अध्याय 32 (68 में से)

बाइबल हमें यह कहने का अधिकार देती है कि ऐसे मामले अपवाद हैं। इस सूझ-बूझ और

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बाइबल हमें यह कहने का अधिकार देती है कि ऐसे मामले अपवाद हैं। इस सूझ-बूझ और इस उद्देश्य के लिये साधनों को अनुकूल बनाने के बिना एक आत्मिक मन भी आत्माओं को मसीह के लिये जीतने में असफल रहेगा।

28. आत्माओं को उनकी समझ के माप के अनुसार शिक्षा की आवश्यकता होती है। कुछ सरल सत्य, जब बुद्धिमानी से लागू किए जाएँ और पवित्र आत्मा उन्हें प्रकाशित करे, तो बालकों का मन मसीह की ओर फिरा देंगे। मैं कहता हूँ बुद्धिमानी से लागू किए जाएँ, क्योंकि वे भी पापी हैं, और उन्हें मसीह तक पहुँचाने के लिये शिक्षक के रूप में व्यवस्था को लागू करने की आवश्यकता है, कि वे विश्वास से धर्मी ठहरें। देर-सबेर यह प्रकट हो जाएगा कि जहाँ व्यवस्था का तैयारी करनेवाला कार्य छोड़ दिया गया है, और मसीह को पाप और दण्ड की आज्ञा से बचानेवाले उद्धारकर्ता के रूप में ग्रहण नहीं किया गया है, वहाँ मसीह की ओर समझे गए मन-परिवर्तन नकली हैं।

29. शिक्षित और सुसंस्कृत पापी, जो आखिरकार अपने हृदयों में पाप-बोध-रहित और सन्देहवादी होते हैं, उन्हें सत्य के कहीं अधिक विस्तृत और पूर्ण प्रयोग की आवश्यकता होती है। पेशेवर लोगों के चारों ओर सुसमाचार का जाल पूरी तरह फैलाने की आवश्यकता होती है, जिसमें कोई छेद न हो जिससे वे निकल भागें; और जब उनसे इस प्रकार व्यवहार किया जाता है, तो अपनी वास्तविक बुद्धि के अनुपात में उनका मन-परिवर्तन और भी निश्चित होता है। मैंने पाया है कि वकीलों को सम्बोधित, और उनकी सोचने और तर्क करने की आदतों के अनुकूल व्याख्यानों की एक श्रृंखला उनका मन-परिवर्तन करने में सबसे अधिक निश्चित है।

30. आत्माओं को जीतने में सफल होने के लिये हमें ध्यान से देखनेवाला होना चाहिए—व्यक्तिगत चरित्र का अध्ययन करना, और अनुभव, निरीक्षण और प्रकाशन के तथ्यों को सब वर्गों के विवेक पर दबाव के साथ रखना चाहिए।

31. जो शब्द आप प्रयोग करते हैं, उन्हें अवश्य समझाइए। मेरे मन-परिवर्तन से पहले, मैंने कभी पश्चाताप, विश्वास, नया जन्म और मन-परिवर्तन जैसे शब्दों की समझ में आनेवाली व्याख्या नहीं सुनी। पश्चाताप को एक भावना बताया जाता था। विश्वास को एक बौद्धिक क्रिया या दशा के रूप में प्रस्तुत किया जाता था, न कि भरोसे की एक स्वैच्छिक क्रिया के रूप में। नये जन्म को स्वभाव में होनेवाला कोई भौतिक परिवर्तन बताया जाता था, जो पवित्र आत्मा की सीधी सामर्थ से उत्पन्न होता है, न कि प्राण की अन्तिम प्राथमिकता का एक स्वैच्छिक परिवर्तन, जो पवित्र आत्मा के आत्मिक प्रकाश से उत्पन्न होता है। यहाँ तक कि मन-परिवर्तन को भी पवित्र आत्मा का कार्य इस अर्थ में बताया जाता था कि यह तथ्य ढक जाता था कि वह पवित्र आत्मा के समझाने-बुझाने के अधीन पापी का अपना कार्य है।

32. इस तथ्य पर ज़ोर दीजिए कि पश्चाताप में सब पापों का स्वैच्छिक और वास्तविक त्याग सम्मिलित है; कि वह परमेश्वर के प्रति मन का आमूल परिवर्तन है।

33. इस तथ्य पर भी कि उद्धार देनेवाला विश्वास मसीह पर हृदय का भरोसा है; कि वह प्रेम के द्वारा काम करता है, हृदय को शुद्ध करता है, और संसार पर जय पाता है; कि जिस विश्वास में ये गुण नहीं, वह उद्धार देनेवाला विश्वास नहीं।

34. पापी से कुछ मानसिक क्रियाएँ करने की माँग की जाती है। ये क्या हैं, यह उसे समझने की आवश्यकता है। मनोविज्ञान (मानसिक दर्शन) की भूल खोजी प्राण को केवल उलझन में डालती है, और उसे घातक रूप से धोखा दे सकती है। पापियों को प्रायः गलत मार्ग पर डाल दिया जाता है। इच्छा की आवश्यक क्रियाएँ करने के बदले उन्हें कुछ अनुभव करने के लिये ज़ोर लगाने में लगा दिया जाता है। अपने मन-परिवर्तन से पहले मुझे किसी मनुष्य से उन मानसिक क्रियाओं का कोई समझ में आनेवाला विचार कभी नहीं मिला जिनकी परमेश्वर मुझसे माँग करता था।

35. पाप का छल खोजी प्राण को भ्रम के लिये अत्यन्त खुला छोड़ देता है; इसलिये शिक्षकों को उचित है कि वे हर झाड़ी को टटोलें, और हर उस कोने-कोने को खोज निकालें जहाँ कोई प्राण झूठा शरण-स्थान पा सकता है। इतनी पूर्णता और विवेक से काम लीजिए कि

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