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विश्वासियों में पाप
अध्याय 14
विश्वास का अंगीकार करनेवालों के जीवन में पाप ने जो प्रभाव डाले हैं, उनसे पाप की सामर्थ का प्रदर्शन - पहला, वास्तविक पापों में - दूसरा, आदतन पीछे हटने में।
अब हम उस दुखद सत्य के अन्य प्रमाणों की ओर बढ़ते हैं। परन्तु चूँकि हमारा अधिकांश कार्य पूरा हो चुका है, इसलिए शेष की चर्चा में मैं अधिक संक्षिप्त रहूँगा।
अतः यहाँ हम उस प्रदर्शन पर विचार करते हैं जो पाप की इस व्यवस्था ने सब युगों में अपनी सामर्थ का दिया है, उन शोकजनक फलों के द्वारा जो उसने उत्पन्न किए हैं, यहाँ तक कि विश्वासियों में भी। ये दो प्रकार के हैं: -
1. उनके जीवन में पाप के भीषण प्रस्फोट;
2. आज्ञाकारिता और परमेश्वर के साथ सहभागिता की उस दशा से, जो उन्होंने प्राप्त की थी, उनका आदतन पीछे हट जाना; - ये दोनों, याकूब के नियम के अनुसार, पाप की इस व्यवस्था के कारण हैं, और उसकी प्रगति के चौथे चरण से सम्बन्ध रखते हैं, और दोनों उसकी सामर्थ के प्रबल प्रमाण हैं।
1. विश्वासियों के जीवन में वास्तविक पाप के भयावह प्रस्फोटों पर विचार कीजिए, और हम पाएँगे कि हमारी बात प्रमाणित होती है। यदि मैं इस विचार को विस्तार से करूँ, तो मुझे पवित्रशास्त्र में अंकित सन्तों की सारी दुखद चूकों का वर्णन करना पड़ेगा; परन्तु उनका विवरण सबको ज्ञात है। केवल कुछ थोड़ी बातें कही जा सकती हैं; जैसे, -
(1.) उनमें से अधिकांश ऐसे लोगों के जीवन में घटित हुईं जो साधारण श्रेणी के विश्वासी नहीं थे, वरन् ऐसे लोग थे जिनकी विशेष प्रतिष्ठा इसलिए थी कि वे अपनी पीढ़ी में परमेश्वर के साथ चले। ऐसे थे नूह, लूत, दाऊद, हिजकिय्याह, और अन्य। वे साधारण कद के मनुष्य नहीं थे, वरन् विश्वास और सच्ची पवित्रता में अपने भाइयों से कन्धे से ऊपर तक ऊँचे थे। और निश्चय ही वह कोई बड़ी प्रभावशीलता रही होगी जो परमेश्वर के मार्गों में ऐसे महाकायों को उन घृणित पापों में खींच ले गई जिनमें वे गिरे। कोई साधारण यंत्र उन्हें कभी उनकी आज्ञाकारिता के मार्ग से नहीं हटा सकता था। वह एक ऐसा विष था जिसका सामना आत्मिक स्वास्थ्य की कोई बलवान काया, कोई मारक औषधि, नहीं कर सकती थी।
