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विश्वासियों में पाप (जारी)
इसलिए, आयत के आरम्भ में हमारा उद्धारकर्ता अनुग्रह को भले मनुष्य के "हृदय का भला भण्डार" कहता है, जिससे जो भला है वह निकलता है। यह एक ऐसा सिद्धान्त है जो निरन्तर अपने समान, अपने ही स्वभाव के कर्मों के लिए प्रेरित और उत्तेजित करता है, और परिणामस्वरूप उन्हें उत्पन्न करता है। और उसे उसकी बहुतायत के कारण भी भण्डार कहा गया है। वह कभी समाप्त नहीं होगा; मनुष्य जितना उदारता से इस भण्डार से निकालते हैं, वह उतना ही बढ़ता जाता है! जैसे मनुष्य अपने अनुग्रह को खर्च नहीं करते, वरन् उसके प्रयोग से उसे बढ़ाते हैं, वैसे ही वे अपने भीतर बसे पाप को भी खर्च नहीं करते। मनुष्य आज्ञाकारिता के कर्तव्यों में जितना अपने अनुग्रह का प्रयोग करते हैं, वह उतना ही बढ़ता है; और मनुष्य अपनी अभिलाषा के फल जितना प्रकट करते हैं, वह उनमें उतना ही बढ़ती है; वह अपने ही विष को निगलती है, और उसी से बढ़ती है। मनुष्य जितना पाप करते हैं, उतना ही पाप की ओर झुकते हैं। पाप की इस व्यवस्था के कपट से ही मनुष्य अपने आपको समझा लेते हैं कि इस या उस विशेष पाप से वे अपनी अभिलाषाओं को ऐसा तृप्त कर लेंगे कि उन्हें फिर पाप करने की आवश्यकता न रहेगी। हर पाप उस सिद्धान्त को बढ़ाता है, और पाप करने की आदत को दृढ़ करता है। यह एक बुरा भण्डार है, जो बुराई करने से बढ़ता है। और यह भण्डार कहाँ रखा है? वह हृदय में है; वहीं वह जमा है, वहीं सुरक्षित रखा गया है। संसार के सब मनुष्य, स्वर्ग के सब स्वर्गदूत, इस भण्डार को मनुष्य से नहीं ले सकते।
पवित्र शास्त्र में "हृदय" शब्द कभी मन और समझ के लिए, कभी इच्छा के लिए, कभी भावनाओं के लिए, कभी विवेक के लिए, और कभी सारे प्राण के लिए प्रयुक्त होता है। सामान्यतः वह मनुष्य के सारे प्राण और उसकी क्षमताओं को दर्शाता है, क्योंकि वे सब नैतिक कर्मों का एक ही सिद्धान्त हैं। मन, क्योंकि वह जाँचता, परखता और निर्णय करता है कि क्या करना चाहिए; इच्छा, क्योंकि वह चुनती या ठुकराती है; भावनाएँ, क्योंकि वे पसन्द या नापसन्द करती हैं, जुड़ती हैं या विमुख होती हैं; विवेक, क्योंकि वह चेतावनी देता और निर्णय देता है, — ये सब मिलकर हृदय कहलाते हैं। और इसी अर्थ में हम कहते हैं कि पाप की इस व्यवस्था का निवास मनुष्य का हृदय है। केवल, हम यह जोड़ सकते हैं कि पवित्र शास्त्र, जब हृदय को मनुष्यों के कर्मों का सिद्धान्त कहकर बोलता है, तो प्रायः उसके साथ दो बातें सम्मिलित करता है: —
1. किए जानेवाले कार्यों में प्राण की प्रसन्नता। जब मनुष्य अपने कार्यों में और उनसे प्रसन्न होते हैं, तब कहा जाता है कि वे उन्हें अपने सारे हृदय से करते हैं। इस प्रकार, जब परमेश्वर अपने लोगों को प्रेम से आशीष देता है, तो वह यह
