अध्याय 59 (68 में से)

कपालविद्यावादी है, और इसलिए उसके धर्मवैज्ञानिक विचारों में न कोई स्वतंत्र इच्छा है, न कोई नैतिक कर्तृत्व,

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कपालविद्यावादी है, और इसलिए उसके धर्मवैज्ञानिक विचारों में न कोई स्वतंत्र इच्छा है, न कोई नैतिक कर्तृत्व, और न ही कोई ऐसी बात जो वास्तव में स्वतंत्र इच्छा और नैतिक कर्तृत्व का तर्कसंगत परिणाम हो। वह

प्यूरिटनवाद का और रूढ़िवादी (ऑर्थोडॉक्स) विश्वास के महान सिद्धान्तों का उपहास कर सकता है; और वास्तव में उसकी सारी शिक्षा, जहाँ तक वह मेरी दृष्टि में आई है, अत्यन्त खेदजनक रूप से नैतिक विवेचन (भले-बुरे की पहचान) के अभाव को प्रकट करती है।

उसके लेखों से मैं यह अनुमान लगाऊँगा कि नैतिक भ्रष्टता, दोष और दण्ड-योग्यता के सच्चे विचारों का, इन शब्दों के सच्चे अर्थ में, उसके मन में कोई स्थान नहीं है। वास्तव में, एक सुसंगत कपालविद्यावादी होने के नाते, ऐसे विचारों का उसके मन में होने का कोई अधिकार भी नहीं है। उसका दर्शनशास्त्र उन्हें अनिवार्य रूप से बाहर कर देता है। मैं नहीं जानता कि कपालविद्या ने विभिन्न सम्प्रदायों के पादरियों के मनों को कितने व्यापक रूप से विषैला कर दिया है, परन्तु मैंने पीड़ा के साथ यह देखा है कि सार्वजनिक पत्र-पत्रिकाओं के लिए लिखनेवाले बहुत से पादरी मनुष्यों के विवेक तक पहुँचने में असफल रहते हैं। वे मामले की तह तक जाने में, और इस बात पर बल देने में असफल रहते हैं कि केवल नैतिक व्यवस्था की आज्ञाकारिता ही परमेश्वर को ग्रहणयोग्य है। मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि वे “विश्वास के द्वारा व्यवस्था को व्यर्थ ठहराते हैं।” वे उस मापदण्ड से भिन्न मापदण्ड प्रस्तुत करते प्रतीत होते हैं जो मसीह के पहाड़ी उपदेश में सिखाया गया है, जो नैतिक व्यवस्था की मसीह द्वारा की गई व्याख्या था। मसीह ने उस उपदेश में स्पष्ट रूप से सिखाया कि उस उपदेश में दिए गए जीवन के नियम के अनुरूप हुए बिना उद्धार नहीं है। मसीह में सच्चा विश्वास सदा और अनिवार्य रूप से पवित्र जीवन को जन्म देगा। परन्तु मुझे डर है कि ऐसे सुसमाचार का प्रचार करना फ़ैशन बन गया है जो वास्तव में व्यवस्था-विरोधी (एन्टीनोमियन) सुसमाचार के बराबर है। सुसमाचार में जो जीवन का नियम घोषित किया गया है, वह ठीक नैतिक व्यवस्था ही का नियम है। सच्चे विश्वास के — सुसमाचार के विश्वास के — विषय में ये चार बातें स्पष्ट रूप से कही गई हैं:

पहली: “वह व्यवस्था को स्थिर करता है।”

दूसरी: “वह प्रेम के द्वारा प्रभाव करता है।”

तीसरी: “वह मन को शुद्ध करता है।”

चौथी: “वह संसार पर जय पाता है।”

ये सब इसी बात को कहने के भिन्न-भिन्न रूप हैं कि सच्चा विश्वास, वास्तव में, पवित्र जीवन उत्पन्न करता है। यदि वह ऐसा न करता, तो वह “व्यवस्था को व्यर्थ ठहराता।” जहाँ जीवन के एकमात्र नियम के रूप में नैतिक व्यवस्था की आज्ञाकारिता पर बल नहीं दिया जाता, वहाँ सच्चे सुसमाचार का प्रचार नहीं होता। जहाँ कहीं किसी मंच (पल्पिट) की शिक्षाओं में ऐसा करने में चूक होती है, वहाँ अनिवार्य रूप से यह दिखाई देगा कि ऐसे अंग-भंग किए हुए सुसमाचार के सुननेवालों में बहुत थोड़ा विवेक होगा। हमें प्रचार-मंच पर और अधिक बूअनरगिस, अर्थात् गर्जन के पुत्रों की आवश्यकता है। हमें ऐसे लोगों की आवश्यकता है जो परमेश्वर की व्यवस्था को कौंधती हुई बिजली की नाईं चमका दें और मनुष्यों के विवेक को जगा दें। हमें प्रचार-मंच पर और अधिक प्यूरिटनवाद की आवश्यकता है। निस्सन्देह, कुछ प्यूरिटन अतिवादी थे। फिर भी उनकी शिक्षा के अधीन व्यक्तिगत और सार्वजनिक विवेक की दशा उससे बहुत भिन्न थी जो इन दिनों पाई जाती है। परमेश्वर के शासन के वे पुराने, कठोर और महान समर्थक, यदि उनकी शिक्षा के अधीन ऐसी कोई अनैतिकताएँ प्रकट हुई होतीं जैसी इन दिनों आम हैं, तो वे तब तक गरजते और बिजली की नाईं कौंधते रहते जब तक कि उन्होंने अपने प्रचार-मंचों को लगभग तोड़ ही न डाला होता। बड़ी हद तक पत्र-पत्रिकाएँ अपना स्वर प्रचार-मंच से ही लेती हैं। आज के समय का सारा साहित्य निर्णायक रूप से दिखाता है कि लोगों के नैतिक बोध को फिर से सुदृढ़ करने की आवश्यकता है, और हमारे कुछ सबसे मनमोहक प्रचारक नास्तिकों, हर श्रेणी के सन्देहवादियों, यूनिवर्सलिस्टों और अत्यन्त पतित चरित्र के लोगों के चहेते बन गए हैं। तो क्या क्रूस की ठोकर समाप्त हो गई है, या क्रूस को दृष्टि से

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