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आराधना-सभा के बाद कहा कि यह मानना हास्यास्पद है कि किसी पश्चाताप न करनेवाले पापी में कुछ भी उचित या निर्दोष नहीं है। मैंने उत्तर दिया: “मैं तो समझता था कि आप खरे सिद्धान्त को माननेवाले हैं। क्या आप पवित्र आत्मा के द्वारा नए जन्म की सार्वभौमिक आवश्यकता पर विश्वास नहीं करते?” उसने उत्तर दिया: “हाँ, करता हूँ।” मैंने आगे कहा: “क्या आप विश्वास करते हैं कि जिस प्राण का नया जन्म नहीं हुआ, वह कुछ भी ऐसा करता है जो परमेश्वर को ग्रहणयोग्य हो? अपना हृदय बदले जाने से पहले, क्या वह किसी भी बात में कभी ऐसे प्रेरक-भाव से काम करता है जिसे परमेश्वर ग्रहण कर सके? क्या वह पूर्णतः भ्रष्ट नहीं है, इस अर्थ में कि उसका हृदय पूरी तरह ग़लत है, और इसलिए उसके कार्य भी पूरी तरह ग़लत होने ही चाहिए?” वह असमंजस में पड़ा दिखाई दिया, उसने बात को समझ लिया, और चुप हो गया।
किसी नैतिक कर्ता में जो कुछ उचित है, या परमेश्वर की व्यवस्था के अनुसार है, वह सही है। इसलिए यदि कोई किसी काम-धन्धे या किसी मनोरंजन में उचित रीति से लगता है, तो उसे ऐसा परमेश्वर के प्रति सर्वोच्च प्रेम और अपने पड़ोसी के प्रति समान प्रेम से करना होगा; और इसलिए वह पश्चाताप न करनेवाला पापी नहीं, बल्कि मसीही है। यह कहना सीधे-सीधे बेतुका और परस्पर-विरोधी है कि पश्चाताप न करनेवाला प्राण सही हृदय से कुछ करता, या कहता, या छोड़ता है। यदि वह पश्चाताप-रहित है, तो उसका अन्तिम प्रेरक-भाव अनिवार्य रूप से ग़लत होगा; और परिणामस्वरूप उसमें कुछ भी निर्दोष नहीं, बल्कि सब कुछ पापपूर्ण होगा। तो फिर निर्दोष मनोरंजन क्या है? वह केवल वही हो सकता है, और केवल वही, जिसमें केवल लगा ही न जा सकता हो, बल्कि वास्तव में परमेश्वर की महिमा और उसके राज्य के हितों पर एकमात्र दृष्टि रखकर लगा जाता हो। यदि यह अन्तिम और सर्वोच्च अभिप्राय न हो, तो वह निर्दोष नहीं, बल्कि पापपूर्ण मनोरंजन है। अब, मुझे डर है कि ठीक यहीं बहुत-से लोगों का भ्रम है। मनोरंजनों की चर्चा करते समय वे कहते हैं: “इनमें क्या हानि है?” अपने आप को और दूसरों को इस प्रश्न का उत्तर देते समय वे इसकी तह तक नहीं पहुँचते। यदि ऊपर से उन्हें नैतिकता के विरुद्ध कुछ दिखाई नहीं देता, तो वे निर्णय कर लेते हैं कि वह मनोरंजन निर्दोष है। वे उस सर्वोच्च और अन्तिम प्रेरक-भाव की जाँच करने में चूक जाते हैं जिसमें उस कार्य की निर्दोषता या पापमयता पाई जाती है।
पर प्रेरक-भाव से अलग, कोई भी आचरण न तो निर्दोष है और न पापपूर्ण, वैसे ही जैसे किसी मशीन की गतियाँ या किसी निरे पशु के कार्य न निर्दोष होते हैं न पापपूर्ण। इसलिए कार्य करनेवाले व्यक्ति के सर्वोच्च प्रेरक-भाव का पता लगाए बिना किसी भी कार्य या आचरण को निर्दोष या पापपूर्ण नहीं ठहराना चाहिए।
सीधे रूप से या संकेत के द्वारा यह सिखाना कि किसी पश्चाताप न करनेवाले पापी का या किसी पीछे हटनेवाले का कोई भी मनोरंजन निर्दोष है, एक घोर और विनाशकारी कुशिक्षा सिखाना है। माता-पिता को अपने उन बच्चों के मनोरंजनों के विषय में, जिनका मन-परिवर्तन नहीं हुआ है, यह बात स्मरण रखनी चाहिए। सब्त-स्कूल के वे शिक्षक और अधीक्षक, जो अपने सब्त-स्कूलों के लिए मनोरंजनों की योजना बना रहे हैं, वे प्रचारक, जो अपना समय युवाओं के लिए मनोरंजनों की योजना बनाने में बिताते हैं, जो अपने झुण्डों को पिकनिकों और सैर-सपाटे की यात्राओं पर ले जाते हैं, और तरह-तरह के खेलों को उचित ठहराते हैं, उन्हें निश्चय ही यह स्मरण रखना चाहिए कि जब तक वे हृदय की पवित्र दशा में न हों, और यह सब परमेश्वर के प्रति सर्वोच्च प्रेम से और इसके द्वारा परमेश्वर की महिमा करने के सर्वोच्च अभिप्राय से न करें, तब तक समय बिताने के ये ढंग किसी भी प्रकार निर्दोष नहीं, बल्कि अत्यन्त अपराधपूर्ण हैं, और जो लोग लोगों को इन मार्गों पर चलना सिखाते हैं, वे केवल उन नालियों को दिशा दे रहे हैं जिनमें होकर उनकी भ्रष्टता बहेगी। क्योंकि यह सदा स्मरण रहे कि जब तक इन बातों में परमेश्वर के प्रति सर्वोच्च प्रेम से और उसकी महिमा करने के अभिप्राय से न लगा जाए, जब तक वास्तव में उनमें परमेश्वर की महिमा पर एकमात्र दृष्टि रखकर न लगा जाए, तब तक वे निर्दोष नहीं, बल्कि पापपूर्ण मनोरंजन हैं। मुझे फिर से, और यदि सम्भव हो तो और भी अधिक बल देकर, यह कहना होगा कि यह
