अध्याय 9 (68 में से)

“इंडिपेंडेंट” में “ऊपर से सामर्थ” पर मेरे लेख के प्रकाशन के बाद से

यह हिन्दी संस्करण मशीन-सहायता से अनुवादित है और समीक्षा की प्रक्रिया में है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।

अध्याय 3 — आत्मा का वरदान — “इंडिपेंडेंट” में “ऊपर से सामर्थ” पर मेरे लेख के प्रकाशन के बाद से

मैं लम्बी बीमारी के कारण घर में बँधा रहा हूँ। इस बीच मुझे उस विषय पर पूछताछ के बहुत से पत्र मिले हैं। वे अधिकतर पूछताछ की तीन विशेष बातों से सम्बन्धित हैं:

1. वे इस सामर्थ के प्रकट होने के और उदाहरण चाहते हैं।

2. वे पूछते हैं, “इस वरदान की आशा करने का अधिकार किनको है?”

3. यह कैसे, या किन शर्तों पर प्राप्त किया जा सकता है?

मैं अलग-अलग व्यक्तियों को पत्र लिखकर इन प्रश्नों का उत्तर देने में असमर्थ हूँ। आपकी अनुमति से, यदि मेरा स्वास्थ्य सुधरता रहा, तो मैं आपके स्तम्भों के द्वारा कई छोटे-छोटे लेखों में उनका उत्तर देना चाहता हूँ। इस अंक में मैं ऊपर से इस सामर्थ के प्रकट होने का एक और उदाहरण बताऊँगा, जिसे मैंने स्वयं देखा। प्रचार करने की अनुमति (लाइसेंस) मिलने के थोड़े ही समय बाद मैं देश के एक ऐसे क्षेत्र में गया जहाँ मैं बिलकुल अजनबी था। मैं वहाँ न्यूयॉर्क के ओनाइडा काउंटी में स्थित एक महिला मिशनरी सोसाइटी के अनुरोध पर गया था। मेरे विचार में मई के आरम्भ में मैं जेफ़र्सन काउंटी के उत्तरी भाग में स्थित एंटवर्प नगर में गया। मैं गाँव के होटल में ठहरा, और वहाँ मुझे पता चला कि उस समय उस नगर में कोई धार्मिक सभाएँ नहीं होती थीं। उनके पास ईंटों का बना एक सभा-भवन तो था, परन्तु उसमें ताला लगा हुआ था। व्यक्तिगत प्रयास करके मैंने कुछ लोगों को उस स्थान की एक मसीही महिला की बैठक में इकट्ठा किया, और अपने पहुँचने के बाद की शाम को उन्हें प्रचार किया। जब मैं गाँव में घूमा तो जहाँ-जहाँ मैं गया, वहाँ पुरुषों में जो भयानक अपशब्द और परमेश्वर की निन्दा मैंने सुनी, उससे मैं स्तब्ध रह गया। मैंने अगले सब्त के दिन स्कूल-भवन में प्रचार करने की अनुमति प्राप्त की; परन्तु सब्त के आने से पहले, समाज की जो दशा मैंने देखी उसके कारण मैं बहुत निरुत्साहित, और लगभग भयभीत हो गया। शनिवार को प्रभु ने मेरे हृदय पर सामर्थ के साथ ये वचन लागू किए, जो प्रभु यीशु ने पौलुस से कहे थे (प्रेरितों के काम 18:9,10): “मत डर, वरन कहे जा, और चुप मत रह; क्योंकि मैं तेरे साथ हूँ, और कोई तुझ पर चढ़ाई करके तेरी हानि न करेगा; क्योंकि इस नगर में मेरे बहुत से लोग हैं।” इससे मेरा भय पूरी तरह दूर हो गया; परन्तु मेरा हृदय लोगों के लिए वेदना से लदा हुआ था। रविवार की सुबह मैं जल्दी उठा, और दिन के परिश्रम पर आशीष के लिए परमेश्वर के सामने अपना हृदय उण्डेलने को गाँव से थोड़ी दूर एक उपवन में चला गया। मैं अपने प्राण की वेदना को शब्दों में व्यक्त नहीं कर सका, परन्तु बहुत कराहते हुए, और मेरे विचार में बहुत आँसुओं के साथ, एक-दो घण्टे तक संघर्ष करता रहा, पर मुझे चैन नहीं मिला। मैं होटल में अपने कमरे में लौट आया; परन्तु लगभग तुरन्त ही उपवन में वापस चला गया। ऐसा मैंने तीन बार किया। अन्तिम बार मुझे पूरा चैन मिल गया, ठीक उस समय जब सभा में जाने का समय हो गया था। मैं स्कूल-भवन में गया, और उसे पूरी तरह खचाखच भरा हुआ पाया। मैंने अपनी छोटी-सी जेब की बाइबल निकाली, और अपने मूल-पाठ के रूप में यह पढ़ा: “परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उस ने अपना एकलौता पुत्र दे दिया, ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे, वह नाश न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए।” मैंने परमेश्वर के प्रेम को उस व्यवहार के विपरीत रखकर दिखाया जो उसके साथ उन लोगों ने किया जिनके लिए उसने अपना पुत्र दे दिया। मैंने उनके अपशब्दों और निन्दा का दोष सीधे उन पर लगाया; और क्योंकि मैंने अपने सुननेवालों में ऐसे कई लोगों को पहचान लिया जिनकी

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