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विश्वासियों में पाप
अध्याय 12
छल के द्वारा पाप का गर्भ धारण - इसमें क्या सम्मिलित है - पाप के लिए इच्छा की सहमति - उसका स्वभाव - वह कैसे प्राप्त की जाती है - पाप के छल द्वारा उपयोग किए जाने वाले अन्य लाभ - अज्ञान - भूल।
पाप के छल के आगे बढ़ते कार्य में तीसरी सफलता वास्तविक पाप का गर्भ धारण है। जब वह मन को कर्तव्य से हटा चुका और भावनाओं को उलझा चुका, तब वह पाप को गर्भ में धारण करने के लिए आगे बढ़ता है ताकि उसे जन्म दे: "फिर अभिलाषा गर्भवती होकर पाप को जनती है।" अब पाप का गर्भ धारण इच्छा की सहमति के सिवा और कुछ नहीं हो सकता; क्योंकि जैसे इच्छा की सहमति के बिना पाप नहीं किया जा सकता, वैसे ही जहाँ इच्छा ने सहमति दे दी है, वहाँ आत्मा में कोई बात उसके पूरा होने में बाधा नहीं डालती। परमेश्वर वास्तव में अनेक रीतियों और साधनों से इन व्यभिचारी गर्भधारणों को जन्म लेने से विफल कर देता है, उन्हें गर्भ में ही गला देता है, या किसी न किसी रीति से उन्हें निष्फल कर देता है, ताकि जिस पाप की इच्छा या गर्भधारण हुआ, उसमें से कोई भी किया न जाए; परन्तु जब इच्छा एक बार सहमति दे चुकी हो, तब आत्मा में कुछ भी उसे रोकने के लिए नहीं रह जाता। प्रायः जब बादल वर्षा से भरा होता है, तब हवा आकर उसे उड़ा ले जाती है; और जब इच्छा अपने पाप को जन्म देने को तैयार होती है, तब परमेश्वर उसे मोड़ देता है: परन्तु फिर भी बादल वर्षा से उतना ही भरा था मानो वह बरस चुका हो, और आत्मा पाप से उतनी ही भरी थी मानो वह किया जा चुका हो।
तो पाप का यह गर्भ धारण इच्छा की सहमति प्राप्त करने की उसकी सामर्थ्य है। और इस प्रकार आत्मा मसीह में परमेश्वर के प्रति अपनी पवित्रता खो देती है, जैसा प्रेरित 2 कुरिन्थियों 11:2, 3 में संकेत करता है। इसलिए हमें यह ध्यान देना चाहिए, -
1. कि इच्छा ही आज्ञाकारिता और अवज्ञा का कारण है। नैतिक कार्य तब अच्छे या बुरे होते हैं जब उनमें इच्छा की सहमति सम्मिलित हो। प्राचीन काल में जिसने कहा था, "हर पाप इतना स्वैच्छिक है कि यदि वह स्वैच्छिक नहीं तो पाप नहीं है," उसने सत्य कहा। वास्तविक पापों के विषय में यह सबसे अधिक सत्य है। जो उन्हें करते हैं, उनके सम्बन्ध में उनका अधर्म उनमें इच्छा के कार्यों में निहित है; अपने आप में पाप का कारण परमेश्वर की व्यवस्था से उसका भटकना है।
2. पाप के लिए इच्छा की सहमति दो प्रकार की होती है: -
