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ऊपरी कोठरी
20. परन्तु क्या नया जन्म के इस सिद्धान्त को इतना महत्त्व देना सचमुच आवश्यक है? क्या लोगों को यह सिखा देना पर्याप्त नहीं कि उन्हें "भला" होना चाहिए, कलीसिया जाना चाहिए, "सच्चे मन" से लगे रहना चाहिए और अपना कर्तव्य निभाना चाहिए, और तब वे किसी न किसी रीति से अन्त में स्वर्ग पहुँच ही जाएँगे? क्या यह निश्चयपूर्वक और दृढ़ता से कहना ज़रूरी है कि उन्हें "नया जन्म" लेना ही होगा?
इन प्रश्नों का उत्तर संक्षिप्त और सरल है। मसीहियों के पास विश्वास और आचरण के लिये बाइबल को छोड़ कोई और नियम नहीं है। यदि बाइबल सत्य है, तो उद्धार के लिये नया जन्म नितान्त आवश्यक है। लिखा है, "जब तक कोई नये सिरे से न जन्मे तो वह परमेश्वर का राज्य देख नहीं सकता"; "तुम्हें नये सिरे से जन्म लेना अवश्य है"; "यदि तुम न फिरो और बालकों के समान न बनो, तो तुम स्वर्ग के राज्य में कभी प्रवेश करने न पाओगे" (यूहन्ना 3:3-8; मत्ती 18:3)। यह सम्भव है कि लोग पश्चातापी चोर के समान बपतिस्मा के बिना स्वर्ग में प्रवेश करें और उद्धार पाएँ; परन्तु नया जन्म के बिना कोई न उद्धार पा सकता है, न स्वर्ग जा सकता है। उस पश्चातापी चोर ने यद्यपि बपतिस्मा नहीं लिया था, फिर भी वह "नये सिरे से जन्मा" था। इसलिये नया जन्म प्रथम और सर्वोच्च महत्त्व का सिद्धान्त है।
21. परन्तु यदि ये बातें सत्य हैं और नया जन्म के बिना कोई उद्धार नहीं पा सकता, तो क्या बहुत से मसीही कहलानेवाले लोग बड़े संकट की दशा में नहीं हैं? क्या जिनमें "नये सिरे से जन्मे" होने के चिह्न नहीं हैं, वे सदा के लिये नष्ट हो जाने के निकट खतरे में नहीं हैं?
निश्चय ही हैं। और पूरी बाइबल आदि से अन्त तक उनके विषय में ठीक यही सिखाती है। लिखा है, "चौड़ा है वह फाटक और चौड़ा है वह मार्ग जो विनाश को पहुँचाता है, और बहुत से हैं जो उस में प्रवेश करते हैं।" फिर लिखा है, "क्योंकि बहुतेरे ऐसी चाल चलते हैं, जिनकी चर्चा मैं ने तुम से बार बार की है और अब भी रो रोकर कहता हूँ, कि वे अपनी चाल चलन से मसीह के क्रूस के बैरी हैं। उनका अन्त विनाश है" (मत्ती 7:13; फिलिप्पियों 3:18)। बहुत से लोगों की धार्मिक दशा का सबसे दयनीय पहलू यही है कि वे समझते हैं कि बपतिस्मा लेने और कलीसिया जाने के कारण वे स्वर्ग जाएँगे, जबकि वास्तव में नया जन्म न पाने के कारण वे अनन्त विनाश के मार्ग पर हैं।
22. क्या मसीह की कलीसिया के सेवक अपने लोगों को नया जन्म देनेवाला अनुग्रह दे सकते हैं?
कदापि नहीं। यूहन्ना स्पष्ट कहता है कि जो परमेश्वर से जन्मे हैं, वे "न तो लहू से, न शरीर की इच्छा से, और न मनुष्य की इच्छा से
