प्रभु-भोज से कोई सम्बन्ध नहीं है। यही सब उत्तम प्रोटेस्टेंट टीकाकारों का, और रोम के कुछ टीकाकारों का भी, मत है। यहाँ जिस "खाने और पीने" की बात कही गई है, उसका अर्थ विश्वास के द्वारा हृदय से आत्मिक रीति से खाना और पीना है, और "मांस और लहू" का अर्थ क्रूस पर मसीह की देह का वह बलिदान है जो उसने हमारे बदले में दिया। पश्चात्तापी चोर ने निश्चय ही प्रभु-भोज की रोटी और दाखमधु ग्रहण नहीं की, फिर भी यह निश्चित है कि उसे "अनन्त जीवन मिला," और मरने पर वह परादीस में गया। यहूदा इस्करियोती ने रोटी और दाखमधु खाई, पर उसे "अनन्त जीवन" नहीं मिला, और वह अपने पापों में मरा। रोगियों के प्रभु-भोज की प्रार्थना-पुस्तक की विधि के समापन-निर्देशों में से एक में यह कथन है: "यदि रोगी सचमुच अपने पापों से मन फिराए, और दृढ़ता से विश्वास करे कि यीशु मसीह ने उसके लिये क्रूस पर मृत्यु सही और उसके छुटकारे के लिये अपना लहू बहाया, और उससे मिलनेवाले लाभों को सच्चे मन से स्मरण करे और इसके लिये उसका धन्यवाद करे, तो वह मसीह की देह और लहू को अपनी आत्मा के कल्याण के लिये लाभदायक रीति से खाता और पीता है, चाहे वह संस्कार को अपने मुँह से ग्रहण न भी करे।" वस्तुतः यह मानना कि जो प्रभु-भोज को ग्रहण नहीं करता, उसे "अनन्त जीवन नहीं मिलता"
