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विश्वासियों में पाप (जारी)
इसलिए पहली बात जो पाप अपने छलपूर्ण कार्य में लक्षित करता है, वह मन को उसके कर्तव्य के निर्वाह से हटा देना है।
मन के कर्तव्य में, उस विशेष कार्य में जो उसका उस आज्ञाकारिता के सम्बन्ध में है जो परमेश्वर माँगता है, दो बातें आती हैं: -
1. स्वयं को और सम्पूर्ण आत्मा को ऐसी दशा में रखना जो उसे आज्ञाकारिता के सब कर्तव्यों के लिए तैयार रखे, और पाप के गर्भधारण की ओर ले जानेवाले सब फुसलावों के विरुद्ध चौकस रखे।
2. विशेष रूप से, सब विशेष कार्यों पर सावधानी से ध्यान देना, कि वे वैसे ही किए जाएँ जैसा परमेश्वर चाहता है, उसकी इच्छा के अनुसार; और पाप के फुसलावों को रोकने के लिए भी। इन दो बातों में विश्वासी के मन का सारा कर्तव्य है; और भीतर बसा पाप इन दोनों से उसे हटाने के लिए कार्य करता है।
1. इनमें पहला आत्मा की सामान्य दशा के सम्बन्ध में मन का कर्तव्य है; दो बातों पर विचार किया जा सकता है। कि वह एक उचित, निरन्तर विचार पर आधारित है, - (1.) अपने विषय में, पाप और उसकी नीचता के विषय में; (2.) परमेश्वर के अनुग्रह और भलाई के विषय में: और पाप इन दोनों से उसे हटाने का प्रयत्न करता है।
2. उन कर्तव्यों पर ध्यान देने में जो विशेष रूप से पाप की व्यवस्था के कार्य को रोकते हैं।
1. (1.) वह उसे उसकी अपनी नीचता के बोध और उससे जुड़े संकट से हटाने का प्रयास करता है। पाप का, उसके स्वभाव में, उसकी परिस्थितियों में, उसके झुकावों में, विशेषकर जैसा वह मसीह के लहू और क्रूस में दिखाया गया है, निरन्तर विचार सदा हमारे साथ बना रहना चाहिए: यिर्मयाह 2:19, "इसलिए जान लो और देख लो कि यह बुरी और कड़वी बात है कि तुमने
