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हमारे भीतर मसीह के आत्मा का जीवन और शक्ति ही हमें पाप से बचा सकती है, और भरोसा ही हमारे भीतर इस उद्धार देनेवाली शक्ति के कार्य करने की एकसमान और सार्वभौमिक शर्त है। धर्म के शिक्षक कब तक इस तथ्य की, कम से कम व्यवहार में, अनदेखी करते रहेंगे? मनुष्य के हृदय में आत्म-धार्मिकता और आत्म-निर्भरता की जड़ें कितनी गहरी हैं? इतनी गहरी कि मानव-हृदय के लिए सीखने को सबसे कठिन पाठों में से एक यह है कि वह आत्म-निर्भरता को त्याग दे और पूरी तरह मसीह पर भरोसा रखे। जब हम पूर्ण भरोसे के द्वारा द्वार खोलते हैं, तो वह भीतर आता है और हमारे साथ और हम में अपना निवास बनाता है। अपने प्रेम को उण्डेलकर वह हमारे सम्पूर्ण प्राणों को जिलाकर अपने साथ सहानुभूति (एक-मन) में ले आता है, और इसी रीति से, और केवल इसी रीति से, वह विश्वास के द्वारा हमारे हृदयों को शुद्ध करता है। वह हमारी इच्छा को भक्ति की दशा में स्थिर बनाए रखता है। वह हमारे स्नेह, इच्छाओं, भूखों और मनोवेगों को जीवित करता और नियंत्रित करता है, और हमारा पवित्रीकरण बन जाता है। प्रार्थना-सभाओं और संगति-सभाओं में, मंच (पल्पिट) से और छापेखाने से जो शिक्षा हम सुनते हैं, उसमें से बहुत कुछ इतनी भ्रामक है कि ऐसी शिक्षा को सुनना या पढ़ना लगभग असहनीय रूप से पीड़ादायक हो जाता है। ऐसी शिक्षा धोखा, निराशा, और सुसमाचार में जिस रूप में मसीह प्रस्तुत किया गया है उस रूप में उसके व्यावहारिक तिरस्कार को जन्म देनेवाली है।
हाय! उस अंधेपन पर जो पाप की सामर्थ से छुटकारे के लिए तरसते हुए प्राण को “भटकाने के लिए ले जाता है”। कभी-कभी मैंने इस विषय पर व्यवस्थावादी शिक्षा को तब तक सुना है जब तक मुझे ऐसा न लगने लगा कि मैं चीख उठूँगा। कभी-कभी यह सुनकर आश्चर्य होता है कि मसीही लोग उस शिक्षा पर, जिस पर मैंने यहाँ बल दिया है, यह आपत्ति करते हैं कि वह हमें एक निष्क्रिय अवस्था में छोड़ देती है, कि हम अपनी किसी सक्रियता के बिना ही बचाए जाएँ। इस आपत्ति में कितना अन्धकार भरा है! बाइबल सिखाती है कि मसीह पर भरोसा रखकर हम एक भीतरी प्रभाव ग्रहण करते हैं जो हमारी सक्रियता को उभारता और उसे दिशा देता है; कि विश्वास के द्वारा हम उसके शुद्ध करनेवाले प्रभाव को अपने अस्तित्व के ठीक केन्द्र में ग्रहण करते हैं; कि प्राण पर सीधे प्रकट किए गए अपने सत्य के द्वारा और उसी के माध्यम से वह हमारे सम्पूर्ण भीतरी अस्तित्व को जिलाकर प्रेमपूर्ण आज्ञाकारिता की दशा में ले आता है; और पाप पर जय पाने का यही मार्ग है, और यही एकमात्र व्यावहारिक मार्ग है। परन्तु कोई कह सकता है: “क्या प्रेरित यह उपदेश नहीं देता: ‘डरते और काँपते हुए अपने अपने उद्धार का कार्य पूरा करते जाओ; क्योंकि परमेश्वर ही है जिस ने अपनी सुइच्छा निमित्त तुम्हारे मन में इच्छा और काम, दोनों बातों के करने का प्रभाव डाला है’? और क्या यह उसी बात को करने का उपदेश नहीं है जिसकी आप इस लेख में निन्दा करते हैं?” कदापि नहीं। फिलिप्पियों के दूसरे अध्याय के 12वें पद में पौलुस कहता है:
“सो हे मेरे प्रियो, जिस प्रकार तुम सदा से आज्ञा मानते आए हो, वैसे ही अब भी न केवल मेरे साथ रहते हुए पर विशेष करके अब मेरे दूर रहने पर भी डरते और काँपते हुए अपने अपने उद्धार का कार्य पूरा करते जाओ, क्योंकि
परमेश्वर ही है जिस ने अपनी सुइच्छा निमित्त तुम्हारे मन में इच्छा और काम, दोनों बातों के करने का प्रभाव डाला है।” यहाँ संकल्प के बल से काम करने का कोई उपदेश नहीं है, वरन् परमेश्वर के भीतरी कार्य के द्वारा और उसी के माध्यम से काम करने का है। पौलुस ने, जब वह उनके साथ था, उन्हें सिखाया था; परन्तु अब, अपनी अनुपस्थिति में, वह उन्हें उपदेश देता है कि वे अपने अपने उद्धार का कार्य पूरा करें — संकल्प के द्वारा नहीं, वरन् परमेश्वर के भीतरी कार्य के द्वारा। ठीक यही इस पुस्तिका का सिद्धान्त है। पौलुस ने कलीसिया को इतनी बार यह सिखाया था कि हृदय में वास करनेवाला मसीह ही हमारा पवित्रीकरण है, और कि यह प्रभाव विश्वास के द्वारा ग्रहण किया जाना है, कि वह इस खण्ड में यह सिखाने का दोषी नहीं हो सकता कि हमारा पवित्रीकरण संकल्प के द्वारा तथा पापमय आदतों को दबाने और पवित्र आदतें बनाने के प्रयत्नों के द्वारा पूरा किया जाना है। पवित्रशास्त्र का यह खण्ड बड़ी सुन्दरता से पवित्रीकरण के कार्य में ईश्वरीय और मानवीय, दोनों प्रकार के कर्तृत्व को स्वीकार करता है। परमेश्वर हम में इच्छा और काम, दोनों उत्पन्न करता है;
