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ऊपरी कोठरी
इंग्लैंड की सुधारवादी कलीसिया के मूल सिद्धान्तों के विषय में। वे सोचते हैं कि सब गम्भीर, वाक्पटु, उत्साही और परिश्रमी पादरी बहुत भूल में नहीं हो सकते। और जब आप उनसे कहते हैं कि बहुत से पादरियों में स्थापित कलीसिया का प्रोटेस्टेंट स्वरूप मिटा देने, धर्म-सुधार के पीछे लौट जाने, और रोमी मिस्सा तथा पाप-स्वीकार की रीति को वापस ले आने का स्पष्ट संकल्प है, तो प्रायः आप पर यह कहकर मुस्कुराया जाता है कि आप व्यर्थ का भय फैला रहे हैं, और आपकी बात का विश्वास नहीं किया जाता। मेरा सोचा-समझा दृढ़ विश्वास है कि जब तक इंग्लैंड के साधारण कलीसियाई जन प्रभु-भोज के विषय में विद्यमान मतभेदों का वास्तविक स्वरूप देखने के लिए जाग न उठें, तब तक थोड़े ही वर्षों में इंग्लैंड की कलीसिया का राज्य से सम्बन्ध-विच्छेद, उसकी सम्पत्ति की ज़ब्ती और उसका विघटन हो जाएगा। आधे साधारण कलीसियाई जन राजनीति, या ललित कलाओं, या कपास, या लोहे, या कोयले, या अनाज, या जहाज़रानी, या रेलमार्गों में ऐसे डूबे दिखते हैं कि आप उन्हें धार्मिक प्रश्नों की ओर देखने के लिए तैयार ही नहीं कर सकते। शेष आधे में से बहुत से लोग, जब शान्ति है ही नहीं, तब भी "शान्ति, शान्ति" पुकार रहे हैं, और इस बात पर अड़े हैं कि हर "गम्भीर" पादरी को अपनी ही दृष्टि में जो ठीक लगे वह करने, व्यवस्था तोड़ने और अकेला छोड़ दिए जाने की छूट मिलनी चाहिए। संक्षेप में, यदि शीघ्र परिवर्तन न आया, तो हमारा दीवट हटा दिया जाएगा और हमारी कलीसिया नष्ट हो जाएगी।
पाठक के हाथों में यह जो लेख है, वह प्रभु-भोज के विषय में सत्य के उद्देश्य के लिए एक विनम्र योगदान है। यह वही सत्य है जो मुझे नए नियम में मिलता है, जो मुझे हमारी कलीसिया के प्रामाणिक नियम-पत्रों में मिलता है, और जो मुझे हमारे सबसे महान अंग्रेज़ धर्म-शास्त्रियों की रचनाओं में मिलता है; इन पन्नों में मैं इसी सत्य का समर्थन करता हूँ।
1. क्या प्रभु-भोज मसीही धर्म में सर्वोपरि महत्त्व का विषय है? क्या हज़ारों कलीसियाई जन उसमें भाग लिए बिना ही जीते और मर नहीं जाते? क्या अधिकांश कलीसिया जाने वाले उससे पीठ नहीं फेर लेते, और जब वह दिया जाता है तब सदा चले नहीं जाते? ऐसा क्यों है?
जिस बात को प्रभु यीशु मसीह ने ठहराया और नियुक्त किया, वह किसी भी प्रकार छोटे महत्त्व की नहीं हो सकती। हमारे प्रभु ने अपने चेलों को अत्यन्त स्पष्ट आज्ञा दी कि वे उसकी स्मृति में "रोटी खाएँ" और "दाख रस पीएँ"। किसी मसीही को इस आज्ञा को न मानने का क्या अधिकार है? निःसन्देह कोई मनुष्य पश्चातापी चोर के समान प्रभु-भोज में भाग लिए बिना भी उद्धार पा सकता है। वह मन फिराव, विश्वास और मन-परिवर्तन के समान पूर्णतः अनिवार्य और अपरिहार्य बात नहीं है। परन्तु यह कहना असम्भव है कि जो कोई मसीही कहलाने वाला व्यक्ति आदतन मसीह की आज्ञा मानने और प्रभु की मेज़ पर आने से इनकार करता है, उसकी आत्मा की दशा सुरक्षित, स्वस्थ या सन्तोषजनक है। यदि वह है
