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अध्याय 11 — विवेक का ह्रास। मेरा विश्वास है कि यह एक सामान्यतः स्वीकार किया गया तथ्य है कि जीवन के लगभग सभी क्षेत्रों में स्त्री-पुरुषों के द्वारा आज उससे कहीं कम विवेक प्रकट किया जाता है जितना चालीस वर्ष पहले किया जाता था। इस पर उचित ही बहुत शिकायत होती है, और सुधार की आशा बहुत कम दिखाई देती है। ऊँचे और नीचे स्थानों में, मनुष्यों के सभी वर्गों में, जो भ्रष्ट गुटबन्दियाँ, धोखाधड़ियाँ और दुष्टताएँ हो रही हैं, वे अत्यन्त भयावह हैं, और मनुष्य लगभग यह पूछने को विवश हो जाता है: “क्या किसी पर भी निःशंक होकर भरोसा नहीं किया जा सकता?” अब, इस पतन का कारण क्या है? निस्सन्देह ऐसे बहुत से कारण हैं जो कमोबेश सीधे इसमें योगदान देते हैं, परन्तु मुझे निश्चय है कि इसका दोष बाकी किसी भी और सब बातों की अपेक्षा पादरियों की सेवकाई और सार्वजनिक समाचार-पत्रों का अधिक है। अब बहुत वर्षों से प्यूरिटनवाद का उपहास करना और उसकी निन्दा करना फ़ैशन बन गया है। पादरियों ने बड़ी हद तक परमेश्वर की आत्मिक व्यवस्था के द्वारा मनुष्यों के विवेक को टटोलना छोड़ दिया है। जहाँ तक मेरी जानकारी है, परमेश्वर की व्यवस्था की उन गहराई से जाँचनेवाली माँगों को, जो उसके वचन में प्रकट की गई हैं, बहुत ढीला कर दिया गया है और उनकी अनदेखी की गई है। यह व्यवस्था ही सच्ची नैतिकता का एकमात्र मापदण्ड है। “व्यवस्था के द्वारा पाप की पहिचान होती है।” व्यवस्था ही मानव-विवेक को जगानेवाली है। जिस अनुपात में परमेश्वर की व्यवस्था की आत्मिकता को दृष्टि से ओझल रखा जाएगा, ठीक उसी अनुपात में विवेक का ह्रास प्रकट होगा। इसका यही अनिवार्य परिणाम होना है। पादरी प्यूरिटनवाद का उपहास करें, और ईश्वरीय व्यवस्था के द्वारा विवेक को पूरी तरह टटोले बिना सुसमाचार प्रचार करने का प्रयत्न करें, तो इसका परिणाम, कम से कम, नैतिक बोध का आंशिक पक्षाघात अवश्य होगा। व्यक्तिगत और सार्वजनिक विवेक के इस ह्रास की नींव में जो भूल पड़ी है, उसका उद्गम निस्सन्देह मंच (पल्पिट) ही है। मुझे डर है कि सार्वजनिक विवेक के उचित रखवालों ने नैतिक व्यवस्था की व्याख्या करने और उसकी आज्ञाकारिता पर बल देने की बहुत उपेक्षा की है। यह स्पष्ट है कि हमारे कुछ सबसे लोकप्रिय प्रचारक कपालविद्या (फ्रेनोलॉजी) के माननेवाले हैं। कपालविद्या में स्वतंत्र इच्छा का कोई अंग नहीं है। इसलिए उसमें इन शब्दों के किसी भी उचित अर्थ में न कोई नैतिक कर्तृत्व है, न नैतिक व्यवस्था और न नैतिक दायित्व। एक सुसंगत कपालविद्यावादी के पास नैतिक दायित्व, नैतिक दोष, दोषयोग्यता और प्रतिफल-दण्ड के कोई उचित विचार नहीं हो सकते। कुछ वर्ष पहले हमारे एक सबसे लोकप्रिय प्रचारक के एक भाई ने मुझे इस पाठ पर प्रचार करते सुना: “परमेश्वर के साथ मेल मिलाप कर लो।” मैंने अन्य बातों के साथ-साथ यह दिखाया कि परमेश्वर से मेल मिलाप करने में उसकी व्यवस्था के लागू किए जाने से भी मेल कर लेना सम्मिलित है। अगली सुबह वे मुझसे मिलने आए, और अन्य बातों के साथ यह कहा कि न तो उनमें और न उनके दो भाइयों में, जिनके उन्होंने नाम लिए — और वे सब प्रचारक थे — स्वभाव से कोई विवेक था। उन्होंने कहा, “हमारे मन में पाप, दोष, न्याय और प्रतिफल-दण्ड के वैसे कोई विचार नहीं हैं जैसे आप में और पिताजी में हैं।” “हम उन विषयों पर वैसा प्रचार नहीं कर सकते जैसा आप करते हैं।”
उन्होंने आगे कहा: “मैं अपने भीतर विवेक विकसित करने का प्रयत्न कर रहा हूँ, और मैं समझता हूँ कि अब मैं कुछ-कुछ समझने लगा हूँ कि वह क्या है। परन्तु स्वभाव से न तो मुझमें और न उन दो भाइयों में, जिनके मैंने नाम लिए हैं, कोई विवेक है।”
अब, ये तीनों पादरी अपने लेखों के द्वारा बार-बार जनता के सामने आए हैं। उन्होंने जो लिखा है उसमें से मैंने बहुत कुछ पढ़ा है, और प्रायः उनमें से एक के उपदेश भी पढ़े हैं, और मैं उसके उपदेशों और लेखों में विवेक के प्रत्यक्ष अभाव को देखकर चकित हुआ हूँ। वह
