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और हम, विश्वास के द्वारा उसके भीतरी कार्य को स्वीकार करके, उसकी सुइच्छा के अनुसार इच्छा करते और काम करते हैं। विश्वास स्वयं एक सक्रिय अवस्था है, निष्क्रिय नहीं। निष्क्रिय पवित्रता असम्भव और बेतुकी बात है। कोई यह न कहे कि जब हम लोगों को पूरी तरह मसीह पर भरोसा रखने का उपदेश देते हैं, तो हम यह सिखाते हैं कि किसी को भीतर के ईश्वरीय प्रभाव को ग्रहण करने और उसके साथ सहयोग करने में निष्क्रिय होना चाहिए या हो सकता है। यह प्रभाव नैतिक है, भौतिक नहीं। यह समझाना-मनाना है, बल-प्रयोग नहीं। यह स्वतंत्र इच्छा को प्रभावित करता है, और इसलिए यह काम सत्य के द्वारा करता है, बल के द्वारा नहीं। आह! काश यह समझ लिया जाता कि किसी भी मनुष्य में जो सम्पूर्ण आत्मिक जीवन है, वह विश्वास के द्वारा सीधे मसीह के आत्मा से प्राप्त होता है, जैसे डाली दाखलता से अपना जीवन पाती है। दूर हो संकल्पों का यह धर्म!
यह मृत्यु का फन्दा है। दूर हो यह प्रयत्न कि जीवन को पवित्र बनाया जाए जबकि हृदय में परमेश्वर का प्रेम है ही नहीं। आह! काश मनुष्य सुसमाचार के द्वारा सीधे मसीह की ओर देखना सीख लेते, और प्रेमपूर्ण भरोसे के एक कार्य के द्वारा उसके साथ ऐसे जुड़ जाते कि उसके मन की दशा के साथ उनकी पूर्ण सहमति (एक-मन) हो जाए। यही, और केवल यही, पवित्रीकरण है।
