अध्याय 4 / 92

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यह हिन्दी संस्करण अंग्रेज़ी मूल से पूर्ण रूप से, अनुच्छेद-दर-अनुच्छेद, कृत्रिम बुद्धि (AI) की सहायता से अनुवादित है; मानवीय समीक्षा जारी है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।

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उसके लिए विश्वास करना कठिन क्यों है? क्या वह धर्मी ठहराया जाना और उद्धार पाना नहीं चाहता? क्या वह यीशु मसीह के द्वारा उद्धार पाना, और इस प्रकार उसमें परमेश्वर के अनुग्रह की स्तुति करना तथा अपने आप पर सब घमण्ड को व्यर्थ ठहराना नहीं चाहता? वह निश्चय ही इससे इनकार करेगा। क्या उसे सुसमाचार के वृत्तान्त की सत्यता पर सन्देह है? वह इसे स्वीकार करने का साहस नहीं करेगा। क्या उसे मसीह की सामर्थ्य या उसकी उद्धार करने की इच्छा पर सन्देह है? यह तो सुसमाचार में दी गई परमेश्वर की गवाही का खण्डन करना है। क्या वह इसलिए सन्देह करता है कि मसीह और उसके छुटकारे में उसका कोई भाग है या नहीं? तुम उससे कहो कि मसीह पर विश्वास करना ही उसमें भागी बनाता है।

"यदि वह कहे कि मैं यीशु मसीह पर विश्वास नहीं कर सकता, क्योंकि इस विश्वास को करना कठिन है, और इसे उत्पन्न करने के लिए ईश्वरीय सामर्थ्य चाहिए, जो मुझे नहीं मिलती, तो तुम्हें उससे कहना चाहिए कि यीशु मसीह पर विश्वास करना कोई काम नहीं, वरन् यीशु मसीह पर भरोसा रखकर विश्राम करना है। तुम्हें उससे कहना चाहिए कि यह बहाना वैसा ही अनुचित है जैसे कोई मनुष्य यात्रा से थककर एक कदम भी आगे न बढ़ सके और यह तर्क करे, 'मैं इतना थक गया हूँ कि लेट भी नहीं सकता,' जबकि वास्तव में वह न खड़ा हो सकता है न चल सकता है। बेचारा थका-माँदा पापी तब तक मसीह पर विश्वास नहीं कर सकता जब तक वह यह न जान ले कि वह अपने लिए कुछ नहीं कर सकता; और अपने पहले विश्वास में वह सदा उद्धार के लिए मसीह के पास ऐसे मनुष्य की नाईं आता है जो अपने आप में निराश और असहाय है। और सुसमाचार से ऐसे तर्कों के द्वारा प्रभु (जैसा वह प्रायः कर चुका है) विश्वास करने के द्वारा विश्वास, आनन्द और शान्ति पहुँचाएगा।" रॉबर्ट ट्रैली की रचनाएँ, 1696। खण्ड 1.266-269।

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[7] इस लेख के अधिकांश भाग का सार एक उपदेश के रूप में सन् 1878 में लन्दन के सेंट पॉल गिरजाघर के गुम्बद के नीचे और चेस्टर गिरजाघर के मध्य-भाग में सुनाया गया था।

1 यूहन्ना 5:4-5। जय [8]

"क्योंकि जो कुछ परमेश्वर से जन्मा है, वह संसार पर जय प्राप्त करता है; और वह जय जिस से संसार पर जय प्राप्त होती है हमारा विश्वास है। संसार पर जय पानेवाला कौन है? केवल वह जिसका यह विश्वास है कि यीशु परमेश्वर का पुत्र है।" 1 यूहन्ना 5:4-5।

यदि हम में कुछ भी धर्म है, तो हमारा यह अभ्यास होना चाहिए कि हम समय-समय पर अपनी आत्माओं की दशा को जाँचें, और यह पता लगाएँ कि क्या हमारा मन "परमेश्वर के आगे सीधा" है (प्रेरितों के काम 8:21)।

क्या हम सच्चे मसीही हैं? क्या मरने पर हमारे स्वर्ग जाने की आशा है? क्या हम नये सिरे से जन्मे हैं, आत्मा से जन्मे हैं, परमेश्वर से जन्मे हैं? ये जाँचनेवाले प्रश्न हैं, जिनका उत्तर देना अनिवार्य है; और इस लेख के आरम्भ का पद इस उत्तर देने में हमारी सहायता करेगा। यदि हम परमेश्वर से जन्मे हैं, तो हम में चरित्र का एक बड़ा चिह्न होगा, हम "संसार पर जय पाएँगे।"

इस विषय को खोलने में तीन बातें हैं जिनकी ओर मैं इस लेख में ध्यान दिलाना चाहता हूँ।

I. पहली बात, उस नाम पर विचार करें जिससे यूहन्ना एक सच्चे मसीही का वर्णन करता है। वह अपनी पहली पत्री में उसे छः बार "परमेश्वर से जन्मा हुआ" मनुष्य कहता है, और एक बार "परमेश्वर से उत्पन्न हुआ।"

II. दूसरी बात, उस विशेष चिह्न पर विचार करें जो यूहन्ना परमेश्वर से जन्मे हुए मनुष्य का बताता है। वह कहता है कि वह "संसार पर जय पाता है।"

III. अन्तिम बात, सच्चे मसीही की संसार पर जय के भेद पर विचार करें। वह कहता है, "वह जय जिस से संसार पर जय प्राप्त होती है हमारा विश्वास है।"

मार्ग साफ़ करने के लिए मैं यह हार्दिक आशा प्रकट करता हूँ कि कोई भी पाठक इस विचार से हमारे सामने के विषय से मुँह न मोड़े कि यह विवादग्रस्त विषय है। मुझे सन्देह है कि बाइबल के किसी सिद्धान्त को विवाद के प्रति अधीर अरुचि से उतनी हानि पहुँची है जितनी उस सिद्धान्त को जो इस वाक्यांश में निहित है, "परमेश्वर से जन्मा हुआ।" फिर भी इस वाक्यांश में मसीही विश्वास का एक बड़ा मूल सत्य है, जिसकी उपेक्षा बिना हानि के कभी नहीं की जा सकती। बपतिस्मा के प्रभाव और धार्मिक विधियों के अर्थ को लेकर हुए झगड़ों और विवादों के नीचे, इन तीन शब्दों में सनातन सुसमाचार की मूल चट्टानों में से एक छिपी है, अर्थात् मनुष्य की आत्मा में पवित्र आत्मा का भीतरी कार्य। हमारे लिए मसीह का प्रायश्चित्त का कार्य, और हमारे भीतर पवित्र आत्मा का पवित्र करने का कार्य, उद्धार देनेवाले धर्म के दो कोने के पत्थर हैं। निश्चय ही जिस सत्य को नये नियम का अन्तिम लेखक एक ही पत्री के पाँच अध्यायों में सात बार सामने लाता है, जिसे वह सात बार मसीही मनुष्य के कुछ विशिष्ट लक्षणों से जोड़ता है, ऐसे सत्य को नापसन्द करना या डरकर टाल जाना उचित नहीं। निश्चय ही इसे विवादित भूमि में पैर रखे बिना लाभ के साथ समझाया जा सकता है। इस लेख में मैं इसे इसी रीति से समझाने का प्रयत्न करूँगा।

I. सबसे पहले मैं अपने पाठकों से कहता हूँ कि उस नाम पर ध्यान दें जिससे यूहन्ना एक सच्चे मसीही का वर्णन करता है। यहाँ और अन्य पाँच स्थानों पर वह उसे "परमेश्वर से जन्मा हुआ" कहता है।

आइए, इस समृद्ध और अद्भुत अभिव्यक्ति का संक्षेप में विश्लेषण करें। मनुष्य के किसी भी बच्चे का स्वाभाविक जन्म, चाहे वह जीवन के निम्नतम स्तर में हो, एक महत्त्वपूर्ण घटना है। यह एक ऐसे प्राणी को अस्तित्व में लाना है जो सूर्य, चन्द्रमा, तारों और पृथ्वी से अधिक जीवित रहेगा, और किसी दिन ऐसा चरित्र विकसित कर सकता है जो संसार को हिला दे। तब आत्मिक जन्म कितना अधिक महत्त्वपूर्ण होगा! उस लाक्षणिक वाक्यांश, "परमेश्वर से जन्मा हुआ," के नीचे कितना कुछ निहित होगा!

(क) "परमेश्वर से जन्मा हुआ" होना हृदय के ऐसे भीतरी परिवर्तन का पात्र होना है, जो इतना पूर्ण है कि मानो एक नये अस्तित्व में प्रवेश करना हो। यह मनुष्य की आत्मा में स्वर्ग से एक बीज, एक नये सिद्धान्त, एक ईश्वरीय स्वभाव, एक नई इच्छा का प्रवेश है। निश्चय ही यह कोई बाहरी शारीरिक परिवर्तन नहीं है; परन्तु यह भी उतना ही निश्चित है कि यह भीतरी मनुष्य का पूर्ण परिवर्तन है। यह हमारे मन में कोई नई शक्तियाँ नहीं जोड़ता; परन्तु हमारी पुरानी शक्तियों को बिलकुल नई प्रवृत्ति और झुकाव देता है। "परमेश्वर से जन्मे हुए" मनुष्य की रुचियाँ और विचार, पाप, संसार, बाइबल, परमेश्वर और मसीह के विषय में उसके दृष्टिकोण, इतने पूरी रीति से नये होते हैं कि वह सब प्रकार से वही है जिसे पौलुस "नई सृष्टि" कहता है। वास्तव में, जैसा कि कलीसिया की प्रश्नोत्तरी सच कहती है, यह "पाप के लिये मरना और धार्मिकता के लिये नया जन्म" है।

(ख) "परमेश्वर से जन्मा" होना एक ऐसा परिवर्तन है जो प्रभु यीशु मसीह की ओर से उसके सब विश्वास करनेवाले लोगों को दिया गया विशेष दान है। वही उनके हृदयों में लेपालकपन की आत्मा बोता है, जिससे वे "हे अब्बा, हे पिता" कहकर पुकारते हैं, और उन्हें अपनी रहस्यमय देह के अंग, तथा सर्वशक्तिमान प्रभु के पुत्र और पुत्रियाँ बनाता है (रोमियों 8:15)। लिखा है: "वह जिसे चाहता है उसे जिलाता है।" "क्योंकि जिस रीति से पिता अपने आप में जीवन रखता है, उसी रीति से उसने पुत्र को भी यह अधिकार दिया है कि अपने आप में जीवन रखे" (यूहन्ना 5:21-26)। संक्षेप में, जैसा यूहन्ना का पहला अध्याय सिखाता है, जब तक संसार बना रहेगा तब तक ऐसा ही होगा: "जितनों ने उसे ग्रहण किया, उसने उन्हें परमेश्वर के सन्तान होने का अधिकार दिया, अर्थात् उन्हें जो उसके नाम पर विश्वास रखते हैं; वे न तो लहू से, न शरीर की इच्छा से, न मनुष्य की इच्छा से, परन्तु परमेश्वर से उत्पन्न हुए हैं" (यूहन्ना 1:12-13)।

(ग) "परमेश्वर से जन्मा" होना एक ऐसा परिवर्तन है जो निःसन्देह बहुत ही रहस्यमय है। प्रभु यीशु मसीह स्वयं उन जाने-पहचाने वचनों में हमें यह बताता है: "हवा जिधर चाहती है उधर बहती है, और तू उसका शब्द सुनता है, परन्तु नहीं जानता कि वह कहाँ से आती और किधर को जाती है; जो कोई आत्मा से जन्मा है वह ऐसा ही है।" (यूहन्ना 3:8)। परन्तु हम सबको मानना पड़ेगा कि हमारे चारों ओर प्राकृतिक जगत में हज़ारों बातें हैं जिन्हें हम समझा नहीं सकते, फिर भी उन पर विश्वास करते हैं। हम यह नहीं समझा सकते कि हमारी इच्छाएँ प्रतिदिन हमारे अंगों पर कैसे काम करती हैं, और उन्हें हमारे चाहने पर हिलाती या विश्राम देती हैं; फिर भी कोई इस तथ्य पर विवाद करने की सोचता तक नहीं। सबसे बुद्धिमान दार्शनिक भी हमें शारीरिक जीवन का उद्गम नहीं बता सकता। तब हमें इस बात की शिकायत करने का क्या अधिकार है कि हम उस मनुष्य में, जो "परमेश्वर से जन्मा" है, आत्मिक जीवन के आरम्भ को समझ नहीं पाते?

(घ) परन्तु "परमेश्वर से जन्मा" होना एक ऐसा परिवर्तन है जो सदा देखा और अनुभव किया जाएगा। मैं यह नहीं कहता कि जिस मनुष्य में यह परिवर्तन हुआ है वह अपनी भावनाओं को सदा समझ ही लेगा। इसके विपरीत, वे भावनाएँ अकसर बहुत चिन्ता, संघर्ष और भीतरी कलह का कारण बनती हैं। न मैं यह कहता हूँ कि "परमेश्वर से जन्मा" हुआ व्यक्ति तुरन्त ही एक दृढ़ मसीही बन जाएगा, ऐसा मसीही जिसके जीवन और चाल-चलन में दूसरों को कोई निर्बलता या कमी दिखाई न दे। परन्तु मैं यह अवश्य कहता हूँ कि पवित्र आत्मा किसी व्यक्ति की आत्मा में ऐसा कार्य कभी नहीं करता जिसका चरित्र और आचरण में कोई दिखाई देनेवाला फल न हो। परमेश्वर का सच्चा अनुग्रह ज्योति और आग के समान है: वह छिप नहीं सकता; वह कभी निष्क्रिय नहीं रहता; वह कभी सोता नहीं। मुझे पवित्रशास्त्र में "सोया हुआ" अनुग्रह जैसी कोई बात नहीं मिलती। लिखा है, "जो कोई परमेश्वर से जन्मा है वह पाप नहीं करता, क्योंकि उसका वीर्य उसमें बना रहता है; और वह पाप कर ही नहीं सकता, क्योंकि परमेश्वर से जन्मा है" (1 यूहन्ना 3:9)।

(ङ) सबसे बढ़कर, परमेश्वर से जन्मा होना हमारे उद्धार के लिए अत्यन्त आवश्यक बात है। इसके बिना हम न तो इस वर्तमान जीवन में परमेश्वर को ठीक से जान सकते हैं और स्वीकार्य रीति से उसकी सेवा कर सकते हैं, और न आनेवाले जीवन में परमेश्वर के साथ सुख से रह सकते हैं। आदम की किसी भी सन्तान के उद्धार पाने से पहले दो बातें अनिवार्य हैं: एक तो मसीह के लहू के द्वारा उसके पापों की क्षमा, और दूसरी मसीह की आत्मा के द्वारा उसके हृदय का नया हो जाना। क्षमा के बिना स्वर्ग पर हमारा कोई अधिकार नहीं; नए हृदय के बिना हम स्वर्ग का आनन्द नहीं ले सकते। ये दोनों बातें कभी अलग नहीं होतीं। हर क्षमा पाया हुआ मनुष्य नया किया हुआ भी होता है, और हर नया किया हुआ मनुष्य क्षमा पाया हुआ भी होता है। सुसमाचार के दो स्थायी सूत्र हैं जिन्हें कभी भूलना नहीं चाहिए: एक यह कि "जो पुत्र पर विश्वास नहीं करता वह जीवन को नहीं देखेगा"; और दूसरा यह कि "यदि किसी में मसीह का आत्मा नहीं तो वह उसका जन नहीं" (यूहन्ना 3:36; रोमियों 8:9)। पुरानी कहावत अनोखी किन्तु अत्यन्त सत्य है: "एक बार जन्मा, दो बार मरेगा, और सदा के लिए मरेगा; दो बार जन्मा, कभी न मरेगा, और सदा जीवित रहेगा।" प्राकृतिक जन्म के बिना हम पृथ्वी पर न जीते और न चलते-फिरते; आत्मिक जन्म के बिना हम स्वर्ग में न जीएँगे और न वास करेंगे। लिखा है, "जब तक कोई नए सिरे से न जन्मे तो वह परमेश्वर का राज्य देख नहीं सकता" (यूहन्ना 3:3)।

और अब, इससे पहले कि मैं उस नाम को छोड़कर आगे बढ़ूँ जो यूहन्ना इस पद में सच्चे मसीही को देता है, आइए हम अपने आप से यह पूछना न भूलें कि "परमेश्वर से जन्मा" होने के विषय में हम अनुभव से क्या जानते हैं। आइए हम ईमानदार आत्म-परीक्षा के साथ अपने हृदयों को जाँचें और परखें, और यह पता लगाने का यत्न करें कि हमारे भीतरी मनुष्यत्व में पवित्र आत्मा का कोई सच्चा कार्य है या नहीं। मुझसे यह कभी न हो कि मैं पाखण्ड, घमण्ड और कट्टरता को ज़रा भी बढ़ावा दूँ। न मैं यह चाहता हूँ कि कोई अपने में पृथ्वी पर उस स्वर्गदूतों जैसी सिद्धता को ढूँढ़े जो केवल स्वर्ग में मिलेगी। मैं केवल इतना कहता हूँ कि जब तक हम "भीतरी और आत्मिक अनुग्रह" के विषय में भी कुछ न जानें, तब तक मसीही धर्म के "बाहरी और दिखाई देनेवाले चिह्नों" से सन्तुष्ट न हों। मैं केवल इतना माँगता हूँ, और मैं समझता हूँ कि मुझे माँगने का अधिकार है, कि हम यूहन्ना की इस पहली पत्री को बार-बार अपने हाथों में लें, और उसके प्रकाश में यह जानने का यत्न करें कि हम "परमेश्वर से जन्मे" हैं या नहीं।

एक बात और मैं जोड़ता हूँ, जिसे बिना कहे छोड़ने का मुझे साहस नहीं। झूठी शिक्षाओं की भरमार के इस दिन में हम कभी लज्जित न हों, वरन् पवित्र आत्मा के ईश्वरत्व और उसके व्यक्तित्व, तथा आत्माओं पर उसके कार्य की वास्तविकता के लिए पूरी लगन से संघर्ष करें। जैसे हम त्रिएकता के सिद्धान्त और अपने प्रभु यीशु मसीह के यथार्थ ईश्वरत्व को सुसमाचार की बड़ी मूल सच्चाइयाँ मानकर अपने हृदयों से लगाए रखते हैं, वैसे ही पवित्र आत्मा परमेश्वर के विषय की सच्चाई को भी दृढ़ता से थामे रहें। हम अपने धर्म में उसे सदा वही स्थान और गौरव दें जो पवित्रशास्त्र उसे देता है। परमेश्वर के विधान से हमें जहाँ कहीं आराधना करने को बुलाया जाए, हमारी पहली पूछताछ यह हो, "मेमना कहाँ है?" और दूसरी यह,

"पवित्र आत्मा कहाँ है?" हम जानते हैं कि यीशु मसीह और धर्मी ठहराए जाने के सच्चे सिद्धान्त के लिए बहुत से शहीद हुए हैं। एक असाधारण सन्त ने कहा था, "एक दिन ऐसा आ सकता है जब पवित्र आत्मा और आत्मा के भीतर उसके कार्य के लिए शहीदों की आवश्यकता होगी।" धन्य है वह जो हमारी पूज्य कलीसियाई प्रश्नोत्तरी के इन जाने-पहचाने शब्दों को मन से भी और होंठों से भी कह सके, "मैं परमेश्वर पिता पर विश्वास करता हूँ, जिसने मुझे और सारे संसार को बनाया है; मैं परमेश्वर पुत्र पर विश्वास करता हूँ, जिसने मुझे और सारी मानवजाति को छुड़ाया है; मैं परमेश्वर पवित्र आत्मा पर विश्वास करता हूँ, जो मुझे और परमेश्वर के सब चुने हुए लोगों को पवित्र करता है।"

II. दूसरी बात जिस पर मैं अपने पाठकों का ध्यान अपने पाठ में दिलाना चाहता हूँ, वह वह विशेष चिह्न है जो यूहन्ना सच्चे मसीही मनुष्य की पहचान के लिए देता है। वह कहता है, "जो कुछ परमेश्वर से उत्पन्न हुआ है वह संसार पर जय प्राप्त करता है।" संक्षेप में, सोडर और मैन के अध्यक्ष, उस पवित्र पुरुष विल्सन के शब्दों में कहें, तो प्रेरित यह सिखाता है कि "नया जन्म का एकमात्र निश्चित प्रमाण विजय है।"

हम सब अपने आपको यह कहकर बहलाने की प्रवृत्ति रखते हैं कि यदि हम इंग्लैंड की कलीसिया नामक उस महान धार्मिक संगठन के विधिवत् सदस्य हैं, तो हमारी आत्माएँ अधिक संकट में नहीं हो सकतीं। हम मन ही मन इस सुखद विचार से विवेक की आवाज़ को दबा देते हैं, "मैं कलीसिया का सदस्य हूँ; मुझे डरने की क्या आवश्यकता है?"

फिर भी साधारण समझ और थोड़ा सा विचार हमें स्मरण करा सकता है कि कोई भी विशेषाधिकार संबंधित उत्तरदायित्वों के बिना नहीं होता। इससे पहले कि हम अपनी कलीसिया की सदस्यता पर आत्म-सन्तुष्ट भरोसा करके विश्राम करें, हमारे लिए भला होगा कि हम अपने आपसे पूछें कि क्या हमारे चरित्र में मसीह की रहस्यमय देह के जीवित सदस्य होने के चिह्न दिखाई देते हैं। क्या हम शैतान और उसके सब कामों का त्याग करने, और शरीर को उसकी अभिलाषाओं और वासनाओं समेत क्रूस पर चढ़ाने के विषय में कुछ जानते हैं? और इस बात को निर्णायक बिन्दु पर लाने के लिए, जैसा कि यह हमारे पाठ में हमारे सामने रखी गई है, क्या हम "संसार पर जय पाने" के विषय में कुछ जानते हैं?

मनुष्य के तीन बड़े आत्मिक शत्रुओं में से यह कहना कठिन है कि कौन आत्मा की सबसे अधिक हानि करता है। केवल अन्तिम दिन ही इस बात का निपटारा करेगा। परन्तु मैं साहस के साथ कहता हूँ कि पहले कभी भी "संसार" मसीह की कलीसिया को हानि पहुँचाने में इतना ख़तरनाक और इतना सफल नहीं रहा जितना कि अभी है। कहा जाता है कि प्रत्येक युग की अपनी एक विशेष महामारी होती है। मुझे सन्देह है कि हमारे अपने युग में मसीही जगत् की विशेष महामारी "सांसारिकता" है। संसार की अच्छी वस्तुओं और संसार की अच्छी राय के प्रति वही प्रेम, और संसार के विरोध और निन्दा का वही भय, जो सुसमाचार के आरम्भ में यहूदा इस्करियोती और देमास और बहुतेरे अन्य लोगों के लिए इतना घातक सिद्ध हुआ, वही प्रत्येक आज उन्नीसवीं शताब्दी में भी उतना ही सामर्थी है जितना पहली शताब्दी में था, बल्कि सौ गुना अधिक। अन्यजाति सम्राटों के अधीन अत्याचार के दिनों में भी इन आत्मिक शत्रुओं ने हज़ारों को मार डाला, और हमारे अपने जैसे सुख, विलासिता और स्वतन्त्र विचार के दिनों में वे लाखों को मारते हैं। आजकल संसार का सूक्ष्म प्रभाव मानो उस वायु में भी फैला हुआ है जिसमें हम साँस लेते हैं। यह ज्योतिर्मय स्वर्गदूत के रूप में परिवारों में रेंगकर घुस जाता है, और असंख्य लोगों को बन्दी बना लेता है, जो कभी जान ही नहीं पाते कि वे दास हैं। अंग्रेज़ी धन की भारी वृद्धि और उसके फलस्वरूप भोग-विलास की सामर्थ्य, सब प्रकार के मनोरंजनों और आमोद-प्रमोदों के लिए उत्कट रुचि की अपार वृद्धि; तथाकथित विचार-उदारता का चौंकाने वाला उदय और विकास, जो किसी को भी गलत कहने से इनकार करती है, चाहे वह कुछ भी करे, और ऊँचे स्वर में यह दावा करती है कि जैसे न्यायियों के दिनों में, हर एक को वही सोचना और करना चाहिए जो उसकी अपनी दृष्टि में ठीक हो, और उसे कभी रोका न जाए, हमारे युग की ये सब विचित्र घटनाएँ संसार को एक अद्भुत अतिरिक्त सामर्थ्य देती हैं, और मसीह के सेवकों के लिए यह दुगुना आवश्यक बना देती हैं कि वे ऊँचे स्वर में पुकारें, "संसार से सावधान रहो!"

इस बढ़े हुए संकट के सामने, हमें कभी नहीं भूलना चाहिए कि जीवते परमेश्वर का वचन बदलता नहीं। "संसार से प्रेम न रखो," — "इस संसार के सदृश न बनो," — "संसार से मित्रता करना परमेश्वर से बैर करना है," — परमेश्वर की व्यवस्था-पुस्तक के ये सामर्थी वचन अब भी अरद्द हैं (1 यूहन्ना 2:15; रोमियों 12:2; याकूब 4:4)। सच्चा मसीही प्रतिदिन इनका पालन करने का प्रयत्न करता है, और अपनी आज्ञाकारिता से अपने धर्म की जीवन्तता को प्रमाणित करता है। आज भी यह उतना ही सत्य है जितना अठारह सौ वर्ष पहले था कि "परमेश्वर से उत्पन्न" मनुष्य ऐसा मनुष्य होगा जो कम या अधिक संसार का सामना करता और उस पर जय पाता है। ऐसा मनुष्य किसी कोने में हटकर साधु या संन्यासी बनकर "जय" नहीं पाता, परन्तु अपने शत्रुओं का साहस से सामना करके और उन्हें जीतकर जय पाता है। वह समाज में अपना स्थान भरने से और उस पद पर अपना कर्तव्य निभाने से इनकार नहीं करता जिस पर परमेश्वर ने उसे बुलाया है। परन्तु संसार में "होते हुए" भी वह संसार का "नहीं" है। वह उसका उपयोग करता है, परन्तु दुरुपयोग नहीं करता। वह जानता है कि कब "नहीं" कहना है, कब मान लेने से इनकार करना है, कब रुकना है, कब कहना है, "यहाँ तक मैं आया हूँ, इससे आगे नहीं जाऊँगा।" वह जीवन के व्यापार या सुखों में पूरी तरह लीन नहीं हो जाता, मानो वही अस्तित्व का सम्पूर्ण योग हों। निर्दोष बातों में भी वह अपनी रुचियों और झुकावों पर लगाम रखता है, और उन्हें अपने आपको बहा ले जाने नहीं देता। वह ऐसे नहीं जीता मानो जीवन केवल मनोरंजन, या धन कमाने, या राजनीति, या वैज्ञानिक खोजों से बना हो, और मानो आने वाला कोई जीवन न हो। हर जगह और हर दशा में, सार्वजनिक और निजी जीवन में, व्यापार में या आमोद-प्रमोद में, वह अपने आपको "एक उत्तम देश के नागरिक" की नाईं और ऐसे मनुष्य की नाईं निभाता है जो पूर्णतः अस्थायी वस्तुओं पर निर्भर नहीं है। पिर्रुस के सामने खड़े उस महान रोमी राजदूत की नाईं, वह हाथी और सोने, दोनों से समान रूप से अविचलित रहता है। तुम न उसे घूस दे सकोगे, न डरा सकोगे, न लुभाकर अपनी आत्मा की उपेक्षा करने के लिए फुसला सकोगे। इसी प्रकार सच्चा मसीही अपने मसीही होने की वास्तविकता को प्रमाणित करता है। इसी प्रकार "परमेश्वर से उत्पन्न" मनुष्य संसार पर जय पाता है।

मैं भली-भाँति जानता हूँ कि पहली दृष्टि में जो बातें मैंने अभी कही हैं वे "कठिन वचन" प्रतीत हो सकती हैं। सच्चे मसीही धर्म का जो स्तर मैंने अभी ऊँचा उठाया है, वह अतिशयोक्तिपूर्ण, अति कठोर और इस जीवन में अप्राप्य लग सकता है। मैं बड़ी उदारता से मानता हूँ कि जिस रीति से मैंने वर्णन किया है उस रीति से "जय पाने" के लिए निरन्तर लड़ाई और संघर्ष की आवश्यकता है, और ऐसी सारी लड़ाई स्वभावतः शरीर और लहू के लिए अप्रिय होती है। यह अप्रिय लगता है कि हम समय-समय पर अपने आपको अकेले खड़ा पाएँ, और अपने चारों ओर के सब लोगों की राय के विरुद्ध चलें। हम संकीर्ण-मन, एकान्तवासी, निर्दयी, रूखे, दुःशील और अपने साथियों के साथ तालमेल न रखनेवाले नहीं दिखना चाहते। हम स्वभाव से आराम और लोकप्रियता से प्रेम रखते हैं, और धर्म में टकराव से घृणा करते हैं, और यदि हम सुनते हैं कि इस सारी लड़ाई और युद्ध के बिना हम सच्चे मसीही नहीं हो सकते, तो हम मन ही मन कहने के लिए प्रलोभित होते हैं, "मैं निराश होकर इसे छोड़ देता हूँ।" मैं कड़वे अनुभव से बोल रहा हूँ। मैंने यह सब स्वयं जाना और अनुभव किया है।

जो कोई भी इस प्रकार परीक्षा में पड़ता है — और मेरा विश्वास है कि युवाओं से अधिक कोई परीक्षा में नहीं पड़ता — जो कोई भी संसार पर जय पाने के किसी भी प्रयत्न से इसे असम्भव जानकर पीछे हटना चाहता है, ऐसे सब लोगों से मैं मित्रभाव से कुछ उपदेश के शब्द कहता हूँ। इससे पहले कि तुम शत्रु की ओर पीठ फेरो, और खुलकर मान लो कि वह तुम्हारे लिए बहुत बलवन्त है, इससे पहले कि तुम उस बलवन्त के आगे झुको और उसे अपनी गर्दन पर पाँव रखने दो, मुझे तुम्हें कुछ ऐसी बातें स्मरण कराने दो जिन्हें शायद तुम भूल रहे हो।

तो क्या संसार उन तीन बड़े शत्रुओं में से एक नहीं है जिनका सामना करने की गम्भीर प्रतिज्ञा तुमने बपतिस्मा के समय की थी? क्या ये शब्द व्यर्थ ही पढ़े गए थे, "हम इसे क्रूस का चिह्न देते हैं, इस बात के चिह्न में कि आगे चलकर यह क्रूस पर चढ़ाए गए मसीह के विश्वास को मानने में लज्जित न होगा, और पाप, संसार और शैतान के विरुद्ध उसके झण्डे के नीचे पुरुषार्थ से लड़ेगा, और जीवन के अन्त तक मसीह का सिपाही और सेवक बना रहेगा"? और क्या सचमुच बात यहाँ तक आ पहुँची है कि तुम अपने उत्तरदायित्वों को त्यागने, अपने स्वामी की सेवा से हट जाने, अपना झण्डा छोड़ देने, चुपके से पीछे खिसक जाने और लड़ने से इनकार करने का मन बना चुके हो?

फिर, क्या यह सत्य नहीं कि असंख्य स्त्री-पुरुष, जो तुमसे अधिक बलवन्त न थे, संसार के साथ यह लड़ाई लड़ चुके और जीत चुके हैं? पिछली अठारह शताब्दियों में सकरे मार्ग पर चलनेवाले और जय पाने से भी बढ़कर विजयी ठहरनेवाले मसीही सिपाहियों की उस बड़ी सेना का विचार करो। वही ईश्वरीय सेनापति, वही हथियार, वही सहायताएँ और सहारे जिनके द्वारा उन्होंने जय पाई, तुम्हारे लिए भी तैयार हैं। निश्चय ही यदि उन्होंने विजय पाई, तो तुम भी वैसा ही करने की आशा रख सकते हो।

फिर, क्या यह सत्य नहीं कि संसार के साथ यह लड़ाई नितान्त अनिवार्य है? क्या हमारा स्वामी नहीं कहता, "जो कोई अपना क्रूस न उठाए और मेरे पीछे न आए, वह मेरा चेला नहीं हो सकता" (लूका 14:27)? "मैं पृथ्वी पर मेल कराने नहीं, पर तलवार चलवाने आया हूँ" (मत्ती 10:34)। यहाँ तो किसी भी दशा में हम तटस्थ नहीं रह सकते, और चुपचाप बैठे नहीं रह सकते। जातियों के संघर्ष में ऐसा आचरण सम्भव हो सकता है, परन्तु उस युद्ध में जो आत्मा से सम्बन्ध रखता है, यह सर्वथा असम्भव है। हस्तक्षेप न करने की वह बहुचर्चित नीति, वह "चतुर निष्क्रियता" जो इतने राजनीतिज्ञों को भाती है, चुप रहने और बातों को जैसी हैं वैसी छोड़ देने की वह योजना — यह सब मसीही युद्ध में कभी काम न आएगा। संसार, शरीर और शैतान से मेल रखना परमेश्वर से बैर रखना है, और उस चौड़े मार्ग पर होना है जो विनाश की ओर ले जाता है। हमारे पास कोई चुनाव या विकल्प नहीं है। प्रकाशितवाक्य में सातों कलीसियाओं से की गई प्रतिज्ञाएँ केवल "जो जय पाए" उसी के लिए हैं। हमें या तो लड़ना है या नाश होना है। हमें या तो जय पानी है या सदा के लिए मरना है। हमें परमेश्वर के सारे हथियार बाँध लेने चाहिए। "जिसके पास तलवार न हो वह अपना कुरता बेचकर एक मोल ले" (इफिसियों 6:11; लूका 22:36)।

निश्चय ही, ऐसी बातों को देखते हुए, मैं उन सब से जो संसार से मेल कर लेने और उसका सामना न करने की ओर झुके हुए हैं, आग्रह और विनती कर सकता हूँ कि अपने संकट के बोध के प्रति जाग उठो। जागो और उन बेड़ियों को उतार फेंको जिन्हें आलस्य या लोकप्रियता का प्रेम धीरे-धीरे तुम्हारे चारों ओर बुन रहा है। बहुत देर हो जाने से पहले जागो — इससे पहले कि बार-बार किए गए सांसारिक काम आदतें बन जाएँ, और आदतें जमकर चरित्र बन जाएँ, और तुम एक लाचार दास बन जाओ। जब चारों ओर लोग युद्ध के लिए स्वेच्छा से आगे आ रहे हैं, और नाशमान मुकुट के लिए रणभूमि में जाने को तैयार हैं, तब तुम उठ खड़े होओ और अविनाशी मुकुट के लिए ऐसा करने का निश्चय करो। संसार उतना बलवन्त शत्रु नहीं है जितना तुम सोचते हो, यदि तुम केवल साहस से उसका सामना करो और सही हथियार काम में लाओ। कल्पित कठिनाइयाँ ज्यों-ज्यों तुम उनके निकट पहुँचोगे, लोप हो जाएँगी, या बर्फ़ की तरह पिघल जाएँगी। जिन सिंहों से तुम अब डरते हो वे बँधे हुए निकलेंगे। सैकड़ों लोग तुम्हें बता सकते हैं कि उन्होंने वर्षों संसार की सेवा की, और अन्त में पाया कि उसके प्रतिफल खोखले और अवास्तविक हैं, और उसकी तथाकथित अच्छी वस्तुएँ न तृप्त कर सकती हैं न बचा सकती हैं। कार्डिनल वुल्से के मरते समय के शब्द इसी क्षण दस हज़ार हृदयों की भाषा हैं —

"इस संसार के व्यर्थ ठाठ-बाट और महिमा, मैं तुमसे घृणा करता हूँ: मेरा हृदय खुल गया है। यदि मैंने अपने परमेश्वर की सेवा उतने ही उत्साह से की होती जितने से अपने राजा की, तो वह मेरे बुढ़ापे में मुझे मेरे शत्रुओं के हाथ नंगा न छोड़ता।"

परन्तु दूसरी ओर, किसने कभी परमेश्वर की लड़ाई संसार के विरुद्ध पुरुषार्थ से लड़ी और बड़ा प्रतिफल न पाया? निस्सन्देह मसीही यात्रियों के अनुभव बहुत भिन्न-भिन्न होते हैं। सब को राज्य में "बड़ी रीति से प्रवेश" नहीं मिलता, और कुछ "जलते-जलते" बचाए जाते हैं (2 पतरस 1:11; 1 कुरिन्थियों 3:15)। परन्तु मुझे विश्वास है कि किसी को भी विश्वास करने में ऐसा आनन्द और शान्ति नहीं मिलती, और कोई स्वर्गीय नगर की यात्रा ऐसे हल्के मन से नहीं करता, जैसे वे जो साहस से बाहर निकल आते हैं और संसार के प्रेम और भय पर जय पाते हैं। ऐसे लोगों को राजाओं का राजा उनके जीवित रहते आदर देने में प्रसन्न होता है; और जब वे मरते हैं, तो उनकी गवाही वही होती है जो पुराने बनयन के वीर 'वैलिएंट' की थी — "मैं अपने पिता के घर जा रहा हूँ; और यद्यपि मैं बड़ी कठिनाई से यहाँ तक पहुँचा हूँ, फिर भी जहाँ मैं पहुँचा हूँ वहाँ पहुँचने के लिए जो भी कष्ट मैंने सहे, उन पर अब मुझे पछतावा नहीं है।"

III. तीसरी और अन्तिम बात जिसे इस पद में देखने को मैं तुमसे कहूँगा, वह है संसार पर सच्चे मसीही की जय का भेद। यूहन्ना यह भेद हमें दो बार प्रकट करता है, मानो वह अपने अर्थ पर बल देना चाहता हो और उसे असंदिग्ध बनाना चाहता हो: "वह जय जो संसार पर प्राप्त हुई है, हमारा विश्वास है। संसार पर जय पानेवाला कौन है? केवल वह जिसका यह विश्वास है कि यीशु परमेश्वर का पुत्र है।"

सरलता परमेश्वर की अनेक कृतियों का एक विशिष्ट लक्षण है। प्रकृति का कोई बड़ा रहस्य खोज लेने पर दार्शनिक प्रायः यही कह उठता है, "कितनी सुन्दर सरलता है!" जिस सिद्धान्त के द्वारा "परमेश्वर से जन्मा" हुआ मनुष्य संसार पर जयवन्त होता है, उसकी सबसे उल्लेखनीय बात उसकी सरलता है। सम्भव है वह स्वयं भी उसे भली-भाँति न समझता हो। परन्तु वह जो कुछ है, जो कुछ करता है, जैसा व्यवहार करता है और जैसा आचरण रखता है, उसका एक ही सरल कारण है: वह विश्वास करता है। वह अनदेखी वस्तुओं के अस्तित्व को पहचानता है, जिनकी तुलना में संसार की भौंहें चढ़ाना या मुस्कुराना, उसकी कृपा या निन्दा, हवा के समान हल्की बातें हैं। परमेश्वर, स्वर्ग, न्याय और अनन्तकाल उसके लिए "केवल शब्द और नाम" नहीं, बल्कि विशाल और ठोस वास्तविकताएँ हैं; और इनका विश्वास बाकी सब कुछ को छाया-सा और असत्य दिखाता है। परन्तु अन्य सब वस्तुओं से बहुत ऊपर वह विश्वास की आँखों से एक अनदेखे उद्धारकर्ता को देखता है, जिसने उससे प्रेम किया, उसके लिए अपने आप को दे दिया, परमेश्वर को उसका ऋण अपने बहुमूल्य लहू से चुका दिया, उसके लिए कब्र में गया, फिर जी उठा, और स्वर्ग में पिता के पास उसके सहायक के रूप में उपस्थित है। उसे देखते हुए वह अपने आप को विवश पाता है कि सबसे पहले और सबसे बढ़कर उसी से प्रेम करे, अपना मुख्य स्नेह ऊपर की वस्तुओं पर लगाए, न कि पृथ्वी की वस्तुओं पर, और अपने लिए नहीं, बल्कि उसके लिए जिए जो उसके लिए मरा। उसे देखते हुए वह संसार की अप्रसन्नता का सामना करने से नहीं डरता, और दृढ़ भरोसे के साथ लड़ता रहता है कि वह "जयवन्त से भी बढ़कर" होगा। संक्षेप में, एक नए सिद्धान्त की यही निष्कासक शक्ति, अर्थात् अनदेखे परमेश्वर और अनदेखे यीशु में जीवित विश्वास, सच्चे मसीही की कठिनाइयों को घटा देती है, मनुष्य का भय दूर भगा देती है, और संसार पर जय पाती है।

यही वह सिद्धान्त है जिसने पिन्तेकुस्त के दिन के बाद प्रेरितों को वैसा बनाया जैसे वे थे। जब पतरस और यूहन्ना महासभा के सामने खड़े हुए और ऐसे बोले कि सब लोग उनके साहस पर चकित हुए, तब उनके सजीव विश्वास ने हन्ना और कैफा और उनके साथियों से ऊँचे एक व्यक्ति को देखा, जो उन्हें कभी न छोड़ेगा। जब शाऊल ने, परिवर्तित और नया होकर, अपनी जाति में अपनी सारी उज्ज्वल सम्भावनाएँ त्याग दीं, ताकि उस सुसमाचार का प्रचारक बने जिसे उसने कभी तुच्छ जाना था, तब उसने विश्वास के द्वारा दूर से उस अदृश्य को देखा जो उसे इस समय सौ गुना और आनेवाले युग में अनन्त जीवन दे सकता था। इन सब ने विश्वास से जय पाई।

यही वह सिद्धान्त है जिसने आदिकालीन मसीहियों को अपने धर्म पर मृत्यु तक दृढ़ बनाए रखा, और अन्यजाति सम्राटों के घोर से घोर उत्पीड़न ने भी उन्हें हिला न सका। वे प्रायः अनपढ़ और साधारण मनुष्य थे, और बहुत-सी बातें दर्पण में धुंधली देखते थे। फिर भी उनकी तथाकथित "हठधर्मिता" ने प्लिनी जैसे दार्शनिकों तक को चकित कर दिया।

सदियों तक पोलीकार्प और इग्नेशियस जैसे ऐसे लोगों की कभी कमी न रही जो मसीह का इनकार करने की अपेक्षा मरने को तैयार थे। जुर्माने, कारागार, यातना, आग और तलवार भी शहीदों की उस श्रेष्ठ सेना की आत्मा को कुचल न सके। अपनी सेनाओं सहित रोमी साम्राज्य की सारी शक्ति भी उस धर्म को मिटाने में असमर्थ रही जो फ़िलिस्तीन में थोड़े-से मछुओं और चुंगी लेनेवालों से आरम्भ हुआ था। उन्होंने विश्वास से जय पाई।

यही वह सिद्धान्त है जिसने सोलहवीं शताब्दी में हमारे अपने धर्म-सुधारकों को रोम की कलीसिया के विरुद्ध अपना विरोध वापस लेने की अपेक्षा मृत्यु तक कष्ट सहने की सामर्थ्य दी। उनमें से बहुतेरे, रोजर्स, फिलपॉट और ब्रैडफ़ोर्ड की तरह, यदि केवल अपना मत त्याग देते तो बड़े-बड़े पद पाकर अपने बिछौने पर चैन से मर सकते थे। परन्तु उन्होंने दुःख उठाना चुना, और विश्वास में सामर्थी होकर खम्भे पर बँधे हुए प्राण दिए। यही वह सिद्धान्त है जिसने उसी युग में हमारे अंग्रेज़ शहीदों की साधारण पंक्ति को, अर्थात् मज़दूरों, कारीगरों और प्रशिक्षुओं को, अपने शरीर जलाए जाने के लिए सौंप देने की सामर्थ्य दी। वे जैसे निर्धन और अनपढ़ थे, वैसे ही विश्वास में धनी थे; और यदि वे मसीह के लिए बोल न सके, तो उसके लिए मर तो सके। इन सब ने विश्वास करके जय पाई।

परन्तु इस विषय में जितने प्रमाण दिए जा सकते हैं, यदि मैं उन सब को सामने रखूँ तो समय कम पड़ जाएगा। आइए, हम अपने ही युग को देखें। उन मनुष्यों पर विचार करें जिन्होंने पिछले सौ वर्षों में मसीह के उद्देश्य के लिए संसार पर सबसे गहरी छाप छोड़ी है। स्मरण करें कि व्हाइटफ़ील्ड, वेस्ली, रोमेन और वेन जैसे पादरी अपनी पीढ़ी में कैसे अकेले खड़े रहे, और हमारे देश के मसीही कहलानेवालों में से नौ-दशांश के विरोध, निन्दा, उपहास और वास्तविक उत्पीड़न के सामने भी अंग्रेज़ी धर्म को पुनर्जीवित किया। स्मरण करें कि विलियम विल्बरफ़ोर्स, हैवलॉक, हेनरी लॉरेंस, हेडली विकर्स और मसीही व्यापारी जॉर्ज मूर जैसे मनुष्यों ने कठिन से कठिन स्थितियों में मसीह की गवाही दी, और हाउस ऑफ़ कॉमन्स में, छावनी में, सैनिक दल की भोजन-मेज़ पर, या नगर के लेखा-कार्यालय में भी मसीह का झंडा फहराया। स्मरण करें कि परमेश्वर के इन श्रेष्ठ सेवकों को न किसी ने डराकर और न हँसी उड़ाकर उनके धर्म से हटाया, और उन्होंने अपने विरोधियों तक का आदर पाया। इन सब का एक ही सिद्धान्त था। सत्रहवीं शताब्दी में इंग्लैंड की कलीसिया और ताज को रौंदनेवाले उस विचित्र तानाशाह ने कहा था, "मुझे ऐसे मनुष्य दो जिनका कोई सिद्धान्त हो।" हमारे अपने समय के इन मसीही योद्धाओं का एक सिद्धान्त था, और वह प्रमुख सिद्धान्त एक अनदेखे परमेश्वर और उद्धारकर्ता पर विश्वास था। इसी विश्वास से वे जिए, चले, उन्होंने उत्तम लड़ाई लड़ी, और जय पाई।

क्या इस लेख को पढ़नेवाला कोई जन सच्चे मसीही का जीवन जीना और संसार पर जय पाना चाहता है? तो वह पहले भीतर ही विजय का सिद्धान्त पाने का यत्न करे। इसके बिना आत्मिकता का सारा बाहरी दिखावा सर्वथा व्यर्थ है। साधु के चोगे के नीचे भी कितने ही संसारी हृदय होते हैं। विश्वास, अर्थात् भीतरी विश्वास ही एकमात्र आवश्यक वस्तु है। वह पहले विश्वास के लिये प्रार्थना करे। यह परमेश्वर का दान है, और ऐसा दान है जिसे माँगनेवाले कभी व्यर्थ नहीं माँगेंगे। विश्वास का सोता अभी सूखा नहीं है। खान अभी चुकी नहीं है। जो "विश्वास का कर्ता" कहलाता है, वह कल और आज और युगानुयुग एकसा है; और वह चाहता है कि लोग उससे बिनती करें (इब्रानियों 12:2)। विश्वास के बिना तुम कभी अच्छी लड़ाई न लड़ोगे, कभी अपना पाँव दृढ़ता से न जमाओगे, और इस फिसलनेवाले संसार की बर्फ़ पर कभी आगे न बढ़ोगे। यदि तुम कुछ करना चाहते हो तो तुम्हें विश्वास करना होगा। यदि लोग धर्म में कुछ नहीं करते और किसी तमाशे के उदासीन दर्शकों की नाईं बैठे रहते हैं, तो इसका कारण केवल यही है कि वे विश्वास नहीं करते। विश्वास स्वर्ग की ओर पहला कदम है।

क्या इस लेख को पढ़नेवाला कोई जन मसीही लड़ाई को निरन्तर बढ़ती हुई सफलता और उन्नति के साथ लड़ना चाहता है? तो वह प्रतिदिन विश्वास की निरन्तर बढ़ती के लिये प्रार्थना करे। वह मसीह में बना रहे, मसीह के और निकट आए, और जितने दिन जीवित रहे प्रतिदिन मसीह को और दृढ़ता से थामे रहे। वह चेलों की प्रार्थना कभी न भूले, "हमारा विश्वास बढ़ा।" वह अपने विश्वास की चौकसी बड़ी सावधानी से करे, और उसकी ज्वाला को कभी मद्धम न होने दे। उसके विश्वास की मात्रा के अनुसार ही उसकी शान्ति, उसकी सामर्थ्य और संसार पर उसकी विजय का माप होगा।

(क) और अब हम इस सारे विषय को इस गम्भीर आत्म-परीक्षा के साथ छोड़ते हैं, "धर्म की उस बड़ी कसौटी के विषय में, जो यह पद हमें देता है, हम क्या जानते हैं? संसार पर जय पाने के विषय में हम क्या जानते हैं? हम कहाँ हैं? हम क्या कर रहे हैं? हम किसके हैं, और किसकी सेवा करते हैं? क्या हम जय पा रहे हैं या हारते जा रहे हैं?" हाय, यह दुःखद सच्चाई है कि बहुत से लोग नहीं जानते कि वे मसीह के स्वतन्त्र जन हैं या संसार के दास! संसार की बेड़ियाँ प्रायः अदृश्य होती हैं। हम अनजाने ही नीचे खिंचते चले जाते हैं, और उस मनुष्य के समान हैं जो नाव में सो रहा है और नहीं जानता कि वह धीरे-धीरे प्रपात की ओर बहता चला जा रहा है। जिस दासत्व का बोध नहीं होता, उससे बुरा कोई दासत्व नहीं। जो बेड़ियाँ दिखाई नहीं देतीं, उनसे सचमुच भारी कोई बेड़ियाँ नहीं। हमारी अनुपम प्रार्थना-पद्धति की यह बिनती बुद्धिमानी की है: "संसार के सब छलों से, हे भले

प्रभु, हमें छुड़ा।"

मैं यह प्रश्न अपने युवा पाठकों से पूरे स्नेह के साथ पूछता हूँ। तुम अभी उस उदार और सरल विश्वासवाली आयु में हो जब संसार सबसे कम खतरनाक और सबसे अधिक लुभावना लगता है, और स्वाभाविक है कि तुम्हारे फँस जाने और हार जाने की सम्भावना सबसे अधिक है। केवल अनुभव ही तुम्हें शत्रु को उसके असली रंग में दिखा सकता है। जब तुम्हारे सिर पर मेरे जितने श्वेत बाल होंगे, तब तुम इस संसार की अच्छी वस्तुओं, या इसकी प्रशंसा या इसके बैर का मूल्य बहुत भिन्न आँकोगे। परन्तु अभी से मेरी चेतावनी स्मरण रखो: "यदि तुम अपने प्राणों से प्रेम रखते हो, तो संसार को अपने से दूर रखो। संसार से सावधान रहो।"

(ख) पाठक, तुम और मैं इस लेख के द्वारा जीवन में एक ही बार मिले हैं, और बहुत सम्भव है कि बिछुड़कर फिर कभी न मिलें। हो सकता है कि तुम इस कष्टदायक संसार की लहरों में निकल पड़ रहे हो। मेरे हृदय की इच्छा और परमेश्वर से मेरी प्रार्थना यह है कि तुम्हारी यात्रा सफल हो, और तुम अन्त में अनन्त जीवन के सुरक्षित बन्दरगाह में पहुँचो। परन्तु, हाय, चौकस रहो कि जिन तूफ़ानी जलों को तुम्हें पार करना है उनके लिये तुम भली-भाँति सज्जित हो, और देख लो कि तुम्हारे पास दिशा दिखानेवाला ऐसा कुतुबनुमा है जिस पर भरोसा किया जा सके, और ऐसा माँझी है जो कभी चूकेगा नहीं! संसार के सदृश बन जाने से अपने जहाज़ को डूबने से बचाओ। हाय, कितने ही लोग सुन्दर साज-सज्जा, फहराती पताकाओं और उज्ज्वल आशाओं के साथ समुद्र में उतरते हैं, और अन्त में सब सवारों समेत नष्ट हो जाते हैं! आरम्भ में वे मूसा, और दानिय्येल, और नीरो के घराने के सन्तों के समान दिखाई देते हैं; परन्तु अन्त में बिलाम, और देमास, और लूत की पत्नी के समान ठहरते हैं! ओह, माँझी और कुतुबनुमा को स्मरण रखो! बाइबल के समान कोई कुतुबनुमा नहीं। मसीह के समान कोई माँझी नहीं!

आज मित्र के नाते मैं जो सलाह देता हूँ उसे मान लो। प्रभु यीशु मसीह से बिनती करो कि वह विश्वास के द्वारा तुम्हारे हृदय में आकर बसे, और तुम्हें "इस वर्तमान बुरे संसार से छुड़ाए" (गलातियों 1:4)। उससे बिनती करो कि वह अपनी प्रतिज्ञा की हुई आत्मा तुम पर उंडेले, और तुम्हें बिना और देर किए उसका सहज जूआ उठाने और संसार का सामना करने के लिये तैयार करे। मसीह की सामर्थ्य से संसार पर जय पाने का यत्न करो, चाहे इसमें तुम्हें कुछ भी खोना पड़े। दास होने पर लज्जित हो, चाहे बेड़ियाँ कितनी ही सुनहरी क्यों न हों। गले के पट्टे के चिह्न पर लज्जित हो। निश्चय कर लो कि तुम पुरुषार्थ दिखाओगे और स्वतन्त्र होगे। स्वतन्त्रता सब आशीषों में सबसे बड़ी है, और सबसे बड़े संघर्ष के योग्य है। प्राचीन काल में यहूदी रब्बियों ने ठीक ही कहा था, "यदि समुद्र स्याही होता, और पृथ्वी चर्मपत्र, तो भी वह स्वतन्त्रता की स्तुति का वर्णन करने के लिये पर्याप्त न होता।" स्वतन्त्रता के लिये यूनानियों, और रोमियों, और जर्मनों, और पोलैण्डवासियों, और स्विसों, और स्कॉटों, और

अंग्रेज़ों ने बारम्बार प्रसन्नता से अन्त तक लड़ाई लड़ी है, और अपने प्राण दिए हैं। निश्चय, यदि मनुष्यों ने अपनी देह की स्वतन्त्रता के लिये ऐसे बलिदान दिए हैं, तो मसीही कहलानेवालों के लिये यह लज्जा की बात है कि वे अपनी आत्मा की स्वतन्त्रता के लिये न लड़ें। मैं फिर कहता हूँ, आज मसीह की सामर्थ्य से निश्चय कर लो कि तुम संसार के विरुद्ध अच्छी लड़ाई लड़ोगे; और केवल लड़ोगे ही नहीं, वरन् जय भी पाओगे। "यदि पुत्र तुम्हें स्वतन्त्र करे, तो तुम सचमुच स्वतन्त्र हो जाओगे" (यूहन्ना 8:36)।

(ग) अन्त में, हम सब यह स्मरण रखें कि मसीही सैनिक का सबसे उत्तम समय अभी आनेवाला है। यहाँ, इस संसार में, हमारी लड़ाई में प्रायः हमें "बहुत रोका और बाधित किया जाता है।" बहुत से कठिन काम करने और सहने पड़ते हैं। घाव और चोटें हैं; जागरण और थकान हैं; पराजय और निराशाएँ हैं। परन्तु सब बातों का अन्त निकट है। जो "जय पाते हैं" उनके लिये विजेता का मुकुट होगा।

इस संसार के युद्ध में विजय के अगले दिन की सुबह की गिनती अक्सर एक शोकपूर्ण दृश्य होती है। मैं उस मनुष्य पर तरस खाता हूँ जो मिस थॉम्पसन के प्रसिद्ध चित्र 'नाम-पुकार' को बिना गहरी भावना के देख सके। शान्ति की घोषणा होने पर भी विजयी रेजिमेंटों का लौटना अत्यन्त मिली-जुली भावनाओं का अवसर होता है। वह मनुष्य अवश्य ही कठोर हृदय का रहा होगा जिसने क्रीमिया के युद्ध के बाद गार्ड्स को लंदन में लौटते देखा और न आह भरी, न आँसू बहाए।

परमेश्वर का धन्यवाद हो, मसीह की विजयी सेना के निरीक्षण का दिन बिलकुल भिन्न होगा। उस दिन कोई भी अनुपस्थित न होगा। वह ऐसी भेंट होगी जिसमें कोई पछतावा न होगा। वह "बादलों से रहित सुबह" होगी, और आँसुओं से रहित भी। संसार का सामना करने और उस पर जयवन्त होने में हमने जो कुछ सहा है, उसकी वह भरपूर क्षतिपूर्ति करेगी।

जिसने रूस के युद्ध के समय हॉर्स गार्ड्स में हमारी कृपालु महारानी को विक्टोरिया क्रॉस बाँटते देखा, वह उस दृश्य से भली-भाँति प्रभावित और द्रवित हुआ होगा। परन्तु जिसने उन्हें अपने आसन से उतरकर एक घायल अधिकारी से मिलने आते देखा, जो चल नहीं सकता था, और अपने ही राजकीय हाथों से उसकी छाती पर उसका सम्मान-चिह्न लगाते देखा, वह शायद जीवन भर उसे नहीं भूलेगा।

परन्तु फिर भी वह उस महान दिन की घटनाओं की तुलना में कुछ भी नहीं था, जब हमारे उद्धार का सेनापति और उसके विजयी सैनिक अन्ततः आमने-सामने मिलेंगे। कौन-सी जीभ उस समय के आनन्द को बता सकती है जब हम अपने कवच उतार देंगे और "तलवार से कहेंगे, विश्राम कर और शान्त रह!" कौन-सा मन उस घड़ी की धन्यता की कल्पना कर सकता है जब हम राजा को उसकी सुन्दरता में देखेंगे और ये वचन सुनेंगे, "धन्य, हे अच्छे और विश्वासयोग्य दास और सैनिक, अपने स्वामी के आनन्द में प्रवेश कर"? उस महिमामय दिन की हम धीरज से बाट जोहें, क्योंकि वह दूर नहीं हो सकता। उसकी आशा में हम काम करें, जागते रहें, प्रार्थना करें, लड़ते रहें और संसार का सामना करें। और अपने सेनापति के वचन को कभी न भूलें: "संसार में तुम्हें क्लेश होता है; परन्तु ढाढ़स बाँधो, मैं ने संसार को जीत लिया है" (यूहन्ना 16:33)। पाद-टिप्पणियाँ:

[8] इस लेख का सार मूल रूप से 1879 में केम्ब्रिज के सेंट मैरी चर्च में उपदेश के रूप में सुनाया गया था, जब मैं चुना हुआ प्रचारक था।

प्रेरितों के काम 17:16-17। एथेंस। [9]

"जब पौलुस एथेंस में उनकी बाट जोह रहा था, तो नगर को मूरतों से भरा हुआ देखकर उसका जी जल गया।" इसलिए उसने आराधनालय में यहूदियों और भक्तों से, और चौक में जो लोग उससे मिलते थे उनसे प्रतिदिन वाद-विवाद किया। -- प्रेरितों के काम 17:16-17।

सम्भव है इस लेख का पाठक किसी कस्बे या नगर में रहता हो, और हरे खेतों से अधिक ईंट-गारे को देखता हो। सम्भव है आपका कोई सम्बन्धी या मित्र किसी नगर में रहता हो, जिसमें आपकी स्वाभाविक रूप से गहरी रुचि हो। दोनों ही दशाओं में, इस पृष्ठ के शीर्ष पर लिखे पवित्रशास्त्र के पद आपके पूरे ध्यान की माँग करते हैं। कुछ ही क्षणों के लिए वह ध्यान मुझे दीजिए, जब मैं आपको वे शिक्षाएँ दिखाने का यत्न करता हूँ जो इस अंश में हैं।

आप इन पदों में आमने-सामने खड़े देखते हैं—न कोई साधारण नगर, न कोई साधारण मनुष्य।

वह नगर प्रसिद्ध एथेंस है—एथेंस, जो आज तक अपने राजनेताओं, दार्शनिकों, इतिहासकारों, कवियों, चित्रकारों और वास्तुकारों के लिए विख्यात है—एथेंस, प्राचीन यूनान की आँख, जैसे प्राचीन यूनान अन्यजातियों के संसार की आँख था।

वह मनुष्य अन्यजातियों का महान प्रेरित, पौलुस है—पौलुस, जो संसार में अब तक हुआ सबसे परिश्रमी और सफल सेवक और मिशनरी है—पौलुस, जिसने अपनी लेखनी और वाणी से मानव-जाति पर ऐसी गहरी छाप छोड़ी है जैसी स्त्री से जन्मे किसी और ने नहीं छोड़ी, केवल उसके दिव्य स्वामी को छोड़कर।

एथेंस और पौलुस, मसीह का महान दास, और प्राचीन मूर्तिपूजा का महान गढ़—हमारे सामने आमने-सामने लाए गए हैं। परिणाम हमें बताया गया है; उस भेंट का सावधानी से वर्णन किया गया है। मैं यह सोचने का साहस करता हूँ कि यह विषय हमारे समय के और आज लंदन, लिवरपूल, मैनचेस्टर तथा अन्य बड़े अंग्रेज़ी नगरों के अनेक निवासियों की परिस्थितियों के बहुत अनुकूल है।

बिना और भूमिका के, मैं आपसे इस अंश में तीन बातों पर ध्यान देने को कहता हूँ:--

I. पौलुस ने एथेंस में क्या देखा।

II. पौलुस ने एथेंस में क्या अनुभव किया।

III. पौलुस ने एथेंस में क्या किया।

I. तो पहले, पौलुस ने एथेंस में क्या देखा?

पवित्रशास्त्र का उत्तर स्पष्ट और असंदिग्ध है। उसने एक "मूरतों से भरा हुआ नगर" देखा। हर गली में मूरतें उसकी आँखों के सामने आती थीं। मूर्ति-देवताओं और देवियों के मन्दिर हर प्रमुख स्थान पर थे। प्लिनी के अनुसार, मिनर्वा की भव्य प्रतिमा, जो कम से कम चालीस फुट ऊँची थी, अक्रोपोलिस के ऊपर ऊँची खड़ी थी और हर दिशा से दिखाई देती थी। मूर्ति-पूजा की एक विशाल व्यवस्था पूरे स्थान पर फैली थी और हर कहीं उसके ध्यान में आती थी। प्राचीन लेखक पौसानियास स्पष्ट कहता है कि "देवताओं की आराधना पर ध्यान देने में एथेंसवासी सब राज्यों से बढ़कर थे।" संक्षेप में, नगर, जैसा हाशिये का पाठ कहता है, "मूरतों से भरा हुआ" था।

फिर भी, मैं चाहूँगा कि आप स्मरण रखें, यह नगर सम्भवतः अन्यजातियों के नगर का सबसे अनुकूल नमूना था जो पौलुस देख सकता था। अपने आकार के अनुपात में, इसमें सम्भवतः पृथ्वी भर में सबसे विद्वान, सभ्य, दार्शनिक, उच्च शिक्षित, कलाप्रेमी और बौद्धिक आबादी थी। परन्तु धार्मिक दृष्टि से वह क्या था? सुकरात और अफ़लातून जैसे बुद्धिमान पुरुषों का नगर—सोलोन, पेरिक्लीज़ और डेमॉस्थनीज़ का नगर—एस्किलस, सोफ़ोक्लीज़, यूरिपिडीज़ और थूसिडाइडीज़ का नगर—मन, बुद्धि, कला और रुचि का नगर—यह नगर "मूरतों से भरा हुआ" था। यदि सच्चा परमेश्वर एथेंस में अज्ञात था, तो पृथ्वी के अधिक अँधेरे स्थानों में वह कैसा रहा होगा? यदि यूनान की आँख आत्मिक रूप से इतनी धुँधली थी, तो बाबुल, इफिसुस, सूर, सिकन्दरिया, कुरिन्थ और रोम तक की दशा कैसी रही होगी? यदि मनुष्य हरे पेड़ में प्रकाश से इतनी दूर चले गए थे, तो सूखे में वे कैसे रहे होंगे?

इन बातों के विषय में हम क्या कहें? हम किन निष्कर्षों की ओर अनिवार्य रूप से खिंचे चले जाते हैं?

क्या हमें एक बात तो यह नहीं सीखनी चाहिए कि ईश्वरीय प्रकाशन की और स्वर्ग से मिलनेवाली शिक्षा की नितान्त आवश्यकता है? मनुष्य को बाइबल के बिना छोड़ दीजिए, तो भी उसके पास किसी न किसी प्रकार का धर्म अवश्य होगा, क्योंकि मानव स्वभाव चाहे कितना ही भ्रष्ट क्यों न हो, उसे एक परमेश्वर चाहिए ही। परन्तु वह ऐसा धर्म होगा जिसमें न ज्योति है, न शान्ति, न आशा।

"संसार ने अपनी बुद्धि से परमेश्वर को न जाना" (1 कुरिन्थियों 1:21)। प्राचीन एथेंस एक स्थायी शिक्षा है, जिस पर ध्यान देना हमारे लिए भला होगा। यह सोचना व्यर्थ है कि प्रकृति, प्रकाशन की सहायता के बिना, पतित मनुष्य को कभी प्रकृति के परमेश्वर तक पहुँचाएगी। बाइबल के बिना एथेंस का निवासी काठ और पत्थरों के आगे झुकता था और अपने ही हाथों की बनाई वस्तु की आराधना करता था। किसी अन्यजाति दार्शनिक को, चाहे वह स्तोइक हो या एपिकुरी, एक खुली कब्र के पास खड़ा करके आने वाले संसार के विषय में पूछिए, तो वह आपको कुछ भी निश्चित, सन्तोषजनक या शान्ति देनेवाली बात न बता सकता।

क्या हमें एक और बात यह नहीं सीखनी चाहिए कि उच्चतम बौद्धिक प्रशिक्षण भी धर्म के विषय में घोर अन्धकार से कोई सुरक्षा नहीं देता? हम इसमें सन्देह नहीं कर सकते कि अन्यजातियों के संसार में यदि कहीं बुद्धि और विवेक को उच्च शिक्षा मिली थी तो एथेंस में। यूनानी दर्शन के विद्यार्थी अनपढ़ और अज्ञानी मनुष्य नहीं थे। वे तर्कशास्त्र, नीतिशास्त्र, भाषण-कला, इतिहास और काव्य में निपुण थे। फिर भी इस सारे मानसिक अनुशासन ने उनके नगर को "मूर्तिपूजा में अत्यन्त मग्न नगर" होने से न रोका। और क्या हमें उन्नीसवीं शताब्दी में यह बताया जाएगा कि पवित्रशास्त्र के ज्ञान के बिना पढ़ना, लिखना, गणित, इतिहास, भाषाएँ और भौतिक विज्ञान ही शिक्षा के लिए पर्याप्त हैं? परमेश्वर न करे! हमने मसीह को इस प्रकार नहीं सीखा। कुछ लोगों को बौद्धिक शक्ति की मूर्ति बनाना और उस ऋण का बखान करना अच्छा लगे जो संसार पर यूनानी मस्तिष्क का है। परन्तु एक बात तो किसी भी स्थिति में भरपूर स्पष्ट है। जो ज्ञान पवित्र आत्मा ने इब्री जाति पर प्रकट किया, उसके बिना प्राचीन यूनान संसार को घोर मूर्तिपूजा के अन्धकार में दबा छोड़ जाता। सुकरात या प्लेटो का कोई अनुयायी बहुत से विषयों पर अच्छा और धाराप्रवाह बोल सकता था, परन्तु वह जेलर के उस प्रश्न का उत्तर कभी न दे सकता था, "उद्धार पाने के लिये मैं क्या करूँ?" (प्रेरितों के काम 16:30)। वह अपनी अन्तिम घड़ी में कभी न कह सकता, "हे मृत्यु, तेरा डंक कहाँ रहा? हे अधोलोक, तेरी जीत कहाँ रही?"

क्या हमें एक और बात यह नहीं सीखनी चाहिए कि भौतिक कलाओं में उच्चतम उत्कृष्टता भी घोर अन्धविश्वास से कोई बचाव नहीं करती? एथेंस के वास्तुशिल्प और मूर्तिकला की पूर्णता एक महान और अकाट्य तथ्य है। एथेंस में पौलुस की आँखों ने अनेक "सुन्दर वस्तुएँ" देखीं जो आज भी कलाप्रेमी मनों के लिए "सदा आनन्द की वस्तु" हैं। फिर भी जिन लोगों ने एथेंस की भव्य इमारतों की कल्पना की और उन्हें बनाया, वे एक सच्चे परमेश्वर से नितान्त अनजान थे। आजकल का संसार कला और विज्ञान में हमारी तथाकथित उन्नति के घमण्ड में लगभग मतवाला हो रहा है। लोग यन्त्रों और कारखानों के विषय में ऐसे बोलते और लिखते हैं मानो कुछ भी असम्भव नहीं। परन्तु यह कभी न भूला जाए कि उच्चतम कला या यान्त्रिक कौशल धर्म के विषय में आत्मिक मृत्यु की दशा के साथ भी बना रह सकता है। फीदियास का नगर एथेंस "मूर्तिपूजा में अत्यन्त मग्न नगर" था। एथेंस का कोई मूर्तिकार एक अनुपम समाधि की रचना कर सकता था, परन्तु वह शोक करनेवाले की आँख का एक भी आँसू न पोंछ सकता था।

इन बातों को नहीं भूलना चाहिए। इन पर ध्यानपूर्वक विचार किया जाना चाहिए। ये हमारे इस समय के अनुकूल हैं। हम एक सन्देहवादी और अविश्वासी युग में आ पड़े हैं। हर ओर हमें प्रकाशन के सत्य और मूल्य के विषय में शंकाएँ और प्रश्न मिलते हैं। "क्या केवल विवेक-बुद्धि ही पर्याप्त नहीं?" "क्या सचमुच बाइबल मनुष्यों को उद्धार के लिये बुद्धिमान बनाने को आवश्यक है?" "क्या मनुष्य के भीतर कोई ज्योति, कोई परखने की शक्ति नहीं जो उसे सत्य और परमेश्वर तक पहुँचा सके?" ओलों की तरह हमारे चारों ओर बरसनेवाली पूछताछ ऐसी ही है। बहुत से अस्थिर मनों को बेचैन करनेवाले अनुमान ऐसे ही हैं।

एक सीधा उत्तर तथ्यों की दुहाई है। मिस्र, यूनान और रोम के अन्यजातीय खण्डहर हमारे पक्ष में बोलेंगे। परमेश्वर के विधान से वे आज तक इस बात के स्मारकों के रूप में सुरक्षित हैं कि बुद्धि और विवेक प्रकाशन के बिना क्या कर सकते हैं। जिन मस्तिष्कों ने लक्सर और कर्नाक के मन्दिरों, या पार्थेनन और कोलोसियम की रूपरेखा बनाई, वे मूर्खों के मस्तिष्क न थे। जिन निर्माताओं ने उनकी रूपरेखाओं को पूरा किया, उन्होंने आधुनिक समय के किसी भी ठेकेदार से अधिक अच्छा और अधिक स्थायी काम किया। जिन लोगों ने उन नक्काशीदार पट्टियों की कल्पना की जिन्हें हम एल्गिन मार्बल्स के नाम से जानते हैं, वे अत्यन्त उच्च कोटि के प्रशिक्षित और बुद्धिमान थे। फिर भी धर्म में ये लोग स्वयं अन्धकार ही थे (इफिसियों 5:8)। जो दृश्य पौलुस ने एथेंस में देखा, वह इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि ईश्वरीय प्रकाशन के बिना मनुष्य कुछ भी ऐसा नहीं जानता जो उसकी आत्मा को लाभ पहुँचा सके।

II. दूसरी बात के लिये मैं आपसे यह देखने को कहता हूँ कि एथेंस में पौलुस ने क्या अनुभव किया। उसने "मूर्तिपूजा में अत्यन्त मग्न नगर" देखा। उस दृश्य का उस पर क्या प्रभाव पड़ा? उसने क्या अनुभव किया?

यह देखना शिक्षाप्रद है कि एक ही दृश्य भिन्न-भिन्न लोगों पर कैसे भिन्न-भिन्न प्रभाव डालता है। दो मनुष्यों को एक ही स्थान पर, साथ-साथ खड़ा कीजिए; उनकी आँखों के सामने वही वस्तुएँ रखिए। एक में जो भावनाएँ जागेंगी, वे प्रायः दूसरे की भावनाओं से बिलकुल भिन्न होंगी। जो विचार जागेंगे और जन्म लेंगे, वे प्रायः ध्रुवों जितनी दूरी पर होंगे।

पहली बार एथेंस आनेवाला कोई साधारण कलाकार निश्चय ही उसकी इमारतों की सुन्दरता में खो जाता। कोई राजनीतिज्ञ या वक्ता पेरिक्लीज़ या डेमॉस्थनीज़ की स्मृति जगाता। कोई साहित्यकार थूसीडाइडीज़, सोफोक्लीज़ और प्लेटो के विषय में सोचता। कोई व्यापारी पिरैयस, उसके बन्दरगाह और समुद्र को निहारता। परन्तु मसीह के एक प्रेरित के विचार कहीं अधिक ऊँचे थे। एक ही बात ने, सब बातों से बढ़कर, उसका सारा ध्यान निगल लिया और बाकी सब कुछ तुच्छ कर दिया। वह एक बात थी एथेंस के लोगों की आत्मिक दशा, उनकी आत्माओं की स्थिति। अन्यजातियों का वह महान प्रेरित सर्वोत्तम रीति से एक ही बात का मनुष्य था। अपने ईश्वरीय स्वामी के समान वह सदा अपने "पिता के काम" के विषय में सोचता रहता था (लूका 2:49)। वह एथेंस में खड़ा था, और एथेंस की आत्माओं से बढ़कर किसी बात के विषय में न सोच रहा था। मूसा, पीनहास और एलिय्याह के समान, "नगर को मूर्तियों से भरा हुआ देखकर उसका जी जल उठा।"

पृथ्वी के सब दृश्यों में मैं किसी को भी एक बड़े नगर के दृश्य जितना प्रभावशाली नहीं जानता, और न किसी ऐसे दृश्य को जो विचारशील मन में इतना विचार जगाने में समर्थ हो। नगर में मनुष्य का मनुष्य से जो दैनिक मेल-जोल स्वाभाविक रूप से होता है, वह बुद्धि को तीक्ष्ण करता और मानसिक सक्रियता को इतना उभारता है जितना देहात के पल्लियों या अन्य एकान्त स्थानों में रहनेवाले समझ नहीं सकते। ठीक हो या गलत, नगर का निवासी देहात के गाँववाले की अपेक्षा दुगुना सोचता है, और दुगुनी तेज़ी से सोचता है। यह वही नगर है "जहाँ शैतान का सिंहासन है" (प्रकाशितवाक्य 2:13)। यह वह नगर है जहाँ हर प्रकार की बुराई सबसे शीघ्रता से गर्भ में आती, बोई जाती, पकती और परिपक्वता को पहुँचती है। यह वह नगर है जहाँ घर छोड़कर जीवन में उतरनेवाला जवान पाप के दृश्य से प्रतिदिन परिचित होते-होते सबसे जल्दी कठोर हो जाता है और उसका विवेक सुन्न पड़ जाता है। यह वह नगर है जहाँ कामुकता, असंयम और निकृष्टतम प्रकार के सांसारिक मनोरंजन सबसे अधिक फलते-फूलते हैं और उन्हें अपने अनुकूल वातावरण मिलता है। यह वह नगर है जहाँ अभक्ति और अधर्म को सबसे अधिक प्रोत्साहन मिलता है, और वह अभागा विश्रामदिन तोड़नेवाला, या अनुग्रह के सब साधनों की उपेक्षा करनेवाला, दूसरों के उदाहरण की ओट में अपने को सुदृढ़ कर लेता है और यह दुखद सांत्वना पाता है कि "वह अकेला नहीं है!" यह वह नगर है जो हर प्रकार के अन्धविश्वास, कर्मकाण्ड, उन्माद और धर्मान्धता का चुना हुआ घर है। यह वह नगर है जो हर प्रकार के झूठे दर्शन की पौधशाला है: स्टोइक मत, एपिक्यूरियन मत, अज्ञेयवाद, सांसारिकतावाद, संशयवाद, प्रत्यक्षवाद, अविश्वास और नास्तिकवाद की। यह वह नगर है जहाँ आधुनिक युग का सबसे बड़ा आविष्कार, छापाखाना, भलाई और बुराई दोनों की वह प्रबल शक्ति, बिना सोए निरन्तर काम करता और विचार के लिए नई-नई सामग्री उँडेलता रहता है। यह वह नगर है जहाँ दैनिक समाचार-पत्र निरन्तर मनों को भोजन देते और जनमत को ढालते और दिशा देते हैं। यह वह नगर है जो राष्ट्र के सारे कारोबार का केन्द्र है। बैंक, न्यायालय, शेयर बाज़ार, संसद या सभा, सब नगर से जुड़े हैं। यह वह नगर है जो चुम्बकीय प्रभाव से देश के प्रतिष्ठित और फैशनेबल लोगों को अपनी ओर खींचता और समाज की रुचियों और रीतियों का स्वर निर्धारित करता है। यह वह नगर है जो व्यवहार में राष्ट्र की नियति को नियन्त्रित करता है। देहात के बिखरे हुए लाखों लोग, जिनमें न आपसी तालमेल है न नित्य का मेल-जोल, उन हज़ारों के सामने शक्तिहीन हैं जो साथ-साथ रहते और प्रतिदिन विचारों का आदान-प्रदान करते हैं। देश पर शासन तो नगर ही करते हैं। मुझे उस मनुष्य पर तरस आता है जो सेंट पॉल के गिरजाघर की चोटी पर खड़ा होकर लन्दन को नीचे देखे और उसके मन में कुछ भावना न उठे, और यह विचार न आए कि वह उस हृदय को देख रहा है जिसकी धड़कनें सारे सभ्य संसार में अनुभव की जाती हैं। तो क्या मुझे एक क्षण के लिए भी आश्चर्य होना चाहिए कि एथेंस के दृश्य ने अन्यजातियों के उस महान प्रेरित के जैसे मनुष्य की "आत्मा को उत्तेजित कर दिया"? मुझे तनिक भी आश्चर्य नहीं। यह ठीक वही दृश्य था जो तरसुस के उस परिवर्तित मनुष्य के हृदय को द्रवित कर सकता था, जिसने रोमियों की पत्री लिखी थी और यीशु मसीह को आमने-सामने देखा था।

वह पवित्र करुणा से भर उठा। यह देखकर उसका हृदय द्रवित हो गया कि इतने असंख्य लोग ज्ञान के अभाव में नाश हो रहे हैं, परमेश्वर के बिना, मसीह के बिना, आशाहीन, उस चौड़े मार्ग पर चलते हुए जो विनाश को पहुँचाता है।

वह पवित्र शोक से भर उठा। यह देखकर उसका हृदय द्रवित हो गया कि इतनी प्रतिभा का दुरुपयोग हो रहा है। यहाँ ऐसे हाथ थे जो उत्कृष्ट कार्य कर सकते थे, और ऐसे मन थे जो उदात्त कल्पनाएँ कर सकते थे। फिर भी जिस परमेश्वर ने जीवन, श्वास और सामर्थ्य दी, उसकी महिमा नहीं हो रही थी।

वह पाप और शैतान के विरुद्ध पवित्र क्रोध से भर उठा। उसने देखा कि इस संसार का ईश्वर अपने असंख्य संगी-मनुष्यों की आँखों को अन्धा कर रहा है और उन्हें अपनी इच्छा से बन्दी बनाकर ले जा रहा है। उसने देखा कि मनुष्य की स्वाभाविक भ्रष्टता एक विशाल नगर की आबादी को एक सामान्य रोग की नाईं संक्रमित कर रही है, और किसी आत्मिक औषधि, प्रतिकार या उपचार का सर्वथा अभाव है।

वह अपने स्वामी की महिमा के लिए पवित्र धुन से भर उठा। उसने देखा कि "हथियारबन्द बलवन्त" एक ऐसे घर की रखवाली कर रहा है जो न्यायसंगत रूप से उसका नहीं है, और उसके सच्चे स्वामी को बाहर रोके हुए है। उसने देखा कि उसका दिव्य स्वामी अपनी ही सृष्टि के प्राणियों द्वारा अज्ञात और अपरिचित है, और मूर्तियाँ वह आदर पा रही हैं जो राजाओं के राजा का है।

पाठक, ये भावनाएँ जिन्होंने प्रेरित को उत्तेजित किया, आत्मा से जन्मे हुए मनुष्य का एक प्रमुख लक्षण हैं। क्या आप इनके विषय में कुछ जानते हैं? जहाँ सच्चा अनुग्रह है, वहाँ दूसरों के प्राणों के लिए कोमल चिन्ता सदा रहेगी। जहाँ परमेश्वर की सच्ची सन्तान होना है, वहाँ पिता की महिमा के लिए धुन सदा रहेगी। अभक्तों के विषय में लिखा है कि वे न केवल ऐसे काम करते हैं जो मृत्यु के योग्य हैं, परन्तु "ऐसे काम करनेवालों से प्रसन्न भी होते हैं" (रोमियों 1:32)। इतने ही सत्य के साथ भक्तों के विषय में कहा जा सकता है कि वे न केवल अपने हृदय में पाप पर शोक करते हैं, परन्तु दूसरों में पाप को देखकर भी शोक करते हैं।

सदोम में लूत के विषय में जो लिखा है उसे सुनिए: "वह उनके अधर्म के कामों के कारण दिन-दिन अपने मन में व्याकुल रहता था" (2 पतरस 2:8)। दाऊद के विषय में जो लिखा है उसे सुनिए: "मेरी आँखों से जल की धाराएँ बहती रहती हैं, क्योंकि लोग तेरी व्यवस्था को नहीं मानते" (भजन संहिता 119:136)। यहेजकेल के समय के भक्तों के विषय में जो लिखा है उसे सुनिए: "जो घृणित काम उस देश के बीच में होते हैं, उनके कारण वे सिसकते और दुहाई देते हैं" (यहेजकेल 9:4)। स्वयं हमारे प्रभु और उद्धारकर्ता के विषय में जो लिखा है उसे सुनिए: "उसने नगर को देखा और उस पर रोया" (लूका 19:41)। निश्चय ही पवित्रशास्त्रीय धर्म के प्रथम सिद्धान्तों में यह भी ठहराया जा सकता है कि जो मनुष्य पाप को बिना शोकपूर्ण भावनाओं के देख सकता है, उसमें आत्मा का मन नहीं है। यह उन बातों में से एक है जिनमें परमेश्वर की सन्तान प्रकट होती है और शैतान की सन्तान से अलग पहचानी जाती है।

मैं अपने पाठकों का विशेष ध्यान इस बात की ओर दिलाता हूँ। समय की माँग है कि हम इसका पूरी तरह सामना करें। जिन भावनाओं से हम पाप, मूर्तिपूजा और अधर्म को देखते हैं, वे आज के दिनों में अत्यन्त महत्त्व का विषय हैं।

सबसे पहले मैं आपसे कहता हूँ कि अपने देश से बाहर दृष्टि डालिए और अन्यजातियों के संसार की दशा पर विचार कीजिए। इस समय कम से कम साठ करोड़ अमर प्राणी अज्ञानता, अन्धविश्वास और मूर्तिपूजा में डूबे हुए हैं। वे परमेश्वर के बिना, मसीह के बिना और आशा के बिना जीते और मरते हैं। बीमारी और शोक में उनके लिए कोई सान्त्वना नहीं। बुढ़ापे और मृत्यु में उनके सामने कब्र से परे कोई जीवन नहीं। छुड़ानेवाले के द्वारा मिलनेवाले शान्ति के सच्चे मार्ग के विषय में, मसीह में परमेश्वर के प्रेम के विषय में, मुफ़्त अनुग्रह के विषय में, दोष से पूरी क्षमा के विषय में, अनन्त जीवन के लिए पुनरुत्थान के विषय में उन्हें कुछ भी ज्ञान नहीं। लम्बी और थका देनेवाली शताब्दियों से वे मसीह की कलीसिया की मन्द चाल की बाट जोहते रहे हैं, जबकि मसीही लोग सोते रहे, या निरर्थक विवादों में अपनी शक्ति गँवाते रहे और रीतियों और विधियों को लेकर झगड़ते और कलह करते रहे। क्या यह ऐसा दृश्य नहीं जो "आत्मा को उभार दे"?

इसके बाद मैं आपसे कहता हूँ कि अपने ही देश की ओर लौटिए और अपने बड़े नगरों की दशा पर विचार कीजिए। हमारी विशाल राजधानी में, लिवरपूल में, मैनचेस्टर में, बर्मिंघम में, ब्लैक कन्ट्री में ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ मसीही धर्म व्यावहारिक रूप से अज्ञात-सा जान पड़ता है। पूर्वी लन्दन, या साउथवार्क, या लैम्बेथ की धार्मिक दशा की जाँच कीजिए। शनिवार की शाम, या रविवार को, या किसी बैंक अवकाश के दिन लिवरपूल के उत्तरी भाग में घूमकर देखिए कि विश्रामदिन का उल्लंघन, मद्यपान और सामान्य अधर्म कैसे बिना किसी रोक-टोक के राज्य करते दिखाई देते हैं। "जब बलवन्त हथियार बाँधे हुए अपने भवन की रखवाली करता है, तो उसकी सम्पत्ति बची रहती है" (लूका 11:21)। और फिर स्मरण कीजिए कि यह दशा एक ऐसे देश में है जो मसीही होने का दावा करता है, एक ऐसी भूमि में जहाँ राजकीय कलीसिया है, और ऑक्सफ़ोर्ड तथा कैम्ब्रिज से कुछ ही घण्टों की दूरी पर! मैं फिर कहता हूँ, क्या ये बातें हमारे हृदयों को "उभार" नहीं देनी चाहिएँ?

यह दुःख की बात है कि आज हमारे आसपास ऐसे लोगों की एक पीढ़ी है जो मूर्तिपूजा, अविश्वास और अधर्म को उदासीनता, शीतलता और बेपरवाही से देखते हैं। उन्हें घर में या विदेश में मसीही मिशनों की कोई चिन्ता नहीं। उन्हें उनकी कोई आवश्यकता दिखाई नहीं देती। किसी भी कलीसिया या संस्था के सुसमाचार-प्रचार के कार्य में वे कोई रुचि नहीं लेते। वे सभी के साथ खुली तुच्छता का व्यवहार करते हैं। वे एक्सेटर हॉल को तुच्छ जानते हैं। वे कभी चन्दा नहीं देते। वे कभी सभाओं में नहीं जाते। वे कभी मिशन की कोई रिपोर्ट नहीं पढ़ते। वे समझते हैं कि हर मनुष्य अपनी ही व्यवस्था या पन्थ से बच जाएगा, यदि वह केवल सच्चे मन से माने; और यह कि एक धर्म उतना ही अच्छा है जितना दूसरा, यदि उसे माननेवाले केवल सच्ची लगन रखें। उन्हें सभी आत्मिक साधनों या मिशन के कार्यों को बदनाम करने और नीचा दिखाने में आनन्द आता है। वे निरन्तर यही कहते रहते हैं कि घर में या विदेश में आधुनिक मिशन कुछ नहीं करते, और उनका समर्थन करनेवाले दुर्बल उत्साहियों से कुछ ही बेहतर हैं। उनकी बातों से लगता है कि वे सोचते हैं कि मिशनों और आक्रामक मसीही आन्दोलनों से संसार को कोई लाभ नहीं पहुँचता, और संसार को उसके हाल पर छोड़ देना ही अच्छा होगा। हम इन लोगों से क्या कहें? वे हमें हर ओर मिलते हैं। हर संस्था में उनकी बातें सुनी जा सकती हैं। एक ओर बैठकर उपहास करना, आलोचना करना और कुछ न करना—यही उनका आनन्द और व्यवसाय प्रतीत होता है। हम उनसे क्या कहें?

यदि वे केवल हमारी सुनें तो हम उन्हें साफ़-साफ़ बता दें कि वे प्रेरित पौलुस के पूरी तरह विरोधी हैं। आइए, हम उन्हें मसीही मिशनरी का वह महान आदर्श दिखाएँ जो एथेंस की गलियों में चल रहा है, और जिसकी आत्मा "मूर्तियों से भरे हुए" उस नगर को देखकर उभर उठी। आइए, हम उनसे पूछें कि चीन और हिन्दुस्तान, अफ़्रीका और दक्षिणी समुद्र के द्वीपों की मूर्तिपूजा के विषय में, या लन्दन, लिवरपूल, मैनचेस्टर, बर्मिंघम और ब्लैक कन्ट्री के अर्द्ध-मूर्तिपूजक क्षेत्रों के विषय में वे वैसा क्यों नहीं अनुभव करते जैसा उसने किया। आइए, हम उनसे पूछें कि क्या 1800 वर्षों ने परमेश्वर के स्वभाव में, पतित मनुष्य की आवश्यकताओं में, मूर्ति-पूजा के पाप में और मसीहियों के कर्तव्य में कोई अन्तर ला दिया है। हम उचित उत्तर के लिए व्यर्थ ही पूछेंगे; हमें कोई उत्तर न मिलेगा। हमारी दुर्बलता पर किए गए ताने हमारे सिद्धान्तों के विरुद्ध कोई तर्क नहीं हैं। हमारी कमज़ोरियों और असफलताओं पर किए गए परिहास इस बात का प्रमाण नहीं कि हमारे उद्देश्य ग़लत हैं। हाँ, उनके पक्ष में इस संसार की चतुराई और बुद्धि हो सकती है; परन्तु नए नियम के अनन्त सिद्धान्त स्पष्ट, साफ़ और निस्सन्देह लिखे हुए हैं। जब तक बाइबल बाइबल है, आत्माओं के प्रति प्रेम मसीही गुणों में सबसे पहले गुणों में से एक है, और अन्यजातियों तथा सब अपरिवर्तित लोगों की आत्माओं के लिए चिन्ता रखना एक गम्भीर कर्तव्य है। जो इस भावना से कुछ भी परिचित नहीं, उसे अभी मसीह की पाठशाला में विद्यार्थी बनना शेष है। जो इस भावना को तुच्छ जानता है, वह पौलुस का उत्तराधिकारी नहीं, बल्कि उसका अनुयायी है जिसने कहा था, "क्या मैं अपने भाई का रखवाला हूँ?"—अर्थात् कैन का।

III. अन्त में मैं अपने पाठकों से कहता हूँ कि ध्यान दें कि पौलुस ने एथेंस में क्या किया। उसने क्या देखा, यह आप सुन चुके हैं; उसने क्या अनुभव किया, यह आपको बताया जा चुका है; परन्तु उसने कैसे कार्य किया?

उसने कुछ किया। वह ऐसा व्यक्ति न था जो मूर्तियों से भरे हुए नगर के सामने चुपचाप खड़ा रहकर "माँस और लहू से सलाह" करता। वह अपने मन में यह तर्क कर सकता था कि वह अकेला है, कि वह जन्म से यहूदी है, कि वह एक पराए देश में परदेशी है, कि उसे विद्वान पुरुषों के जमे हुए पूर्वाग्रहों और पुराने सम्बन्धों का विरोध करना है, कि एक पूरे नगर के पुराने धर्म पर आक्रमण करना सिंह की माँद में उसकी दाढ़ी पकड़ना है, और कि यूनानी दर्शन में डूबे हुए मनों पर सुसमाचार के सिद्धान्तों का कोई प्रभाव पड़ना सम्भव नहीं।

परन्तु ये विचार पौलुस के मन में आए ही नहीं जान पड़ते। उसने आत्माओं को नाश होते देखा; उसने अनुभव किया कि जीवन छोटा है और समय बीता जा रहा है; उसे अपने स्वामी के सन्देश की सामर्थ्य पर भरोसा था कि वह हर मनुष्य की आत्मा तक पहुँच सकता है; उसने स्वयं दया पाई थी, और वह चुप रहना नहीं जानता था। उसने तुरन्त कार्य किया; और जो कुछ उसके हाथ को करने को मिला, उसे उसने अपनी पूरी शक्ति से किया। काश, आज के दिनों में हमारे पास कर्मठ लोग और अधिक होते!

और उसने जो कुछ किया, वह पवित्र बुद्धि के साथ और साथ ही पवित्र साहस के साथ किया। उसने आक्रामक कदम अकेले ही आरम्भ किए, और साथियों तथा सहायकों की प्रतीक्षा नहीं की। परन्तु उसने उन्हें अत्यन्त निपुणता से, और ऐसी रीति से आरम्भ किया जिससे सुसमाचार को पैर जमाने का सबसे अधिक अवसर मिले। पहले, हमें बताया गया है, उसने आराधनालय में "यहूदियों से" और उन "भक्त लोगों" या यहूदी मत अपनानेवालों से, जो यहूदी आराधना में आते थे, वाद-विवाद किया। उसके बाद वह "बाजार में प्रतिदिन उन से जो उसके पास आते थे" "वाद-विवाद" या चर्चा करता गया। वह एक अनुभवी सेनापति के समान कदम-कदम आगे बढ़ा। यहाँ भी, और अन्यत्र भी, पौलुस हमारे लिए एक आदर्श है: उसने उमड़ते हुए उत्साह और साहस को विवेकपूर्ण चतुराई और पवित्र किए हुए सामान्य ज्ञान के साथ मिलाया। आह, कि आज के दिनों में हमारे पास बुद्धिमान पुरुष और अधिक होते!

परन्तु प्रेरित ने क्या सिखाया? वह कौन-सा महान विषय था जिस पर उसने यहूदी और यूनानी दोनों से, आराधनालय में और गली में, तर्क-वितर्क और चर्चा की? उसने अनजान भीड़ों के सामने मूर्तिपूजा की मूर्खता को प्रकट किया, हाथ की बनी मूर्तियों के पूजनेवालों को परमेश्वर का सच्चा स्वरूप दिखाया, एपिकूरी और स्तोइकी लोगों के सामने यह घोषणा की कि परमेश्वर हम सब के निकट है और न्याय के दिन परमेश्वर के सामने गम्भीर लेखा देना निश्चित है — ये बातें हमें उसके उस भाषण में पूरी तरह लिखी मिलती हैं जो उसने मंगल ग्रह की पहाड़ी पर दिया।

परन्तु क्या उस मूर्तिपूजक नगर के साथ प्रेरित के व्यवहार के विषय में इससे अधिक कुछ सीखने को नहीं है? क्या कोई और ऐसी बात नहीं जो मसीही विश्वास की अपनी विशेषता हो और जिसे पौलुस ने एथेन्स में प्रस्तुत किया? निश्चय ही और भी है। जिस अध्याय को हम देख रहे हैं उसके 18वें पद में एक वाक्य है, जो सोने के अक्षरों में लिखा जाना चाहिए — ऐसा वाक्य जो उस ढीठ दावे को सदा के लिए चुप कर दे जो कुछ लोगों ने करने का साहस किया है, कि अन्यजातियों का वह महान प्रेरित कभी-कभी केवल देववाद या प्राकृतिक धर्मविज्ञान का शिक्षक बनकर सन्तुष्ट रहता था! 18वें पद में हमें बताया गया है कि एथेन्सवासियों का ध्यान जिस एक बात ने खींचा, वह यह थी कि पौलुस "यीशु और पुनरुत्थान का सुसमाचार सुनाता था।"

यीशु और पुनरुत्थान! उस वाक्य में कितनी बड़ी खान भरी थी! उन शब्दों से मसीही विश्वास का कितना पूरा सारांश निकाला जा सकता है! मुझे कोई सन्देह नहीं कि वे केवल एक सारांश के रूप में कहे गए हैं। मुझे उन पर तरस आता है जो उनके अर्थ को सिकोड़ना और काट-छाँट करना चाहते हैं, और उनकी व्याख्या मसीह के भविष्यद्वक्ता पद और उसके आदर्श से अधिक कुछ नहीं करते। मुझे यह अविश्वसनीय लगता है कि वही प्रेरित, जो कुछ दिन बाद कुरिन्थुस गया और "यीशु मसीह, वरन् क्रूस पर चढ़ाए हुए मसीह को छोड़ और कुछ न जानने का निश्चय किया," अर्थात् क्रूस के सिद्धान्त को, एथेन्सवासियों के कानों से क्रूस को छिपाए रखता। मैं मानता हूँ कि "यीशु और पुनरुत्थान" ऐसा वाक्य है जो सम्पूर्ण सुसमाचार के लिए खड़ा है। संस्थापक का नाम और सुसमाचार की नींव के तथ्यों में से एक, सम्पूर्ण मसीही विश्वास के प्रतिनिधि बनकर हमारे सामने हैं।

तो फिर इस वाक्य का अर्थ क्या है? हमें क्या समझना चाहिए कि पौलुस ने प्रचार किया?

(क) पौलुस ने एथेन्स में प्रभु यीशु के व्यक्तित्व का प्रचार किया — उसके ईश्वरत्व, उसके देहधारण, पापियों को बचाने के लिए जगत में उसके भेजे जाने, उसके जीवन, मृत्यु और स्वर्ग में आरोहण, उसके चरित्र, उसकी शिक्षा और मनुष्यों की आत्माओं के प्रति उसके अद्भुत प्रेम का।

(ख) पौलुस ने एथेन्स में प्रभु यीशु के कार्य का प्रचार किया — क्रूस पर उसके बलिदान का, पाप के लिए उसकी प्रतिनिधिरूप सन्तुष्टि का, अधर्मियों के स्थान पर धर्मी के ठहरने का, उस पूर्ण छुटकारे का जो उसने सब के लिए प्राप्त किया और विशेष रूप से उन सब के लिए सम्पन्न किया जो विश्वास करते हैं, और उस पूर्ण विजय का जो उसने खोए हुए मनुष्य के लिए पाप, मृत्यु और नरक पर प्राप्त की।

(ग) पौलुस ने एथेन्स में प्रभु यीशु के पदों का प्रचार किया — परमेश्वर और सारी मानवजाति के बीच एकमात्र मध्यस्थ के रूप में, सब पाप से रोगी आत्माओं के महान वैद्य के रूप में, सब बोझ से दबे हृदयों को विश्राम और शान्ति देनेवाले के रूप में, मित्रहीनों के मित्र के रूप में, उन सब के महायाजक और सहायक के रूप में जो अपनी आत्माएँ उसके हाथों में सौंपते हैं, बन्धुओं का छुटकारा-मूल्य चुकानेवाले के रूप में, और परमेश्वर से भटके हुए सब लोगों की ज्योति और मार्गदर्शक के रूप में।

(घ) पौलुस ने एथेन्स में उन शर्तों का प्रचार किया जिन्हें प्रभु यीशु ने अपने सेवकों को सारे संसार में घोषित करने की आज्ञा दी थी — पापियों में प्रधान को भी तुरन्त ग्रहण करने के लिए उसकी तत्परता और इच्छा; उन सब को पूरी रीति से उद्धार देने की उसकी सामर्थ्य जो उसके द्वारा परमेश्वर के पास आते हैं; वह पूर्ण, वर्तमान और तत्काल क्षमा जो वह उन सब को देता है जो विश्वास करते हैं; हर प्रकार के पाप से उसके लहू में पूर्ण शुद्धि; विश्वास, या हृदय का सीधा भरोसा, जो उन सब से माँगी जानेवाली एकमात्र बात है जो अपने पापों को अनुभव करते और उद्धार पाना चाहते हैं; और जितने विश्वास करते हैं उन सब के लिए कर्मों, या व्यवस्था के कामों के बिना पूर्ण रूप से धर्मी ठहराया जाना।

(ङ) अन्त में, परन्तु कम महत्त्व का नहीं, पौलुस ने एथेन्स में प्रभु यीशु के पुनरुत्थान का प्रचार किया। उसने इसे उस चमत्कारी तथ्य के रूप में प्रचारित किया जिस पर यीशु ने स्वयं अपने सारे मिशन की विश्वसनीयता को दाँव पर लगाया, और ऐसे तथ्य के रूप में जो इतने प्रचुर प्रमाण से सिद्ध है कि चमत्कारों में दोष निकालनेवाले किसी ने भी अब तक ईमानदारी से उसका सामना करने का साहस नहीं किया — उसने इसे ऐसे तथ्य के रूप में प्रचारित किया जो छुटकारे के सारे कार्य का शिखर-पत्थर है, यह प्रमाणित करता है कि मसीह ने जो कुछ हाथ में लिया उसे पूरी तरह पूरा किया, कि छुड़ौती स्वीकार की गई, प्रायश्चित पूर्ण हुआ और बन्दीगृह के द्वार सदा के लिए खोल दिए गए। उसने इसे ऐसे तथ्य के रूप में प्रचारित किया जो हमारे अपने शरीर में पुनरुत्थान की सम्भावना और निश्चितता को निःसन्देह प्रमाणित करता है, और इस महान प्रश्न को सदा के लिए सुलझा देता है, "क्या परमेश्वर मरे हुओं को जिला सकता है?"

इन बातों को, और इन जैसी अनेक बातों को, पौलुस ने अथेने में अवश्य सुनाया होगा—इसमें मुझे तनिक भी सन्देह नहीं। मैं क्षण भर के लिए भी यह नहीं मान सकता कि उसने एक स्थान पर कुछ और सिखाया तथा दूसरे स्थान पर कुछ और। पवित्र आत्मा ने उसके प्रचार का सार उस भरपूर वाक्य में दे दिया है: "यीशु और पुनरुत्थान।" उसी पवित्र आत्मा ने हमें विस्तार से बताया है कि उसने पिसिदिया के अन्ताकिया में, फिलिप्पी में, कुरिन्थुस में और इफिसुस में इन विषयों को किस प्रकार प्रस्तुत किया। प्रेरितों के काम और पत्रियाँ इस विषय में निःसंदिग्ध स्वर में बोलती हैं। मेरा विश्वास है कि "यीशु और पुनरुत्थान" का अर्थ यह है—यीशु और वह छुटकारा जो उसने अपनी मृत्यु और कब्र से जी उठने के द्वारा सम्पन्न किया; उसका प्रायश्चित करनेवाला लहू, उसका क्रूस, उसका स्थानापन्न होना, उसकी मध्यस्थता, उसका विजय के साथ स्वर्ग में प्रवेश, और उसके फलस्वरूप उन सब पापियों का पूर्ण और सम्पूर्ण उद्धार जो उस पर विश्वास करते हैं। यही वह सिद्धान्त है जो पौलुस ने प्रचार किया। अथेने में रहते हुए पौलुस ने यही कार्य किया।

तो क्या अन्यजातियों के इस महान प्रेरित के इन कार्यों से हमें कुछ सीखने को नहीं है? इनमें गहरे महत्त्व की शिक्षाएँ हैं, जिनकी ओर मैं इस लेख के सब पाठकों का ध्यान संक्षेप में दिलाने का साहस करता हूँ। मैं संक्षेप में कहता हूँ। मैं इन्हें केवल बीजों की भाँति बिखेर रहा हूँ, कि आप निजी मनन करें।

(क) पहली बात, अथेने में पौलुस के कार्यों से एक सैद्धान्तिक शिक्षा सीखें। हर स्थान पर हमारी शिक्षा का महान विषय यीशु मसीह ही होना चाहिए। हमारे श्रोता चाहे कितने ही विद्वान हों या कितने ही अनपढ़, चाहे कितने ही कुलीन हों या कितने ही साधारण—क्रूस पर चढ़ाया हुआ मसीह, मसीह, मसीह—क्रूसित, जी उठा हुआ, मध्यस्थता करता हुआ, छुड़ाता हुआ, क्षमा करता हुआ, ग्रहण करता हुआ, उद्धार करता हुआ—मसीह ही हमारी शिक्षा का महान विषय होना चाहिए। हम इस सुसमाचार में कभी सुधार नहीं कर सकेंगे। हमें कोई दूसरा ऐसा विषय कभी न मिलेगा जिससे इतनी भलाई हो। यदि हम पौलुस की तरह फसल काटना चाहते हैं, तो हमें वैसे ही बोना होगा जैसे पौलुस ने बोया।

(ख) दूसरी बात, अथेने में पौलुस के कार्यों से एक व्यावहारिक शिक्षा सीखें। यदि आवश्यकता हो तो हमें अकेले खड़े होने और मसीह के एकाकी गवाह बनने से कभी नहीं डरना चाहिए—चाहे अपने ही देश के किसी विशाल अधर्मी मण्डल में अकेले हों, पूर्वी लन्दन में, लिवरपूल में, मैनचेस्टर में, दिल्ली में, बनारस में या पीकिंग में अकेले हों, इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता। यदि परमेश्वर का सत्य हमारे पक्ष में है, तो हमें चुप नहीं रहना चाहिए। अथेने में अकेला पौलुस, संसार के विरुद्ध अकेला अथानासियुस, रोमी पादरियों की पूरी सेना के विरुद्ध अकेला विक्लिफ़, वर्म्स में अकेला लूथर—ये हमारी आँखों के सामने ज्योतिस्तम्भ हैं। परमेश्वर वैसे नहीं देखता जैसे मनुष्य देखता है। हमें रुककर गिनती करने और लोगों की संख्या आँकने में नहीं पड़ना चाहिए। जिस एक मनुष्य के हृदय में मसीह और हाथ में बाइबल है, वह मूर्तिपूजकों के असंख्य दल से अधिक सामर्थी है।

(ग) तीसरी बात, इस महत्त्व को—बल्कि मुझे कहने दीजिए इस आवश्यकता को—सीखें कि अलौकिक तत्त्व को मसीही धर्म के एक अनिवार्य अंग के रूप में साहसपूर्वक प्रतिपादित किया जाए। इन पृष्ठों के अनेक पाठकों को मुझे यह बताने की आवश्यकता नहीं कि आजकल अविश्वासी और संशयवादी बहुत हैं, जो बाइबल के चमत्कारों पर कमर कसकर टूट पड़ते हैं, और निरन्तर यह प्रयास करते रहते हैं कि उन्हें निकम्मे कबाड़ की तरह फेंक दें, अथवा चतुराई-भरी व्याख्याओं से यह सिद्ध कर दें कि वे कहानियाँ मात्र हैं और चमत्कार हैं ही नहीं। हम ऐसी शिक्षा का दृढ़ता से विरोध करने में और पौलुस के पक्ष में खड़े होने में कभी न डरें। उसी की तरह हम मसीह के पुनरुत्थान की ओर संकेत करें, और सब निष्पक्ष और विवेकशील लोगों को आत्मविश्वास के साथ चुनौती दें कि वे उस प्रमाण का खण्डन करें जिस पर वह आधारित है। अलौकिक धर्म के शत्रुओं ने उस प्रमाण का खण्डन कभी नहीं किया, और कभी कर भी न सकेंगे। यदि मसीह मरे हुओं में से नहीं जी उठा, तो उसके संसार से जाने के बाद प्रेरितों का आचरण और उनकी शिक्षा एक अनसुलझी पहेली और पूरा रहस्य है, जिसकी व्याख्या कोई भी स्वस्थ बुद्धि का मनुष्य नहीं कर सकता। परन्तु यदि, जैसा हम विश्वास करते हैं, मसीह का पुनरुत्थान एक ऐसा निर्विवाद तथ्य है जिसे झुठलाया नहीं जा सकता, तो अलौकिक धर्म के विरुद्ध संशयवादी तर्कों का सारा ढाँचा खोखला हो जाता है और गिर पड़ेगा। मसीह के पुनरुत्थान के उस महान चमत्कार को एक बार स्वीकार कर लेने के बाद, यह कहना कि बाइबल का कोई अन्य छोटा चमत्कार अविश्वसनीय या असम्भव है, निरा मूर्खतापूर्ण है।

(घ) एक और बात, अथेने में पौलुस के कार्यों से विश्वास को प्रोत्साहन देनेवाली शिक्षा सीखें। यदि हम सुसमाचार का प्रचार करें, तो हम पूर्ण भरोसे के साथ प्रचार कर सकते हैं कि उससे भलाई होगी। तरसुस का वह अकेला यहूदी जो मार्स की पहाड़ी पर अकेला खड़ा हुआ, उस समय ऐसा प्रतीत हुआ मानो उसने कुछ भी नहीं किया, या बहुत कम किया। वह अपने मार्ग पर आगे बढ़ गया, और लगा कि वह असफल रहा। स्तोइकी और इपिकूरी सम्भवतः हँसे होंगे और व्यंग्य किया होगा, मानो वह दिन उन्हीं का था। परन्तु वह अकेला यहूदी एक ऐसा दीपक जला रहा था जो तब से कभी बुझा नहीं। जो वचन उसने अथेने में सुनाया वह बढ़ा और फैला, और एक विशाल वृक्ष बन गया। वह थोड़ा-सा ख़मीर अन्ततः पूरे यूनान में फैल गया। पौलुस ने जो सुसमाचार प्रचार किया, उसने मूर्तिपूजा पर विजय पाई। खाली पड़ा पार्थेनन आज तक इस बात का प्रमाण है कि अथेने का धर्मशास्त्र मर चुका और बीत चुका है। हाँ; यदि हम अच्छा बीज बोएँ, तो हम उसे आँसुओं के साथ बोएँगे, पर हम "जयजयकार करते हुए अपनी पूलियाँ लिए हुए लौटेंगे" (भजन संहिता 126:6)।

मैं निष्कर्ष की ओर बढ़ता हूँ। अब मैं इस पर विचार से कि पौलुस ने अथेने में क्या देखा, क्या अनुभव किया और क्या किया, व्यावहारिक महत्त्व की बातों की ओर आता हूँ। मैं इस लेख के प्रत्येक पाठक से पूछता हूँ कि हमें क्या देखना चाहिए, क्या अनुभव करना चाहिए और क्या करना चाहिए?

(1) हमें क्या देखना चाहिए? यह दर्शनीय स्थलों और उत्तेजना का युग है। "आँखें देखने से तृप्त नहीं होतीं" (सभोपदेशक 1:8)। संसार इधर-उधर दौड़ने और ज्ञान की वृद्धि के पीछे पागल है। मनुष्य का धन, उसकी कलाएँ, उसके आविष्कार निरन्तर लाखों लोगों को बड़ी-बड़ी प्रदर्शनियों में इकट्ठा करते रहते हैं। हर वर्ष हज़ारों-लाखों लोग इधर-उधर भागते हैं और मनुष्यों के हाथों की कारीगरी को निहारते हैं।

परन्तु क्या मसीही को संसार का मानचित्र नहीं देखना चाहिए? क्या बाइबल पर विश्वास करनेवाले मनुष्य को उस मानचित्र के उन विशाल क्षेत्रों को गम्भीर विचारों के साथ नहीं निहारना चाहिए जो आत्मिक रूप से अब भी काले, मृत और सुसमाचार से रहित हैं? क्या हमारी आँखों को इस तथ्य पर दृष्टि नहीं डालनी चाहिए कि पृथ्वी की आधी जनसंख्या अब भी परमेश्वर और मसीह से अनजान है, और पाप तथा मूर्तिपूजा में पड़ी बैठी है, और हमारे अपने महानगरों में हमारे ही देशवासी असंख्य लोग व्यवहार में अन्यजातियों से कुछ ही अच्छे हैं, क्योंकि मसीही लोग आत्माओं के लिए बहुत कम करते हैं?

परमेश्वर की आँखें ये बातें देखती हैं, और हमारी आँखों को भी इन्हें देखना चाहिए।

(2) हमें क्या अनुभव करना चाहिए? यदि हमारे हृदय परमेश्वर की दृष्टि में सीधे हैं, तो अधर्म और मूर्तिपूजा को देखकर वे अवश्य प्रभावित होने चाहिए। वास्तव में संसार की दशा हमारे हृदयों में अनेक भावनाएँ जगाने वाली होनी चाहिए।

अपने असंख्य विशेषाधिकारों के लिए हमें धन्यवादी होना चाहिए। अधिकांश अंग्रेज़ लोग इस बात को बहुत कम जानते हैं कि मसीही धर्म के प्रति उनका प्रतिदिन का अनचुकाया ऋण कितना बड़ा है। कुछ लोगों के लिए यह कितना भला होता यदि उन्हें प्रतिवर्ष कुछ सप्ताह किसी अन्यजाति देश में रहने को विवश किया जाता।

जब हम सोचते हैं कि इंग्लैंड की कलीसिया ने अब तक मसीही धर्म के प्रसार के लिए कितना कम किया है, तो हमें लज्जा और दीनता अनुभव करनी चाहिए। निश्चय ही जब से क्रैनमर, रिडली और लैटिमर ने खूँटे पर जलकर प्राण दिए, तब से परमेश्वर ने हमारे लिए बड़े-बड़े काम किए हैं — उसने हमें अनेक परीक्षाओं में बचाए रखा और अनेक आशीषों से धनी किया। परन्तु हमने उसे कितना कम लौटाया है! हमारे 15,000 पल्लियों में से कितनी थोड़ी हैं जो स्वदेश या विदेश में मिशन-कार्य के योग्य कुछ करती हैं! कुछ मण्डलियाँ आत्माओं के उद्धार के लिए कितना कम उत्साह दिखाती हैं! ऐसा नहीं होना चाहिए!

जब हम अपरिवर्तित आत्माओं की दयनीय दशा और उन सब स्त्री-पुरुषों के दुःख का विचार करते हैं जो मसीह के बिना जीते और मरते हैं, तब हमारे भीतर करुणा उत्पन्न होनी चाहिए। इस दरिद्रता के समान कोई दरिद्रता नहीं! इस रोग के समान कोई रोग नहीं! इस दासत्व के समान कोई दासत्व नहीं! मूर्तिपूजा, अधर्म और पाप में मरने के समान कोई मृत्यु नहीं! यदि हम खोए हुओं के लिए कुछ अनुभव नहीं करते, तो हम भली-भाँति अपने आप से पूछ सकते हैं कि मसीह का मन कहाँ है? मैं निडर होकर एक बड़े सिद्धान्त के रूप में कहता हूँ कि जो मसीही धर्म मनुष्य को अपरिवर्तित लोगों की दशा के लिए व्याकुल नहीं करता, वह वह मसीही धर्म नहीं है जो 1800 वर्ष पहले स्वर्ग से उतरा और नए नियम में सुरक्षित है। वह केवल एक खोखला नाम है। वह पौलुस का मसीही धर्म नहीं है।

(3) अन्त में, हमें क्या करना चाहिए? अन्ततः यही वह बिन्दु है जिस पर मैं आपका मन लाना चाहता हूँ। देखना और अनुभव करना अच्छा है; परन्तु करना ही धर्म का जीवन है। जो निष्क्रिय प्रभाव कर्म की ओर नहीं ले जाते, वे विवेक को कठोर कर देते हैं और हमें सचमुच हानि पहुँचाते हैं। हमें क्या करना चाहिए? हमें अब तक जितना किया है, उससे कहीं अधिक करना चाहिए। हम सब सम्भवतः और अधिक कर सकते हैं। सुसमाचार का सम्मान, विदेश के मिशन-क्षेत्र की दशा, स्वदेश के हमारे विशाल बढ़े हुए नगरों की स्थिति — सब हमें और अधिक करने के लिए पुकारते हैं।

क्या हमें रुक जाना चाहिए और अपने युद्ध के हथियारों पर लज्जित होना चाहिए? क्या सुसमाचार, वह पुराना सुसमाचारीय विश्वास-वचन, हमारे समय की आवश्यकताओं के लिए अपर्याप्त है? मैं निडर होकर कहता हूँ कि हमें सुसमाचार पर तनिक भी लज्जित होने का कारण नहीं है। वह घिस नहीं गया है। वह शक्तिहीन नहीं हुआ है। वह समय से पीछे नहीं है। हमें कुछ नया नहीं चाहिए, सुसमाचार में कुछ जोड़ना नहीं, कुछ घटाना नहीं। हमें केवल "पुरानी राहों" की आवश्यकता है, अर्थात् पुराने सत्यों को पूरी तरह, निडरता से और प्रेम से सुनाने की। बस सुसमाचार को पूरा सुनाओ, वही सुसमाचार जो पौलुस ने सुनाया, तो वह अब भी "हर एक विश्वास करनेवाले के लिए उद्धार के निमित्त परमेश्वर की सामर्थ्य है," और धर्म कहलाने वाली कोई अन्य वस्तु में कोई वास्तविक सामर्थ्य है ही नहीं। (रोमियों 1:16)

क्या हमें रुक जाना चाहिए और सुसमाचार के प्रचार के परिणामों पर लज्जित होना चाहिए? क्या हम सिर झुकाकर शिकायत करें कि "वह विश्वास जो पवित्र लोगों को एक ही बार सौंपा गया था" अपनी सामर्थ्य खो चुका है और कोई भला नहीं करता? हमें लज्जित होने का तनिक भी कारण नहीं है। मैं साहसपूर्वक कहता हूँ कि पृथ्वी पर कोई भी धार्मिक शिक्षा उल्लेखनीय परिणाम नहीं दिखा सकती सिवाय उसके जिसे सैद्धान्तिक, मतवादी धर्मशास्त्र कहा जाता है। वे सब आधुनिक पाठशालाएँ — जो सैद्धान्तिक शिक्षा का तिरस्कार करती हैं — उन्होंने पृथ्वी पर कौन सा छुटकारा दिलाया है? राजधानी के, हमारे बड़े बन्दरगाहों के, हमारे कारखाना-नगरों के और हमारे कोयला-क्षेत्रों के कौन से विशाल और अर्द्ध-अन्यजाति पल्लियों को उन्होंने सुसमाचार सुनाया और सभ्य बनाया है? कौन सा न्यूज़ीलैंड, कौन सी रेड रिवर, कौन सा सियरा लियोन, कौन सा तिन्नेवेली इस पिछले युग की ऊँचे नाम वाली प्रणालियाँ अपने तंत्र के फल के रूप में दिखा सकती हैं? नहीं! यदि "सत्य क्या है?" इस प्रश्न का समाधान परिणामों और फलों के आधार पर करना हो, तो नए नियम का धर्म, वह धर्म जिसके सिद्धान्त हमारे अनुच्छेदों, विश्वास-वचनों और प्रार्थना-पुस्तक में संक्षिप्त और सुरक्षित हैं, उसके लिए लज्जित होने का कोई कारण नहीं है।

अब हम इसके सिवा क्या कर सकते हैं कि अतीत के लिए अपने आप को दीन करें, और परमेश्वर की सहायता से आगे के लिए और अधिक करने का यत्न करें? आइए हम अपनी आँखें और अधिक खोलें और देखें। आइए हम अपने हृदय और अधिक खोलें और अनुभव करें। आइए हम आत्म-त्यागपूर्ण दान से, उत्साहपूर्ण सहयोग से, साहसी पक्ष-समर्थन से और उत्कट प्रार्थना से और अधिक कार्य करने के लिए अपने आप को जगाएँ। आइए हम अपने उद्देश्य के योग्य कुछ करें।

जिस उद्देश्य के लिए यीशु स्वर्ग छोड़कर पृथ्वी पर उतरा, वह हमारे सर्वोत्तम प्रयास के योग्य है।

और अब, मैं इस लेख को उसी विचार पर लौटकर समाप्त करता हूँ जिससे इसका आरम्भ हुआ था। सम्भव है आपका भाग्य किसी नगर या कस्बे में पड़ा हो। हमारे ग्रामीण क्षेत्रों की जनसंख्या प्रतिवर्ष घट रही है। नगरवासी देहाती पल्लियों के निवासियों से तेज़ी से अधिक होते जा रहे हैं। यदि आप नगर के निवासी हैं, तो वे विदाई के सलाह-शब्द स्वीकार कीजिए जो मैं देने जा रहा हूँ। जब मैं आपसे आपकी आत्मा के विषय में बात करूँ, तब मुझे अपना पूरा ध्यान दीजिए।

(1) एक बात तो यह याद रखिए कि आप आत्मिक दृष्टि से एक विशेष खतरे की स्थिति में रखे गए हैं। बाबुल के दिनों से लेकर आज तक, जहाँ कहीं आदम की सन्तानें बड़ी संख्या में इकट्ठी हुई हैं, उन्होंने सदा एक दूसरे को पाप और दुष्टता की चरम सीमाओं तक खींचा है। बड़े नगर सदा शैतान की गद्दी रहे हैं। नगर ही वह स्थान है जहाँ जवान मनुष्य अभक्ति के अनगिनत उदाहरण देखता है; और यदि वह पाप में जीने का ठान ले, तो उसे सदा बहुत से साथी मिल जाते हैं। नगर ही वह स्थान है जहाँ नाट्यशाला और जुआघर, नाचघर और मदिरालय निरन्तर भरे रहते हैं। नगर ही वह स्थान है जहाँ धन का लोभ, या मनोरंजन का प्रेम, या इन्द्रिय-सुख की लालसा असंख्य दासों को बन्दी बनाए रखती है। नगर ही वह स्थान है जहाँ मनुष्य को सब्त का दिन तोड़ने, अनुग्रह के साधनों को तुच्छ जानने, बाइबल की उपेक्षा करने और प्रार्थना की आदत छोड़ देने के लिए प्रोत्साहित करनेवाले सैकड़ों लोग सदा मिल जाते हैं। पाठक, इन बातों पर विचार कीजिए। यदि आप नगर में रहते हैं, तो सावधान रहिए। अपने खतरे को पहचानिए। अपनी निर्बलता और पापमयता को अनुभव कीजिए। मसीह की ओर भागिए और अपनी आत्मा को उसकी देखरेख में सौंप दीजिए। उससे विनती कीजिए कि वह आपको थामे रहे, तब आप सुरक्षित रहेंगे। चौकस रहिए। शैतान का साम्हना कीजिए। जागते रहिए और प्रार्थना कीजिए।

(2) दूसरी ओर यह भी याद रखिए कि यदि आप नगर में रहते हैं, तो आपको कुछ विशेष सहायताएँ भी मिल सकती हैं जो देहात में सदा नहीं मिल पातीं। इंग्लैंड के बहुत कम नगर ऐसे हैं जहाँ आपको मसीह के कुछ विश्वासयोग्य सेवक न मिलें, जो प्रसन्नता से आपकी सहायता करें और स्वर्ग की ओर आपकी यात्रा में आपका साथ दें। इंग्लैंड के बहुत थोड़े ही नगर ऐसे हैं जहाँ आपको कोई ऐसा सेवक न मिले जो सुसमाचार का प्रचार करता हो, और सकरे मार्ग पर चलनेवाले कुछ ऐसे यात्री न मिलें जो अपनी संख्या में किसी और के जुड़ने का स्वागत करने को तैयार हों।

पाठक, हियाव बाँधिए, और कभी इस निराशाजनक विचार को मन में स्थान न दीजिए कि नगर में मसीह की सेवा करना असम्भव है। इसके बजाय यह सोचिए कि परमेश्वर के लिए कुछ भी असम्भव नहीं। उन गवाहों की लम्बी सूची पर ध्यान कीजिए जिन्होंने बड़ी से बड़ी परीक्षाओं के बीच क्रूस उठाया और मृत्यु तक विश्वासयोग्य रहे। बाबुल में दानिय्येल और तीनों जवानों को स्मरण कीजिए। रोम में नीरो के घराने के सन्तों को स्मरण कीजिए। प्रेरितों के दिनों में कुरिन्थुस, इफिसुस और अन्ताकिया के विश्वासियों की भीड़ को स्मरण कीजिए। मसीही को बनानेवाली वस्तु स्थान नहीं, अनुग्रह है। परमेश्वर के जो सेवक अब तक सबसे अधिक पवित्र और सबसे अधिक उपयोगी हुए हैं, वे जंगल के साधु नहीं, नगरों के निवासी थे।

इन बातों को याद रखिए और ढाढ़स बाँधिए। हो सकता है आपका भाग्य एथेन्स जैसे नगर में पड़े जो "मूरतों से भरा हुआ" था। हो सकता है आपको बैंक में, लेखा-कार्यालय में, व्यापार-स्थल पर, या दुकान में अकेले खड़ा होना पड़े।

परन्तु यदि मसीह आपके साथ है, तो आप सचमुच अकेले नहीं हैं। प्रभु में और उसकी शक्ति के प्रभाव में बलवन्त बनिए। साहसी, सच्चे, दृढ़ और धैर्यवान बनिए। वह दिन आएगा जब आप पाएँगे कि एक बड़े नगर में भी मनुष्य सुखी और उपयोगी मसीही हो सकता है, जीते जी आदर पा सकता है और मरने पर सम्मानित हो सकता है। पाद-टिप्पणियाँ:

[9] इस निबन्ध में उस उपदेश का सार है जो 1880 में ऑक्सफ़ोर्ड के सेंट मैरी गिरजाघर में विश्वविद्यालय के सामने दिया गया था।

प्रेरितों के काम 26:24-29। चित्र। [10]

"जब वह इस रीति से उत्तर दे रहा था तो फेस्तुस ने ऊँचे शब्द से कहा, हे पौलुस, तू पागल है; बहुत विद्या ने तुझे पागल कर दिया है।"

"परन्तु उसने कहा, हे महाप्रतापी फेस्तुस, मैं पागल नहीं, परन्तु सत्य और बुद्धि की बातें कहता हूँ।"

"क्योंकि राजा, जिसके सामने मैं निडर होकर बोल रहा हूँ, इन बातों को जानता है; और मुझे विश्वास है कि इन बातों में से कोई उससे छिपी नहीं, क्योंकि यह घटना कोने में नहीं हुई।"

"हे राजा अग्रिप्पा, क्या तू भविष्यद्वक्ताओं की प्रतीति करता है? हाँ, मैं जानता हूँ कि तू प्रतीति करता है।"

"तब अग्रिप्पा ने पौलुस से कहा, तू थोड़े ही समझाने से मुझे मसीही बनाना चाहता है।"

"पौलुस ने कहा, परमेश्वर से मेरी प्रार्थना यह है कि क्या थोड़े में, क्या बहुत में, केवल तू ही नहीं, परन्तु जितने लोग आज मेरी सुनते हैं, वे मेरे समान हो जाएँ, सिवाय इन बेड़ियों के।" -- प्रेरितों के काम 26:24-29।

लन्दन में चित्रों का एक संग्रह है जिसे राष्ट्रीय चित्र-दीर्घा कहते हैं। उसमें उन लगभग सभी महान पुरुषों के चित्र हैं जिन्होंने अंग्रेज़ी इतिहास में अपनी छाप छोड़ी है। उसे देखना बहुत सार्थक है। परन्तु मुझे सन्देह है कि उसमें ऐसे तीन चित्र होंगे जो उन तीन चित्रों से अधिक ध्यानपूर्वक अध्ययन के योग्य हों जिन्हें मैं इस निबन्ध में आपको दिखाने जा रहा हूँ।

बाइबल की एक उल्लेखनीय विशेषता उसकी विषय-वस्तु की समृद्ध विविधता है। वह महान प्राचीन पुस्तक, जिसने अठारह शताब्दियों से अमित्र आलोचकों के आक्रमणों को निष्फल किया है, केवल सिद्धान्त, आज्ञा, इतिहास, काव्य और भविष्यद्वाणी का भण्डार ही नहीं है। पवित्र आत्मा ने हमें मानव स्वभाव के उसके सब भिन्न-भिन्न रूपों में सजीव चित्रों की एक श्रृंखला भी दी है, जो हमारे ध्यानपूर्वक अध्ययन के योग्य है। कौन नहीं जानता कि हम प्रायः अमूर्त कथनों की अपेक्षा नमूनों और उदाहरणों से अधिक सीखते हैं?

इस निबन्ध के शीर्ष पर दिया हुआ पवित्रशास्त्र का सुप्रसिद्ध अंश मेरे आशय का उत्तम उदाहरण प्रस्तुत करता है। यह उस अध्याय का समापन है जिसमें प्रेरित पौलुस रोमी हाकिम फेस्तुस और यहूदी राजा अग्रिप्पा के सामने अपनी सफ़ाई देता है। तीन बहुत भिन्न पुरुषों के तीन चित्र हमारे सामने टँगे हैं। वे उन तीन प्रकार के मनुष्यों के नमूने हैं जो आज भी हमारे बीच दिखाई देते हैं। उनकी परम्परा कभी टूटी नहीं। बदलते फ़ैशनों, वैज्ञानिक खोजों और राजनैतिक सुधारों के होते हुए भी, हर युग में मनुष्य का भीतरी हृदय सदा एक-सा रहता है। आइए, इन तीनों चित्रों के सामने वैसे ही खड़े हों जैसे हम किसी गेन्सबरो, रेनॉल्ड्स या रॉमनी की चित्रकृति के सामने खड़े होते हैं, और देखें कि हम क्या सीख सकते हैं।

I. आइए, पहले रोमी हाकिम फेस्तुस को देखें। यही वह पुरुष है जिसने पौलुस के भाषण में अचानक बाधा डालकर ऊँचे स्वर में कहा, "हे पौलुस, तू पागल है; बहुत विद्या ने तुझे पागल कर दिया है।"

फेस्तुस निःसन्देह एक अन्यजातीय था, जो मूर्तिपूजक मन्दिर-आराधना को छोड़ किसी भी धर्म से अनजान था, जो प्रेरितों के समय में सभ्य संसार भर में फैली हुई थी। पिछले अध्याय में अग्रिप्पा से कहे गए उसके शब्दों से लगता है कि वह यहूदी धर्म और मसीही विश्वास, दोनों से बिलकुल अनजान था। उसने "अपने मत सम्बन्धी विवादों, और यीशु नाम किसी मनुष्य के विषय में, जो मर गया था, और पौलुस उसे जीवित बताता था" की बात कही (प्रेरितों के काम 25:19)। अधिक सम्भावना यही है कि रोमी साम्राज्य के ढलते युग के अनेक अभिमानी रोमियों की तरह वह सब धर्मों को मन ही मन तुच्छ समझता था, मानो वे सब समान रूप से झूठे हों, या समान रूप से सच्चे हों, और सब के सब किसी बड़े आदमी के ध्यान के योग्य न हों। और जहाँ तक किसी यहूदी का "अन्यजातियों को ज्योति" दिखाने की बात थी, यह विचार ही हास्यास्पद था! संसार से मेल बनाए रखना, मनुष्यों की कृपा पाना, दृश्य वस्तुओं को छोड़ किसी और बात की चिन्ता न करना, "मेरे स्वामी" कैसर को प्रसन्न करना, सम्भवतः पुर्कियुस फेस्तुस का पूरा धर्म यही था।

अब, क्या हमारे बीच बहुत से लोग फेस्तुस जैसे हैं? हाँ! मुझे डर है कि ऐसे हज़ारों-लाखों हैं। वे समाज के हर पद और वर्ग में मिलते हैं। वे हमारी गलियों में चलते हैं। वे रेलगाड़ियों के डिब्बों में हमारे साथ यात्रा करते हैं। वे संसार के दैनिक व्यवहार में हमसे मिलते हैं। वे जीवन के विभिन्न सम्बन्धों को आदरपूर्वक निभाते हैं। वे अक्सर अच्छे व्यापारी होते हैं और अपने चुने हुए पेशों में प्रतिष्ठित होते हैं। वे अपने पदों के अनेक कर्तव्यों को सम्मान के साथ निभाते हैं, और जब उनका स्थान खाली होता है तब अपना अच्छा नाम छोड़ जाते हैं। परन्तु फेस्तुस की तरह उनके पास कोई धर्म नहीं है!

ये वे लोग हैं जो ऐसे जीते दिखते हैं मानो उनकी कोई आत्मा ही न हो। जनवरी से दिसम्बर तक वे आनेवाले जीवन के विषय में न कुछ सोचते, न अनुभव करते, न देखते, न जानते प्रतीत होते हैं। वह उनकी योजनाओं, इरादों और हिसाब-किताब का कोई भाग नहीं है। वे ऐसे जीते हैं मानो उन्हें शरीर के सिवाय किसी बात की चिन्ता न हो, खाने, पीने, सोने, सजने, धन कमाने और धन उड़ाने के सिवाय कुछ करना न हो, और उस संसार के सिवाय, जिसे हम अपनी आँखों से देखते हैं, किसी और संसार का प्रबन्ध न करना हो।

ये वे लोग हैं जो अनुग्रह के साधनों का, चाहे सार्वजनिक हों चाहे निजी, कभी-कभार ही उपयोग करते हैं। प्रार्थना करना, बाइबल पढ़ना और परमेश्वर के साथ गुप्त सहभागिता, ये ऐसी बातें हैं जिन्हें वे तुच्छ जानकर छोड़ देते हैं। वे वृद्धों, रोगियों और मरणासन्नों के लिए, पादरी-वर्ग, भिक्षु और भिक्षुणी के लिए ठीक हो सकती हैं; परन्तु उनके लिए नहीं! यदि वे कभी किसी आराधनालय में जाते भी हैं, तो केवल औपचारिकता के लिए, ताकि आदरणीय दिखें; और प्रायः वे किसी बड़े सार्वजनिक समारोह, या विवाह, या अन्त्येष्टि के अवसर को छोड़ कभी नहीं जाते।

ये वे लोग हैं जो कहते हैं कि वे धर्म के विषय में उत्साह या गम्भीरता जैसी किसी बात को समझ ही नहीं सकते। वे मसीहियों की संस्थाओं, संगठनों, साहित्य और सुसमाचार-प्रचार के प्रयासों को, चाहे अपने देश में हों चाहे विदेश में, परम तिरस्कार की दृष्टि से देखते हैं। उनका सिद्धान्त यह है कि हर किसी को अकेला छोड़ दो। कलीसिया और विरोधी सम्प्रदाय के सापेक्ष दावे, हमारी अपनी सीमा के भीतर दलों की कलह, धर्मसभाओं, सम्मेलनों और धर्मप्रान्तीय परिषदों के वाद-विवाद, ये सब उनके लिए समान रूप से उदासीनता की बातें हैं। वे उन्हें दूर से ठण्डी दृष्टि से देखते हैं, जैसे लातीनी कवि लुक्रेतियुस द्वारा वर्णित दार्शनिक, और उन्हें दुर्बल लोगों के बचकाने संघर्ष मानते हैं, जो सुसंस्कृत मन के ध्यान के योग्य नहीं। और यदि उनकी उपस्थिति में कभी ऐसे विषय छेड़े जाएँ, तो वे किसी व्यंग्यपूर्ण टिप्पणी से, या सन्देहवाद की किसी बार-बार दोहराई गई पुरानी चतुर उक्ति से उन्हें झटक देते हैं।

क्या कोई इनकार करेगा कि हमारे चारों ओर ऐसे असंख्य लोग हैं जैसा मैंने वर्णन करने का प्रयास किया है, दयालु लोग, शायद नैतिक लोग, सुशील स्वभाव के लोग, जिनके साथ निभाना आसान है, जब तक आप धर्म का विषय न छेड़ें? इससे इनकार करना असम्भव है। उनका नाम "सेना" है, क्योंकि वे बहुत हैं। इन अन्तिम दिनों की यह प्रवृत्ति कि बुद्धि को मूर्ति बना लिया जाए, स्वतन्त्र रहने और अपने आप सोचने की इच्छा, निजी निर्णय की उपासना करने और अपनी अलग राय को ऊँचा ठहराने की प्रवृत्ति, और यह मानना कि भीड़ के साथ सही होने से कुछ लोगों के साथ ग़लत होना अधिक उत्तम और चतुराई का काम है, यह सब फेस्तुस के अनुयायियों की पंक्तियों को बढ़ाने में सहायक होता है। मुझे डर है कि वह एक बड़े वर्ग का नमूना है।

ऐसे लोग एक दुःखद दृश्य हैं। वे मुझे प्रायः मेलरोज़ या बोल्टन एबी जैसे किसी भव्य पुराने खण्डहर की याद दिलाते हैं, जहाँ सुन्दर मेहराबों, स्तम्भों, मीनारों और नक्काशीदार खिड़कियों के इतने अवशेष बचे हैं कि दिखा सकें कि वह इमारत कभी कैसी थी, और यदि परमेश्वर ने उसे न छोड़ा होता तो आज कैसी हो सकती थी। परन्तु अब सब कुछ ठण्डा, मौन और उदास है, और विनाश का सूचक है, क्योंकि घर का स्वामी, जीवन का प्रभु, वहाँ नहीं है। ठीक यही फेस्तुस के बहुत से अनुयायियों के साथ है। उनकी बौद्धिक शक्ति, उनकी वाक्-प्रतिभा, उनकी रुचि और उनके चरित्र की ऊर्जा को देखकर आप प्रायः अनुभव करते हैं, "यदि परमेश्वर को उनकी आत्मा में उसका उचित स्थान मिलता तो ये कैसे मनुष्य हो सकते थे!" परन्तु परमेश्वर के बिना सब कुछ ग़लत है। हाय, अविश्वास और अभिमान की उस कुचल देनेवाली शक्ति पर, जब वे किसी मनुष्य पर पूरा अधिकार जमा लेते हैं और उस पर बिना रोक-टोक राज्य करते हैं! इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि पवित्रशास्त्र अपरिवर्तित मनुष्य का वर्णन "अन्धा, सोया हुआ, बेसुध और मरा हुआ" कहकर करता है।

क्या फेस्तुस आज यह लेख पढ़ रहा है? मुझे डर है कि नहीं! धार्मिक पर्चे और पुस्तकें, रविवार की आराधनाओं और उपदेशों की तरह, उसकी रुचि के नहीं हैं। रविवार को फेस्तुस सम्भवतः समाचार-पत्र पढ़ता है, या अपने सांसारिक हिसाब-किताब देखता है, या मित्रों से मिलने जाता है, या यात्रा पर निकलता है, और मन ही मन चाहता है कि अंग्रेज़ी रविवार महाद्वीपीय रविवार जैसा होता और नाट्यशालाएँ और संग्रहालय खुले होते। सप्ताह के दिनों में फेस्तुस निरन्तर व्यापार, या राजनीति, या मनोरंजन में लगा रहता है, या आधुनिक समाज की तुच्छ गतिविधियों में समय बिताता है; और वह तितली की तरह जीता है, इतना बेफ़िक्र मानो मृत्यु, या न्याय, या अनन्तकाल जैसी कोई बात ही न हो। अरे नहीं: फेस्तुस यह लेख पढ़नेवाला आदमी नहीं है!

पर क्या फेस्तुस जैसा मनुष्य निराशाजनक दशा में है, और दया की पहुँच से बाहर है? नहीं, कदापि नहीं! मैं परमेश्वर का धन्यवाद करता हूँ कि वह ऐसा नहीं है। उसके स्वभाव की तह में अब भी एक विवेक है, जो चाहे कितना ही झुलस गया हो, पूरी तरह मरा नहीं है — एक ऐसा विवेक जो आधी रात को, जब नगर के कारोबार का कोलाहल थम जाता है, सेंट पॉल के बड़े घण्टे की तरह कभी-कभी अपनी आवाज़ सुना देता है। फेलिक्स, हेरोदेस, अहाब और फ़िरौन की तरह फेस्तुस के अनुयायियों पर भी देखभाल के समय आते हैं; और उनके विपरीत वे कभी-कभी बहुत देर होने से पहले जाग उठते हैं और बदले हुए मनुष्य बन जाते हैं। उनके जीवन में ऐसे समय आते हैं जब वे अपने भीतर लौटने को विवश होते हैं और "आनेवाले युग की सामर्थ्य" का अनुभव करते हैं, और पाते हैं कि नश्वर मनुष्य परमेश्वर के बिना निभ नहीं सकता। बीमारी, एकान्त, निराशाएँ, धन की हानि और प्रियजनों की मृत्यु कभी-कभी सबसे घमण्डी हृदयों को भी झुका देती हैं, और वे मान लेते हैं कि "टिड्डी भी भार बन जाती है।" मनश्शे ही अकेला नहीं है जिसने "संकट के समय" परमेश्वर की ओर फिरकर प्रार्थना करना आरम्भ किया। हाँ! मैं बहुत समय से अनुभव करता आया हूँ कि हमें किसी के विषय में भी कभी निराश नहीं होना चाहिए। आत्मिक आश्चर्यकर्मों का युग बीता नहीं है। मसीह और पवित्र आत्मा के साथ कुछ भी असम्भव नहीं। अन्तिम दिन प्रकट कर देगा कि कुछ ऐसे थे जिन्होंने फेस्तुस की तरह आरम्भ किया और उसी के समान थे, परन्तु अन्त में पलटे, मन फिराया, और पौलुस की तरह समाप्त हुए। जब तक जीवन है, हमें दूसरों के लिए आशा रखनी और प्रार्थना करनी चाहिए।

II. अब हम एक बिलकुल भिन्न चित्र की ओर मुड़ें। राजा अग्रिप्पा को देखें। यह वही मनुष्य है जो पौलुस के भाषण से इतना प्रभावित हुआ कि उसने कहा, "तू थोड़े ही समझाने से मुझे मसीही बनाना चाहता है।"

"थोड़े ही।" इस अभिव्यक्ति पर मुझे क्षणभर ठहरने दीजिए। मैं भली-भाँति जानता हूँ कि बहुत लोग मानते हैं कि बाइबल के हमारे Authorized अंग्रेज़ी अनुवाद में यहाँ चूक हुई है और वह मूल यूनानी का सच्चा अर्थ नहीं देता। वे कहते हैं कि इस वाक्यांश का अधिक सही अनुवाद होगा, "थोड़े ही समय में," अथवा "दुर्बल और निर्बल तर्क से तू मुझे समझा रहा है।" मैं साहसपूर्वक कहता हूँ कि मैं इन आलोचकों का मत स्वीकार नहीं कर सकता, यद्यपि मानता हूँ कि यह वाक्यांश कुछ अस्पष्ट है। परन्तु ऐसे प्रश्नों में मैं किसी को भी अपना स्वामी कहने का साहस नहीं करता। मैं कई उत्तम टीकाकारों के साथ, प्राचीन और आधुनिक दोनों, [11] यह मानता हूँ कि हमारे Authorized अनुवाद में दिया गया रूप सही और ठीक है। मेरे इस विश्वास को इस बात से बल मिलता है कि यही उस व्यक्ति का मत है जो नए नियम की भाषा में सोचता, बोलता और लिखता था — मेरा आशय प्रसिद्ध यूनानी पिता क्रिसोस्तम से है। और अन्त में, परन्तु कम महत्त्व का नहीं, मुझे कोई और मत प्रेरित पौलुस के अगले पद के उद्गार से मेल खाता नहीं दिखाई देता। मानो वह अग्रिप्पा के शब्द उठाकर कहता है, "थोड़े ही!" "मैं चाहता हूँ कि तू थोड़े ही नहीं, पूरा मसीही बन जाए।" इन्हीं आधारों पर मैं अपने पुराने अनुवाद के पक्ष में खड़ा हूँ।

अग्रिप्पा, जिसका चित्र अब हमारा ध्यान माँगता है, अनेक बातों में फेस्तुस से बहुत भिन्न था। यहूदी वंश का, और यहूदियों के बीच पला-बढ़ा, यदि शुद्ध यहूदी रक्त का न भी रहा हो, तो भी वह उन बहुत-सी बातों से भली-भाँति परिचित था जिनसे रोमी हाकिम बिलकुल अनजान था। वह "भविष्यद्वक्ताओं की प्रतीति" करता और उन्हें जानता था। पौलुस के भाषण की बहुत-सी बातें, जो सुनने के स्थान में उसके साथी के लिए केवल "शब्द और नाम" और बकवास कल्पनाएँ थीं, वह अवश्य समझता रहा होगा। उसके भीतर गुप्त प्रतीति थी कि उसके सामने खड़े मनुष्य के पक्ष में सत्य है। उसने देखा, अनुभव किया, प्रभावित हुआ, उसका विवेक चुभा, और उसके मन में इच्छाएँ और तीव्र लालसाएँ उठीं। पर वह इससे आगे न बढ़ सका। उसने देखा; पर उसमें कार्य करने का साहस न था। उसने अनुभव किया; पर उसमें आगे बढ़ने की इच्छा-शक्ति न थी। वह परमेश्वर के राज्य से दूर नहीं था; पर वह बाहर ही ठिठका रहा। उसने मसीही विश्वास की न निन्दा की, न उपहास किया; पर लकवे के मारे हुए मनुष्य की तरह वह उसे केवल देख और परख सकता था, और उसे थामकर अपने हृदय में ग्रहण करने का मनोबल उसमें न था।

अब क्या अग्रिप्पा जैसे बहुत से मसीही कहलानेवाले हैं? मुझे भय है कि इस प्रश्न का केवल एक ही उत्तर है। वे एक अत्यन्त विशाल सेना हैं, ऐसी भीड़ जिसकी गिनती कठिन है। वे हमारी कलीसियाओं में पाए जाते हैं और अनुग्रह के सब साधनों में नियमित रूप से उपस्थित रहते हैं। उन्हें बाइबल की सच्चाई में कोई सन्देह नहीं। उन्हें सुसमाचार के सिद्धान्तों पर तनिक भी आपत्ति नहीं। वे खरी और खोटी शिक्षा का अन्तर जानते हैं। वे पवित्र जनों के जीवन की सराहना करते हैं। वे अच्छी पुस्तकें पढ़ते हैं और भले कार्यों के लिए धन देते हैं। परन्तु दुर्भाग्य से वे अपने धर्म में एक निश्चित सीमा से आगे कभी नहीं बढ़ते। वे कभी मसीह के पक्ष में साहसपूर्वक बाहर नहीं आते, कभी क्रूस नहीं उठाते, कभी मनुष्यों के सामने मसीह को नहीं मानते, कभी छोटी-छोटी असंगतियाँ नहीं छोड़ते। वे प्रायः आपसे कहते हैं कि वे किसी दिन अधिक दृढ़ मसीही बनने का "मन बनाते हैं, इरादा रखते हैं, आशा करते हैं और संकल्प करते हैं।" वे जानते हैं कि वे अभी ठीक वैसे नहीं हैं जैसा उन्हें होना चाहिए, और आशा करते हैं कि किसी दिन वे भिन्न होंगे। पर "सुविधाजनक समय" कभी आता ही नहीं दिखता। मन बनाते और इरादा रखते हुए वे चलते जाते हैं, और मन बनाते और इरादा रखते हुए वे जगत के मंच से चले जाते हैं। मन बनाते और इरादा रखते हुए वे जीते हैं, और मन बनाते और इरादा रखते हुए, बहुधा, वे मर भी जाते हैं — दयालु, भले स्वभाव के, आदरणीय लोग; पौलुस के शत्रु नहीं, मित्र; परन्तु अग्रिप्पा की तरह "थोड़े ही मसीही।"

आप भली-भाँति पूछ सकते हैं कि ऐसा कैसे होता है कि मनुष्य धर्म में इतनी दूर तक जाकर भी आगे नहीं बढ़ते? ऐसा कैसे होता है कि वे इतना देखते और इतना जानते हैं, फिर भी जो ज्योति उनके पास है उसके पीछे "पूर्ण दिन" तक नहीं चलते? ऐसा कैसे होता है कि बुद्धि, तर्क और विवेक मसीही विश्वास की ओर इतनी प्रगति कर लेते हैं, और फिर भी हृदय और इच्छा पीछे रह जाती है?

इन प्रश्नों के उत्तर शीघ्र ही दिए जा सकते हैं। मनुष्य का भय कुछ लोगों को पीछे रोके रखता है। उन्हें इस बात का कायरतापूर्ण डर रहता है कि यदि वे दृढ़ मसीही बन गए तो उनकी हँसी उड़ाई जाएगी, उनका उपहास होगा और उन्हें तुच्छ समझा जाएगा। वे मनुष्यों की अच्छी राय खो देने का जोखिम नहीं उठा सकते। हमारे प्रभु के समय के यहूदी अगुवों में से अनेक की तरह वे "मनुष्यों की प्रशंसा को परमेश्वर की प्रशंसा से अधिक प्रिय जानते" हैं (यूहन्ना 12:43)। संसार का प्रेम औरों को पीछे रोके रखता है। वे जानते हैं कि दृढ़ धार्मिकता का अर्थ है संसार में प्रचलित कुछ फैशनेबल मनोरंजनों और समय बिताने के ढंगों से अलग होना। वे इस अलगाव के लिए अपना मन नहीं बना पाते। वे अपने बपतिस्मा की उस प्रतिज्ञा से कतराते हैं कि वे "इस संसार की धूमधाम और व्यर्थताओं का त्याग करेंगे।" लूत की पत्नी की तरह वे परमेश्वर के क्रोध से बचाए जाना तो चाहते हैं, परन्तु उसी की तरह उन्हें "पीछे मुड़कर देखना" ही है (उत्पत्ति 19:26)। आत्म-धार्मिकता का एक सूक्ष्म रूप बहुतों को पीछे रोके रखता है। वे मन ही मन यह सोचकर सन्तोष कर लेते हैं कि कम से कम वे फेस्तुस जितने बुरे तो नहीं हैं। वे उन कुछ लोगों जैसे नहीं हैं जिन्हें वे जानते हैं: वे धर्म का तिरस्कार नहीं करते। वे कलीसिया जाते हैं। वे पौलुस जैसे सच्चे मनवाले लोगों की प्रशंसा करते हैं। निश्चय ही कुछ असंगतियों के कारण वे नाश नहीं होंगे! -- दलबन्दी के रोगात्मक भय से भी बहुत लोग, विशेषकर जवान, पीछे रुके रहते हैं। उन पर यह विचार हावी रहता है कि किसी विशेष "विचार-सम्प्रदाय" से बँधे बिना वे धर्म में कोई दृढ़ मार्ग नहीं अपना सकते। यही वे नहीं करना चाहते। वे भूल जाते हैं कि अग्रिप्पा का मामला सिद्धान्त का नहीं, आचरण का है, और कर्तव्य के विषय में दृढ़ कार्यवाही ही सैद्धान्तिक सत्य के विषय में ज्योति पाने का सबसे निश्चित मार्ग है। "यदि कोई उसकी इच्छा पर चलना चाहे, तो वह इस उपदेश के विषय में जान जाएगा" (यूहन्ना 7:17)। मुझे भय है कि कोई गुप्त पाप भी अनेकों को पीछे रोके रखता है। वे अपने मन में जानते हैं कि वे किसी ऐसी वस्तु से चिपके हैं जो परमेश्वर की दृष्टि में बुरी है। उनके निजी जीवन में कहीं कोई हेरोदियास, या द्रुसिल्ला, या बिरनीके, या आकान की सोने की ईंट है, जो दिन के उजाले को सह नहीं सकती। वे इस प्रिय वस्तु को छोड़ नहीं सकते। वे दाहिना हाथ काट नहीं सकते, या दाहिनी आँख निकाल नहीं सकते, और इसलिए चेले नहीं बन सकते। हाय, इन बहानों पर! तराजू में तौले जाने पर ये निकम्मे और व्यर्थ हैं। हाय, उन पर जो इनमें विश्राम करते हैं! यदि वे जाग न उठें और अपनी बेड़ियाँ न उतार फेंकें, तो वे सदा के लिए जहाज़ के समान डूब जाएँगे।

क्या अग्रिप्पा आज यह लेख पढ़ रहा है? क्या कोई उसके समान है जिसकी आँखें इस पृष्ठ पर हैं? मसीह के एक सेवक की ओर से स्नेहपूर्ण चेतावनी लीजिए, और यह समझने का प्रयत्न कीजिए कि आप बहुत ही खतरनाक स्थिति में हैं। चाहना, अनुभव करना, मन में सोचना और इरादा करना उद्धार देनेवाला धर्म नहीं बनाते। ये तो केवल रंगे हुए कॉर्क हैं, जो आपको कुछ समय तक सतह पर तैरते रहने और सिर को पानी से ऊपर रखने में समर्थ कर सकते हैं, परन्तु वे आपको धारा में बहने से और अन्त में नियाग्रा से भी भयंकर झरने में बह जाने से नहीं रोकेंगे। और फिर भी आप सुखी नहीं हैं। आप धर्म के विषय में इतना जानते हैं कि संसार में सुखी नहीं रह सकते; आप संसार में इतने घुले-मिले हैं कि अपने धर्म से कोई शान्ति नहीं पा सकते। संक्षेप में, आप न संसार में सुखी हैं, न संसार से बाहर। अपने संकट और अपनी मूर्खता के बोध के लिए जाग उठिए। परमेश्वर की सहायता से दृढ़ होने का निश्चय कीजिए। तलवार खींचिए और म्यान फेंक दीजिए। "जिसके पास तलवार न हो, वह अपना वस्त्र बेचकर एक मोल ले" (लूका 22:36)। अपने जहाज़ जला दीजिए और सीधे आगे बढ़िए। केवल जहाज़ को देखकर उसकी प्रशंसा मत कीजिए; द्वार बन्द होने और जल-प्रलय के आरम्भ होने से पहले भीतर प्रवेश कीजिए। इतना तो धर्म के मूल सिद्धान्तों में एक स्वयंसिद्ध बात के रूप में कहा जा सकता है: "लगभग" मसीही न तो सुरक्षित मनुष्य है, न सुखी।

III. अब आइए तीनों चित्रों में से अन्तिम चित्र की ओर मुड़ें। उस मनुष्य को देखें जिसे फेस्तुस ने "बावला" समझा, और जिसके द्वारा अग्रिप्पा "लगभग मसीही बनने के लिए मना लिया गया।" आइए हम पौलुस को देखें। यही वह मनुष्य है जिसने साहसपूर्वक कहा, "मैं परमेश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि क्या थोड़े में, क्या बहुत में, केवल आप ही नहीं, परन्तु जितने लोग आज मेरी सुनते हैं, मेरे समान हो जाएँ, सिवाय इन बेड़ियों के।" वह नहीं चाहता था कि उसके सुननेवालों को ऐसी बेड़ियाँ या कारावास भोगना पड़े जैसा वह बोलते समय भोग रहा था। परन्तु वह अवश्य चाहता था कि वे उस एक आवश्यक बात के विषय में उसके समान मन के हों; और उसकी शान्ति, उसकी आशा, उसके ठोस सान्त्वना और उसकी अपेक्षाओं में सहभागी हों।

"बिलकुल मेरे समान।" कैसा गम्भीर और स्मरणीय वचन है! यह उस मनुष्य की भाषा है जो पूरी तरह आश्वस्त और निश्चित है कि वह सही है। उसने सारे सन्देह और हिचकिचाहट को जहाज़ से बाहर फेंक दिया है। वह सत्य को दोनों हाथों की दृढ़ पकड़ से थामे है, केवल उँगली और अँगूठे से नहीं। यह उसी मनुष्य की भाषा है जिसने एक स्थान पर लिखा, "मैं जानता हूँ कि मैंने किस पर विश्वास किया है, और मुझे निश्चय है कि वह मेरी धरोहर की उस दिन तक रक्षा करने में समर्थ है।" -- और दूसरे स्थान पर, "मुझे निश्चय है कि न मृत्यु, न जीवन, न स्वर्गदूत, न प्रधानताएँ, न वर्तमान, न भविष्य, न सामर्थ्य, न ऊँचाई, न गहराई, और न कोई और सृष्टि हमें परमेश्वर के प्रेम से, जो हमारे प्रभु मसीह यीशु में है, अलग कर सकेगी" (2 तीमुथियुस 1:12; रोमियों 8:38-39)।

(क) पौलुस मसीही धर्म के तथ्यों की सच्चाई के विषय में पूरी तरह आश्वस्त था। कि प्रभु यीशु मसीह वास्तव में "शरीर में प्रगट हुआ परमेश्वर" था, -- कि उसने ऐसे आश्चर्यकर्म करके अपना ईश्वरत्व प्रमाणित किया था जिन्हें नकारा नहीं जा सकता था, -- कि अन्त में वह कब्र से जी उठा और स्वर्ग पर चढ़ गया, और मनुष्य के उद्धारकर्ता के रूप में परमेश्वर के दाहिने हाथ बैठा है, -- इन सभी बातों के विषय में उसने अपना मन पूरी तरह बना लिया था, और उनकी विश्वसनीयता पर उसे लेशमात्र भी सन्देह न था। उनके लिए वह मरने को तैयार था।

(ख) पौलुस मसीही धर्म के सिद्धान्तों की सच्चाई के विषय में पूरी तरह निश्चित था। हम सब दोषी पापी हैं और अनन्त विनाश के खतरे में हैं; मसीह के जगत में आने का महान उद्देश्य हमारे पापों का प्रायश्चित करना और क्रूस पर हमारे स्थान पर दुःख उठाकर छुटकारा मोल लेना था; जो कोई मन फिराकर क्रूस पर चढ़ाए गए मसीह पर विश्वास करता है उसके सब पाप पूरी रीति से क्षमा हो जाते हैं; और परमेश्वर के साथ मेल-मिलाप तथा मृत्यु के बाद स्वर्ग पाने का मसीह पर विश्वास के सिवाय और कोई मार्ग नहीं है — इस सब पर वह अत्यन्त दृढ़ता से विश्वास करता था। अपने मन फिराव के समय से लेकर अपनी शहादत तक इन सिद्धान्तों की शिक्षा देना ही उसका एकमात्र उद्देश्य रहा।

(ग) पौलुस इस बात के विषय में भी पूरी तरह निश्चित था कि वह स्वयं पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से बदल दिया गया है और उसे नया जीवन जीना सिखाया गया है; कि मसीह के लिए समर्पित और अर्पित पवित्र जीवन ही मनुष्य के लिए सबसे बुद्धिमानी का और सबसे सुखी जीवन है; कि परमेश्वर की कृपा मनुष्य की कृपा से हज़ार गुना उत्तम है; और कि जिसने उससे प्रेम किया और अपने आप को उसके लिए दे दिया, उसके लिए कुछ भी करना अधिक नहीं है। वह अपनी दौड़ सदा “यीशु की ओर देखते हुए” दौड़ता रहा, और उसी के लिए अपने आप को खर्च करता और खर्च हो जाता रहा (इब्रानियों 12:2; 2 कुरिन्थियों 5:15, 12:15)।

(घ) अन्त में, परन्तु कम महत्त्व का नहीं, पौलुस आनेवाले जगत की वास्तविकता के विषय में भी पूरी तरह निश्चित था। मनुष्य की प्रशंसा या कृपा, इस वर्तमान जगत के प्रतिफल या दण्ड — ये सब उसके लिए कचरे के समान थे। उसकी आँखों के सामने निरन्तर वह अविनाशी मीरास और महिमा का वह मुकुट था जो कभी मुर्झाएगा नहीं (फिलिप्पियों 3:8; 2 तीमुथियुस 4:8)। वह जानता था कि उस मुकुट से उसे कोई वंचित नहीं कर सकता। फेस्तुस उसे तुच्छ जाने और “पागल” समझे; जिस रोमी सम्राट के पास वह जा रहा था वह उसका सिर कटवा दे या उसे सिंहों के आगे फिंकवा दे — तो क्या? उसे दृढ़ विश्वास था कि स्वर्ग में उसके लिए ऐसा धन रखा है जिसे न फेस्तुस छू सकता है, न कैसर, और जो अनन्तकाल तक उसी का रहेगा।

पौलुस के इन शब्दों “जैसा मैं हूँ वैसे ही हो जाएँ” का यही अर्थ था। मसीही धर्म के तथ्यों, सिद्धान्तों, आचरण और आनेवाले प्रतिफलों के विषय में उसके भीतर जड़ पकड़ी हुई, स्थिर और दृढ़ प्रतीति थी — ऐसी प्रतीति जिसमें वह सब मनुष्यों को सहभागी देखना चाहता था। वह निश्चयपूर्ण था; वह चाहता था कि दूसरे भी उसी निश्चय का आनन्द लें। अपनी आत्मा की भावी दशा के विषय में उसे न कोई सन्देह था, न कोई भय। वह चाहता था कि फेस्तुस, अग्रिप्पा, बिरनिके और उनके आसपास के सब लोग उसी सुखी दशा में हों।

अब, क्या आज के समय में पौलुस के समान बहुत लोग हैं? मेरा आशय यह नहीं कि बहुत से प्रेरित प्रेरणा पाए हुए हैं; बल्कि यह कि क्या ऐसे मसीही मिलना आम बात है जो उसके समान पूर्ण, निःसंकोच और निश्चयता से भरे हों? मुझे डर है कि इस प्रश्न का उत्तर केवल एक ही हो सकता है। चाहे धनी हों या निर्धन, ऊँचे हों या नीचे, “बहुत नहीं बुलाए गए।” — “क्योंकि सकेत है वह फाटक और सकरा है वह मार्ग जो जीवन को पहुँचाता है, और थोड़े हैं जो उसे पाते हैं” (1 कुरिन्थियों 1:26; मत्ती 7:14)। जहाँ चाहो देखो, नगर में या देहात में जहाँ चाहो खोजो, “पूरे” मसीही थोड़े ही हैं। फेस्तुस और अग्रिप्पा तो हर कहीं मिलते हैं; वे हर मोड़ पर हमें मिलते हैं। परन्तु पौलुस के पूर्ण, सारे मन से चलनेवाले अनुयायी थोड़े हैं। फिर भी एक बात अत्यन्त निश्चित है। ये थोड़े ही लोग “पृथ्वी के नमक” और “जगत की ज्योति” हैं (मत्ती 5:13-14)। ये थोड़े ही कलीसिया की शोभा हैं और उसे जीवित रखते हैं। इनके बिना कलीसिया सड़ती हुई लाश से, चूना पोती हुई कब्र से, बिना ज्योति के प्रकाश-स्तम्भ से, बिना आग के भाप-इंजन से, बिना दीपक के सोने की दीवट से कुछ ही अच्छी होती — शैतान के लिए आनन्द और परमेश्वर के लिए ठोकर।

ऐसे ही लोग जगत को हिला देते हैं और अपने पीछे अमिट छाप छोड़ जाते हैं। मार्टिन लूथर, जॉन वेस्ली और विलियम विल्बरफ़ोर्स अपने जीवनकाल में घृणा और तिरस्कार के पात्र रहे; परन्तु मसीह के लिए जो काम उन्होंने किया वह कभी भुलाया न जाएगा। वे “पूरे” मसीही थे।

ऐसे ही लोग अपने धर्म में सच्चे सुख का आनन्द लेते हैं। पौलुस और सीलास के समान वे बन्दीगृह में भजन गा सकते हैं, और पतरस के समान कब्र के ठीक किनारे पर भी चैन से सो सकते हैं (प्रेरितों के काम 12:6, 16:25)। दृढ़ विश्वास उन्हें ऐसी भीतरी शान्ति देता है जो उन्हें सांसारिक कष्टों से स्वतन्त्र कर देती है और उनके शत्रुओं तक को चकित कर देती है। तुम्हारे गुनगुने लौदीकिया के मसीहियों को अपने धर्म में थोड़ा ही सुख मिलता है। बड़ी शान्ति तो “पूरे” लोगों को ही मिलती है। मरियम के समय के पहले शहीद जॉन रॉजर्स के विषय में कहा जाता है कि जब उन्हें प्रोटेस्टेंट होने के कारण जीवित जलाया जाने वाला था, तो वे स्मिथफ़ील्ड में खम्भे की ओर ऐसे प्रसन्न चलकर गए मानो अपने विवाह में जा रहे हों। बूढ़े लैटिमर के वे खरे, साहसी शब्द, जो उन्होंने अपनी शहादत के दिन ऑक्सफ़ोर्ड की ब्रॉड स्ट्रीट में लकड़ियों में आग लगाए जाने से पहले कहे थे, आज तक नहीं भुलाए गए। उन्होंने अपने साथ दुःख उठानेवाले रिडले से पुकारकर कहा, “हियाव बाँधो भाई रिडले; आज हम परमेश्वर के अनुग्रह से इंग्लैंड में ऐसी मोमबत्ती जलाएँगे जो कभी बुझाई न जा सकेगी।” ये लोग “पूरे” मसीही थे।

जो कोई सुरक्षित रहना चाहता है और एक क्षण की सूचना पर संध्या को, मुर्गे के बाँग देने के समय, या भोर को अपने परमेश्वर से भेंट करने को तैयार रहना चाहता है — जो कोई अपने धर्म में ऐसी अनुभव की हुई शान्ति चाहता है जो बीमारियों, शोक-वियोग, दिवालियापन, क्रान्तियों और अन्तिम तुरही की ध्वनि से भी अप्रभावित रहे — जो कोई अपनी पीढ़ी में भलाई करना चाहता है और अपने आसपास सब लोगों के लिए मसीही प्रभाव का सोता बनना चाहता है, ऐसा प्रभाव जो उसके कब्र में रखे जाने के बहुत बाद तक जाना और पहचाना जाए — वह मनुष्य आज मेरी कही बात याद रखे और उसे कभी न भूले। तुम्हें अग्रिप्पा के समान “लगभग” मसीही बनकर सन्तुष्ट नहीं होना चाहिए। तुम्हें पौलुस के समान “पूरे” मसीही बनने के लिए यत्न करना, परिश्रम करना, जूझना और प्रार्थना करना चाहिए।

और अब, आओ हम इन तीनों चित्रों को आत्म-जाँच और आत्म-परीक्षा के लिए छोड़ दें। समय थोड़ा है। हमारे वर्ष तेज़ी से बीत रहे हैं। जगत बूढ़ा होता जा रहा है। महान न्यायालय शीघ्र ही आरम्भ होगा। न्यायी शीघ्र ही प्रकट होगा। हम क्या हैं? हम किसके समान हैं? हम पर यह किसकी छाप और लिखावट है? क्या फेस्तुस की, या अग्रिप्पा की, या पौलुस की?

फेस्तुस और अग्रिप्पा अब कहाँ हैं? हम नहीं जानते। उनके बाद के इतिहास पर पर्दा पड़ा हुआ है, और क्या वे वैसे ही मरे जैसे वे जिए थे, यह हम नहीं कह सकते। परन्तु पौलुस, वह "सर्वथा" मसीही, कहाँ है? इस प्रश्न का उत्तर हम दे सकते हैं। वह "मसीह के साथ है, जो बहुत ही उत्तम है" (फिलिप्पियों 1:23)। वह धर्मियों के पुनरुत्थान की बाट जोह रहा है, विश्राम के उस स्वर्गलोक में जहाँ पाप, शैतान और शोक उसे फिर कभी सता नहीं सकते। उसने अच्छी कुश्ती लड़ी है। उसने अपनी दौड़ पूरी कर ली है, उसने विश्वास की रखवाली की है। उसके लिये एक मुकुट रखा हुआ है जो वह प्रभु के प्रकट होने के उस बड़े न्याय के दिन पाएगा (2 तीमुथियुस 4:7-8)।

और आओ, हम परमेश्वर का धन्यवाद करें, कि यद्यपि पौलुस मर चुका और चला गया, तौभी जिस उद्धारकर्ता ने पौलुस को वैसा बनाया जैसा वह था, और अन्त तक उसे थामे रखा, वह अब भी जीवित है और कभी नहीं बदलता, -- सदा बचाने में समर्थ, सदा ग्रहण करने को तैयार। यदि अब तक हमने अपनी आत्माओं के साथ खिलवाड़ किया है, तो बीता हुआ समय हमारे लिये बहुत हो। आओ, हम नया पन्ना पलटें। यदि हमने पहले कभी आरम्भ नहीं किया, तो उठें और मसीह के साथ आरम्भ करें। यदि हम उसके साथ आरम्भ कर चुके हैं, तो अन्त तक मसीह के साथ आगे बढ़ते जाएँ। परमेश्वर के अनुग्रह से कुछ भी असम्भव नहीं। कौन सोच सकता था कि शाऊल फरीसी, मसीहियों को सतानेवाला, कभी स्वयं "सर्वथा मसीही" बन जाएगा, अन्यजातियों का महान प्रेरित बनेगा, और जगत को उलट-पुलट कर देगा? जब तक जीवन है तब तक आशा है। फेस्तुस और अग्रिप्पा के अनुयायी भी अब तक मन फिरा सकते हैं, और वर्षों जीवित रह सकते हैं, और अन्त में पौलुस के समान "सर्वथा" मसीही होकर कब्र में लेट सकते हैं।

पाद-टिप्पणियाँ:

[10] इस लेख में उस उपदेश का सार है जो अप्रैल 1881 में ऑक्सफ़ोर्ड के सेंट मैरी में विश्वविद्यालय के सामने, और लन्दन के सेंट जेम्स के रॉयल चैपल में दिया गया था।

[11] लूथर, बीज़ा, ग्रोशियस, पूल, बेंगेल, स्टियर, और डीन हाउसन।

"किसके पास?" [12]

"शमौन पतरस ने उसको उत्तर दिया, कि हे प्रभु, हम किसके पास जाएँ? अनन्त जीवन की बातें तो तेरे ही पास हैं।" -- यूहन्ना 6:68।

जिस अध्याय में इस पृष्ठ का पाठ-वचन आता है, वह विषय-वस्तु में अनोखे रूप से समृद्ध है।

हमें स्मरण रखना चाहिए कि यह उस सुप्रसिद्ध आश्चर्यकर्म से आरम्भ होता है, अर्थात् पाँच रोटियों और दो मछलियों से पाँच हज़ार पुरुषों को खिलाना, -- एक ऐसा आश्चर्यकर्म जिसे कुछ आरम्भिक लेखक मसीह के सब कामों में सबसे बड़ा कहते हैं, -- एकमात्र ऐसा आश्चर्यकर्म जिसे चारों सुसमाचार-लेखकों ने समान रूप से लिखा है, -- एक ऐसा आश्चर्यकर्म जिसमें सृजनात्मक सामर्थ्य प्रकट हुई।

यह आगे हमें एक और आश्चर्यकर्म दिखाता है जो कुछ कम उल्लेखनीय नहीं, अर्थात् गलील की झील के जल पर मसीह का चलना, -- एक ऐसा आश्चर्यकर्म जिसमें हमारे प्रभु की वह सामर्थ्य प्रकट हुई कि जब वह उचित समझे तब तथाकथित प्रकृति के नियमों को स्थगित कर दे। उसके लिये जल पर चलना उतना ही सहज था जितना आदि में स्थल और समुद्र को रचना।

फिर यह अध्याय हमें कफरनहूम के आराधनालय के उस अद्भुत प्रवचन तक ले जाता है, जिसे चारों सुसमाचार-लेखकों में से केवल यूहन्ना ही को जगत को देने की प्रेरणा मिली। मसीह, जीवन की सच्ची रोटी, -- उन सबके विशेषाधिकार जो उसके पास आते और विश्वास करते हैं, -- मसीह का मांस खाने और मसीह का लहू पीने का गम्भीर भेद, और वह जीवन जो वह मांस और लहू पहुँचाता है, -- यहाँ सत्य की कितनी बहुमूल्य सम्पदा भरी है! चौथे सुसमाचार का कलीसिया पर कितना बड़ा ऋण है!

और अन्त में, जब अध्याय समाप्ति पर आता है, तो हमें उत्साही हृदयवाले प्रेरित पतरस का वह उदात्त उद्गार मिलता है, -- "हे प्रभु, हम किसके पास जाएँ? अनन्त जीवन की बातें तो तेरे ही पास हैं।" इस उल्लेखनीय वचन में तीन बातें हैं जिन पर मैं अब उन सब का ध्यान दिलाना चाहता हूँ जिनके हाथों में यह लेख पहुँचे।

I. पहले, मैं आपसे इन शब्दों के कहे जाने के अवसर पर ध्यान देने को कहता हूँ। इस उग्र, आवेगशील चेले को "हम किसके पास जाएँ?" यह पुकारने पर किस बात ने विवश किया? हमारे पाठ-वचन से पहले के वचन इसका उत्तर देते हैं। "इस पर उसके चेलों में से बहुत से उल्टे फिर गए और उसके साथ न चले। तब यीशु ने उन बारहों से कहा, क्या तुम भी चले जाना चाहते हो?"

यहाँ आपके सामने एक शोकजनक और अत्यन्त शिक्षाप्रद तथ्य लिखा है। स्वयं मसीह से भी, जो "ऐसा बोला जैसा कोई मनुष्य नहीं बोला," और जिसने अनुपम सामर्थ्य के काम किए, और ऐसा जीवन जिया जैसा किसी ने कभी नहीं जिया, पवित्र, निर्दोष, निष्कलंक और पापियों से अलग, स्वयं मसीह से भी, कुछ समय तक उसके पीछे चलने के बाद, बहुत से चले गए। हाँ! बहुत से, थोड़े नहीं, आश्चर्यकर्मों और उपदेशों की उस दोपहर की चकाचौंध में, जैसे पृथ्वी ने पहले न कभी देखे थे न सुने थे, बहुत से मसीह से मुड़ गए, उसे छोड़ गए, उसकी धन्य सेवा त्याग दी, और लौट गए, -- कुछ यहूदी धर्म की ओर, कुछ संसार की ओर, और कुछ, हमें डर है, अपने पापों की ओर। "जब हरे वृक्ष के साथ ऐसा करते हैं, तो सूखे के साथ क्या न किया जाएगा?" यदि मनुष्य मसीह को छोड़ सकते थे, तो इन अन्तिम दिनों में यदि उसके भूल करनेवाले, निर्बल सेवकों को भी छोड़ दिया जाए तो हमें चकित होने का कोई अधिकार नहीं।

परन्तु ये लोग क्यों लौट गए? उनमें से कुछ सम्भवतः इसलिये लौट गए कि उन्होंने मूल्य का हिसाब नहीं लगाया था, और "जब वचन के कारण क्लेश या उपद्रव उठा" तो वे ठोकर खा गए। उनमें से कुछ इसलिये लौट गए कि उन्होंने हमारे प्रभु के राज्य के स्वरूप को बिलकुल गलत समझा था, और केवल सांसारिक लाभों और पुरस्कारों के सपने देखे थे। परन्तु अधिकांश, यह बहुत स्पष्ट है, इसलिये लौट गए कि वे उस गम्भीर सिद्धान्त को ग्रहण न कर सके जो अभी-अभी घोषित हुआ था, -- मेरा आशय इस सिद्धान्त से है कि "मसीह का मांस खाना और मसीह का लहू पीना" उद्धार के लिये नितान्त आवश्यक है। यह वही पुरानी कहानी है। जैसा आदि में था, वैसा ही अन्त तक होगा। मनुष्य के अन्धकारमय, स्वाभाविक हृदय को किसी बात से इतनी अरुचि नहीं जितनी तथाकथित "लहू के धर्मशास्त्र" से। कैन अपनी घमण्डी अज्ञानता में प्रतिनिधिक बलिदान के विचार से मुड़ गया, और जो यहूदी हमारे प्रभु से अलग हो गए, वे "लौट गए" जब उन्होंने सुना कि उन्हें मनुष्य के पुत्र का "मांस खाना और लहू पीना" होगा।

परन्तु इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि इन यहूदियों के समान "पीछे हट जानेवालों" के अनुयायियों और अनुकरण करनेवालों की कभी कमी नहीं रही। किसी भी स्थिति में उनकी परम्परा कभी समाप्त नहीं हुई। हर युग में लाखों लोग बपतिस्मा के द्वारा कलीसिया में सम्मिलित किए गए हैं और उन्होंने मसीही होने का दावा करते हुए जीवन आरम्भ किया है, और फिर वयस्क होने पर उन्होंने मसीह और मसीही विश्वास से सर्वथा मुँह फेर लिया है। "मसीह के विश्वासयोग्य सैनिक और सेवक बने रहने" के बदले वे पाप, संसार और अविश्वास के दास बन गए हैं। यह विचलन निरन्तर होता रहता है; यह एक पुराना रोग है, और इससे हमें चकित नहीं होना चाहिए। हृदय सदा छली और असाध्य रूप से दुष्ट है; शैतान सदा सक्रिय है और ढूँढ़ता फिरता है कि किसे फाड़ खाए; संसार सदा फँसाता रहता है; जीवन का मार्ग सकरा है, शत्रु बहुत हैं, मित्र थोड़े हैं, कठिनाइयाँ बड़ी हैं, क्रूस भारी है, और सुसमाचार का सिद्धान्त स्वाभाविक मनुष्य को अप्रिय लगता है। कौन विचारशील व्यक्ति इस पर आश्चर्य करेगा कि हर युग में असंख्य लोग मसीह से पीछे हट जाते हैं? वे बचपन में कलीसिया के बाहरी बाड़े में लाए जाते हैं, और फिर जब वे पुरुष बनते हैं तो सारा धर्म त्याग देते हैं, और जंगल में दयनीय रीति से नष्ट हो जाते हैं।

फिर भी मैं साहसपूर्वक कहता हूँ कि मसीह से पीछे हटने की प्रवृत्ति इन दिनों के समान पहले कभी इतनी प्रबल नहीं थी। जीवित मसीही विश्वास के विरुद्ध आपत्तियाँ पहले कभी इतनी अधिक, इतनी विश्वासोत्पादक और इतनी भ्रामक नहीं थीं। क्योंकि यह स्वतन्त्र विचार और कार्य की स्वतन्त्रता का युग है, वैज्ञानिक खोज का युग है, और प्राचीन मतों पर प्रश्न उठाने तथा उनसे जिरह करने के संकल्प का युग है; यह सुख की लालसापूर्ण खोज और संयम के प्रति अधीरता का युग है; यह बुद्धि की मूर्तिपूजा और तथाकथित चतुराई की अतिशयोक्तिपूर्ण प्रशंसा का युग है; यह एथेन्सवासियों के समान नवीनता की लालसा और परिवर्तन के निरन्तर प्रेम का युग है; यह वह युग है जब हम चारों ओर एक निडर किन्तु सदा बदलते रहनेवाला संशयवाद देखते हैं, जो कभी हमें बताता है कि मनुष्य बन्दर से बहुत अधिक अच्छा नहीं है, और कभी यह कि वह देवता से बहुत कम नहीं है; यह वह युग है जब अविश्वास के पक्ष में सबसे उथले तर्कों को स्वीकार करने की रुग्ण तत्परता है, और साथ ही ईश्वरीय प्रकाशन के महान मूलभूत प्रमाणों की जाँच करने की आलसी अनिच्छा भी। और सबसे बुरा यह कि यह झूठी उदारता का युग है, जब "कोई दलबन्दी नहीं! कोई कट्टरता नहीं!" जैसे ऊँचे सुनाई देनेवाले शब्दों की आड़ में लोग बिना किसी स्पष्ट मत के जीते और मरते हैं। ऐसे युग में, क्या कोई विचारशील मसीही इस पर आश्चर्य कर सकता है कि मसीह से विमुख होना आम बात है? वह आश्चर्य करना छोड़े, और अपना समय शिकायतों में व्यर्थ न गँवाए। वह इसके बदले पुरुष की नाई कमर कसे, और इस महामारी को रोकने के लिए जो कुछ कर सकता है करे। वह "पुराने मार्गों" में अपने पाँव दृढ़ता से जमाए, और स्मरण रखे कि जो विचलन वह देखता है वह केवल एक पुरानी बीमारी का बढ़ा हुआ रूप है। वह मरे हुओं और जीवितों के बीच खड़ा हो, और इस हानि को रोकने का प्रयत्न करे। वह "गला खोलकर पुकारे, और न रुके।" वह कहे, "अपने झण्डे के नीचे डटे रहो; मसीही विश्वास की लड़ाई हारी नहीं है: क्या तुम भी चले जाना चाहते हो?"

मैं यह मानने का साहस करता हूँ कि बहुत से युवा, जिनके हाथों में यह लेख पड़े, प्राय: मसीह से पीछे हट जाने की प्रबल परीक्षा में पड़ते हैं। तुम शायद शान्त घरों से संसार में निकलते हो, जहाँ मसीही विश्वास के मूल सत्यों पर एक क्षण के लिए भी प्रश्न नहीं उठाया गया था, और वहाँ तुम सब प्रकार के विचित्र सिद्धान्त सुनते हो और विचित्र मत प्रस्तुत किए जाते देखते हो, जो उन पुराने सिद्धान्तों का खण्डन करते हैं जिन पर विश्वास करना तुम्हें सिखाया गया था। तुम आश्चर्य के साथ पाते हो कि स्वतन्त्र विचार और पवित्र विषयों के प्रति स्वच्छन्द व्यवहार इस सीमा तक पहुँच गया है कि विश्वास की नींव ही हिलती हुई प्रतीत होती है। तुम चकित होकर जान लेते हो कि चतुराई और धर्म सदा साथ-साथ नहीं चलते, और यह सम्भव है कि सबसे ऊँची बुद्धि भी परमेश्वर को उसके अपने ही संसार से निकाल बाहर करने को तत्पर हो। यदि यह स्थिति बहुत से युवाओं के कोमल विश्वास के लिए एक कठोर आघात हो, और उसके नीचे लड़खड़ाते हुए वे मसीह से पीछे हट जाने और मसीही विश्वास को सर्वथा त्याग देने की परीक्षा में पड़ें, तो कौन आश्चर्य कर सकता है?

अब यदि कोई जो यह लेख पढ़ता है इस प्रकार परीक्षा में पड़ा हो, तो मैं मसीह के नाम पर उससे विनती करता हूँ कि दृढ़ रहे, पुरुषार्थ दिखाए, और परीक्षा का सामना करे। यह समझने का प्रयत्न करो कि जिस स्थिति ने अब तुम्हें व्याकुल किया है उसमें कुछ भी नया नहीं है। यह वही पुराना रोग है जिसने हर युग में कलीसिया को सताया और परखा है, उसी दिन से जब शैतान ने हव्वा से कहा था, "तुम निश्चय न मरोगे।" यह केवल वह छँटाई की प्रक्रिया है जिसकी परमेश्वर अनुमति देता है, ताकि गेहूँ को भूसे से अलग किया जाए, और जिससे होकर हम सबको निकलना है। संसार, अपने गड्ढों और आत्मा के लिए बिछाए गए फन्दों के साथ, अपनी प्रतिस्पर्धाओं और संघर्षों, अपनी असफलताओं और सफलताओं, अपनी निराशाओं और उलझनों, अपने कच्चे सिद्धान्तों और अतिवादी मतों की निरन्तर उपज, अपने मानसिक द्वन्द्वों और चिन्ताओं, अपने उन्मुक्त स्वतन्त्र विचार और उतने ही उन्मुक्त अन्धविश्वास के साथ—संसार एक धधकती भट्ठी और अग्नि-परीक्षा है, जिससे होकर सब विश्वासियों को निकलने का मन बना लेना चाहिए। अपना पहला विश्वास त्याग देने और मसीह से पीछे हट जाने की परीक्षा देर-सबेर तुम्हारे सामने अवश्य आएगी, जैसे वह किसी न किसी रूप में पहले लाखों के सामने आई है। यह समझ लेना कि उसका सामना करके तुम केवल आत्मा के एक पुराने और बार-बार पराजित शत्रु का सामना कर रहे हो, आधी लड़ाई जीत लेना है।

और जैसे मैं तुमसे कहता हूँ कि मसीह को छोड़ देने की परीक्षा से चकित न हो, वैसे ही मैं तुमसे यह भी विनती करता हूँ कि उससे डगमगाओ मत। क्या हुआ यदि तुम्हारे जाननेवाले दर्जनों लोग आक्रमण के सामने झुक जाते हैं, अपना मसीही कवच उतार फेंकते हैं, अपनी बाइबल की उपेक्षा करते हैं, अपने रविवारों का दुरुपयोग करते हैं, और व्यवहार में संसार में परमेश्वर के बिना जीते हैं? क्या हुआ यदि चतुर लोग, आशाजनक लोग, ऐसे माता-पिता के पुत्र, जिन्होंने कभी ऐसी बातों की कल्पना भी न की थी, उस झण्डे को छोड़ देते हैं जिसके नीचे उनका नाम लिखा गया था, और निरे अविश्वासी बन जाते हैं, या किसी बात पर विश्वास नहीं करते? इनमें से कोई भी बात तुम्हें विचलित न करे। यरूशलेम की ओर अपना मुख चकमक पत्थर के समान कर लो। पुराने मार्गों में, स्वर्गीय नगर तक जानेवाले उस भले और परखे हुए मार्ग में, अपना पाँव दृढ़ता से जमा लो।

पतरस, याकूब और यूहन्ना के अनुयायियों की तुलना में भाग जानेवालों के पास दिखाने को कौन-सा फल है? भीतरी शान्ति और बाहरी उपयोगिता में कौन-सी बढ़ोतरी? विवेक का कौन-सा चैन? परीक्षा में कौन-सी सान्त्वना? नहीं! जब बहुत-से लोग मसीह को छोड़कर चले जाते हैं, तब तुम दृढ़ मन से उससे लिपटे रहो। प्रतिदिन की प्रार्थना और प्रतिदिन बाइबल पढ़ने की अपनी पुरानी आदतों से, और अनुग्रह के साधनों में नियमित उपस्थिति से लिपटे रहो। कुछ थोड़े लोगों के साथ मसीह के पक्ष में रहना, और कुछ समय तक हँसी और तिरस्कार सहना, हज़ार गुना उत्तम है, उस बात से कि थोड़े-से अल्प वर्षों के लिए बहुतों की प्रशंसा मिले, और फिर बहुत देर से जागकर यह पता चले कि मसीह के बिना तुम्हारे पास न शान्ति है, न आशा, न स्वर्ग।

II. दूसरी बात यह कि आओ, उस प्रश्न पर विचार करें जो पतरस ने अपने स्वामी की पुकार के उत्तर में पूछा: "क्या तुम भी चले जाना चाहते हो?" उस उत्साही और आवेगशील प्रेरित ने पुकारकर कहा, "हे प्रभु, हम किसके पास जाएँ?" बाइबल के सैकड़ों प्रश्नों की तरह यह प्रश्न भी निःसन्देह एक दृढ़ कथन के बराबर था। "तेरे सिवाय कोई नहीं जिसके पास हम जा सकें।" यह दाऊद के उस कथन के समान है, "स्वर्ग में मेरा और कौन है? तेरे संग रहते हुए मैं पृथ्वी पर और कुछ नहीं चाहता" (भजन संहिता 73:25)।

जब हम उस युग का विचार करते हैं जिसमें पतरस जीवित था, तो यह अनुभव किए बिना नहीं रह सकते कि उसके पास यह प्रश्न पूछने का भरपूर कारण था। उसके दिनों में, चार हज़ार वर्ष के अन्त पर, "संसार ने अपनी बुद्धि से परमेश्वर को नहीं जाना" (1 कुरिन्थियों 1:21)। मिस्र, अश्शूर, यूनान और रोम, जो राष्ट्र सांसारिक बातों में सबसे ऊँची उत्कृष्टता तक पहुँचे थे, वे धर्म की बातों में घोर अन्धकार में डूबे हुए थे। अनुपम इतिहासकारों, दुखान्त नाटककारों, कवियों, वक्ताओं और वास्तुकारों के देशवासी मूर्तियों की पूजा करते और अपने ही हाथों की बनाई वस्तुओं के आगे दण्डवत् करते थे। यूनान और रोम के सबसे योग्य दार्शनिक अन्धों की तरह सत्य को टटोलते रहे, और द्वार ढूँढ़ने में व्यर्थ थक गए। सारी पृथ्वी आत्मिक अज्ञान और अनैतिकता से अशुद्ध थी, और सबसे बुद्धिमान मनुष्य भी यूनानी दार्शनिक प्लेटो की तरह केवल अपनी ज्योति की आवश्यकता मान सकते थे, और किसी छुड़ानेवाले के लिए कराहते और आहें भरते थे। पतरस का यह पुकारना ठीक ही था, "हे प्रभु, यदि हम तुझे छोड़ दें, तो किसके पास जाएँ?"

सचमुच, यदि वह प्रेरित 1854 वर्ष पहले कफरनहूम के आराधनालय से भाग जानेवालों के साथ चला जाता और मसीह को छोड़ देता, तो मन की शान्ति, विवेक के सन्तोष और आनेवाले संसार की आशा के लिए वह कहाँ मुड़ता! क्या वह जो चाहता था उसे औपचारिक फरीसियों में पाता, या सन्देहवादी सदूकियों में, या सांसारिक हेरोदियों में, या तपस्वी एस्सेनियों में, या एथेंस, सिकन्दरिया अथवा रोम की दार्शनिक पाठशालाओं में? क्या गमलीएल, या कैफा, या स्तोइक, या एपिक्यूरी, या प्लेटोवादी उसकी आत्मिक प्यास बुझाते, या उसकी आत्मा को खिलाते? ऐसे प्रश्न पूछना समय गँवाना है। ज्ञान के ये सब दिखावटी सोते बहुत पहले मनुष्यों के बनाए हुए हौद, फूटे हुए हौद सिद्ध हो चुके थे, जो पानी नहीं रोक सकते थे। उन्होंने किसी चिन्तित मन को सन्तुष्ट नहीं किया। जो इन जलों को पीता, वह शीघ्र फिर प्यासा होता।

परन्तु पतरस ने जो प्रश्न पूछा, वह ऐसा है जिसे सच्चे मसीही जब मसीह के पास से चले जाने की परीक्षा में पड़ें, तब सदा साहस से पूछ सकते हैं। आज के दिन भी, जब लोग हमसे कहते हैं कि मसीही धर्म निर्बल और घिसा-पिटा है, तो हम निडर होकर उन्हें चुनौती दे सकते हैं कि हमें कुछ इससे अच्छा दिखाएँ। यदि वे चाहें तो प्रकाशित धर्म पर आपत्तियाँ उठाकर हमें घेर सकते हैं, और बहुत-सी ऐसी बातें कह सकते हैं जिनका हम कोई उत्तर नहीं दे सकते। परन्तु अन्त में हम पूरे भरोसे के साथ उन्हें चुनौती दे सकते हैं कि वे हमें "और भी उत्तम मार्ग" दिखाएँ, और उस मनुष्य की भूमि से अधिक ठोस भूमि दिखाएँ जो केवल सारी बाइबल पर विश्वास करता और मसीह के पीछे चलता है।

क्षण भर के लिए मान लो कि दुर्बलता की घड़ी में हम मसीह से दूर जाने की परीक्षा की बात सुन लें। मान लो कि हम अपनी बाइबलें बन्द कर दें, सब धर्म-सिद्धान्तों को ठुकरा दें, और अपने पूर्वजों के जीवाश्म बन चुके धर्मविज्ञान के प्रति महान तिरस्कार रखकर, किसी चमकदार "कुछ-भी-न-मानने" के मत से, या ठण्डी औपचारिकता के कुछ टुकड़ों से सन्तोष कर लें। हम किस बात में पाएँगे कि हमारा सुख या उपयोगिता बढ़ी है? जो कुछ हमने छोड़ा उसकी जगह कौन-सी ठोस वस्तु हमें मिलेगी? एक बार मसीह की ओर पीठ फेरकर देखो, तब तुम्हारे विवेक के लिए शान्ति, कर्तव्य के लिए बल, परीक्षा के विरुद्ध सामर्थ्य, संकट में सान्त्वना, मृत्यु की घड़ी में सहारा, और क़ब्र की ओर देखते हुए आशा कहाँ पाओगे? तुम ठीक ही पूछ सकते हो। "कुछ-भी-न-मानने" का मत कोई उत्तर नहीं दे सकता। ये बातें केवल उन्हें मिलती हैं जो क्रूस पर चढ़ाए गए और जी उठे मसीह में विश्वास का जीवन जीते हैं।

सचमुच, यदि हम मसीह की ओर पीठ फेर लें, तो सहायता, बल और सान्त्वना के लिए किसके पास जाएँ? हम चाहे या न चाहें, हम संकटों के संसार में जीते हैं। तुम उन्हें न टाल सकते हो, न रोक सकते हो, जैसे राजा कन्यूट समुद्र की लहर को राजसिंहासन के चारों ओर चढ़ने और उमड़ने से न रोक सका। हमारे शरीर हज़ारों रोगों के और हमारे हृदय हज़ारों दुःखों के शिकार हो सकते हैं। पृथ्वी पर कोई प्राणी इतना घायल होने योग्य, और इतने तीव्र शारीरिक तथा मानसिक कष्ट के योग्य नहीं जितना मनुष्य है। बीमारी, मृत्यु, अन्त्येष्टियाँ, बिछोह, अलगाव, हानियाँ, असफलताएँ, निराशाएँ और घरेलू निजी परीक्षाएँ, जिन्हें कोई नश्वर आँख नहीं देखती, समय-समय पर हम पर टूट पड़ेंगी; और मानव स्वभाव अत्यन्त आवश्यक रूप से माँगता है कि उनका सामना करने को सहायता, सहायता, सहायता मिले! हाय, यदि हम मसीह को छोड़ दें, तो प्यासा, विलाप करता मानव स्वभाव ऐसी सहायता कहाँ पाएगा?

सीधी सच्चाई यह है कि सर्वशक्तिमान व्यक्तिगत मित्र को छोड़ और कोई भी मनुष्य की आत्मा की उचित आवश्यकताओं को कभी पूरा नहीं कर सकता। तत्त्वमीमांसा की धारणाएँ, दार्शनिक सिद्धान्त, अमूर्त विचार, और "अदृश्य, अनन्त, अन्तर्ज्योति" आदि के विषय में अस्पष्ट अटकलें कुछ चुने हुए थोड़े से लोगों को कुछ समय के लिए सन्तुष्ट कर सकती हैं। परन्तु मनुष्यों का विशाल बहुमत, यदि उनका कोई धर्म है भी, तो उस धर्म से कभी सन्तुष्ट न होगा जो उन्हें कोई ऐसा व्यक्ति न दे जिसकी ओर वे देख सकें और जिस पर भरोसा रख सकें। व्यक्ति की यही लालसा रोम की मरियम-पूजा को उसकी विचित्र शक्ति देती है। और जब यह सिद्धान्त एक बार मान लिया जाए, तो बाइबल के मसीह जैसा कोई और कहाँ मिलेगा जो मनुष्य को इतनी पूर्णता से सन्तुष्ट कर सके? सारे संसार पर दृष्टि डालो, और यदि हो सके तो कोई ऐसा विश्वास का विषय बताओ जिसकी तुलना परमेश्वर के इस धन्य पुत्र से की जा सके, जिसे सुसमाचारों में हमारी आँखों के सामने प्रस्तुत किया गया है। एक मरते हुए संसार के सामने हमें निषेध नहीं, सकारात्मक बातें चाहिए। "यदि हम मसीह को छोड़कर चले जाएँ, तो किसके पास जाएँ?"

लोग चाहें तो हमसे कह सकते हैं कि हमारा जीवित जल का पुराना सोता सूख रहा है, और उन्नीसवीं शताब्दी को एक नए धर्मविज्ञान की आवश्यकता है। पर मुझे इस दावे की पुष्टि करनेवाला कोई प्रमाण नहीं दिखता। मैं देखता हूँ कि 1800 वर्षों के बाद भी सारे संसार में असंख्य स्त्री-पुरुष इसी सोते से पीते चले आ रहे हैं; और जो सच्चाई से झुककर पीते हैं, उनमें से कोई शिकायत नहीं करता कि उसकी प्यास नहीं बुझी। और इस सारे समय में, जो लोग इस भले पुराने सोते को तुच्छ समझने का दावा करते हैं, वे इसका स्थान लेने के लिए कुछ भी नहीं दिखा सकते। जिस मानसिक स्वतन्त्रता और उच्चतर ज्योति का वे वचन देते हैं, वह अफ्रीकी मरुभूमि की मृगतृष्णा के समान धोखा देनेवाली और स्वप्न के समान असत्य है। पुराने सोते का कोई विकल्प मनुष्य की कल्पना के सिवा कहीं नहीं है। जो इसे छोड़ेगा, उसे लौटना पड़ेगा, नहीं तो प्यास से नाश होना पड़ेगा। सम्भव है मेरे कुछ युवा पाठक मन ही मन सोचते हों कि प्रकाशित धर्म की कठिनाइयाँ अव्याख्येय हैं, और अपने आप को यह समझाने का प्रयत्न कर रहे हों कि इन अँधेरे और बादलों से घिरे दिनों में वे नहीं जानते कि "कहाँ जाएँ।" मैं उनसे विनती करता हूँ कि वे विचार करें कि अविश्वास की कठिनाइयाँ विश्वास की कठिनाइयों से कहीं अधिक बड़ी हैं। जब लोग बाइबल के पुराने मार्गों को नीचा दिखाने और तुम्हें मसीह से दूर खींचने के लिए जो कुछ कह सकते हैं कह चुकें, जब वे पाठभेदों, संदिग्ध लेखकत्व, परस्पर विरोधी कथनों और कथित अविश्वसनीय चमत्कारों की प्राचीन, घिसी-पिटी आपत्तियों का ढेर लगा चुकें, तब भी वे पवित्रशास्त्र का कोई विकल्प नहीं दे सकते, न इस प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं, "हम किसके पास जाएँ?" तब भी यह विशाल और स्पष्ट तथ्य बना रहता है कि प्रकाशन के मुख्य प्रमाण कभी उलटे नहीं गए, कि हम एक दुःखी संसार में निर्बल प्राणी हैं, और हमें सहायक हाथ की आवश्यकता है, जिसे केवल मसीह बढ़ाता है, और जिसे अठारह शताब्दियों से लाखों लोगों ने पर्याप्त पाया है, और पा रहे हैं। सम्भावना का महान तर्क पूरी तरह हमारे पक्ष में है। निश्चय ही मसीह और मसीही धर्म से, उसकी सारी कथित कठिनाइयों के साथ, चिपके रहना अनिश्चितताओं के सागर में उतरने से कहीं अधिक बुद्धिमानी है, जहाँ मनुष्य निराश और सान्त्वनाहीन होकर, और अदृश्य संसार के विषय में कुछ भी न जानने का दावा करते हुए कब्र की ओर बढ़ता है।

और सब कुछ कहने के बाद भी, कुछ सिद्धान्तों की कथित कठोरता के कारण मसीह को छोड़ देने से मानसिक संघर्षों से कोई छुटकारा नहीं मिलेगा। मसीही धर्म की समस्याएँ बड़ी और गहरी लग सकती हैं; पर अविश्वास की समस्याएँ उनसे भी बड़ी और गहरी हैं। और सबसे छोटी समस्या यह नहीं है कि इस प्रश्न का उत्तर देना असम्भव है, "यदि मैं मसीह को छोड़ दूँ, तो क्या मुझे कहीं और सच्ची शान्ति या आत्मा का विश्राम मिलेगा? मैं किसके पास जाऊँ? सारे संसार में यीशु पर विश्वास के मार्ग से उत्तम मार्ग मुझे कहाँ मिलेगा? वह व्यक्तिगत मित्र कहाँ है जो उसका स्थान ले सके?" मुझे हज़ार बार इसके बदले पुराना सुसमाचारीय मसीही धर्म दीजिए, उसके सभी कठिन तथ्यों और सिद्धान्तों के साथ, देहधारण, प्रायश्चित, पुनरुत्थान, स्वर्गारोहण, न कि सोसीनियन या ईश्वरवादी का ठण्डा, बंजर मत, या आधुनिक अविश्वास के उदास निषेध। मुझे पदों और भजनों और सरल विश्वास का वह धर्म दीजिए, जो हज़ारों को सन्तुष्ट करता है, न कि चिन्तनात्मक दर्शन का वह नीरस शून्य, जो किसी को भी पूरी तरह सन्तुष्ट नहीं करता।

3. अन्त में, आइए हम उस उत्तम घोषणा पर विचार करें जो शमौन पतरस हमारे पाठ में करता है। "अनन्त जीवन की बातें तेरे ही पास हैं।"

मैं एक क्षण के लिए भी यह नहीं मानता कि प्रेरित ने यहाँ प्रयुक्त शब्दों का पूरा अर्थ समझ लिया था। हमारे प्रभु के पुनरुत्थान से पहले उसके ज्ञान के विषय में हम जो कुछ पढ़ते हैं, उसे देखते हुए ऐसा मानना असंगत होगा। इसमें भी सन्देह किया जा सकता है कि उसका अभिप्राय इससे अधिक कुछ था: "तू सच्चा मसीहा है; तू मूसा के समान प्रतिज्ञा किया हुआ भविष्यद्वक्ता है, जिसके विषय में लिखा है, मैं अपना वचन उसके मुँह में डालूँगा, और जो कुछ मैं उसे आज्ञा दूँगा वही वह उनसे कहेगा" (व्यवस्थाविवरण 18:18)। मेरा विश्वास है कि वह प्रसिद्ध पद पतरस के मन में था, यद्यपि वह अभी उसके अर्थ की समृद्धि को समझ नहीं पाया था।

परन्तु एक बात के विषय में हम बहुत निश्चित हो सकते हैं। "अनन्त जीवन" यह वाक्यांश उसके और सब बारहों के लिए बहुत परिचित रहा होगा, जब यीशु उनके बीच आता-जाता था। मुझे लगता है कि ऐसे थोड़े ही दिन होंगे जब उन्होंने इसे उसके मुँह से निकलते न सुना हो, और यदि वे इसे पूरी तरह न भी समझे हों तो भी उन्होंने इसे पकड़ लिया। हमारे प्रभु की शिक्षा के संक्षिप्त वृत्तान्त में, जो चारों सुसमाचारों में है, यह आपको पच्चीस बार मिलता है। अकेले यूहन्ना के सुसमाचार में यह सत्रह बार आया है। इसी छठे अध्याय में हम इसे पाँच बार पढ़ते हैं। निस्सन्देह जब पतरस ने बात की, तब यह उसके कानों में गूँज रहा था।

परन्तु यद्यपि पतरस उस दिन "नहीं जानता था कि वह क्या कह रहा है," एक दिन ऐसा आया जब अपने प्रभु के पुनरुत्थान के बाद उसकी समझ खोली गई, और उसने "अनन्त जीवन की बातों" में वे ऊँचाइयाँ और गहराइयाँ देखीं जो क्रूस पर चढ़ाए जाने से पहले उसने केवल "दर्पण में धुँधली सी" देखी थीं। और हमें, प्रेरितों के काम और पत्रियों के पूर्ण प्रकाश में, इस विषय में तनिक भी सन्देह करने की आवश्यकता नहीं कि इस सामर्थी वाक्यांश में, जिसे हमारे प्रभु ने इतनी बार प्रयोग किया, क्या-क्या बातें सम्मिलित थीं।

मसीह के अनन्त जीवन के वचन उस जीवन के स्वरूप के विषय में थे जिसकी घोषणा करने वह संसार में आया था — वह जीवन जो हमारे जीवित रहते विश्वास के द्वारा आत्मा में आरम्भ होता है और हमारे मरने पर महिमा में सिद्ध किया जाता है। वे इस विषय में वचन थे कि पापी मनुष्य के लिये यह अनन्त जीवन किस प्रकार प्रदान किया गया है, अर्थात् क्रूस पर हमारे स्थानापन्न के रूप में उसकी प्रायश्चित्त करनेवाली मृत्यु के द्वारा। वे इस विषय में वचन थे कि यह अनन्त जीवन किन शर्तों पर हमारा अपना बन जाता है, यदि हम उसकी आवश्यकता का अनुभव करें, अर्थात् सरल विश्वास की शर्तों पर। जैसा लैटिमर ने कहा, यह केवल इतना ही है: "विश्वास करो और पाओ।" वे उस प्रशिक्षण और अनुशासन के विषय में वचन थे जो अनन्त जीवन के मार्ग में है, जिसकी मनुष्य को इतनी आवश्यकता है और जो इतनी प्रचुरता से प्रदान किया गया है, अर्थात् पवित्र आत्मा का नया करनेवाला और पवित्र करनेवाला अनुग्रह। वे उन सान्त्वनाओं और प्रोत्साहनों के विषय में वचन थे जो मार्ग में उन सब के लिये रखी गई हैं जो अनन्त जीवन के लिये विश्वास करते हैं, अर्थात् मसीह की प्रतिदिन की सहायता, सहानुभूति और सतर्क देखभाल। यह सब और इससे बहुत अधिक, जिसके विषय में मैं अभी विशेष रूप से नहीं कह सकता, उस छोटे से वाक्यांश "अनन्त जीवन की बातें" में समाया हुआ है। इसमें आश्चर्य नहीं कि हमारा प्रभु एक स्थान पर कहता है, "मैं इसलिये आया कि वे जीवन पाएँ, और बहुतायत से पाएँ"; "जो बातें तू ने मुझे पहुँचाईं, मैं ने उन्हें पहुँचा दिया है" (यूहन्ना 10:10, 17:8)।

आइए क्षण भर विचार करें कि पिछली अठारह शताब्दियों में कितने असंख्य स्त्री-पुरुषों ने इन "अनन्त जीवन की बातों" को केवल "बातें" ही नहीं, वरन् ठोस वास्तविकताएँ पाया है। वे इनके विषय में निश्चित हुए, उन्होंने इन्हें अपनाया, और इन्हें अपनी आत्माओं के लिये भोजन और पेय पाया। हम गवाहों के एक बड़े बादल से घिरे हुए हैं, जिन्होंने इन बातों के विश्वास में सुखी और उपयोगी जीवन बिताया और महिमामय मृत्यु पाई। कौन है जो इससे इनकार करने का साहस करेगा? मसीह के बिना ऐसे जीवन और ऐसी मृत्यु हमें कहाँ मिलेंगी?

यह मसीह के "अनन्त जीवन की बातों" में विश्वास ही था जिसने पतरस और यूहन्ना को यहूदी महासभा के सामने साहस से खड़े होने और परिणामों के भय के बिना अपने स्वामी का अंगीकार करने के योग्य बनाया, जब उन्होंने कहा, "किसी दूसरे के द्वारा उद्धार नहीं; क्योंकि स्वर्ग के नीचे मनुष्यों को कोई दूसरा नाम नहीं दिया गया, जिसके द्वारा हम उद्धार पा सकें" (प्रेरितों के काम 4:12)।

यह मसीह के "अनन्त जीवन की बातों" में विश्वास ही था जिसने पौलुस को यहूदी धर्म से बाहर निकलने, अपना जीवन सुसमाचार के प्रचार में बिताने, और कब्र के किनारे पर यह कहने के योग्य बनाया, "मैं जानता हूँ कि मैं ने किस पर विश्वास किया है, और मुझे निश्चय है कि वह मेरी धरोहर की उस दिन तक रखवाली करने में समर्थ है" (2 तीमुथियुस 1:12)।

यह मसीह के "अनन्त जीवन की बातों" में विश्वास ही था जिसने अध्यक्ष हूपर को यह कहने के बाद ग्लॉस्टर में साहस से खम्भे की ओर जाने के योग्य बनाया, "जीवन मधुर है और मृत्यु कड़वी; परन्तु अनन्त जीवन और भी मधुर है, और अनन्त मृत्यु और भी कड़वी।"

यह मसीह के "अनन्त जीवन की बातों" में विश्वास ही था जिसने निकोलस रिडली और ह्यू लैटिमर को धर्म-सुधार के सिद्धान्तों का इनकार करने के बजाय ऑक्सफ़ोर्ड की ब्रॉड स्ट्रीट में अग्नि की मृत्यु सहने के योग्य बनाया।

यह मसीह के "अनन्त जीवन की बातों" में विश्वास ही था जिसने हेनरी मार्टिन को कैम्ब्रिज में आराम और प्रतिष्ठा से मुँह मोड़ने, उष्णकटिबन्धीय जलवायु में जाने, और एक मिशनरी के रूप में अकेले मृत्यु पाने के योग्य बनाया।

यह मसीह के "अनन्त जीवन की बातों" में विश्वास ही था जिसने उस आदरणीय स्त्री कैथरीन टेट को, जैसा कि एक अत्यन्त हृदयस्पर्शी जीवनी में लिखा है, पाँच सप्ताह में अपने पाँच बच्चों को कब्र के सुपुर्द करने के योग्य बनाया, इस पूर्ण निश्चय के साथ कि मसीह अपना वचन पूरा करेगा, उनकी देह और आत्मा दोनों की देखभाल करेगा, और अन्तिम दिन उन्हें अपने साथ लाकर उससे मिलाएगा।

उन लोगों के जीवन और मृत्यु में, जो मसीह से मुँह मोड़कर दूसरे स्वामियों को खोजते हैं, ऐसे तथ्यों की तुलना में कैसा भयानक अन्तर दिखाई देता है! मसीही-विरोधी सिद्धान्तों, विचारों और नियमों के पक्षधर अपनी सारी चतुराई के साथ कौन से फल दिखा सकते हैं? उन्होंने आत्मा की कैसी पवित्र, प्रेममय, शान्त स्थिरता प्रकट की है? उन्होंने अन्धकार, अनैतिकता, अन्धविश्वास और पाप पर कौन सी विजयें पाई हैं? उन्होंने कौन से सफल मिशन चलाए हैं? उन्होंने कौन से समुद्र पार किए हैं? उन्होंने किन देशों को सभ्य या नैतिक बनाया है? उन्होंने उपेक्षित घरेलू जनसंख्या में कौन सा सुधार किया है? उन्होंने आत्म-त्याग के कौन से परिश्रम किए हैं? उन्होंने पृथ्वी पर कौन सा छुटकारा सम्पन्न किया है? तुम भली-भाँति पूछ सकते हो; तुम्हें कोई उत्तर नहीं मिलेगा। इसमें आश्चर्य नहीं कि हमारे प्रभु ने झूठे भविष्यद्वक्ताओं के विषय में कहा, "उनके फलों से तुम उन्हें पहचान लोगे" (मत्ती 7:15-16)। केवल वे ही जो पतरस के साथ कह सकते हैं, "अनन्त जीवन की बातें तेरे ही पास हैं," जीवित रहते मानवजाति पर अपनी छाप छोड़ते हैं, और मरते समय कहते हैं, "हे मृत्यु, तेरा डंक कहाँ है?"

(क) अन्त में, मैं इस लेख को पढ़नेवाले प्रत्येक जन से विनती करता हूँ कि वह अपने आप से पूछे कि क्या वह यहूदियों के समान मसीह से दूर जा रहा है, या पतरस के समान साहस से मसीह से लिपटा हुआ है।

तुम संकटपूर्ण दिनों में जी रहे हो। एक समय था जब अधर्म शायद ही आदरणीय माना जाता था; परन्तु वह समय बहुत पहले बीत चुका है। फिर भी अब भी मसीह तुम्हारे हृदयों के द्वार पर खटखटाता है, और तुमसे कहता है कि अपने चाल-चलन पर विचार करो और ध्यान दो कि तुम क्या कर रहे हो। "क्या तुम भी चले जाना चाहते हो?" अपने हृदय के अन्तरतम में न्याय-सभा बिठाने का साहस करो, और भीतर झाँको। उस आलसी सुखवादी भावना का विरोध करो जो तुम्हें अपने भीतरी चरित्र की कभी जाँच न करने को कहती है। विश्वास रखो, एक घड़ी आएगी जब तुम स्वर्ग में एक महान मित्र की आवश्यकता अनुभव करोगे। उसके बिना तुम किसी प्रकार जी तो सकते हो; उसके बिना तुम कभी चैन से मर न सकोगे।

शायद तुम मुझसे कहो कि तुम मसीह को छोड़ने का सचमुच कोई इरादा नहीं रखते, यद्यपि इस समय तुम वैसे नहीं हो जैसा तुम्हें होना चाहिए। परन्तु धर्म की कुछ बातें ऐसी हैं जिनके विषय में तुम अपना मन नहीं बना पाए हो, और अधिक प्रकाश की प्रतीक्षा कर रहे हो। या तुम किसी विशेष उद्देश्य के लिये कठिन परिश्रम कर रहे हो, और अभी तुम्हारे पास समय नहीं है, और फेलिक्स के समान तुम किसी "सुविधाजनक समय" की आशा रखते हो। परन्तु हाय! प्रतीक्षा करनेवाली, देर लगानेवाली आत्मा, मसीह के वचन, विधियों और दिन की उपेक्षा "मसीह से दूर जाना" नहीं तो और क्या है? जागो और देखो कि तुम ढलान पर हो और धीरे-धीरे नीचे की ओर जा रहे हो। तुम बहे जा रहे हो, प्रतिदिन परमेश्वर से और, और दूर बहे जा रहे हो। जागो, और परमेश्वर की सहायता से यह ठान लो कि अब और न बहोगे।

(ख) परन्तु बिल्कुल कोई धर्म न होने के बाद, मैं इस लेख के प्रत्येक पाठक से विनती करता हूँ कि ऐसे धर्म से सावधान रहें जिसमें मसीह को उसका उचित स्थान नहीं दिया गया है। हम कभी भी थोड़े-से सस्ते, औपचारिक मसीही धर्म से अपने आप को सन्तुष्ट करने का प्रयास न करें, जिसे रविवार की सुबह लापरवाही से अपना लिया जाता है और रात को त्याग दिया जाता है, परन्तु जो सप्ताह भर हम पर कोई प्रभाव नहीं डालता। ऐसा मसीही धर्म न तो जीवन में हमें शान्ति देगा, न मृत्यु में आशा, न परीक्षा का सामना करने की सामर्थ्य, और न संकट में सान्त्वना। केवल मसीह के पास "अनन्त जीवन की बातें" हैं, और उसकी बातों को ग्रहण किया जाए, उन पर विश्वास किया जाए, उन्हें अपनाया जाए, और उन्हें हमारी आत्माओं का भोजन और पेय बनाया जाए। जो मसीही धर्म उसके साथ जीवित, अनुभव की जाने वाली सहभागिता के बिना हो, जिसमें उसके लहू और मध्यस्थता की प्रार्थना के लाभों की पकड़ न हो, जिसमें मसीह के बलिदान और मसीह के याजकपद के बिना हो, वह सामर्थ्यहीन और थका देने वाला बाहरी रूप मात्र है।

(ग) अन्त में, यदि हमारे पास यह आशा रखने का कारण है कि हम मसीह के सच्चे सेवक हैं, तो हम "अपने विश्वास के अंगीकार को बिना डगमगाए दृढ़ता से थामे रहें।" लोग चाहे जितना हम पर हँसें और हमें फेरने का प्रयत्न करें। ऐसे समयों में हम शान्ति और नम्रता से अपने आप से कहें: "आख़िर यदि मैं मसीह को छोड़ दूँ तो किसके पास जाऊँगा? मैं अपने भीतर अनुभव करता हूँ कि उसके पास 'अनन्त जीवन की बातें' हैं। मैं देखता हूँ कि हज़ारों लोग उन्हें अपनी आत्माओं का भोजन और पेय पाते हैं। जहाँ वह जाएगा, वहाँ मैं जाऊँगा; और जहाँ वह ठहरेगा, वहाँ मैं ठहरूँगा। इस मरते हुए संसार में मुझे इससे उत्तम कुछ नहीं दिखता। मैं मसीह और उसकी बातों से लिपटा रहूँगा। जिसने भी उन पर भरोसा किया, उन्होंने उसे कभी निराश नहीं किया, और मुझे विश्वास है कि वे मुझे भी निराश नहीं करेंगी।" पाद-टिप्पणियाँ:

[12] इन पृष्ठों का सार मूल रूप से ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के सामने एक उपदेश के रूप में प्रचार किया गया था, जब मेरी बारी चुने हुए प्रचारक के रूप में सेंट [टिप्पणी का शेष भाग लुप्त है]।

इब्रानियों 4:14 - हमारा अंगीकार

"इसलिये जब हमारा ऐसा बड़ा महायाजक है, जो स्वर्गों से होकर गया है, अर्थात् परमेश्वर का पुत्र यीशु, तो आओ, हम अपने अंगीकार को दृढ़ता से थामे रहें।" -- इब्रानियों 4:14।

इब्रानियों की पत्री को ध्यान से पढ़ने वाला पाठक शायद ही इस बात पर ध्यान दिए बिना रहे कि चौथे अध्याय में "आओ, हम" शब्द पूरे चार बार आए हैं। पहली आयत में तुम पढ़ोगे, "आओ, हम डरें," -- ग्यारहवीं आयत में, "आओ, हम परिश्रम करें," -- चौदहवीं आयत में, "आओ, हम दृढ़ता से थामे रहें," -- और सोलहवीं आयत में, "आओ, हम अनुग्रह के सिंहासन के निकट हियाव बाँधकर चलें।" हमें इस पर ध्यान देना चाहिए।

अब प्रेरित पौलुस ने इस प्रकार क्यों लिखा? उसने ऐसा इसलिए किया कि इब्रानी मसीही, जिन्हें वह लिख रहा था, एक विशेष लोग थे और एक विशेष स्थिति में थे। वे अन्यजाति के उन धर्मान्तरित लोगों के समान नहीं थे जो मूर्तियों की पूजा करते हुए बड़े हुए थे और जिन्हें परमेश्वर की ओर से कोई प्रकाशन कभी नहीं मिला था। यहूदी ऐसे लोग थे जिन पर पन्द्रह सौ वर्षों से परमेश्वर की विशेष कृपा रही थी। उस पूरे लम्बे काल में उनके पास मूसा की व्यवस्था थी, और आत्मिक ज्योति की बहुत बड़ी मात्रा थी, जो पृथ्वी की किसी और जाति को नहीं दी गई थी। इन विशेषाधिकारों ने उन्हें किसी भी परिवर्तन के विचार से अत्यन्त संवेदनशील और ईर्ष्यालु बना दिया था। उनके पास बहुत कोमलता और नाज़ुकता से जाना आवश्यक था, और उनसे एक विशेष शैली में बात करना आवश्यक था। यह सब पौलुस को, जो स्वयं जन्म से यहूदी था, भली-भाँति याद था। वह स्वयं को उनके बराबर रखता है, और कहता है, "आओ, हम -- मैं अपने आप से भी कहता हूँ और तुमसे भी, ताकि मैं तुम्हें ठेस न पहुँचाऊँ।"

परन्तु बात इतनी ही नहीं है। मैं यह भी कह सकता हूँ कि यहूदी मसीहियों को बहुत विशेष परीक्षाओं से होकर जाना था। मुझे लगता है कि धर्मान्तरण के बाद उन्हें अन्यजाति के मसीहियों की अपेक्षा कहीं अधिक सताया गया और उनके साथ बुरा व्यवहार किया गया। निःसन्देह एक अन्यजाति के लिए मूर्तियों से फिरना कठिन बात थी। परन्तु एक यहूदी के लिए यह अंगीकार करना कहीं अधिक कठिन था कि वह मूसा की रस्मी व्यवस्था से सन्तुष्ट नहीं है, और उसे एक उत्तम याजक और एक उत्तम बलिदान मिल गया है, अर्थात् नासरत का यीशु और क्रूस का लहू। यह भी पौलुस को भली-भाँति याद था, और वह स्वयं को उनके साथ खड़ा करके उन्हें ढाढ़स और प्रोत्साहन देता है, यह कहकर, "आओ, हम डरें," -- "आओ, हम परिश्रम करें," -- "आओ, हम दृढ़ता से थामे रहें," -- "आओ, हम हियाव बाँधकर चलें," -- "मैं तुम्हारे ही समान हूँ, हम सब एक ही नाव में हैं।"

इस लेख में मैं स्वयं को उस पद तक सीमित रखूँगा जो इसके शीर्ष पर है, और मैं तीन प्रश्नों के उत्तर देने का प्रयत्न करूँगा।

I. यह अंगीकार क्या है जिसकी चर्चा पौलुस करता है?

II. पौलुस क्यों कहता है, "आओ, हम दृढ़ता से थामे रहें"?

III. वह बड़ा प्रोत्साहन क्या है जो पौलुस हमें "दृढ़ता से थामे रहने" के लिए देता है?

आगे बढ़ने से पहले, मैं अपने पाठकों से निवेदन करता हूँ कि वे स्मरण रखें कि जिन बातों पर हम विचार करने जा रहे हैं, वे पवित्र आत्मा की प्रेरणा से मसीह की सम्पूर्ण कलीसिया के हित के लिए, हर युग में, जगत के अन्त तक लिखी गई थीं। उनका उद्देश्य था कि वे इंग्लैंड के सब सच्चे मसीहियों के, और सब वर्गों के, चाहे ऊँचे हों या नीचे, धनी हों या निर्धन, लन्दन में हों या लिवरपूल में, या पृथ्वी के किसी भी भाग में, काम आएँ। इब्रानियों की पत्री कोई पुरानी घिसी-पिटी चिट्ठी नहीं है जो केवल अठारह शताब्दी पहले के यहूदियों के अनुकूल हो। यह तुम्हारे और मेरे लिए है।

हम सब को "अपने अंगीकार को दृढ़ता से थामे रहने" के लिए समझाए जाने की आवश्यकता है।

I. आइए, हम आरम्भ में यह विचार करें कि "हमारे अंगीकार" का क्या अर्थ है।

जब पौलुस इस अभिव्यक्ति का प्रयोग करता है, तो उसके अर्थ के विषय में बहुत कम सन्देह हो सकता है। उसका अर्थ था मसीह में विश्वास और उसकी आज्ञाकारिता का वह सार्वजनिक "अंगीकार" जो प्रत्येक व्यक्ति मसीही कलीसिया का सदस्य बनते समय करता था। प्रेरित के दिनों में, जब कोई स्त्री या पुरुष यहूदी धर्म या मूर्तिपूजा को छोड़कर मसीह को उद्धारकर्ता के रूप में ग्रहण करता था, तो वह कुछ कार्यों के द्वारा स्वयं को मसीही घोषित करता था। वह यह सार्वजनिक रूप से बपतिस्मा लेकर, उनकी मण्डली में सम्मिलित होकर जो पहले ही बपतिस्मा ले चुके थे, मूर्तिपूजा और सब प्रकार की दुष्टता को त्यागने की सार्वजनिक प्रतिज्ञा करके, और नासरत के यीशु के अनुयायियों की सब धार्मिक सभाओं, उनके मार्गों और उनकी रीतियों में नियमित रूप से उनके साथ भाग लेकर करता था। पौलुस के मन में यही बात थी जब उसने ये शब्द लिखे, "आओ, हम अपने अंगीकार को दृढ़ता से थामे रहें।"

उन दिनों में मसीही होने का अंगीकार करना बहुत गम्भीर बात थी, और उसके परिणाम भी बहुत गम्भीर होते थे। इससे प्रायः मनुष्य पर सताव, सम्पत्ति की हानि, बन्दीगृह, और यहाँ तक कि मृत्यु भी आ पड़ती थी। इसका परिणाम यह हुआ कि आरम्भिक कलीसिया में बहुत थोड़े लोग मसीही होने का अंगीकार करते थे, जब तक कि वे सचमुच निष्ठावान, सच्चे मन से परिवर्तित, और वास्तव में विश्वासी न होते। निस्सन्देह कुछ अपवाद भी थे। हनन्याह और सफीरा, और शमौन जादूगर, और देमास जैसे लोग चुपके से घुस आए और चेलों में मिल गए। परन्तु ये अपवाद ही थे। सामान्य नियम यह था कि यदि किसी मनुष्य का हृदय उसके अंगीकार में पूरी रीति से न हो, तो उसके लिए मसीही धर्म का अंगीकार करना व्यर्थ था। इसका मूल्य बहुत चुकाना पड़ता था; इससे मनुष्य पर बड़े कष्ट का जोखिम आता था, और लाभ बहुत कम मिलता था। परिणाम यह हुआ कि प्रेरितों के दिनों की कलीसिया में सच्चे, निष्कपट हृदयवाले और परिवर्तित लोगों का अनुपात उतना ऊँचा था जितना पिछली अठारह शताब्दियों में किसी और काल में कभी नहीं रहा। जब पौलुस ने कहा, “आओ, हम अपने अंगीकार को दृढ़ता से थामे रहें,” तो उसके शब्दों में बहुत गहरा अर्थ था।

जिन दिनों में हम जी रहे हैं, उनमें “अंगीकार” बिलकुल भिन्न बात है। करोड़ों लोग अपने आप को मसीही कहते और मानते हैं, जिन्हें प्रेरित मसीही कहता ही नहीं। प्रतिवर्ष करोड़ों को बपतिस्मा दिया जाता है और वे कलीसियाओं की सूचियों और पंजियों में जोड़ दिए जाते हैं, जिनमें धर्म नाम मात्र को भी नहीं या बहुत ही कम होता है। उनमें से बहुत-से कभी आराधना के स्थान में गए बिना जीते और मर जाते हैं, और अत्यन्त अभक्ति का जीवन बिताते हैं। और भी बहुत-से कभी-कभार ही किसी गिरजे या प्रार्थनालय में जाते हैं, या रविवार को अधिक से अधिक एक बार। और बहुत-से लोग कभी प्रभु-भोज में सम्मिलित हुए बिना ही जीवन बिता देते हैं, और उस पवित्र संस्कार की, जिसे प्रभु ने ग्रहण करने की आज्ञा दी थी, आदतन उपेक्षा करते हुए जीते और मरते हैं। इनमें से अधिकतर लोग जीवित रहते मसीही गिने जाते हैं, और मरने पर उन्हें मसीही रीति से दफनाया जाता है। परन्तु पौलुस उनके विषय में क्या कहता? मुझे डर है कि इस उत्तर के विषय में कोई सन्देह नहीं हो सकता। वह कहता कि वे किसी भी कलीसिया के सदस्य गिने जाने के योग्य ही नहीं! वह उन्हें “मसीह यीशु में पवित्र और विश्वासी भाइयों” कहकर सम्बोधित न करता। वह उनसे यह न कहता कि “अपने अंगीकार को दृढ़ता से थामे रहो।” वह उनसे कहता कि उनके पास थामे रहने को कोई अंगीकार है ही नहीं, और वे “अपने अपराधों और पापों में अब तक मरे हुए” हैं (इफिसियों 2:1)। यह सब शोक और पीड़ा की बात है, परन्तु बहुत ही सच है। जिसमें साहस हो, वह इसका खण्डन करे।

फिर भी हम परमेश्वर का धन्यवाद करें कि मसीहीजगत के हर भाग में ऐसे थोड़े लोग नहीं हैं जो वास्तव में वही हैं जो वे अंगीकार करते हैं—सच्चे, निष्कपट, गम्भीर मनवाले, सच्चे हृदय के, परिवर्तित और विश्वास करनेवाले मसीही। इनमें से कुछ निस्सन्देह ऐसी कलीसियाओं के हैं जिनमें उनकी आत्माओं को बहुत कम सहायता मिलती है। उनमें से कुछ का ज्ञान बहुत अपूर्ण है, और वे सत्य को अनेक दोषपूर्ण विचारों के मिश्रण में घुला हुआ थामे रहते हैं। परन्तु उन सब में कुछ साझा चिह्न हैं। वे अपनी आत्माओं का मूल्य जानते हैं, और सचमुच उद्धार पाना चाहते हैं। वे पाप की पापमयता को अनुभव करते हैं, और उससे घृणा करते हैं, उससे लड़ते हैं, और उससे छूट जाने की लालसा रखते हैं। वे देखते हैं कि केवल यीशु मसीह ही उन्हें बचा सकता है, और उन्हें केवल उसी पर भरोसा रखना चाहिए। वे देखते हैं कि उन्हें पवित्र और भक्तिपूर्ण जीवन बिताना चाहिए, और अपनी दीन रीति से वे ऐसा करने का यत्न करते हैं। वे अपनी बाइबल से प्रेम रखते हैं, और प्रार्थना करते हैं, यद्यपि उनका पढ़ना और उनकी प्रार्थना दोनों ही बहुत अपूर्ण हैं। संक्षेप में, उनमें से कुछ मसीह की पाठशाला की सबसे ऊँची कक्षा में हैं, और ज्ञान, विश्वास और प्रेम में सामर्थी हैं। अन्य केवल शिशुओं की कक्षा में हैं, और हर बात में निर्बल और दीन हैं। परन्तु एक बात में वे सब एक हैं। उनके हृदय परमेश्वर की दृष्टि में सीधे हैं; वे मसीह से प्रेम रखते हैं; उनके मुख स्वर्ग की ओर हैं, और वे वहाँ जाना चाहते हैं। आज के दिनों में इसी प्रकार के लोगों पर मैं इस लेख में पौलुस की यह प्रबोधन लागू करना चाहता हूँ, “आओ, हम अपने अंगीकार को दृढ़ता से थामे रहें।” हम उससे चिपके रहें, और उसे जाने न दें।

अब मैं यह नहीं भूल सकता कि दैनिक जीवन में हमें हज़ारों ऐसे लोग मिलते हैं जो सदा यही कहते रहते हैं, “मैं धर्म का कोई अंगीकार नहीं करता।” वे केवल यह कहते ही नहीं, वरन् यह कहने में गर्व भी करते हैं, मानो यह कहना कोई उचित, बुद्धिमानी और ठीक बात हो। वे तो अंगीकार करनेवालों को तुच्छ भी समझते जान पड़ते हैं, और उन्हें कपटी और धोखेबाज़, या कम से कम निर्बल और मूर्ख लोग मानते हैं। यदि यह लेख ऐसे किसी व्यक्ति के हाथ पड़े, तो मुझे उससे कुछ कहना है, और मैं उसे अपना पूरा ध्यान देने के लिए आमन्त्रित करता हूँ।

मैं इससे इनकार नहीं करता कि धर्म में बहुत-से कपटी हैं। वे सदा रहे हैं, और जब तक संसार खड़ा है, सदा रहेंगे। जब तक राज्य में खरे सोने-चाँदी के सिक्के हैं, तब तक जाली सिक्के गढ़े और ढाले जाते रहेंगे, और नकली मुद्रा बनती रहेगी। खोटे सिक्कों का अस्तित्व ही परोक्ष रूप से इस बात का प्रमाण है कि कोई ऐसी वस्तु है जिसकी नकल करना लाभदायक है, और चलन में खरा सिक्का भी है। मसीही धर्म के विषय में भी ठीक ऐसा ही है! कलीसियाओं में बहुत-से झूठे अंगीकार करनेवालों का होना ही परोक्ष रूप से इस बात का प्रमाण है कि सच्चे हृदय के और खरे विश्वासी भी होते हैं। मसीही धर्म की निन्दा कराने के लिए शैतान की प्रिय युक्तियों में से एक यह है कि वह कुछ अभागे लोगों को उस बात का अंगीकार करने के लिए फुसलाता है जिस पर वे वास्तव में विश्वास नहीं करते। वह भेड़ों के भेष में भेड़िए भेजकर, और ऐसे स्त्री-पुरुष खड़े करके, जो कनान की बोली बोलते और परमेश्वर की सन्तान का वस्त्र पहनते हैं पर भीतर से हृदय में सड़े हुए हैं, हमारे प्रभु यीशु मसीह के उद्देश्य को संसार में हानि पहुँचाने का यत्न करता है। परन्तु इन बातों से किसी मनुष्य को यह अधिकार नहीं मिल जाता कि वह सब धार्मिक अंगीकार की निन्दा करे।

जो लोग घमण्ड से कहते हैं कि वे कोई अंगीकार नहीं करते, उनसे मैं कहता हूँ कि वे पवित्रशास्त्र के विषय में अपनी ही शोचनीय अज्ञानता प्रकट कर रहे हैं। कुछ अभागे लोगों का कपट हमें अपना कर्तव्य निभाने से कभी न रोके; और हमें इसकी परवाह नहीं करनी चाहिए कि लोग हमारे विषय में क्या कहते या सोचते हैं। हमें मसीह के पक्ष में साहसपूर्वक खड़े होने में कभी लज्जित नहीं होना चाहिए—उसके वचन, उसके दिन और उसकी विधियों का आदर करके, उचित अवसरों पर मसीह के उद्देश्य के पक्ष में बोलकर, और इस संसार के लोगों के पापों और मूर्खताओं के अनुरूप चलने से दृढ़तापूर्वक इनकार करके। हमारे प्रभु यीशु मसीह के वचनों को कभी नहीं भूलना चाहिए: "जो कोई मुझ से और मेरी बातों से लजाएगा, मनुष्य का पुत्र भी जब अपनी, और अपने पिता की, और पवित्र स्वर्गदूतों की महिमा सहित आएगा, तो उस से लजाएगा" (लूका 9:26)। यदि हम पृथ्वी पर मसीह को स्वीकार नहीं करेंगे, और खुलेआम यह अंगीकार नहीं करेंगे कि हम उसके दास हैं, तो हमें यह आशा नहीं रखनी चाहिए कि अन्तिम दिन मसीह स्वर्ग में हमें स्वीकार करेगा।

संक्षेप में, एक मनुष्य को जिस बात से सबसे अन्त में लज्जित होना चाहिए, वह है धर्म का "अंगीकार"। खेद है कि ऐसी बहुत सी बातें हैं जिनसे अधिकांश लोग बिलकुल भी लज्जित नहीं दिखते। चिड़चिड़ापन, स्वार्थ, प्रेम की कमी, आलस्य, द्वेष, चुगली, झूठ, निन्दा, असंयम, अशुद्धता, जुआ, सब्त का उल्लंघन—ये सब मनुष्यों में भयानक रूप से आम बातें हैं, और इनमें से अधिकांश से लोग तनिक भी लज्जित नहीं दिखते, यद्यपि उन्हें होना चाहिए! जो लोग आदतन "ऐसे ऐसे काम करते हैं, वे परमेश्वर के राज्य के वारिस न होंगे" (गलातियों 5:21)। परन्तु बाइबल पढ़ने, प्रार्थना करने, पवित्र जीवन जीने, और शरीरों तथा आत्माओं की भलाई के लिए काम करने से किसी को कभी लज्जित होने की आवश्यकता नहीं। ये ऐसी बातें हो सकती हैं जिन पर बहुत से लोग हँसते हैं, जिन्हें वे नापसन्द और तुच्छ समझते हैं, और जिनके प्रति उनकी कोई रुचि नहीं, पर ये वही बातें हैं जिनसे परमेश्वर भली-भाँति प्रसन्न होता है। मैं फिर दोहराता हूँ, लोग चाहे कुछ भी कहें, जिस बात से हमें सबसे अन्त में लज्जित होना चाहिए, वह है मसीह में हमारे विश्वास और मसीह की आज्ञाकारिता का हमारा "अंगीकार"।

II. अब दूसरे स्थान पर हम विचार करें कि पौलुस क्यों कहता है, "आओ हम अपने अंगीकार को दृढ़ता से थामे रहें।" इस प्रश्न का उत्तर तीन प्रकार का है, और उन सब के गम्भीर ध्यान की माँग करता है जो आशा रखते हैं कि वे अपने मसीही अंगीकार में सचमुच सच्चे हैं।

(क) एक तो यह कि हमारे हृदय सदा निर्बल और मूर्ख हैं, मन फिराव के बाद भी। हम मृत्यु से पार होकर जीवन में आ गए हों, और हमारे मन की आत्मा नई की गई हो। हम अपनी आत्माओं का मूल्य देखने लगे हों, जैसा पहले नहीं देखते थे। हम नई सृष्टि बन गए हों; पुरानी बातें बीत गई हों, और सब कुछ नया हो गया हो। परन्तु विश्वासियों को यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि जब तक वे मर नहीं जाते, तब तक वे अपने भीतर एक निर्बल, मूर्ख और विश्वासघाती हृदय लिए फिरते हैं। सब प्रकार की बुराई की जड़ें अब भी हमारे भीतर हैं, यद्यपि पवित्र आत्मा के अनुग्रह से वे भूमि तक काट डाली गई हैं। हम इसे मानना चाहें या न चाहें, हमारे भीतर, हमारी सर्वोत्तम दशा में भी, कठिनाई के प्रति छिपी अरुचि, मनुष्यों को प्रसन्न करने और संसार के साथ मेल बनाए रखने की गुप्त इच्छा, निजी बाइबल पढ़ने और प्रार्थनाओं के प्रति लापरवाही, दूसरों के प्रति डाह और जलन, भलाई करने में आलस्य, स्वार्थ और अपनी ही मनमानी करने की इच्छा, दूसरों की इच्छाओं के प्रति भुलक्कड़पन, और अपने सहज में फँसानेवाले पापों के प्रति सतर्कता की कमी विद्यमान है। ये सब बातें प्रायः हमारे भीतर, हमारे हृदयों की सतह के नीचे छिपी रहती हैं। सबसे पवित्र सन्त को भी किसी दिन अपनी हानि उठाकर पता चल सकता है कि ये सब वहाँ जीवित हैं और प्रकट होने को तैयार हैं। इसमें आश्चर्य नहीं कि हमारे प्रभु यीशु ने बारी में तीनों प्रेरितों से कहा, "जागते रहो, और प्रार्थना करते रहो, कि तुम परीक्षा में न पड़ो; आत्मा तो तैयार है, परन्तु शरीर दुर्बल है" (मरकुस 14:38)। मुझे कोई सन्देह नहीं कि जब पौलुस ने ये शब्द, "दृढ़ता से थामे रहो," लिखे, तब उसके सामने हृदय ही था। "इसलिए आओ हम अपने अंगीकार को दृढ़ता से थामे रहें"

(ख) दूसरी बात यह कि संसार मसीही आत्मा के लिए अत्यधिक खतरे का स्रोत है। जिस दिन से हम मन फिराते हैं, उसी दिन से हम धर्म के लिए अत्यन्त अस्वस्थ वातावरण में रह रहे होते हैं। हम ऐसे लोगों की एक विशाल भीड़ के बीच जीते, चलते और अपना अस्तित्व रखते हैं जो जीवित मसीही विश्वास से बिलकुल रहित हैं। जीवन के हर वर्ग में हमें सैकड़ों ऐसे लोग मिलते हैं जो, चाहे कितने ही नैतिक और सम्माननीय हों, ऐसी ही बातों के सिवा और किसी की परवाह करते नहीं दिखते—मैं क्या खाऊँ? क्या पीऊँ? क्या पाऊँ? क्या खर्च करूँ? अपना समय कैसे बिताऊँ? क्या लाभ कमाऊँ? क्या मनोरंजन करूँ? किस सुखद संगति का आनन्द लूँ! जहाँ तक परमेश्वर, मसीह, पवित्र आत्मा, बाइबल, प्रार्थना, मन फिराव, विश्वास, पवित्र जीवन, संसार में भलाई करने, मृत्यु, पुनरुत्थान, न्याय, स्वर्ग और नरक का सम्बन्ध है, ये ऐसे विषय हैं जो बीमारी या किसी अन्त्येष्टि के समय को छोड़कर उनके मन में कभी आते ही नहीं दिखते। अब ऐसे लोगों के बीच निरन्तर रहना, जैसा एक मसीही को करना पड़ता है, उसके लिए निश्चय ही एक बड़ी परीक्षा है, और हानि से बचने के लिए निरन्तर सतर्कता की माँग करता है। छोटी-छोटी बातों में झुक जाने, और समझौते तथा रियायतें करने के लिए हम लगातार लुभाए जाते हैं। हम स्वभाव से ही दूसरों को ठेस पहुँचाने, और सम्बन्धियों, मित्रों तथा पड़ोसियों से मनमुटाव और टकराव को पसन्द नहीं करते। हमें यह पसन्द नहीं कि बहुमत हमारी हँसी और उपहास उड़ाए, और हम यह अनुभव करें कि हम जिस भी मण्डली में जाएँ, उसमें सदा अल्पसंख्यक हैं। मुझे भय है कि बहुत से लोग हँसी के कारण स्वर्ग से बाहर हो जाते हैं और हँसी के कारण नरक में जा पड़ते हैं। सुलैमान का यह कथन सच है, "मनुष्य का भय खाना फन्दा ठहरता है" (नीतिवचन 29:25)। मैं एक बार एक घुड़सवार रेजिमेंट के एक साहसी सार्जेंट को जानता था, जो पचास वर्ष की आयु तक बिना किसी धर्म के जीवन बिताने के बाद अपने जीवन के अन्तिम कुछ वर्षों में एक दृढ़ मसीही बन गया। उसने मुझे बताया कि जब उसने पहले-पहल अपनी आत्मा के विषय में सोचना और प्रार्थना करना आरम्भ किया, तो कई महीने बीत गए और उसे अपनी पत्नी को यह बताने का साहस नहीं हुआ कि वह प्रार्थना करता है; और वह संध्या को बिना जूतों के दबे पाँव ऊपर चला जाता था, ताकि उसकी पत्नी उसे सुन न ले और जान न ले कि वह क्या कर रहा है!

सीधी सच्ची बात यह है कि "सारा संसार उस दुष्ट के वश में पड़ा है" (1 यूहन्ना 5:19), और संसार से विश्वासी की आत्मा पर जो संकट आता है उसकी उपेक्षा करना व्यर्थ है। संसार की आत्मा, संसार का स्वर, संसार की रुचियाँ, संसार की हवा और संसार का श्वास उसके जीवन के हर दिन उसके चारों ओर बने रहते हैं, उसे नीचे खींचते और पीछे घसीटते हैं। यदि वह अपने विश्वास को जीवित अभ्यास में न रखे, तो उसे संक्रमण लगना और हानि उठाना निश्चित है, ठीक उन यात्रियों की तरह जो रोम के कैम्पान्या से होकर गुज़रते हैं और उस समय जाने बिना ही ज्वर पकड़ लेते हैं। सबसे हानिकारक और अस्वास्थ्यकर गैस वही है जिसे हमारी शारीरिक इन्द्रियाँ पहचान नहीं पातीं। हमारे पास उस विश्वास की वृद्धि के लिए निरन्तर प्रार्थना करने का कारण है जिसके विषय में यूहन्ना कहता है कि वह "हमें संसार पर जयवन्त करता है" (1 यूहन्ना 5:4)। सचमुच धन्य है वह मसीही जो संसार में रहकर भी संसार का न हो, जो उसमें अपना कर्तव्य निभाए और फिर भी उसके अनुरूप न बने, जो उसकी मुस्कान या उसकी भृकुटि, उसकी चापलूसी या उसकी शत्रुता, उसके खुले विरोध या उसके हँसी-हँसी के उपहास, उसकी मिठास या उसकी कड़वाहट, उसके सोने या उसकी तलवार से विचलित हुए बिना उसमें से होकर निकल जाए! जब मैं सोचता हूँ कि संसार क्या है, और देखता हूँ कि उसने आत्माओं की कितनी हानि की है और कर रहा है, तो मुझे आश्चर्य नहीं होता कि पौलुस कहता है, "दृढ़ता से थामे रहो।" "आओ, हम अपने अंगीकार को दृढ़ता से थामे रहें।"

(ङ) एक बात और: शैतान मसीही की आत्मा का निरन्तर शत्रु है। वह महान, कभी न सोनेवाला और कभी न थकनेवाला शत्रु सदा हमारी हानि करने में लगा रहता है। यदि वह मार और नष्ट न कर सके, तो उसका निरन्तर उद्देश्य घायल करना, चोट पहुँचाना, सताना, हानि पहुँचाना या निर्बल करना है। वह एक अदृश्य शत्रु है जो सदा हमारे निकट रहता है, "हमारे मार्ग और हमारी शय्या के आस-पास," और हमारी सब चाल-चलन की टोह लेता रहता है, और हर मनुष्य की विशेष निर्बलताओं के अनुसार अपने प्रलोभन तैयार रखता है। वह हमें हमसे कहीं अधिक अच्छी तरह जानता है। वह 6000 वर्षों से एक ही पुस्तक का अध्ययन करता आया है, अर्थात् पतित मानव स्वभाव की पुस्तक का, और वह लगभग असीम चतुराई और छल का, तथा असीम द्वेष का आत्मा है। सबसे उत्तम सन्त को भी इसका अल्प ही अनुमान होता है कि उसके हृदय में कितने घृणित सुझाव शैतान की ओर से आते हैं, और कैसा अशान्त विरोधी उसके दाहिने हाथ खड़ा है।

यह वही है जिसने आरम्भ में हव्वा को प्रलोभन दिया, और उसे मनवा लिया कि वह परमेश्वर की आज्ञा तोड़ सकती है, वर्जित फल खा सकती है और मरेगी नहीं। यह वही है जिसने दाऊद को लोगों की गिनती करने के लिए उकसाया, और तीन दिन में महामारी से उसकी 70,000 प्रजा की मृत्यु करवाई। यह वही है जिसने बपतिस्मा के तुरन्त बाद जंगल में हमारे प्रभु को परखने का यत्न किया, और अपना उद्देश्य पूरा करने के लिए पवित्रशास्त्र तक का हवाला दिया। यह वही है जिसने हमारे प्रभु की तीन वर्ष की पूरी सेवकाई में उनका विरोध किया, कभी अभागे स्त्री-पुरुषों के शरीरों में अत्यन्त रहस्यमय रीति से समाकर, और अन्त में उनके एक प्रेरित के हृदय में उन्हें पकड़वाने का विचार डालकर। यह वही है जिसने प्रभु के स्वर्गारोहण के बाद प्रेरितों का निरन्तर विरोध किया और सुसमाचार की प्रगति रोकने का यत्न किया। यह वही है जिसके विषय में पौलुस गवाही देता है कि "शैतान आप भी ज्योतिर्मय स्वर्गदूत का रूप धारण करता है," और झूठे शिक्षक उसके एजेंट हैं (2 कुरिन्थियों 11:14)।

क्या इस लेख का कोई पाठक मूर्खता से यह समझता है कि शैतान सो रहा है, या मर गया है, या अब पुराने समय से कम हानिकारक है? कदापि नहीं! वह अब भी "गर्जनेवाले सिंह की नाईं इस खोज में रहता है कि किसे फाड़ खाए।" वह अब भी "पृथ्वी पर इधर-उधर घूमता और डोलता फिरता है" (1 पतरस 5:8; अय्यूब 1:7)। वही है जो अन्यजातियों के बीच जाकर उन्हें मूर्तियों की पूजा या हत्यारे युद्धों में रक्त के सागर बहाने के लिए मनाता है। वही है जो पतित कलीसियाओं में इधर-उधर घूमकर उन्हें बाइबल को त्याग देने और लोगों को औपचारिक आराधना या घिनौने अन्धविश्वासों से सन्तुष्ट करने के लिए मनाता है। वही है जो प्रोटेस्टेंट देशों में डोलता फिरता है, और दलबन्दी तथा कटु राजनीतिक कलह भड़काता है, वर्ग को वर्ग के विरुद्ध और प्रजा को शासकों के विरुद्ध खड़ा करता है, ताकि लोगों का मन उत्तम बातों से भटक जाए। वही है जो बुद्धिजीवी और उच्च शिक्षित लोगों के कानों में निरन्तर जाकर उन्हें समझाता है कि पुरानी बाइबल सच नहीं है, और उन्हें नास्तिकता, ईश्वरवाद, अज्ञेयवाद, धर्मनिरपेक्षतावाद और आनेवाले संसार के प्रति सामान्य तिरस्कार से सन्तुष्ट रहने की सलाह देता है। सबसे बढ़कर, वही है जो मूर्ख लोगों को मनाता है कि शैतान जैसा कोई नहीं है, मृत्यु के बाद कोई भावी न्याय नहीं है, और कोई नरक नहीं है। इस सारी भयानक सूची के मूल में मैं दृढ़ता से मानता हूँ कि शैतान ही है, और वही सच्ची जड़, कारण और हेतु है। क्या हम क्षण भर भी मान सकते हैं कि वह सच्चे मसीहियों को चुपचाप स्वर्ग जाने देगा और मार्ग में उन्हें प्रलोभन न देगा?

इस मूर्खतापूर्ण विचार को दूर करो! हमें शैतान के विरुद्ध भी प्रार्थना करने की आवश्यकता है, जैसे संसार और शरीर के विरुद्ध। शत्रुओं की उस बड़ी त्रिएकता में, जिसे विश्वासी को प्रतिदिन स्मरण रखना चाहिए, शैतान शायद सबसे बड़ा है क्योंकि वह सबसे कम दिखाई देता है। उसे इतना आनन्द और किसी बात में नहीं मिलता (यदि वह कभी आनन्दित हो सकता है) जितना किसी सच्चे मसीही को हानि पहुँचाने और उससे उसके धर्म पर कलंक लगवाने में। जब मैं शैतान के विषय में सोचता हूँ, तो मुझे आश्चर्य नहीं होता कि पौलुस ने कहा, "दृढ़ता से थामे रहो।" "आओ, हम अपने अंगीकार को दृढ़ता से थामे रहें।"

अब मुझे सन्देह है कि इस लेख का कोई पाठक मन ही मन सोच रहा होगा कि मैं व्यर्थ भय दिखानेवाला हूँ, और ऐसी चौकसी, सावधानी और "दृढ़ता से थामे रहने" की कोई आवश्यकता नहीं है। मैं ऐसे व्यक्ति से कहता हूँ कि मेरे साथ कुछ क्षण के लिए बाइबल की ओर मुड़े, और गम्भीरता से विचार करे कि वह धन्य पुस्तक क्या सिखाती है।

मैं उससे कहता हूँ कि स्मरण रखे कि यहूदा इस्करियोती और देमास दोनों ने अच्छी रीति से आरम्भ किया था और अच्छा अंगीकार भी किया था। एक तो हमारे प्रभु यीशु मसीह का चुना हुआ प्रेरित था, तीन वर्ष तक हमारे धन्य उद्धारकर्ता का निरन्तर साथी रहा। वह उसके साथ चला, उससे बातें कीं, उसकी शिक्षा सुनी, उसके आश्चर्यकर्म देखे, और हमारे प्रभु के क्रूस पर चढ़ाए जाने से ठीक पहली रात तक पतरस, याकूब या यूहन्ना से बुरा मनुष्य कभी नहीं समझा गया। फिर भी इस अभागे मनुष्य ने अन्त में अपना अंगीकार छोड़ दिया, अपने स्वामी को पकड़वा दिया, दुखद अन्त को पहुँचा, और अपने ही स्थान को चला गया। -- दूसरा मनुष्य, जिसका मैंने नाम लिया, देमास, प्रेरित पौलुस का चुना हुआ साथी था, और उस महान परमेश्वर-जन के समान मन रखने का अंगीकार करता था। इसमें बहुत कम सन्देह है कि कई वर्ष तक वह उसके साथ यात्रा करता रहा, उसकी सहायता करता रहा, और उसके सुसमाचार-प्रचार के परिश्रम में सहभागी रहा। परन्तु अन्त में क्या हुआ? उसने अपना अंगीकार छोड़ दिया, और पौलुस की लिखी हुई अन्तिम पत्री में यह शोकपूर्ण वृत्तान्त मिलता है: "देमास ने इस संसार को प्रिय जानकर मुझे छोड़ दिया" (2 तीमुथियुस 4:10)। उसके विषय में फिर हम कभी कुछ नहीं सुनते।

जो कोई सोचता है कि मैं मसीही के खतरों पर बहुत अधिक रुका रहा, उससे मैं आज यह कहता हूँ: देमास को स्मरण करो, यहूदा इस्करियोती को स्मरण करो, अपनी पकड़ दृढ़ करो, "अपने अंगीकार को दृढ़ता से थामे रहो," और सावधान रहो। हम मनुष्यों को कुछ समय तक बहुत अच्छे मसीही प्रतीत हो सकते हैं, और फिर भी अन्त में पथरीली भूमि के सुननेवाले, और विवाह के वस्त्र से रहित निकल सकते हैं।

परन्तु बात इतनी ही नहीं है। मैं प्रत्येक विश्वासी से कहता हूँ कि स्मरण रखे कि यदि वह "दृढ़ता से न थामे रहे," तो वह अपने आप को बहुत से दुःखों से छलनी कर सकता है, और अपने चरित्र पर बड़ा कलंक ला सकता है। हमें दाऊद का ऊरिय्याह की पत्नी के विषय में भयंकर पतन, पतरस का अपने स्वामी का तीन बार इनकार करना, और क्रेनमर की क्षणिक कायरता कभी नहीं भूलनी चाहिए, जिसके लिए उसने अन्त में इतना कड़वा पश्चाताप किया। क्या हम उनसे बड़े और बलवन्त हैं? "हम अभिमानी न बनें, परन्तु डरते रहें।" एक ऐसा भक्तिपूर्ण भय है जो आत्मा के लिए बड़े काम का है। ये शब्द अन्यजातियों के उसी महान प्रेरित ने लिखे थे: "मैं अपनी देह को मारता कूटता, और वश में लाता हूँ, ऐसा न हो कि औरों को प्रचार करके मैं आप ही किसी रीति से निकम्मा ठहरूँ" (1 कुरिन्थियों 9:27)।

क्या इन पृष्ठों का कोई मसीही पाठक अपने धर्म में बहुत सुख, और विश्वास करने में बहुत आनन्द और शान्ति चाहता है? वह आज एक बूढ़े सेवक की सलाह मान ले, और "अपने अंगीकार को दृढ़ता से थामे रहे।" वह ठान ले कि अपनी आत्मा की दशा के विषय में बहुत गम्भीर, बहुत निश्चित, बहुत जागरूक और बहुत सावधान रहेगा। वह जितने साहस से अपना पक्ष प्रकट करेगा, और जितना अधिक अटल और दृढ़ रहेगा, उतना ही अपना हृदय हल्का पाएगा, और उतनी ही स्पष्टता से अनुभव करेगा कि सूर्य उसके मुख पर चमक रहा है। परमेश्वर की सेवा में दृढ़ निश्चयी मसीहियों के समान और कोई सुखी नहीं। जब रानी मरियम के समय का पहला शहीद जॉन रोजर्स जलाए जाने के लिए स्मिथफील्ड ले जाया जा रहा था, तो फ्रांस के राजदूत ने बताया कि वह ऐसा प्रसन्न और खिला हुआ दिखाई देता था मानो अपने विवाह के लिए जा रहा हो।

क्या इन पृष्ठों का कोई मसीही पाठक अपने धर्म में दूसरों के लिए बहुत उपयोगी होना चाहता है? मैं उसे विश्वास दिलाता हूँ कि जीवन के लम्बे चक्र में जो "अपने अंगीकार को" सबसे दृढ़ता से "थामे रहते" हैं और मसीह के सबसे निश्चयी सेवक हैं, उनके समान भलाई कोई नहीं करता, और वे अपनी पीढ़ी पर ऐसी छाप छोड़ते हैं जैसी और कोई नहीं छोड़ता। प्रोटेस्टेंट धर्म-सुधार के उद्देश्य के लिए, और इस देश में रोम की शक्ति को पूरी रीति से हिला देने के लिए, शायद उन दो उदार अध्यक्षों से अधिक किसी ने नहीं किया जो ऑक्सफोर्ड में एक ही खम्भे से पीठ से पीठ बाँधकर जलाए गए, और अपने प्राण बचाने के लिए भी अपना विश्वास नहीं छोड़ा। मुझे कहने की आवश्यकता नहीं कि मेरा संकेत रिडले और लैटिमर की ओर है। लापरवाह, विचारहीन, अधर्मी संसार भी ऐसे लोगों पर ध्यान देता है, और मानने को विवश होता है कि उनके धर्म में कुछ वास्तविक और ठोस बात है। हमारे जीवनों में जितना अधिक प्रकाश चमकेगा, उतनी ही अधिक भलाई हम संसार में करेंगे। यह व्यर्थ नहीं है कि हमारा प्रभु पहाड़ी उपदेश में कहता है, "उसी प्रकार तुम्हारा उजियाला मनुष्यों के सामने चमके, कि वे तुम्हारे भले कामों को देखकर तुम्हारे पिता की, जो स्वर्ग में है, बड़ाई करें" (मत्ती 5:16)।

आओ, इन सब बातों को अपनी स्मृति में संजो लें और कभी न भूलें। हमारे मन में यह एक स्थिर सिद्धान्त रहे कि हमारे सुख और उपयोगिता के लिए "अपने अंगीकार को दृढ़ता से थामे रहना" और सदा चौकस रहना अपार महत्त्व रखता है। आओ, इस आधुनिक कच्चे विचार को अपने मन से निकाल दें कि विश्वासी को बस चुपचाप बैठे रहना और अपने आप को परमेश्वर को "सौंप देना" है। आओ, हम पवित्रशास्त्र की भाषा को बनाए रखें, और "शरीर के कामों को मारने," "अपने शरीर को क्रूस पर चढ़ाने," "अपने आप को शरीर और आत्मा की सब मलिनता से शुद्ध करने," जूझने, लड़ने और सैनिक का जीवन जीने का प्रयत्न करें (रोमियों 8:13; गलातियों 5:24; 2 कुरिन्थियों 7:1; इफिसियों 6:12; 1 तीमुथियुस 6:12; 2 तीमुथियुस 2:3)। कोई सोच सकता है कि इफिसियों की पत्री में परमेश्वर के हथियारों का वर्णन हमारे कर्तव्य का प्रश्न सुलझाने के लिए पर्याप्त होना चाहिए। परन्तु सीधी सच्चाई यह है कि मनुष्य दो भिन्न बातों को गड्डमड्ड करने पर अड़े रहते हैं, अर्थात् धर्मी ठहराया जाना और पवित्रीकरण। धर्मी ठहराए जाने में मनुष्य से कहा जानेवाला वचन यह है: विश्वास करो, केवल विश्वास करो। पवित्रीकरण में वचन यह होना चाहिए: जागते रहो, प्रार्थना करो, और लड़ो। परमेश्वर ने जिन्हें अलग किया है, उन्हें हम मिलाकर उलझा न दें। "अपने अंगीकार को दृढ़ता से थामे रहने" के अपार महत्त्व का अपना गहरा बोध प्रकट करने के लिए मुझे शब्द नहीं मिलते।

III. अन्त में, आओ विचार करें कि मसीहियों के लिए अपने अंगीकार को दृढ़ता से थामे रखने के लिए कौन-सा प्रोत्साहन है।

प्रेरित पौलुस अनुग्रह और स्वभाव, दोनों के कारण, इस विषय को सँभालने के लिए अद्भुत रूप से उपयुक्त था। नए नियम के सब प्रेरित लेखकों में से किसी को भी मानव-हृदय के संघर्षों से निपटने के लिए परमेश्वर ने इतनी भली-भाँति सिखाया हुआ नहीं जान पड़ता जितना पौलुस को। आत्मा के खतरों, रोगों और उपचारों से उससे अधिक परिचित कोई न था। इसका प्रमाण रोमियों की पत्री के सातवें अध्याय और कुरिन्थियों की दूसरी पत्री के पाँचवें अध्याय में देखा जा सकता है। उन दोनों अध्यायों का प्रत्येक उस मसीही को बार-बार अध्ययन करना चाहिए जो अपने हृदय को समझना चाहता है।

अब वह प्रोत्साहन का कौन-सा आधार है जो पौलुस हमारे सामने रखता है? वह हमसे कहता है कि हम "अपने अंगीकार को दृढ़ता से थामे रहें," और उसे न छोड़ें, क्योंकि "हमारा ऐसा बड़ा महायाजक है जो स्वर्ग से होकर गया है, अर्थात् यीशु परमेश्वर का पुत्र।"

"महायाजक" शब्द एक यहूदी पाठक के कानों में अन्यजाति मसीहियों की तुलना में कहीं अधिक शक्ति से गूँजता। यह उसके मन में तम्बू और मन्दिर की सेवा की अनेक प्रतीकात्मक बातों की स्मृति जगा देता। यह उसे स्मरण कराता कि यहूदी महायाजक परमेश्वर और लोगों के बीच एक प्रकार का मध्यस्थ था; कि वही अकेला प्रति वर्ष प्रायश्चित के दिन एक बार परमपवित्र स्थान में जाता और परदे के भीतर दया-आसन तक पहुँचता था; कि वह बारह गोत्रों और परमेश्वर के बीच एक प्रकार का बिचवई था, जो दोनों पर अपना हाथ रखे (अय्यूब 9:33); कि वह परमेश्वर के भवन का प्रधान सेवक था, जिसे "अज्ञानियों और भटके हुओं के साथ नरमी से व्यवहार करने" के लिए ठहराया गया था (इब्रानियों 5:2)। इन सब बातों से यहूदियों को कुछ अनुमान हो जाता कि पौलुस का क्या अभिप्राय था जब उसने कहा, "आओ, हम दृढ़ता से थामे रहें," क्योंकि स्वर्ग में हमारा एक बड़ा महायाजक है। सीधी-सी सच्चाई यह है कि मसीही को यह समझना है कि स्वर्ग में हमारा एक सामर्थी, जीवित मित्र है, जो न केवल हमारे लिए मरा, वरन् फिर जी भी उठा, और जी उठने के बाद परमेश्वर के दाहिने हाथ बैठ गया, कि जब तक वह फिर न आए, पिता के सामने हमारा सहायक और मध्यस्थ बना रहे। हमें यह समझना है कि मसीह न केवल हमारे लिए मरा, पर हमारे लिए जीवित भी है, और आज के दिन भी हमारी ओर से सक्रिय रूप से कार्य कर रहा है। संक्षेप में, जो प्रोत्साहन पौलुस विश्वासियों के सामने रखता है वह यीशु मसीह का जीवित याजकपद है।

क्या उसका ठीक यही अभिप्राय नहीं था जब उसने इब्रानियों से कहा कि मसीह "उनका जो उसके द्वारा परमेश्वर के पास आते हैं पूरा-पूरा उद्धार कर सकता है, क्योंकि वह उनके लिए बिनती करने को सर्वदा जीवित है" (इब्रानियों 7:25)? क्या यही उसका अभिप्राय नहीं था जब उसने रोमियों से कहा, "क्योंकि बैरी होने की दशा में जब उसके पुत्र की मृत्यु के द्वारा हमारा मेल परमेश्वर के साथ हुआ, तो मेल हो जाने पर उसके जीवन के कारण हम और भी निश्चय उद्धार पाएँगे" (रोमियों 5:10)? क्या यही उसका अभिप्राय नहीं था जब उसने वह महिमामय चुनौती लिखी, "कौन है जो दण्ड की आज्ञा देगा? मसीह वह है जो मर गया, बरन् मुर्दों में से जी भी उठा, और परमेश्वर की दाहिनी ओर है, और हमारे लिए निवेदन भी करता है" (रोमियों 8:34)? यहाँ, एक ही शब्द में, विश्वासी की शान्ति का सोता है। उसे केवल ऐसे उद्धारकर्ता की ओर नहीं देखना है जो उसके स्थानापन्न के रूप में मरा और उसके लिए अपना लहू बहाया, पर ऐसे उद्धारकर्ता की ओर भी जो अपने पुनरुत्थान के बाद परमेश्वर के दाहिने हाथ बैठा, और वहाँ उसका निरन्तर मध्यस्थ और याजक बनकर जीवित है।

आइए, क्षण भर विचार करें कि हमारे अंगीकार का महायाजक कैसा अद्भुत और उपयुक्त महायाजक है, जो हारून के घराने के किसी भी महायाजक से लाखों गुना श्रेष्ठ है।

यीशु सर्वशक्तिमान सामर्थ्य का महायाजक है, क्योंकि वह यथार्थ परमेश्वर से यथार्थ परमेश्वर है, जो न कभी ऊँघता, न कभी सोता, न कभी मरता है, और सनातन है। यहूदी महायाजकों को "मृत्यु के कारण बने रहने नहीं दिया जाता था" (इब्रानियों 7:23), परन्तु मसीह मुर्दों में से जी उठकर फिर कभी नहीं मरता। हमारा महान महायाजक कभी बूढ़ा नहीं होता, और कभी नहीं मरता (रोमियों 6:9)।

यीशु ऐसा महायाजक है जो सिद्ध मनुष्य भी है और सिद्ध परमेश्वर भी। वह जानता है कि हमारी देह कैसी है, क्योंकि उसकी अपनी भी देह थी, और वह उसकी सारी निष्पाप दुर्बलता और पीड़ाओं से परिचित है। वह जानता है कि भूख, प्यास और दुःख क्या हैं, क्योंकि वह तैंतीस वर्ष पृथ्वी पर जिया, और शिशु, बालक, लड़के, जवान और पूर्ण आयु के मनुष्य की शारीरिक प्रकृति को जानता है। "उसने परीक्षा की दशा में दुःख उठाया" (इब्रानियों 2:18)।

यीशु अनुपम सहानुभूति का महायाजक है। वह "हमारी निर्बलताओं में हमारे साथ दुःखी" हो सकता है (इब्रानियों 4:15)। पृथ्वी पर रहते हुए उसका हृदय सदा प्रेम, तरस और करुणा से उमड़ता रहता था। वह लाज़र की कब्र पर रोया। वह अविश्वासी यरूशलेम के लिए रोया। उसका कान सहायता की हर पुकार सुनने को तैयार रहता था, और वह सदा बीमारों और दुखियों की भलाई करता फिरता था। क्रूस पर उसके अन्तिम विचारों में से एक अपनी माता की चिन्ता का था, और पुनरुत्थान के बाद उसके पहले सन्देशों में से एक अपने गिरे हुए बेचारे प्रेरितों के लिए "शान्ति" का था। और वह बदला नहीं है। वह उस अद्भुत हृदय को स्वर्ग में ले गया है, और दयालु कोमलता के साथ अपने झुण्ड के सबसे निर्बल मेम्ने को भी निरन्तर देखता रहता है।

यीशु सिद्ध बुद्धि का महायाजक है। वह ठीक-ठीक जानता है कि हममें से प्रत्येक कैसा है और हममें से प्रत्येक को किस बात की आवश्यकता है। "वह हमें हमारी सामर्थ्य से बाहर परीक्षा में न पड़ने देगा" (1 कुरिन्थियों 10:13), और न हमें दुःख की भट्ठी में उस समय से एक क्षण भी अधिक रहने देगा जितना हमें शुद्ध करने के लिए आवश्यक है। वह हमारे दिन के अनुसार हमें शक्ति देगा, और हमारी आवश्यकता के अनुसार अनुग्रह। वह हमारे हृदयों की गुप्त से गुप्त भावनाओं को जानता है, और हमारी निर्बल से निर्बल प्रार्थनाओं का अर्थ समझता है। वह हारून, एली, एब्यातार, हन्ना और कैफा के समान नहीं है, जो उन लोगों के साथ व्यवहार में, जो उनके पास आकर अपनी बिनतियाँ उनके सामने रखते थे, भूल करनेवाले और अपूर्ण महायाजक थे। वह कभी कोई भूल नहीं करता।

मैं इस लेख के हर पाठक को चुनौती देता हूँ कि यदि हो सके तो मुझे बताए कि मनुष्य की आत्मा को ऐसे महायाजक के होने से बढ़कर और कौन-सी शान्ति और प्रोत्साहन मिल सकता है? इन दिनों हम उसके विषय में पर्याप्त नहीं सोचते। हम उसकी मृत्यु, उसके बलिदान, उसके लहू, उसके प्रायश्चित और क्रूस पर उसके पूरे किए हुए कार्य की बात करते हैं; और निःसन्देह इन महिमामय विषयों को हम कभी बहुत अधिक महत्त्व नहीं दे सकते। परन्तु यदि हम यहीं रुक जाएँ तो हम बड़ी भूल करते हैं। हमें क्रूस और कब्र से आगे हमारे प्रभु मसीह के जीवन, याजकपद और निरन्तर मध्यस्थता की प्रार्थना की ओर देखना चाहिए। यदि हम ऐसा न करें तो मसीही सिद्धान्त का हमारा दृष्टिकोण अधूरा ही रहेगा। हमारे प्रभु के इस पक्ष की उपेक्षा के परिणाम बहुत गम्भीर हैं, और उन्होंने कलीसिया और संसार की बड़ी हानि की है।

हमारी सब कलीसियाओं में युवक-युवतियाँ, और सामान्यतः सभी नए विश्वासी, मसीह के याजकीय पद के विषय में सही शिक्षा के अभाव के कारण भारी हानि उठा रहे हैं। जीवन के सकरे मार्ग पर अपने सामने रखी दौड़ को दौड़ने के लिए वे अपने भीतर प्रतिदिन सहायता, अनुग्रह, बल और मार्गदर्शन की लालसा अनुभव करते हैं। यह सुनकर उन्हें सन्तोष नहीं होता कि उन्हें सदा क्रूस और प्रायश्चित की ओर पीछे मुड़कर देखते रहना चाहिए। उनके भीतर कुछ ऐसा है जो धीरे से कहता है कि उन्हें एक जीवित मित्र चाहिए। तब शैतान आकर सुझाव देता है कि वे सांसारिक याजकों के पास जाएँ, पाप-अंगीकार करें, पापमुक्ति पाएँ, और यह रीति निरन्तर निभाते रहें। वे प्रायः इस पर विश्वास करने को बहुत ही तत्पर रहते हैं, और प्रभु-भोज को अत्यधिक बार ग्रहण करके तथा किसी पादरी की आत्मिक निर्देशन-व्यवस्था के अधीन होकर अपनी आत्मा की भूख मिटाने का मूर्खतापूर्ण प्रयत्न करते हैं। यह सब धार्मिक अफ़ीम खाने और शराब पीने से कुछ ही बेहतर है। यह थोड़े समय के लिए हृदय को शान्त तो कर देता है, परन्तु वास्तव में कोई भलाई नहीं करता, और प्रायः आत्माओं को रुग्ण, अन्धविश्वासी दासता की दशा में पहुँचा देता है। यह वह औषधि नहीं है जो पवित्रशास्त्र ने ठहराई है। जो सत्य सब विश्वासियों को, और विशेषकर आज के युवक-युवतियों को बताना आवश्यक है, वह स्वर्ग में मसीह के जीवन और हमारे लिए उसकी याजकीय मध्यस्थता की प्रार्थना का सत्य है। हमें किसी सांसारिक पाप-अंगीकार सुननेवाले की आवश्यकता नहीं, और किसी सांसारिक याजक की भी नहीं। केवल एक ही महायाजक है जिसके पास हमें अपनी प्रतिदिन की आवश्यकताएँ लेकर जाना चाहिए, अर्थात् परमेश्वर का पुत्र यीशु। उससे अधिक सामर्थी, अधिक प्रेमी, अधिक बुद्धिमान और सहायता करने को अधिक तत्पर कोई और मिलना असम्भव है। एक पुराने धर्मशास्त्री का यह कथन बुद्धिमानी का है कि "विश्वासी की आँखें परमेश्वर के साथ अपने सब व्यवहार में मसीह पर टिकी रहनी चाहिए। एक आँख उसके अर्पण पर लगी रहे, और दूसरी उसकी मध्यस्थता की प्रार्थना पर।" हम इसे कभी न भूलें। अपने अंगीकार को दृढ़ता से थामे रहने का सच्चा भेद यह है कि हम मसीह के याजकीय पद में निरन्तर विश्वास करते रहें और प्रतिदिन उससे लाभ उठाते रहें।

जो इस सिद्धान्त पर चलता है, वह पाएगा कि किसी भी स्थिति में, चाहे वह कितनी ही कठिन क्यों न हो, परमेश्वर की सेवा करना और मसीही बने रहना सम्भव है। उसे एक क्षण के लिए भी यह नहीं समझना चाहिए कि संसार से अलग होकर किसी मठ में चले जाने, या किसी गुफा में संन्यासी की तरह रहने के बिना सच्चा धर्म नहीं हो सकता। किसी युवती को यह नहीं मान लेना चाहिए कि अपने ही परिवार में, अपने अपरिवर्तित माता-पिता, भाइयों और बहनों के कारण, वह परमेश्वर की सेवा नहीं कर सकती, और उसे अपने जैसे विचारोंवाली कुछ स्त्रियों के साथ किसी तथाकथित "धार्मिक भवन" में चले जाना चाहिए। ऐसे सब विचार निरर्थक और पवित्रशास्त्र के विरुद्ध हैं; वे नीचे से आते हैं, ऊपर से नहीं। स्कूल या कॉलेज में, सेना या नौसेना में, बैंक में या वकालत में, व्यापारी के घर में या शेयर बाज़ार में, मनुष्य के लिए परमेश्वर की सेवा करना सम्भव है। घर में पुत्री के रूप में, या किसी उच्च विद्यालय की शिक्षिका के रूप में, या किसी व्यापारिक प्रतिष्ठान की सहायिका के रूप में, स्त्री परमेश्वर की सेवा कर सकती है, और उसे कभी इस कायरतापूर्ण विचार के आगे नहीं झुकना चाहिए कि यह असम्भव है। परन्तु यह सब कैसे हो? केवल परमेश्वर के पुत्र में विश्वास का जीवन जीने से, प्रतिदिन के क्षमादान और विवेक की शान्ति के लिए क्रूस पर और उसके लहू के सोते की ओर निरन्तर पीछे मुड़कर देखने से, और परमेश्वर के दाहिने हाथ पर हमारे लिए मध्यस्थता की प्रार्थना करते हुए उसकी ओर प्रतिदिन ऊपर देखने से, तथा इस आवश्यकताओं से भरे संसार में उससे प्रतिदिन अनुग्रह की आपूर्ति पाते रहने से। सारी बात का सार यही है। हमारा एक ऐसा महान महायाजक है जो स्वर्ग में से होकर जा चुका है, और उसी के द्वारा न केवल आरम्भ करना, वरन् अपने अंगीकार को "दृढ़ता से थामे रहना" भी सम्भव है।

अब मैं इस निबन्ध का समापन उस हर पाठक के लिए, जिसके हाथ में यह पड़े, सीधी और व्यावहारिक प्रेरणा के कुछ शब्दों के साथ करता हूँ।

(क) क्या आप उस विशाल वर्ग के तथाकथित मसीहियों में से हैं जो धर्म का कोई अंगीकार करते ही नहीं? हाय! यह खेद की बात है कि यह वर्ग इतना बड़ा हो; परन्तु इस तथ्य की ओर से आँखें मूँदना व्यर्थ है कि यह बहुत बड़ा है। जिनकी मैं बात कर रहा हूँ वे नास्तिक या अविश्वासी नहीं हैं; उन्हें यह कहा जाना कि वे मसीही नहीं हैं, एक क्षण के लिए भी अच्छा न लगेगा। वे आराधना के स्थानों में जाते हैं, वे मसीही धर्म को बपतिस्मा, विवाह और अन्त्येष्टि के अवसरों के लिए बहुत उचित वस्तु समझते हैं। वे भोजन से पहले और बाद में धन्यवाद की प्रार्थना करते हैं; वे चाहते हैं कि उनके बच्चों की शिक्षा में कुछ धर्म भी हो। परन्तु वे कभी इससे आगे बढ़ते नहीं दिखते; वे "अंगीकार" करने से कतराते हैं। उनसे "दृढ़ता से थामे रहने" को कहना व्यर्थ है, क्योंकि उनके पास थामने को कुछ है ही नहीं।

मैं ऐसे लोगों से पूरे स्नेह और भलाई की भावना से कहता हूँ कि वे विचार करें कि उनकी स्थिति कितनी अनुचित और असंगत है। उनमें से अधिकांश प्रेरितों के विश्वास-सूत्र को मानते हैं। वे मानते हैं कि परमेश्वर है, और मृत्यु के बाद आनेवाला संसार है, और पुनरुत्थान है, और न्याय है, और अनन्त जीवन है। परन्तु इन सब विशाल वास्तविकताओं पर विश्वास करते हुए भी उस महान भविष्य की कोई तैयारी किए बिना कब्र की ओर बढ़ते जाने से अधिक निरर्थक और क्या हो सकता है? आप इनकार नहीं करेंगे कि आपको प्रभु यीशु से मिलना होगा

मसीह से, जो सबका न्यायी है, जब अन्तिम तुरही बजेगी, और आप बड़े श्वेत सिंहासन के सामने खड़े होंगे। परन्तु उस भयानक दिन में आप कहाँ होंगे, यदि पृथ्वी पर अपने जीवन-काल में आपने उस न्यायी के प्रति विश्वास, प्रेम और आज्ञाकारिता का कभी अंगीकार ही नहीं किया? आप उससे यह आशा कैसे कर सकते हैं कि उस घड़ी वह आपको अंगीकार करे और अपना माने, यदि आप पृथ्वी पर रहते हुए उसे अंगीकार करने से डरते या लज्जित होते रहे, और खुलकर उसके पक्ष में अपने को प्रकट न किया?

मैं तुमसे विनती करता हूँ, इन बातों पर विचार करो और अपने जीवन की योजना बदल डालो। व्यर्थ के बहाने और विलम्ब के तुच्छ कारण त्याग दो। परमेश्वर के अनुग्रह से ठान लो कि तुम यीशु मसीह को दृढ़ता से थाम लोगे और पुरुषार्थ के साथ उसी की पताका के नीचे भरती हो जाओगे। वह धन्य उद्धारकर्ता तुम्हें वैसा ही ग्रहण करेगा जैसे तुम हो, चाहे तुम स्वयं को कितना ही अयोग्य क्यों न समझो। किसी बात की बाट मत जोहो, और किसी की प्रतीक्षा मत करो। आज ही से प्रार्थना करना आरम्भ करो, और सच्ची, जीवित, उत्साहपूर्ण प्रार्थनाएँ करो, जैसी उस पश्चातापी चोर ने क्रूस पर की थीं। अपनी बहुत दिनों से उपेक्षित बाइबल उतारो और उसे पढ़ना शुरू करो। हर जानी-पहचानी बुरी आदत को तोड़ दो। पूरे मन से चलनेवाले मसीहियों की संगति और मित्रता खोजो। उन स्थानों में जाना छोड़ दो जहाँ तुम्हारी आत्मा को हानि के सिवा कुछ नहीं मिल सकता। एक शब्द में, "अंगीकार" करना आरम्भ करो, और न मनुष्य की हँसी से डरो, न उसके तिरस्कार से। प्रभु यीशु का वचन दूसरों के लिए जैसा है वैसा ही तुम्हारे लिए भी है: "जो कोई मेरे पास आएगा उसे मैं कभी न निकालूँगा" (यूहन्ना 6:37)। मैंने मृत्यु-शय्या पर पड़े बहुत से लोगों को देखा है, परन्तु ऐसा कोई नहीं मिला जिसने कहा हो कि उसे धर्म का "अंगीकार" करने का खेद है।

(ख) अन्त में, क्या तुम उस बहुत छोटे वर्ग के लोगों में से हो जो सचमुच मसीही विश्वास और मसीही आज्ञाकारिता का अंगीकार करते हैं, और एक बुरे संसार के बीच, चाहे कितनी ही दुर्बलता से, मसीह के पीछे चलने का प्रयत्न कर रहे हैं? मैं समझता हूँ कि तुम्हारे हृदयों में जो कुछ होता है उसके बारे में मैं कुछ जानता हूँ। तुम कभी-कभी अनुभव करते हो कि तुम अन्त तक स्थिर न रह सकोगे और किसी दिन अपना अंगीकार छोड़ने को विवश हो जाओगे। कभी-कभी तुम्हें अपने विरुद्ध कड़वी बातें लिखने की परीक्षा होती है और तुम सोचने लगते हो कि तुम्हारे पास अनुग्रह है ही नहीं। मुझे भय है कि ऐसी दशा में असंख्य सच्चे मसीही हैं, जो काँपते और सन्देह करते हुए स्वर्ग की ओर बढ़ते हैं, और 'यात्री की प्रगति' के निराशा, बहुत-डरपोक और भयभीत के साथ यह डरते हैं कि वे स्वर्गीय नगर तक कभी पहुँचेंगे ही नहीं। परन्तु आश्चर्य की बात है कि अपनी सारी कराहों, सन्देहों और भयों के होते हुए भी वे उस नगर को नहीं लौटते जहाँ से वे आए थे (इब्रानियों 11:15)। वे थके होने पर भी पीछा करते हुए आगे बढ़ते जाते हैं, और जैसा जॉन

वेस्ली अपने लोगों के विषय में कहा करता था, "उनका अन्त भला होता है।"

अब, यदि ऐसे लोगों में से कोई यह लेख पढ़ रहा हो, तो मेरी उनको सलाह बहुत सरल है। अपने जीवन के हर सवेरे और हर सन्ध्या को कहो, "हे प्रभु, मेरा विश्वास बढ़ा।" अपनी दृष्टि को अधिक सरलता से यीशु मसीह पर टिकाने की आदत डालो, और यह अधिक जानने का प्रयत्न करो कि उसमें उसके हर विश्वासी जन के लिए कैसी परिपूर्णता भण्डारित है। अपने हृदय की अपूर्णताओं पर सदा झुककर विचार करते न रहो, और अपने उलझानेवाले पापों की चीर-फाड़ न करते रहो। ऊपर देखो। स्वर्ग में अपने जी उठे सिर की ओर अधिक देखो, और जितना अब तक समझते आए हो उससे अधिक यह समझने का प्रयत्न करो कि प्रभु यीशु केवल तुम्हारे लिए मरा ही नहीं, वरन् वह फिर जी भी उठा, और परमेश्वर के दाहिने हाथ पर तुम्हारे महायाजक, तुम्हारे सहायक और तुम्हारे सर्वशक्तिमान मित्र के रूप में सदा जीवित है। जब प्रेरित पतरस "पानी पर चलकर यीशु के पास गया," तब जब तक उसकी दृष्टि अपने सर्वशक्तिमान स्वामी और उद्धारकर्ता पर टिकी रही, वह भली-भाँति चलता रहा। परन्तु जब उसने आँधी और लहरों की ओर देखा, और तर्क करने लगा, और अपने बल और अपने शरीर के भार पर विचार करने लगा, तो वह शीघ्र ही डूबने लगा और चिल्ला उठा, "हे प्रभु, मुझे बचा।" कोई आश्चर्य नहीं कि हमारे अनुग्रहकारी प्रभु ने उसका हाथ पकड़कर उसे जल की कब्र से बचाते हुए कहा, "हे अल्पविश्वासी, तूने क्यों सन्देह किया?" हाय! हम में से बहुत लोग पतरस के समान हैं,—हम यीशु से दृष्टि हटा लेते हैं, और तब हमारा हृदय बैठने लगता है और हम डूबता हुआ अनुभव करते हैं (मत्ती 14:28-31)।

अन्त में यह भी सोचो कि पिछले अठारह सौ वर्षों में तुम्हारे ही समान कितने लाखों स्त्री-पुरुष सुरक्षित घर पहुँच चुके हैं। तुम्हारी ही तरह उनके भी संघर्ष और युद्ध थे, उनके भी सन्देह और भय थे। उनमें से कुछ को "विश्वास करने में आनन्द और शान्ति" बहुत कम मिली, और जब वे स्वर्गलोक में जागे तो उन्हें लगभग आश्चर्य ही हुआ। उनमें से कुछ ने पूर्ण निश्चयता और दृढ़ सान्त्वना का सुख पाया, और पूरे पाल तानकर चलनेवाले किसी शूरवीर जहाज़ की तरह अनन्त जीवन के बन्दरगाह में प्रवेश किया। और ये अन्तिम जन कौन हैं जिन्होंने ऐसा किया? वे जिन्होंने अपने अंगीकार को केवल उँगली और अँगूठे के बीच नहीं पकड़ा, वरन् उसे दोनों हाथों से कसकर थामे रखा, और मनुष्यों के सामने मसीह का अंगीकार न करने की अपेक्षा उसके लिए मरने को तैयार रहे। हे विश्वासी, साहस रख। तू जितना अधिक निर्भीक और दृढ़ निश्चयी होगा, मसीह में तुझे उतनी ही अधिक शान्ति मिलेगी। तू दो स्वर्ग नहीं पा सकता, एक यहाँ और दूसरा परलोक में। तू अभी संसार में है, तेरे पास शरीर है, और तेरे निकट सदा एक व्यस्त शैतान रहता है। परन्तु बड़ा विश्वास सदा बड़ी शान्ति पाएगा। धर्म में सबसे सुखी वही स्त्री या पुरुष होगा जो सच्चे मन से पौलुस के समान कह सके, "मैं शरीर में जो जीवन जी रहा हूँ वह परमेश्वर के पुत्र के विश्वास से जीता हूँ, जिसने मुझसे प्रेम किया और मेरे लिए अपने आप को दे दिया।" अपने में मुझे कुछ दिखाई नहीं देता, परन्तु मैं निरन्तर यीशु की ओर देखता रहता हूँ, और उसके अनुग्रह से अपने अंगीकार को दृढ़ता से थामे रहता हूँ (गलातियों 2:20)।

और अब मैं इस महान और गम्भीर विषय को छोड़ने से पहले, जो भी इसे पढ़े उन सब को, उन दिनों के विषय में जिनमें हम जी रहे हैं, विदा की एक चेतावनी दिए बिना नहीं रह सकता। मैं संक्षेप में समझाने का प्रयत्न करूँगा कि मेरा क्या तात्पर्य है।

तब मेरा विश्वास है कि तीन सौ वर्षों में ऐसा कोई युग नहीं हुआ जिसमें अंगीकार करनेवाले मसीहियों को "दृढ़ता से थामे रहने" का आग्रह करना उतना आवश्यक रहा हो जितना इस समय है। निःसन्देह आजकल एक प्रकार का धर्म तो बहुतायत से है। तीस वर्ष पहले की अपेक्षा देश भर में सार्वजनिक आराधना में आनेवालों की संख्या कहीं अधिक है। परन्तु इसमें सन्देह करने का पूरा कारण है कि जीवित मसीही धर्म में कोई वृद्धि हुई है। यदि मैं बहुत भूल में नहीं हूँ, तो धर्म में किसी भी बात को "दृढ़ता से न थामने" और हर बात को यथासम्भव ढीले ढंग से पकड़ने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। "कुछ भी दृढ़ नहीं! सब कुछ ढीला!" यही आजकल का चलन प्रतीत होता है।

विश्वास और सिद्धान्त के विषयों में क्या स्थिति है? पहले यह महत्वपूर्ण समझा जाता था कि पवित्रशास्त्र की प्रेरणा, प्रायश्चित, आत्मा के कार्य, शैतान के व्यक्तित्व और भावी दण्ड की वास्तविकता जैसी बातों पर स्पष्ट और निश्चित विचार रखे जाएँ। अब ऐसा नहीं समझा जाता। पुरानी व्यवस्था समाप्त हो गई है। इन विषयों में आप चाहे कुछ भी मानें या कुछ भी न मानें, बस इतना काफ़ी है कि आप उत्साही और निष्कपट हों। दृढ़ता से थामे रहने का स्थान ढीले ढाले ढंग से थामने ने ले लिया है।

आराधना और विधि-विधान के विषयों में क्या स्थिति है? पहले यह महत्वपूर्ण समझा जाता था कि प्रार्थना-पुस्तक की सीधी-सादी शिक्षा से सन्तुष्ट रहा जाए। अब ऐसा नहीं समझा जाता। प्रार्थना-पुस्तक में ज़रा भी आधार न होते हुए भी प्रभु की मेज़ को वेदी और संस्कार को बलिदान कहा जाना चाहिए, और इन नए विचारों के अनुकूल कर्मकाण्ड होना चाहिए। फिर यदि आप शिकायत करें, तो आपसे कहा जाता है कि आप बहुत संकीर्ण और अनुदार हैं, और यह कि पादरी को कुछ भी करने, कहने और सिखाने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए, बस वह उत्साही और निष्कपट हो। दृढ़ता से थामे रहने का स्थान ढीले ढाले ढंग से थामने ने ले लिया है।

पवित्र जीवन के विषय में क्या स्थिति है? पहले यह महत्वपूर्ण समझा जाता था कि "इस दुष्ट संसार के आडम्बर और घमण्ड का त्याग" किया जाए, और घुड़दौड़, नाटक-घर जाने, नाच-रंग, ताश खेलने और ऐसी ही बातों से दूर रहा जाए। अब ऐसा नहीं समझा जाता। आप जो चाहें करें और जहाँ चाहें जाएँ, बस लेंट का पालन करते रहें और कभी-कभार सुबह के प्रभु-भोज में सम्मिलित हो जाएँ! आपको इतना कठोर और नियम-पालक नहीं होना चाहिए! मैं फिर कहता हूँ, दृढ़ता से थामे रहने का स्थान ढीले ढाले ढंग से थामने ने ले लिया है।

यह स्थिति, कम से कम शब्दों में कहें तो, सन्तोषजनक नहीं है। यह संकट से भरी है। यह मसीही विश्वास की ऐसी दशा को दर्शाती है जिससे, मुझे निश्चय है, पौलुस या यूहन्ना सन्तुष्ट न होते। अठारह शताब्दी पहले संसार को ऐसे अस्पष्ट, ढीले सिद्धान्त और आचरण से उलट-पलट नहीं किया गया था। आज के समय में मनुष्यों की आत्माओं को ऐसे ढीले मसीही विश्वास से इंग्लैंड में या कहीं और कुछ विशेष लाभ कभी नहीं मिलेगा। शिक्षा और जीवन में दृढ़ निश्चय ही वह एकमात्र मसीही विश्वास है जिसे परमेश्वर ने बीते युगों में आशीष दी है, और हमारे अपने समय में भी आशीष देता रहेगा। ढीला, अस्पष्ट, धुँधला, "व्यापक" मसीही विश्वास ठेस पहुँचाने से बच सकता है और स्वास्थ्य और समृद्धि के दिनों में लोगों को भा सकता है, परन्तु वह आत्माओं को मन फिराव की ओर नहीं ला सकता, और न दुःख या बीमारी की घड़ी में, या मृत्यु-शय्या पर, ठोस सान्त्वना दे सकता है।

सीधी सच्ची बात यह है कि आजकल बहुत से अंग्रेज़ मसीहियों के लिए "निष्कपटता और उत्साह" ही मूर्ति बनते जा रहे हैं। लोग मानो यह समझते हैं कि धर्म में मनुष्य के विचार क्या हैं इसका कोई विशेष महत्व नहीं, बस वह "उत्साही और निष्कपट" हो; और यदि आप विश्वास में उसकी दृढ़ता पर सन्देह करें तो आपको निर्दयी समझा जाता है! केवल "उत्साह" की इस मूर्तिपूजा के विरुद्ध मैं गम्भीरता से अपना विरोध प्रकट करता हूँ। इस लेख के प्रत्येक पाठक को मैं चिताता हूँ कि परमेश्वर का लिखित वचन ही विश्वास का एकमात्र नियम है, और धर्म में ऐसी किसी बात को सत्य और आत्मा को बचानेवाली न मानो जो पवित्रशास्त्र के स्पष्ट पदों से प्रमाणित न की जा सके। मैं उससे विनती करता हूँ कि वह बाइबल पढ़े, और उसी को सत्य और भ्रम, सही और ग़लत की अपनी एकमात्र कसौटी बनाए। और अन्तिम बार मैं कहता हूँ, "दृढ़ता से थामे रहो, ढीला न छोड़ो — अपने अंगीकार को दृढ़ता से थामे रहो।"

मत्ती 8:11 बहुत से

"बहुत से लोग पूर्व और पश्चिम से आकर अब्राहम, इसहाक और याकूब के साथ स्वर्ग के राज्य में बैठेंगे।" — मत्ती 8:11।

इस पृष्ठ के शीर्ष पर लिखे पवित्रशास्त्र के ये वचन हमारे प्रभु यीशु मसीह ने कहे थे। आप इन्हें भविष्यद्वाणी भी मान सकते हैं और प्रतिज्ञा भी। दोनों दृष्टियों से ये अत्यन्त रोचक हैं और इनमें मनन के लिए बहुत कुछ है।

इन वचनों को भविष्यद्वाणी मानकर चलें, और स्मरण रखें कि ये अवश्य पूरे होंगे। बाइबल में ऐसी बहुत-सी भविष्यद्वाणियाँ हैं जो अत्यन्त असम्भव और अनहोनी लगती थीं, फिर भी सच निकलीं। क्या इश्माएल के विषय में, जो अरब जाति का पिता था, यह नहीं कहा गया था कि वह "जंगली मनुष्य होगा, उसका हाथ सबके विरुद्ध और सबके हाथ उसके विरुद्ध होंगे"? (उत्पत्ति 16:12)। जब हम सूडान की जातियों को देखते हैं या बद्दुओं के रहन-सहन पर ध्यान देते हैं, तो आज भी उन वचनों की पूर्ति देखते हैं। — क्या मिस्र के विषय में यह नहीं कहा गया था कि वह अन्त में "सब राज्यों में सबसे नीचा" हो जाएगा, और उसके निवासी ऐसे लोग होंगे जो न अपने ऊपर शासन कर सकेंगे और न उन पर शासन किया जा सकेगा? (यहेजकेल 29:15)। नील की पूरी घाटी में आज भी हम उन वचनों की पूर्ति देखते हैं, और यूरोप का हर राजनेता इसे अपने दुःख के साथ जानता है। ठीक यही बात हमारे सामने की इस भविष्यद्वाणी के साथ भी होगी। "बहुत से लोग स्वर्ग के राज्य में बैठेंगे।"

इन वचनों को प्रतिज्ञा मानकर चलें। यह प्रेरितों के प्रोत्साहन के लिए, और आज तक के सब मसीही सेवकों और शिक्षकों के प्रोत्साहन के लिए कही गई थी। हम अकसर यह सोचने के लिए परखे जाते हैं कि प्रचार करना, सिखाना, भेंट करना और आत्माओं को मसीह के पास लाने का प्रयत्न करना कुछ लाभ नहीं देता, और हमारा सारा परिश्रम व्यर्थ जाता है। परन्तु यहाँ उसकी प्रतिज्ञा है जो "झूठ नहीं बोल सकता" और जिसने अपना वचन निभाने में कभी चूक नहीं की। वह हमें एक अनुग्रहपूर्ण वाक्य से उत्साहित करता है। वह चाहता है कि हम न थकें और न निराशा के आगे झुकें। हम चाहे जो सोचें, और हमें चाहे कितनी ही कम सफलता दिखे, हमारे सामने पवित्रशास्त्र का एक ऐसा वचन है जो टल नहीं सकता: "बहुत से लोग स्वर्ग के राज्य में बैठेंगे।"

I. इन वचनों में पहले हम उन लोगों की संख्या देखते हैं जिनका उद्धार होगा। हमारे प्रभु यीशु मसीह घोषणा करते हैं कि वे "बहुत" होंगे।

"बहुत" शब्द कितना अनोखा लगता है! क्या कोई ऐसा भी बचाया जाएगा जो नए सिरे से जन्मा नहीं, मसीह के लहू से धोया नहीं गया और पवित्र आत्मा से पवित्र नहीं किया गया?

क्या (शिशुओं को छोड़कर) कोई ऐसा भी बचाया जाएगा जिसने पाप से मन नहीं फिराया, क्षमा के लिए प्रभु यीशु पर विश्वास नहीं किया, और जिसका हृदय पवित्र नहीं किया गया? कोई नहीं, कोई नहीं, निश्चय ही कोई नहीं। यदि स्त्री-पुरुष मन फिराव, विश्वास और पवित्रता के बिना बच सकते हैं, तो हम बाइबल को फेंक दें और मसीही विश्वास को पूरी तरह छोड़ दें।

परन्तु क्या संसार में इस प्रकार के बहुत लोग दिखाई देते हैं? हाय! बहुत ही थोड़े हैं। जिन विश्वासियों को हम देखते और जानते हैं वे "छोटा झुण्ड" हैं। "क्योंकि सकेत है वह फाटक और सकरा है वह मार्ग जो जीवन को पहुंचाता है, और थोड़े हैं जो उसे पाते हैं" (मत्ती 7:14)। नगरों में थोड़े दिखाई देते हैं, और देहात के गांवों में भी थोड़े! धनवानों में थोड़े, और कंगालों में भी थोड़े! बूढ़ों में थोड़े, और जवानों में भी थोड़े! विद्वानों में थोड़े, और अनपढ़ों में भी थोड़े! महलों में थोड़े, और झोंपड़ियों में भी थोड़े! सब सच्चे मसीहियों के लिए यह एक स्थायी दुःख है कि उन्हें इतने थोड़े लोग मिलते हैं जिनके साथ वे प्रार्थना कर सकें, स्तुति कर सकें, बाइबल पढ़ सकें और आत्मिक बातों की चर्चा कर सकें। वे प्रायः अपने आप को अकेला पाते हैं। बहुत से लोग ऐसे हैं जो जनवरी के पहले दिन से लेकर दिसम्बर के अन्तिम दिन तक कभी किसी आराधना-स्थल में नहीं जाते, और संसार में परमेश्वर के बिना जीवन बिताते प्रतीत होते हैं। किसी भी मण्डली में प्रभु-भोज में सम्मिलित होनेवाले थोड़े ही हैं — उनकी तुलना में मुट्ठी भर, जो प्रभु की मेज़ पर कभी जाते ही नहीं। वे स्त्री-पुरुष थोड़े ही हैं जो पृथ्वी पर मसीह के उद्देश्य के लिए कुछ करते हैं, या जिन्हें इस बात की चिन्ता प्रतीत होती है कि उनके आस-पास के लोग खो जाएंगे या उनका उद्धार होगा। क्या कोई इन बातों से इनकार कर सकता है? असम्भव! फिर भी हमारे प्रभु यीशु मसीह यहां कह रहे हैं, "बहुत से लोग स्वर्ग के राज्य में भोज में बैठेंगे।"

तो फिर हमारे प्रभु ने ऐसा क्यों कहा? उनसे कभी कोई भूल नहीं हुई, और वे जो कहते हैं वह सब सत्य है। मुझे इस प्रश्न पर कुछ प्रकाश डालने दीजिए।

(क) "बहुत" होंगे, जब वे सब इकट्ठे किए जाएंगे जो प्रभु में मरे हैं — हाबिल से लेकर, जो पहला सन्त था, उस अन्तिम जन तक जो तुरही बजने और पुनरुत्थान होने के समय जीवित पाया जाएगा। वे "एक ऐसी बड़ी भीड़ होंगे जिसे कोई गिन नहीं सकता" (प्रकाशित वाक्य 7:9)।

(ख) "बहुत" होंगे, जब वे सब शिशु, जो भले-बुरे में या अपने दाहिने-बाएं हाथ में भेद जानने से पहले ही मर गए, अपनी छोटी कब्रों से बुलाए जाएंगे और इकट्ठे किए जाएंगे। शायद थोड़े ही लोग जानते हैं कि बच्चों का कितना बड़ा अनुपात एक वर्ष भी जीवित नहीं रहता! वे "एक ऐसी भीड़ होंगे जिसे कोई गिन नहीं सकता।"

(ग) "बहुत" होंगे, जब हर नाम, जाति, लोग और भाषा के सब विश्वासी — पुराने नियम के सन्त, जैसे हनोक, नूह, अब्राहम, इसहाक, याकूब, मूसा, दाऊद और भविष्यद्वक्ता, — नए नियम के सन्त, जैसे प्रेरित, आदि मसीहियों में से सन्त, और धर्म-सुधारक, — जब ये सब इकट्ठे किए जाएंगे, तो वे "एक ऐसी भीड़ होंगे जिसे कोई गिन नहीं सकता।"

(घ) "बहुत" होंगे, जब वे सच्चे मसीही इकट्ठे किए जाएंगे जो अब पृथ्वी की सतह पर बिखरे हुए हैं, और जिन्हें न कलीसिया जानती है न संसार। कुछ थोड़े नहीं हैं जो किसी मण्डली के नहीं हैं, और जिनके नाम प्रभु-भोज में सम्मिलित होनेवालों की किसी सूची में नहीं हैं, यद्यपि उनके नाम मेम्ने की जीवन की पुस्तक में हैं। उनमें से कुछ बड़े उपेक्षित गांवों में अनजाने और बिना किसी के भेंट किए जीते और मरते हैं। उनमें से कुछ स्वदेश या विदेश में मिशनरियों द्वारा सुसमाचार का प्रचार सुनकर सत्य को पकड़ लेते हैं; यद्यपि प्रचारक उन्हें कभी नहीं जान पाया, और वे कभी औपचारिक रूप से मन फिरानेवालों की सूची में दर्ज नहीं हुए। उनमें से कुछ सैनिक और नाविक हैं, जो पलटनों में और जहाज़ों पर अकेले खड़े रहते हैं, और जिन्हें उनके साथी नहीं समझते। मेरा विश्वास है कि ऐसे असंख्य लोग हैं जो विश्वास का जीवन जीते हैं, और मसीह से प्रेम रखते हैं, और प्रभु उन्हें जानता है, चाहे मनुष्य नहीं जानते। ये भी "उस भीड़ में, जिसे कोई गिन नहीं सकता" बड़ी वृद्धि करेंगे।

सीधी सच्ची बात यह है कि परमेश्वर का परिवार अन्त में उससे कहीं बड़ा पाया जाएगा जितना हम में से अधिकतर लोग समझते हैं। हम उन बातों को देखते हैं जो अपनी आंखों से देखते हैं, और भूल जाते हैं कि संसार में, यूरोप, एशिया, अफ्रीका और अमेरिका में कितना कुछ हो रहा है जिसे हमारी आंखें बिलकुल नहीं देखतीं। हमारे आस-पास के सब लोगों में से अधिकांश का भीतरी जीवन एक छिपी हुई बात है, जिसके विषय में हम कुछ नहीं जानते। हम बीते युगों के विषय में नहीं सोचते, और उन अनगिनत करोड़ों के विषय में नहीं सोचते जो अब "धूल और राख" हैं, यद्यपि हर एक अपनी-अपनी बारी में मसीह में सो गया, और अब्राहम की गोद में पहुंचाया गया। निःसन्देह यह पूर्णतः सत्य है कि "चौड़ा है वह फाटक और चाकल है वह मार्ग जो विनाश को पहुंचाता है; और बहुतेरे हैं जो उसमें प्रवेश करते हैं" (मत्ती 7:13)। यह सोचकर भय लगता है कि हमारे आस-पास के लोगों में कितना बड़ा बहुमत पापों में मरा हुआ और परमेश्वर से मिलने के लिए बिलकुल तैयार नहीं दिखाई देता। परन्तु फिर भी हमें परमेश्वर की सन्तानों की संख्या को कम नहीं आंकना चाहिए। यदि यह मान भी लें कि मनुष्य के अनुमान से वे अल्पसंख्या में हैं, तो भी अन्त में वे महिमा के राज्य में बहुत सिद्ध होंगे, एक विशाल समूह, "एक ऐसी भीड़ जिसे कोई गिन नहीं सकता।"

क्या इस लेख का कोई पाठक विश्वास पर हँसने को तैयार है, क्योंकि जो इसे दृढ़ता से मानते हैं वे गिनती में थोड़े हैं? क्या तुम मन ही मन उन लोगों को तुच्छ जानते हो जो अपनी बाइबल पढ़ते हैं, और अपने विवेक के कारण रविवार को पवित्र रखते हैं, और परमेश्वर के साथ निकटता से चलने का यत्न करते हैं? क्या तुम स्वयं अपना विश्वास प्रकट करने से इसलिए डरते हो कि तुम्हें लगता है कि तुम्हारे साथ बहुत थोड़े होंगे और विरोध में बहुत होंगे, और तुम्हें अलग दिखना और अकेले खड़ा होना अच्छा नहीं लगता? हाय! तुम्हारे जैसे लोग तो सदा से बहुत रहे हैं! जब नूह ने जहाज़ बनाया, तब उसके साथ थोड़े ही थे, और बहुतों ने उसका उपहास किया; पर अन्त में वही सही ठहरा। जब यहूदी बाबुल से लौटकर यरूशलेम की शहरपनाह बना रहे थे, तब सन्बल्लत और तोबियाह ने उनका ठट्ठा किया और कहा, "ये निर्बल यहूदी क्या कर रहे हैं?" जब प्रभु यीशु मसीह ने संसार को छोड़ा, तब यरूशलेम की ऊपरी कोठरी में केवल एक सौ बीस चेले इकट्ठे थे, जबकि अविश्वासी फरीसियों, शास्त्रियों और याजकों के मित्र दसों हज़ारों में गिने जाते थे। परन्तु चेले सही थे, और उनके शत्रु ग़लत थे। जब ख़ूनी मरियम सिंहासन पर बैठी, और लैटिमर और रिडले को खूँटे से बाँधकर जलाया गया, तब सुसमाचार के मित्र बहुत थोड़े दिखाई देते थे, और उनके शत्रु बहुसंख्यक थे। फिर भी धर्म-सुधारक सही थे, और उनके शत्रु ग़लत थे। सावधान रहो कि तुम क्या कर रहे हो! जीवित मसीही विश्वास को इस आधार पर मत परखो कि उसे मानने वाले थोड़े दिखाई देते हैं। हो सकता है कि अभी भीड़ तुम्हारे साथ हो, और हँसी तुम्हारे पक्ष में हो। परन्तु एक दिन आ रहा है जब तुम आश्चर्य से आँखें खोलोगे, और शायद बहुत देर से यह जानोगे कि जिन लोगों को तुमने तुच्छ जाना था वे थोड़े नहीं, वरन् "बहुत" थे, एक विशाल दल, "ऐसी बड़ी भीड़ जिसे कोई गिन नहीं सकता।"

क्या इस लेख का कोई पाठक निराश और हताश होने को है, क्योंकि वह मसीह से प्रेम रखता है और उसकी सेवा करने का यत्न करता है, पर अपने आप को लगभग पूरी तरह अकेला पाता है? क्या कभी तुम्हारा मन बैठ जाता है, और तुम्हारे हाथ ढीले पड़ जाते हैं, और तुम्हारे घुटने कमज़ोर हो जाते हैं, क्योंकि तुम्हें ऐसा कोई कम ही मिलता है जिसके साथ तुम प्रार्थना कर सको, स्तुति कर सको, पढ़ सको, और मसीह के विषय में बात कर सको, और निडर होकर अपना मन खोल सको? क्या तुम कभी संगति के अभाव में चुपचाप शोक करते हो? तो सुनो, तुम केवल वही कटोरा पी रहे हो जिसे तुमसे पहले बहुतों ने पिया है। अब्राहम, इसहाक और याकूब, और

यूसुफ, और मूसा, और शमूएल, और दाऊद, और भविष्यद्वक्ता, और पौलुस, और यूहन्ना, और प्रेरित, ये सब वे लोग थे जो बहुत हद तक अकेले खड़े रहे। क्या तुम आशा करते हो कि तुम्हारा हाल उनसे अच्छा होगा? ढाढ़स बाँधो और विश्वास रखो। संसार में अनुग्रह उससे कहीं अधिक है जितना तुम देख पाते हो, और स्वर्ग की ओर यात्रा करने वाले मसीही उससे अधिक हैं जितना तुम जानते हो। एलिय्याह ने सोचा कि वह अकेला खड़ा है, जबकि "इस्राएल में सात हज़ार ऐसे थे जिन्होंने बाल के आगे घुटने नहीं टेके थे।" ढाढ़स बाँधो और आगे की ओर देखो। तुम्हारा अच्छा समय आ रहा है। थोड़े ही समय में तुम्हें भरपूर संगति मिलेगी। तुम स्वर्ग के राज्य में बहुतों को पाओगे, थोड़ों को नहीं, बहुत से तुम्हारा स्वागत करने वाले, बहुत से आनन्द मनाने और स्तुति करने में तुम्हारे साथी, बहुत से जिनके साथ तुम धन्य अनन्तकाल बिताओगे। अभी किसी एक सन्त से कुछ ही घण्टे मिल लेना कितना सुखद होता है! वह हमें कैसा प्रसन्न और तरोताज़ा कर देता है, जैसे गर्मी में हिम या बादलों के बाद धूप! तो फिर तब कैसा होगा जब हम सन्तों का एक विशाल दल देखेंगे, जिसमें एक भी अपरिवर्तित पापी नहीं होगा जो उस मेल को बिगाड़े, सब विश्वास करने वाले स्त्री-पुरुष, कोई अविश्वासी नहीं, सब गेहूँ और कोई भूसा नहीं, "ऐसी बड़ी भीड़ जिसे कोई गिन नहीं सकता"! निश्चय ही स्वर्ग में जो "बहुत" हम देखेंगे वे पृथ्वी पर अभी देखे जाने वाले "थोड़ों" की पूरी भरपाई कर देंगे।

II. दूसरे, हमारे प्रभु यीशु मसीह के वचनों में हमें उनका निवास और स्थान मिलता है जो अन्त में उद्धार पाएँगे। लिखा है कि "वे पूर्व और पश्चिम से आएँगे।"

इसमें शायद ही कोई सन्देह हो कि यह कथन एक कहावत के रूप में है। इसे शाब्दिक अर्थ में नहीं लेना चाहिए, मानो उद्धार पाने वाले उत्तर और दक्षिण से नहीं, केवल सूर्य के उदय और अस्त होने की दिशाओं से आएँगे। यही कथन हमें भजन संहिता 103:12 में मिलता है, जहाँ लिखा है, "जितनी दूर पूर्व पश्चिम से है, उतनी ही दूर उसने हमारे अपराधों को हमसे दूर कर दिया है।" इसका अर्थ केवल यह है: उद्धार पाने वाले भिन्न-भिन्न स्थानों से आएँगे, दूर-दूर के स्थानों से, और ऐसे स्थानों से भी जहाँ तुम्हें उनके मिलने की सबसे कम आशा होती।

(क) वे सब एक ही कलीसिया के नहीं होंगे। उनमें एपिस्कोपल, और प्रेस्बिटेरियन, और इंडिपेंडेंट, और बैपटिस्ट, और मेथोडिस्ट, और प्लिमथ ब्रदरन, और मसीहियों के और भी अनेक प्रकार होंगे जिनके नाम गिनाने के लिए मेरे पास न स्थान है न समय। अभी वे चाहे कितना ही असहमत हों और विवाद करें, अन्त में उन्हें सहमत होना पड़ेगा। वे आश्चर्य से पाएँगे कि जिन बातों में वे एक मन के थे वे बहुत अधिक थीं, और जिन बातों में वे भिन्न थे वे बहुत थोड़ी थीं। वे सब एक मन से कह सकेंगे, "हल्लिलूय्याह! उसकी स्तुति हो जिसने हमसे प्रेम किया, और अपने लहू से हमें हमारे पापों से धो दिया!" और वे सब एक स्वर में उत्तर दे सकेंगे, "आमीन, आमीन!" भले जॉर्ज व्हाइटफ़ील्ड ने कहा था कि स्वर्ग का गीत अनन्तकाल तक यही होगा, "परमेश्वर ने क्या ही कार्य किया है!" पृथ्वी की असहमतियाँ झड़ जाएँगी, और वसन्त की हिम के समान पिघल जाएँगी। पवित्र आत्मा की सामान्य शिक्षा स्वर्ग में हर आँख के सामने स्पष्ट और साफ़ खड़ी होगी। अन्त में एक सच्ची "पवित्र सार्वभौमिक कलीसिया" होगी, जिसमें न कोई दाग़ होगा, न झुर्री, न ऐसी कोई वस्तु, न झगड़ा, न विवाद, न फूट, सब गेहूँ और कोई जंगली बीज नहीं, सब स्वस्थ अंग और कोई रोगी नहीं।

(ब) वे पृथ्वी के हर भाग के अनेक देशों से आएँगे—ग्रीनलैण्ड के बर्फीले पहाड़ों से और उष्णकटिबन्ध के झुलसा देनेवाले प्रदेशों से, भारत और ऑस्ट्रेलिया से, अमेरिका और चीन से, न्यूज़ीलैण्ड और प्रशान्त महासागर के द्वीपों से, अफ्रीका और मैक्सिको से। कुछ ने हेनरी मार्टिन के समान फारस में अकेली कब्रों में अपनी हड्डियाँ रखी होंगी, और मृत्यु में उनका सम्मान करनेवाला कोई न था। कुछ को समुद्र में नाविक की अन्त्येष्टि के साथ दफनाया गया होगा। कुछ ने शहीदों की मृत्यु सही होगी और हमारे अपने धर्म-सुधारकों के समान जलकर राख हो गए होंगे। कुछ घातक जलवायु के, या मिशन-स्थानों पर अन्यजातियों की हिंसा के शिकार हुए होंगे। और कुछ मूसा के समान ऐसे स्थानों में मरे होंगे जहाँ किसी मनुष्य की आँख ने उन्हें न देखा। परन्तु वे सब एक साथ आएँगे, और स्वर्ग के राज्य में फिर मिलेंगे। इससे बहुत अन्तर नहीं पड़ता कि हम कहाँ दफनाए जाएँ, कैसे दफनाए जाएँ, और किस प्रकार की कब्र में। चीन स्वर्ग से उतना ही निकट है जितना इंग्लैण्ड, और समुद्र अपने मृतकों को उसी क्षण लौटा देगा जिस क्षण भूमि। हमारा ताबूत, हमारी अन्त्येष्टि, दफन की विधि और शोक करनेवालों का लम्बा जुलूस—ये सब बहुत गौण बातें हैं। हमें जिस एक बात को निश्चित करने का प्रयत्न करना चाहिए, वह यह है कि हम चाहे जिस स्थान से आएँ, उन लोगों में हों जो "स्वर्ग के राज्य में बैठेंगे।"

(क) वे सर्वथा भिन्न पदों, वर्गों और पेशों से आएँगे। स्वर्ग स्वामियों के साथ-साथ सेवकों के लिए भी, मालकिनों के साथ-साथ दासियों के लिए भी, धनवानों के साथ-साथ निर्धनों के लिए भी, विद्वानों के साथ-साथ अनपढ़ों के लिए भी, भूस्वामियों के साथ-साथ किसानों के लिए भी, शासकों के साथ-साथ प्रजा के लिए भी, और रानी के साथ-साथ कंगाल के लिए भी स्थान होगा। स्वर्ग का कोई राजमार्ग नहीं है, और वहाँ पहुँचकर कोई वर्ग-भेद न रहेगा। अन्त में पूर्ण समानता, पूर्ण भाईचारा और पूर्ण स्वतन्त्रता होगी। इससे कुछ अन्तर न पड़ेगा कि पृथ्वी पर हमारे पास बहुत धन था या कुछ भी नहीं। एकमात्र प्रश्न यह होगा कि क्या हमने सचमुच अपने पापों से मन फिराया, सचमुच प्रभु यीशु पर विश्वास किया, और क्या हम सचमुच परिवर्तित और पवित्र किए गए लोग थे। मठों, संन्यासिनियों के आश्रमों या साधुओं की गुफाओं से आनेवालों को कोई वरीयता न दी जाएगी। यह बहुत सम्भव है कि जिन्होंने जीवन की उस अवस्था में, जिसमें परमेश्वर ने उन्हें बुलाया, अपना कर्तव्य निभाया, और जिन्होंने थल-सेना या जल-सेना में, संसद में या न्यायालय में, बैंक में या व्यापारी के कार्यालय में, दुकान के काउण्टर के पीछे या कोयले की खान की तह में मसीह का क्रूस उठाया, वे स्वर्ग के राज्य में पहली पंक्ति में पाए जाएँगे। स्वर्ग के राज्य में बैठने के लिए कोई विशेष पोशाक पहनना, कठोर मुख-मुद्रा बनाना और संसार से अलग हो जाना आवश्यक नहीं है।

(ग) वे अत्यन्त असम्भव स्थानों से, और ऐसी स्थितियों से आएँगे जिनमें तुम सोचते कि अनन्त जीवन का बीज किसी आत्मा में कभी उग ही नहीं सकता था। शाऊल, वह युवा फरीसी, गमलीएल के चरणों से और मसीहियों को सताने की स्थिति से निकलकर अन्यजातियों का महान प्रेरित बना, जिसने संसार को उलट-पुलट कर दिया। दानिय्येल बाबुल में रहा, और मूर्तिपूजा तथा अन्यजातियों के बीच विश्वासयोग्यता से परमेश्वर की सेवा करता रहा। पतरस कभी गलील की झील पर मछुआ था। मत्ती चुंगी लेनेवाला था, जो अपने दिन कर वसूलने में बिताता था। लूथर और लैटिमर ने जीवन आरम्भ तो पोप के निष्ठावान अनुयायियों के रूप में किया, और अन्त निष्ठावान प्रोटेस्टेंट के रूप में किया। पिलग्रिम्स प्रोग्रेस के लेखक जॉन बनयन कभी एक देहाती गाँव के लापरवाह, विचारहीन, गाली बकनेवाले, घण्टा बजानेवाले युवक थे। जॉर्ज व्हाइटफील्ड ने ग्लूसेस्टर में एक मधुशाला में नौकरी की, और अपने आरम्भिक दिन बर्तन माँजने और बियर ढोने में बिताए। जॉन न्यूटन, जो प्रसिद्ध भजनों और पत्रों के रचयिता हुए, कभी अफ्रीका के तटों पर एक दास-जहाज़ के कप्तान थे, और मनुष्यों के मांस और लहू को बेचने-खरीदने में उन्हें कोई बुराई न दिखती थी। ये सब सचमुच "पूर्व और पश्चिम से आए," और अपने जीवन के किसी समय संसार के सबसे असम्भव लोग प्रतीत होते थे कि वे मसीह के पास आएँ और "स्वर्ग के राज्य में बैठें।" पर वे निःसन्देह आए, और वे इस बात का अनन्त प्रमाण हैं कि हमारे प्रभु यीशु मसीह के वचन अक्षरशः सत्य हैं। स्त्री-पुरुष "पूर्व और पश्चिम से आ सकते हैं," और अन्त में अनन्त सुख और महिमा के राज्य में पाए जा सकते हैं।

आओ हम यह सीखें कि जब तक कोई जीवित है, हम उसके उद्धार से कभी निराश न हों। पिताओं को उड़ाऊ पुत्रों से कभी निराश नहीं होना चाहिए। माताओं को हठीली, मनमानी करनेवाली पुत्रियों से कभी निराश नहीं होना चाहिए। पतियों को पत्नियों से, और पत्नियों को पतियों से कभी निराश नहीं होना चाहिए। परमेश्वर के लिए कुछ भी असम्भव नहीं। अनुग्रह की भुजा बहुत लम्बी है, और उन तक भी पहुँच सकती है जो बहुत दूर दिखाई देते हैं। पवित्र आत्मा किसी भी हृदय को बदल सकता है। मसीह का लहू किसी भी पाप को धो सकता है। चाहे दूसरों का उद्धार अभी कितना ही असम्भव दिखाई दे, हम उनके लिए प्रार्थना करते रहें और आशा रखते रहें। हम स्वर्ग में बहुतों को देखेंगे जिन्हें वहाँ देखने की हमने कभी आशा न की थी। जो अन्तिम हैं वे पहले, और जो पहले हैं वे अन्तिम ठहर सकते हैं। यॉर्कशायर के प्रेरित कहलानेवाले प्रसिद्ध ग्रिमशॉ अपने एकलौते पुत्र को अपरिवर्तित, लापरवाह, विचारहीन और धर्म के प्रति उदासीन छोड़कर मरे। वह दिन आया जब उस युवक का हृदय बदल गया, और वह अपने पिता के पदचिह्नों पर चला। और जब वह अपनी मृत्यु-शय्या पर पड़ा था, तब उसके अन्तिम शब्दों में से एक यह था, "जब मेरे बूढ़े पिता मुझे स्वर्ग में देखेंगे तो क्या कहेंगे!"

आओ, हम यह सीखें कि जब हम सच्चे मसीही मित्रों से बिछड़ें, और शायद सदा के लिए बिछड़ें, तो "उन लोगों के समान जिनको आशा नहीं" शोक न करें। इस संसार के बिछोह और विदाइयाँ शायद इसकी सबसे पीड़ादायक बातों में से हैं। जब परिवार का घेरा टूट जाता है, जब पुराना घोंसला अपने निवासियों से खाली होने लगता है, जब कोई जवान ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड या फ़िजी द्वीपों के लिए जहाज़ पर सवार होता है और दस-बारह वर्ष तक लौटने की कोई आशा नहीं होती, तब ये बातें मांस और लहू के लिए बड़ी कठिन परीक्षा होती हैं। लिवरपूल के घाट पर, जब बड़े भाप-जहाज़ अमेरिका के लिए रवाना होने को होते हैं, मैंने ऐसे दृश्य देखे हैं जो किसी अत्यन्त कठोर-हृदय अजनबी की आँखों में भी आँसू ला दें। इस संसार के बिछोह भयानक बातें हैं; परन्तु मसीह में सच्चा विश्वास, और उसके द्वारा अनन्त जीवन के लिए पुनरुत्थान, बड़े से बड़े बिछोह का भी डंक निकाल देता है। वह विश्वासी को दिखाई देनेवाली वस्तुओं से परे अनदेखी वस्तुओं की ओर, उद्धारकर्ता के आगमन की ओर, और उसके पास हमारे इकट्ठे किए जाने की ओर देखने के योग्य बनाता है। हाँ, यह स्मरण करना सुखद है कि जब बड़ा जहाज़ दूर जाने लगता है और हम अन्तिम विदा के लिए हाथ हिलाते हैं, तब यह सोचें, "बस थोड़ा ही समय है, और हम उन सब से फिर मिलेंगे, और फिर कभी अलग न होंगे।" परमेश्वर के लोग पूर्व और पश्चिम से इकट्ठे होंगे, और हम सब अन्त में "स्वर्ग के राज्य में" मिलेंगे, और फिर कभी बाहर न निकलेंगे।

III. तीसरे, हमारे प्रभु यीशु मसीह के वचनों में हमें उन लोगों का भावी भाग और प्रतिफल मिलता है जो अन्त में उद्धार पाएँगे। लिखा है, "वे स्वर्ग के राज्य में बैठेंगे।"

"बैठना" यह वाक्यांश मेरे मन को बहुत सुखद और आरामदायक लगता है। आओ, हम इसे छानें, परखें, और देखें कि इसमें क्या कुछ समाया है। न्याय के दिन विश्वासी मसीह की दाहिनी ओर साहस के साथ खड़े होंगे, और कहेंगे, "परमेश्वर के चुने हुओं पर दोष कौन लगाएगा? परमेश्वर वह है जो उनको धर्मी ठहरानेवाला है। कौन है जो दण्ड की आज्ञा देगा? मसीह वह है जो मर गया, वरन् मरे हुओं में से जी भी उठा, और परमेश्वर की दाहिनी ओर है, और हमारे लिये बिनती भी करता है" (रोमियों 8:33-34)। परन्तु जब न्याय हो चुकेगा और बीत जाएगा, और अनन्त राज्य आरम्भ होगा, तब वे "बैठेंगे।"

(क) बैठने में भरोसे और अपने घर में होने का भाव निहित है। यदि हम किसी कठोर न्यायी के सामने, या भयानक प्रताप से विभूषित किसी राजा के सामने होते, तो हम बैठने का साहस न करते। परन्तु स्वर्ग के राज्य में ऐसा कुछ न होगा जो विश्वासियों को डराए। उनके बीते जीवन के पाप उन्हें न कँपाएँगे और न घबराएँगे। वे कितने ही अधिक, कितने ही बड़े और कितने ही काले क्यों न हों, वे सब मसीह के बहुमूल्य लहू में धुल चुके होंगे, और एक भी दाग न रहेगा। पूरी रीति से धर्मी ठहराए गए, पूरी रीति से मुक्त किए गए, पूरी रीति से क्षमा पाए हुए, पूरी रीति से "उस प्रिय में स्वीकार किए हुए," वे परमेश्वर के सामने उसके कारण धर्मी गिने जाएँगे जो "हमारे लिये पाप ठहरा, जो पाप से अज्ञात था" (2 कुरिन्थियों 5:21)। यद्यपि उनके जीवन के पाप "लाल रंग के समान थे, वे हिम के समान उजले किए जाएँगे; और यद्यपि वे किरमिज़ के समान लाल थे, वे ऊन के समान हो जाएँगे।" उनके पाप "फिर स्मरण न किए जाएँगे," "ढूँढ़े जाने पर भी न मिलेंगे," "घने बादल के समान मिटा दिए जाएँगे," "परमेश्वर की पीठ के पीछे फेंक दिए जाएँगे," "समुद्र की गहराइयों में डाल दिए जाएँगे।" विश्वासियों को मरने के बाद किसी शुद्धिकरण-स्थान (पर्गेटरी) की आवश्यकता नहीं। ऐसा सोचना अज्ञानता और अविश्वास है। एक बार विश्वास के द्वारा मसीह से जुड़ जाने पर वे पिता परमेश्वर की दृष्टि में सिद्ध हैं, और सिद्ध स्वर्गदूत भी उनमें कोई दाग न देखेंगे। निश्चय ही वे भली-भाँति बैठ सकते हैं और अपने घर में होने का अनुभव कर सकते हैं! वे अपने बीते जीवन के सब पापों को स्मरण कर सकते हैं, और उनकी याद से दीन हो सकते हैं। परन्तु वे पाप उन्हें डराएँगे नहीं।

प्रतिदिन की असफलता, दुर्बलता, अपूर्णता और भीतरी संघर्ष का बोध अब उनकी शान्ति को भंग न करेगा। अन्त में उनका पवित्रीकरण पूरा हो जाएगा। भीतर का युद्ध पूरी रीति से समाप्त हो जाएगा। उनके पुराने उलझानेवाले पाप और निर्बलताएँ झड़ जाएँगी और गल जाएँगी। अन्त में वे बिना थके परमेश्वर की सेवा कर सकेंगे, और बिना ध्यान बँटे उसके सामने उपस्थित रह सकेंगे, और उन्हें निरन्तर यह पुकारने के लिए विवश न होना पड़ेगा,

"मैं कैसा अभागा मनुष्य हूँ! मुझे इस मृत्यु की देह से कौन छुड़ाएगा?" (रोमियों 7:24)। जब हम अभी देह में हैं, तब कौन इस सब की धन्यता को बता सकता है? यहाँ इस संसार में हम अपने धर्मी ठहराए जाने की पूर्णता को नहीं समझते, और अपने अधूरे पवित्रीकरण के कारण "बोझ से दबे हुए कराहते हैं।" पवित्रता के लिए हमारे उत्तम से उत्तम प्रयासों के साथ प्रतिदिन की असफलता का दुःखद बोध जुड़ा रहता है। परन्तु जब "पुराना मनुष्यत्व" अन्त में पूरी रीति से मर जाएगा, और शरीर आत्मा के विरुद्ध लालसा न करेगा, जब भीतर बसे पाप का अन्त हो जाएगा, और संसार और शैतान हमें फिर परीक्षा में न डाल सकेंगे, तब अन्त में हम समझेंगे कि परमेश्वर ने अपने प्रेम रखनेवालों के लिए क्या तैयार किया है। हम "स्वर्ग के राज्य में बैठेंगे।"

(ख) परन्तु बात इतनी ही नहीं है। बैठने से विश्राम का, और काम, परिश्रम तथा संघर्ष के पूर्ण थम जाने का अर्थ निकलता है। परमेश्वर के लोगों के लिये एक विश्राम बाकी है। इस जीवन में हम कभी निश्चल नहीं होते। परमेश्वर का वचन हमें बताता है कि मसीही को "चलना," "दौड़ना," "काम करना," "परिश्रम करना," "लड़ना," "कराहना," "क्रूस उठाना," और "हथियार बाँधना" है, और शत्रु के देश में पहरेदार की भाँति खड़े रहना है। जब तक हम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश न करें, तब तक हमें "बैठने" की आशा नहीं करनी चाहिए। इसमें सन्देह नहीं कि मसीह के लिये काम करना सुखद है, और इस जीवन में भी उसका प्रतिफल बड़ा है — शुद्ध विवेक का प्रतिफल, जिसे केवल राजनीतिज्ञ, या व्यापारी, या सुख-विलास में डूबा मनुष्य कभी नहीं पा सकता, क्योंकि वे केवल नाशवान मुकुट ढूँढ़ते हैं। "जो कोई इस जल में से पीएगा वह फिर प्यासा होगा।" परन्तु मसीही का काम भी शरीर और लहू को थका देनेवाला है; और जब तक हम नश्वर देह में रहते हैं, तब तक काम और थकान साथ-साथ चलते हैं। दूसरों में पाप को देखना, जिसे हम रोक नहीं सकते, यही हमारी आत्माओं के लिये प्रतिदिन की परीक्षा है। इसमें सन्देह नहीं कि विश्वास की लड़ाई "अच्छी लड़ाई" है, परन्तु लड़ाई कभी बिना घावों, पीड़ा और थकान के नहीं होती। मसीही को जो हथियार पहनने की आज्ञा दी गई है, वह स्वयं भारी है। टोप और झिलम, ढाल और तलवार, जिनके बिना हम शैतान पर जय नहीं पा सकते, निरन्तर परिश्रम के बिना कभी पहने नहीं जा सकते।

निश्चय ही वह समय धन्य होगा जब हमारे सब शत्रु मारे जाएँगे, और हम अपने हथियार सुरक्षा से उतार रख सकेंगे, और "स्वर्ग के राज्य में बैठेंगे।"

इस बीच हम कभी न भूलें कि समय थोड़ा है। शैतान भी यह जानता है, और "बड़े क्रोध में है, क्योंकि जानता है कि उसका थोड़ा ही समय और बाकी है" (प्रकाशित वाक्य 12:12)। आओ, हम आशा के पूर्ण निश्चय के साथ, इस धन्य स्मरण के साथ कि यह सदा के लिये नहीं है, काम करते रहें और लड़ते रहें। कहा जाता है कि जब वाटरलू का महायुद्ध छिड़ा था, और उस दिन का परिणाम तराजू में लटका दिखता था, तब वेलिंगटन के ड्यूक शान्त भाव से बार-बार अपनी आँखें बाईं ओर फेरते रहे, इस दृढ़ आशा के साथ कि थोड़े ही समय में उनके प्रशियाई मित्र आ पहुँचेंगे और विजय निश्चित हो जाएगी। जब हम दिन का बोझ और तपन सह रहे हैं, तब इसी प्रकार की आशा हमारी आत्माओं को उत्साहित करे। हमारा राजा शीघ्र आनेवाला है, और जब वह आएगा तब हम "बैठेंगे," और फिर परिश्रम और लड़ाई नहीं करेंगे।

4. हमारे प्रभु यीशु मसीह के वचनों में चौथी और अन्तिम बात यह है कि जो लोग अन्त में उद्धार पाएँगे, वे सदा किस संगति का आनन्द लेंगे।

अब संगति सुख का एक बड़ा रहस्य है। मनुष्य स्वभाव से सामाजिक प्राणी है। ऐसा कोई मिलना सचमुच अपवाद ही है जिसे सदा अकेले रहना अच्छा लगे। अपार धन और विलास-सामग्री से भरा महल भी, यदि हम उसमें बिलकुल अकेले रहें, अन्त में बन्दीगृह से अधिक अच्छा नहीं रहेगा। मन के अनुकूल साथियों वाली झोपड़ी उस राजमहल से अधिक सुखद निवास है जिसमें बात करने को, सुनने को, मन का आदान-प्रदान करने को कोई न हो, और बातचीत करने को अपने दीन हृदय के सिवाय कुछ न हो। हम सब चाहते हैं कि कोई हमारे साथ रहे और हम उससे प्रेम करें, और रॉबिन्सन क्रूसो के समान किसी निर्जन द्वीप का निवासी, यदि वह सच्चा मनुष्य है, कभी सन्तुष्ट नहीं होता। हमारा धन्य प्रभु, जिसने मनुष्य को भूमि की मिट्टी से रचा और उसे जैसा वह है वैसा बनाया, यह भली-भाँति जानता है। इसलिये जब वह अपने विश्वासी लोगों के भावी भाग का वर्णन करता है, तब वह हमें यह बताने का ध्यान रखता है कि स्वर्ग के राज्य में उन्हें कैसी संगति मिलेगी। वह कहता है कि उद्धार पाए हुए लोग आनेवाले संसार में "अब्राहम, इसहाक और याकूब के साथ बैठेंगे।"

अब इस कथन का क्या अर्थ है? आओ, हम इसे देखें, इसका विश्लेषण करें, और देखें कि इसमें क्या निहित है।

अनन्त संसार में उद्धार पाए हुए लोगों के साथी वे सब विश्वासी होंगे जो आदि से अन्त तक पृथ्वी पर कभी जीवित रहे। पुराने सिपाही, पुराने तीर्थयात्री, मसीह के पुराने दास, मसीह के परिवार के पुराने सदस्य — एक शब्द में, वे सब जो विश्वास से जिए और मसीह की सेवा की, और परमेश्वर के साथ चले — ये ही वह संगति बनाएँगे जिसमें उद्धार पाए हुए लोग अनन्त काल बिताएँगे।

वे उन सब पुराने श्रेष्ठ जनों को देखेंगे जिनके विषय में वे पुराने नियम में पढ़ते हैं — कुलपतियों, भविष्यद्वक्ताओं और पवित्र राजाओं को, जो मसीह के आने की बाट जोहते रहे, परन्तु उसे देखे बिना ही मर गए। वे नए नियम के सन्तों को, प्रेरितों को, और उन पवित्र स्त्री-पुरुषों को देखेंगे जिन्होंने मसीह को आमने-सामने देखा। वे उन आरम्भिक पिताओं को देखेंगे जो सत्य के लिये मरे, और रोमी सम्राटों के अत्याचार में सिंहों के आगे डाले गए या जिनका सिर काटा गया। वे उन वीर धर्म-सुधारकों को देखेंगे जिन्होंने यूरोप महाद्वीप पर सुसमाचार को धूल में से फिर जीवित किया, और जीवित जल के उन कुओं को खोला जिन्हें रोम ने कूड़े से भर दिया था। वे हमारे अपने देश के उन धन्य शहीदों को देखेंगे जिन्होंने महिमामय प्रोटेस्टेंट धर्म-सुधार को सम्पन्न कराया, और हमारे देशवासियों को अंग्रेज़ी भाषा में बाइबल दी, और सुसमाचार के लिये हँसते-हँसते खूँटे पर मरे। वे पिछली शताब्दी के उन पवित्र जनों को देखेंगे — व्हाइटफील्ड, वेस्ली, रोमेन और उनके साथियों को — जिन्होंने कड़ा विरोध सहते हुए इंग्लैंड की कलीसिया में धर्म को फिर जगाया। सब से बढ़कर, वे अपने उन मित्रों को देखेंगे जो मसीह में सो गए, और जिनके पीछे वे बहुत आँसू बहाते हुए उनकी क़ब्रों तक गए थे, और उन्हें इस सुखद विचार के साथ देखेंगे कि अब वे फिर कभी अलग न होंगे। निश्चय ही ऐसी संगति का विचार हमें सकरे मार्ग पर चलते हुए प्रोत्साहित करे! यह एक अच्छी बात है जो अभी आनेवाली है।

संगति में तब तक थोड़ा ही सुख है जब तक कि पूरी सहानुभूति और रुचि का मेल न हो। पृथ्वी पर एक सच्चे मसीही की सबसे भारी परीक्षाओं में से एक यह है कि उसे ऐसे लोग बहुत कम मिलते हैं जो धर्म के विषय में पूरी तरह उसके समान विचार रखते हों। समाज में वह कितनी बार अपने आपको मजबूर पाता है कि चुप रहे और कुछ न कहे, और ऐसी बहुत सी बातें सुने और देखे जिनसे उसका हृदय व्यथित होता है और जो उसे भारी और उदास मन से अपने घर लौटा देती हैं! यह एक दुर्लभ सौभाग्य है कि कभी-कभार दो-तीन ऐसे लोग मिल जाएँ जिनके सामने वह अपना हृदय खोल सके, और जिनसे वह बिना किसी को ठेस पहुँचाने या ग़लत समझे जाने के भय के खुलकर बात कर सके। परन्तु स्वर्ग के राज्य में इस स्थिति का अन्त हो जाएगा। जो लोग उद्धार पाएँगे, उन्हें वहाँ कोई ऐसा नहीं मिलेगा जो उसी आत्मा की अगुवाई में न चला हो और जिसने वैसा ही अनुभव न पाया हो जैसा उन्होंने। वहाँ एक भी स्त्री या पुरुष ऐसा न होगा जिसने पाप के बोझ को गहराई से अनुभव न किया हो, उस पर शोक न किया हो, उसे मान न लिया हो, उससे संघर्ष न किया हो, और उसे क्रूस पर चढ़ाने का प्रयत्न न किया हो। वहाँ एक भी स्त्री या पुरुष ऐसा न होगा जो विश्वास के द्वारा मसीह के पास न भागा हो, जिसने अपनी आत्मा का पूरा बोझ उस पर न डाल दिया हो, और जिसने उसे अपना छुड़ानेवाला जानकर उसमें आनन्द न मनाया हो। वहाँ एक भी स्त्री या पुरुष ऐसा न होगा जिसने परमेश्वर के वचन में आनन्द न पाया हो, अनुग्रह के सिंहासन के सामने प्रार्थना में अपनी आत्मा को उँडेला न हो, और पवित्र जीवन जीने का प्रयत्न न किया हो। एक शब्द में, वहाँ कोई ऐसा न होगा जिसने परमेश्वर की ओर मन फिराव, हमारे प्रभु यीशु मसीह की ओर विश्वास, और जीवन तथा चाल-चलन की पवित्रता को कुछ न कुछ न जाना हो। स्वर्ग को जानेवाले सकरे मार्ग पर चलते हुए पृथ्वी पर ऐसे कुछ लोगों से मिलना सुखद होता है। यह मार्ग के किनारे बहती नदी के समान हमें तरोताज़ा करता है, और परदे के भीतर एक छोटी सी झलक के समान है। परन्तु तब कैसा होगा जब हम "एक ऐसी बड़ी भीड़, जिसे कोई गिन नहीं सकता" देखेंगे, ऐसे पवित्र लोगों की जो सब पापों से पूरी तरह छुड़ाए गए हैं, और उनके बीच एक भी अपरिवर्तित व्यक्ति नहीं जो उस मेल को बिगाड़े!

तब कैसा होगा जब हम अपने विश्वासी मित्रों से एक बार फिर मिलेंगे, जो अन्त में सिद्ध किए जा चुके होंगे, और पाएँगे कि उनके पाप जो उन्हें सहज ही फँसा लेते थे और हमारे अपने पाप भी सब जाते रहे हैं, और हममें बिना किसी भ्रष्टता के केवल अनुग्रह ही रह गया है! फिर भी यह सब तब होना है जब हम परदे के भीतर प्रवेश करेंगे। वहाँ के निवासी कोई मिली-जुली भीड़ नहीं होंगे जो एक-दूसरे को न समझ सकें। वे सब एक हृदय और एक मन के होंगे। हमें अज्ञानी, भक्तिहीन और अपरिवर्तित लोगों के बीच नहीं बैठना है, परन्तु "स्वर्ग के राज्य में अब्राहम और इसहाक और याकूब के साथ" बैठना है। जैसा कि कुछ लोग झूठ सिखाते हैं, यदि हर प्रकार के चरित्र के लोग वहाँ पहुँच जाते तो स्वर्ग स्वयं स्वर्ग न रहता। ऐसे स्वर्ग में न कोई व्यवस्था हो सकती और न कोई सुख। "ज्योति में पवित्र लोगों के साथ मीरास में सहभागी होने के योग्य" बनना आवश्यक है (कुलुस्सियों 1:12)।

(1) और अब, पाठक, इस पत्र को रखने से पहले अपने आप से पूछो कि क्या तुम उन बहुतों में पाए जाओगे जो "स्वर्ग के राज्य में बैठेंगे।" यह प्रश्न उत्तर माँगता है। मैं तुम्हें चेताता हूँ कि जब तक तुम इसका सन्तोषजनक उत्तर न दे सको, अपनी आत्मा को चैन न लेने दो। समय तेज़ी से बीत रहा है और संसार बूढ़ा होता जा रहा है। समय के चिन्हों को हम सबको सोचने पर विवश करना चाहिए। "जातियों को संकट, और घबराहट" प्रतिवर्ष बढ़ती दिखाई देती है। राजनेताओं की बुद्धि हर दिशा में युद्धों और अव्यवस्था को रोकने में पूरी तरह असमर्थ दिखाई देती है। कला, विज्ञान और सभ्यता की उन्नति भारी नैतिक बुराइयों के अस्तित्व को रोकने में बिल्कुल निर्बल प्रतीत होती है। मानव स्वभाव के रोगों को कोई चीज़ कभी चंगा नहीं करेगी सिवाय महान वैद्य, शान्ति के राजकुमार के लौट आने के, अर्थात् स्वयं यीशु मसीह के दूसरे आगमन के। और जब वह आएगा, तो क्या तुम उन "बहुतों" में पाए जाओगे जो "स्वर्ग के राज्य में अब्राहम और इसहाक और याकूब के साथ बैठेंगे"?

तुम उन बहुतों में क्यों न पाए जाओ? मुझे तुम्हारी अपनी इच्छा की कमी, या तुम्हारे अपने आलस्य और सुस्ती, या पाप और संसार के प्रति तुम्हारे हठीले प्रेम के सिवा कोई कारण नहीं दिखता। तुम्हारे सामने एक खुला द्वार है: तुम उसमें प्रवेश क्यों नहीं करते? प्रभु यीशु मसीह तुम्हें बचाने में समर्थ और तैयार है: तुम अपनी आत्मा को उसे क्यों नहीं सौंप देते, और उस हाथ को क्यों नहीं थाम लेते जो वह स्वर्ग से बढ़ाए हुए है? मैं फिर कहता हूँ कि मुझे कोई कारण नहीं दिखता कि तुम अन्तिम दिन उन "बहुतों" में क्यों न पाए जाओ।

तुम सोचते हो कि समय बहुत है, और जल्दी करने या तुरन्त निर्णय लेने की कोई आवश्यकता नहीं। तुम्हें सावधान रहना चाहिए कि क्या कह रहे हो। यह सब स्त्री-पुरुषों को नहीं दिया गया कि वे सत्तर वर्ष जीएँ और फिर चुपचाप अपने बिछौने पर मरें। इस नश्वर देह को छोड़ने की सूचना कभी-कभी बहुत अचानक आती है, और स्त्री-पुरुषों को पल भर में अदृश्य संसार में जाने के लिए बुला लिया जाता है। तुम्हें चाहिए कि जब तक समय है उसका सदुपयोग करो, और "सुविधा के समय" नामक उस दुखद चट्टान पर अपना जहाज़ न टकराओ।

क्या तुम डरते हो कि यदि तुम अपनी आत्मा की चिन्ता करने और स्वर्ग के राज्य में स्थान खोजने लगोगे तो लोग तुम पर हँसेंगे और तुम्हारा उपहास करेंगे? इस कायरता की भावना को पीठ पीछे फेंक दो, और ठान लो कि कभी धर्म से लज्जित न होगे। हाय! ऐसे बहुत हैं जो अन्त में पाएँगे कि उन्हें हँसी-हँसी में स्वर्ग से बाहर कर दिया गया और हँसी-हँसी में नरक में धकेल दिया गया। मनुष्य की निन्दा से मत डरो, जो अधिक से अधिक केवल तुम्हारी देह को हानि पहुँचा सकता है। उससे डरो जो आत्मा और देह दोनों को नरक में नाश कर सकता है। साहस के साथ मसीह को थाम लो, और वह तुम्हें उस सबके ऊपर जय देगा जिससे तुम अब डरते हो। जिसने प्रेरित पतरस को, जो एक समय भाग गया था और अपने स्वामी का इनकार कर बैठा था, यहूदी महासभा के सामने चट्टान की नाईं दृढ़ खड़े रहने और अन्त में सुसमाचार के लिए प्राण देने की सामर्थ दी, वह अब भी परमेश्वर के दाहिने हाथ जीवित है, और उन सब को जो उसके द्वारा परमेश्वर के पास आते हैं पूरा-पूरा उद्धार देने में समर्थ है, और तुम्हें जय पानेवालों से भी बढ़कर बना सकता है।

क्या तुम सोचते हो कि यदि तुम अपनी आत्मा का उद्धार पाने और स्वर्ग के राज्य में बैठने का यत्न करोगे तो तुम सुखी न होगे? इस अनुचित विचार को शैतान की झूठी सुझावना जानकर दूर फेंक दो। सच्चे मसीहियों के समान सचमुच सुखी लोग और कोई नहीं हैं। उपहास करनेवाला संसार चाहे जो कहे, उनके पास खाने के लिये ऐसा भोजन है जिसे संसार नहीं जानता, और ऐसी भीतरी शान्ति है जिसे संसार समझ नहीं सकता। सच्चे धर्म में कोई उदासी नहीं, और उदास, खट्टे या कठोर दिखने में कोई धर्म नहीं। क्रूस और संघर्ष के होते हुए भी सच्चे मसीही के पास ऐसी भीतरी शान्ति है जिसकी तुलना में संसार के पास देने को कुछ नहीं; क्योंकि यह ऐसी शान्ति है जिसे क्लेश, शोक, रोग, यहाँ तक कि मृत्यु भी छीन नहीं सकती। स्वामी के ये वचन अक्षरशः सत्य हैं, "मैं तुम्हें शान्ति दिए जाता हूँ, अपनी शान्ति तुम्हें देता हूँ; जैसे संसार देता है, मैं तुम्हें नहीं देता: तुम्हारा मन न घबराए और न डरे" (यूहन्ना 14:27)। यदि स्त्री-पुरुष सचमुच सुखी होना चाहते हैं, तो उन्हें उन लोगों में सम्मिलित होने का यत्न करना चाहिए जो "स्वर्ग के राज्य में बैठेंगे।"

(2) अन्त में, पर कम महत्त्व का नहीं, मैं एक उपदेश और प्रोत्साहन के वचन के साथ इसे समाप्त करता हूँ, उन लोगों के लिये जिनके पास यह आशा रखने का कारण है कि वे उन बहुतों में से हैं जो स्वर्ग के राज्य में बैठेंगे।

क्या तुम विश्वास करने में बहुत आनन्द और शान्ति चाहते हो? संसार में जितनी भलाई कर सकते हो, करने का यत्न करो। करने को सदा बहुत कुछ होता है, और करनेवाले थोड़े। सदा बहुत से लोग अज्ञान और पाप में जीते और मरते हैं, और कोई उनके पास नहीं जाता, न उनकी आत्माओं को बचाने का यत्न करता है। हम ऐसे दिनों में जी रहे हैं जब हाई चर्चवाद, लो चर्चवाद, ब्रॉड चर्चवाद, रीति-विधिवाद, बुद्धिवाद और संशयवाद की बहुत बातें होती हैं, परन्तु इस युग की बुराइयों को सुधारने के लिये सच्चे मसीही कार्य बहुत कम होते हैं! यदि हमारी सब कलीसियाओं के सब सहभागी हाथ में बाइबल लेकर और हृदय में मसीह के समान प्रेममय सहानुभूति लेकर उन लोगों के बीच जाने में लग जाएँ जो संसार में परमेश्वर के बिना जीते हैं, तो वे शीघ्र ही अब से कहीं अधिक सुखी हो जाएँगे, और समाज का स्वरूप शीघ्र ही बदल जाएगा। आलस्य उस उदासी का एक बड़ा कारण है जिसकी बहुत से लोग शिकायत करते हैं। बहुत से, बहुत अधिक मसीही अकेले स्वर्ग जाने में ही सन्तुष्ट दिखाई देते हैं, और दूसरों को परमेश्वर के राज्य में लाने की उन्हें कोई चिन्ता नहीं।

यदि तुम सही रीति से भलाई करने का यत्न करो, तो इसमें कभी सन्देह न करो कि भलाई होगी। बहुत से रविवारीय पाठशाला के शिक्षक रविवार की रात भारी मन से घर लौटते हैं और सोचते हैं कि उनका परिश्रम सब व्यर्थ है। बहुत से भेंट करनेवाले अपने दौरे से लौटकर सोचते हैं कि उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा। बहुत से सेवक अपने मंच से निराश और हताश होकर उतरते हैं, यह समझकर कि उनका प्रचार किसी काम का नहीं। परन्तु यह सब लज्जाजनक अविश्वास है। हृदयों और विवेक में अक्सर उससे कहीं अधिक हो रहा होता है जितना हम देखते हैं। "जो बीज बोने के लिये रोता हुआ जाता है, वह निश्चय आनन्द करता हुआ अपनी पूलियाँ लिये हुए लौट आएगा" (भजन संहिता 126:6)। जितनों का हम अनुमान करते हैं, उनसे अधिक लोग मन फिरा रहे हैं और उद्धार पा रहे हैं। "बहुत से स्वर्ग के राज्य में बैठेंगे" जिन्हें हमने अपनी मृत्यु के समय वहाँ देखने की आशा न की थी। आओ, हम पढ़ते रहें, प्रार्थना करते रहें, भेंट करते रहें, बोलते रहें, और जिस किसी तक हम पहुँच सकें उसे मसीह के विषय में बताते रहें। यदि हम केवल "स्थिर और अटल रहें, और प्रभु के काम में सर्वदा बढ़ते जाएँ," तो हम आश्चर्य के साथ पाएँगे कि प्रभु में हमारा परिश्रम व्यर्थ नहीं है (1 कुरिन्थियों 15:58)।

परन्तु यदि हम भलाई करने का यत्न करें, तो हमें सदा धीरज को बढ़ाना चाहिए। हम दो स्वर्ग नहीं पा सकते: एक यहाँ और एक परलोक में। लड़ाई अभी समाप्त नहीं हुई। कटनी का समय अभी नहीं आया। शैतान अभी बाँधा नहीं गया। हमारे प्रभु की प्रतिज्ञा के पूरे होने का समय अभी नहीं आया। परन्तु वह थोड़े ही समय में आएगा। जब हमारी दयालु महारानी ने क्रीमिया के युद्ध के अन्त में हॉर्स गार्ड्स के सामने आकर अपने राजकीय हाथों से उन वीर सैनिकों को विक्टोरिया क्रॉस दिया जिन्होंने उसे अर्जित किया था, तो उस सार्वजनिक सम्मान ने उन सैनिकों के सब कष्टों की भरपाई कर दी। बालाक्लावा, इन्करमैन और खाइयों की कठिनाइयाँ उस समय के लिये भूल गईं और अपेक्षाकृत छोटी बातें लगने लगीं। तब उस दिन का आनन्द कैसा होगा जब हमारे उद्धार का सेनापति अपने विश्वासयोग्य सैनिकों को अपने चारों ओर इकट्ठा करेगा और हर एक को महिमा का वह मुकुट देगा जो कभी मुरझाता नहीं! निश्चय ही हम उस दिन की धीरज से प्रतीक्षा कर सकते हैं। वह आ रहा है, और अन्त में अवश्य आएगा। उस दिन को स्मरण करके हम सन्देह और अविश्वास को पीछे फेंक दें, और अपना मुख दृढ़ता से यरूशलेम की ओर कर लें। "रात बहुत बीत गई है, और दिन निकलने पर है" (रोमियों 13:12)। हमारे सामने की धन्य प्रतिज्ञा का एक भी वचन विफल न होगा: "बहुत से पूर्व और पश्चिम से आकर अब्राहम, इसहाक और याकूब के साथ स्वर्ग के राज्य में बैठेंगे।"

2 शमूएल 23:4-5। बिना बादलों के। [13]

"वह सूर्योदय के समय के उजियाले के समान होगा, अर्थात् बिना बादलों की भोर के समान, और वर्षा के बाद की चमकती धूप से भूमि से निकली हुई कोमल घास के समान। यद्यपि मेरा घर परमेश्वर के साथ ऐसा नहीं है, तौभी उसने मेरे साथ सदा की वाचा बाँधी है, जो सब बातों में ठीक की हुई और अटल है; क्योंकि यही मेरा पूरा उद्धार और सारी इच्छा है, चाहे वह उसे न बढ़ाए।" -- 2 शमूएल 23:4-5।

इस पृष्ठ के आरम्भ का पद एक ऐसे अध्याय से लिया गया है जो हर मसीही के लिये बहुत रोचक होना चाहिए। उसका आरम्भ इस मर्मस्पर्शी कथन से होता है, "दाऊद के अन्तिम वचन ये हैं।"

इसका अर्थ यह हो कि "ये वे अन्तिम वचन हैं जो दाऊद ने भजनकार के रूप में प्रेरणा से कहे," या यह कि "ये दाऊद की मृत्यु से पहले की अन्तिम बातों में से हैं," इससे कोई बड़ा अन्तर नहीं पड़ता। दोनों दृष्टि से यह वाक्य बहुत से विचार जगाता है।

इसमें परमेश्वर के एक बूढ़े दास का अनुभव है जिसके जीवन में बहुत उतार-चढ़ाव आए। यह उस बूढ़े सैनिक का अपने अभियानों को स्मरण करना है। यह उस बूढ़े यात्री का अपनी यात्राओं को मुड़कर देखना है।

I. आओ, पहले हम दाऊद की नम्र करनेवाली स्थिति पर विचार करें।

वह भविष्यद्वक्ता की दृष्टि से भविष्य में मसीहा के आने की बाट जोहता है — उस प्रतिज्ञा किए हुए उद्धारकर्ता की, जो अब्राहम का वंश और दाऊद का वंश है। वह एक महिमामय राज्य के आगमन की बाट जोहता है, जिसमें कोई दुष्टता न होगी और धार्मिकता उसकी सारी प्रजा का सार्वभौमिक स्वभाव होगी। वह एक सिद्ध परिवार के अन्तिम रूप से एकत्र किए जाने की बाट जोहता है, जिसमें न कोई अशुद्ध सदस्य होगा, न कोई त्रुटि, न पाप, न शोक, न मृत्यु, न आँसू। और वह कहता है कि उस राज्य का प्रकाश "भोर के प्रकाश के समान होगा, जब सूर्य उदय होता है, ऐसा भोर जिसमें बादल नहीं होते।"

परन्तु फिर वह अपने ही घराने की ओर मुड़ता है और शोक के साथ कहता है, "मेरा घराना परमेश्वर के सम्मुख ऐसा नहीं है।" वह सिद्ध नहीं है, वह पाप से मुक्त नहीं है, और उस पर अनेक प्रकार के दाग और दोष हैं। उसके कारण मुझे बहुत आँसू बहाने पड़े हैं। वह वैसा नहीं है जैसा मैं चाहता हूँ, और जैसा बनाने का मैंने व्यर्थ प्रयत्न किया।

बेचारा दाऊद सचमुच ऐसा कह सकता था! यदि कभी कोई ऐसा मनुष्य हुआ जिसका घराना परीक्षाओं से भरा था और जिसका जीवन दुःखों से भरा था, तो वह दाऊद था।

अपने ही भाइयों की डाह से परीक्षाएँ — शाऊल के अन्यायपूर्ण उत्पीड़न से परीक्षाएँ — अपने ही सेवकों, जैसे योआब और अहीतोपेल, से परीक्षाएँ — पत्नी से परीक्षाएँ, उसी मीकल से भी जो कभी उससे इतना प्रेम करती थी — अपने बच्चों, जैसे अबशालोम, अम्नोन और अदोनिय्याह, से परीक्षाएँ — अपनी ही प्रजा से परीक्षाएँ, जिसने एक समय उसके सारे उपकार भुला दिए और विद्रोह करके उसे यरूशलेम से निकाल दिया — हर प्रकार की परीक्षाएँ, लहर पर लहर, दाऊद के जीवन के अन्त तक उस पर लगातार टूटती रहीं। इन परीक्षाओं में से कुछ सबसे कठिन परीक्षाएँ, निःसन्देह, उसके अपने पापों के उचित परिणाम और एक प्रेमी पिता की बुद्धिमानी भरी ताड़ना थीं। परन्तु यदि हम यह अनुभव न करें कि दाऊद सचमुच "दुःखी पुरुष" था, तो हमारे हृदय कठोर होंगे।

परन्तु क्या यह परमेश्वर के अनेक श्रेष्ठ सन्तों और प्रिय सन्तानों का अनुभव नहीं है? बाइबल का कौन-सा ध्यान से पढ़नेवाला यह देखने से चूक सकता है कि आदम, नूह, अब्राहम, इसहाक, याकूब, यूसुफ, मूसा और शमूएल सब बहुत दुःख सहनेवाले पुरुष थे, और वे दुःख मुख्यतः उनके अपने ही घरों से उत्पन्न हुए थे?

सीधी-सी सच्चाई यह है कि घर की परीक्षाएँ उन अनेक साधनों में से एक हैं जिनके द्वारा परमेश्वर अपने विश्वासी लोगों को पवित्र और शुद्ध करता है। इनके द्वारा वह हमें दीन बनाए रखता है। इनके द्वारा वह हमें अपनी ओर खींचता है। इनके द्वारा वह हमें हमारी बाइबल की ओर भेजता है। इनके द्वारा वह हमें प्रार्थना करना सिखाता है। इनके द्वारा वह हमें मसीह की आवश्यकता दिखाता है। इनके द्वारा वह हमें संसार से छुड़ाता है। इनके द्वारा वह हमें "उस नगर" के लिए तैयार करता है "जिसकी नींव है," जिसमें न कोई निराशा होगी, न आँसू, न पाप। जब मसीहियों पर कोई परीक्षा नहीं आती, तो यह परमेश्वर की कृपा का कोई विशेष चिह्न नहीं है। ये आत्मिक औषधियाँ हैं, जिनकी पतित मानव स्वभाव को नितान्त आवश्यकता है। राजा सुलैमान का जीवन-क्रम अटूट शान्ति और समृद्धि का था। परन्तु इसमें सन्देह करने का पूरा कारण है कि यह उसकी आत्मा के लिए भला था।

अपने विषय के इस भाग को छोड़ने से पहले आइए हम कुछ व्यावहारिक शिक्षाएँ सीखें।

(क) आइए हम सीखें कि माता-पिता अपने बच्चों को, या स्वामी अपने सेवकों को, अनुग्रह नहीं दे सकते। हम सब साधन काम में ला सकते हैं, परन्तु सफलता की आज्ञा नहीं दे सकते। हम सिखा सकते हैं, परन्तु मन नहीं फिरा सकते। हम अपने आसपास के लोगों को जीवन की रोटी और जल दिखा सकते हैं, परन्तु उन्हें खाने-पीने पर विवश नहीं कर सकते। हम अनन्त जीवन का मार्ग बता सकते हैं, परन्तु दूसरों को उस पर चला नहीं सकते। "आत्मा ही जीवनदायक है।" जीवन वह एक वस्तु है जिसे सबसे चतुर वैज्ञानिक भी न बना सकता है, न दे सकता है। यह "न तो लहू से, न मनुष्य की इच्छा से" होता है (यूहन्ना 1:13)। जीवन देना परमेश्वर का महान विशेषाधिकार है।

(ख) आइए हम सीखें कि इस पतित संसार में किसी से या किसी वस्तु से बहुत अधिक आशा न रखें। दुःख का एक बड़ा रहस्य बढ़ा-चढ़ाकर अपेक्षाएँ रखने की आदत है। धन से, विवाह से, व्यापार से, घरों से, बच्चों से, सांसारिक सम्मान से, राजनीतिक सफलता से, मनुष्य निरन्तर वह आशा रखते हैं जो उन्हें कभी नहीं मिलती; और अधिकांश लोग निराश होकर मरते हैं। धन्य है वह जिसने हर समय यह कहना सीख लिया है, "हे मेरे मन, तू परमेश्वर ही की बाट जोहता रह, क्योंकि मेरी आशा उसी से है" (भजन संहिता 62:5)।

(ग) आइए हम सीखें कि जब परीक्षाएँ आएँ तो न चकित हों, न कुढ़ें। अय्यूब का यह वचन बुद्धिमानी का है, "जैसे चिंगारियाँ ऊपर उड़ती हैं, वैसे ही मनुष्य कष्ट भोगने के लिए उत्पन्न हुआ है" (अय्यूब 5:7)। निःसन्देह कुछ लोगों को दूसरों से अधिक दुःख का प्याला पीना पड़ता है। परन्तु कम ही लोग ऐसे हैं जो बहुत समय तक किसी न किसी प्रकार की परेशानियों या चिन्ताओं के बिना जीते हैं। हमारा स्नेह जितना गहरा होता है, हमारे दुःख भी उतने ही गहरे होते हैं, और हम जितना अधिक प्रेम करते हैं उतना ही अधिक हमें रोना पड़ता है। पालने में पड़े शिशु के विषय में केवल एक ही बात निश्चय से कही जा सकती है — यदि वह बड़ा होगा तो उसे बहुत दुःख उठाने पड़ेंगे, और अन्त में वह मर जाएगा।

(घ) अन्त में आइए हम सीखें कि परमेश्वर हमसे कहीं अधिक अच्छी तरह जानता है कि जिन्हें हम प्रेम करते हैं उन्हें हमसे ले लेने का सबसे उत्तम समय कौन-सा है। दाऊद के कुछ बच्चों की मृत्यु आयु, ढंग और परिस्थितियों, तीनों की दृष्टि से पीड़ादायक रूप से उल्लेखनीय थी। जब दाऊद का नन्हा शिशु बीमार पड़ा, तो दाऊद ने चाहा कि बच्चा जीवित रहे, और जब तक सब समाप्त न हो गया वह उपवास करता और शोक मनाता रहा। फिर भी, जब अन्तिम साँस ली जा चुकी, तो उसने बच्चे से फिर मिलने की दृढ़ निश्चयता के साथ कहा, "मैं तो उसके पास जाऊँगा, परन्तु वह मेरे पास लौट न आएगा" (2 शमूएल 12:23)। परन्तु इसके विपरीत जब अबशालोम युद्ध में मरा — अबशालोम, वह सुन्दर अबशालोम, उसके हृदय का प्यारा — परन्तु अबशालोम जो परमेश्वर और अपने पिता के विरुद्ध खुले पाप में मरा, तब दाऊद ने क्या कहा? उसकी निराशा भरी पुकार सुनिए, "हाय मेरे बेटे अबशालोम! मेरे बेटे, मेरे बेटे अबशालोम! भला होता कि मैं तेरे स्थान पर मरता!" (2 शमूएल 18:33)। हाय! हममें से कोई नहीं जानता कि हमारे, हमारे बच्चों और हमारे मित्रों के लिए कब मरना सबसे उत्तम है। हमें प्रार्थना करनी चाहिए कि हम कह सकें, "मेरा समय तेरे हाथों में है," जब तू चाहे, जहाँ तू चाहे, और जैसे तू चाहे (भजन संहिता 31:15)।

II. आइए हम दूसरे, यह विचार करें कि जीवन में दाऊद की वर्तमान शान्ति का स्रोत क्या था। वह कहता है, "यद्यपि मेरा घराना वैसा नहीं जैसा मैं चाहता हूँ, और बहुत दुःख का कारण है, तो भी परमेश्वर ने मेरे साथ एक अनन्त वाचा बाँधी है, जो सब बातों में व्यवस्थित और अटल है।" और फिर वह जोड़ता है, "यही मेरा सारा उद्धार और मेरी सारी अभिलाषा है।"

अब "वाचा" शब्द एक गहरी और रहस्यमय बात है, जब इसे परमेश्वर के किसी भी कार्य पर लागू किया जाता है। हम समझ सकते हैं कि मनुष्य और मनुष्य के बीच वाचा क्या होती है। यह दो व्यक्तियों के बीच एक समझौता है, जिसके द्वारा वे कुछ शर्तों को पूरा करने और कुछ बातें करने के लिए अपने आपको बाँध लेते हैं। परन्तु सनातन परमेश्वर की बाँधी हुई वाचा को पूरी रीति से कौन समझ सकता है? वह हमारी पहुँच से बहुत ऊपर और हमारी दृष्टि से परे की बात है। यह एक ऐसा वाक्यांश है जिसके द्वारा वह अनुग्रह करके अपने आपको हमारी दुर्बल और तुच्छ समझ के अनुकूल बना लेता है, फिर भी अधिक से अधिक हम उसका थोड़ा-सा अंश ही ग्रहण कर सकते हैं।

परमेश्वर की जिस वाचा का उल्लेख दाऊद अपनी शान्ति के रूप में करता है, उसका अर्थ वह सनातन समझौता या युक्ति ही होना चाहिए जो धन्य त्रिएकता के तीनों व्यक्तियों के बीच अनादि काल से मसीह के सब जीवित अंगों के लाभ के लिए चली आ रही है।

यह एक रहस्यमय और अवर्णनीय प्रबन्ध है जिसके द्वारा हमारी आत्माओं के उद्धार, हमारी वर्तमान शान्ति और हमारी अन्तिम महिमा के लिए जो कुछ आवश्यक है, वह सब पूरी तरह और सम्पूर्ण रीति से जुटाया गया है, और यह सब पिता परमेश्वर, पुत्र परमेश्वर और पवित्र आत्मा परमेश्वर के सम्मिलित कार्य से हुआ है। पुत्र परमेश्वर का छुटकारे का कार्य, जो उसने क्रूस पर हमारे स्थानापन्न के रूप में मरकर किया, पिता परमेश्वर का खींचने का कार्य, जो उसने हमें चुनकर और पुत्र की ओर खींचकर किया, और पवित्र आत्मा का पवित्रीकरण का कार्य, जो हमारे गिरे हुए स्वभाव को जगाने, जिलाने और नया करने में होता है, ये सब इसी वाचा में समाए हुए हैं, और इनके अतिरिक्त वह सब कुछ भी जिसकी विश्वासी की आत्मा को अनुग्रह से लेकर महिमा तक आवश्यकता होती है।

इस वाचा का मध्यस्थ त्रिएकता का दूसरा व्यक्ति है (इब्रानियों 12:24)। उसी के द्वारा वाचा की सब आशीषें और विशेषाधिकार उसके हर एक विश्वासी अंग तक पहुँचाए जाते हैं। और जब बाइबल परमेश्वर के मनुष्य के साथ वाचा बाँधने की बात करती है, जैसा कि दाऊद के शब्दों में है, तो उसका अर्थ है मसीह में मनुष्य के साथ, पुत्र के एक अंग और भाग के रूप में। वे उसकी रहस्यमय देह हैं, और वह उनका सिर है, और सिर के द्वारा सनातन वाचा की सब आशीषें देह तक पहुँचाई जाती हैं। एक शब्द में, मसीह "वाचा का ज़ामिन" है, और उसी के द्वारा विश्वासी उसके लाभ पाते हैं। यही वह महान वाचा है जो दाऊद के सामने थी।

सच्चे मसीहियों के लिए अच्छा होगा कि वे इस वाचा के विषय में सोचें, उसे स्मरण रखें, और अपनी आत्माओं का बोझ उस पर उससे कहीं अधिक डालें जितना वे अब डालते हैं। इस विचार में अकथनीय सान्त्वना है कि हमारी आत्माओं के उद्धार का प्रबन्ध अनादि काल से किया गया है, और वह कल की कोई साधारण बात नहीं है। हमारे नाम बहुत पहले से मेम्ने की जीवन की पुस्तक में हैं। मसीह के लहू के द्वारा हमारी क्षमा और विवेक की शान्ति, कर्तव्य के लिए हमारी शक्ति, परीक्षा में हमारी सान्त्वना, मसीह की लड़ाइयाँ लड़ने की हमारी सामर्थ्य, ये सब हमारे लिए अनन्त युगों से, और हमारे जन्म से बहुत पहले से ठहराई गई थीं। यहाँ पृथ्वी पर हम प्रार्थना करते हैं, पढ़ते हैं, लड़ते हैं, संघर्ष करते हैं, कराहते हैं, रोते हैं, और अपनी यात्रा में प्रायः बुरी तरह रुकावट और बाधा पाते हैं। परन्तु हमें स्मरण रखना चाहिए कि एक सर्वशक्तिमान दृष्टि बहुत पहले से हम पर लगी है, और हम परमेश्वर के प्रबन्ध के पात्र रहे हैं, चाहे हमने उसे जाना न हो।

सबसे बढ़कर, मसीहियों को यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि सनातन वाचा "सब बातों में ठीक की हुई और अटल" है। हमारे दैनिक जीवन की छोटी से छोटी बातें भी मिलकर भलाई ही उत्पन्न कर रही हैं, चाहे हम उसे उस समय न देख पाएँ। हमारे सिर का एक-एक बाल गिना हुआ है, और हमारे पिता की इच्छा के बिना एक गौरैया भी भूमि पर नहीं गिरती। हमारे साथ जो कुछ घटता है उसमें कोई संयोग या अचानक होनेवाली बात नहीं है। हमारे जीवन की छोटी से छोटी घटनाएँ भी एक सनातन योजना या विधान के अंग हैं, जिसमें परमेश्वर ने हमारी आत्माओं की भलाई के लिए सब कुछ पहले से देखा और ठहराया है।

आओ, हम सब सनातन वाचा को स्मरण रखने की आदत बनाने का यत्न करें। यदि इसका ठीक उपयोग किया जाए तो यह सिद्धान्त सुदृढ़ सान्त्वना से भरा है। इसका उद्देश्य हमारे उत्तरदायित्व को नष्ट करना नहीं था। यह मुसलमानी भाग्यवाद से बिलकुल भिन्न है। यह विशेष रूप से इसलिए ठहराया गया है कि दुःख और परीक्षा से भरे संसार में व्यावहारिक उपयोग के लिए ताज़गी देनेवाली औषधि बने। जीवन के अनेक दुःखों और निराशाओं के बीच हमें स्मरण रखना चाहिए कि "जो हम अभी नहीं जानते, उसे आगे चलकर जान लेंगे।" हमें जो भी कड़वा प्याला पीना पड़ता है उसमें एक अर्थ और एक "आवश्यकता" है, और जिस हानि और बिछोह पर हम शोक करते हैं उसके पीछे भी एक बुद्धिमानी का कारण है।

आख़िर हम कितना कम जानते हैं! हम उन बच्चों के समान हैं जो आधे बने भवन को देखते हैं, और उन्हें ज़रा भी अनुमान नहीं होता कि पूरा हो जाने पर वह कैसा दिखेगा। वे पत्थर, ईंट, मलबा, लकड़ी, गारा, मचान और गन्दगी के ढेर देखते हैं, और सब कुछ देखने में अस्त-व्यस्त लगता है। परन्तु जिस वास्तुकार ने भवन का नक्शा बनाया है, वह सबमें व्यवस्था देखता है, और शान्ति से उस दिन की प्रतीक्षा करता है जब सारा भवन पूरा हो जाएगा और मचान हटा लिया जाएगा। हमारे साथ भी ऐसा ही है। हम अपने जीवन के अनेक विधानों का अर्थ नहीं समझ पाते, और हमें यह सोचने का प्रलोभन होता है कि हमारे चारों ओर सब कुछ अस्त-व्यस्त है। परन्तु हमें स्मरण रखने का यत्न करना चाहिए कि स्वर्ग का वह महान वास्तुकार सदा बुद्धिमानी और भलाई से काम करता है, और हम सदा "सीधे मार्ग से बसे हुए नगर की ओर" ले जाए जा रहे हैं (भजन संहिता 107:7)। पुनरुत्थान का प्रभात सब कुछ समझा देगा। एक पुराने धर्मशास्त्री की यह उक्ति अनोखी पर बुद्धिमानी की है कि "सच्चे विश्वास की आँखें चमकीली होती हैं, और वह अँधेरे में भी देख सकता है।"

बर्नार्ड गिलपिन के विषय में लिखा है, जो मरियम के समय के शहीदों के दिनों में जीवित एक धर्म-सुधारक थे और जिन्हें उत्तर का प्रेरित कहा जाता था, कि वे इस बात के लिए प्रसिद्ध थे कि उन पर चाहे जो भी बीते, वे कभी बड़बड़ाते या शिकायत नहीं करते थे। बुरे से बुरे और अन्धकारमय समयों में भी वे सदा यही कहा करते थे, "यह सब परमेश्वर की अनन्त वाचा में है, और अवश्य ही भलाई के लिए होगा।" रानी मरियम के शासन के अन्त के निकट, उन्हें अचानक डरहम से लन्दन आने का बुलावा आया, कि उन पर झूठी शिक्षा का मुकद्दमा चले और बहुत सम्भव है कि रिडले और लैटिमर की नाईं उन्हें जला दिया जाए। उस भले मनुष्य ने चुपचाप आज्ञा मान ली, और शोक करते हुए अपने मित्रों से कहा, "यह वाचा में है, और अवश्य ही भलाई के लिए होगा।" डरहम से लन्दन की यात्रा में उनका घोड़ा गिर पड़ा और उनकी टाँग टूट गई, और उन्हें सड़क के किनारे एक सराय में पड़े रहना पड़ा। एक बार फिर उनसे पूछा गया, "इसके विषय में आप क्या सोचते हैं?" उन्होंने फिर उत्तर दिया, "यह सब वाचा में है, और अवश्य ही भलाई के लिए होगा।" और वैसा ही हुआ। उनकी टाँग के ठीक होने और यात्रा फिर आरम्भ कर सकने में सप्ताह पर सप्ताह बीत गए। परन्तु उन्हीं सप्ताहों में अभागी रानी मरियम की मृत्यु हो गई, सताव रोक दिए गए, और वह योग्य वृद्ध धर्म-सुधारक आनन्द करता हुआ अपने उत्तरी घर लौट आया। उसने अपने मित्रों से कहा, "क्या मैंने तुमसे नहीं कहा था कि सब कुछ मिलकर भलाई ही उत्पन्न कर रहा है?"

हमारे लिए कितना अच्छा होता यदि हममें बर्नार्ड गिलपिन का कुछ विश्वास होता, और हम भी उनकी नाईं अनन्त वाचा का व्यावहारिक उपयोग कर पाते। धन्य है वह मसीही जो मन से ये शब्द कह सकता है, --

"मैं नहीं जानता कि मैं किस मार्ग पर जा रहा हूँ,

परन्तु अपने पथ-प्रदर्शक को मैं भली-भाँति जानता हूँ;

बालक-सी निष्ठा से मैं अपना हाथ देता हूँ

अपने पास खड़े सामर्थी मित्र को।

जब वह उसे थामता है, तो मैं उससे केवल यही कहता हूँ --

'इसे दृढ़ता से पकड़े रह;

मुझे अपना मार्ग खोने न दे,

और अन्त में मुझे घर पहुँचा दे।'"

III. अन्त में, आइए हम विचार करें कि राजा दाऊद की भविष्य के विषय में क्या आशा थी। उसकी वह आशा निःसन्देह जगत के अन्त में मसीहा के महिमामय आगमन की, और "सब बातों के सुधार" (प्रेरितों के काम 3:21) के अन्तिम समय में धार्मिकता के राज्य की स्थापना की थी।

निस्सन्देह इस राज्य के विषय में राजा दाऊद के विचार उन विचारों की तुलना में धुँधले और अस्पष्ट थे जो नए नियम के प्रत्येक समझदार पाठक की पहुँच में हैं। वह मसीहा के दुःख उठाने के लिए आने से अनजान न था, क्योंकि वह भजन संहिता 22 में इसके विषय में कहता है। परन्तु उसने उसके बहुत आगे मसीहा का राज्य करने के लिए आना देखा, और उसके उत्सुक विश्वास ने दोनों आगमनों के बीच के अन्तराल को लाँघ लिया। इसमें मुझे तनिक भी सन्देह नहीं कि उसका मन इस प्रतिज्ञा पर लगा था कि "स्त्री का वंश" एक दिन सर्प के सिर को पूरी रीति से कुचल डालेगा, और पृथ्वी पर से श्राप हटा लिया जाएगा, और आदम के पतन के प्रभाव पूरी रीति से मिटा दिए जाएँगे। मसीह की कलीसिया ने भला किया होता यदि वह दाऊद के पदचिन्हों पर चलती, और दूसरे आगमन पर उतना ही ध्यान देती जितना दाऊद ने दिया।

मसीहा के आगमन और भावी राज्य की चर्चा करते हुए दाऊद जो उपमाएँ और तुलनाएँ प्रयोग करता है, वे अनोखे रूप से सुन्दर हैं, और कलीसिया और पृथ्वी के लिए उससे होनेवाली आशीषों को प्रकट करने के लिए अति उपयुक्त हैं। मसीह का दूसरा आगमन "भोर के उस प्रकाश के समान होगा जब सूर्य उदय होता है, ऐसी भोर जिसमें बादल नहीं; वा उस कोमल घास के समान जो वर्षा के बाद के निर्मल उजियाले से भूमि से उगती है।" इन शब्दों पर हज़ार बार विचार करना चाहिए। कौन अपने चारों ओर देखकर और उस संसार की दशा पर विचार करके, जिसमें हम रहते हैं, यह मानने को विवश नहीं होता कि अब चारों ओर बादल और अन्धकार छाया है? "सारी सृष्टि अब तक मिलकर कराहती और पीड़ाओं में तड़पती है" (रोमियों 8:22)। हम जहाँ भी देखें, हमें गड़बड़ी, झगड़े, जातियों के बीच युद्ध, राजनेताओं की लाचारी, निम्न वर्गों का असन्तोष और कुड़कुड़ाना, धनवानों में अत्यधिक विलासिता, निर्धनों में घोर दरिद्रता, असंयम, अशुद्धता, बेईमानी, ठगी, झूठ, छल, लोभ, मूर्तिपूजा, अन्धविश्वास, मसीहियों में दिखावटीपन, और सच्चे धर्म का ह्रास दिखाई देता है। ये वे बातें हैं जो यूरोप, एशिया, अफ्रीका और अमेरिका में, सारे भूमण्डल पर, निरन्तर हमारी दृष्टि में आती हैं। ये वे बातें हैं जो सृष्टि के मुख को मलिन करती हैं, और प्रमाणित करती हैं कि शैतान "इस संसार का सरदार" है, और परमेश्वर का राज्य अभी नहीं आया। ये सचमुच ऐसे बादल हैं जो प्रायः सूर्य को हमारी आँखों से छिपा लेते हैं।

परन्तु एक अच्छा समय आनेवाला है, जिसे दाऊद ने बहुत दूर से देखा था, जब इस दशा में पूरा परिवर्तन हो जाएगा। एक ऐसा राज्य आनेवाला है जिसमें पवित्रता नियम होगी, और पाप का कोई स्थान न होगा।

कौन अपने ही पड़ोस में चारों ओर देखकर यह नहीं देख पाता कि अपने घर से एक मील के भीतर ही पाप के परिणाम पृथ्वी पर भारी बोझ की नाईं पड़े हैं, और शोक तथा क्लेश की भरमार है? बीमारी, पीड़ा और मृत्यु सब वर्गों पर आती है, और धनी हो या निर्धन, किसी को नहीं छोड़ती। युवा प्रायः वृद्धों से पहले मर जाते हैं, और बच्चे माता-पिता से पहले। अत्यन्त भयंकर प्रकार की शारीरिक पीड़ा और असाध्य रोग बहुतों का जीवन दयनीय बना देते हैं। वैधव्य, निःसन्तानता और अकेलापन बहुतों को जीवन से थक जाने के लिए ललचाते हैं, यद्यपि वह सब कुछ जो धन से मिल सकता है उनकी पहुँच में है। पारिवारिक झगड़े, डाह और जलन अनेक घरानों की शान्ति भंग कर देते हैं, और कितने ही धनवान की प्रसन्नता की जड़ में कीड़े के समान लगे रहते हैं। कौन इनकार कर सकता है कि ये सब बातें हमारे चारों ओर दिखाई देती हैं? अभी बहुत से बादल हैं।

क्या कुछ भी इस दशा का अन्त नहीं करेगा? क्या सृष्टि इसी प्रकार कराहती और पीड़ा में तड़पती ही रहेगी? परमेश्वर का धन्यवाद हो, मसीह का दूसरा आगमन इन प्रश्नों का उत्तर देता है। प्रभु यीशु मसीह ने मनुष्य की ओर से अपना कार्य अभी पूरा नहीं किया है। वह एक दिन (और शायद बहुत शीघ्र) फिर आएगा और एक महिमामय राज्य स्थापित करेगा, जिसमें पाप के परिणामों के लिए कोई स्थान ही न होगा। यह ऐसा राज्य है जिसमें न कोई पीड़ा होगी, न कोई रोग, जिसमें "कोई निवासी न कहेगा कि मैं रोगी हूँ" (यशा. 33:24)। यह ऐसा राज्य है जिसमें न बिछुड़ना होगा, न स्थान बदलना, न परिवर्तन, और न विदा के शब्द। यह ऐसा राज्य है जिसमें न मृत्यु होगी, न अन्तिम संस्कार, न आँसू, और न शोक के वस्त्र। यह ऐसा राज्य है जिसमें न झगड़े होंगे, न हानि, न क्रूस, न निराशाएँ, न दुष्ट सन्तानें, न बुरे सेवक, न विश्वासघाती मित्र। जब अन्तिम तुरही फूँकी जाएगी, और मृतक अविनाशी दशा में जिलाए जाएँगे, तब परमेश्वर के सब लोगों की एक महान सभा इकट्ठी होगी, और जब हम अपने प्रभु के स्वरूप में जाग उठेंगे तब हम तृप्त होंगे (भजन 17:15)। वह मसीही हृदय कहाँ है जो इस दशा के आरम्भ होने की लालसा नहीं करता? प्रकाशितवाक्य की पुस्तक की अन्तिम प्रार्थना को हम अपनाएँ और बार-बार पुकारें, "हाँ, प्रभु यीशु, आ" (प्रका. 22:20)।

(क) और अब, क्या हम पर क्लेश हैं? पृथ्वी पर ऐसा कौन स्त्री या पुरुष है जो कह सके, "मुझ पर कोई क्लेश नहीं है"? आइए हम उन सब को प्रभु यीशु मसीह के पास ले जाएँ। उसके समान कोई सान्त्वना नहीं दे सकता। जिसने हमारे पापों की क्षमा मोल लेने के लिए क्रूस पर प्राण दिए, वही परमेश्वर के दाहिने हाथ बैठा है और उसका हृदय प्रेम और सहानुभूति से भरा है। वह जानता है कि दुःख क्या है, क्योंकि वह तैंतीस वर्ष इस पापी संसार में रहा, स्वयं परीक्षा में पड़कर दुःख उठाया, और प्रतिदिन दुःख को देखा। और वह उसे भूला नहीं है। जब वह पिता के दाहिने हाथ बैठने के लिए स्वर्ग पर चढ़ा, तो वह अपने साथ एक सिद्ध मानवीय हृदय ले गया। "वह हमारी निर्बलताओं में हमारे साथ दुःखी हो सकता है" (इब्रा. 4:15)। वह अनुभव कर सकता है। क्रूस पर उसके अन्तिम विचारों में से एक अपनी ही माता के लिए था, और वह आज भी रोती हुई और शोकग्रस्त माताओं की चिन्ता करता है।

वह चाहता है कि हम कभी न भूलें कि मसीह में हमारे बिछुड़े हुए मित्र खोए नहीं गए, केवल आगे चले गए हैं। हम उन्हें एकत्र होने के दिन फिर देखेंगे, क्योंकि "जो यीशु में सो गए हैं, उन्हें परमेश्वर उसी के साथ ले आएगा" (1 थिस्स. 4:14)। हम उन्हें नई देह में देखेंगे और फिर पहचानेंगे, पर पृथ्वी पर जैसे हमने उन्हें देखा था उससे कहीं अधिक उत्तम, अधिक सुन्दर और अधिक सुखी। सबसे बढ़कर, हम उन्हें इस आश्वासन के साथ देखेंगे कि हम फिर कभी बिछुड़ने के लिए नहीं मिलेंगे।

(ख) क्या हम पर क्लेश हैं? हम उस अनन्त वाचा को कभी न भूलें जिससे बूढ़ा दाऊद अपने जीवन के अन्त तक लिपटा रहा। वह अब भी पूरी शक्ति से बनी हुई है। वह रद्द नहीं हुई है। वह यीशु के प्रत्येक विश्वासी की, चाहे वह धनी हो या निर्धन, उतनी ही सम्पत्ति है जितनी वह यिशै के पुत्र की थी। हम कभी कुढ़ने, बुड़बुड़ाने और शिकायत करनेवाले मन को स्थान न दें। हम सबसे बुरे समय में भी दृढ़ता से विश्वास करें कि हमारे जीवन का एक-एक कदम प्रभु के द्वारा सिद्ध बुद्धि और सिद्ध प्रेम से ठहराया गया है, और हम अन्त में यह सब देखेंगे। हम सन्देह न करें कि वह सदा सब कुछ भली रीति से करता है। वह देने में भला है, और ले लेने में भी उतना ही भला है।

(ग) अन्त में, क्या हम पर क्लेश हैं? हम कभी न भूलें कि सबसे उत्तम उपायों और सबसे सुखदायक औषधियों में से एक यह है कि हम दूसरों की भलाई करने का और उपयोगी होने का यत्न करें। आइए हम इस पाप के बोझ से दबे संसार में दुःख को घटाने और आनन्द को बढ़ाने में अपने आप को लगा दें। हमारे अपने द्वारों से कुछ ही गज की दूरी पर सदा कोई न कोई भलाई करने को होती है। प्रत्येक मसीही उसे करने का, और देहों या मनों को राहत पहुँचाने का प्रयत्न करे।

"सान्त्वना देना और आशीष देना, दुःख के लिए मरहम ढूँढ़ना, अकेले और अनाथ की देखभाल करना, यही पृथ्वी पर स्वर्गदूतों का काम है।"

अपने ही क्लेशों को स्वार्थ से पोसते रहना और आलस्य से अपने दुःखों में डूबे रहना उस उदास दुर्दशा का एक रहस्य है जिसमें बहुत से लोग अपना जीवन बिताते हैं। यदि हम यीशु मसीह के लहू पर भरोसा रखते हैं, तो आइए उसके उदाहरण को स्मरण रखें। वह सदा "भलाई करता फिरा" (प्रेरितों के काम 10:38)। वह इसलिए नहीं आया कि उसकी सेवा टहल की जाए, परन्तु इसलिए कि सेवा टहल करे, और बहुतों की छुड़ौती के लिए अपना प्राण दे। हम उसके समान बनने का यत्न करें। हम भले सामरी के पदचिह्नों पर चलें, और जहाँ कहीं सचमुच सहायता की आवश्यकता हो वहाँ सहायता करें। उचित समय पर कहा गया एक दयालु शब्द भी प्रायः बड़ी आशीष होता है। पुराने नियम की वह प्रतिज्ञा अभी पुरानी नहीं पड़ी: "क्या ही धन्य है वह जो कंगाल की सुधि रखता है; विपत्ति के दिन यहोवा उसे बचाएगा" (भजन 41:1, प्रेयर-बुक का अनुवाद)। पाद-टिप्पणियाँ:

[13] इस लेख का सार टर्नर मेमोरियल होम ऑफ़ रेस्ट, डिंगल, लिवरपूल के चैपल के उद्घाटन के अवसर पर 16 अक्टूबर, 1885 को एक भाषण के रूप में दिया गया था।

श्रेष्ठगीत 4:12 प्रभु की बारी।

प्रभु यीशु मसीह की एक बारी है। वह उन सब की मण्डली है जो उस में सच्चे विश्वासी हैं। वे ही उसकी बारी हैं।

एक दृष्टि से देखें तो विश्वासी यीशु मसीह की दुल्हन हैं। वे सब एक अनन्त वाचा के द्वारा उससे जुड़े हैं जो टूट नहीं सकती; विश्वास के विवाह के द्वारा उससे ब्याहे गए हैं; उसने उन्हें अपने सारे ऋणों और दायित्वों, अपने सारे दोषों और अपूर्णताओं समेत सदा के लिए अपना कर लिया है। उनका पुराना नाम जाता रहा, अब उनका नाम वही है जो उनके दूल्हे का है। पिता परमेश्वर उन्हें अपने प्रिय पुत्र के साथ एक मानता है। शैतान उन पर कोई दोष नहीं लगा सकता। वे मेमने की दुल्हन हैं: "मेरा प्रेमी मेरा है और मैं उसकी हूँ" (श्रेष्ठगीत 2:16)।

दूसरी दृष्टि से देखें तो विश्वासी मसीह की बहन हैं। वे बहुत बातों में उसके समान हैं। उनके पास उसका आत्मा है; वे उससे प्रेम करते हैं जिससे वह प्रेम करता है, और उससे घृणा करते हैं जिससे वह घृणा करता है; वे उसके सब सदस्यों को भाई मानते हैं; उसके द्वारा उन्हें लेपालकपन की आत्मा मिली है, और वे परमेश्वर के विषय में कह सकते हैं, "वह मेरा पिता है।" अपने बड़े भाई से उनकी समानता सचमुच बहुत धुँधली है! फिर भी वे उसके समान हैं।

तीसरी दृष्टि से देखें तो विश्वासी मसीह की बारी हैं। आइए देखें कि कैसे और किस रीति से।

I. यीशु अपने लोगों को बारी कहता है, क्योंकि वे संसार के लोगों से सर्वथा भिन्न हैं। संसार एक जंगल है: उसमें काँटों और ऊँटकटारों के सिवा कुछ नहीं उगता; वह पाप को छोड़ और किसी बात में फलवन्त नहीं। इस संसार की सन्तान परमेश्वर की दृष्टि में एक बिना जोता हुआ जंगल है। अपनी सारी कलाओं और विज्ञान, बुद्धि और कौशल, वाक्पटुता और राजनीतिज्ञता, काव्य और शिष्टता के होते हुए भी—इस सब के होते हुए भी वे एक जंगल ही हैं, जो मन फिराव, विश्वास, पवित्रता और परमेश्वर की आज्ञाकारिता से रहित है। प्रभु स्वर्ग से नीचे देखता है, और जहाँ उसे अनुग्रह दिखाई नहीं देता, वहाँ प्रभु को "जंगल" की दशा के सिवा कुछ नहीं दिखता। प्रभु यीशु मसीह के विश्वासी लोग पृथ्वी का हरा-भरा स्थान हैं; बंजर मरुभूमियों के बीच हरियाली का द्वीप हैं; वे उसकी बारी हैं।

वह अपने लोगों को बारी कहता है, क्योंकि वे उसके मन को मधुर और सुन्दर लगते हैं। वह संसार को देखता है, तो उसका हृदय दुखी होता है: वह अपने विश्वासी लोगों के छोटे से झुण्ड को देखता है, तो प्रसन्न होता है। वह उनमें अपने कष्ट का फल देखता है, और सन्तुष्ट होता है। जब वह देखता है कि राज्य बालकों पर प्रगट किया गया है, यद्यपि ज्ञानी और समझदार उसे ग्रहण नहीं करते, तो वह आत्मा में आनन्दित होता है। जैसे नूह के बलिदान के दिन उसने सुखदायक सुगन्ध पाई और तृप्त हुआ, वैसे ही अब भी। यह बहुत आश्चर्यजनक, बहुत रहस्यमय है! विश्वासी अपनी ही दृष्टि में तुच्छ हैं, और अपने को अभागे पापी समझते हैं; फिर भी यीशु कहता है, "तू सर्वांग सुन्दर है, — तेरा बोल मधुर है, — तेरा मुख मनोहर है, — तू तिर्सा के समान सुन्दर, यरूशलेम के समान मनोहर, चन्द्रमा के समान रूपवती और सूर्य के समान निर्मल है" (श्रेष्ठगीत 1:15, 4:7, 2:14, 6:10, आदि)। ओह, कैसी गहराइयाँ हैं! यह समझ से परे और लगभग अविश्वसनीय लगता है; पर यह सच है।

वह अपने लोगों को बारी कहता है, क्योंकि वह उनके बीच चलने-फिरने में आनन्द पाता है। वह इस संसार की सन्तान को देखता है, पर उनके साथ मेल-जोल नहीं रखता। उसकी आँखें उनकी सब चाल-चलन पर लगी रहती हैं, पर वह उनसे बातचीत करने नीचे नहीं आता, जैसे वह अब्राहम के पास आया था, जैसे कोई मनुष्य अपने मित्र से बातें करता है।

इसके विपरीत, वह अपनी दीवटों के बीच चलना पसन्द करता है, और यह देखना कि ज्योति भली भाँति जल रही है या नहीं। वह अपने पवित्र लोगों की सभाओं में उपस्थित रहना, और भीतर आकर उनके साथ भोजन करना पसन्द करता है, और वे उसके साथ। वह अपने पिता के साथ आकर अपने चेलों के साथ वास करना पसन्द करता है; और जहाँ कहीं दो या तीन उसके नाम पर इकट्ठे होते हैं, वहाँ वह उनके बीच में होता है। वह अपनी बारी में आकर उसके मनोहर फल खाना; सुगन्ध-द्रव्यों की क्यारियों में उतरकर कुमुद इकट्ठे करना; यह देखना पसन्द करता है कि दाखलता फूल-फल रही है, कोमल अंगूर निकल रहे हैं, और अनार की कलियाँ फूट रही हैं (श्रेष्ठगीत 7:12)। संक्षेप में, वह अपने लोगों के साथ विशेष सहभागिता रखता है, और उनसे ऐसा घनिष्ठ व्यवहार करता है जैसा वह संसार से नहीं करता।

वह अपने लोगों को बारी कहता है, क्योंकि वे उपयोगी हैं, और फल और फूल लाते हैं। इस संसार की सन्तान का वास्तविक उपयोग कहाँ है? जब तक वे मन नहीं फिराते, उनका क्या मूल्य है? वे निकम्मे किसान और भूमि को व्यर्थ घेरनेवाले हैं। वे उस प्रभु की महिमा नहीं करते जिसने उन्हें मोल लिया; वे सृष्टि में अपना भाग पूरा नहीं करते; वे सृजे हुए प्राणियों के जगत में अकेले खड़े हैं, उस काम को नहीं करते जिसके लिए उनके सृष्टिकर्ता ने उन्हें ठहराया था। आकाश परमेश्वर की महिमा वर्णन करता है, — वृक्ष, अन्न, घास, फूल, नदियाँ, पक्षी उसकी स्तुति करते हैं, — पर संसारी मनुष्य ऐसा कुछ नहीं करता जिससे प्रगट हो कि वह परमेश्वर की चिन्ता करता है, या परमेश्वर की सेवा करता है, या परमेश्वर से प्रेम रखता है, या मसीह की छुड़ाने वाली मृत्यु के लिए कृतज्ञ है।

प्रभु के लोग ऐसे नहीं हैं। वे उसे महिमा की कुछ आमदनी लाते हैं। वे थोड़ा-बहुत फल लाते हैं, और बिलकुल बंजर और निकम्मे दास नहीं हैं। संसार की तुलना में वे एक बारी हैं।

II. प्रभु की बारी में एक विशेष लक्षण है। वह एक घिरी हुई बारी है।

विश्वासियों के चारों ओर एक घेरा है; नहीं तो वे कभी उद्धार न पाते। यही उनकी सुरक्षा का रहस्य है। यह उनकी विश्वासयोग्यता, उनका बल या उनका प्रेम नहीं, बल्कि उनके चारों ओर की दीवार है जो उन्हें खो जाने से रोकती है। वे "घिरी हुई बारी" हैं।

वे परमेश्वर पिता के अनन्त चुनाव से घिरे हुए हैं। उनके जन्म से बहुत पहले, — जगत की उत्पत्ति से बहुत पहले, परमेश्वर ने उन्हें जाना, उन्हें चुन लिया, और यीशु मसीह के द्वारा उद्धार पाने के लिए ठहराया। संसार की सन्तान को यह सिद्धान्त सुनाया जाना अच्छा नहीं लगता। यह मनुष्य को दीन करता है, और उसके लिए घमण्ड करने का कोई स्थान नहीं छोड़ता। पर चाहे इसका दुरुपयोग हो या न हो, चुनाव का सिद्धान्त सत्य है। यह विश्वासी की नींव का कोने का पत्थर है कि वह जगत की उत्पत्ति से पहले मसीह में चुना गया था। इस घेरे की दृढ़ता का ठीक अनुमान कौन लगा सकता है?

वे परमेश्वर पुत्र के विशेष प्रेम से घिरे हुए हैं। प्रभु यीशु सब मनुष्यों का उद्धारकर्ता है, पर विशेष करके विश्वास करनेवालों का। उसे सब प्राणियों पर अधिकार है, पर जो विशेष रूप से उसे दिए गए हैं उन्हें वह अनन्त जीवन ऐसी रीति से देता है जैसा किसी और को नहीं देता। उसने क्रूस पर अपना लहू सब के लिए बहाया, पर वह केवल उन्हीं को धोता है जिनका उसमें भाग है। वह सब को बुलाता है, पर जिन्हें चाहता है उन्हें जिलाता है और महिमा तक पहुँचाता है। वह उनके लिए प्रार्थना करता है: वह संसार के लिए प्रार्थना नहीं करता। वह उनके लिए मध्यस्थता की प्रार्थना करता है, कि वे बुराई से बचे रहें, कि वे सत्य के द्वारा पवित्र किए जाएँ, कि उनका विश्वास जाता न रहे। इस घेरे की धन्यता का पूरा वर्णन कौन कर सकता है?

वे परमेश्वर पवित्र आत्मा के प्रभावशाली कार्य से घिरे हुए हैं। मसीह का आत्मा उन्हें संसार में से बुलाता है, और उन्हें ऐसे अलग करता है मानो उनके और संसार के बीच दीवार खड़ी कर दी गई हो। वह उनमें नए हृदय, नए मन, नई रुचियाँ, नई अभिलाषाएँ, नए शोक, नए आनन्द, नई इच्छाएँ, नए सुख, नई लालसाएँ डालता है। वह उन्हें नई आँखें, नए कान, नए प्रेम, नए विचार देता है। वह उन्हें नई सृष्टि बनाता है; उनका नया जन्म होता है, और नए जन्म के साथ वे एक नया जीवन आरम्भ करते हैं। पवित्र आत्मा की रूपान्तरित करनेवाली शक्ति सचमुच प्रबल है! विश्वासी और संसार पूरी रीति से अलग कर दिए जाते हैं, और सदा के लिए पृथक हो जाते हैं। आप एक विश्वासी और एक अविश्वासी को साथ रख सकते हैं, उनका विवाह करा सकते हैं, उन्हें एक छत के नीचे रख सकते हैं, पर उन्हें फिर कभी एक नहीं कर सकते। एक "घिरी हुई बारी" का अंश है, और दूसरा नहीं। प्रभावशाली बुलाहट एक ऐसी रुकावट है जो टूट नहीं सकती।

इस तिहरी दीवार की घेराबन्दी की शान्ति कौन बता सकता है! विश्वासी चुनाव के द्वारा घिरे हुए हैं, धुलाई और मध्यस्थता की प्रार्थना के द्वारा घिरे हुए हैं, बुलाहट और नया जन्म के द्वारा घिरे हुए हैं। हमारे चारों ओर प्रेम के इन तिहरे बन्धनों की सान्त्वना महान है—पिता परमेश्वर का प्रेम, पुत्र परमेश्वर का प्रेम, पवित्र आत्मा परमेश्वर का प्रेम! तिहरा बटा हुआ डोरा सहज ही नहीं टूटता।

क्या कोई पाठक एक क्षण के लिए भी यह मान सकता है कि इस सबकी आवश्यकता नहीं थी? मेरा विश्वास है कि इस तिहरी घेराबन्दी से कम कुछ भी प्रभु की वाटिका को पूरी तरह उजड़ने से नहीं बचा सकता था। चुनाव, मध्यस्थता की प्रार्थना और नया जन्म के बिना एक भी आत्मा स्वर्ग तक न पहुँचती। जंगल का जंगली सूअर घुस आता और सब कुछ चट कर जाता; गरजता हुआ सिंह भीतर आकर सब कुछ अपने पाँवों तले रौंद डालता। शैतान शीघ्र ही प्रभु की वाटिका को भूमि के बराबर कर देता।

इसके लिए परमेश्वर का धन्यवाद हो कि हम "बाड़ से घिरी हुई वाटिका" हैं! परमेश्वर का धन्यवाद हो कि हमारी अन्तिम सुरक्षा हमारी अपनी किसी बात पर निर्भर नहीं है—न हमारे अनुग्रह और भावनाओं पर, न हमारे पवित्रीकरण की मात्रा पर, न भलाई करते रहने में हमारे स्थिर रहने पर, न हमारे प्रेम पर, न अनुग्रह में हमारी बढ़ती पर, न हमारी प्रार्थनाओं और बाइबल-पठन पर, यहाँ तक कि न हमारे विश्वास पर भी। यह किसी और बात पर नहीं, केवल पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के कार्य पर टिकी है। यदि यह तिहरा कार्य हमें घेरे हुए है, तो हमारी आशा को कौन गिरा सकता है? यदि परमेश्वर हमारी ओर है, तो हमारा विरोधी कौन हो सकता है?

आदम का हृदय पाप से मुक्त था। आदम निर्दोषता में बलवन्त था, और बुरे उदाहरणों तथा भ्रष्ट पड़ोसियों के सम्पर्क से अशुद्ध नहीं हुआ था। आदम ऐसे ऊँचे स्थान पर था जो हमारे वर्तमान स्थान से हज़ार गुना ऊँचा था; फिर भी आदम परीक्षा के सामने गिर गया। उसके चारों ओर कोई घेराबन्दी न थी, शैतान को बाहर रखने वाली कोई दीवार न थी, प्रभु की वाटिका के पहले फूल के चारों ओर कोई रोक न थी—और देखो आदम कैसे गिर गया!

विश्वासी अपनी ऊँघती आँखें खोलें और अपने विशेषाधिकारों का मूल्य समझने का यत्न करें! यह प्रभु की वाटिका का सबसे धन्य भाग है। यह "बाड़ से घिरी हुई वाटिका" है। मेरा विश्वास है कि यदि चुनाव न होता, तो उद्धार भी न होता। मैंने कभी ऐसा मनुष्य नहीं देखा जिसका उद्धार किसी भी रीति से स्वयं उसी पर निर्भर होता तो हो पाता। आओ, हम सब प्रतिदिन प्रभु यीशु का धन्यवाद करें, और अपने पूरे हृदय से करें, कि उसके लोग चुने हुए और रखवाली किए हुए लोग हैं, और उसकी वाटिका "बाड़ से घिरी हुई वाटिका" से कम कुछ नहीं है।

III. प्रभु की वाटिका खाली नहीं है: वह सदा फूलों से भरी रहती है। बीते समय में उसमें बहुत फूल रहे हैं, वर्तमान समय में भी बहुत हैं। विश्वासी ही वे फूल हैं जो प्रभु की वाटिका को भरते हैं।

मैं प्रभु यीशु की वाटिका के फूलों के विषय में दो बातें कहूँगा। कुछ बातों में वे सब बिलकुल एक-दूसरे के समान हैं। कुछ बातों में वे इस संसार की वाटिकाओं के फूलों के समान भाँति-भाँति के और भिन्न-भिन्न हैं।

(क) कुछ बातों में वे सब एक समान हैं।

(1) वे सब रोपे गए हैं। प्रभु का एक भी फूल उसकी वाटिका में स्वाभाविक रूप से नहीं उगा। वे सब औरों के समान स्वभाव ही से क्रोध की सन्तान जन्मे थे। कोई मनुष्य अपने हृदय में अनुग्रह लिए हुए नहीं जन्मता। प्रभु के लोगों में हर एक विश्वासी किसी समय उसका बैरी और दण्ड की दशा में था। यह परमेश्वर का अनुग्रह ही था जिसने पहले उसे संसार में से बुलाया। यह मसीह का आत्मा ही था जिसने उसे वह बनाया जो वह है, और उसे प्रभु की वाटिका में रोपा। इस बात में प्रभु के सब लोग एक समान हैं: वे सब रोपे हुए फूल हैं।

(2) प्रभु के फूल अपनी जड़ में सब एक समान हैं। बाहरी बातों में वे भिन्न हो सकते हैं, पर भीतर से वे सब एक ही हैं। वे सब यीशु मसीह में जड़ पकड़े और नींव पर स्थापित हैं। विश्वासी भिन्न-भिन्न स्थानों में आराधना करते हों और भिन्न-भिन्न कलीसियाओं के सदस्य हों, परन्तु उनकी नींव एक ही है—क्रूस और लहू।

(3) प्रभु के फूल आरम्भ में सब निर्बल होते हैं। वे एकदम पूरी परिपक्वता को नहीं पहुँचते। वे पहले नवजात शिशुओं के समान कोमल और नाज़ुक होते हैं, और उन्हें दूध पिलाना पड़ता है, ठोस भोजन नहीं। वे शीघ्र ही रोक दिए जाते और पीछे धकेल दिए जाते हैं। सब इसी प्रकार आरम्भ करते हैं।

(4) प्रभु के फूलों को सब को सूर्य के प्रकाश की आवश्यकता है। फूल बिना प्रकाश के जी नहीं सकते। विश्वासी तब तक सुखपूर्वक नहीं जी सकते जब तक वे यीशु मसीह का मुख बहुत न देखें। सदा उसी को निहारना, उसी से पोषण पाना, उसी के साथ सहभागिता रखना—यही मनुष्य की आत्मा में परमेश्वर के जीवन का गुप्त स्रोत है।

(5) प्रभु के फूलों को सब को आत्मा की ओस की आवश्यकता है। फूल नमी के बिना मुरझा जाते हैं। विश्वासियों को प्रतिदिन, प्रतिघण्टे, पवित्र आत्मा के द्वारा अपने मन के आत्मिक स्वभाव में नया किए जाने की आवश्यकता है। यदि हम ताज़ा, जीवित, सच्चे मसीही होना चाहते हैं तो पुराने अनुग्रह पर नहीं जी सकते। हमें प्रतिदिन आत्मा से और अधिक भरते जाना चाहिए। भीतरी मन्दिर का हर कक्ष भरा जाना चाहिए।

(6) प्रभु के फूलों को सब को खरपतवार का भय है। फूलों की क्यारियों में निरन्तर निराई की आवश्यकता होती है। विश्वासियों को प्रतिदिन जाँच करके देखना चाहिए कि वे अपने उलझाने वाले पापों को बिना छेड़े बढ़ने तो नहीं दे रहे। ये ही वे बातें हैं जो अनुग्रह के कार्यों का गला घोंट देती हैं और आत्मा के प्रभावों को ठण्डा कर देती हैं। सब इस संकट में हैं; सबको सावधान रहना चाहिए।

(7) प्रभु के फूलों को सब को छँटाई और गुड़ाई की आवश्यकता है। अकेले छोड़े गए फूल शीघ्र ही घट जाते और छोटे हो जाते हैं। कोई सावधान माली अपने गुलाबों को वर्ष भर यूँ ही नहीं छोड़ता। ठीक इसी प्रकार विश्वासियों को झकझोरे जाने, हिलाए जाने और अपने शरीर को मारने की आवश्यकता है, नहीं तो वे ऊँघने लगते हैं और लूत के समान सदोम के पास बस जाने की ओर झुक जाते हैं। और यदि वे छँटाई के काम में ढीले हैं, तो परमेश्वर प्रायः उनके लिए उसे अपने हाथ में ले लेता है।

(8) प्रभु के फूल सब बढ़ते हैं। केवल कपटी, भेड़ की खाल में भेड़िए और रँगे-पुते मसीही ही एक जगह ठहरे रहते हैं। सच्चे विश्वासी देर तक एक से नहीं रहते। उनकी अभिलाषा है कि अनुग्रह पर अनुग्रह, सामर्थ्य पर सामर्थ्य, ज्ञान पर ज्ञान, विश्वास पर विश्वास, पवित्रता पर पवित्रता में आगे बढ़ते जाएँ। दो-तीन वर्ष की अनुपस्थिति के बाद प्रभु की वाटिका की किसी क्यारी को देखो, तो तुम्हें यह दिखाई देगा। यदि न दिखाई दे, तो तुम भली-भाँति मान सकते हो कि जड़ में कीड़ा लगा है। जीवन बढ़ता है; पर मृत्यु ठहरी रहती और सड़ती जाती है।

(ख) परन्तु जहाँ प्रभु के फूल कुछ बातों में सब एक समान हैं, वहाँ दूसरी बातों में वे हमारी अपनी वाटिकाओं के फूलों के समान भाँति-भाँति के और भिन्न-भिन्न हैं। आओ, इस बात पर थोड़ा विचार करें।

विश्वासियों में बहुत सी बातें एक समान होती हैं: एक प्रभु, एक विश्वास, आत्मा का एक बपतिस्मा, एक आशा, एक नींव, परमेश्वर के वचन के प्रति एक सी श्रद्धा, प्रार्थना में एक सा आनन्द, हृदय की एक सी नई दशा। फिर भी कुछ बातें ऐसी हैं जिनमें वे एक नहीं हैं। उनका सामान्य अनुभव एक सा है, और स्वर्ग पर उनका अधिकार भी एक सा है; फिर भी उनके विशेष अनुभव में भिन्नताएँ हैं। उनके विचारों और भावनाओं में अन्तर की छटाएँ हैं। वे इतने सर्वथा और पूर्णतः एक नहीं हैं कि सब बातों में, सब समय और सब विषयों में एक-दूसरे को भली-भाँति समझ सकें। इसे स्मरण रखना बहुत ही आवश्यक है! विश्वासी वर्ग में एक हैं, पर जाति में एक नहीं; बड़े सिद्धान्तों में एक हैं, पर सब ब्योरों में एक नहीं; पूरे सत्य को ग्रहण करने में एक हैं, पर सत्य के भिन्न-भिन्न अंशों को जो महत्त्व वे देते हैं उसमें एक नहीं; जड़ में एक हैं, पर फूल में एक नहीं; उस अंश में एक हैं जिसे केवल प्रभु यीशु देखता है, पर उस अंश में एक नहीं जिसे संसार देखता है।

कुछ बातों में तुम अपने भाई या बहन को समझ नहीं सकते। तुम वैसा नहीं कर सकते जैसा वे करते हैं, वैसा नहीं बोल सकते जैसा वे बोलते हैं, वैसा आचरण नहीं कर सकते जैसा वे करते हैं, वैसे नहीं हँस सकते जैसे वे हँसते हैं, और जिसकी वे प्रशंसा करते हैं उसकी प्रशंसा नहीं कर सकते। ओह, उन्हें दोषी ठहराने में उतावली न करो! एक शब्द के कारण उन्हें अपराधी न बनाओ! इसलिए उन्हें नीचा स्थान न दो कि उनके और तुम्हारे बीच थोड़ी ही सहानुभूति है, तुम्हारे हृदयों में मेल खाने और प्रत्युत्तर देने वाले तार थोड़े हैं, उनसे सहभागिता करते हुए तुम शीघ्र ही रुक जाते हो, और पाते हो कि उनमें और तुममें साझा भूमि सीमित ही है! अपने हृदय की पट्टियों पर यह लिख रखो कि मसीहियों में अनेक पाठशालाएँ, श्रेणियाँ, वर्ग और भिन्नताएँ हैं। तुम सब प्रभु की वाटिका में हो सकते हो, और बड़े-बड़े सिद्धान्तों पर एक हो सकते हो; फिर भी प्रभु की वाटिका भाँति-भाँति के फूलों से बनी है। उसके सब फूल उपयोगी हैं; किसी को तुच्छ न जानना चाहिए। फिर भी उसकी वाटिका में बहुत भिन्न-भिन्न प्रकार के फूल हैं।

(1) प्रभु की वाटिका में उगने वालों में कुछ ऐसे फूलों के समान हैं जो रंग में चमकीले और भड़कीले होते हैं, पर सुगन्धित नहीं होते। तुम उन्हें दूर से देखते हो, वे संसार की आँखों को आकर्षित करते हैं और उनके रंग सुन्दर हैं, पर इससे अधिक तुम कुछ नहीं कह सकते।

ये प्रायः सार्वजनिक मसीही होते हैं, अर्थात् लोकप्रिय प्रचारक, मंचों पर बोलने वाले, सुनने वाली मंडलियों के सिंह, ऐसे लोग जिनकी चर्चा होती है, जिनकी ओर उँगली उठाई जाती है और जिनके पीछे लोग दौड़ते हैं। ऐसे लोग प्रभु की वाटिका के ट्यूलिप, सूरजमुखी, पीओनी और डालिया हैं, अपने ढंग से अद्भुत, भड़कीले, चमकीले और तेजस्वी, पर सुगन्धित नहीं।

(2) कुछ उन फूलों के समान हैं जो कोई दिखावा नहीं करते, फिर भी सबसे सुगन्धित होते हैं।

ये वे मसीही हैं जिनके विषय में संसार कभी सुनता नहीं; वे सार्वजनिक दृष्टि से कुछ दूर ही रहना चाहते हैं। वे अपने मार्ग की समतल चाल पर चलते रहते हैं और चुपचाप घर की ओर बढ़ते जाते हैं; पर अपने आस-पास सब कुछ सुगन्धित कर देते हैं।

ये वे हैं जो दुर्लभ हैं और कठिनाई से मिलते हैं; पर जितना अधिक वे जाने जाते हैं, उतना ही अधिक वे प्रिय लगते हैं। उनके अपने घरों और परिवारों में उनका वास्तविक चरित्र पूछो; पतियों, पत्नियों, बच्चों और सेवकों से उनके चरित्र के विषय में पूछो, तो तुम शीघ्र जान लोगे कि उनकी सुन्दरता और श्रेष्ठता का दसवाँ भाग भी संसार नहीं जानता। जितना निकट जाओगे, प्रभु की वाटिका के इन निवासियों से उतनी ही अधिक सुगन्ध निकलेगी। ये प्रभु के बैंगनी फूल हैं, जिनका मूल्य थोड़े ही लोग जानते हैं, पर जो उन्हें जानते हैं उनके लिए ये कितने मधुर हैं!

(3) प्रभु की वाटिका में कुछ उन फूलों के समान हैं जो ठंडे मौसम में जीवित नहीं रह सकते।

ये वे मसीही हैं जिनमें थोड़ा ही बल है, जो विपत्ति के दिन मूर्छित हो जाते हैं, और जो तभी फलते-फूलते हैं जब उनके आस-पास सब कुछ सुगम और गर्म हो। परीक्षा की ठंडी हवा और क्लेश का अचानक पड़ा पाला उन्हें झुलसा कर काट डालता है। परन्तु प्रभु यीशु बड़ा दयालु है; वह उन्हें सामर्थ्य से बढ़कर परीक्षा में पड़ने नहीं देता। वह उन्हें अपनी वाटिका के आश्रय वाले और धूप वाले स्थानों में लगाता है। वह उनकी रक्षा करता है और ठंडी हवा को रोकने के लिए सुदृढ़ पौधों की बाड़ उनके चारों ओर लगा देता है। कोई मनुष्य उन्हें तुच्छ न जाने। वे प्रभु के फूल हैं, अपने स्थान और अपने ढंग से सुन्दर।

(4) प्रभु की वाटिका में कुछ उन सहनशील फूलों के समान हैं जो जाड़े में भी खिलते हैं।

ये वे खुरदरे मसीही हैं जिन्हें कभी कोई कष्ट अनुभव होता ही नहीं दिखता; जिन्हें न विरोध, न क्लेश कुछ भी विचलित करता प्रतीत होता है। निःसन्देह उनमें वह कोमलता और मधुरता नहीं है जिसकी हम दूसरों में प्रशंसा करते हैं। हम उस प्रिय सुकुमारता को खोजते हैं जो कुछ लोगों में एक अवर्णनीय आकर्षण होती है। जिन्हें हम जानते हैं उनकी तुलना में वे कभी-कभी अपनी रूखाई और सहानुभूति की कमी से हमें ठंडा कर देते हैं। फिर भी कोई मनुष्य उन्हें तुच्छ न जाने। वे प्रभु की वाटिका के क्रोकस हैं, अपने स्थान और ढंग में सुन्दर, और अपने ही समय में मूल्यवान।

(5) प्रभु की वाटिका में कुछ वर्षा के बाद ही सबसे अधिक सुगन्धित होते हैं।

ये वे मसीही हैं जो परीक्षा और क्लेश में सबसे अधिक अनुग्रह प्रकट करते हैं। धूप और समृद्धि के दिन वे असावधान हो जाते हैं; उन पर किसी दुःख की वर्षा होनी चाहिए ताकि उनकी पूरी उत्तमता प्रकट हो। उनकी मुस्कान से अधिक उनके आँसुओं में पवित्रता की सुन्दरता है; जब वे हँसते हैं उसकी अपेक्षा जब वे रोते हैं तब वे यीशु के अधिक समान होते हैं। ये प्रभु की वाटिका के गुलाब हैं, सब समय प्रिय, सुगन्धित और सुन्दर, पर वर्षा के बाद जैसे कभी नहीं।

(6) प्रभु की वाटिका में कुछ रात्रि में ही सबसे अधिक सुगन्धित होते हैं।

ये वे विश्वासी हैं जिन्हें अनुग्रह के सिंहासन के निकट बने रहने के लिए निरन्तर परीक्षा की आवश्यकता होती है। वे समृद्धि की धूप सह नहीं सकते: वे प्रार्थना में असावधान, वचन के विषय में ऊँघने वाले, स्वर्ग के विषय में उदासीन हो जाते हैं, और किसी बिन्यामीन के साथ इस संसार के किसी कोने में बस जाना उन्हें बहुत भाने लगता है। ऐसे लोगों को प्रभु यीशु प्रायः बादल के नीचे रखता है, ताकि वे सही मनोदशा में बने रहें। वह लहर पर लहर, संकट पर संकट भेजता है कि वे मरियम के समान उसके चरणों में बैठें और क्रूस के निकट रहें। जिस अन्धकार में उन्हें चलना पड़ता है, वही उन्हें इतना सुगन्धित बनाता है।

(7) प्रभु की वाटिका में कुछ कुचले जाने पर ही सबसे अधिक सुगन्धित होते हैं।

ये वे मसीही हैं जिनकी सच्चाई किसी भारी और असाधारण न्याय के समय सबसे अधिक प्रकट होती है। भारी विपत्ति की आँधियाँ और तूफ़ान उन पर से गुज़र जाते हैं, और तब संसार के आश्चर्य के लिए सुगन्धित द्रव्य बह निकलते हैं। मैंने एक बार एक युवती को देखा जो रीढ़ की बीमारी के कारण छः वर्ष से एक अटारी में बिछौने पर पड़ी थी, असहाय, गतिहीन, और उन सब बातों से कटी हुई जो इस संसार को सुखद बना सकती हैं। परन्तु वह यीशु की बारी की थी: वह अकेली न थी, क्योंकि वह उसके साथ था। आप सोचते कि वह उदास होगी; वह तो पूरी तरह प्रसन्न थी। आप आशा करते कि वह शोकित होगी; वह सदा आनन्दित रहती थी। आप मानते कि वह निर्बल होगी और उसे शान्ति की आवश्यकता होगी; वह बलवन्त थी और दूसरों को शान्ति देने में समर्थ थी। आप कल्पना करते कि उसने अन्धकार का अनुभव किया होगा; मुझे तो वह सर्वथा ज्योति ही लगी। आप समझते कि उसका मुख गम्भीर होगा; वह तो शान्त मुस्कान से और भीतरी शान्ति के उमड़ते स्रोत से भरा था। यदि वह कुड़कुड़ाती तो आप उसे लगभग क्षमा ही कर देते; पर उसके मुख से तो पूर्ण सुख और सन्तोष ही की साँस निकलती थी। प्रभु की बारी के कुचले हुए फूल कभी-कभी अत्यन्त मधुर सुगन्ध देते हैं!

(8) प्रभु की बारी के कुछ फूलों का पूरा मूल्य उनके मरने के बाद ही समझा जाता है।

ये वे नम्र विश्वासी हैं जो दोरकास की नाईं भले कर्मों और दूसरों के प्रति सक्रिय प्रेम से भरपूर हैं। ये वे सीधे-सादे लोग हैं जिन्हें दिखावा और प्रसिद्धि नहीं भाती, और जो अपने प्रभु और स्वामी की नाईं भलाई करते हुए आत्माओं के पास जाना पसन्द करते हैं, अर्थात् अनाथों और विधवाओं से भेंट करना, उन घावों पर मरहम लगाना जिन्हें यह निष्ठुर संसार न जानता है न परवाह करता है, मित्रहीनों की सेवा करना, दरिद्रों की सहायता करना, और सुसमाचार का प्रचार रेशम और मखमल पहनने वालों को नहीं, बरन् कंगालों को करना।

इस पीढ़ी का ध्यान इन पर नहीं जाता; परन्तु प्रभु यीशु इन्हें जानता है, और उसका पिता भी। जब वे मर कर चले जाते हैं, तब उनका काम और प्रेम का परिश्रम सब प्रकट हो जाता है। वह उन लोगों के हृदयों पर, जिनकी उन्होंने सहायता की, हीरे से लिखा हुआ है: वह छिपाया नहीं जा सकता। मरे हुए होकर भी वे बोलते हैं, यद्यपि जीवित रहते वे चुप थे। उनके चले जाने पर हम उनका मूल्य जान लेते हैं, चाहे जब वे हमारे साथ थे तब न जाना हो। जिनका प्राण या शरीर उनके हाथ से पोषित हुआ, उनके आँसू चकित संसार को बताते हैं कि कुछ ऐसे लोग घर चले गए हैं जिनका स्थान सहज में नहीं भरा जा सकता, और एक ऐसी रिक्तता हो गई है जिसे भरना कठिन होगा। इनके लिए कभी वह दुखद समाधि-लेख न होगा, "बिना चाहे हुए चला गया।" ये प्रभु की बारी के सुगन्धित पौधे हैं, जिनकी जितनी सराहना और प्रशंसा कट कर मर जाने पर होती है उतनी पहले कभी नहीं होती।

अब मैं कुछ व्यावहारिक प्रयोग के शब्दों के साथ समाप्त करता हूँ।

प्रभु की बारी की एक बात ऐसी है जिसके समान मुझे इस संसार में कुछ नहीं दिखता।

इस संसार के फूल सब मर जाते हैं, और कुम्हला जाते हैं, और अपनी मधुरता खो देते हैं, और सड़ जाते हैं, और अन्त में कुछ नहीं रहते। सबसे सुन्दर फूल भी सचमुच सदा रहने वाले नहीं हैं। प्रकृति की सबसे पुरानी और सबसे बलवन्त सन्तान का भी अन्त हो जाता है।

प्रभु के फूलों के साथ ऐसा नहीं है। अनुग्रह की सन्तान कभी नहीं मर सकती। वे कुछ समय के लिए सो सकते हैं; जब वे अपनी पीढ़ी की सेवा कर चुकें और अपना काम पूरा कर लें, तब वे उठा लिए जा सकते हैं। प्रभु निरन्तर अपनी बारी में उतरकर "सोसन फूल बटोरता" है, और एक के बाद एक फूल अपनी छाती में रखता है; परन्तु प्रभु के सब फूल फिर जी उठेंगे।

जब प्रभु दूसरी बार आएगा, तब वह अपने लोगों को अपने साथ लाएगा। उसके फूल फिर जीवित होंगे, और अधिक उज्ज्वल, अधिक मधुर, अधिक मनोहर, अधिक सुन्दर, अधिक तेजस्वी, अधिक शुद्ध, अधिक चमकीले, अधिक रमणीय होंगे। उनकी देह उनके प्रभु की देह के समान तेजोमय होगी, और वे हमारे परमेश्वर के आँगनों में सदा फूलते-फलते रहेंगे।

(1) पाठक, क्या तू प्रभु की बारी में है, या इस संसार के जंगल में?

तुझे इन दोनों में से किसी एक में होना ही है। तुझे चुनना होगा। तूने कौन-सा चुना है, और अब तू कौन-सा चुनता है? प्रभु यीशु तुझे रोपना चाहता है।

वह अपनी आत्मा के द्वारा तुझसे विनती करता है। वह तुझे अपने प्रियों की गिनती में मिलाना चाहता है। वह वचन और विधान के द्वारा तेरे हृदय के द्वार पर खटखटाता है। वह तेरे विवेक से कानाफूसी करता है, "जाग, उठ, पश्चाताप कर, मन फिरा, और निकल आ!"

ओह, उससे जो बोलता है मुँह न फेर! पवित्र आत्मा का विरोध न कर। जंगल में नहीं, बारी में अपना स्थान चुन। जाग, उठ, और संसार से मुड़ जा।

(2) पाठक! जंगल या बारी! तू कौन-सा लेगा?

यदि जंगल, तो तू अपनी ही इच्छा पर चलेगा, जंगली होकर बढ़ेगा, व्यर्थ ही उगेगा, अपने ही लिए फल और फूल उत्पन्न करेगा, बाँझ, निष्फल और निकम्मा पौधा बन जाएगा, अपने लिए भी अप्रिय और प्रेम के अयोग्य होकर जीएगा, और अन्त में जंगली दाने के पूले में बटोरा जाकर जला दिया जाएगा!

यदि बारी, तो तू अपनी इच्छा पर न चलेगा। परन्तु तुझे उससे कहीं उत्तम वस्तु मिलेगी, अर्थात् परमेश्वर और मसीह तेरे अपने होंगे। प्रभु यीशु स्वयं तुझे जोतेगा, सींचेगा, सम्भालेगा, स्थानान्तरित करेगा, छाँटेगा, और सिखाएगा;

और अन्त में तेरा नाम जीवन के पूले में पाया जाएगा।

नीतिवचन 22:6 माता-पिता के कर्तव्य

"लड़के को उसी मार्ग की शिक्षा दे जिस पर उसको चलना चाहिए, और वह बूढ़ा होकर भी उससे न हटेगा।" -- नीतिवचन 22:6।

मैं समझता हूँ कि अधिकांश मसीही कहलाने वाले इस पृष्ठ के शीर्ष के पद से परिचित हैं। इसकी ध्वनि सम्भवतः किसी पुरानी धुन की नाईं आपके कानों को जानी-पहचानी लगती होगी। सम्भव है कि आपने इसे कई बार सुना या पढ़ा हो, इसकी चर्चा की हो, या इसे उद्धृत किया हो। क्या ऐसा नहीं है?

परन्तु फिर भी इस पद के सार पर कितना कम ध्यान दिया जाता है! इसमें निहित सिद्धान्त मुश्किल से जाना जाता प्रतीत होता है, और जो कर्तव्य यह हमारे सामने रखता है वह भयानक रूप से कम निभाया जाता है। पाठक, क्या मैं सत्य नहीं कहता?

यह नहीं कहा जा सकता कि यह विषय नया है। संसार पुराना है, और हमारी सहायता के लिए लगभग छः हज़ार वर्ष का अनुभव है। हम ऐसे दिनों में जी रहे हैं जब हर ओर शिक्षा के लिए बड़ा उत्साह है। हम सुनते हैं कि हर तरफ़ नई पाठशालाएँ खुल रही हैं। हमें नई प्रणालियों के विषय में, और हर प्रकार और विवरण की युवाओं के लिए नई पुस्तकों के विषय में बताया जाता है। फिर भी इस सब के होते हुए, अधिकांश बच्चे स्पष्टतः उस मार्ग पर नहीं सिखाए जाते जिस पर उन्हें चलना चाहिए, क्योंकि जब वे बड़े होकर प्रौढ़ अवस्था को पहुँचते हैं, तब वे परमेश्वर के साथ नहीं चलते।

अब हम इस स्थिति का कारण कैसे बताएँ? सीधी सच्ची बात यह है कि हमारे पाठ में प्रभु की आज्ञा का आदर नहीं किया जाता; और इसीलिए हमारे पाठ में प्रभु की प्रतिज्ञा पूरी नहीं होती।

पाठक, ये बातें हृदय में गहरी जाँच-पड़ताल को जन्म दें, यह उचित ही है। इसलिए बच्चों के सही पालन-पोषण के विषय में एक सेवक की ओर से उपदेश का एक वचन सह लीजिए। मेरा विश्वास कीजिए, यह ऐसा विषय है जो हर विवेक को छूना चाहिए, और हर एक को अपने आप से यह प्रश्न पुछवाना चाहिए, "क्या मैं इस विषय में वह सब कर रहा हूँ जो मैं कर सकता हूँ?"

यह ऐसा विषय है जो लगभग सभी से सम्बन्ध रखता है। शायद ही कोई घराना हो जिसे यह न छूता हो। माता-पिता, दाइयाँ, शिक्षक, धर्मपिता, धर्ममाताएँ, चाचा-मामा, चाचियाँ-मामियाँ, भाई, बहनें — सभी की इसमें रुचि है। मेरे विचार में ऐसे लोग कम ही मिलेंगे जो किसी माता-पिता को उसके परिवार के संचालन में प्रभावित न कर सकें, या सुझाव अथवा सलाह से किसी बच्चे के पालन-पोषण पर असर न डाल सकें। मुझे संदेह है कि हम सब यहाँ कुछ न कुछ कर सकते हैं, चाहे सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से, और मैं चाहता हूँ कि सब इस बात को स्मरण रखने के लिए जागृत हों।

यह ऐसा विषय भी है जिसमें सम्बन्धित सब लोग अपने कर्तव्य में चूक जाने के बड़े खतरे में हैं। यह विशेष रूप से ऐसी बात है जिसमें मनुष्य अपने पड़ोसियों की त्रुटियाँ अपनी त्रुटियों से अधिक साफ़ देख लेते हैं। वे अक्सर अपने बच्चों को ठीक उसी मार्ग पर पालते हैं जिसे उन्होंने अपने मित्रों के सामने असुरक्षित बताकर धिक्कारा था। वे दूसरे लोगों के परिवारों में तिनके देखते हैं, पर अपने ही परिवार की कड़ियाँ अनदेखी कर देते हैं। वे बाहर की भूलें पकड़ने में उकाब जैसे तेज़ दृष्टिवाले होते हैं, फिर भी घर में प्रतिदिन होती घातक भूलों के प्रति चमगादड़ जैसे अंधे। वे अपने भाई के घर के विषय में बुद्धिमान होते हैं, पर अपने ही रक्त-सम्बन्धियों के विषय में मूर्ख। यहाँ, यदि कहीं है, तो हमें अपने ही निर्णय पर सन्देह करने की आवश्यकता है। इस बात को भी स्मरण रखना आपके लिए अच्छा होगा। [14]

अब आइए, मैं आपके सामने सही पालन-पोषण के विषय में कुछ संकेत रखता हूँ। परमेश्वर पिता, परमेश्वर पुत्र, परमेश्वर पवित्र आत्मा उन्हें आशीष दें, और उन्हें आप सबके लिए समय पर कहे गए वचन बना दें। उन्हें इसलिए अस्वीकार न कीजिए कि वे स्पष्ट और सीधे-सादे हैं; उन्हें इसलिए तुच्छ न जानिए कि उनमें कुछ नया नहीं है। निश्चित जानिए, यदि आप बच्चों को स्वर्ग के लिए तैयार करना चाहते हैं, तो ये ऐसे संकेत हैं जिन्हें हल्के में टाला नहीं जाना चाहिए।

I. पहला, यदि आप अपने बच्चों का सही पालन-पोषण करना चाहते हैं, तो उन्हें उस मार्ग में चलाइए जिसमें उन्हें चलना चाहिए, उस मार्ग में नहीं जिसमें वे स्वयं चलना चाहें।

स्मरण रखिए कि बच्चे बुराई की ओर स्पष्ट झुकाव लेकर जन्म लेते हैं, और इसलिए यदि आप उन्हें अपनी इच्छा से चुनने दें, तो वे निश्चय ही गलत चुनेंगे।

माँ यह नहीं बता सकती कि उसका कोमल शिशु बड़ा होकर क्या बनेगा — लम्बा या ठिगना, निर्बल या बलवान, बुद्धिमान या मूर्ख: वह इनमें से कुछ भी हो सकता है या नहीं भी, — यह सब अनिश्चित है। परन्तु एक बात माँ निश्चय के साथ कह सकती है: उसका हृदय भ्रष्ट और पापी होगा। हमारे लिए बुराई करना स्वाभाविक है। सुलैमान कहता है, "लड़के के हृदय में मूर्खता बंधी रहती है" (नीतिवचन 22:15)। "जो लड़का यों ही छोड़ दिया जाता है, वह अपनी माता की लज्जा का कारण होता है" (नीतिवचन 29:15)। हमारे हृदय उस भूमि के समान हैं जिस पर हम चलते हैं; उसे अकेला छोड़ दो तो वह निश्चय ही खरपतवार उगाएगी।

इसलिए, यदि आप अपने बच्चे के साथ बुद्धिमानी से व्यवहार करना चाहते हैं, तो आपको उसे उसकी अपनी इच्छा के मार्गदर्शन पर नहीं छोड़ना चाहिए। उसके लिए सोचिए, उसके लिए निर्णय कीजिए, उसके लिए कार्य कीजिए, ठीक वैसे ही जैसे आप किसी निर्बल और अंधे के लिए करते; परन्तु दया करके उसे उसकी अपनी मनमानी रुचियों और झुकावों के हवाले न कर दीजिए। उसकी पसन्द और इच्छाओं से परामर्श नहीं लेना चाहिए। वह अभी नहीं जानता कि उसके मन और आत्मा के लिए क्या भला है, जैसे वह यह भी नहीं जानता कि उसके शरीर के लिए क्या भला है। आप उसे यह तय नहीं करने देते कि वह क्या खाएगा, क्या पीएगा, और कैसे वस्त्र पहनेगा। संगत रहिए, और उसके मन के साथ भी वैसा ही व्यवहार कीजिए। उसे उस मार्ग में चलाइए जो पवित्रशास्त्र के अनुसार और सही है, उस मार्ग में नहीं जो उसे भाता है।

यदि आप मसीही पालन-पोषण के इस पहले सिद्धान्त पर मन नहीं बना सकते, तो आगे पढ़ना व्यर्थ है। हठ लगभग वह पहली बात है जो बच्चे के मन में प्रकट होती है; और उसका विरोध करना आपका पहला कदम होना चाहिए।

II. अपने बच्चे का पालन-पोषण पूरी कोमलता, स्नेह और धीरज के साथ कीजिए।

मेरा आशय यह नहीं कि आप उसे बिगाड़ दें, परन्तु मेरा आशय यह अवश्य है कि आप उसे दिखाएँ कि आप उससे प्रेम करते हैं।

प्रेम वह चाँदी का धागा होना चाहिए जो आपके सारे आचरण में पिरोया हो। कृपालुता, नम्रता, सहनशीलता, धीरज, सहानुभूति, बचपन की कठिनाइयों में सहभागी होने की तत्परता, बचपन के आनन्दों में सम्मिलित होने की तैयारी — ये वे डोरियाँ हैं जिनसे बच्चा सबसे सहज रीति से मार्ग पर लाया जा सकता है, — ये वे सुराग हैं जिनका आपको अनुसरण करना चाहिए यदि आप उसके हृदय तक पहुँचने का मार्ग ढूँढ़ना चाहते हैं।

बड़े हो चुके लोगों में भी ऐसे कम ही मिलेंगे जिन्हें हाँकने की अपेक्षा खींचना अधिक सरल न हो। हम सबके मन में कुछ ऐसा है जो ज़बरदस्ती के विरुद्ध उठ खड़ा होता है; जबरन आज्ञापालन के विचार मात्र से हमारी पीठ तन जाती है और गर्दन अकड़ जाती है। हम किसी सधाने वाले के हाथ में पड़े जवान घोड़ों के समान हैं: उनके साथ कोमलता से व्यवहार कीजिए और उन्हें दुलारिए, तो कुछ समय में आप उन्हें धागे से चला सकेंगे; उनके साथ कठोरता और हिंसा कीजिए, तो उन्हें वश में करने में कई महीने लग जाएँगे।

अब बच्चों के मन भी लगभग हमारे ही मन के साँचे में ढले हैं। व्यवहार की कठोरता और सख्ती उन्हें ठंडा कर देती है और पीछे धकेल देती है। यह उनके हृदय बन्द कर देती है, और आप द्वार ढूँढ़ते-ढूँढ़ते थक जाएँगे।

परन्तु उन्हें केवल यह देखने दीजिए कि आपके मन में उनके प्रति स्नेह है, — कि आप सचमुच उन्हें सुखी करना और उनका भला करना चाहते हैं, — कि यदि आप उन्हें दण्ड देते हैं तो वह उनके लाभ के लिए है, और कि पेलिकन पक्षी की तरह आप उनकी आत्माओं का पोषण करने के लिए अपने हृदय का लहू देने को तैयार हैं; मैं कहता हूँ, उन्हें यह देखने दीजिए, तो वे शीघ्र ही पूरी तरह आपके हो जाएँगे। परन्तु यदि उनका ध्यान कभी जीतना है, तो उन्हें कृपालुता से मनाना होगा।

और निश्चय ही स्वयं तर्क भी हमें यह पाठ सिखा सकता है। बच्चे निर्बल और कोमल प्राणी हैं, और इसीलिए उन्हें धैर्यपूर्ण और विचारशील व्यवहार की आवश्यकता है। हमें उन्हें नाज़ुक यंत्रों की तरह सावधानी से सँभालना चाहिए, ऐसा न हो कि खुरदरे स्पर्श से हम भला करने की अपेक्षा हानि अधिक कर दें। वे छोटे पौधों के समान हैं, और उन्हें कोमल सिंचाई चाहिए, — बार-बार, परन्तु एक बार में थोड़ी-थोड़ी।

हमें सब कुछ एक ही बार में पाने की आशा नहीं करनी चाहिए। हमें स्मरण रखना चाहिए कि बच्चे क्या होते हैं, और उन्हें उतना ही सिखाना चाहिए जितना वे सह सकें। उनका मन धातु के उस पिण्ड के समान है जिसे एकाएक गढ़कर काम का नहीं बनाया जा सकता, परन्तु छोटे-छोटे प्रहारों की लगातार श्रृंखला से ही बनाया जा सकता है। उनकी समझ सँकरे मुँह वाले बर्तनों के समान है; ज्ञान की दाखमधु को धीरे-धीरे उँडेलना चाहिए, नहीं तो उसका बहुत सा भाग छलककर नष्ट हो जाएगा। "आज्ञा पर आज्ञा, आज्ञा पर आज्ञा, नियम पर नियम, नियम पर नियम; थोड़ा यहाँ, थोड़ा वहाँ" — यही हमारा नियम होना चाहिए। सान का पत्थर अपना काम धीरे-धीरे करता है, परन्तु बार-बार रगड़ने से हँसिया की धार तेज हो जाती है। सचमुच बच्चे को सिखाने में धैर्य की आवश्यकता है, परन्तु उसके बिना कुछ भी नहीं हो सकता।

इस कोमलता और प्रेम के अभाव की कोई भी चीज़ भरपाई नहीं कर सकती। एक सेवक यीशु में जो सत्य है उसे स्पष्टता से, ज़ोर देकर और अकाट्य रीति से सुना सकता है; परन्तु यदि वह उसे प्रेम से नहीं सुनाता, तो थोड़ी ही आत्माएँ जीती जाएँगी। ठीक इसी प्रकार तुम अपने बच्चों के सामने उनका कर्तव्य रखो — आज्ञा दो, चेतावनी दो, दण्ड दो, समझाओ — परन्तु यदि तुम्हारे व्यवहार में स्नेह की कमी है, तो तुम्हारा सारा परिश्रम व्यर्थ ही जाएगा।

प्रेम सफल प्रशिक्षण का एक बड़ा रहस्य है। क्रोध और कठोरता डरा तो सकते हैं, परन्तु बच्चे को यह विश्वास नहीं दिला सकते कि तुम सही हो; और यदि वह तुम्हें बार-बार आपे से बाहर देखे, तो शीघ्र ही तुम उसके आदर को खो दोगे। जो पिता अपने पुत्र से वैसा बोलता है जैसा शाऊल ने योनातान से बोला था (1 शमूएल 20:30), उसे यह आशा नहीं करनी चाहिए कि उस पुत्र के मन पर उसका प्रभाव बना रहेगा।

अपने बच्चे के स्नेह पर अपनी पकड़ बनाए रखने का पूरा यत्न करो। अपने बच्चों को अपने से भयभीत कर देना एक खतरनाक बात है। तुम्हारे और तुम्हारे बच्चे के बीच संकोच और दबाव होने से तो लगभग कुछ भी अच्छा है; और यह भय के साथ आ जाता है। भय खुलेपन को समाप्त कर देता है; भय छिपाव की ओर ले जाता है; भय बहुत सी कपट का बीज बोता है और अनेक झूठों का कारण बनता है। कुलुस्सियों को कहे गए प्रेरित के शब्दों में सत्य की एक खान है: "हे बच्चेवालो, अपने बच्चों को तंग न करो, न हो कि उनका साहस टूट जाए" (कुलुस्सियों 3:21)। जो सलाह इसमें है उसे अनदेखा न किया जाए।

III. अपने मन में इस स्थायी धारणा के साथ अपने बच्चों को सिखाओ कि बहुत कुछ तुम पर निर्भर करता है।

अनुग्रह सब सिद्धान्तों में सबसे बलवन्त है। देखो, जब अनुग्रह किसी बूढ़े पापी के हृदय में आता है तो कैसी क्रान्ति कर देता है — वह कैसे शैतान के गढ़ों को उलट देता है, पहाड़ों को गिरा देता है, तराइयों को भर देता है, टेढ़ी बातों को सीधा करता है, और पूरे मनुष्य को नया बना देता है। सचमुच अनुग्रह के लिए कुछ भी असम्भव नहीं।

स्वभाव भी बहुत बलवन्त है। देखो, वह परमेश्वर के राज्य की बातों के विरुद्ध कैसे संघर्ष करता है, अधिक पवित्र होने के हर प्रयत्न से कैसे लड़ता है, और जीवन की अन्तिम घड़ी तक हमारे भीतर कैसे निरन्तर युद्ध छेड़े रखता है। स्वभाव सचमुच बलवन्त है।

परन्तु स्वभाव और अनुग्रह के बाद निःसन्देह शिक्षा से अधिक सामर्थी कुछ नहीं। (यदि मैं ऐसा कह सकूँ) परमेश्वर के अधीन रहते हुए बचपन की आदतें हमारे लिए सब कुछ हैं। प्रशिक्षण ही हमें वह बनाता है जो हम हैं। हमारा चरित्र उसी साँचे का रूप धारण कर लेता है जिसमें हमारे आरम्भिक वर्ष ढाले गए। [15]

हम बहुत बड़ी मात्रा में उन पर निर्भर हैं जो हमारा पालन-पोषण करते हैं। उनसे हमें एक रंग, एक रुचि और एक झुकाव मिलता है जो न्यूनाधिक रूप से जीवन भर हमसे चिपका रहता है। हम अपनी दाइयों और माताओं की भाषा पकड़ लेते हैं और लगभग अनजाने ही उसे बोलना सीख जाते हैं, और निस्सन्देह उसी समय उनके व्यवहार, चाल-चलन और मन की कुछ बातें भी पकड़ लेते हैं। मुझे सन्देह है कि समय ही दिखाएगा कि हम सब बचपन के प्रभावों के कितने ऋणी हैं, और हममें की कितनी ही बातों का पता उन बीजों तक लगाया जा सकता है जो हमारे शैशव के दिनों में हमारे आस-पास के लोगों ने बोए थे। एक अत्यन्त विद्वान अंग्रेज़, श्रीमान लॉक, यहाँ तक कह गए हैं: "जितने मनुष्य हमें मिलते हैं, उनमें दस में से नौ अपनी शिक्षा के अनुसार ही जैसे हैं वैसे हैं, अच्छे या बुरे, काम के या निकम्मे।"

और यह सब परमेश्वर की दयालु व्यवस्थाओं में से एक है। वह तुम्हारे बच्चों को ऐसा मन देता है जो गीली मिट्टी के समान छाप ग्रहण करता है। वह जीवन के आरम्भ-बिन्दु पर उन्हें यह प्रवृत्ति देता है कि जो तुम उनसे कहो उस पर विश्वास करें, जो सलाह तुम दो उसे मान लें, और किसी अजनबी की बात की अपेक्षा तुम्हारे वचन पर भरोसा करें। संक्षेप में, वह तुम्हें उनका भला करने का सुनहरा अवसर देता है। देखो कि यह अवसर अनदेखा करके गँवा न दिया जाए। एक बार हाथ से निकल गया तो सदा के लिए चला गया।

उस दयनीय भ्रम से सावधान रहो जिसमें कुछ लोग पड़ गए हैं कि माता-पिता अपने बच्चों के लिए कुछ नहीं कर सकते, कि उन्हें अकेला छोड़ देना चाहिए, अनुग्रह की प्रतीक्षा करनी चाहिए और चुपचाप बैठे रहना चाहिए। ये लोग अपने बच्चों के लिए बिलाम की रीति की इच्छाएँ रखते हैं — वे चाहते हैं कि वे धर्मी की मृत्यु मरें, परन्तु उन्हें उसका सा जीवन जीने के लिए कुछ नहीं करते। वे बहुत चाहते हैं, पर उनके पास कुछ नहीं है। और शैतान ऐसे तर्क को देखकर प्रसन्न होता है, जैसा वह हर उस बात पर होता है जो आलस्य का बहाना बनती या साधनों की उपेक्षा को बढ़ावा देती प्रतीत होती है।

मैं जानता हूँ कि तुम अपने बच्चे का मन नहीं फिरा सकते। मैं भली-भाँति जानता हूँ कि जो नया जन्म पाते हैं वे न मनुष्य की इच्छा से, परन्तु परमेश्वर से जन्मे हैं। परन्तु मैं यह भी जानता हूँ कि परमेश्वर स्पष्ट कहता है, "लड़के को उसी मार्ग की शिक्षा दे जिसमें उसको चलना चाहिए," और उसने मनुष्य को कभी ऐसी आज्ञा नहीं दी जिसे पूरा करने का अनुग्रह वह मनुष्य को न दे। और मैं यह भी जानता हूँ कि हमारा कर्तव्य खड़े रहकर विवाद करना नहीं, परन्तु आगे बढ़कर आज्ञा मानना है। आगे बढ़ने में ही परमेश्वर हमसे भेंट करेगा। आज्ञाकारिता का मार्ग ही वह मार्ग है जिसमें वह आशीष देता है। हमें केवल वही करना है जो काना के ब्याह-भोज में सेवकों को आज्ञा मिली थी, कि मटकों को पानी से भर दें, और इस पानी को दाखमधु बना देना हम निश्चिन्त होकर प्रभु पर छोड़ सकते हैं।

IV. इस विचार को निरन्तर अपनी आँखों के सामने रखकर सिखाओ कि तुम्हारे बच्चे की आत्मा ही सबसे पहले विचार करने योग्य वस्तु है।

निःसन्देह ये नन्हें बच्चे तुम्हारी दृष्टि में अनमोल हैं; परन्तु यदि तुम उनसे प्रेम करते हो तो उनकी आत्माओं के विषय में बार-बार सोचो। कोई भी स्वार्थ तुम्हारे लिए उनके अनन्त हित के बराबर महत्त्व न रखे। उनका कोई भी अंश तुम्हें उस अंश के समान प्रिय न हो जो कभी नहीं मरेगा। संसार अपनी सारी महिमा समेत जाता रहेगा; पहाड़ पिघल जाएँगे; आकाश चर्मपत्र के समान लपेट दिए जाएँगे; सूर्य का चमकना बन्द हो जाएगा। परन्तु वह आत्मा जो उन नन्हें प्राणियों में रहती है, जिनसे तुम इतना प्रेम करते हो, उन सब से अधिक काल तक बनी रहेगी, और वह सुख में रहेगी या दुःख में (मनुष्य की भाषा में कहें तो) यह तुम पर निर्भर करेगा।

अपने बच्चों के लिए जो कुछ भी तुम करो, उसमें यही विचार तुम्हारे मन में सबसे ऊपर रहे। उनके विषय में हर कदम में, हर योजना, उपाय और प्रबन्ध में उस महान प्रश्न को न छोड़ो, "इसका उनकी आत्माओं पर क्या प्रभाव पड़ेगा?"

आत्मा के प्रति प्रेम ही सब प्रेम की आत्मा है। अपने बच्चे को इस प्रकार लाड़-प्यार करना, सहलाना और उसकी हर इच्छा पूरी करना, मानो यही संसार उसके लिए सब कुछ हो और यही जीवन सुखी होने का एकमात्र अवसर हो — ऐसा करना सच्चा प्रेम नहीं, निर्दयता है। यह उसके साथ पृथ्वी के किसी पशु के समान व्यवहार करना है, जिसके लिए केवल एक ही संसार है और मृत्यु के बाद कुछ नहीं। यह उससे उस महान सत्य को छिपाना है जो उसे उसके शैशव से ही सिखाया जाना चाहिए, कि उसके जीवन का मुख्य उद्देश्य उसकी आत्मा का उद्धार है।

यदि सच्चा मसीही अपने बच्चे को स्वर्ग के लिए तैयार करना चाहता है तो उसे फैशन का दास नहीं होना चाहिए। उसे केवल इसलिए कोई बात करने में सन्तोष नहीं मानना चाहिए कि वह संसार की रीति है; केवल इसलिए उन्हें कुछ विशेष ढंग से सिखाना और शिक्षा देना कि ऐसा प्रचलन है; केवल इसलिए उन्हें सन्देहजनक पुस्तकें पढ़ने देना कि सब लोग उन्हें पढ़ते हैं; केवल इसलिए उन्हें संदिग्ध प्रवृत्ति की आदतें बनाने देना कि वे आजकल की आदतें हैं। उसे अपने बच्चों की आत्माओं पर दृष्टि रखकर उनका पालन-पोषण करना चाहिए। उसे अपनी शिक्षा-पद्धति को अनोखी और विचित्र कहे जाने पर लज्जित नहीं होना चाहिए। तो क्या हुआ यदि वह ऐसी है? समय थोड़ा है — इस संसार का रूप बदलता जाता है। जिसने अपने बच्चों को पृथ्वी के लिए नहीं बल्कि स्वर्ग के लिए, मनुष्य के लिए नहीं बल्कि परमेश्वर के लिए तैयार किया है, अन्त में वही माता-पिता बुद्धिमान कहलाएगा।

5. अपने बच्चे को बाइबल का ज्ञान देने का प्रशिक्षण दो।

मैं मानता हूँ कि तुम अपने बच्चों से बाइबल के प्रति प्रेम नहीं करवा सकते। पवित्र आत्मा के सिवा कोई भी हमें परमेश्वर के वचन में आनन्दित होनेवाला हृदय नहीं दे सकता। परन्तु तुम अपने बच्चों को बाइबल से परिचित अवश्य करा सकते हो; और निश्चय जानो कि वे उस धन्य पुस्तक से न तो बहुत जल्दी परिचित हो सकते हैं, न बहुत भली-भाँति।

बाइबल का पूरा ज्ञान धर्म सम्बन्धी सब स्पष्ट विचारों की नींव है। जो उसमें भली-भाँति जमा हुआ है, वह प्रायः डाँवाडोल और नए-नए सिद्धान्तों की हर बयार से इधर-उधर उड़ाया जानेवाला नहीं पाया जाएगा। कोई भी शिक्षा-पद्धति, जो पवित्रशास्त्र के ज्ञान को सबसे पहला स्थान नहीं देती, असुरक्षित और अनुचित है।

इस विषय में तुम्हें अभी विशेष सावधान रहने की आवश्यकता है, क्योंकि शैतान चारों ओर घूम रहा है और भ्रम बढ़ रहा है। हमारे बीच कुछ लोग ऐसे हैं जो यीशु मसीह का आदर कलीसिया को देते हैं। कुछ ऐसे हैं जो संस्कारों को उद्धारकर्ता और अनन्त जीवन का पासपोर्ट बना देते हैं। और कुछ ऐसे भी हैं जो इसी प्रकार बाइबल की अपेक्षा किसी प्रश्नोत्तरी का अधिक आदर करते हैं, या अपने बच्चों के मन को सत्य के पवित्रशास्त्र के स्थान पर तुच्छ छोटी-छोटी कहानियों की पुस्तकों से भर देते हैं। परन्तु यदि तुम अपने बच्चों से प्रेम करते हो, तो उनकी आत्माओं के प्रशिक्षण में सादी बाइबल को ही सब कुछ होने दो; और अन्य सब पुस्तकों को नीचे उतरकर दूसरा स्थान लेने दो।

इसकी इतनी चिन्ता मत करो कि वे प्रश्नोत्तरी में निपुण हों, जितनी इसकी कि वे पवित्रशास्त्र में निपुण हों। मेरा विश्वास करो, यही वह प्रशिक्षण है जिसका परमेश्वर आदर करेगा। भजनकार उसके विषय में कहता है, "तू ने अपने वचन को अपने सारे नाम से अधिक महत्त्व दिया है" (भजन संहिता 138:2); और मेरा विचार है कि जो लोग मनुष्यों के बीच उसे महान ठहराने का यत्न करते हैं, उन सब पर वह विशेष आशीष देता है।

देखो कि तुम्हारे बच्चे बाइबल को श्रद्धा से पढ़ें। उन्हें सिखाओ कि वे उसे मनुष्यों का वचन न समझें, बल्कि जैसा कि वास्तव में वह है, परमेश्वर का वचन, जिसे स्वयं पवित्र आत्मा ने लिखवाया है, जो सब सच्चा, सब लाभदायक और उस विश्वास के द्वारा जो मसीह यीशु पर है, उद्धार के लिए हमें बुद्धिमान बनाने में समर्थ है।

देखो कि वे उसे नियमित रूप से पढ़ें। उन्हें सिखाओ कि वे उसे अपनी आत्मा का दैनिक भोजन समझें, अपनी आत्मा के दैनिक स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य वस्तु मानें। मैं भली-भाँति जानता हूँ कि तुम इसे केवल एक रीति से अधिक नहीं बना सकते; परन्तु कोई नहीं बता सकता कि केवल एक रीति भी अप्रत्यक्ष रूप से कितने पाप को रोक सकती है।

देखो कि वे उसे पूरा पढ़ें। उनके सामने किसी भी सिद्धान्त को रखने से तुम्हें झिझकना नहीं चाहिए। यह मत सोचो कि मसीही धर्म के मुख्य सिद्धान्त ऐसी बातें हैं जिन्हें बच्चे समझ नहीं सकते। बच्चे बाइबल की उससे कहीं अधिक बातें समझते हैं जितना हम सोचते हैं।

उन्हें पाप के विषय में बताओ, उसके दोष, उसके परिणामों, उसकी शक्ति और उसकी घिनौनी प्रकृति के विषय में: तुम पाओगे कि वे इसमें से कुछ-कुछ समझ सकते हैं।

उन्हें प्रभु यीशु मसीह के विषय में और हमारे उद्धार के लिए उसके कार्य के विषय में बताओ — प्रायश्चित, क्रूस, लहू, बलिदान, मध्यस्थता की प्रार्थना: तुम देखोगे कि इस सब में कुछ ऐसा है जो उनकी समझ से परे नहीं है।

उन्हें मनुष्य के हृदय में पवित्र आत्मा के कार्य के विषय में बताओ, कि वह कैसे बदलता, नया करता, पवित्र ठहराता और शुद्ध करता है: तुम शीघ्र देखोगे कि वे इसमें कुछ हद तक तुम्हारे साथ चल सकते हैं। संक्षेप में, मुझे सन्देह है कि हमें इसका अनुमान ही नहीं कि एक छोटा बच्चा महिमामय सुसमाचार की लम्बाई और चौड़ाई में से कितना ग्रहण कर सकता है। वे इन बातों को उससे कहीं अधिक देखते हैं जितना हम सोचते हैं। [16]

उनके मन को पवित्रशास्त्र से भर दो। परमेश्वर का वचन उनमें बहुतायत से बसे। उन्हें बाइबल दो, सारी बाइबल, जब वे छोटे ही हों।

6. उन्हें प्रार्थना की आदत डालने का प्रशिक्षण दो।

प्रार्थना सच्चे धर्म की प्राण-वायु है। यह इस बात का एक पहला प्रमाण है कि मनुष्य का नया जन्म हुआ है। जिस दिन प्रभु ने हनन्याह को शाऊल के पास भेजा, उस दिन उसने कहा, "देख, वह प्रार्थना कर रहा है" (प्रेरितों के काम 9:11)। उसने प्रार्थना करना आरम्भ कर दिया था, और यही प्रमाण काफी था।

जिस दिन प्रभु के लोगों और संसार के बीच अलगाव आरम्भ हुआ, उस दिन प्रार्थना ही उनकी विशिष्ट पहचान थी। "उस समय लोग यहोवा से प्रार्थना करने लगे" (उत्पत्ति 4:26)।

प्रार्थना अब सब सच्चे मसीहियों की विशेषता है। वे प्रार्थना करते हैं — क्योंकि वे परमेश्वर को अपनी आवश्यकताएँ, अपनी भावनाएँ, अपनी अभिलाषाएँ और अपने भय बताते हैं; और जो कहते हैं, मन से कहते हैं। केवल नाम का मसीही प्रार्थनाएँ दोहरा सकता है, और अच्छी प्रार्थनाएँ भी, परन्तु वह इससे आगे नहीं बढ़ता।

प्रार्थना मनुष्य की आत्मा का मोड़ है। हमारी सेवकाई निष्फल और हमारा परिश्रम व्यर्थ है, जब तक तुम घुटनों पर न लाए जाओ। तब तक हमें तुम्हारे विषय में कोई आशा नहीं।

प्रार्थना आत्मिक उन्नति के बड़े भेदों में से एक है। जब परमेश्वर के साथ एकान्त में बहुत सहभागिता होती है, तब तुम्हारी आत्मा वर्षा के पीछे की घास के समान बढ़ती है; जब वह कम होती है, तब सब कुछ ठहर जाता है, और तुम अपनी आत्मा को मुश्किल से जीवित रख पाते हो। मुझे कोई बढ़ता हुआ मसीही, आगे बढ़नेवाला मसीही, दृढ़ मसीही, फलता-फूलता मसीही दिखाओ, और मैं निश्चय जानता हूँ कि वह ऐसा जन है जो अपने प्रभु से बार-बार बातें करता है। वह बहुत माँगता है, और उसे बहुत मिलता है। वह यीशु को सब कुछ बताता है, और इसलिए सदा जानता है कि कैसे चलना चाहिए।

प्रार्थना सबसे सामर्थी यन्त्र है जो परमेश्वर ने हमारे हाथों में रखा है। यह हर कठिनाई में काम आनेवाला सबसे उत्तम हथियार और हर संकट का सबसे निश्चित उपाय है। यह वह कुंजी है जो प्रतिज्ञाओं के भण्डार को खोलती है, और वह हाथ है जो आवश्यकता के समय अनुग्रह और सहायता खींच लाता है। यह वह चाँदी की तुरही है जिसे बजाने की आज्ञा परमेश्वर हमें हमारी हर आवश्यकता में देता है, और यह वह पुकार है जिसे सुनने की प्रतिज्ञा उसने की है, जैसे प्रेम करनेवाली माता अपने बच्चे की आवाज़ पर ध्यान देती है।

प्रार्थना वह सबसे सरल साधन है जिसे मनुष्य परमेश्वर के पास आने में काम में ला सकता है। यह सब की पहुँच में है — रोगी, वृद्ध, दुर्बल, अर्धांगी, अन्धा, दरिद्र, अनपढ़ — सब प्रार्थना कर सकते हैं। इस विषय में स्मरण-शक्ति की कमी, विद्या की कमी, पुस्तकों की कमी और पाण्डित्य की कमी का बहाना बनाने से तुम्हें कुछ लाभ नहीं। जब तक तुम्हारे पास अपनी आत्मा की दशा बताने के लिए जीभ है, तब तक तुम प्रार्थना कर सकते हो और तुम्हें करना चाहिए। ये शब्द, "तुम्हें इसलिये नहीं मिलता कि तुम माँगते नहीं" (याकूब 4:2), न्याय के दिन बहुतों के लिए भयानक दोषारोपण होंगे।

माता-पिताओ, यदि तुम अपने बच्चों से प्रेम करते हो, तो उन्हें प्रार्थना की आदत में पालने के लिए अपने सामर्थ्य भर सब कुछ करो। उन्हें दिखाओ कि कैसे आरम्भ करें। उन्हें बताओ कि क्या कहें। उन्हें लगे रहने के लिए प्रोत्साहित करो। यदि वे इस विषय में लापरवाह और ढीले पड़ जाएँ तो उन्हें स्मरण दिलाओ। कम से कम यह तुम्हारा दोष न हो कि वे कभी प्रभु का नाम न पुकारें।

स्मरण रखो, धर्म में यही पहला कदम है जो एक बच्चा उठा सकता है। उसके पढ़ने योग्य होने से बहुत पहले तुम उसे सिखा सकते हो कि वह अपनी माता के पास घुटने टेके, और प्रार्थना और स्तुति के वे सरल शब्द दोहराए जो वह उसके मुँह में रखती है। और जैसे किसी भी कार्य के पहले कदम सदा सबसे महत्त्वपूर्ण होते हैं, वैसे ही तुम्हारे बच्चों की प्रार्थनाएँ जिस रीति से की जाती हैं, वह ऐसी बात है जो तुम्हारे सबसे अधिक ध्यान के योग्य है। थोड़े ही लोग जानते हैं कि इस पर कितना कुछ निर्भर है। तुम्हें सावधान रहना चाहिए कि वे उन्हें हड़बड़ी में, लापरवाही से और अनादर के साथ कहने के आदी न हो जाएँ। तुम्हें इस बात की देखरेख सेवकों और दाइयों को सौंप देने से, या यह भरोसा करने से कि अकेले छोड़ दिए जाने पर बच्चे आप ही यह करेंगे, बचना चाहिए। मैं उस माता की प्रशंसा नहीं कर सकता जो अपने बच्चे के दैनिक जीवन के इस सबसे महत्त्वपूर्ण भाग की देखभाल स्वयं नहीं करती। यदि कोई आदत ऐसी है जिसके बनाने में तुम्हारे अपने हाथ और आँख को सहायता करनी चाहिए, तो वह प्रार्थना की आदत है। मेरा विश्वास करो, यदि तुम स्वयं कभी अपने बच्चों को प्रार्थना करते नहीं सुनते, तो तुम बहुत दोषी हो। तुम उस पक्षी से बहुत अधिक बुद्धिमान नहीं जिसका वर्णन अय्यूब में है, "जो अपने अण्डे भूमि पर छोड़ देती है, और धूल में उन्हें गरमाती है, और भूल जाती है कि वे पाँव से कुचले जा सकते हैं, या वन-पशु उन्हें तोड़ सकता है। वह अपने बच्चों से ऐसी कठोरता करती है मानो वे उसके नहीं; उसका परिश्रम व्यर्थ जाता है, और उसे कुछ भय नहीं" (अय्यूब 39:14-16)।

सब आदतों में प्रार्थना ही वह आदत है जो सबसे अधिक समय तक याद रहती है। बहुत से पके बालों वाले मनुष्य तुम्हें बता सकते हैं कि उनकी माता बचपन के दिनों में उनसे कैसे प्रार्थना करवाती थी। सम्भव है कि और बातें उनके मन से मिट गई हों। वह कलीसिया जहाँ उन्हें आराधना के लिए ले जाया जाता था, वह सेवक जिसका उपदेश उन्होंने सुना, वे साथी जो उनके संग खेलते थे — ये सब सम्भवतः उनकी स्मृति से जाते रहे हों और कोई चिह्न न छोड़ गए हों। परन्तु उनकी पहली प्रार्थनाओं के विषय में तुम प्रायः देखोगे कि बात बिलकुल भिन्न होती है। वह प्रायः तुम्हें बता सकेगा कि उसने कहाँ घुटने टेके, उसे क्या कहना सिखाया गया था, और उस समय उसकी माता कैसी दिखती थी। यह उसके मन की आँखों के सामने ऐसी ताज़ा उभर आएगी मानो कल ही की बात हो।

पाठक, यदि तुम अपने बच्चों से प्रेम करते हो, तो मैं तुम्हें चिताता हूँ, प्रार्थनामय आदत के बीज बोने का समय व्यर्थ न जाने दो। यदि तुम अपने बच्चों को किसी भी बात में पालो, तो कम से कम उन्हें प्रार्थना की आदत में पालो।

7. उन्हें सार्वजनिक अनुग्रह के साधनों के विषय में परिश्रम और नियमितता की आदतों में पालो।

उन्हें परमेश्वर के भवन में जाने और मण्डली की प्रार्थनाओं में सम्मिलित होने के कर्तव्य और विशेषाधिकार के विषय में बताओ। उन्हें बताओ कि जहाँ कहीं प्रभु के लोग इकट्ठे होते हैं, वहाँ प्रभु यीशु विशेष रीति से उपस्थित रहता है, और जो अनुपस्थित रहते हैं उन्हें प्रेरित थोमा के समान आशीष से चूक जाने की आशा रखनी चाहिए। उन्हें परमेश्वर के वचन के प्रचार को सुनने के महत्त्व के विषय में बताओ, कि यह मनुष्यों की आत्माओं को परिवर्तित करने, पवित्र करने और उन्हें उन्नत करने के लिए परमेश्वर की विधि है। उन्हें बताओ कि प्रेरित पौलुस हमें कैसे आज्ञा देता है कि "एक दूसरे के साथ इकट्ठा होना न छोड़ें, जैसा कि कितनों की रीति है" (इब्रानियों 10:25); परन्तु एक दूसरे को समझाएँ, और एक दूसरे को इसके लिए उभारें, और जितना उस दिन को निकट आते देखें उतना ही अधिक।

मैं इसे कलीसिया में एक दुःखद दृश्य कहता हूँ जब प्रभु की मेज़ पर वृद्ध लोगों के अतिरिक्त कोई नहीं आता, और जवान पुरुष और जवान स्त्रियाँ सब मुँह फेर लेते हैं। परन्तु मैं उसे और भी दुःखद दृश्य कहता हूँ जब कलीसिया में रविवार की पाठशाला में आनेवाले बच्चों को छोड़, जिन्हें आना ही पड़ता है, कोई बच्चा दिखाई नहीं देता। इस दोष में से कुछ भी तुम्हारे द्वार पर न रहे। हर पल्ली में पाठशाला में आनेवालों के सिवाय भी बहुत से लड़के-लड़कियाँ हैं, और तुम, जो उनके माता-पिता और मित्र हो, इस बात पर ध्यान दो कि वे तुम्हारे साथ कलीसिया में आएँ।

उन्हें न आने के लिए व्यर्थ बहाने बनाने की आदत के साथ बड़े न होने दें। उन्हें साफ़-साफ़ समझा दें कि जब तक वे आपकी छत के नीचे हैं, आपके घर का यही नियम है कि हर स्वस्थ व्यक्ति प्रभु के दिन प्रभु के भवन का आदर करे, और आप सब्त का उल्लंघन करनेवाले को अपनी ही आत्मा का हत्यारा मानते हैं।

यह भी देखें कि यदि हो सके तो आपके बच्चे आपके साथ कलीसिया जाएँ और वहाँ आपके निकट बैठें। कलीसिया जाना एक बात है, परन्तु कलीसिया में अच्छा व्यवहार करना बिलकुल दूसरी बात है। और मेरा विश्वास कीजिए, अच्छे व्यवहार की इससे बढ़कर कोई सुरक्षा नहीं कि वे आपकी अपनी दृष्टि के सामने रहें।

जवान लोगों का मन सहज ही भटक जाता है और उनका ध्यान खो जाता है, और इसका सामना करने के लिए हर सम्भव उपाय किया जाना चाहिए। मुझे यह अच्छा नहीं लगता कि वे अकेले कलीसिया आएँ; वे अकसर मार्ग में बुरी संगति में पड़ जाते हैं, और इस प्रकार प्रभु के दिन वे सप्ताह के बाकी सब दिनों से अधिक बुराई सीख लेते हैं। न ही मुझे वह अच्छा लगता है जिसे मैं कलीसिया में "जवानों का कोना" कहता हूँ। वहाँ वे अकसर ध्यान न लगाने और अनादर की ऐसी आदतें पकड़ लेते हैं, जिन्हें छुड़ाने में वर्षों लग जाते हैं, यदि कभी छूटती भी हैं। मुझे जो देखना अच्छा लगता है वह यह है कि पूरा परिवार एक साथ बैठा हो, बूढ़े और जवान, साथ-साथ, पुरुष, स्त्रियाँ और बच्चे, अपने-अपने घरानों के अनुसार परमेश्वर की सेवा करते हुए।

परन्तु कुछ लोग कहते हैं कि बच्चों से अनुग्रह के साधनों में उपस्थित होने का आग्रह करना व्यर्थ है, क्योंकि वे उन्हें समझ नहीं सकते।

मैं नहीं चाहता कि आप ऐसे तर्क पर कान दें। मुझे पुराने नियम में ऐसा कोई सिद्धान्त नहीं मिलता। जब मूसा फ़िरौन के सामने जाता है (निर्गमन 10:9), तो मैं देखता हूँ कि वह कहता है, "हम अपने बालकों और बूढ़ों, बेटे-बेटियों के संग जाएँगे; क्योंकि हमें यहोवा के लिये पर्व्व करना है।" जब यहोशू ने व्यवस्था पढ़ी (यहोशू 8:35), तो मैं देखता हूँ, "जो कुछ मूसा ने आज्ञा दी थी, उसमें से कोई भी बात ऐसी न थी जिसे यहोशू ने इस्राएल की सारी सभा के सामने, और स्त्रियों, बालकों और उनके बीच रहनेवाले परदेशियों के सामने भी, पढ़कर न सुनाया हो।" "वर्ष में तीन बार," निर्गमन 34:23 कहता है, "तुम्हारे सब पुरुष इस्राएल के परमेश्वर यहोवा के सम्मुख उपस्थित हुआ करें।" और जब मैं नए नियम की ओर मुड़ता हूँ, तो वहाँ भी मुझे पुराने नियम की तरह बच्चों का सार्वजनिक धार्मिक कार्यों में भाग लेना मिलता है। जब पौलुस सोर में चेलों को अन्तिम बार छोड़ रहा था, तो मैं पाता हूँ कि लिखा है (प्रेरितों के काम 21:5), "वे सब स्त्रियों और बालकों समेत नगर के बाहर तक हमें पहुँचाने आए, और हमने किनारे पर घुटने टेककर प्रार्थना की।"

शमूएल अपने बचपन के दिनों में प्रभु की सेवा करता हुआ दिखाई देता है, जबकि वह अभी प्रभु को सचमुच जानता भी न था। "शमूएल अब तक यहोवा को नहीं जानता था, और न यहोवा का वचन उस पर प्रगट हुआ था" (1 शमूएल 3:7)। प्रेरित स्वयं भी वह सब नहीं समझ पाए जो हमारे प्रभु ने उसी समय कहा था: "उसके चेले पहले इन बातों को न समझे थे, परन्तु जब यीशु की महिमा प्रगट हुई तब उन्हें स्मरण आया कि ये बातें उसके विषय में लिखी हुई थीं" (यूहन्ना 12:16)।

माता-पिताओ, इन उदाहरणों से अपने मन को शान्ति दीजिए। इस बात से निराश न हों कि आपके बच्चे अभी अनुग्रह के साधनों का पूरा मूल्य नहीं देखते। बस उन्हें नियमित उपस्थिति की आदत में प्रशिक्षित कीजिए। इसे उनके मन के सामने एक ऊँचे, पवित्र और गम्भीर कर्त्तव्य के रूप में रखिए, और मेरा विश्वास कीजिए, बहुत सम्भव है कि वह दिन आएगा जब वे आपके इस कार्य के लिए आपको धन्य कहेंगे।

8. उन्हें विश्वास की आदत में प्रशिक्षित कीजिए।

इससे मेरा तात्पर्य यह है कि आप उन्हें इस बात का प्रशिक्षण दें कि वे आपकी बात पर विश्वास करें। आपको प्रयत्न करना चाहिए कि वे आपके निर्णय पर भरोसा रखें और आपकी राय को अपनी राय से अच्छा मानकर उसका आदर करें। उन्हें इस बात का अभ्यस्त बनाइए कि जब आप कहें कि कोई बात उनके लिए बुरी है, तो वह बुरी ही होगी, और जब आप कहें कि कोई बात उनके लिए अच्छी है, तो वह अच्छी ही होगी; संक्षेप में, कि आपका ज्ञान उनके अपने ज्ञान से बेहतर है, और वे आपके वचन पर पूरी तरह भरोसा रख सकते हैं। उन्हें यह अनुभव करना सिखाइए कि जो बात वे अभी नहीं जानते, उसे वे आगे चलकर सम्भवतः जान लेंगे, और इस बात से सन्तुष्ट रहना सिखाइए कि जो कुछ आप उनसे करवाते हैं, उस हर एक बात का कोई कारण और आवश्यकता है।

सचमुच, विश्वास की सच्ची आत्मा की धन्यता का वर्णन कौन कर सकता है? या यों कहें कि अविश्वास ने संसार पर जो दुःख डाला है, उसे कौन बता सकता है? अविश्वास ने हव्वा से वर्जित फल खिलाया, उसने परमेश्वर के वचन की सच्चाई पर सन्देह किया: "तू निश्चय मर जाएगा।" अविश्वास ने पुराने संसार से नूह की चेतावनी को ठुकरवाया, और वह पाप में नाश हुआ। अविश्वास ने इस्राएल को जंगल में रोके रखा; वही वह रुकावट थी जिसने उन्हें प्रतिज्ञा की हुई भूमि में प्रवेश करने से रोका। अविश्वास ने यहूदियों से महिमा के प्रभु को क्रूस पर चढ़वाया; उन्होंने मूसा और भविष्यद्वक्ताओं की वाणी पर विश्वास न किया, यद्यपि वह प्रतिदिन उन्हें पढ़कर सुनाई जाती थी। और अविश्वास आज तक मनुष्य के हृदय का प्रबल पाप है: परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं में अविश्वास, परमेश्वर की चेतावनियों में अविश्वास, अपनी पापमय दशा में अविश्वास, अपने संकट में अविश्वास, और हमारे बुरे हृदयों के अहंकार और संसारिकता के विरुद्ध जानेवाली हर बात में अविश्वास। पाठक, यदि आप अपने बच्चों को पूर्ण विश्वास की आदत में प्रशिक्षित नहीं करते, अर्थात् अपने माता-पिता के वचन पर विश्वास, और इस भरोसे में कि जो उनके माता-पिता कहते हैं वह सही ही होगा, तो आप उन्हें व्यर्थ ही प्रशिक्षित कर रहे हैं।

मैंने कुछ लोगों को यह कहते सुना है कि बच्चों से ऐसी कोई बात नहीं माँगनी चाहिए जिसे वे समझ न सकें, और जो कुछ आप उनसे करवाना चाहते हैं उस हर बात की व्याख्या करनी और उसका कारण बताना चाहिए। मैं आपको ऐसी धारणा के विरुद्ध गम्भीरता से चेताता हूँ। मैं साफ़ कहता हूँ कि मैं इसे एक अनुचित और सड़ा हुआ सिद्धान्त समझता हूँ। निःसन्देह अपने हर काम को रहस्य बना देना हास्यास्पद है, और बहुत-सी बातें ऐसी हैं जिन्हें बच्चों को समझाना अच्छा है, ताकि वे देख सकें कि वे उचित और बुद्धिमानी की हैं। परन्तु उन्हें इस विचार के साथ बड़ा करना कि वे कोई बात विश्वास पर न मानें, और अपनी दुर्बल और अपूर्ण समझ के साथ हर कदम पर "क्यों" और "किसलिए" का स्पष्टीकरण पाएँ, यह सचमुच एक भयानक भूल है, और उनके मन पर इसका अत्यन्त बुरा प्रभाव पड़ने की सम्भावना है।

यदि आपकी इच्छा हो तो कुछ अवसरों पर अपने बच्चे के साथ तर्क कीजिए, परन्तु यदि आप उससे सचमुच प्रेम करते हैं तो उसे यह याद दिलाना कभी न भूलिए कि वह आखिर है तो बच्चा ही; वह बच्चे की तरह सोचता है, बच्चे की तरह समझता है, और इसलिए उसे हर बात का कारण एकदम जान लेने की आशा नहीं करनी चाहिए।

उसके सामने इसहाक का उदाहरण रखो, उस दिन का जब अब्राहम उसे मोरिय्याह पर्वत पर होमबलि चढ़ाने के लिये ले गया (उत्पत्ति 22)। उसने अपने पिता से केवल यही एक प्रश्न पूछा, "होमबलि के लिये मेम्ना कहाँ है?" और उसे इसके सिवाय कोई उत्तर न मिला, "परमेश्वर आप ही अपने लिये मेम्ना तैयार कर लेगा।" कैसे, या कहाँ, या कहाँ से, या किस रीति से, या किन साधनों से, यह सब इसहाक को नहीं बताया गया; परन्तु उत्तर ही काफ़ी था। उसने विश्वास किया कि सब भला होगा, क्योंकि उसके पिता ने ऐसा कहा था, और वह सन्तुष्ट रहा।

अपने बच्चों से यह भी कहो कि आरम्भ में हम सब को सीखनेवाला होना पड़ता है, कि हर प्रकार के ज्ञान में एक वर्णमाला होती है जिसे सीखना ही पड़ता है, कि संसार के सबसे अच्छे घोड़े को भी कभी सधाया जाना पड़ा था, और कि एक दिन आएगा जब वे तुम्हारी सारी शिक्षा की बुद्धिमानी को समझ लेंगे। परन्तु इस बीच यदि तुम किसी बात को ठीक कहती हो, तो उनके लिये यही पर्याप्त होना चाहिए; उन्हें तुम पर विश्वास करना और सन्तुष्ट रहना चाहिए।

माता-पिताओ, यदि शिक्षा की कोई बात महत्त्वपूर्ण है, तो यही है। अपने बच्चों के प्रति अपने प्रेम की दुहाई देकर मैं तुम से आग्रह करता हूँ कि उन्हें विश्वास की आदत में ढालने के लिये हर उपाय काम में लाओ।

9. उन्हें आज्ञाकारिता की आदत में ढालो।

यह ऐसा लक्ष्य है जिसे पाने के लिये कितना भी परिश्रम करना उचित है। मेरा अनुमान है कि हमारे जीवन पर किसी और आदत का इतना प्रभाव नहीं पड़ता जितना इसका। माता-पिताओ, ठान लो कि तुम अपने बच्चों से अपनी आज्ञा मनवाओगे, चाहे इसमें तुम्हें बहुत कष्ट उठाना पड़े और उन्हें बहुत आँसू बहाने पड़ें। न कोई प्रश्न उठाना हो, न तर्क-वितर्क, न झगड़ा, न टालमटोल, न पलटकर उत्तर देना। जब तुम उन्हें कोई आज्ञा दो, तो वे साफ़ देख लें कि तुम उसका पालन करवाकर ही रहोगे।

आज्ञाकारिता ही वास्तविकता है। यह दिखाई देनेवाला विश्वास है, कार्य करता हुआ विश्वास है, और देहधारी विश्वास है। प्रभु के लोगों में सच्ची शिष्यता की यही कसौटी है। "जो कुछ मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ, यदि तुम उसे करो, तो तुम मेरे मित्र हो" (यूहन्ना 15:14)। भली-भाँति सिखाए गए बच्चों की पहचान यही होनी चाहिए कि वे जो कुछ उनके माता-पिता उन्हें आज्ञा दें वही करें। यदि पिता और माता की आज्ञा प्रसन्नता से, अपनी इच्छा से और तुरन्त न मानी जाए, तो पाँचवीं आज्ञा जिस आदर की माँग करती है वह कहाँ रहा?

आरम्भ से ही आज्ञाकारिता के पक्ष में सारा पवित्रशास्त्र है। अब्राहम की प्रशंसा में यह कहा गया है कि वह न केवल अपने परिवार को शिक्षा देगा, परन्तु "अपने पुत्रों और अपने पीछे अपने घराने को भी आज्ञा देगा" (उत्पत्ति 18:19)। प्रभु यीशु मसीह के विषय में भी कहा गया है कि "वह छुटपन में मरियम और यूसुफ के अधीन रहा" (लूका 2:51)। देखो कि यूसुफ ने अपने पिता याकूब की आज्ञा को कितनी पूर्णता से माना (उत्पत्ति 37:13)। देखो कि यशायाह इसे कैसी बुरी बात बताता है कि "लड़का बूढ़ों के सामने अभिमान करेगा" (यशायाह 3:5)। ध्यान दो कि प्रेरित पौलुस ने माता-पिता की आज्ञा न मानने को अन्तिम दिनों के बुरे चिह्नों में गिना है (2 तीमुथियुस 3:2)। ध्यान दो कि उसने आज्ञाकारिता चाहने के इस गुण को मसीही सेवक की शोभा बनने योग्य गुण के रूप में अलग से बताया है: "अध्यक्ष ऐसा हो जो अपने घर का अच्छी रीति से प्रबन्ध करता हो, और अपने बच्चों को सारी गम्भीरता से अधीन रखता हो।" और फिर, "सेवक अपने बच्चों और अपने घरों का अच्छी रीति से प्रबन्ध करनेवाले हों" (1 तीमुथियुस 3:4-12)। और फिर, प्राचीन ऐसा हो "जिसके बच्चे विश्वासी हों, और जिन पर लम्पटता या हठीले होने का दोष नहीं लगाया जाता" (तीतुस 1:6)।

माता-पिताओ, क्या तुम अपने बच्चों को सुखी देखना चाहते हो? तो ध्यान रखो कि उन्हें ऐसा सिखाओ कि जब उनसे कुछ कहा जाए तो वे आज्ञा मानें, जैसा उनसे कहा जाए वैसा ही करें। मेरा विश्वास करो, हम पूर्ण स्वतन्त्रता के लिये नहीं बनाए गए हैं, हम उसके योग्य नहीं हैं। मसीह के स्वतन्त्र किए हुए लोगों को भी जूआ उठाना पड़ता है, वे "प्रभु मसीह की सेवा करते हैं" (कुलुस्सियों 3:24)। बच्चे इस बात को जितनी जल्दी सीख लें उतना अच्छा कि यह ऐसा संसार है जिसमें हम सब को शासन करने के लिये नहीं ठहराया गया है, और जब तक हम अपने से बड़ों की आज्ञा मानना नहीं जानते तब तक हम अपने उचित स्थान पर नहीं होते। उन्हें छुटपन में ही आज्ञा मानना सिखाओ, नहीं तो वे जीवन भर परमेश्वर के विरुद्ध कुढ़ते रहेंगे, और उसके अधिकार से स्वतन्त्र होने के व्यर्थ विचार में अपने आप को थका डालेंगे।

पाठक, इस संकेत की आवश्यकता बहुत अधिक है। आज के दिनों में तुम बहुतों को देखोगे जो अपने बच्चों को उस समय से बहुत पहले ही अपने लिये चुनने और सोचने देते हैं जब वे इसके योग्य होते हैं, और उनकी अवज्ञा के लिये बहाने भी बनाते हैं, मानो यह कोई ऐसी बात हो जिसके लिये उन्हें दोषी न ठहराना चाहिए। मेरी दृष्टि में सदा झुकता रहनेवाला माता-पिता और सदा अपनी मनमानी करनेवाला बच्चा बहुत ही पीड़ादायक दृश्य है; पीड़ादायक इसलिये कि मैं देखता हूँ कि परमेश्वर की ठहराई हुई व्यवस्था उलट-पुलट कर दी गई है; पीड़ादायक इसलिये कि मुझे निश्चय है कि अन्त में उस बच्चे के स्वभाव में इसका परिणाम हठ, घमण्ड और अहंकार होगा। यदि तुम बच्चों को छुटपन में पृथ्वी पर के अपने पिता की आज्ञा न मानने देते हो, तो इस पर आश्चर्य न करना कि मनुष्य स्वर्ग में के अपने पिता की आज्ञा मानने से इनकार करते हैं।

माता-पिताओ, यदि तुम अपने बच्चों से प्रेम करते हो, तो आज्ञाकारिता को ऐसा आदर्श-वाक्य और संकेत-शब्द बनाओ जो निरन्तर उनकी आँखों के सामने रहे।

10. उन्हें सदा सत्य बोलने की आदत में ढालो। संसार में सत्य बोलना उससे कहीं कम पाया जाता है जितना पहली दृष्टि में हम समझ बैठते हैं। पूरा सत्य, और सत्य के सिवाय कुछ नहीं, यह एक सुनहरा नियम है जिसे बहुतों को स्मरण रखना भला होगा। झूठ बोलना और बात को घुमाना पुराने पाप हैं। शैतान उनका पिता था; उसने हव्वा को एक साहसी झूठ से धोखा दिया, और पतन के समय से यह ऐसा पाप है जिससे हव्वा की सब सन्तानों को सावधान रहने की आवश्यकता है।

ज़रा सोचो तो कि संसार में कितना झूठ और छल है! कितना बढ़ा-चढ़ाकर कहा जाता है! एक साधारण कहानी में कितना कुछ जोड़ दिया जाता है! कितनी बातें छोड़ दी जाती हैं यदि उनको कहना बोलनेवाले के स्वार्थ के काम का न हो! हमारे आस-पास ऐसे कितने कम लोग हैं जिनके विषय में हम कह सकें कि हम उनकी बात पर निःसंकोच भरोसा रखते हैं! सचमुच प्राचीन फ़ारसी लोग अपनी पीढ़ी में बुद्धिमान थे: अपने बच्चों को शिक्षा देने में उनके लिये यह एक प्रमुख बात थी कि वे सत्य बोलना सीखें। मनुष्य के स्वाभाविक पापमय होने का यह कितना भयानक प्रमाण है कि ऐसी बात का उल्लेख करना भी आवश्यक हो!

पाठक, मैं चाहता हूँ कि आप ध्यान दें कि पुराने नियम में परमेश्वर को कितनी बार सत्य का परमेश्वर कहा गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि जिससे हमारा सामना है, उसके चरित्र की एक प्रमुख विशेषता के रूप में सत्य को विशेष रूप से हमारे सामने रखा गया है। वह कभी सीधी रेखा से नहीं हटता। वह झूठ और कपट से घृणा करता है। इस बात को अपने बच्चों के मन में निरन्तर बनाए रखने का यत्न कीजिए। उन्हें हर समय समझाइए कि सत्य से कम कुछ भी झूठ है; कि बात को टालना, बहाने बनाना और बढ़ा-चढ़ाकर कहना, ये सब झूठ की ओर ले जानेवाले आधे रास्ते के पड़ाव हैं, और इनसे बचना चाहिए। उन्हें हर परिस्थिति में सीधा-सच्चा होने के लिए प्रोत्साहित कीजिए, और चाहे इसमें उन्हें कुछ भी क्यों न चुकाना पड़े, वे सत्य ही बोलें।

मैं इस विषय पर आपका ध्यान केवल इसलिए नहीं दिला रहा कि संसार में आपके बच्चों का चरित्र अच्छा बने, यद्यपि इस पर मैं बहुत कुछ कह सकता हूँ; बल्कि मैं इसे आपकी अपनी सुविधा और सहायता के लिए भी आग्रहपूर्वक कह रहा हूँ, जो उनके साथ आपके सब व्यवहारों में काम आएगी। आप पाएँगे कि सदा उनके वचन पर भरोसा कर पाना सचमुच बड़ी सहायता है। इससे छिपाव की उस आदत को रोकने में बहुत सहायता मिलेगी, जो कभी-कभी बच्चों में दुःखद रूप से फैल जाती है। खुलापन और सीधापन बहुत कुछ इस पर निर्भर करता है कि हमारे शैशवकाल में माता-पिता ने इस विषय को कैसे सँभाला।

11. उन्हें सदा समय को बहुमूल्य समझकर काम में लाने की आदत सिखाइए। आलस्य शैतान का सबसे अच्छा मित्र है। उसे हमारी हानि करने का अवसर देने का यह सबसे निश्चित मार्ग है। आलसी मन खुले द्वार के समान है, और यदि शैतान स्वयं उससे भीतर न आए, तो भी यह निश्चित है कि वह हमारी आत्माओं में बुरे विचार उठाने के लिए कुछ न कुछ भीतर फेंक देगा।

किसी भी सृजे हुए प्राणी को कभी आलसी रहने के लिए नहीं बनाया गया। सेवा और काम परमेश्वर के हर प्राणी का ठहराया हुआ भाग है। स्वर्ग के स्वर्गदूत काम करते हैं; वे प्रभु के सेवक हैं जो सदा उसकी इच्छा पूरी करते हैं। आदम के पास स्वर्गोद्यान में काम था; उसे अदन की बाटिका की देखभाल और रखवाली करने के लिए ठहराया गया था। महिमा में छुड़ाए हुए पवित्र लोगों के पास भी काम होगा: "वे रात दिन विश्राम नहीं करते", और उसकी स्तुति और महिमा गाते हैं जिसने उन्हें मोल लिया। और मनुष्य, निर्बल, पापी मनुष्य, के पास कुछ करने को अवश्य होना चाहिए, नहीं तो उसकी आत्मा शीघ्र ही अस्वस्थ दशा में पहुँच जाएगी। हमारे हाथ भरे हुए और हमारे मन किसी न किसी काम में लगे रहने चाहिए, नहीं तो हमारी कल्पनाएँ शीघ्र ही उबलने लगेंगी और बुराई को जन्म देंगी।

और जो हमारे विषय में सत्य है, वही हमारे बच्चों के विषय में भी सत्य है। हाय उस मनुष्य पर जिसके पास करने को कुछ नहीं! यहूदी आलस्य को सचमुच पाप मानते थे; उनकी एक व्यवस्था थी कि हर मनुष्य अपने पुत्र को कोई उपयोगी व्यवसाय सिखाए, और वे सही थे। वे मनुष्य के हृदय को हममें से कुछ लोगों से अधिक अच्छी तरह जानते थे।

आलस्य ने सदोम को वैसा बना दिया जैसा वह था। "तेरी बहन सदोम का अधर्म यह था, कि वह और उसकी बेटियाँ अहंकार करती, पेट भर भरके खातीं, और सुख चैन से रहती थीं" (यहेजकेल 16:49)। उरिय्याह की पत्नी के साथ दाऊद के भयानक पाप में भी आलस्य का बड़ा हाथ था। मैं 2 शमूएल 11 में देखता हूँ कि योआब अम्मोन से लड़ने को निकला, "परन्तु दाऊद यरूशलेम ही में रह गया।" क्या यह आलस्य नहीं था? और तभी उसने बतशेबा को देखा, और अगला कदम जो हम पढ़ते हैं वह उसका भयंकर और दुःखद पतन है।

सचमुच, मैं मानता हूँ कि आलस्य ने जितने पाप कराए हैं, उतने शायद किसी और आदत ने नहीं कराए। मुझे संदेह है कि यह शरीर के अनेक कामों की जननी है, व्यभिचार, लुचपन, पियक्कड़पन और अन्धकार के अन्य अनेक कामों की जननी, जिनका नाम लेने का मेरे पास समय नहीं। अपना ही विवेक बताए कि क्या मैं सत्य नहीं कह रहा। आप आलसी थे, और तुरन्त शैतान ने द्वार खटखटाया और भीतर आ गया।

और मुझे आश्चर्य भी नहीं होता; हमारे चारों ओर संसार की हर वस्तु यही शिक्षा देती प्रतीत होती है। ठहरा हुआ पानी ही सड़ता और अशुद्ध होता है; बहती, चलती धाराएँ सदा स्वच्छ रहती हैं। यदि आपके पास भाप का यंत्र है, तो उसे चलाना ही होगा, नहीं तो वह शीघ्र बिगड़ जाता है। यदि आपके पास घोड़ा है, तो उसे व्यायाम कराना होगा; वह तब सबसे अच्छा रहता है जब उसके पास नियमित काम होता है। यदि आप स्वयं अच्छा शारीरिक स्वास्थ्य चाहते हैं, तो आपको व्यायाम करना होगा। यदि आप सदा बैठे रहें, तो आपका शरीर अन्त में अवश्य शिकायत करेगा। आत्मा के साथ भी ठीक ऐसा ही है। सक्रिय, चलते हुए मन पर निशाना साधना शैतान के लिए कठिन है। सदा उपयोगी काम में लगे रहने का यत्न कीजिए, और इस प्रकार आपके शत्रु को जंगली दाने बोने की जगह पाना कठिन होगा।

पाठक, मैं आपसे आग्रह करता हूँ कि ये बातें अपने बच्चों के मन के सामने रखें। उन्हें समय का मूल्य सिखाइए, और उन्हें इसे भली-भाँति काम में लाने की आदत सिखाने का यत्न कीजिए। जब बच्चे अपने हाथ के काम में, वह जो भी हो, ढिलाई करते हैं, तो मुझे पीड़ा होती है। मुझे उन्हें सक्रिय और परिश्रमी देखना अच्छा लगता है, जो जो भी करें पूरे मन से करें; जब पाठ सीखना हो तो पूरे मन से पाठ सीखें, और जब खेलने जाएँ तो पूरे मन से अपने खेल-कूद में लगें।

परन्तु यदि आप उनसे भली-भाँति प्रेम करते हैं, तो अपने घराने में आलस्य को पाप गिना जाने दीजिए।

12. उन्हें अति लाड़-प्यार के निरन्तर भय के साथ प्रशिक्षित कीजिए। सब बातों में यही वह एक बात है जिसमें आपको सबसे अधिक सावधान रहने की आवश्यकता है। अपने ही रक्त-मांस के प्रति कोमल और स्नेहशील होना स्वाभाविक है, और आपको इसी कोमलता और स्नेह की अधिकता से डरना है। चौकस रहिए कि यह आपको अपने बच्चों के दोषों के प्रति अंधा और उनके विषय में हर सलाह के प्रति बहरा न बना दे। चौकस रहिए कि यह आपको दण्ड और ताड़ना देने की पीड़ा सहने के बदले बुरे आचरण की ओर से आँख मूँद लेने पर विवश न कर दे।

मैं भली-भाँति जानता हूँ कि दण्ड और ताड़ना अप्रिय बातें हैं। जिनसे हम प्रेम करते हैं उन्हें पीड़ा देना और उनके आँसू बहाना, इससे अधिक अप्रिय कुछ नहीं। परन्तु जब तक हृदय वैसे ही हैं जैसे वे हैं, तब तक सामान्य नियम के रूप में यह मान लेना व्यर्थ है कि बच्चे कभी बिना ताड़ना के पाले जा सकते हैं।

बिगाड़ना एक बहुत अर्थपूर्ण शब्द है, और खेद है कि अर्थ से भरा हुआ है। बच्चों को बिगाड़ने का सबसे छोटा रास्ता यह है कि उन्हें अपनी मनमानी करने दी जाए, उन्हें गलत करने दिया जाए और उसके लिए दण्ड न दिया जाए। मेरा विश्वास कीजिए, आपको यह नहीं करना चाहिए, चाहे इसमें आपको कितनी ही पीड़ा क्यों न हो, जब तक कि आप अपने बच्चों की आत्माओं को नष्ट करना न चाहें।

आप यह नहीं कह सकते कि पवित्रशास्त्र इस विषय पर स्पष्ट रूप से नहीं बोलता: "जो अपनी छड़ी को बचा रखता है, वह अपने पुत्र से बैर रखता है, परन्तु जो उस से प्रेम रखता है, वह यत्न से उसको ताड़ना देता है" (नीतिवचन 13:24)। "जब तक आशा है, तब तक अपने पुत्र की ताड़ना कर, और उसके रोने से मन में न घबरा" (नीतिवचन 19:18)। "लड़के के मन में मूर्खता की गाँठ बँधी होती है, परन्तु छड़ी की ताड़ना उसको उससे दूर कर देती है" (नीतिवचन 22:15)। "लड़के को ताड़ना देने में न झिझक, क्योंकि यदि तू उसको छड़ी से मारे, तो वह न मरेगा। तू उसको छड़ी से मारकर उसका प्राण अधोलोक से बचाएगा" (नीतिवचन 23:13-14)। "छड़ी और डाँट से बुद्धि प्राप्त होती है, परन्तु जो लड़का ऐसे ही छोड़ दिया जाता है, वह अपनी माता की लज्जा का कारण होता है।" "अपने पुत्र की ताड़ना कर, तब वह तुझे चैन देगा, और तेरे मन को सुख देगा" (नीतिवचन 29:15-17)।

ये वचन कितने सशक्त और प्रभावशाली हैं! यह कितने खेद की बात है कि बहुत से मसीही परिवारों में ये लगभग अज्ञात से प्रतीत होते हैं! उनके बच्चों को डाँट की आवश्यकता है, परन्तु वह शायद ही कभी दी जाती है; उन्हें ताड़ना की आवश्यकता है, परन्तु उसका शायद ही कभी प्रयोग होता है। फिर भी नीतिवचन की यह पुस्तक अप्रचलित या मसीहियों के लिए अनुपयुक्त नहीं है। यह परमेश्वर की प्रेरणा से दी गई है, और लाभदायक है। यह हमारी शिक्षा के लिए दी गई है, ठीक वैसे ही जैसे रोमियों और इफिसियों के पत्र। निश्चय ही वह विश्वासी जो इसकी सम्मति पर ध्यान दिए बिना अपने बच्चों का पालन-पोषण करता है, वह लिखे हुए से अधिक बुद्धिमान बनता है, और बड़ी भूल करता है।

पिताओं और माताओं, मैं आपसे साफ़ कहता हूँ, यदि आप अपने बच्चों के दोषी होने पर कभी उन्हें दण्ड नहीं देते, तो आप उनके साथ घोर अन्याय कर रहे हैं। मैं आपको चेतावनी देता हूँ, यह वही चट्टान है जिस पर परमेश्वर के सन्त हर युग में बार-बार जहाज़ के समान टूटते रहे हैं। मैं चाहता हूँ कि आप समय रहते बुद्धिमान बनें और इससे बचे रहें। एली के उदाहरण में इसे देखिए। उसके पुत्रों होप्नी और पीनहास ने "अपने आप को घृणित बना लिया, और उसने उन्हें न रोका।" जब उसे उन्हें कड़ाई से डाँटना चाहिए था, तब उसने उन्हें केवल एक फीकी और ठण्डी डाँट दी। एक शब्द में, उसने अपने पुत्रों को परमेश्वर से अधिक आदर दिया। और इन बातों का अन्त क्या हुआ? उसे अपने दोनों पुत्रों की युद्ध में मृत्यु का समाचार सुनना पड़ा, और उसके पके बाल दुःख के साथ कब्र में उतार दिए गए (1 शमूएल 2:22-29, 3:13)।

दाऊद का उदाहरण भी देखिए। उसके बच्चों और उनके पापों का इतिहास बिना पीड़ा के कौन पढ़ सकता है? अम्नोन का व्यभिचार, अबशालोम की हत्या और घमण्ड भरा विद्रोह, अदोनिय्याह की कपट भरी महत्त्वाकांक्षा: निश्चय ही परमेश्वर के मन के अनुसार चलनेवाले मनुष्य के लिए अपने ही घराने से मिले ये बड़े गहरे घाव थे। परन्तु क्या उसकी ओर से कोई दोष नहीं था? मुझे डर है कि इसमें कोई सन्देह नहीं कि था। इस सबकी कुंजी मुझे 1 राजाओं 1:6 में अदोनिय्याह के वर्णन में मिलती है, "उसके पिता ने उसको कभी यह कहकर उदास नहीं किया था, कि तू ने ऐसा क्यों किया?" सारी बुराई की जड़ यही थी। दाऊद एक अति-लाड़ करनेवाला पिता था, ऐसा पिता जो अपने बच्चों को मनमानी करने देता था, और उसने जैसा बोया वैसा ही काटा।

माता-पिताओ, मैं आपसे विनती करता हूँ, अपने बच्चों की भलाई के लिए अत्यधिक लाड़-प्यार से सावधान रहिए। मैं आपसे आग्रह करता हूँ कि स्मरण रखिए, आपका पहला कर्तव्य उनके सच्चे हित का ध्यान रखना है, न कि उनकी सनक और पसन्द का; उन्हें प्रशिक्षित करना है, न कि उनकी हाँ में हाँ मिलाना; उन्हें लाभ पहुँचाना है, न कि केवल प्रसन्न करना।

आप अपने बच्चे के मन की हर इच्छा और सनक के आगे झुक नहीं सकते, चाहे आप उससे कितना ही प्रेम क्यों न करते हों। आपको उसे यह नहीं समझने देना चाहिए कि उसकी इच्छा ही सब कुछ है, और उसे बस किसी वस्तु की चाह करनी है और वह पूरी हो जाएगी। मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ, अपने बच्चों को मूर्ति मत बनाइए, ऐसा न हो कि परमेश्वर उन्हें उठा ले और आपकी मूर्ति को तोड़ दे, केवल आपको आपकी मूर्खता का बोध कराने के लिए।

अपने बच्चों से "नहीं" कहना सीखिए। उन्हें दिखाइए कि जो कुछ आपको उनके लिए उचित नहीं लगता, उसे अस्वीकार करने में आप समर्थ हैं। उन्हें दिखाइए कि आप आज्ञा-उल्लंघन को दण्ड देने के लिए तैयार हैं, और जब आप दण्ड की बात करते हैं, तो आप केवल धमकी देने को ही नहीं, बल्कि उसे पूरा करने को भी तैयार हैं। बहुत अधिक धमकियाँ न दीजिए। [17] जिन्हें धमकी दी जाती है वे लोग, और जिन दोषों को धमकी दी जाती है वे दोष, देर तक जीवित रहते हैं। दण्ड कम दीजिए, परन्तु सचमुच और पूरी गम्भीरता से; बार-बार और हल्का दण्ड तो सचमुच एक दयनीय प्रणाली है। [18]

"यह तो छोटी सी बात है" इस विचार से छोटे दोषों को अनदेखा जाने देने से सावधान रहिए। बच्चों के प्रशिक्षण में कोई बात छोटी नहीं होती; सब महत्त्वपूर्ण हैं। छोटे खरपतवार को भी उतना ही उखाड़ने की आवश्यकता होती है जितना किसी और को। उन्हें अकेला छोड़ दीजिए, तो वे जल्दी ही बड़े हो जाएँगे।

पाठक, यदि कोई ऐसी बात है जो आपके ध्यान के योग्य है, तो मेरा विश्वास कीजिए, यही है। मैं जानता हूँ कि यह आपको कष्ट देगी। परन्तु यदि आप अपने बच्चों के छोटे होते हुए उन पर परिश्रम नहीं करेंगे, तो वे बड़े होकर आपको कष्ट देंगे। चुन लीजिए कि आप कौन सा पसन्द करते हैं।

13. उन्हें प्रशिक्षित कीजिए, निरन्तर स्मरण करते हुए कि परमेश्वर अपने बच्चों को कैसे प्रशिक्षित करता है।

बाइबल हमें बताती है कि परमेश्वर के चुने हुए लोग हैं, इस जगत में उसका एक परिवार है। वे सब दीन पापी जिन्हें अपने पाप का बोध हुआ है, और जो शान्ति के लिए यीशु के पास भागे हैं, उसी परिवार को बनाते हैं। हम में से जो सचमुच उद्धार के लिए मसीह पर विश्वास करते हैं, वे सब उसके सदस्य हैं।

अब पिता परमेश्वर इस परिवार के सदस्यों को अपने साथ अनन्त निवास के लिए स्वर्ग में निरन्तर प्रशिक्षित करता रहता है। वह उस माली के समान कार्य करता है जो अपनी दाख की लताओं की छँटाई करता है, ताकि वे और अधिक फल लाएँ। वह हम में से प्रत्येक का स्वभाव जानता है, हमारे सहज में उलझानेवाले पाप, हमारी दुर्बलताएँ, हमारी विशेष निर्बलताएँ, हमारी विशेष आवश्यकताएँ। वह हमारे कर्म जानता है और यह भी कि हम कहाँ रहते हैं, जीवन में हमारे साथी कौन हैं, और हमारी परीक्षाएँ क्या हैं, हमारे प्रलोभन क्या हैं, और हमारे विशेषाधिकार क्या हैं। वह इन सब बातों को जानता है, और सब कुछ हमारी भलाई के लिए निरन्तर ठहराता रहता है। वह अपने विधान में हम में से प्रत्येक को वही बातें देता है जिनकी हमें आवश्यकता है, ताकि हम सबसे अधिक फल लाएँ, उतनी धूप जितनी हम सह सकें, और उतनी वर्षा, उतनी कड़वी बातें जितनी हम सह सकें, और उतनी मीठी। पाठक, यदि आप अपने बच्चों को बुद्धिमानी से प्रशिक्षित करना चाहते हैं, तो ध्यान से देखिए कि पिता परमेश्वर अपने बच्चों को कैसे प्रशिक्षित करता है। वह सब कुछ भली रीति से करता है; जो योजना वह अपनाता है वह उचित ही होगी।

देखो, तब, कितनी ही बातें हैं जो परमेश्वर अपने बच्चों से रोक रखता है। मेरा अनुमान है कि उनमें बहुत थोड़े ऐसे मिलेंगे जिनकी कुछ ऐसी इच्छाएँ न रही हों जिन्हें पूरा करना परमेश्वर को कभी अच्छा न लगा हो। प्रायः कोई एक वस्तु होती है जिसे वे पाना चाहते थे, और फिर भी उसे पाने में सदा कोई न कोई रुकावट रही। यह ठीक ऐसा रहा है मानो परमेश्वर उसे हमारी पहुँच से ऊपर रख रहा हो, और कह रहा हो, "यह तुम्हारे लिये भला नहीं है; यह नहीं होना चाहिए।" मूसा की बड़ी अभिलाषा थी कि यरदन पार करके प्रतिज्ञा की उस उत्तम भूमि को देखे; परन्तु तुम्हें स्मरण होगा कि उसकी वह अभिलाषा कभी पूरी नहीं हुई।

यह भी देखो कि परमेश्वर कितनी बार अपने लोगों को ऐसे मार्गों से ले चलता है जो हमारी आँखों को अन्धकारमय और रहस्यमय लगते हैं। हम उसके सब व्यवहारों का अर्थ नहीं समझ पाते; जिस मार्ग पर हमारे पाँव चल रहे हैं उसकी युक्तिसंगतता हमें दिखाई नहीं देती। कभी-कभी इतनी परीक्षाओं ने हमें घेरा है, और इतनी कठिनाइयों ने हमें आ घेरा है, कि हम इस सब की आवश्यकता को समझ ही नहीं पाए। यह ठीक ऐसा रहा है मानो हमारा पिता हमारा हाथ पकड़कर हमें किसी अन्धेरी जगह में ले जा रहा हो और कह रहा हो, "कोई प्रश्न मत पूछो, बस मेरे पीछे चले आओ।" मिस्र से कनान तक सीधा मार्ग था, फिर भी इस्राएल को उस पर नहीं ले जाया गया; परन्तु चक्कर काटकर जंगल में से ले जाया गया। और उस समय यह कठिन लगा। हमें बताया गया है कि "लोगों का मन मार्ग के कारण बहुत उदास हो गया" (निर्गमन 13:17; गिनती 21:4)।

यह भी देखो कि परमेश्वर कितनी बार अपने लोगों को परीक्षा और क्लेश के द्वारा ताड़ना देता है। वह उन पर क्रूस और निराशाएँ भेजता है; वह उन्हें रोग से गिरा देता है; वह उन्हें सम्पत्ति और मित्रों से वंचित कर देता है; वह उन्हें एक स्थिति से दूसरी स्थिति में बदल देता है; वह उन पर ऐसी बातें लाता है जो शरीर और लहू के लिये अत्यन्त कठिन होती हैं; और हम में से कुछ तो हम पर रखे गए बोझों के नीचे लगभग मूर्छित हो चुके हैं। हमने अपने आप को सामर्थ्य से अधिक दबा हुआ अनुभव किया है, और उस हाथ पर कुड़कुड़ाने को लगभग तैयार हो गए हैं जिसने हमें ताड़ना दी। प्रेरित पौलुस के लिये शरीर में एक काँटा ठहराया गया था, निःसन्देह कोई कड़वी शारीरिक पीड़ा, यद्यपि हम ठीक नहीं जानते कि वह क्या थी। परन्तु इतना हम जानते हैं कि उसने प्रभु से तीन बार विनती की कि वह उससे दूर कर दिया जाए; फिर भी वह दूर नहीं किया गया (2 कुरिन्थियों 12:8-9)।

अब, पाठक, इन सब बातों के होते हुए भी, क्या तुमने कभी परमेश्वर के किसी एक भी सन्तान के विषय में सुना जिसने सोचा हो कि उसके पिता ने उसके साथ बुद्धिमानी का व्यवहार नहीं किया? नहीं, मुझे निश्चय है कि तुमने कभी नहीं सुना। परमेश्वर की सन्तानें अन्त में सदा तुम से यही कहेंगी कि यह धन्य बात थी कि उनकी अपनी मनमानी नहीं चली, और परमेश्वर ने उनके लिये उससे कहीं अच्छा किया जैसा वे अपने लिये कर सकते थे। हाँ! और वे तुम से यह भी कह सकती हैं कि परमेश्वर के व्यवहारों ने उनके लिये उससे अधिक सुख जुटाया जितना वे स्वयं कभी पा सकते थे, और उसका मार्ग, चाहे कभी-कभी कितना ही अन्धकारमय क्यों न हो, सुखदायी मार्ग और शान्ति की डगर था।

मैं तुम से कहता हूँ कि उस शिक्षा को अपने मन में रखो जो परमेश्वर का अपने लोगों के साथ व्यवहार तुम्हें सिखाना चाहता है। अपने बच्चे से कोई भी ऐसी वस्तु रोक रखने से मत डरो जिसे तुम समझते हो कि उसे हानि पहुँचाएगी, चाहे उसकी अपनी इच्छा कुछ भी क्यों न हो। यही परमेश्वर की रीति है।

उस पर ऐसी आज्ञाएँ रखने में संकोच मत करो जिनकी बुद्धिमानी वह अभी न देख पाए, और उसे ऐसे मार्गों पर चलाने में भी, जो अभी उसके मन को युक्तिसंगत न लगें। यही परमेश्वर की रीति है।

जब कभी तुम देखो कि उसकी आत्मा के स्वास्थ्य के लिये आवश्यक है, तब उसे ताड़ना देने और सुधारने से मत हिचकिचाओ, चाहे वह तुम्हारी भावनाओं के लिये कितना ही पीड़ादायक क्यों न हो; और स्मरण रखो कि मन की औषधियों को इसलिये अस्वीकार नहीं करना चाहिए कि वे कड़वी हैं। यही परमेश्वर की रीति है।

और सबसे बढ़कर, इस बात से मत डरो कि प्रशिक्षण की ऐसी रीति तुम्हारे बच्चे को दुखी कर देगी। मैं तुम्हें इस भ्रम से सावधान करता हूँ। निश्चय जानो, सदा अपनी इच्छा पूरी करवाने से बढ़कर दुःख का कोई और निश्चित मार्ग नहीं है। हमारी इच्छाओं का रोका और ठुकराया जाना हमारे लिये धन्य बात है; यह हमें आनन्दों का मूल्य सिखाता है जब वे आते हैं। निरन्तर लाड़-प्यार में पलना स्वार्थी बनने का मार्ग है; और स्वार्थी लोग तथा बिगड़े हुए बच्चे, मेरा विश्वास करो, कम ही सुखी होते हैं।

पाठक, परमेश्वर से अधिक बुद्धिमान मत बनो; अपने बच्चों को वैसे ही प्रशिक्षित करो जैसे वह अपने बच्चों को करता है।

14. उन्हें प्रशिक्षित करो, और अपने उदाहरण के प्रभाव को निरन्तर स्मरण रखो।

शिक्षा, सलाह और आज्ञाओं से बहुत कम लाभ होगा, जब तक उन्हें तुम्हारे अपने जीवन का नमूना सहारा न दे। जब तक तुम्हारे कार्य तुम्हारी सलाह के विपरीत हैं, तुम्हारे बच्चे कभी विश्वास नहीं करेंगे कि तुम गम्भीर हो और सचमुच चाहते हो कि वे तुम्हारी आज्ञा मानें। आर्चबिशप टिलोट्सन ने यह बुद्धिमानी की बात कही थी, "बच्चों को अच्छी शिक्षा देना और बुरा उदाहरण रखना, सिर हिलाकर उन्हें स्वर्ग का मार्ग दिखाना है, जबकि हम उनका हाथ पकड़कर उन्हें नरक के मार्ग पर ले चलते हैं।"

हम उदाहरण के बल और सामर्थ्य को कम ही जानते हैं। हम में से कोई भी इस संसार में अपने ही लिये नहीं जी सकता; हम सदा अपने आस-पास के लोगों को किसी न किसी रीति से प्रभावित करते रहते हैं, चाहे भलाई के लिये हो या बुराई के लिये, चाहे परमेश्वर के लिये हो या पाप के लिये। वे हमारे चाल-चलन को देखते हैं, हमारे आचरण पर ध्यान देते हैं, हमारे व्यवहार को निहारते हैं, और जो कुछ वे हमें करते देखते हैं, उसे वे उचित रूप से ठीक मान सकते हैं। और मेरा विश्वास है कि उदाहरण कहीं भी इतना प्रबल प्रभाव नहीं डालता जितना माता-पिता और बच्चों के विषय में डालता है।

पिताओ और माताओ, यह मत भूलो कि बच्चे कानों से अधिक आँखों से सीखते हैं। कोई पाठशाला चरित्र पर वैसी गहरी छाप नहीं छोड़ेगी जैसी घर छोड़ता है। सबसे अच्छे शिक्षक भी उनके मन पर उतना अंकित नहीं करेंगे जितना वे तुम्हारी अँगीठी के पास से ग्रहण कर लेंगे। बच्चों में स्मरण-शक्ति से कहीं अधिक प्रबल सिद्धान्त अनुकरण है। जो वे देखते हैं उसका उनके मन पर उससे कहीं अधिक प्रभाव पड़ता है जो उन्हें बताया जाता है।

इसलिये ध्यान रखो कि बच्चे के सामने तुम क्या करते हो। यह एक सच्ची कहावत है, "जो बच्चे के सामने पाप करता है, वह दुगुना पाप करता है।" इसके बजाय मसीह की जीवित पत्री बनने का यत्न करो, ऐसी कि तुम्हारे परिवार उसे पढ़ सकें, और स्पष्ट रूप से पढ़ सकें। परमेश्वर के वचन के प्रति श्रद्धा का, प्रार्थना में श्रद्धा का, अनुग्रह के साधनों के प्रति श्रद्धा का, प्रभु के दिन के प्रति श्रद्धा का उदाहरण बनो। वाणी में, स्वभाव में, परिश्रम में, संयम में, विश्वास में, प्रेम में, कृपालुता में, नम्रता में उदाहरण बनो। यह मत सोचो कि तुम्हारे बच्चे वह करेंगे जो वे तुम्हें करते नहीं देखते। तुम उनके लिये आदर्श चित्र हो, और तुम जैसे हो वैसा ही वे अनुकरण करेंगे। तुम्हारे तर्क और तुम्हारे व्याख्यान, तुम्हारी बुद्धिमान आज्ञाएँ और तुम्हारी अच्छी सलाह; यह सब वे शायद न समझें, परन्तु तुम्हारे जीवन को वे समझ सकते हैं।

बच्चे बहुत तेज़ निरीक्षक होते हैं; कुछ प्रकार के कपट को भाँप लेने में बहुत तेज़, यह जान लेने में बहुत तेज़ कि तुम वास्तव में क्या सोचते और अनुभव करते हो, और तुम्हारे सब तौर-तरीक़ों और मतों को अपना लेने में बहुत तेज़। तुम अकसर यही पाओगे कि जैसा पिता, वैसा पुत्र।

विजेता कैसर अपने सैनिकों से युद्ध में जो शब्द सदा कहा करता था, उसे स्मरण रखो। वह यह नहीं कहता था, "आगे बढ़ो," परन्तु "आओ।" अपने बच्चों को सिखाने में तुम्हें भी ऐसा ही करना चाहिए। जिन आदतों को वे तुम्हें तुच्छ जानते देखते हैं, उन्हें वे कदाचित् ही सीखेंगे, और जिन मार्गों पर तुम स्वयं नहीं चलते, उन पर वे नहीं चलेंगे। जो अपने बच्चों को वह उपदेश देता है जिसका वह स्वयं पालन नहीं करता, वह ऐसा काम कर रहा है जो कभी आगे नहीं बढ़ता। यह प्राचीन काल की पेनेलोपी के उस कहे जानेवाले जाल के समान है, जो दिन भर बुनती और रात भर उधेड़ती थी। ठीक वैसे ही, जो माता-पिता अच्छा उदाहरण रखे बिना शिक्षा देने का प्रयत्न करता है, वह एक हाथ से बनाता और दूसरे हाथ से गिराता है।

15. उन्हें सिखाओ, और पाप की शक्ति को निरन्तर स्मरण रखो। मैं इसे संक्षेप में कहता हूँ, ताकि तुम्हें पवित्रशास्त्र-विरुद्ध आशाओं से बचाए रखूँ।

तुम्हें यह आशा नहीं रखनी चाहिए कि अपने बच्चों के मन को तुम शुद्ध श्वेत कागज़ के समान पाओगे, और यदि तुम केवल उचित साधनों का प्रयोग करो तो तुम्हें कोई कठिनाई न होगी। मैं तुम्हें स्पष्ट चेतावनी देता हूँ कि तुम ऐसा कुछ नहीं पाओगे। यह देखना पीड़ादायक है कि छोटे बच्चे के हृदय में कितनी भ्रष्टता और बुराई है, और वह कितनी जल्दी फल लाने लगती है। उग्र स्वभाव, हठ, घमण्ड, डाह, चिड़चिड़ापन, क्रोध, आलस्य, स्वार्थ, छल, चालाकी, झूठ, कपट, बुरी बातें सीखने की भयानक तत्परता, भली बातें सीखने की पीड़ादायक धीमापन, अपना मतलब निकालने के लिए कुछ भी दिखावा करने की तैयारी, ये सब बातें, या इनमें से कुछ, तुम्हें अपने ही रक्त-मांस में देखने के लिए तैयार रहना चाहिए। बहुत छोटी अवस्था में ही ये छोटे-छोटे रूपों में बाहर निकलने लगती हैं; यह देखकर लगभग चौंक जाना पड़ता है कि वे कितने स्वाभाविक रूप से उभर आती हैं। बच्चों को पाप करना सीखने के लिए किसी पाठशाला की आवश्यकता नहीं होती।

परन्तु जो कुछ तुम देखते हो उससे तुम्हें निराश और हताश नहीं होना चाहिए। तुम्हें इसे कोई अनोखी या असाधारण बात नहीं समझनी चाहिए कि छोटे हृदय भी पाप से इतने भरे हो सकते हैं। हमारे पूर्वज आदम ने हमारे लिए यही भाग छोड़ा है; यही वह पतित स्वभाव है जिसे लेकर हम संसार में आते हैं; यही वह मीरास है जो हम सब की है। इसके बजाय यह तुम्हें और भी अधिक परिश्रमी बनाए कि हर उस साधन का प्रयोग करो जो परमेश्वर की आशीष से इस हानि का सामना करने में सबसे अधिक सहायक प्रतीत हो। यह तुम्हें और अधिक सावधान करे कि जहाँ तक तुमसे हो सके, अपने बच्चों को प्रलोभन के मार्ग से दूर रखो।

उन लोगों की बात कभी मत सुनो जो तुमसे कहते हैं कि तुम्हारे बच्चे अच्छे हैं, उनका पालन-पोषण भली रीति से हुआ है और उन पर भरोसा किया जा सकता है। इसके बजाय यह सोचो कि उनके हृदय सदा सूखे फूस के समान आग पकड़नेवाले हैं। अपनी सर्वोत्तम दशा में भी उन्हें अपनी भ्रष्टताओं को भड़काने के लिए बस एक चिंगारी चाहिए। माता-पिता कदाचित् ही आवश्यकता से अधिक सतर्क होते हैं। अपने बच्चों की स्वाभाविक भ्रष्टता को स्मरण रखो, और सावधान रहो।

16. उन्हें सिखाओ, और पवित्रशास्त्र की प्रतिज्ञाओं को निरन्तर स्मरण रखो।

इसे भी मैं संक्षेप में कहता हूँ, ताकि तुम्हें हतोत्साह से बचाए रखूँ।

तुम्हारे पक्ष में एक स्पष्ट प्रतिज्ञा है, "लड़के को शिक्षा उसी मार्ग की दे जिसमें उसको चलना चाहिए, और वह बूढ़ा होने पर भी उससे न हटेगा" (नीतिवचन 22:6)। सोचो कि ऐसी प्रतिज्ञा का होना क्या अर्थ रखता है। बाइबल लिखे जाने से पहले कुलपतियों के हृदयों को प्रोत्साहित करनेवाला आशा का एकमात्र दीपक प्रतिज्ञाएँ ही थीं। हनोक, नूह, अब्राहम, इसहाक, याकूब, यूसुफ, ये सब कुछ थोड़ी-सी प्रतिज्ञाओं के सहारे जीए और अपनी आत्माओं में फले-फूले। प्रतिज्ञाएँ वे संजीवनी हैं जिन्होंने हर युग में विश्वासी को सम्भाला और बल दिया है। जिसके पक्ष में एक स्पष्ट वचन है, उसे कभी हताश होने की आवश्यकता नहीं। हे पिताओ और माताओ, जब तुम्हारे हृदय हार मानने और रुक जाने को हों, तो इस वचन को देखो और शान्ति पाओ।

सोचो कि प्रतिज्ञा करनेवाला कौन है। यह किसी मनुष्य का वचन नहीं है, जो झूठ बोल सकता या पछता सकता है; यह राजाओं के राजा का वचन है, जो कभी नहीं बदलता। क्या उसने कहा है और वह उसे पूरा न करेगा? या क्या उसने बोला है और उसे सफल न करेगा? उसके लिए कुछ भी करना कठिन नहीं है। जो बातें मनुष्यों से नहीं हो सकतीं, वे परमेश्वर से हो सकती हैं। हे पाठक, यदि हमें उस प्रतिज्ञा का लाभ नहीं मिलता जिस पर हम विचार कर रहे हैं, तो दोष उसका नहीं, हमारा अपना है।

इससे पहले कि तुम इससे शान्ति लेने से इनकार करो, यह भी सोचो कि इस प्रतिज्ञा में क्या निहित है। यह एक निश्चित समय की बात करती है जब भली शिक्षा विशेष रूप से फल लाएगी, "जब बच्चा बूढ़ा हो जाए।" निश्चय ही इसमें शान्ति है। हो सकता है तुम अपनी आँखों से सावधानीपूर्वक दी गई शिक्षा का परिणाम न देखो, परन्तु तुम नहीं जानते कि तुम्हारे मर जाने और चले जाने के बहुत समय बाद उससे कैसे धन्य फल उत्पन्न होंगे। परमेश्वर की रीति यह नहीं कि सब कुछ एक साथ दे दे। "बाद में" वह समय है जब वह प्रायः कार्य करना चुनता है, चाहे प्रकृति की बातों में हो या अनुग्रह की बातों में। "बाद में" वह ऋतु है जब दुःख धार्मिकता का शान्तिदायक फल लाता है (इब्रानियों 12:11)। "बाद में" वही समय था जब उस पुत्र ने, जिसने अपने पिता की दाख की बारी में काम करने से इनकार किया था, पछताकर जाना स्वीकार किया (मत्ती 21:29)। और "बाद में" वही समय है जिसकी ओर माता-पिता को आशा से देखना चाहिए, यदि वे तुरन्त सफलता न देखें; तुम्हें आशा में बोना और आशा में रोपना है।

आत्मा कहता है, "अपनी रोटी जल के ऊपर डाल दे, क्योंकि बहुत दिन के बाद तू उसे फिर पाएगा" (सभोपदेशक 11:1)। मुझे सन्देह नहीं कि बहुत से बच्चे न्याय के दिन उठ खड़े होंगे और भली शिक्षा के लिए अपने माता-पिता को धन्य कहेंगे, जिन्होंने अपने माता-पिता के जीवनकाल में कभी यह संकेत नहीं दिया कि उन्हें उससे कोई लाभ हुआ है। इसलिए विश्वास में आगे बढ़ो, और निश्चित रहो कि तुम्हारा परिश्रम पूरी तरह व्यर्थ नहीं जाएगा। एलिय्याह ने विधवा के बच्चे के जी उठने से पहले तीन बार अपने आप को उस पर पसारा। उससे उदाहरण लो, और डटे रहो।

17. अन्त में, उन्हें सिखाओ, और जो कुछ तुम करो उस पर आशीष के लिए निरन्तर प्रार्थना करते रहो।

प्रभु की आशीष के बिना तुम्हारे उत्तम से उत्तम प्रयत्न भी कुछ भला नहीं करेंगे। सब मनुष्यों के हृदय उसी के हाथ में हैं, और जब तक वह अपने आत्मा के द्वारा तुम्हारे बच्चों के हृदयों को न छूए, तब तक तुम व्यर्थ ही थक जाओगे। इसलिए जो बीज तुम उनके मन में बोते हो, उसे निरन्तर प्रार्थना से सींचते रहो। प्रभु सुनने के लिए हमारे प्रार्थना करने से कहीं अधिक तैयार है; आशीष देने के लिए हमारे माँगने से कहीं अधिक तत्पर है; फिर भी वह चाहता है कि उसके आगे विनती की जाए। और मैं प्रार्थना की इस बात को तुम्हारे सब कार्यों के शिखर-पत्थर और मुहर के रूप में तुम्हारे सामने रखता हूँ। मुझे लगता है कि बहुत प्रार्थनाओं की सन्तान शायद ही कभी त्यागी जाती है।

अपने बच्चों को वैसे ही देखो जैसे याकूब ने अपने बच्चों को देखा; वह एसाव से कहता है कि ये "वे बालक हैं जिन्हें परमेश्वर ने अनुग्रह करके तेरे दास को दिया है" (उत्पत्ति 33:5)। उन्हें वैसे ही देखो जैसे यूसुफ ने अपने पुत्रों को देखा; उसने अपने पिता से कहा, "ये मेरे पुत्र हैं जिन्हें परमेश्वर ने मुझे यहाँ दिया है" (उत्पत्ति 48:9)। भजनकार के साथ उन्हें "यहोवा का दिया हुआ भाग और उसकी ओर से प्रतिफल" गिनो (भजन संहिता 127:3)। और तब पवित्र साहस के साथ प्रभु से विनती करो कि वह अपनी ही दी हुई देनों पर अनुग्रह और दया करे। देखो अब्राहम ने इश्माएल के लिए कैसे मध्यस्थता की प्रार्थना की, क्योंकि वह उससे प्रेम करता था, "भला होता कि इश्माएल तेरे सम्मुख जीवित रहे!" (उत्पत्ति 17:18)। देखो मानोह ने शिमशोन के विषय में स्वर्गदूत से कैसे बात की, "हम उस लड़के का क्या कार्य और कैसा चाल-चलन रखें?" (न्यायियों 13:12)। ध्यान दो कि अय्यूब अपने बच्चों के प्राणों की कितनी कोमलता से चिन्ता करता था, "वह उन सभों की गिनती के अनुसार होमबलि चढ़ाता था, क्योंकि वह सोचता था, कदाचित् मेरे पुत्रों ने पाप किया हो और अपने मन में परमेश्वर को शाप दिया हो। अय्यूब सदा ऐसा ही किया करता था" (अय्यूब 1:5)। माता-पिताओ, यदि तुम अपने बच्चों से प्रेम रखते हो तो जाकर वैसा ही करो। तुम उनके नाम दयासन के सामने कितनी ही बार क्यों न लो, वह कम ही है।

और अब, पाठक, अन्त में मैं एक बार फिर तुमसे आग्रह करता हूँ कि यदि तुम बच्चों को स्वर्ग के लिए प्रशिक्षित करना चाहते हो, तो अपनी सामर्थ्य के हर एक साधन को काम में लाना कितना आवश्यक और महत्त्वपूर्ण है।

मैं भली-भाँति जानता हूँ कि परमेश्वर सर्वाधिकारी परमेश्वर है, और वह सब कुछ अपनी इच्छा की सम्मति के अनुसार करता है। मैं जानता हूँ कि रहूबियाम सुलैमान का पुत्र था, और मनश्शे हिजकिय्याह का पुत्र, और यह भी कि भक्त माता-पिता की सन्तान सदा भक्त नहीं दिखाई देती। परन्तु मैं यह भी जानता हूँ कि परमेश्वर ऐसा परमेश्वर है जो साधनों के द्वारा कार्य करता है, और मुझे निश्चय है कि यदि तुम उन साधनों को, जिनका मैंने उल्लेख किया है, हल्का समझोगे, तो तुम्हारे बच्चों के अच्छे निकलने की सम्भावना कम है।

पिताओ और माताओ, तुम अपने बच्चों को बपतिस्मा दिलाने ले जा सकते हो, और उनके नाम मसीह की कलीसिया की पंक्तियों में लिखवा सकते हो; तुम भक्त धर्म-माता-पिता पा सकते हो जो उनकी ओर से उत्तर दें और अपनी प्रार्थनाओं से तुम्हारी सहायता करें; तुम उन्हें सर्वोत्तम पाठशालाओं में भेज सकते हो, उन्हें बाइबलें और प्रार्थना-पुस्तकें दे सकते हो, और उन्हें सिर के ज्ञान से भर सकते हो; परन्तु यदि इस सारे समय घर पर नियमित प्रशिक्षण नहीं है, तो मैं तुमसे साफ़ कहता हूँ, मुझे डर है कि अन्त में तुम्हारे बच्चों की आत्माओं के लिए यह कठिन होगा। घर वह स्थान है जहाँ आदतें बनती हैं; घर वह स्थान है जहाँ चरित्र की नींव रखी जाती है; घर ही हमारी रुचियों, पसन्दों और मतों को झुकाव देता है। इसलिए मैं तुमसे विनती करता हूँ कि घर पर सावधानी से प्रशिक्षण दिया जाए। सचमुच वह मनुष्य धन्य है जो अपनी मृत्यु-शय्या पर बोल्टन की तरह अपने बच्चों से कह सके, "मुझे विश्वास है कि तुममें से कोई भी नया जन्म पाए बिना मसीह के न्याय-आसन के सामने मुझसे मिलने का साहस नहीं करेगा।"

पिताओ और माताओ, मैं परमेश्वर के सामने और प्रभु

यीशु मसीह के सामने तुम्हें गम्भीरता से आदेश देता हूँ कि अपने बच्चों को उस मार्ग में, जिसमें उन्हें चलना चाहिए, प्रशिक्षित करने में पूरा परिश्रम करो। मैं यह आदेश केवल तुम्हारे बच्चों की आत्माओं के लिए नहीं देता; मैं यह तुम्हारे अपने भावी चैन और शान्ति के लिए भी देता हूँ। सचमुच ऐसा करना तुम्हारे ही हित में है। सचमुच तुम्हारा अपना सुख बहुत कुछ इसी पर निर्भर है। बच्चे सदा वह धनुष रहे हैं जिससे छूटे हुए सबसे तीखे तीर मनुष्य के हृदय को बेधते आए हैं। बच्चों ने वे सबसे कड़वे प्याले घोले हैं जो मनुष्य को कभी पीने पड़े हैं। बच्चों ने वे सबसे दुःखद आँसू बहवाए हैं जो मनुष्य को कभी बहाने पड़े हैं। आदम तुम्हें यह बता सकता है; याकूब बता सकता है; दाऊद बता सकता है। पृथ्वी पर ऐसे कोई दुःख नहीं जैसे वे जो बच्चों ने अपने माता-पिता पर डाले हैं। आह! चौकस रहो, कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारी अपनी उपेक्षा बुढ़ापे में तुम्हारे लिए दुर्दशा का भण्डार जमा कर दे। चौकस रहो, कहीं ऐसा न हो कि उन दिनों में जब तुम्हारी आँखें धुँधली और स्वाभाविक बल घट गया हो, तुम किसी कृतघ्न सन्तान के दुर्व्यवहार के नीचे रोओ।

यदि तुम कभी चाहते हो कि तुम्हारे बच्चे तुम्हारे प्राण को फिर से हरा करनेवाले और तुम्हारे बुढ़ापे के पालनहार हों, यदि तुम चाहते हो कि वे शाप नहीं वरन् आशीष हों, दुःख नहीं वरन् आनन्द हों, रूबेन नहीं वरन् यहूदा हों, ओर्पा नहीं वरन् रूत हों, यदि तुम नूह की तरह उनके कामों से लज्जित न होना चाहो और रिबका की तरह उनके कारण अपने जीवन से उकता न जाना चाहो: यदि तुम्हारी यही इच्छा है, तो मेरी सलाह समय रहते याद रखो, उन्हें बचपन में ही सही मार्ग में प्रशिक्षित करो।

और जहाँ तक मेरी बात है, मैं परमेश्वर से अपनी प्रार्थना करते हुए समाप्त करता हूँ कि इस लेख के सब पढ़नेवालों को परमेश्वर यह सिखाए कि वे अपनी आत्माओं का मूल्य अनुभव करें। यही एक कारण है कि बपतिस्मा बहुधा केवल एक रीति बनकर रह जाता है, और मसीही प्रशिक्षण तुच्छ समझा और उपेक्षित किया जाता है। प्रायः माता-पिता अपने लिए ही चिन्ता नहीं करते, और इसलिए अपने बच्चों के लिए भी चिन्ता नहीं करते। वे स्वभाव की दशा और अनुग्रह की दशा के बीच के भारी अन्तर को नहीं समझते, और इसलिए उन्हें अकेला छोड़ देने से सन्तुष्ट रहते हैं।

अब प्रभु तुम सबको सिखाए कि पाप वह घृणित वस्तु है जिससे परमेश्वर बैर रखता है। तब, मैं जानता हूँ, तुम अपने बच्चों के पापों पर शोक करोगे, और उन्हें आग में से निकाली हुई लकड़ियों की नाईं खींच लेने का यत्न करोगे।

प्रभु तुम सबको सिखाए कि मसीह कितना बहुमूल्य है, और उसने हमारे उद्धार के लिए कैसा सामर्थी और सम्पूर्ण कार्य किया है। तब मुझे विश्वास है कि तुम अपने बच्चों को यीशु के पास लाने के लिए हर साधन काम में लाओगे, ताकि वे उसके द्वारा जीवित रहें।

प्रभु तुम सबको सिखाए कि तुम्हारी आत्माओं को नया करने, पवित्र करने और जिलाने के लिए तुम्हें पवित्र आत्मा की कितनी आवश्यकता है। तब मुझे निश्चय है कि तुम अपने बच्चों से आग्रह करोगे कि वे उसके लिए निरन्तर प्रार्थना करें, और जब तक वह सामर्थ्य के साथ उनके हृदयों में न उतरे और उन्हें नई सृष्टि न बना दे, तब तक चैन न लें।

प्रभु यह प्रदान करे, तब मुझे अच्छी आशा है कि तुम सचमुच अपने बच्चों को भली-भाँति प्रशिक्षित करोगे, इस जीवन के लिए भली-भाँति प्रशिक्षित करोगे, और आनेवाले जीवन के लिए भली-भाँति प्रशिक्षित करोगे; पृथ्वी के लिए भली-भाँति प्रशिक्षित करोगे, और स्वर्ग के लिए भली-भाँति प्रशिक्षित करोगे; उन्हें परमेश्वर के लिए, मसीह के लिए, और अनन्तकाल के लिए प्रशिक्षित करोगे। पाद-टिप्पणियाँ:

[14] एक सेवक होने के नाते मैं यह कहे बिना नहीं रह सकता कि ऐसा कोई विषय शायद ही हो जिस पर लोग अपने बच्चों के विषय के समान इतना हठ करते दिखाई दें। मैं कभी-कभी पूरी तरह चकित रह गया हूँ कि समझदार मसीही माता-पिता यह मानने में कितने धीमे होते हैं कि उनके अपने बच्चों का कोई दोष है, या वे दोष के योग्य हैं। ऐसे लोग कम नहीं हैं जिनसे मैं उनके अपने पापों के विषय में बात करना कहीं अधिक पसन्द करूँगा, बजाय इसके कि उन्हें बताऊँ कि उनके बच्चों ने कुछ गलत किया है।

[15] "जिसने जीवन को बहुत कम देखा है, वही हर कहीं मनुष्यों की राय और सोचने की आदतों पर शिक्षा के प्रभाव को नहीं पहचानता। बच्चे जो कुछ बाल-कक्ष से लेकर निकलते हैं, वही उनके पूरे जीवन में प्रकट होता रहता है।" — सेसिल।

[16] बच्चे की धार्मिक शिक्षा किस आयु में आरम्भ होनी चाहिए, इसके विषय में कोई सामान्य नियम नहीं बनाया जा सकता। कुछ बच्चों में मन दूसरों की अपेक्षा बहुत जल्दी खुलता हुआ दिखाई देता है। हम बहुत कम ही बहुत जल्दी आरम्भ करते हैं। इस बात के आश्चर्यजनक उदाहरण दर्ज हैं कि एक बच्चा तीन वर्ष की आयु में भी क्या कुछ प्राप्त कर सकता है।

[17] कुछ माता-पिता और दाइयों की आदत होती है कि हर छोटे-से अवसर पर, और प्रायः बिना उचित कारण के, किसी लड़के या लड़की से "शरारती बच्चा" कह देते हैं। यह बहुत मूर्खतापूर्ण आदत है। दोष के शब्द कभी बिना सच्चे कारण के प्रयोग नहीं करने चाहिए।

[18] बच्चे को दण्ड देने का सबसे अच्छा तरीका क्या है, इसके विषय में कोई सामान्य नियम नहीं बनाया जा सकता। बच्चों के स्वभाव इतने अधिक भिन्न होते हैं कि जो एक बच्चे के लिए कठोर दण्ड होगा, वह दूसरे के लिए दण्ड ही नहीं होगा। मैं केवल इस आधुनिक धारणा के विरुद्ध अपना दृढ़ विरोध दर्ज कराना चाहता हूँ कि किसी बच्चे को कभी कोड़े या छड़ी से नहीं मारना चाहिए। निःसन्देह कुछ माता-पिता शारीरिक दण्ड का प्रयोग बहुत अधिक और बहुत कठोरता से करते हैं; परन्तु मुझे भय है कि बहुत-से अन्य लोग उसका प्रयोग बहुत ही कम करते हैं।

फिलिप्पियों 1:1 कलीसिया के साधारण सदस्यों के अधिकार और कर्तव्य

कलीसिया के लोग। [19]

"पौलुस और तीमुथियुस की ओर से, जो मसीह यीशु के दास हैं, सब पवित्र लोगों के नाम जो मसीह यीशु में होकर फिलिप्पी में रहते हैं, अध्यक्षों और सेवकों समेत।" — फिलिप्पियों 1:1।

फिलिप्पियों के नाम पौलुस की पत्री का यह आरम्भिक पद पवित्रशास्त्र का एक बहुत ही उल्लेखनीय पद है। मुझे सन्देह है कि बाइबल पढ़नेवाले इस पर उतना ध्यान नहीं देते जितना यह माँगता है। कैलिफ़ोर्निया के सोने के समान लोग सदियों से इस पर चलते रहे हैं, और उन्होंने यह नहीं देखा कि उनके पाँवों के नीचे क्या है। वास्तव में, यदि कुछ अंग्रेज़ी कलीसिया के धर्मविज्ञानी इस पद को लिखते समय प्रेरित के पास खड़े होते, तो मेरा विश्वास है कि वे यह संकेत देते कि उससे भूल हो गई है।

अब इस सब से मेरा क्या तात्पर्य है? वह उल्लेखनीय बात क्या है जिसकी ओर मैं संकेत कर रहा हूँ? जिस बात पर मैं अँगुली रखता हूँ, वह यह है कि पौलुस ने "अध्यक्षों और सेवकों" से पहले "पवित्र लोगों" का उल्लेख किया है। जब वह फिलिप्पी की कलीसिया को सम्बोधित करता है, तो वह साधारण सदस्यों को पादरी-वर्ग से पहले रखता है। वह बपतिस्मा पाए हुए लोगों के समूह को अगली पंक्ति में रखता है, और सेवकों को पीछे।

इस मामले में हस्तलिखित प्रतियों के विभिन्न पाठों के विषय में विवाद की कोई गुंजाइश नहीं है। यहाँ कम से कम संशोधित संस्करण (Revised Version) पाठ की भाषा को नहीं छूता।

यह निस्सन्देह परमेश्वर की प्रेरणा से दिया गया था, और हमारी शिक्षा के लिए लिखा गया था। इस रूप में मैं इसमें एक महान सत्य का बीज देखता हूँ, जो आज के समय में विशेष ध्यान की माँग करता है। संक्षेप में, यह मसीही कलीसिया के साधारण सदस्यों के अधिकारों और कर्तव्यों के गम्भीर विषय को खोलता है।

इस लेख में मैं तीन प्रश्नों की जाँच करना चाहता हूँ:—

I. प्रेरितों के दिनों में किसी कलीसिया के साधारण सदस्यों की क्या स्थिति थी?

II. पिछले 200 वर्षों से इंग्लैंड की कलीसिया के साधारण सदस्यों की क्या स्थिति रही है?

III. स्थापित इंग्लैंड की कलीसिया को सुदृढ़ करने और उसका सुधार करने के लिए साधारण सदस्यों के विषय में हमारा लक्ष्य क्या होना चाहिए?

मैं पूरे विषय के पास इस गहरी अनुभूति के साथ आता हूँ कि यह कितना नाज़ुक और कठिन है। मैं उन क्रान्तिकारी सलाहकारों से ज़रा भी सहानुभूति नहीं रखता जो चाहते हैं कि हम धर्म-सूत्रों, अनुच्छेदों और विधियों को समुद्र में फेंक दें और आक्रमणकारियों को मोल लेने की व्यर्थ आशा में कलीसिया को सब देवताओं का मन्दिर बना दें। मैं पवित्रशास्त्र के अनुसार और विवेकपूर्ण सुधारों के सिवा कुछ नहीं चाहता, और मैं ऐसा कोई सुधार नहीं जानता जो इंग्लैंड की कलीसिया को उतना सुदृढ़ करे जितना कि उसके साधारण सदस्यों को उनके उचित स्थान पर रखना। आज के दिन कलीसिया की प्रभावी रक्षा को बढ़ावा देने का एक सबसे अच्छा तरीका बुद्धिमानी से किए गए कलीसिया-सुधार को बढ़ावा देना है।

I. तो फिर प्रेरितों के दिनों में कलीसियाओं के साधारण सदस्यों की क्या स्थिति थी? आइए, हम कल्पना करें कि हम रोम, या कुरिन्थुस, या इफिसुस, या थिस्सलुनीके, या यरूशलेम के बपतिस्मा पाए हुए समुदायों की भेंट कर रहे हैं, और देखें कि हमें क्या मिलता, और पवित्रशास्त्र उनके विषय में क्या सिखाता है। इस विषय में, जैसे अनेक अन्य विषयों में, हमें यह पूछने का अधिकार है, "नए नियम से हमें क्या प्रकाश मिल सकता है?"

यह एक ऐसी जाँच है जो विशेष ध्यान के योग्य है, और यदि इसका परिणाम कुछ लोगों को चकित न कर दे और उनकी आँखें न खोल दे, तो मुझसे बड़ी भूल हुई समझिए।

तब मैं बिना हिचकिचाहट के कहता हूँ कि आपको नए नियम में एक भी पद ऐसा नहीं मिलेगा जिसमें केवल नियुक्त सेवकों को ही कभी "कलीसिया" कहा गया हो, या जिसमें वे साधारण सदस्यों के उनके कार्य में सम्मिलित और सहयोगी हुए बिना कलीसिया की ओर से कभी कार्य करते हों।

क्या डीकन नियुक्त किए जाते हैं? बारहों इसकी सिफ़ारिश करते हैं, परन्तु चुनाव "सारी मण्डली" करती है (प्रेरितों के काम 6:5)। क्या यह विचार करने के लिए महासभा बुलाई जाती है कि अन्यजातियों में से मन फिरानेवालों का खतना किया जाए या नहीं, और वे रस्मी व्यवस्था का पालन करें या नहीं? कहा गया है कि जो निर्णय लिया गया, वह "प्रेरितों, प्राचीनों और भाइयों" की ओर से, और "सारी कलीसिया" के साथ था (प्रेरितों के काम 15:22-23)। — क्या पौलुस द्वारा विशेष कलीसियाओं को प्रेरणा से भरी पत्रियाँ लिखी जाती हैं? आठ मामलों में वे "कलीसिया, पवित्र लोगों और विश्वासी भाइयों" के नाम लिखी गई हैं — और केवल एक मामले में (फिलिप्पियों की पत्री में) आरम्भिक अभिवादन में "अध्यक्षों और डीकनों" का कोई उल्लेख मिलता है। क्या पौलुस कलीसिया को प्रभु-भोज और अन्य भाषा बोलने के विषय में निर्देश भेजता है? वह उन्हें "उन लोगों के नाम भेजता है जो मसीह यीशु में पवित्र किए गए हैं", सेवकों के नाम नहीं। — क्या किसी अस्वस्थ सदस्य के विरुद्ध अनुशासन चलाया जाता है? मैं देखता हूँ कि पौलुस कुरिन्थ के पवित्र लोगों को निर्देश देता है, और सेवकाई का उल्लेख तक नहीं करता: "उस दुष्ट को अपने बीच में से निकाल दो" (1 कुरिन्थियों 5:13)। — क्या "किसी अपराध में पकड़े गए" मनुष्य को फिर सहभागिता में लाना है? पौलुस गलातिया के उन लोगों से, जो "आत्मिक" हैं, यह करने को कहता है, और इसे उनके सेवकों को नहीं सौंपता (गलातियों 6:1)। — क्या इब्री मसीहियों को पत्री लिखी जाती है? अन्तिम अध्याय तक पहुँचने से पहले "अगुओं" के विषय में एक शब्द भी नहीं कहा गया। क्या याकूब सर्वसाधारण पत्री लिखता है? वह "बारह गोत्रों" को सम्बोधित करता है, और "शिक्षकों" का नाम केवल तीसरे अध्याय में लेता है। क्या पतरस सर्वसाधारण पत्री लिखता है? वह चुने हुए लोगों की सारी मण्डली को लिखता है, और अन्तिम अध्याय तक पहुँचने से पहले "प्राचीनों" से कुछ नहीं कहता, और तब भी वह उन्हें यह याद दिलाने में सावधान है कि वे "परमेश्वर की सम्पत्ति पर अधिकार जतानेवाले" नहीं हैं। जहाँ तक पतरस की दूसरी पत्री और यूहन्ना तथा यहूदा की पत्रियों का सम्बन्ध है, वे सेवकाई के विषय को छूती तक नहीं।

अब कोई मुझे गलत न समझे। नए नियम में, मेरी दृष्टि में, यह बात अत्यन्त स्पष्ट रूप से सिखाई गई है कि कलीसिया की सेवा के लिए मनुष्यों का एक अलग वर्ग होना था। हमें बताया गया है कि पौलुस ने "हर एक कलीसिया में प्राचीन ठहराए" (प्रेरितों के काम 14:23)। देखिए 1 कुरिन्थियों 12:28; इफिसियों 4:11; तीमुथियुस की पहली और दूसरी पत्री; और तीतुस। परन्तु यह कि किसी नगर या देश की "कलीसिया" से विशेष रूप से सामान्य विश्वासियों का अर्थ था, और सेवक केवल "कलीसिया के दास" (2 कुरिन्थियों 4:5) माने जाते थे, मुझे दोपहर के सूर्य के समान स्पष्ट प्रतीत होता है। जहाँ तक ऐसी कलीसिया का प्रश्न है जिसमें पादरी-वर्ग अकेला ही कार्य करता, सब कुछ तय करता, सब कुछ निर्णय करता, सब कुछ का न्याय करता और सब कुछ का प्रबन्ध करता, और सामान्य विश्वासियों की कोई आवाज़ ही न होती, तो नए नियम के प्रेरितों के काम या पत्रियों में मुझे ऐसी बात की छाया की छाया का भी चिह्न नहीं मिलता। इसके विपरीत, जहाँ पौलुस थिस्सलुनीकियों से कहता है कि वे "अपने सेवकों को बहुत ही आदर के योग्य समझें", वहाँ ये शब्द कि "जो ठीक चाल नहीं चलते उन्हें समझाओ, कायरों को ढाढ़स दो, निर्बलों को सम्भालो" (1 थिस्सलुनीकियों 5:14), वह पादरी-वर्ग से नहीं बल्कि सामान्य विश्वासियों से कहता है। मुझे आशा है कि जो कलीसिया-जन हमारी अंग्रेज़ी कलीसिया के छठे अनुच्छेद को स्मरण रखते हैं, वे इस पर ध्यान देना न भूलेंगे।

इस लेख में आगे बढ़ने से पहले, मैं उचित समझता हूँ कि सम्भावित गलतफ़हमी रोकने के लिए अपनी सफ़ाई में कुछ शब्द कहूँ। यदि कोई यह समझता है कि मैं पादरी-वर्ग की हानि पर सामान्य विश्वासियों की स्थिति को ऊँचा और बढ़ा-चढ़ाकर दिखाना चाहता हूँ, और सेवकाई के पद को तुच्छ समझता हूँ, तो वह पूरी तरह भूल में है। मसीही सेवकाई को मसीह की विधि और पतित संसार की आवश्यकता के रूप में मूल्यवान समझने की गहरी भावना में मैं किसी से पीछे नहीं हूँ। परन्तु इस विषय में मैं पवित्रशास्त्र की सीमाओं को लाँघने का साहस नहीं करता। मैं यह कहे बिना नहीं रह सकता कि याजकीय सेवकाई, मध्यस्थता करनेवाली सेवकाई, अचूक सेवकाई, ऐसे मनुष्यों की सेवकाई जिनके पास अध्यक्षीय अभिषेक के बल पर ज्ञान का कोई एकाधिकार हो, या विश्वास अथवा विधि-विधान के विवादित प्रश्नों को निपटाने की कोई विशेष सामर्थ्य हो — ऐसी सेवकाई मेरे विचार में मनुष्य की गढ़ी हुई नई बात है और पवित्रशास्त्र के किसी अधिकार पर आधारित नहीं। यह वह सेवकाई है जो यहूदी कलीसिया की प्रतीकात्मक व्यवस्था से उधार ली गई है, और वर्तमान युग में उसका कोई स्थान नहीं। मसीही सेवक एक शिक्षक, एक राजदूत, एक संदेशवाहक, एक पहरुआ, एक साक्षी, एक चरवाहा और एक भण्डारी है, और तीमुथियुस और तीतुस की पत्रियों में उसे स्पष्ट रूप से अधिकार दिया गया है, जहाँ उसके कर्तव्य साफ़-साफ़ बताए गए हैं। परन्तु इस बात का नए नियम में कोई प्रमाण स्पष्ट रूप से अनुपस्थित है कि वह बलिदान चढ़ानेवाला याजक है।

यह कहने में मैं अकेला नहीं हूँ। डरहम के विद्वान अध्यक्ष अपनी फिलिप्पियों पर लिखी विस्तृत रचना में निम्नलिखित भाषा का प्रयोग करते हैं: —

"मसीह के राज्य में कोई याजकीय व्यवस्था नहीं है। वह परमेश्वर और मनुष्य के बीच बलिदान चढ़ानेवाला कोई गोत्र या वर्ग नहीं खड़ा करता, जिसकी बिनतियों से ही परमेश्वर मेल करे और मनुष्य क्षमा पाए। प्रत्येक सदस्य की ईश्वरीय शिर के साथ व्यक्तिगत सहभागिता है। वह सीधे उसी के प्रति उत्तरदायी है, और उसी से सीधे क्षमा पाता और सामर्थ्य लेता है" (पृ. 174, संस्करण 3)।

फिर वे कहते हैं: "याजक की उपाधि कलीसिया के सेवकों को कभी एक बार भी नहीं दी गई। सुसमाचार के अधीन नए नियम में याजक के रूप में जिन्हें बताया गया है, वे केवल पवित्र लोग हैं, अर्थात् मसीही भाईचारे के सदस्य" (पृ. 132, संस्करण 3)।

यह ऐसी खरी बात है जिसकी निन्दा नहीं की जा सकती।

यह 1868 में पहली बार प्रकाशित हुई, और अठारह वर्षों की आलोचना की कसौटी पर खरी उतरी है, और इसके सिद्धान्तों का कोई उत्तर नहीं दिया गया है और न दिया जा सकता है। मैं इन सिद्धान्तों पर दृढ़ता से स्थिर हूँ, और आज के सब अंग्रेज़ कलीसिया-जनों के विचार के लिए इन्हें आग्रहपूर्वक प्रस्तुत करता हूँ।

अब मैं प्रेरितिक कलीसियाओं के सामान्य सदस्यों के विषय को यहीं छोड़ता हूँ, और इसे इस निबन्ध के सब पाठकों के ध्यान में सौंपता हूँ। मेरा दृढ़ विश्वास है कि इन आदिकालीन समुदायों में सामान्य विश्वासियों को जो प्रमुख स्थान प्राप्त था, वही उनके निर्विवाद बल, वृद्धि, समृद्धि और सफलता का एक बड़ा रहस्य था। उन दिनों कोई निष्क्रिय साझेदार नहीं होते थे। कलीसिया रूपी देह का हर सदस्य काम करता था। हर एक अपने आप को कुछ न कुछ करने के लिए बाध्य समझता था। यदि हम रोमियों की पत्री के 16वें अध्याय से अनुमान लगा सकें, तो सब बपतिस्मा पाए हुए सदस्य, चाहे पुरुष हों या स्त्रियाँ, सम्पूर्ण कलीसिया रूपी देह के कल्याण और उन्नति में प्रत्यक्ष और सक्रिय रुचि लेते थे। वे सीधी-सादी, अज्ञानी भेड़ें नहीं थीं जिन्हें कोई निरंकुश चरवाहा अपने संकेत पर इधर-उधर हाँकता रहे। सेना की सर्वश्रेष्ठ टुकड़ी वही होती है जिसमें अधिकारी और सिपाही, दोनों पूरी टुकड़ी की कार्यक्षमता में समान रुचि रखते हैं। यह वह उत्साह है जिसमें अधिकारी सिपाहियों पर और सिपाही अधिकारियों पर भरोसा रखते हैं, जैसा उन्होंने ज़ुलू युद्ध में रोर्क्स ड्रिफ्ट की उस अविस्मरणीय रात को लड़ते हुए रखा था। यह वह टुकड़ी है जिसका हर सिपाही समझदार है और ऐसे व्यवहार करता है मानो अभियान की सफलता उसी पर निर्भर हो। यह वह टुकड़ी है जिसका हर सिपाही अपना कर्तव्य जानता है, अपने पेशे पर सम्मानपूर्वक गर्व करता है, और झण्डे के लिए अन्तिम साँस तक लड़ता रहेगा, चाहे सब अधिकारी गिर जाएँ। प्रेरितों के दिनों की आदिकालीन कलीसिया ऐसी ही टुकड़ी थी। उसके अपने अधिकारी थे, उसके अध्यक्ष और डीकन थे। उसमें श्रेणियाँ, उचित अधीनता और अनुशासन था। परन्तु उसके बल की मुख्य प्रेरक शक्ति और रीढ़ उसके सामान्य विश्वासियों का उत्साह, समझ और सक्रियता थी। काश, इंग्लैंड की कलीसिया के संगठन में भी कुछ ऐसा ही होता!

II. दूसरी बात जो मैं करना चाहता हूँ, वह यह है कि पिछली दो शताब्दियों में और आज के दिन इंग्लैंड की कलीसिया के सामान्य विश्वासियों की स्थिति की जाँच करूँ।

आइए, हम एक परिभाषा से आरम्भ करें। जब हम अपनी स्थापित कलीसिया के सामान्य विश्वासियों की बात करते हैं, तो हमारा क्या अर्थ होता है? हमारा अर्थ स्वाभाविक रूप से उन सब से है जो उसके घेरे में हैं और जिन्हें किसी सेवकाई-पद के लिए नियुक्त नहीं किया गया है। हमारा अर्थ कलीसिया के लोगों से है, जो पादरी-वर्ग से भिन्न हैं। वे कितना अत्यन्त महत्त्वपूर्ण समूह हैं, यह कहना अनावश्यक है। ऐसी बात पर देर तक ठहरना समय की बर्बादी होगी। सामान्य सदस्यों के बिना कलीसिया का अस्तित्व मुश्किल से ही कहा जा सकता है। निस्सन्देह यह पुरानी कहावत सत्य है, "Ubi tres, ibi ecclesia" (जहाँ तीन हैं, वहाँ कलीसिया है)। परन्तु बिना सेना का सेनापति, बिना टुकड़ी का कर्नल, या बिना नाविकों का जहाज़ का कप्तान उतना निरर्थक और असहाय नहीं, जितनी वह कलीसिया है जिसमें सामान्य विश्वासियों के बिना केवल पादरी हों। इंग्लैंड की कलीसिया में तो कम से कम इस समय सामान्य जनों की कोई कमी नहीं है। प्रत्येक पादरी के अनुपात में सम्भवतः 500 सामान्य जन हैं। इसलिए केवल संख्या की दृष्टि से ही, अन्य सब बातों को छोड़कर भी, सामान्य विश्वासी इंग्लैंड की कलीसिया का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भाग हैं। अब मेरा तर्क यह है कि हमारे सामान्य कलीसियाई जनों की स्थिति इस समय नए नियम के स्तरों से बहुत नीचे है, और इसलिए बहुत असन्तोषजनक है। मैं इसे मसीही विश्वास का एक नियम और स्वयंसिद्ध सत्य मानता हूँ कि कलीसिया जितना पवित्रशास्त्र के आदर्श के निकट पहुँचती है उतनी ही अच्छी होती है, और जितना उससे दूर जाती है उतनी ही बुरी। इससे इनकार करना व्यर्थ है कि हमारी कलीसिया की वास्तविक कार्य-व्यवस्था और प्रशासन में, उसके प्रबन्धों, योजनाओं, परियोजनाओं और सामान्य संगठन में सामान्य सदस्यों के लिए तुलनात्मक रूप से कोई स्थान ही नहीं है! क्या अध्यक्ष लैम्बेथ महल में गम्भीर सभा में एकत्र होकर हमारे सिय्योन की दशा पर विचार करते हैं? वहाँ सामान्य जनों के लिए कोई स्थान नहीं है।—क्या कॉन्वोकेशन अपना वार्षिक वाद-विवाद करती है? उसमें सामान्य जनों का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है।—क्या किसी धर्मप्रान्त का अध्यक्ष अपने धर्मासन के कार्य के लिए अपने वार्षिक प्रबन्ध करता है? क्या उसे अनुशासन के विषय में, या किसी दोषी पादरी से निपटने के सर्वोत्तम उपाय के विषय में कोई कठिन समस्या सुलझानी है? उसके पास सामान्य जनों की कोई परिषद नहीं है।—क्या कोई रिक्त वृत्ति या पादरी-पद भरना है? नियुक्ति बिना इस बात का तनिक भी विचार किए की जाती है कि पल्ली-निवासियों की क्या राय है। मैं केवल सीधे-सादे तथ्य कह रहा हूँ। मैं किसी को चुनौती देता हूँ कि वह उनकी सत्यता से इनकार करे।

निस्सन्देह मुझे याद दिलाया जाएगा कि हमारी कलीसिया में सामान्य जनों का प्रतिनिधित्व चर्चवार्डनों द्वारा होता है, जो हर ईस्टर पर चुने जाते हैं और प्रतिवर्ष आर्चडीकन या अध्यक्ष के निरीक्षण में बुलाए जाते हैं। मैं यह बिलकुल नहीं भूला हूँ। उत्तर में मैं केवल यह पूछता हूँ कि क्या चर्चवार्डन, एक नियम के रूप में, आत्मिक योग्यताओं का बहुत कम ध्यान रखकर नहीं नियुक्त किए जाते? मैं पूछता हूँ कि क्या निरीक्षण-सभाओं में उनकी वार्षिक उपस्थिति सामान्यतः मात्र एक औपचारिकता और रस्म नहीं है? कितने चर्चवार्डन निरीक्षण के विषय में इसके सिवा कुछ जानते हैं कि वे किसी निश्चित नगर में जाते हैं, किसी नीरस विषय पर कोई आदेश-भाषण सुनते हैं जिसे सम्भवतः वे समझते भी नहीं, शायद अन्य चर्चवार्डनों के साथ भोजन करते हैं, और फिर घर लौट जाते हैं? कितने चर्चवार्डन यह पद इस थोड़े-से भी विचार के साथ स्वीकार करते हैं कि कलीसिया के सब कामों में निरन्तर सक्रिय रुचि लेंगे? उनमें से कितनों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे कलीसिया के सिद्धान्तों, रीतियों, शासन, कठिनाइयों, परियोजनाओं या योजनाओं के विषय में कुछ जानें? वे प्रायः अत्यन्त उत्तम पुरुष होते हैं और उत्तम सेवा करने में समर्थ होते हैं। परन्तु व्यवहार में उनसे बहुत कम या कुछ भी अपेक्षा नहीं की जाती, और सांसारिक तथा आर्थिक कार्य के सिवा उन्हें करने को बहुत कम या कुछ भी नहीं दिया जाता। जो मनुष्य सोचता है कि चर्चवार्डन का पद कलीसिया में सामान्य जनों की स्थिति के नए नियम के विचार को पूरी तरह पूर्ण कर देता है, उसने अपनी सामान्य बुद्धि को अलविदा कह दिया होगा। मैं भली-भाँति जानता हूँ कि कुछ अपवादस्वरूप चर्चवार्डन हैं जो सचमुच कलीसिया के लिए बड़े काम करते हैं। परन्तु वे इतने उज्ज्वल अपवाद हैं कि वे मेरे नियम की सत्यता को ही सिद्ध करते हैं। यदि सब चर्चवार्डन सदा अपना कर्तव्य निभाते, जैसे कुछ चर्चवार्डन कभी-कभी निभाते हैं, तो इंग्लैंड की कलीसिया आज की कलीसिया से कहीं अधिक सशक्त कलीसिया होती।

निश्चय ही मुझे फिर याद दिलाया जाएगा कि कलीसिया की सभाओं और सम्मेलनों में सामान्य जन-सदस्य एक प्रमुख स्थान रखते हैं, और धार्मिक संस्थाओं की समितियों में बहुत उपयोगी पद भी सँभालते हैं। मैं इस बात से भली-भाँति परिचित हूँ, परन्तु यह प्रश्न से बिलकुल बाहर की बात है। ये सब शुद्ध रूप से स्वैच्छिक व्यवस्थाएँ हैं, जो कलीसिया की अधिकृत और सामान्य कार्य-प्रणाली का कोई भाग नहीं हैं। मैं कलीसिया की संगठित व्यवस्था को देख रहा हूँ, न कि असाधारण सामान्य जन-स्वयंसेवकों की स्वैच्छिक सेवा को।

परन्तु कोई फिर मुझे स्मरण दिलाएगा कि हाउस ऑफ कॉमन्स इंग्लैंड की कलीसिया के सामान्य जनों का प्रतिनिधित्व करता है। निश्चय ही इसके विषय में जितना कम कहा जाए उतना ही अच्छा है! जो मनुष्य इस प्रकार बोलता है, उसने इतिहास को बहुत ही कम लाभ के साथ पढ़ा है, या वह 200 वर्ष से सोया हुआ है। हम 1686 में नहीं, 1888 में जी रहे हैं। यह सुखद पुराना सिद्धान्त कि कलीसिया और राज्य एक ही विस्तार के और एक समान हैं, बहुत पहले हवा में विलीन हो चुका है, और बीती बात हो गया है। हाउस ऑफ कॉमन्स निःसन्देह एक शक्तिशाली संस्था है, और "जो कुछ वह देखती है उसकी स्वामिनी" है। परन्तु अब वह केवल "कलीसिया के सदस्यों" की सभा नहीं रही। इसके अतिरिक्त, यह सर्वविदित है कि कोई विषय ऐसा नहीं जिस पर चर्चा करने की हाउस ऑफ कॉमन्स को धर्म से कम परवाह हो, और कोई धार्मिक हित ऐसे नहीं जिनकी उसके हाथों इंग्लैंड की कलीसिया के हितों से अधिक दुर्दशा होती हो।

परन्तु दुर्भाग्य से बात इतनी ही नहीं है। इसके पीछे कुछ और भी है। हमारी कलीसिया के सामान्य जन मसीह के सीधे कार्य में और देश में मसीही धर्म को आगे बढ़ाने में वहाँ नहीं हैं जहाँ उन्हें होना चाहिए। सारा धर्म-कर्म गाँव के पादरी पर छोड़ देने की एक हानिकारक आदत सारे देश में फैल गई है, और कलीसिया के अधिकांश सामान्य सदस्य यह समझते प्रतीत होते हैं कि कलीसिया से उनका कोई सम्बन्ध नहीं सिवाय इसके कि वे उसके अनुग्रह के साधनों का लाभ उठाएँ, जबकि कलीसिया की कार्यक्षमता बढ़ाने के लिए वे स्वयं सक्रिय परिश्रम के रूप में कुछ भी योगदान नहीं देते। कलीसिया जानेवालों की अपार बहुसंख्या यह मानती दिखाई देती है कि जब वे रविवार को कलीसिया चले गए और प्रभु-भोज में सम्मिलित हो लिए, तो उन्होंने अपना कर्त्तव्य पूरा कर लिया, और दूसरों को चेतावनी देने, सिखाने, डाँटने, उन्नति करने, दया के कार्यों को बढ़ावा देने, सुसमाचार-प्रचार में सहायता करने, या पाप को रोकने और संसार में मसीह के कार्य को आगे बढ़ाने में उँगली तक उठाने का उन पर ज़रा भी दायित्व नहीं है। उनका एकमात्र विचार यही है कि निरन्तर पाते रहें, पर स्वयं कुछ भी न करें। वे सही गाड़ी में अपनी सीटों पर बैठ गए हैं, और उन्हें बस चुपचाप बैठे रहना है, जबकि पादरी-रूपी इंजन उन्हें स्वर्ग की ओर खींच ले जाता है, शायद उनके आधे सोते-सोते। यदि इफिसुस, फिलिप्पी या थिस्सलुनीके का कोई सामान्य कलीसिया-सदस्य मरे हुओं में से जी उठे और देखे कि सामान्य जन-सदस्य अंग्रेज़ी कलीसिया के लिए कितना कम काम करते हैं, तो वह अपनी आँखों पर विश्वास न करेगा। आरम्भिक काल के सामान्य कलीसिया-सदस्य और अंग्रेज़ी सदस्य में उतना ही अन्तर है जितना ज्योति और अन्धकार, श्वेत और श्याम में। एक जागता हुआ और जीवित था, और सदा अपने स्वामी के काम में लगा रहता था। दूसरा बहुधा व्यवहार में सोया हुआ, सुस्त और निठल्ला है, और गाँव का धर्म-कर्म पादरी के हाथ में छोड़कर सन्तुष्ट है। दोनों ने बपतिस्मा लिया है। दोनों अनुग्रह के साधनों का उपयोग करते हैं। दोनों उपदेश सुनते हैं, और अपने को मसीही कहते हैं। परन्तु एक की कलीसियाई सदस्यता दूसरे से बिलकुल भिन्न है। जब ऐसा है, और कौन इसे नकारेगा, तो हमारे संगठन में कुछ पीड़ादायक रूप से अनुचित अवश्य है। यदि फिलिप्पी का सामान्य कलीसिया-सदस्य सही था, तो अंग्रेज़ी सामान्य सदस्य सही नहीं हो सकता। हम तराज़ू में तौले गए और घटी में पाए गए हैं। आम बोलचाल की भाषा ही इसका स्पष्ट प्रमाण है कि कहीं कुछ खेदजनक रूप से अनुचित है। आजकल "कलीसिया" का अर्थ "पादरी-वर्ग" हो गया है; और जब कोई युवक अभिषिक्त होने का प्रस्ताव रखता है, तो उसके मित्र कहते हैं कि वह "कलीसिया में जा रहा है", मानो वह बहुत पहले से कलीसिया में था ही नहीं!

अपनी कलीसिया और उसके संविधान का भरसक अच्छा पक्ष लेने की पूरी इच्छा के होते हुए भी, मैं इस निष्कर्ष से बच नहीं सकता कि सामान्य जनों के विषय में उसकी व्यवस्था इस समय दोषपूर्ण और पवित्रशास्त्र से नीची है। मैं 1888 में अंग्रेज़ी एपिस्कोपल सामान्य सदस्य की स्थिति का मेल अठारह शताब्दी पहले किसी प्रेरितिक कलीसिया में उसके भाई की स्थिति से नहीं बैठा सकता। मैं इन दोनों बातों को आपस में नहीं मिला सकता। मेरी दृष्टि में ऐसा प्रतीत होता है कि इंग्लैंड की कलीसिया के नियमित कार्य में प्रायः सब कुछ पादरी-वर्ग के हाथों में छोड़ दिया गया है, और सामान्य जनों को लगभग कुछ भी नहीं सौंपा गया! पादरी सब कुछ तय करते हैं! पादरी सब कुछ संचालित करते हैं! पादरी सब कुछ व्यवस्थित करते हैं! सामान्य जनों को व्यवहार में न कोई आवाज़ दी गई है, न स्थान, न राय, न अधिकार, और उन्हें वही स्वीकार करना पड़ता है जो पादरी उनके लिए ठहराते हैं। इस सब में कोई जान-बूझकर किया गया अनादर नहीं है। सामान्य जनों की विश्वसनीयता और योग्यता पर रत्ती भर भी आक्षेप अभिप्रेत नहीं है। परन्तु किसी न किसी कारण से वे ठण्ड में बाहर छोड़ दिए गए हैं, एक विशाल कलीसियाई निगम में सक्रिय सदस्य नहीं, केवल निष्क्रिय ग्रहणकर्ता हैं, एक भारी-भरकम और बुरी तरह चलाए जा रहे कारोबार में कार्यकर्ता नहीं, केवल सोते हुए साझेदार हैं। संक्षेप में, इंग्लैंड की कलीसिया के सामान्य संचालन में सामान्य सदस्यों को किनारे की पटरी पर खड़ा कर दिया गया है। अनावश्यक सैनिकों की भाँति वे पंक्तियों से बाहर हो गए, पीछे हट गए, और दृष्टि से ओझल हो गए हैं।

अब, इस विचित्र स्थिति का सच्चा कारण क्या है? यह ऐसा कारण है जिसे सरलता से पहचाना जा सकता है। अंग्रेज़ साधारण विश्वासियों की स्थिति और कुछ नहीं, बस पोपवाद का एक चिथड़ा और बचा-खुचा अंश है। यह उस "damnosa haereditas" का भाग है जो रोम ने हमारी कलीसिया के लिए छोड़ी, और जो कभी पूरी तरह से धोई नहीं गई। हमारे धर्म-सुधारक स्वयं सिद्ध पुरुष नहीं थे, और महारानी एलिज़ाबेथ की स्वभावगत ईर्ष्या ने उन्हें अंग्रेज़ी धर्म-सुधार का कार्य पूरा करने से रोक दिया। अन्य जिन कलंकों को उन्होंने हमारी कलीसिया के मुख पर छोड़ दिया, उनमें साधारण विश्वासियों के हितों की उपेक्षा, मुझे दुःख के साथ स्वीकार करना पड़ता है, सबसे छोटा कलंक नहीं था। पादरी-वर्ग को मसीह और मनुष्य के बीच मध्यस्थ बनाना, उन्हें साधारण विश्वासियों से बहुत ऊपर उठाना और सारी कलीसियाई सत्ता उनके हाथों में रख देना, उन्हें याजकीय अधिकार पहनाना और कलीसिया के सब विषयों में उन्हें अचूक मार्गदर्शक मानना, यह सदा रोमी व्यवस्था का एक अनिवार्य तत्त्व रहा है। हमारे धर्म-सुधारकों को निःसन्देह चाहिए था कि वे साधारण विश्वासियों को अधिक शक्ति देकर इस तत्त्व को सुधारते, जैसा जॉन नॉक्स ने स्कॉटलैंड में किया। उन्होंने ऐसा नहीं किया, या तो समय के अभाव के कारण या राजकीय अनुमति के अभाव के कारण। इस चूक का दुःखद फल यह हुआ है कि धीरे-धीरे हमारी कलीसिया के विषयों में प्रमुख अधिकार लगभग पूरी तरह पादरी-वर्ग के हाथों में चला गया, और साधारण विश्वासियों को उनके उचित अधिकारों और शक्तियों के बिना छोड़ दिया गया। आज इसका परिणाम यह है कि अंग्रेज़ साधारण विश्वासी उस स्थान से बहुत नीचे हैं जो उन्हें मिलना चाहिए, और अंग्रेज़ पादरी-वर्ग अपने स्थान से बहुत ऊपर है। संक्षेप में, दोनों पक्ष ग़लत स्थान पर हैं।

इस असन्तोषजनक स्थिति के परिणाम क्या हैं? वे ठीक वैसे ही हैं जैसे अपेक्षित थे, बुरे और केवल बुरे। परमेश्वर की मनसा से हट जाना, चाहे वह छोटी से छोटी बातों में ही क्यों न हो, सदा कड़वा फल लाता है। अपने उचित स्थान से ऊपर उठाए जाने के कारण अंग्रेज़ पादरी-वर्ग सदा याजकवाद, पुरोहितवाद, आत्म-अभिमान, और अपने विशेषाधिकारों और शक्तियों के अत्यधिक अनुमान की ओर झुका रहा है। अपने उचित स्थान से नीचे गिरा दिए जाने के कारण, इक्के-दुक्के उज्ज्वल अपवादों को छोड़कर, अंग्रेज़ साधारण विश्वासियों ने कलीसिया के विषयों में बहुत कम रुचि ली है, और वे कलीसियाई हर बात को पादरी-वर्ग के प्रबन्ध पर छोड़ देने को बहुत तैयार रहे हैं। इस बीच तीन सदियों से इंग्लैंड की स्थापित कलीसिया को भारी और लगभग असाध्य हानि पहुँची है।

बहुत कम सोचे जाने, बहुत कम परामर्श लिए जाने, बहुत कम शक्ति सौंपे जाने और बहुत कम अधिकार दिए जाने के कारण, अंग्रेज़ साधारण कलीसिया-सदस्य प्रायः कलीसिया के प्रश्नों के विषय में अनजान, उदासीन या निरुत्साही रहता है। कितने कम साधारण विश्वासी अपने ही धर्म-प्रदेश के कलीसियाई कार्य के विषय में कुछ जानते हैं! कितने कम 'कन्वोकेशन' की रत्ती भर भी परवाह करते हैं! कितने कम लोग, यदि उनके प्राण उसी पर निर्भर हों, तो भी बता सकेंगे कि उनके धर्म-प्रदेश के प्रॉक्टर कौन हैं! कितने कम लोग उन बड़े सैद्धान्तिक विवादों का अर्थ समझते हैं जिनसे उनकी कलीसिया लगभग टुकड़े-टुकड़े हो रही है! कितने कम लोग उनमें उतनी निजी रुचि या चिन्ता दिखाते हैं जितनी कोलोसियम के अखाड़े में दो मल्लयोद्धाओं की लड़ाई के विषय में किसी रोमी दर्शक ने दिखाई होती! कितने कम लोग इससे अधिक कुछ बता सकेंगे कि "पादरियों में कोई झगड़ा चल रहा है; और हम उसे समझने का दावा भी नहीं करते!" यह एक उदास करनेवाला चित्र है; पर मुझे भय है कि यह खेदजनक रूप से सही है। फिर भी कौन आश्चर्य कर सकता है? इंग्लैंड की कलीसिया के प्रबन्ध में अंग्रेज़ साधारण विश्वासियों को अब तक अपना उचित स्थान कभी नहीं मिला।

आप इसे एक अचूक नियम मान सकते हैं कि किसी मनुष्य को किसी काम में रुचि दिलाने का सबसे अच्छा तरीका उसे उस "संस्था का एक अंग" बनाना है। यह नियम व्यापारिक संस्थाओं पर जितना लागू होता है उतना ही कलीसियाई संस्थाओं पर भी।

स्कॉटलैंड के प्रेस्बिटेरियन, अंग्रेज़ नॉनकन्फ़ॉर्मिस्ट, अमेरिकी एपिस्कोपल और उपनिवेशों के एपिस्कोपल, सब इस सिद्धान्त का महत्त्व समझते हैं और इसे लागू करने का ध्यान रखते हैं। केवल इंग्लैंड की कलीसिया ने इस सिद्धान्त को पूरी तरह दृष्टि से खो दिया है। साधारण विश्वासियों को कभी वैसे उपयोग में नहीं लाया गया, न उन पर भरोसा किया गया, न उन्हें महत्त्व दिया गया, न आगे बुलाया गया, न उनसे परामर्श लिया गया, न उन्हें पद पर बिठाया गया, न उन्हें अधिकार से सज्जित किया गया, जैसा कि होना चाहिए था। परिणाम यह है कि एक समुदाय के रूप में वे कलीसिया के विषयों के बारे में न जानते हैं, न परवाह करते हैं, न अनुभव करते हैं, न समझते हैं, न सोचते हैं, न पढ़ते हैं, न अपने मन को लगाते हैं, न अपना सिर अधिक खपाते हैं। जिस व्यवस्था के अधीन यह स्थिति पनपी है, वह एक विशाल भूल है। जितनी जल्दी इसे जड़ से काटकर उलट दिया जाए, उतना अच्छा। यदि हम अपनी कलीसिया की वर्तमान दुर्बलता के एक बड़े कारण को दूर करना चाहते हैं, तो हमें साधारण विश्वासियों की स्थिति को पूरी तरह बदलना होगा। इस बात में, यदि और किसी में नहीं, तो कलीसिया-सुधार की बड़ी आवश्यकता है।

3. अब अन्त में, हम अपने तात्कालिक कर्तव्य पर विचार करें। इंग्लैंड की स्थापित कलीसिया को सुदृढ़ करने के लिए साधारण विश्वासियों के विषय में हमारा लक्ष्य क्या होना चाहिए?

जब मैं लक्ष्यों की बात करता हूँ, तो मुझे व्यावहारिक ब्यौरों पर आना होगा, और मैं ठीक-ठीक यह कहने से नहीं हिचकिचाऊँगा कि मेरा अभिप्राय क्या है। एक क्षण के लिए मान लीजिए कि हमने अन्ततः जान लिया है कि हमारे साधारण कलीसिया-सदस्य अपने उचित स्थान पर नहीं हैं। इस बुराई का उपाय क्या है? कौन-सा परिवर्तन आवश्यक है? क्या किया जाना चाहिए?

इन प्रश्नों के जो उत्तर कुछ लोग देते हैं, वे इतने बचकाने, निर्बल और अपर्याप्त हैं कि उनका नाम लेते हुए भी मुझे लज्जा आती है। वे बड़े शान्त भाव से हमें बताते हैं कि साधारण विश्वासी लोग सामान्य प्रचारक और पवित्रशास्त्र-पाठक बन सकते हैं, यद्यपि मुझे स्मरण है कि एक समय यह भी एक चौंकानेवाला नयापन माना जाता था। वे उपदेश भी दे सकते हैं और छोटे-छोटे भाषण भी, रविवार की पाठशालाएँ चला सकते हैं और पल्ली के भेंटकर्ता बन सकते हैं, सुधारगृहों और शरणगृहों का प्रबन्ध कर सकते हैं, समितियों में उपस्थित हो सकते हैं और कलीसिया के वित्त की देखरेख कर सकते हैं! मेरा उत्तर यह है कि ऐसे सारे सुझाव हास्यास्पद रूप से सही स्तर से बहुत नीचे हैं, और कलीसिया की आवश्यकता के विषय में शोचनीय अज्ञानता प्रकट करते हैं। मुझे आश्चर्य होता है कि समझदार लोग इन्हें प्रस्तुत करने का साहस कैसे कर लेते हैं। ओह, कैसी महान कृपा! ओह, कैसी अद्भुत उदारता! हम साधारण जनों को वह मोटा-मोटा काम करने देंगे जो उनके बिना हो ही नहीं सकता, और जिसके लिए उन्हें पादरी-वर्ग से अनुमति माँगने की कोई आवश्यकता नहीं! यदि "साधारण जनों के सहयोग" की बात करते समय लोगों का इतना ही अर्थ है, तो मुझे उन पर तरस आता है। ऐसे उपचार से हमारे सिय्योन के घाव नहीं भरेंगे। ऐसे सुधारों से हमारे साधारण जनों की ठण्डी पड़ चुकी सहानुभूति फिर नहीं जीती जा सकेगी, और वे इंग्लैंड की कलीसिया की दाहिनी भुजा नहीं बन पाएँगे।

हमारे साधारण जनों की स्थिति में जिस सुधार की मैं विनती करता हूँ, वह कहीं अधिक गहरा, ऊँचा, व्यापक, विस्तृत, सम्पूर्ण और पूरा सुधार है। मैं इस महान सिद्धान्त को सर्वत्र मान्यता दिए जाने की विनती करता हूँ कि कलीसिया में कुछ भी, चाहे बड़ी बातों में हो या छोटी बातों में, साधारण जनों के बिना नहीं किया जाना चाहिए। मेरा तर्क है कि कलीसिया जो कुछ कहती और करती है, उस सब में साधारण जनों का भाग, वाणी, हाथ और मत होना चाहिए, केवल मण्डली में अभिषेक करने और सेवा करने को छोड़कर। मेरा तर्क है कि इंग्लैंड की कलीसिया की वाणी केवल अध्यक्षों और प्राचीनों की वाणी न हो, वरन् साधारण जनों की भी वाणी हो, और कलीसिया की कोई कार्रवाई कभी न की जाए, और कलीसिया की सम्मति की कोई अभिव्यक्ति कभी सामने न रखी जाए, जिसमें साधारण जनों का पादरी-वर्ग के बराबर भाग न हो। ऐसा सुधार नए नियम के सिद्धान्तों की ओर लौटना होगा। ऐसा सुधार इंग्लैंड की कलीसिया की शक्ति को सौ गुना बढ़ा देगा। ऐसे सुधार का ब्योरा क्या होना चाहिए, यह मैं अब समझाने जा रहा हूँ।

(क) यदि हम साधारण कलीसियाई जनों की स्थिति को प्रेरितों के समय के स्तर तक उठाना चाहते हैं, तो जिस इकाई से हमें आरम्भ करना चाहिए, वह निःसन्देह पल्ली है। देश के एक छोर से दूसरे छोर तक हमें इस महान सिद्धान्त को स्थापित करने का प्रयत्न करना चाहिए कि प्रत्येक पादरी अपने साधारण पल्लीवासियों से निरन्तर परामर्श करता रहे।

यदि उसे "पल्ली-परिषद" जैसा कठोर और औपचारिक सुनाई देनेवाला कोई नाम पसन्द न हो, तो भी वह कम से कम अपने कलीसिया-अभिभावकों, सहायकों और सहभागियों से अपने काम के विषय में प्रायः विचार-विमर्श करे। विशेष रूप से वह आराधना के समय और ढंग बदलने, नए अनुष्ठान, नई सजावट, नई मुद्राएँ और नई भंगिमाएँ अपनाने के विषय में अपने साधारण लोगों से परामर्श किए बिना कुछ न करे। कलीसिया उनकी है, उसकी नहीं; वह उनका सेवक है, वे उसके नहीं; उनसे परामर्श किए जाने का उन्हें निश्चय ही अधिकार है। कौन बता सकता है कि यदि पादरी सदा इसी प्रकार चलें तो कितनी ठेस पहुँचने से बचाई जा सकती है? मेरा विश्वास है कि साधारण कलीसियाई लोगों से अधिक समझदार कोई लोग नहीं होते, यदि उनके पास उचित रीति से जाया जाए और उनके साथ उचित रीति से व्यवहार किया जाए। सबसे बढ़कर, पल्ली का प्रत्येक अधिष्ठाता इस बात पर बल दे कि वह हर सहभागी को सिखाए कि वह इंग्लैंड की कलीसिया का अभिन्न अंग है और उसके कल्याण के लिए जो कुछ कर सकता है, करने को बाध्य है, अर्थात् भेंट करना, सिखाना, चेताना, समझाना, उन्नति करना, सहायता देना, सम्मति देना, सांत्वना देना, सँभालना और सुसमाचार सुनाना; सोए हुओं को जगाना, खोजियों को आगे ले चलना, पवित्र लोगों की उन्नति करना, और अपने वरदानों, समय और अवसर के अनुसार सर्वत्र मन फिराव, विश्वास और पवित्रता को बढ़ावा देना। वह अपने लोगों को शिक्षा दे कि वे आलसी आधुनिक रीति को छोड़ दें जिसमें सब कुछ पादरी पर छोड़ दिया जाता है, और सोए हुए साझेदार बने रहने के बदले सक्रिय कार्यकर्ता बनें। इस बात में, मुझे कहते हुए खेद होता है, मेथोडिस्ट और असहमत लोग कलीसियाई लोगों को बहुत पीछे छोड़ देते हैं। उनके यहाँ हर नया सदस्य उनके उद्देश्य के लिए एक नया देशीय मिशनरी है। इंग्लैंड की कलीसिया के लिए तब तक कुछ भी भला नहीं होगा जब तक उसका प्रत्येक सदस्य यह न समझ ले कि उसे अपनी कलीसिया के प्रति एक कर्तव्य निभाना है, और उस कर्तव्य को निरन्तर अपने सामने न रखे।

मैं इस बात से जानबूझकर आरम्भ करता हूँ। मुझे निश्चय है कि यह एक प्राणाधार बात है, और जिस पूरे विषय पर हम विचार कर रहे हैं उसकी जड़ में है। सबसे उत्तम बात यह कि यह ऐसा सुधार है जो तुरन्त आरम्भ किया जा सकता है, और इसे चलाने के लिए संसद के किसी अधिनियम की आवश्यकता नहीं। इसके लिए इंग्लैंड के रेक्टरों, विकारों और स्थायी सहायक पादरियों की ओर से केवल यही दृढ़ निश्चय चाहिए कि वे यह विषय अपनी-अपनी पल्लियों के सहभागियों के सामने रखें और उन्हें आगे आकर अपना कर्तव्य निभाने के लिए उभारें। मेरा विश्वास है कि यह बात उनकी मुट्ठी में है। मेरा विश्वास है कि साधारण जन इस आमन्त्रण का उत्तर देंगे, यदि वे एक बार यह समझ लें कि कलीसिया का स्वास्थ्य दाँव पर है और उनके लिए करने को काम है। सच तो यह है कि यह हमारे लिए भेंट का दिन है। हमारी स्थापित कलीसिया में यह कभी काम नहीं देगा कि दीवारों पर अधिकारियों को खड़ा किया जाए और सैनिक अपनी छावनियों में निठल्ले बैठे रहें। पादरी-वर्ग और साधारण जनों को मिलकर काम करना सीखना होगा। यदि हमारी कलीसिया को और अधिक समय तक टिके रहना है, तो हमारे यहाँ केवल सेवकों की प्रेरितीय परम्परा ही नहीं, वरन् साधारण जनों की भी प्रेरितीय परम्परा होनी चाहिए।

(ब) यदि हम कलीसिया के आम विश्वासियों को पवित्रशास्त्र के अनुसार उनके उचित स्थान पर ले आना चाहते हैं, तो अगली बात जिस पर हमारा ध्यान जाना आवश्यक है, वह यह है कि प्रत्येक पल्ली और मण्डली को अपने सेवकों की नियुक्ति में कुछ बोलने और मत देने का अधिकार देना नितान्त आवश्यक है। हमारी वर्तमान व्यवस्था की इस त्रुटि को उठाने के लिए मैं क्षमा नहीं माँगता, क्योंकि कलीसिया संरक्षण विधेयक में, जो संसद के सामने लाया जा रहा है, इसी का सीधा उल्लेख है। मैं मानता हूँ कि उस विधेयक के कुछ प्रावधानों की मुझे बहुत परवाह नहीं है, और यदि वे लॉर्ड सभा और कॉमन्स सभा की समितियों की कठिन परीक्षा से पार भी हो जाएँ, तो मुझे सन्देह है कि वे भली-भाँति काम करेंगे। परन्तु प्रस्तावित उपाय में एक धारा ऐसी है जो अत्यन्त सराहनीय है, और मैं गहरे सन्तोष के साथ उसका स्वागत करता हूँ। मेरा आशय उस धारा से है जो किसी भी पल्ली के निवासियों को यह अवसर देती है कि किसी पादरी का नाम घोषित होने के बाद एक निश्चित अवधि तक वे उसे अपने ऊपर नियुक्त किए जाने पर आपत्ति कर सकें। मैं इसे निश्चित रूप से सही दिशा में उठाया गया कदम मानता हूँ। मैं यह नहीं चाहता कि संरक्षण का अधिकार एक ही वर्ग के हाथों में केन्द्रित हो। उससे भी कम मैं यह चाहता हूँ कि पादरी पूरी तरह पल्लीवासियों या मण्डली द्वारा चुने जाएँ। परन्तु मैं यह अवश्य मानता हूँ कि सेवकों की नियुक्ति में लोगों की कुछ आवाज़ होनी चाहिए, और उन्हें किसी अयोग्य संरक्षक की दया पर नहीं छोड़ा जाना चाहिए, न ही उसके चुनाव पर कोई आपत्ति करने से रोका जाना चाहिए। हम सब जानते हैं कि अभिषेक से पहले “सि क्विस” पढ़ा जाना आवश्यक है, और मैं कहता हूँ कि प्रत्येक पदस्थापन से पहले भी “सि क्विस” की अपेक्षा की जानी चाहिए।

जीविका-पदों पर नियुक्ति की हमारी वर्तमान व्यवस्था आम विश्वासियों की पूरी तरह उपेक्षा करती है, और प्रायः घोर दुरुपयोग का कारण बनती है। ऐसे पादरी, जो अपने पद के लिए बिलकुल अयोग्य हैं, निरन्तर अनिच्छुक पल्लियों और विरक्त मण्डलियों पर थोप दिए जाते हैं, और लोगों को झुकना पड़ता है। परिणामस्वरूप पल्लीवासी कलीसिया से दूर हो जाते हैं, और राजकीय कलीसिया को ऐसी हानि पहुँचती है जिसकी भरपाई नहीं हो सकती। इस व्यवस्था को छोड़ देने का समय कब का आ चुका है। प्रत्येक संरक्षक से यह अपेक्षा की जाए कि वह जिस पादरी को रिक्त जीविका-पद के लिए नामित करना चाहता है, उसका नाम अध्यक्ष के सामने प्रस्तुत करने से एक मास पहले कलीसिया के अधिकारियों को भेजे। प्रस्तावित नए पदधारी का नाम विवाह-घोषणा की तरह कलीसिया में सार्वजनिक रूप से पढ़ा जाए, और लगातार तीन या चार रविवारों तक कलीसिया के द्वारों पर लगाया जाए, और हर किसी को आमन्त्रित किया जाए कि यदि वह कर सके तो आपत्ति करे। आपत्ति करनेवाले को बाध्य किया जाए कि वह अध्यक्ष और उसकी परिषद को सन्तुष्ट करे कि उसकी आपत्तियों के पीछे उचित कारण हैं, चाहे वे सैद्धान्तिक हों या व्यावहारिक, और अध्यक्ष तथा उसकी परिषद को यह अधिकार हो कि सन्तुष्ट होने पर वे संरक्षक के नामित व्यक्ति को अस्वीकार कर सकें। निस्सन्देह ऐसा सुरक्षा-उपाय प्रायः निष्फल भी हो सकता है। नामित व्यक्ति के विरुद्ध आपत्तियाँ अक्सर तुच्छ या सिद्ध न की जा सकने योग्य हो सकती हैं। परन्तु कम से कम एक सिद्धान्त तो स्थापित हो जाएगा। किसी पल्ली के आम विश्वासी फिर यह शिकायत नहीं कर सकेंगे कि उन्हें निरन्तर नए पादरियों के हवाले कर दिया जाता है और इस प्रक्रिया में उनकी ज़रा भी आवाज़ नहीं होती। मैं उन्हें स्मरण दिलाता हूँ कि एक अधिकार तो आज भी आम विश्वासियों के पास है, और मैं हृदय से चाहता हूँ कि वे उसका प्रयोग इससे अधिक बार करें। जब “सि क्विस” पढ़ा जाए, तब आपत्ति करके वे उन युवकों को अभिषिक्त होने से प्रभावी रूप से रोक सकते हैं जो पादरी-पद के योग्य नहीं हैं। इंग्लैंड की कलीसिया के लिए कितना अच्छा होता यदि इस विषय में आम विश्वासी सदा अपना कर्तव्य निभाते!

(स) आम विश्वासियों की स्थिति में जो तीसरा और अन्तिम सुधार हमें प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए, वह यह है कि सामान्यजन कलीसियाई सदस्यों को सम्पूर्ण कलीसिया के प्रशासन और प्रबन्ध में उनका उचित स्थान दिया जाए। मैं अपने दो आदरणीय अध्यक्ष-भाइयों से पूरी तरह सहमत हूँ कि हमें एक राष्ट्रीय कलीसिया परिषद की बड़ी आवश्यकता है, जो अध्यक्षों, प्राचीनों और आम विश्वासियों से मिलकर बनी हो।

ऐसी परिषद के पास कोई विधायी अधिकार नहीं होना चाहिए, और न ही उसे राजमुकुट के विशेषाधिकार या राजकीय सर्वोच्चता में ज़रा भी हस्तक्षेप करना चाहिए। इसलिए उसके गठन के लिए कानूनी अधिकार प्राप्त करने में कोई बड़ी कठिनाई नहीं होनी चाहिए, और गठित हो जाने पर उसे सन्देह की दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए। उसका मुख्य उद्देश्य पादरी-वर्ग और आम विश्वासियों को आमने-सामने लाना होना चाहिए, और उन्हें कलीसिया के कल्याण से जुड़े सब विषयों पर विचार करने योग्य बनाना, तथा आवश्यकता पड़ने पर उन्हें संसद के ध्यान में लाना। उसका मुख्य लाभ यह होगा कि जब वह संसद के सामने कोई ऐसा विषय लाएगी जिसके लिए कानून बनाना आवश्यक हो, तब वह कह सकेगी, “यह एक ऐसा विषय है जिस पर राजकीय कलीसिया के पादरी और आम विश्वासी सहमत हैं। उस कलीसिया के नाम पर हम आपसे निवेदन करते हैं कि इसे हाथ में लें और इसे देश का कानून बना दें।”

मुझे भय है कि कन्वोकेशन के किसी बड़े सुधार की आशा करना व्यर्थ है। कैन्टरबरी और यॉर्क के धर्मसभाएँ निस्सन्देह प्राचीन और आदरणीय हैं, फिर भी मेरे विचार में कोई यह न कहेगा कि वे सचमुच इंग्लैंड की कलीसिया का प्रतिनिधित्व करती हैं। यदि वे पादरी-वर्ग का समुचित प्रतिनिधित्व करतीं भी, तो यह निश्चित है कि वे साधारण विश्वासियों का प्रतिनिधित्व नहीं करतीं। यही अकेली एक बहुत बड़ी और असह्य त्रुटि है, और इसी कारण साधारण विश्वासी प्रायः कन्वोकेशन की कार्यवाही में कोई रुचि नहीं लेते। वे अनुभव करते हैं कि उन्हें बाहर ठण्ड में छोड़ दिया गया है, और वेस्टमिन्स्टर या यॉर्क की चर्चाओं में, चाहे विषय उनसे अत्यन्त निकट का सम्बन्ध ही क्यों न रखते हों, न उनकी कोई आवाज़ है, न मत, न स्थान, न भाग। इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं कि वे इसे पसन्द नहीं करते। परमेश्वर के वचन के अनुसार वे भी उतने ही "कलीसिया" हैं जितने पादरी। कलीसिया की भलाई में उनका भी उतना ही दाँव पर लगा है। वे प्रायः उतने ही शिक्षित, उतने ही बुद्धिमान, उतने ही सुविज्ञ, उतने ही आत्मिक मन के, और धर्म की "भिन्न-भिन्न बातों" को परखने में उतने ही समर्थ होते हैं जितना कोई पादरी। विवेकशील हूकर के ये शब्द स्मरण रखने योग्य हैं: "जब तक यह प्रमाणित न हो जाए कि मसीह की किसी विशेष व्यवस्था ने कलीसियाई कानून बनाने का अधिकार सदा के लिए अकेले पादरी-वर्ग को सौंप दिया है, तब तक हमें यही बात न्याय और विवेक के सर्वथा अनुकूल माननी चाहिए कि किसी मसीही राज्य में पादरी-वर्ग और साधारण विश्वासियों, दोनों की सहमति के बिना कोई कलीसियाई कानून न बनाया जाए।" (हूकर, पुस्तक 8, अध्याय 6।) यह साधारण सी बात ही कि अंग्रेज़ी कन्वोकेशन में साधारण विश्वासियों की इस समय न कोई आवाज़ है न स्थान, यह दिखाने के लिए पर्याप्त है कि यह संस्था इस युग के सर्वथा अनुपयुक्त और समय से पीछे है।

बेशक मैं यह नहीं भूलता कि कैन्टरबरी प्रान्त में साधारण विश्वासियों का एक सदन स्थापित किया गया है, जिसका स्पष्ट उद्देश्य परामर्शदात्री संस्था के रूप में और कन्वोकेशन के सहायक के रूप में कार्य करना है, और यॉर्क में भी वैसा ही सदन बनाने का निश्चय किया गया है। निस्सन्देह इन दोनों संस्थाओं की स्थापना सही दिशा में एक बड़ा कदम है। यह इस बात की सार्वजनिक स्वीकृति है कि अब वह समय आ गया है जब साधारण कलीसिया-सदस्यों से कहा जाना चाहिए कि वे स्थापित कलीसिया के कार्यों में अधिक सक्रिय रुचि लें, और इस बड़े कलीसियाई उद्यम में सोए हुए साझेदारों की उनकी पिछली निष्क्रिय स्थिति अब बनी नहीं रह सकती। साधारण विश्वासियों के अधिकारों और कर्तव्यों की इस विलम्ब से हुई स्वीकृति के लिए मैं बहुत धन्यवादी हूँ। एक बड़ा सिद्धान्त स्थापित हो चुका है, और मुझे आशा है कि घड़ी की सुइयाँ फिर कभी पीछे न घुमाई जाएँगी।

परन्तु यद्यपि मैं अपने निर्णय के अचूक होने का दावा नहीं करता, फिर भी आदरपूर्वक यह शंका प्रकट करना चाहता हूँ कि क्या ये साधारण विश्वासियों के नए सदन आज की आवश्यकताओं को पूरा करते हैं, या वे केवल एक अस्थायी जुगाड़ से अधिक कुछ हैं। साधारण विश्वासियों का सचमुच प्रतिनिधित्व करनेवाला सदन यॉर्क में एकत्र कराने की अत्यन्त कठिनाई के विषय में भी मैं कुछ कह सकता हूँ! परन्तु मैं इस पर नहीं रुकूँगा। मैं केवल तीन आपत्तियाँ बताऊँगा जिनका उत्तर देना मुझे सरल नहीं लगता।

(क) पहली बात यह कि साधारण विश्वासियों के इन सदनों की कोई वैधानिक हैसियत नहीं होगी, जब तक राजमुकुट और संसद उन्हें विधिवत् अधिकार न दें; वे केवल स्वैच्छिक वाद-विवाद सभाएँ बनकर रह जाएँगे। इसके विपरीत कन्वोकेशन राज्य की सबसे पुरानी वैधानिक संस्थाओं में से एक है। इन परिस्थितियों में ये दोनों संस्थाएँ साथ मिलकर कैसे काम करेंगी, यह बहुत स्पष्ट नहीं है। यह लोहे और मिट्टी को जोड़ने का प्रयास है। यह पुराने वस्त्र में नया टुकड़ा सीना है।

(ख) दूसरी बात यह कि साधारण विश्वासियों के इन सदनों के गठन, संरचना और चुनाव की रीति इस समय सन्तोषजनक होने से बहुत दूर दिखती है। यदि वे विभिन्न धर्मप्रान्तीय सम्मेलनों द्वारा चुने गए साधारण विश्वासियों से बने हों, तो वे निश्चय ही इंग्लैंड की कलीसिया के साधारण विश्वासियों का उचित प्रतिनिधित्व न होंगे। एक तो धर्मप्रान्तीय सम्मेलनों की संरचना एक समान नहीं है और इंग्लैंड तथा वेल्स के भिन्न-भिन्न धर्मप्रान्तों में बहुत अलग-अलग है। दूसरे, यह सर्वविदित है कि अधिकतर धर्मप्रान्तों में बहुत कम साधारण कलीसिया-सदस्य धर्मप्रान्तीय सम्मेलन में उपस्थित होते हैं, और अधिकतर उसकी पूरी तरह उपेक्षा कर देते हैं।

(ग) अन्तिम बात, परन्तु कम महत्त्व की नहीं, यह कि यह बात पूरी तरह स्पष्ट नहीं लगती कि इन सदनों को किन विषयों पर चर्चा करने की अनुमति होगी। जो विचार प्रस्तुत किया गया है कि वे "विश्वास और सिद्धान्त के प्रश्नों" पर कभी मुँह न खोलें, वह मेरे मन में अत्यन्त आपत्तिजनक है। यह मान लेना अनुचित है कि बुद्धिमान अंग्रेज़ साधारण विश्वासी, जो ज्ञान, नेतृत्व और बौद्धिक सामर्थ्य के पुरुष हैं, कभी व्यावहारिक रूप से अपना मुँह बन्द कराने और केवल सांसारिक विषयों के अतिरिक्त किसी और बात पर बोलने से रोके जाने को स्वीकार करेंगे।

मेरी राय में ऐसा प्रतिबन्ध अन्ततः तनाव और टकराव की ओर ले जाएगा। यदि आप कलीसिया के प्रबन्ध में सहायता के लिए साधारण विश्वासियों को बुलाते हैं, तो आपको उन पर भरोसा करना होगा और उन्हें बोलने की स्वतन्त्रता देनी होगी।

यह बहुत सम्भव है कि इन आपत्तियों के उत्तर मिल जाएँ, यद्यपि इस समय मैं उन्हें नहीं देख पाता। साधारण विश्वासियों की सहायता बुलाने और कलीसिया के विषयों में उनकी राय का उपयोग करने की घोषित इच्छा के लिए मैं धन्यवादी हूँ। परन्तु मेरी दृढ़ धारणा है कि इस दिशा में कोई भी आन्दोलन तब तक बहुत भला नहीं करेगा, जब तक हमारे पास एक सच्ची राष्ट्रीय महासभा न हो, जिसमें 30 अध्यक्ष हों, लगभग 60 प्रेस्बिटर हों, और इंग्लैंड तथा वेल्स के 30 धर्मप्रान्तों में से चुने गए 120 साधारण विश्वासी हों, जिनमें समाज के उच्च वर्गों के साथ-साथ मध्यम वर्ग के साधारण विश्वासी भी सम्मिलित हों। परन्तु मेरा विश्वास है कि कलीसिया के सर्वोत्तम और सबसे सुयोग्य साधारण सदस्य कभी किसी केवल स्वैच्छिक सभा में सम्मिलित न होंगे, जिसकी चर्चाएँ और निर्णय पूरी तरह किसी अधिकार से रहित हों और जिसके प्रस्तावों का कोई वज़न न हो।

सबसे बढ़कर हमें ऐसी महासभा चाहिए जिसमें अध्यक्ष, प्रेस्बिटर और साधारण विश्वासी एक साथ बैठें और आमने-सामने विषयों पर विचार करें। तब पादरी-वर्ग को यह जानने का अवसर मिलेगा कि जनमत क्या है, और यह पता चलेगा कि वे अचूक नहीं हैं। साधारण विश्वासियों को पादरी-वर्ग को यह दिखाने का अवसर मिलेगा कि संसार में वास्तव में क्या हो रहा है, और वे उनकी सभाओं में व्यावहारिक, काम की बुद्धि ला सकेंगे। यह योजना सब पक्षों के लिए अत्यन्त लाभदायक होगी।

मैं यहाँ कलीसिया के सामान्य जनों के अधिकारों और कर्तव्यों की चर्चा छोड़ता हूँ। इस विषय को और आगे बढ़ाने का मेरे पास समय नहीं है। मैं जानता हूँ कि मैंने ऐसे मत प्रस्तुत किए हैं जो कुछ लोगों को अप्रिय लगेंगे और अपनी नवीनता के कारण चौंकानेवाले होंगे। परन्तु मुझे अभी यह सीखना बाकी है कि सामान्य जनों की स्थिति में जो सुधार मैंने सुझाया है, वह सैद्धान्तिक रूप में अत्यन्त वांछनीय और वर्तमान समय की दृष्टि से अत्यन्त अनिवार्य नहीं है। कलीसिया-अलगाववादियों, रोमी कलीसिया के अनुयायियों और अज्ञेयवादियों के बीच कलीसिया का जहाज़ तट की ओर बहती हवा में चट्टानों के निकट है, और लहरें टकराती हुई दिखाई दे रही हैं। यदि जहाज़ को बचाना है तो पादरी-वर्ग और सामान्य जनों को मिलकर काम करना होगा। यह समय मीठी-मीठी बातें सुनाने का नहीं है, न अन्धी आँखों से दूरबीन लगाकर देखने का, और न यह पुकारने का, "शान्ति, शान्ति! चलो चुपचाप बैठे रहें।"

(क) "यह तो पवित्र वस्तुओं का अपमान करनेवाला सुधार है!" कुछ लोग ऐसा पुकारेंगे। वे समझते हैं कि सामान्य जनों को आत्मिक विषयों में किसी भी प्रकार का भाग देना सरासर दुष्टता है। वे चाहते हैं कि वे पादरी-वर्ग के लिए गिबोनियों की तरह केवल लकड़हारे और पानी भरनेवाले बने रहें। वे गम्भीरता से दातान और अबीराम की, और वाचा के सन्दूक को हाथ लगानेवाले उज्जा की, और मन्दिर में धूप जलाने का साहस करनेवाले उज्जियाह की बातें करते हैं। ऐसे लोगों को मेरा उत्तर यह है, "आयरलैंड की कलीसिया को देखो और बुद्धि सीखो।" यदि राजकीय संरक्षण का अन्त हो जाए, और बहुत से दूरदर्शी पुरुष कहते हैं कि वह अन्त में निश्चय आएगा, तो तुम्हें चाहे अच्छा लगे या बुरा, सामान्य जनों की सहायता का सहारा लेना ही पड़ेगा। और यदि वह न भी आए, तो भी जब तक तुम सामान्य जनों को उनके उचित स्थान पर नहीं रखोगे, तब तक तुम सचमुच बलवन्त नहीं हो सकोगे। जहाँ तक पवित्र वस्तुओं के अपमान की अस्पष्ट बातों का सम्बन्ध है, वह सब व्यर्थ है। इस विचार को पवित्रशास्त्र के इथुरिएल के भाले से छू दो, और वह लुप्त हो जाएगा।

(ख) परन्तु कुछ लोग पुकारेंगे, "यह एक खतरनाक सुधार है। सामान्य जन बागडोर अपने हाथ में ले लेंगे और पादरी-वर्ग के विवेक पर प्रभुता जताएँगे।" ऐसे भय निरे हास्यास्पद हैं। सामान्य जनों को निष्क्रिय बैठे रहने देने और कलीसिया के कामों में उन्हें कोई सक्रिय रुचि न देने में कहीं अधिक वास्तविक खतरा है। इन डरानेवालों की अपेक्षा सामान्य जनों के विषय में मेरी राय कहीं अच्छी है। कलीसिया की नई व्यवस्था आरम्भ में कुछ अटपटी चल सकती है, जैसे नया भाप-इंजन जब उसके जोड़ कड़े और धुरियाँ गरम होती हैं। हो सकता है कि आरम्भ में सामान्य जन यह न समझें कि उन्हें क्या करना है। परन्तु उन्हें समय दो, उन्हें समय दो। उन्हें दिखाओ कि तुम उन पर भरोसा करते हो, और उन्हें समझाओ कि क्या चाहिए, तो मुझे कोई सन्देह नहीं कि सामान्य जन शीघ्र ही अपने स्थान पर जम जाएँगे और पूरे मन से काम करेंगे। स्मरण रखो कि राजकीय संरक्षण के अन्त के बाद आयरलैंड के सामान्य जनों ने अपना घर कितनी उत्तम रीति से व्यवस्थित किया, और अंग्रेज़ सामान्य जनों पर अधिक भरोसा रखो।

(ग) "परन्तु यह एक निरर्थक सुधार है," अन्त में कुछ लोग पुकारेंगे। "सामान्य जन अध्यक्षों को सलाह देने, या कलीसिया की महासभाओं में बैठने, या पदधारी पादरियों की योग्यता के विषय में राय देने के योग्य नहीं हैं।" मैं एक क्षण के लिए भी यह नहीं मानता। हमारी कलीसिया के सामान्य सदस्य हो सकता है कि यूनानी या इब्रानी भाषा के आलोचक न हों, या बहुत-से पादरियों की तुलना में गहरे धर्मशास्त्री न हों। परन्तु उनमें से बहुतों में उतना ही अनुग्रह है, और अंग्रेज़ी बाइबल का उतना ही ज्ञान है। सबसे बढ़कर, उनमें प्रायः पादरी-वर्ग से कहीं अधिक व्यावहारिक समझ होती है। जो जानता है कि हमारे सर्वोत्तम सामान्य जन हमारी बड़ी धार्मिक संस्थाओं की समितियों में कैसा आचरण करते हैं, वह इस बात से अनजान नहीं रह सकता। पादरी-वर्ग के विषय में लार्ड क्लैरेंडन की टिप्पणी, खेद है, बहुत सच्ची है। लम्बे अनुभव के बाद उसने अपना यह दृढ़ विश्वास प्रकट किया कि "लिखने-पढ़ने वाले सब मनुष्यों में पादरी लोग मानवीय कामों को सबसे कम समझते हैं और उनका सबसे बुरा अनुमान लगाते हैं।" मुझे भय है कि यदि वह आज के दिन जीवित होता, तो हमें एक समूह के रूप में इससे कुछ अच्छा प्रमाणपत्र न देता। मेरा दृढ़ विश्वास है कि कलीसिया के लिए इससे बड़ा लाभ और कुछ नहीं होगा कि उसकी सारी कार्यवाही में सामान्य जनों के तत्त्व का विवेकपूर्ण मिश्रण खमीर की तरह मिला दिया जाए। इन पिछले दिनों में कलीसिया की आधी भूलों का सच्चा कारण यही रहा है कि सामान्य जन अपने उचित स्थान पर नहीं थे।

आज के दिन राजकीय संरक्षण प्राप्त कलीसिया का सबसे बड़ा संकट पूर्ण निष्क्रियता की उस प्रिय नीति में है जो इतने लोगों को भाती है, और इस बात में कि वे यह नहीं देख पाते कि हम संकट में हैं। "थोड़ी और नींद! थोड़ी और झपकी! तुम चीज़ों को जैसी हैं वैसी क्यों नहीं रहने देते?" जब कलीसिया के सुधारों की चर्चा होती है और उन्हें लोगों के ध्यान में लाया जाता है, तब यही उत्तर बार-बार दिया जाता है। "हम क्यों डरें?" वे पुकारते हैं। "कोई वास्तविक खतरा नहीं है।" क्या कोई मुझसे कहेगा कि कोई भीतरी खतरा नहीं है, जब एक ओर प्रभु-भोज में वास्तविक उपस्थिति की शिक्षा, रोमी कलीसिया का पापस्वीकार, कलीसियाई उच्छृंखलता और स्वशासन की माँग चुपचाप सह ली जाती हैं, और दूसरी ओर प्रायश्चित, मसीह का ईश्वरत्व, पवित्रशास्त्र की प्रेरणा और चमत्कारों की वास्तविकता को ठण्डे मन से त्याग दिया जाता है? क्या कोई मुझसे कहेगा कि कोई बाहरी खतरा नहीं है, जब अविश्वासी, पोप के अनुयायी और कलीसिया से अलग हुए लोग राजकीय संरक्षण-प्राप्त कलीसिया के विनाश के भूखे-प्यासे हैं और अपने उद्देश्य पूरे करने के लिए जल-थल एक कर रहे हैं? क्या कोई खतरा नहीं, जब हमारे कामकाजी वर्गों के लाखों लोग हमारी कलीसिया की दीवारों के भीतर कभी पैर नहीं रखते, और

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