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ऊपरी कोठरी
(यशायाह 51:12-13)। और यह भय कितना निष्फल है! कोई भी वास्तव में इसके कारण तुम्हें अच्छा नहीं समझेगा। संसार सदा उन्हीं का सबसे अधिक आदर करता है जो परमेश्वर के लिए निडर होकर काम करते हैं। अरे, इन बन्धनों को तोड़ डालो और इन जंजीरों को अपने ऊपर से उतार फेंको! लोगों को यह देखने देने में कभी लज्जित न हो कि तुम स्वर्ग जाना चाहते हो। परमेश्वर का दास कहलाने में अपनी कोई लज्जा न समझो। जो उचित है उसे करने से कभी न डरो।
प्रभु यीशु के ये वचन स्मरण रखो: "जो शरीर को घात करते हैं पर आत्मा को घात नहीं कर सकते उनसे मत डरो; पर उसी से डरो जो आत्मा और शरीर दोनों को नरक में नष्ट कर सकता है" (मत्ती 10:28)। केवल परमेश्वर को प्रसन्न करने का प्रयत्न करो, तो वह शीघ्र ही दूसरों को भी तुम से प्रसन्न कर सकता है। "जब किसी का चालचलन यहोवा को भावता है, तब वह उसके शत्रुओं को भी उससे मिलाप कराता है" (नीतिवचन 16:7)।
हे जवानो, हियाव बाँधो। — संसार क्या कहता या सोचता है इसकी चिन्ता मत करो: तुम सदा संसार के साथ न रहोगे। क्या मनुष्य तुम्हारी आत्मा को बचा सकता है? नहीं। क्या लेखे के उस बड़े और भयानक दिन में मनुष्य तुम्हारा न्यायी होगा? — नहीं। क्या मनुष्य जीवन में तुम्हें शुद्ध विवेक दे सकता है, मृत्यु में अच्छी आशा दे सकता है, पुनरुत्थान के प्रातःकाल में अच्छा उत्तर दे सकता है? नहीं! नहीं! नहीं! मनुष्य ऐसा कुछ भी नहीं कर सकता। इसलिए "मनुष्यों की नामधराई से मत डरो, और उनके निन्दा करने से तुम्हारा मन कच्चा न हो; क्योंकि कीड़ा उन्हें वस्त्र के समान खा जाएगा, और घुन उन्हें ऊन के समान खा जाएगा" (यशायाह 51:7-8)। भले कर्नल गार्डिनर की उस उक्ति का स्मरण करो: "मैं परमेश्वर से डरता हूँ, इसलिए मुझे और किसी से डरना नहीं है।" जाओ, और उसके समान बनो।
ये वे चेतावनियाँ हैं जो मैं तुम्हें देता हूँ। इन्हें अपने मन में रखो। इन पर विचार करना उचित है। यदि इनकी बड़ी आवश्यकता न हो तो मैं बहुत भूल में हूँ। प्रभु करे कि ये तुम्हें व्यर्थ न दी गई हों।
III. जवानों के लिए सामान्य सम्मतियाँ।
3. तीसरे स्थान पर, मैं जवानों को कुछ सामान्य सम्मतियाँ देना चाहता हूँ।
(1) एक तो यह कि पाप की बुराई को स्पष्ट रीति से देखने का प्रयत्न करो।
हे जवानो, यदि तुम जानते कि पाप क्या है और पाप ने क्या किया है, तो तुम्हें यह अचम्भा न लगता कि मैं तुम्हें इस प्रकार समझाता हूँ। तुम उसे उसके सच्चे रंग में नहीं देखते। तुम्हारी आँखें स्वभाव से ही उसके दोष और जोखिम के प्रति अन्धी हैं, इसलिए तुम समझ नहीं पाते कि मुझे तुम्हारी इतनी चिन्ता क्यों है। अरे, शैतान को इस बात में सफल न होने दो कि वह तुम्हें समझा दे कि पाप तो छोटी बात है!
क्षण भर विचार करो कि बाइबल पाप के विषय में क्या कहती है; — कि वह स्वभाव से ही हर जीवित स्त्री-पुरुष के हृदय में बसा हुआ है (सभोपदेशक 7:20; रोमियों 3:23), — कि वह हमारे विचारों, वचनों और कार्यों को, और वह भी लगातार, अशुद्ध करता है (उत्पत्ति 6:5; मत्ती 15:19), — कि वह हम सब को पवित्र परमेश्वर की दृष्टि में दोषी और घृणित ठहराता है (यशायाह 64:6; हबक्कूक 1:13), — कि यदि हम अपनी ओर देखें तो वह हमें उद्धार की आशा से बिलकुल रहित कर देता है (भजन संहिता 143:2; रोमियों 3:20), — कि इस संसार में उसका फल लज्जा है, और आनेवाले संसार में उसकी मजदूरी मृत्यु है (रोमियों 6:21-23)। यह सब शान्त मन से सोचो। मैं आज तुमसे कहता हूँ, क्षय रोग से मरते हुए और उसे न जानने की दशा उतनी शोचनीय नहीं है जितनी जीवित मनुष्य होकर इसे न जानने की दशा है।
विचार करो कि पाप ने हमारे स्वभाव में कैसा भयानक परिवर्तन कर दिया है। मनुष्य अब वैसा नहीं रहा जैसा तब था जब परमेश्वर ने उसे भूमि की मिट्टी से रचा। वह परमेश्वर के हाथ से खरा और निष्पाप निकला (सभोपदेशक 7:29)। अपनी सृष्टि के दिन वह, और सब वस्तुओं के समान, "बहुत अच्छा" था (उत्पत्ति 1:31)। और अब मनुष्य क्या है? — एक गिरा हुआ प्राणी, एक खँडहर, एक ऐसा जीव जिस पर सब ओर भ्रष्टता के चिह्न दिखाई देते हैं; उसका हृदय नबूकदनेस्सर के समान गिरा हुआ और सांसारिक, नीचे देखनेवाला, ऊपर नहीं; उसकी भावनाएँ अव्यवस्थित घराने के समान, जो किसी को स्वामी नहीं मानतीं, सब ओर उड़ाऊपन और गड़बड़ी; उसकी समझ बुझते हुए दीये के समान टिमटिमाती हुई, उसे मार्ग दिखाने में असमर्थ, भले-बुरे का भेद न जाननेवाली; उसकी इच्छा बिना पतवार के जहाज़ के समान, हर लालसा से इधर-उधर डोलती हुई, और परमेश्वर के मार्ग को छोड़ किसी भी और मार्ग को चुनने में स्थिर। हाय, जो वह हो सकता था उसकी तुलना में मनुष्य कैसा नष्ट हो गया है! जब आत्मा को हमें मनुष्य की वर्तमान दशा का चित्र दिखाना होता है, तब अन्धापन, बहरापन, रोग, नींद, मृत्यु जैसे रूपकों का प्रयोग होना कोई आश्चर्य नहीं। और स्मरण रखो, मनुष्य जैसा है वैसा पाप ही के कारण बना है।
यह भी सोचो कि पाप का प्रायश्चित करने और पापियों के लिए क्षमा और पापमोचन की व्यवस्था करने में कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। परमेश्वर के अपने पुत्र को संसार में आना और हमारा स्वभाव धारण करना पड़ा, ताकि हमारे छुटकारे का मूल्य चुकाए और हमें टूटी हुई व्यवस्था के श्राप से छुड़ाए। जो आदि में पिता के साथ था और जिसके द्वारा सब कुछ रचा गया, उसे पाप के लिए धर्मी होकर अधर्मियों के बदले दुःख उठाना पड़ा, — किसी भी आत्मा के लिए स्वर्ग का मार्ग खुलने से पहले उसे अपराधी की मृत्यु मरना पड़ा। प्रभु यीशु
मसीह को देखो, जो मनुष्यों में तुच्छ जाना गया और ठुकराया गया, कोड़े खाए, ठट्ठों में उड़ाया गया और अपमानित हुआ; — उसे गुलगुता के क्रूस पर लहू बहाते हुए देखो; — उसे वेदना में पुकारते सुनो, "हे मेरे परमेश्वर, हे मेरे परमेश्वर, तूने मुझे क्यों छोड़ दिया?" देखो कि उस दृश्य को देखकर सूर्य कैसे अन्धकारमय हो गया और चट्टानें फट गईं; — और तब, हे जवानो, विचार करो कि पाप की बुराई और दोष कितना बड़ा होगा।
यह भी सोचो कि पाप पृथ्वी पर पहले ही क्या कर चुका है। सोचो कि उसने कैसे आदम और हव्वा को अदन से निकाल दिया, — पुराने संसार पर जलप्रलय ले आया, सदोम और अमोरा पर आग बरसवाई, फिरौन और उसकी सेना को लाल समुद्र में डुबोया, कनान की सात दुष्ट जातियों का नाश किया, इस्राएल के बारहों गोत्रों को पृथ्वी की सतह पर बिखेर दिया। यह सब अकेले पाप ने किया।
इसके अतिरिक्त उस सारे दुःख और शोक का विचार करो जो पाप ने उत्पन्न किया है और आज भी कर रहा है। पीड़ा, रोग और मृत्यु, झगड़े, कलह और फूट, डाह, जलन और बैर, छल, कपट और ठगी, हिंसा, अत्याचार और लूट, स्वार्थ, निर्दयता और कृतघ्नता; ये सब पाप के फल हैं। पाप इन सबका जनक है। पाप ही है जिसने परमेश्वर की सृष्टि का रूप इस प्रकार बिगाड़ और नष्ट कर दिया है।
हे जवानो, इन बातों पर विचार करो, तब तुम्हें आश्चर्य न होगा कि हम ऐसा प्रचार करते हैं। यदि तुम इन पर सचमुच ध्यान दो, तो निश्चय ही तुम पाप से सदा के लिए नाता तोड़ लोगे। क्या तुम विष से खेलोगे? क्या तुम नरक से हँसी-ठट्ठा करोगे? क्या तुम हाथ में आग लोगे? क्या तुम अपने सबसे भयंकर शत्रु को अपनी छाती में स्थान दोगे? क्या तुम ऐसे जीते रहोगे मानो इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता कि तुम्हारे अपने पाप क्षमा हुए या नहीं, पाप का तुम पर प्रभुत्व है या तुम्हारा पाप पर? ओह, पाप की पापमयता और उसके संकट का बोध करके जाग उठो! सुलैमान के वचन स्मरण करो: "मूर्ख", केवल मूर्ख ही, "पाप का उपहास करते हैं" (नीतिवचन 14:9)।
तो आज मैं तुमसे जो विनती करता हूँ, उसे सुनो — प्रार्थना करो कि परमेश्वर तुम्हें पाप की वास्तविक बुराई सिखाए। यदि तुम चाहते हो कि तुम्हारी आत्मा का उद्धार हो, तो उठो और प्रार्थना करो।
(2) दूसरी बात यह कि हमारे प्रभु यीशु मसीह से परिचित होने का प्रयत्न करो।
सचमुच यही धर्म की मुख्य बात है। यही मसीही विश्वास की कोने की आधारशिला है।
जब तक तुम इसे नहीं जानते, मेरी चेतावनियाँ और सलाह व्यर्थ रहेंगी, और तुम्हारे प्रयत्न, चाहे जैसे भी हों, निष्फल होंगे। जैसे मुख्य कमानी के बिना घड़ी किसी काम की नहीं, वैसे ही मसीह के बिना धर्म भी किसी काम का नहीं।
परन्तु मेरी बात का गलत अर्थ न लिया जाए। मेरा आशय केवल मसीह का नाम जानने से नहीं है — मेरा आशय उसकी दया, अनुग्रह और सामर्थ्य को जानने से है; उसे कानों से सुनकर नहीं, बल्कि अपने हृदयों के अनुभव से जानने से है। मैं चाहता हूँ कि तुम उसे विश्वास के द्वारा जानो — मैं चाहता हूँ कि तुम, जैसा पौलुस कहता है, "उसके पुनरुत्थान की सामर्थ्य" को जानो, और "उसकी मृत्यु की समानता" में ढलते जाओ (फिलिप्पियों 3:10)। मैं चाहता हूँ कि तुम उसके विषय में कह सको: वही मेरी शान्ति और मेरा बल है, मेरा जीवन और मेरी सान्त्वना है, मेरा वैद्य और मेरा चरवाहा है, मेरा उद्धारकर्ता और मेरा परमेश्वर है।
मैं इस बात पर इतना बल क्यों देता हूँ? इसलिए कि केवल मसीह में ही "सारी परिपूर्णता वास करती है" (कुलुस्सियों 1:19) — केवल उसी में हमारी आत्माओं की आवश्यकताओं की हर वस्तु की पूरी पूर्ति है। हम स्वयं में सब दीन और रिक्त प्राणी हैं — धार्मिकता और शान्ति से रिक्त, बल और सान्त्वना से रिक्त, साहस और धीरज से रिक्त, इस बुरे संसार में खड़े रहने, आगे बढ़ने या उन्नति करने की सामर्थ्य से रिक्त। ये सब बातें — अनुग्रह, शान्ति, बुद्धि, धार्मिकता, पवित्रीकरण और छुटकारा — केवल मसीह में ही पाई जाती हैं। हम जितना उस पर निर्भर रहते हैं, उतने ही सामर्थी मसीही होते हैं। जब अपना आप कुछ नहीं रहता और मसीह ही हमारा सारा भरोसा होता है, केवल तभी हम बड़े-बड़े काम करेंगे। तभी हम जीवन के संग्राम के लिए सुसज्जित होते हैं और जय पाएँगे। तभी हम जीवन की यात्रा के लिए तैयार होते हैं और आगे बढ़ेंगे। मसीह पर जीना, मसीह से सब कुछ पाना, मसीह की सामर्थ्य से सब कुछ करना, सदा मसीह की ओर ताकते रहना — यही आत्मिक उन्नति का सच्चा भेद है। पौलुस कहता है, "जो मुझे सामर्थ्य देता है उसमें मैं सब कुछ कर सकता हूँ" (फिलिप्पियों 4:13)।
हे जवानो, आज मैं यीशु मसीह को तुम्हारी आत्माओं के भण्डार के रूप में तुम्हारे सामने रखता हूँ; और यदि तुम इस रीति से दौड़ना चाहते हो कि जीत पाओ, तो मैं तुम्हें न्योता देता हूँ कि उसी के पास जाकर आरम्भ करो। यही तुम्हारा पहला कदम हो — मसीह के पास जाओ। क्या तुम मित्रों से परामर्श करना चाहते हो? वही सबसे उत्तम मित्र है: "ऐसा मित्र जो भाई से भी अधिक मिला रहता है" (नीतिवचन 18:24)। क्या तुम अपने पापों के कारण अपने को अयोग्य समझते हो? मत डरो: उसका लहू सब पापों से शुद्ध करता है। वह कहता है, "तुम्हारे पाप चाहे लाल रंग के हों, तौभी वे हिम के समान उजले हो जाएँगे; और चाहे अरुण रंग के हों, तौभी वे ऊन के समान हो जाएँगे" (यशायाह 1:18)। क्या तुम अपने को निर्बल पाते हो और समझते हो कि उसके पीछे चल न सकोगे? मत डरो: वह तुम्हें परमेश्वर की सन्तान बनने का अधिकार देगा। वह पवित्र आत्मा को तुम में वास करने के लिए देगा और तुम पर अपनी छाप लगाएगा; वह तुम्हें नया हृदय देगा और तुम्हारे भीतर नई आत्मा डालेगा। क्या तुम किन्हीं विशेष दुर्बलताओं से व्याकुल या घिरे हुए हो? मत डरो: ऐसी कोई अशुद्ध आत्मा नहीं जिसे यीशु निकाल न सके, आत्मा का ऐसा कोई रोग नहीं जिसे वह चंगा न कर सके। क्या तुम्हारे मन में सन्देह और भय उठते हैं? उन्हें दूर फेंको: वह कहता है, "मेरे पास आओ; जो मेरे पास आएगा उसे मैं कभी न निकालूँगा।" वह जवान के हृदय को भली-भाँति जानता है। वह तुम्हारी परीक्षाओं और प्रलोभनों को, तुम्हारी कठिनाइयों और शत्रुओं को जानता है। अपनी देह के दिनों में वह तुम्हारे ही समान था — नासरत में एक जवान। वह अनुभव से जवान के मन को जानता है। वह तुम्हारी निर्बलताओं में तुम्हारे साथ दुःख मान सकता है, क्योंकि उसने स्वयं परीक्षा में पड़कर दुःख उठाया। यदि तुम ऐसे उद्धारकर्ता और मित्र से मुँह मोड़ोगे, तो निश्चय ही तुम्हारे पास कोई बहाना न होगा।
आज मैं तुमसे जो विनती करता हूँ, उसे सुनो — यदि तुम जीवन से प्रेम रखते हो, तो यीशु मसीह से परिचित होने का प्रयत्न करो।
(3) तीसरी बात यह कि कभी न भूलो कि तुम्हारी आत्मा से अधिक महत्त्वपूर्ण कुछ भी नहीं है।
तुम्हारी आत्मा अनन्त है। वह सदा जीवित रहेगी। संसार और उसमें जो कुछ है, सब टल जाएगा — दृढ़, ठोस, सुन्दर और सुव्यवस्थित होने पर भी संसार का अन्त हो जाएगा। "पृथ्वी और उस पर के काम जल जाएँगे" (2 पतरस 3:10)। राजनेताओं, लेखकों, चित्रकारों और वास्तुकारों के काम सब अल्पकालिक हैं: तुम्हारी आत्मा इन सबसे अधिक जीवित रहेगी। एक दिन स्वर्गदूत की वाणी घोषणा करेगी कि "अब समय न रहेगा" (प्रकाशितवाक्य 10:6) — परन्तु तुम्हारी आत्माओं के विषय में यह कभी नहीं कहा जाएगा।
मैं तुमसे विनती करता हूँ कि इस तथ्य को हृदयंगम करने का प्रयत्न करो कि तुम्हारी आत्मा ही एक ऐसी वस्तु है जिसके लिए जीना सार्थक है। वह तुम्हारा वह भाग है जिस पर सबसे पहले विचार होना चाहिए। कोई स्थान, कोई काम तुम्हारे लिए अच्छा नहीं है जो तुम्हारी आत्मा को हानि पहुँचाए। कोई मित्र, कोई साथी तुम्हारे भरोसे के योग्य नहीं जो तुम्हारी आत्मा की चिन्ताओं को हलका समझता है। जो मनुष्य तुम्हारे शरीर, तुम्हारी सम्पत्ति या तुम्हारी प्रतिष्ठा को चोट पहुँचाता है, वह तुम्हारी केवल अस्थायी हानि करता है। सच्चा शत्रु वही है जो तुम्हारी आत्मा को हानि पहुँचाने की युक्ति रचता है।
ज़रा एक क्षण सोचो कि तुम्हें संसार में किस लिये भेजा गया है। केवल खाने-पीने और शरीर की अभिलाषाओं को पूरा करने के लिये नहीं, — केवल अपने शरीर को सजाने और उसकी लालसाएँ जहाँ भी ले जाएँ वहीं चलने के लिये नहीं, — केवल काम करने, सोने, हँसने, बातें करने और मौज उड़ाने के लिये नहीं, और समय के सिवा किसी और बात की चिन्ता न करने के लिये भी नहीं। नहीं! तुम इससे कहीं ऊँचे और उत्तम उद्देश्य के लिये बनाए गए हो। तुम्हें यहाँ अनन्तकाल की तैयारी के लिये रखा गया है। तुम्हारा शरीर तो केवल तुम्हारी अमर आत्मा का घर होने के लिये बना था। जैसा बहुत से लोग करते हैं — कि आत्मा को शरीर का दास बना देते हैं, और शरीर को आत्मा का दास नहीं बनने देते — यह तो परमेश्वर के उद्देश्यों का सीधा विरोध करना है। [28]
जवानो, परमेश्वर किसी का पक्षपात नहीं करता। वह किसी मनुष्य के वस्त्र, थैली, पद या हैसियत को नहीं देखता। वह मनुष्य की आँखों से नहीं देखता। जो सबसे कंगाल सन्त किसी दीनगृह में मरा, वह उसकी दृष्टि में उस सबसे धनी पापी से कहीं श्रेष्ठ है जो किसी राजमहल में मरा। परमेश्वर धन, उपाधियों, विद्या, सुन्दरता या ऐसी किसी बात की ओर नहीं देखता। वह केवल एक ही बात को देखता है, और वह है अमर आत्मा। वह सब मनुष्यों को एक ही मापदण्ड, एक ही नाप, एक ही कसौटी, एक ही परख से जाँचता है, और वह उनकी आत्माओं की दशा है।
इसे मत भूलना। प्रातःकाल, दोपहर और सन्ध्या, अपनी आत्मा के हित को सदा दृष्टि में रखो। हर दिन इस अभिलाषा के साथ उठो कि तुम्हारी आत्मा उन्नति करे, — और हर सन्ध्या सोने से पहले अपने आप से पूछो कि क्या सचमुच उसने कुछ प्रगति की है। प्राचीन काल के उस महान चित्रकार ज़ेउक्सिस को स्मरण करो। जब लोगों ने उससे पूछा कि वह इतना परिश्रम क्यों करता है और हर चित्र पर इतना अधिक श्रम क्यों लगाता है, तो उसका सीधा-सा उत्तर था, "मैं अनन्तकाल के लिये चित्र बनाता हूँ।" उसके समान होने में लज्जित न होना। अपनी अमर आत्मा को अपने मन की आँखों के सामने रखो, और जब लोग तुमसे पूछें कि तुम ऐसा जीवन क्यों जीते हो, तो उसी भावना से उन्हें उत्तर दो, "मैं अपनी आत्मा के लिये जीता हूँ।" मेरा विश्वास करो, वह दिन शीघ्र आ रहा है जब मनुष्य केवल आत्मा ही की चिन्ता करेंगे, और एकमात्र महत्त्वपूर्ण प्रश्न यही होगा, "क्या मेरी आत्मा खो गई या बच गई?"
(4) एक और बात यह है कि स्मरण रखो, जवान होते हुए भी परमेश्वर की सेवा करना सम्भव है।
मुझे उन फन्दों का भय है जो शैतान इस विषय में तुम्हारे लिये बिछाता है। मुझे डर है कि कहीं वह तुम्हारे मन में यह व्यर्थ धारणा भर देने में सफल न हो जाए कि जवानी में सच्चा मसीही होना असम्भव है। मैंने बहुतों को इस भुलावे में बहते देखा है। मैंने लोगों को यह कहते सुना है, "आप युवाओं से इतनी अधिक धार्मिकता की आशा करके असम्भव बातें माँग रहे हैं। जवानी गम्भीरता का समय नहीं है। हमारी इच्छाएँ प्रबल होती हैं, और यह कभी अभिप्राय नहीं था कि हम उन्हें दबाकर रखें जैसा आप चाहते हैं। परमेश्वर ने हमें आनन्द करने के लिये बनाया है। धर्म के लिये आगे चलकर बहुत समय मिल जाएगा।" और संसार की ओर से इस प्रकार की बातों को बहुत बढ़ावा मिलता है। संसार जवानी के पापों की ओर से आँख मूँद लेने को बहुत तैयार रहता है। संसार मानो इसे स्वाभाविक ही मानता है कि जवान लोग "अपनी जंगली जई बो लें।" संसार जैसे यह मानकर चलता है कि जवानों का अधार्मिक होना अनिवार्य है, और उनके लिये मसीह के पीछे चलना सम्भव नहीं है।
जवानो, मैं तुमसे यह सीधा प्रश्न पूछता हूँ, — इस सारी बात में से कुछ भी तुम परमेश्वर के वचन में कहाँ पाओगे? बाइबल का वह कौन-सा अध्याय या पद है जो संसार की इस बातचीत और तर्क का समर्थन करता है? क्या बाइबल बूढ़ों और जवानों दोनों से बिना भेदभाव के नहीं कहती? क्या पाप, पाप नहीं है, चाहे वह बीस वर्ष की आयु में किया जाए या पचास में? क्या न्याय के दिन यह कहना ज़रा भी बहाना बन सकेगा कि, "मैं जानता हूँ कि मैंने पाप किया, परन्तु तब मैं जवान था"? मैं तुमसे विनती करता हूँ, ऐसे व्यर्थ बहाने छोड़कर अपनी सामान्य समझ का परिचय दो। जिस क्षण से तुम भले और बुरे को पहचानने लगते हो, उसी क्षण से तुम परमेश्वर के सामने उत्तरदायी और जवाबदेह हो।
मैं भली-भाँति जानता हूँ कि जवान के मार्ग में बहुत कठिनाइयाँ हैं, मैं इसे पूरी तरह मानता हूँ। परन्तु भला करने के मार्ग में कठिनाइयाँ सदा रही हैं। स्वर्ग का मार्ग सदा सकरा है, चाहे हम जवान हों या बूढ़े।
कठिनाइयाँ हैं, — परन्तु परमेश्वर तुम्हें उन पर जय पाने के लिये अनुग्रह देगा। परमेश्वर कठोर स्वामी नहीं है। वह फ़िरौन की नाईं तुमसे बिना पुआल के ईंटें बनाने को नहीं कहेगा। वह इसका ध्यान रखेगा कि स्पष्ट कर्तव्य का मार्ग कभी असम्भव न हो। उसने मनुष्य को कभी ऐसी आज्ञा नहीं दी जिसे पूरा करने की सामर्थ्य उसने मनुष्य को न दी हो।
कठिनाइयाँ हैं, परन्तु अब तक बहुत से जवानों ने उन पर जय पाई है, और तुम भी पा सकते हो। मूसा भी तुम्हारे ही समान भावनाओंवाला एक जवान था; — परन्तु पवित्रशास्त्र में उसके विषय में क्या कहा गया है, देखो: "विश्वास ही से मूसा ने सयाना होकर फिरौन की बेटी का पुत्र कहलाने से इन्कार किया। इसलिये कि उसे पाप में थोड़े दिन के सुख भोगने से परमेश्वर के लोगों के साथ दुःख भोगना अधिक उत्तम लगा। और मसीह के कारण निन्दित होने को मिस्र के भण्डार से बड़ा धन समझा क्योंकि उसकी आँखें फल पाने की ओर लगी थीं" (इब्रानियों 11:24-26)। दानिय्येल एक जवान ही था जब उसने बाबुल में परमेश्वर की सेवा आरम्भ की। वह हर प्रकार की परीक्षाओं से घिरा हुआ था। उसके साथ थोड़े थे, और उसके विरुद्ध बहुत।
तौभी दानिय्येल का जीवन ऐसा निर्दोष और अटल था कि उसके शत्रु भी उसमें कोई दोष न पा सके, सिवाय "उसके परमेश्वर की व्यवस्था के विषय में" (दानिय्येल 6:5)। और ये अकेले उदाहरण नहीं हैं। गवाहों का एक बड़ा बादल है जिनके नाम मैं ले सकता हूँ। यदि मैं तुम्हें जवान इसहाक, जवान यूसुफ, जवान यहोशू, जवान शमूएल, जवान दाऊद, जवान सुलैमान, जवान अबिय्याह, जवान ओबद्याह, जवान योशिय्याह और जवान तीमुथियुस के विषय में बताने लगूँ, तो समय कम पड़ जाएगा। ये स्वर्गदूत नहीं, मनुष्य थे, जिनके हृदय स्वभाव से तुम्हारे ही जैसे थे। उनके सामने भी तुम्हारी ही नाईं बाधाएँ थीं, मारने के लिये अभिलाषाएँ थीं, सहने के लिये परीक्षाएँ थीं, और निभाने के लिये कठिन स्थान थे। परन्तु जवान होते हुए भी उन सब ने परमेश्वर की सेवा करना सम्भव पाया। यदि तुम यह कहने पर अड़े रहे कि यह हो ही नहीं सकता, तो क्या वे सब न्याय के दिन उठकर तुम्हें दोषी न ठहराएँगे?
जवानो, परमेश्वर की सेवा करने का यत्न करो। जब शैतान कानों में कहे कि यह असम्भव है, तो उसका सामना करो। यत्न करो — और प्रतिज्ञाओं का प्रभु परमेश्वर तुम्हारे यत्न करते समय तुम्हें सामर्थ्य देगा। जो उसके पास आने के लिये संघर्ष करते हैं, उनसे मिलना उसे प्रिय है; वह तुमसे भी मिलेगा और तुम्हें वह सामर्थ्य देगा जिसकी तुम्हें आवश्यकता जान पड़ती है। उस मनुष्य के समान बनो जिसे बनयन के यात्री ने व्याख्याता के घर में देखा था — साहस के साथ आगे बढ़ो और कहो, "मेरा नाम लिख लीजिए।" हमारे प्रभु के ये वचन सत्य हैं, चाहे मैं उन्हें प्रायः हृदयहीन और संवेदनाहीन जीभों से दोहराए जाते सुनता हूँ: "माँगो, तो तुम्हें दिया जाएगा; ढूँढ़ो, तो तुम पाओगे; खटखटाओ, तो तुम्हारे लिये खोला जाएगा" (मत्ती 7:7)। जो कठिनाइयाँ पहाड़ों जैसी लगती थीं, वे वसन्त में बर्फ के समान पिघल जाएँगी। जो बाधाएँ दूर के कुहासे में दैत्यों जैसी दिखती थीं, वे सीधे उनका सामना करने पर कुछ भी नहीं रह जाएँगी। मार्ग का वह सिंह जिससे तुम डरते हो, बँधा हुआ निकलेगा। यदि मनुष्य प्रतिज्ञाओं पर अधिक विश्वास करते, तो वे कर्तव्यों से कभी न डरते। परन्तु उस छोटे से शब्द को स्मरण रखो जिस पर मैं तुमसे आग्रह करता हूँ, और जब शैतान कहे, "जब तक तुम जवान हो, मसीही नहीं हो सकते," तो उसे उत्तर दो, "हे शैतान, मेरे पीछे हट जा; परमेश्वर की सहायता से मैं यत्न करूँगा।"
(5) दूसरी बात यह कि जब तक जीवित रहो, यह निश्चय कर लो कि बाइबल को अपना मार्गदर्शक और सलाहकार बनाओगे।
बाइबल पापी मनुष्य की आत्मा के लिये परमेश्वर का दयालु प्रबन्ध है — वह मानचित्र जिससे उसे अपना मार्ग निर्धारित करना है, यदि वह अनन्त जीवन पाना चाहता है। हमें शान्तिपूर्ण, पवित्र या सुखी होने के लिये जो कुछ जानना आवश्यक है, वह सब उसमें भरपूरी से मिलता है। यदि कोई जवान जानना चाहे कि जीवन का आरम्भ भली रीति से कैसे करे, तो वह सुने कि दाऊद क्या कहता है: "जवान अपनी चाल को किस उपाय से शुद्ध रखे? तेरे वचन के अनुसार सावधान रहने से" (भजन संहिता 119:9)।
जवानो, मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ कि बाइबल पढ़ने की आदत डालो, और उस आदत को टूटने न दो। साथियों की हँसी, या जिस परिवार में तुम रहते हो उसकी बुरी रीतियाँ — इनमें से कोई भी तुम्हें ऐसा करने से न रोके। यह निश्चय करो कि तुम्हारे पास केवल बाइबल ही न हो, बल्कि उसे पढ़ने के लिये समय भी निकालो। किसी को यह कहकर तुम्हें न बहकाने दो कि यह तो केवल सण्डे-स्कूल के बच्चों और बूढ़ी स्त्रियों की पुस्तक है। यह वही पुस्तक है जिससे राजा दाऊद ने बुद्धि और समझ पाई। यह वही पुस्तक है जिसे जवान तीमुथियुस बचपन से जानता था। इसे पढ़ने में कभी लज्जित न हो। "वचन को तुच्छ न जानो" (नीतिवचन 13:13)।
इसे इस प्रार्थना के साथ पढ़ो कि पवित्र आत्मा का अनुग्रह तुम्हें इसे समझने की योग्यता दे। अध्यक्ष बेवरिज ने ठीक कहा है, "कोई मनुष्य जैसे आँखों के बिना पवित्रशास्त्र के अक्षर को पढ़ सकता है, वैसे ही अनुग्रह के बिना उसकी आत्मा को समझ सकता है।"
इसे श्रद्धा से पढ़ो, परमेश्वर के वचन के रूप में, मनुष्य के वचन के रूप में नहीं — पूरे मन से यह मानते हुए कि जिसे वह उचित ठहराता है वह सही है, और जिसकी वह निन्दा करता है वह गलत है। इस बात को भली-भाँति जान लो कि जो सिद्धान्त पवित्रशास्त्र की कसौटी पर खरा नहीं उतरता, वह झूठा है। यह तुम्हें इन पिछले दिनों की खतरनाक मान्यताओं के बहकावे और भटकावे से बचाए रखेगा। यह भी भली-भाँति जान लो कि तुम्हारे जीवन का जो आचरण पवित्रशास्त्र के विपरीत है, वह पापमय है और उसे छोड़ देना चाहिए। इससे विवेक के अनेक प्रश्न सुलझ जाएँगे और अनेक संदेहों की गाँठ कट जाएगी। स्मरण रखो कि यहूदा के दो राजाओं ने परमेश्वर का वचन कितने भिन्न ढंग से पढ़ा: यहोयाकीम ने उसे पढ़ा, और तुरन्त उस लेख को टुकड़े-टुकड़े करके आग में जला दिया (यिर्मयाह 36:23)। और क्यों? — क्योंकि उसका हृदय उसके विरुद्ध विद्रोह करता था, और वह आज्ञा न मानने का निश्चय कर चुका था। योशिय्याह ने उसे पढ़ा, और तुरन्त अपने वस्त्र फाड़े और प्रभु के सामने ऊँचे शब्द से गिड़गिड़ाया (2 इतिहास 34:19)। और क्यों? — क्योंकि उसका हृदय कोमल और आज्ञाकारी था। पवित्रशास्त्र ने जो कुछ उसका कर्तव्य दिखाया, उसे करने को वह तैयार था। ओह, कि तुम इन दोनों में से दूसरे का अनुसरण करो, पहले का नहीं!
और इसे नियमित रूप से पढ़ो। "पवित्रशास्त्र में सामर्थी" बनने का यही एकमात्र मार्ग है। बाइबल पर कभी-कभार जल्दी से एक दृष्टि डाल लेने से बहुत लाभ नहीं होता। इस रीति से तुम उसके खज़ानों से कभी परिचित न होगे, और न संघर्ष की घड़ी में आत्मा की तलवार को अपने हाथ में ठीक बैठा हुआ पाओगे। परन्तु परिश्रम से पढ़कर अपने मन को पवित्रशास्त्र से भर लो, तो शीघ्र ही उसका मूल्य और सामर्थ्य जान लोगे। परीक्षा के क्षण में वचन तुम्हारे हृदय में उभर आएँगे। संदेह के समय आज्ञाएँ अपने आप सूझ जाएँगी। निराशा के समय प्रतिज्ञाएँ तुम्हारे विचारों में आ जाएँगी। — और इस प्रकार तुम दाऊद के इन शब्दों की सच्चाई का अनुभव करोगे, "मैंने तेरे वचन को अपने हृदय में रख छोड़ा है, कि मैं तेरे विरुद्ध पाप न करूँ" (भजन संहिता 119:11); और सुलैमान के इन शब्दों की भी, "वह तेरे चलने में तेरी अगुवाई करेगी, और सोते समय तेरी रखवाली करेगी, और जागते समय तुझसे बातें करेगी" (नीतिवचन 6:22)।
मैं इन बातों पर इसलिये और अधिक ज़ोर देता हूँ कि यह पढ़ने का युग है। बहुत सी पुस्तकें बनाने का कोई अन्त नहीं दिखता, यद्यपि उनमें से थोड़ी ही वास्तव में लाभदायक हैं। सस्ती छपाई और प्रकाशन की जैसे धुन सी लगी है। हर प्रकार के समाचार-पत्र भरे पड़े हैं, और जिनका प्रसार सबसे अधिक है उनमें से कुछ का स्वर इस युग की रुचि के विषय में बुरी बात कहता है। खतरनाक पठन-सामग्री की इस बाढ़ के बीच मैं अपने स्वामी की पुस्तक की पैरवी करता हूँ — मैं तुमसे आग्रह करता हूँ कि आत्मा की इस पुस्तक को न भूलो। समाचार-पत्र, उपन्यास और प्रेम-कथाएँ तो पढ़ी जाएँ, और भविष्यद्वक्ताओं और प्रेरितों को तुच्छ जाना जाए, ऐसा न होने दो। उत्तेजक और कामुक सामग्री तुम्हारा सारा ध्यान न निगल जाए, जबकि उन्नति करनेवाली और पवित्र करनेवाली बातों को तुम्हारे मन में कोई स्थान ही न मिले।
जवानो, जितने दिन जीवित रहो, प्रतिदिन बाइबल को वह आदर दो जिसकी वह योग्य है। जो कुछ भी पढ़ो, उसे पहले पढ़ो। और बुरी पुस्तकों से सावधान रहो: आज के दिनों में उनकी कमी नहीं। चौकस रहो कि क्या पढ़ते हो। मुझे सन्देह है कि इस रीति से आत्माओं की जितनी हानि होती है, वह अधिकांश लोगों की कल्पना से कहीं अधिक है। सब पुस्तकों का मूल्य इस अनुपात से आँको कि वे पवित्रशास्त्र के कितने अनुकूल हैं। जो उसके सबसे निकट हैं, वे सबसे उत्तम हैं, और जो उससे सबसे दूर और सबसे विपरीत हैं, वे सबसे निकृष्ट हैं।
(6) एक और बात यह कि जो परमेश्वर का मित्र नहीं है, उसे कभी अपना घनिष्ठ मित्र न बनाओ।
मुझे ठीक समझो — मैं परिचितों की बात नहीं कर रहा। मेरा यह अर्थ नहीं कि सच्चे मसीहियों को छोड़ किसी से तुम्हारा कोई सम्बन्ध न हो। इस संसार में ऐसा मार्ग अपनाना न सम्भव है, न वांछनीय। मसीही धर्म किसी मनुष्य से अशिष्ट होने को नहीं कहता।
परन्तु मैं तुम्हें सलाह देता हूँ कि मित्रों के चुनाव में बहुत सावधान रहो। किसी मनुष्य के सामने केवल इसलिए अपना सारा हृदय न खोल दो कि वह चतुर, मिलनसार, भले स्वभाव का, हँसमुख और दयालु है। ये बातें अपनी जगह ठीक हैं, पर यही सब कुछ नहीं हैं। ऐसे किसी भी मनुष्य की मित्रता से सन्तुष्ट न हो जो तुम्हारी आत्मा के लिए लाभदायक न हो।
मेरा विश्वास करो, इस सलाह के महत्त्व को कभी बढ़ा-चढ़ाकर नहीं कहा जा सकता। भक्तिहीन साथियों और मित्रों की संगति से जो हानि होती है, उसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता। मनुष्य की आत्मा को नष्ट करने में शैतान के पास इससे अच्छे सहायक बहुत कम हैं। यह सहायता उसे दे दो, तो फिर तुम उसके विरुद्ध जो भी कवच धारण किए हो, उसकी उसे कोई चिन्ता नहीं रहती। वह भली-भाँति जानता है कि अच्छी शिक्षा, बचपन की नैतिक आदतें, उपदेश, पुस्तकें, नियमित घर-परिवार, माता-पिता की चिट्ठियाँ, ये सब तुम्हारे बहुत काम न आएँगी, यदि तुम भक्तिहीन मित्रों से ही चिपके रहोगे। तुम बहुत-सी खुली परीक्षाओं का सामना कर सकते हो, बहुत-से स्पष्ट फन्दों को ठुकरा सकते हो; पर जैसे ही तुमने किसी बुरे साथी को अपना लिया, वह सन्तुष्ट हो जाता है। वह भयानक अध्याय, जिसमें तामार के प्रति अम्नोन के दुष्ट आचरण का वर्णन है, लगभग इन्हीं शब्दों से आरम्भ होता है, "अम्नोन का एक मित्र था, जो बड़ा चतुर मनुष्य था" (2 शमूएल 13:3)।
तुम्हें स्मरण रखना चाहिए कि हम सब अनुकरण करनेवाले प्राणी हैं; उपदेश हमें सिखा सकता है, परन्तु हमें खींचता उदाहरण ही है। हम सब में यह प्रवृत्ति है कि जिनके साथ रहते हैं उनके चाल-चलन को शीघ्र अपना लेते हैं; और जितना अधिक हम उन्हें पसन्द करते हैं, यह प्रवृत्ति उतनी ही प्रबल होती जाती है। हमें पता भी नहीं चलता और वे हमारी रुचियों और विचारों पर प्रभाव डालते हैं; हम धीरे-धीरे वह छोड़ देते हैं जो उन्हें अप्रिय है, और वह अपना लेते हैं जो उन्हें प्रिय है, ताकि उनके और घनिष्ठ मित्र बन सकें। और सबसे बुरी बात यह है कि हम उनकी बुरी बातों को भली बातों की अपेक्षा कहीं अधिक शीघ्रता से अपना लेते हैं। दुर्भाग्य से स्वास्थ्य संक्रामक नहीं होता, रोग होता है। ठण्ड लग जाना गर्मी पहुँचाने की अपेक्षा कहीं अधिक सरल है; और एक-दूसरे के धर्म को क्षीण कर देना उसे बढ़ाने और फलने-फूलने देने से कहीं अधिक सरल है।
हे जवानो, मैं तुमसे आग्रह करता हूँ कि इन बातों को अपने मन में रखो। किसी को अपना नित्य का साथी बनाने से पहले, उससे सब कुछ कह देने और अपने सब दुःखों और सुखों में उसी के पास जाने की आदत डालने से पहले, इन बातों पर विचार करो जो मैंने कही हैं; अपने आप से पूछो, "क्या यह मित्रता मेरे लिए लाभदायक होगी या नहीं?"
"बुरी संगति" सचमुच "अच्छे चरित्र को बिगाड़ देती है" (1 कुरिन्थियों 15:33)। मैं चाहता हूँ कि यह वचन उतनी ही बार हृदयों पर लिखा जाए जितनी बार यह लिखावट की कापियों में लिखा जाता है। अच्छे मित्र हमारी सबसे बड़ी आशीषों में से हैं; वे हमें बहुत-सी बुराई से रोक सकते हैं, हमारी यात्रा में हमें स्फूर्ति दे सकते हैं, समय पर एक वचन कह सकते हैं, हमें ऊपर खींच सकते हैं और आगे बढ़ा सकते हैं। परन्तु बुरा मित्र निश्चित रूप से एक दुर्भाग्य है, एक बोझ जो हमें निरन्तर नीचे खींचता है और धरती से बाँधे रखता है। रखो
