अध्याय 39 (68 में से)

33. अपने पाठों के चुनाव और उनकी व्याख्या में, सदा प्रत्यक्ष शिक्षा प्राप्त कीजिए

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33. अपने पाठों के चुनाव और उनकी व्याख्या में, सदा पवित्र आत्मा की प्रत्यक्ष शिक्षा प्राप्त कीजिए।

34. आपके सब उपदेश हृदय के उपदेश हों, न कि केवल दिमाग़ के उपदेश।

35. अनुभव से प्रचार कीजिए, न कि सुनी-सुनाई बातों से, या केवल पढ़ने और अध्ययन से।

36. सदा वही विषय प्रस्तुत कीजिए जो पवित्र आत्मा उस अवसर के लिए आपके हृदय पर रखता है। पवित्र आत्मा के द्वारा आपके अपने मन के सामने रखी गई बातों को पकड़ लीजिए, और उन्हें यथासम्भव सबसे सीधे ढंग से अपनी मण्डली के सामने प्रस्तुत कीजिए।

37. जब भी आप प्रचार करने का प्रयत्न करें, प्रार्थना से भरे रहिए, और अपनी कोठरी से अपने मंच पर इस प्रकार जाइए कि आत्मा की भीतरी आहें आपके होंठों पर प्रकट होने के लिए ज़ोर मार रही हों।

38. अपने मन को अपने विषय से पूरी तरह भर लीजिए, ताकि वह प्रकट होने के लिए ज़ोर मारे; तब अपना मुँह खोलिए, और उसे एक प्रचण्ड धारा के समान बह निकलने दीजिए।

39. ध्यान रखिए कि “मनुष्य का भय, जो फन्दा बन जाता है,” आप पर न हो। अपने लोगों को यह समझने दीजिए कि आप परमेश्वर का इतना अधिक भय मानते हैं कि उनसे नहीं डर सकते।

40. अपने लोगों के बीच अपनी लोकप्रियता के प्रश्न को कभी अपने प्रचार को प्रभावित न करने दीजिए।

41. वेतन के प्रश्न को कभी आपको “परमेश्वर की सारी मनसा को प्रगट करने से, चाहे मनुष्य सुनें या न सुनें,” रोकने न दीजिए।

42. समय देखकर समझौता न कीजिए, कहीं ऐसा न हो कि आप अपने लोगों का भरोसा खो दें, और इस प्रकार उन्हें बचाने में असफल हो जाएँ। यदि वे देखें कि आप अपना कर्तव्य करने का साहस नहीं करते, तो वे मसीह के राजदूत के रूप में आपका पूरा आदर नहीं कर सकते।

43. निश्चय कीजिए कि आप “परमेश्वर के सामने हर एक मनुष्य के विवेक में अपनी भलाई बैठाएँ।”

44. “नीच कमाई के लोभी न” बनिए।

45. घमण्ड के हर प्रकार के दिखावे से बचिए।

46. अपने लोगों को विवश कीजिए कि वे आपकी सच्चाई और आपकी आत्मिक बुद्धि का आदर करें।

47. उन्हें एक क्षण के लिए भी यह न सोचने दीजिए कि आपके प्रचार पर वेतन के किसी भी विचार का प्रभाव पड़ सकता है—चाहे वह अधिक हो, कम हो, या बिल्कुल न हो।

48. यह प्रभाव न पड़ने दीजिए कि आप अच्छे भोजनों के शौक़ीन हैं, और भोज पर बुलाए जाना आपको अच्छा लगता है; क्योंकि यह आपके लिए फन्दा और उनके लिए ठोकर का कारण बन जाएगा।

49. अपनी देह को वश में रखिए, कहीं ऐसा न हो कि औरों को प्रचार करके आप स्वयं निकम्मे ठहरें।

50. “उनकी नाईं आत्माओं के लिए जागते रहिए, जिन्हें परमेश्वर को लेखा देना पड़ेगा।”

51. परिश्रमी विद्यार्थी बनिए, और जो कुछ अपने लोगों के उद्धार के लिए आवश्यक है, उस सब में उन्हें भली-भाँति शिक्षा दीजिए।

52. धनवानों की चापलूसी कभी मत कीजिए।

53. कंगालों की आवश्यकताओं और उनकी शिक्षा पर विशेष ध्यान दीजिए।

54. दान-भेंट की दावतों (डोनेशन पार्टियों) के द्वारा घूस लेकर पाप के साथ समझौता करने में अपने आप को न फँसने दीजिए।

55. सबके सामने अपने साथ भिखारी का-सा व्यवहार न होने दीजिए, नहीं तो आप अपने सुननेवालों के एक बड़े वर्ग की दृष्टि में तुच्छ ठहरेंगे।

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