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विश्वासियों में पाप (जारी)
जब वह सिंहासन पर होता है। यहाँ व्यवस्था पापियों के साथ बात को घुमाती नहीं, जैसा कि हम आपस में प्रायः किया करते हैं, बल्कि उससे साफ़ कह देती है, "'तू' ही वह 'मनुष्य' है जिसमें यह अत्यन्त पापमय पाप बसता है, और तुझे इसके दोष का उत्तर देना होगा।" और मैं समझता हूँ कि यदि कोई बात मनुष्य को इसका विरोध करने और इसे जड़ से नष्ट करने के लिए जगा सकती है, तो वह यही होगी। व्यवस्था उसे जता देती है कि इस पाप के कारण वह परमेश्वर के श्राप और क्रोध के अधीन है; वह इसके लिए उस पर अनन्त दण्ड की आज्ञा सुना देती है। "इसी दशा में रह और नष्ट हो जा," यही उसकी भाषा है। वह आत्मा को इस जगत में यह चेतावनी देती है, और आनेवाले जगत में उसे निरुत्तर छोड़ देगी।
4. व्यवस्था अपने दण्ड की आज्ञा के पीछे इस प्रकार पड़ी रहती है कि वह आत्मा को चौंका देती है, और उसे अपने पापमय निवासी को आश्रय देते हुए किसी प्रकार की शान्ति का आनन्द नहीं लेने देती। जब कभी आत्मा ने पाप की आज्ञाओं का पालन किया है, व्यवस्था तुरन्त प्रभु के क्रोध के साथ उस पर टूट पड़ती है और उसे थरथरा देती है। उसे चैन नहीं मिलता, वह उस बेचारे पशु के समान है जिसकी पसलियों में घातक तीर धँसा हुआ है, जो चाहे कहीं भी हो और कुछ भी करे, उसे बेचैन रखता है।
5. व्यवस्था यहीं नहीं रुकती; वह आत्मा को घात भी करती है, रोमियों 7:9; अर्थात् इस भीतर बसनेवाले पाप के स्वभाव, सामर्थ्य और योग्य दण्ड का कायल करके, जिसमें यह है उसके पास से वह सारी आत्मधार्मिकता और आशा छीन लेती है जिसके सहारे वह अपने को सँभाले रहता था, - वह उसे एक दीन, मृत, असहाय और निराश प्राणी बनाकर छोड़ देती है; और यह सब इसलिए कि वह इस पाप का विरोध करती है। क्या अब हम यह आशा न करें कि इसकी शक्ति टूट जाएगी, - कि परमेश्वर की व्यवस्था के इन प्रहारों के सामने यह मर जाएगा? परन्तु सच्चाई यह है कि इसकी शक्ति और बल ऐसा है कि बात बिलकुल इसके विपरीत होती है। क्योंकि हर पतन से यह नया बल पाता है; भीतर बसे पाप पर व्यवस्था के द्वारा दिए गए सभी आघातों का यही हाल है: क्योंकि, -
(1.) यह पराजित नहीं होता। पराजय में पराजित के विषय में दो बातें निहित हैं, - पहली, प्रभुत्व की हानि; और दूसरी, बल की हानि। जब कभी कोई पराजित होता है तो वह इन दोनों से वंचित हो जाता है; वह अपना अधिकार और अपनी शक्ति दोनों खो देता है। इसी प्रकार जब बलवन्त पुरुष जीत लिया जाता है, तो वह बाँध दिया जाता है और उसका माल छीन लिया जाता है। परन्तु व्यवस्था के आक्रमणों से भीतर बसे पाप पर इन दोनों में से कोई बात नहीं बीतती। उस पर पड़ने वाले सभी प्रहारों से वह न अपना प्रभुत्व खोता है, न बल। व्यवस्था
