अध्याय 42 / 63

प्रभावित मण्डली को। यह और भी विचित्र था, क्योंकि

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प्रभावित मण्डली को। यह और भी विचित्र था, क्योंकि

रेव. जे. वेस्ली का

[अप्रैल 1785। "जब तुझे दिखाई नहीं देता?"

"बहुत अच्छी तरह," उसने कहा; "क्योंकि प्रभु मुझे उसका स्मरण दिलाता है।"

इस प्रकार, बिना सन्देह या भय के, उसने अपनी आत्मा अपने दयालु और विश्वासयोग्य सृष्टिकर्ता को सौंप दी।

लगभग ग्यारह बजे मैंने वॉल्वरहैम्पटन में प्रचार किया, और दोपहर बाद हिल्टन-पार्क के प्रिय परिवार के साथ बिताई।

मंगलवार, 29। दोपहर को मैंने स्टैफ़र्ड के कक्ष में, एक गहराई से प्रभावित मण्डली को प्रचार किया।

यह और भी विचित्र था, क्योंकि इंग्लैंड में बहुत कम नगर हैं जो धर्म से इतने अछूते हों जितना

स्टैफ़र्ड।

सन्ध्या को मैंने न्यूकैसल में एक बहुत गम्भीर और अत्यन्त प्रभावित मण्डली को प्रचार किया।

बुधवार, 30। हमें लेन-एंड में कठिनाई हुई।

दोपहर को भी भवन में मण्डली का तिहाई भाग भी नहीं समाया।

हवा चुभती हुई ठण्डी थी; फिर भी मैंने बाहर प्रचार किया, और परमेश्वर ने हमारे हृदय गर्म कर दिए।

सन्ध्या को मुझे बर्सलम में हमारे भाइयों के बीच बहुत सान्त्वना मिली, जो अनुग्रह में भली-भाँति स्थापित हैं; और गुरुवार, 31 को, कॉन्ग्लटन में मुझे वैसी ही एक और मण्डली मिली।

शुक्र. 1 अप्रैल।—मैं मैक्लेसफील्ड आया, जहाँ श्री सिम्पसन ने अपने गिरजे में मेरे प्रचार करने की सूचना दे रखी थी।

यहाँ मैंने अपनी आत्मा को पूरी तरह उँडेल दिया; और शनिवार, 2 को, मैनचेस्टर की ओर आगे बढ़ा।

रविवार, 3। हमारे भाई चारों ओर से उमड़ आए, भवन, जितना बड़ा है, उन्हें समा न सका।

अनुमान था कि हमारे यहाँ बारह सौ प्रभु-भोज में सहभागी थे।

सोमवार, 4। मैंने बोल्टन में अपनी पुरानी, प्रेमी मण्डली को प्रचार किया।

मंगलवार, 5। दोपहर को मैंने विनगेट में खुली हवा में प्रचार किया। मण्डली सुसमाचार की सब आशीषों के लिए बिलकुल तैयार थी, और हर शब्द को निगल रही थी।

सन्ध्या को मैंने विगन में प्रचार किया।

मैंने इस प्रचार-भवन को पहले कभी भरा हुआ नहीं देखा था; परन्तु आज रात यह भरे से भी अधिक था, और गहरे ध्यान से सुननेवाले श्रोताओं से।

बुधवार, 6। मैंने लिवरपूल में प्रचार किया; परन्तु वहाँ मुझे चलने को तैयार कोई जहाज़ नहीं मिला।

इसलिए, गुरुवार, 7 को, (मार्ग में वॉरिंगटन में प्रचार करने के बाद,) मैं शीघ्रता से चेस्टर पहुँचा। पार्कगेट में भी चलने को तैयार कोई जहाज़ नहीं था; इसलिए, शुक्रवार, 8 को, हमने गाड़ी ली, और शनिवार को दोपहर बाद चार और पाँच बजे के बीच होलीहेड पहुँचे।

नौ और दस बजे के बीच हम क्लर्मोंट डाक-जहाज़ पर सवार हुए:

परन्तु रविवार, 10 को दस बजे के बाद तक बिलकुल सन्नाटा रहा, जब यात्रियों ने मुझसे उपदेश देने को कहा।

उपदेश के बाद मैंने प्रार्थना की कि परमेश्वर हमें पूरी और शीघ्र यात्रा दे।

जब मैं बोल ही रहा था, हवा चल पड़ी; और बारह घंटे में हमें डबलिन की खाड़ी तक पहुँचा दिया। क्या हमारा प्रभु अब भी प्रार्थना नहीं सुनता?

मुझे अपने ही घर में ऐसा विश्राम-स्थान मिला जैसा आयरलैंड में मैंने पहले कभी नहीं पाया था; और दो ऐसे प्रचारक,

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