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49. यदि हम इस विषय पर चुप रहें, तो स्वाभाविक निष्कर्ष यही निकलेगा कि हम इस पर विश्वास नहीं करते, और निस्सन्देह यह भी कि हम अनुभव से इसके विषय में कुछ नहीं जानते। यह अवश्य ही कलीसिया के लिए ठोकर का कारण बनेगा।
50. चूँकि यह निर्विवाद रूप से एक महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त है, और सुसमाचार में स्पष्ट रूप से सिखाया गया है, और वास्तव में सुसमाचार का गूदा और चिकनाई है, इसलिए इसकी शिक्षा देने में चूकना कलीसिया को उसकी सबसे समृद्ध विरासत से वंचित करना है।
51. इस विषय पर कलीसिया की, और बहुत हद तक सेवकों की भी, गवाही खेदजनक रूप से अधूरी रही है। यह विरासत कलीसिया से रोक रखी गई है; तो क्या यह कोई आश्चर्य की बात है कि वह इतनी लज्जाजनक रीति से पीछे हटती है? यहाँ-वहाँ के उन अपेक्षाकृत थोड़े लोगों की गवाही, जो इस सिद्धान्त पर बल देते हैं, मसीह के गवाहों के विशाल समूह की विरोधी गवाही या दोषपूर्ण चुप्पी के कारण लगभग निष्फल हो जाती है।
52. मेरे प्रिय भाइयो, इस विषय पर मेरे विश्वास इतने परिपक्व और मेरी भावनाएँ इतनी गहरी हैं कि मैं आपसे अपना यह भय छिपा नहीं सकता कि बहुत-से मामलों में सुसमाचार के प्रचार की इस बड़ी कमी का कारण व्यक्तिगत अनुभव का अभाव है। मैं यह आपको उलाहना देने के लिए नहीं कहता; ऐसा करना मेरे मन में नहीं है। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि आप में से बहुतों को, कम से कम, यह अनुभव नहीं है। आपकी धार्मिक शिक्षा-दीक्षा अधूरी रही है। आपको इस विषय पर एक भिन्न दृष्टिकोण अपनाने की ओर ले जाया गया है। अनेक कारणों ने मिलकर आपको महिमामय सुसमाचार के इस धन्य सिद्धान्त के विरुद्ध पूर्वाग्रही बना दिया है। आपने बौद्धिक रूप से इस पर विश्वास नहीं किया; और निस्सन्देह, आपने मसीह को उसकी परिपूर्णता में अपने हृदयों में ग्रहण नहीं किया। शायद यह सिद्धान्त आपके लिए ठोकर का पत्थर और ठेस की चट्टान रहा है; पर मैं आपसे विनती करता हूँ कि पूर्वाग्रह को प्रबल न होने दें, बल्कि मसीह को अभी अपना ज्ञान, धार्मिकता, पवित्रता और छुटकारा मानकर ग्रहण करते हुए उस पर भरोसा करके आगे बढ़ें, और देखें कि क्या वह आपके लिए उन सब बातों से, जो आपने माँगी या सोची थीं, कहीं बढ़कर नहीं करता।
53. किसी भी मनुष्य को, चाहे वह संत हो या पापी, हमें किसी भी पाप में लिप्त रहते हुए चैन से या निश्चिन्त न छोड़ना चाहिए। जहाँ तक हमारा वश चले, किसी ऐसे व्यक्ति को स्वर्ग की आशा रखने न दिया जाए जो किसी भी रूप में जाने-पहचाने पाप में लिप्त रहता है। हमारी निरन्तर माँग और हमारा निरन्तर आग्रह यही होना चाहिए, “तुम पवित्र बनो, क्योंकि परमेश्वर पवित्र है।” “तुम सिद्ध बनो, जैसा तुम्हारा स्वर्गीय पिता सिद्ध है।” आइए, हम स्मरण करें कि मसीह ने अपने स्मरणीय पहाड़ी उपदेश को किस रीति से समाप्त किया। अपने सुननेवालों के सामने उन भयानक रूप से जाँचनेवाले सत्यों को खोलकर रखने के बाद, और यह माँग करने के बाद कि वे सिद्ध बनें, जैसा उनका स्वर्गीय पिता सिद्ध है, वह उन्हें यह निश्चय दिलाकर समाप्त करता है कि जो कोई उसकी शिक्षाओं को ग्रहण करके उनका पालन नहीं करता, उसका उद्धार नहीं हो सकता।
अपने लोगों को उनके पापों में प्रसन्न करने का प्रयत्न करने के बजाय, हमें निरन्तर यह प्रयास करना चाहिए कि उनका पीछा करके और उन्हें समझा-बुझाकर उनके पापों से बाहर निकालें। भाइयो, आइए हम ऐसा ही करें, क्योंकि हम नहीं चाहते कि हमारे वस्त्रों के छोर उनके लहू से अशुद्ध हों। यदि हम यही मार्ग अपनाएँ और निरन्तर अभिषेक और सामर्थ के साथ प्रचार करें, और मसीह के सिद्धान्त की परिपूर्णता में बने रहें, तो हम आनन्द के साथ यह आशा कर सकते हैं कि हम अपना और अपने सुननेवालों का भी उद्धार करेंगे।
