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जो मेरी गवाही देता है; फिर भी तुम जीवन पाने के लिये मेरे पास आना नहीं चाहते।” वे पवित्रशास्त्र पर ही आकर रुक गए। वे यह पता लगाकर सन्तुष्ट हो गए कि पवित्रशास्त्र मसीह के विषय में क्या कहता है, परन्तु इस प्रकार मिली ज्योति का लाभ उठाकर उसके व्यक्तित्व पर प्रेमपूर्ण भरोसे के कार्य के द्वारा उसके पास नहीं आए। मुझे डर है कि जैसा बीते दिनों में होता रहा है, वैसा ही इन दिनों में भी सच है कि भीड़ की भीड़ सुसमाचार के तथ्यों और सिद्धान्तों पर ही आकर रुक जाती है, और उसके व्यक्तित्व पर भरोसे के किसी कार्य के द्वारा उसके पास नहीं आती, जिसके विषय में यह सारी गवाही दी गई है।
इस प्रकार बाइबल को गलत समझा जाता है और उसका दुरुपयोग किया जाता है।
बहुत से लोग “विश्वास-अंगीकार” (कन्फ़ेशन ऑफ़ फ़ेथ) को बाइबल के सिद्धान्तों का सारांश समझकर बाइबल की बहुत उपेक्षा करते हैं और विश्वास के धर्मसूत्रों पर विश्वास करने में ही सन्तुष्ट होकर ठहर जाते हैं। दूसरे, जो अधिक सावधान और अधिक गम्भीर हैं, यह देखने के लिए पवित्रशास्त्र में ढूँढ़ते हैं कि वह मसीह के विषय में क्या कहता है, परन्तु वहीं रुक जाते हैं और सही धर्मवैज्ञानिक मत बना लेने में ही ठहर जाते हैं; जबकि कुछ और लोग — और केवल वही उद्धार पाए हुए वर्ग हैं — पवित्रशास्त्र से अत्यन्त प्रेम करते हैं, क्योंकि वह यीशु की गवाही देता है। वे पवित्रशास्त्र में ढूँढ़ते हैं और उसे मानो निगल जाते हैं, क्योंकि वह उन्हें बताता है कि यीशु कौन है और वे किन बातों के लिए उस पर भरोसा रख सकते हैं। वे इस गवाही पर ही रुककर ठहर नहीं जाते; वरन् प्रेमपूर्ण भरोसे के एक कार्य के द्वारा सीधे उसके पास, उसके व्यक्तित्व के पास जाते हैं, और इस प्रकार अपने प्राणों को उसके साथ ऐसी एकता में जोड़ देते हैं जो सीधे ईश्वरीय संचार के द्वारा उससे वे बातें प्राप्त करती है जिनके लिए उन्हें उस पर भरोसा रखने को प्रेरित किया गया है।
निश्चय ही यही मसीही अनुभव है। यही मसीह से वह अनन्त जीवन प्राप्त करना है जो परमेश्वर ने हमें उसमें दिया है। यही उद्धार देनेवाला विश्वास है।
विश्वास की प्रबलता की बहुत सी मात्राएँ होती हैं — उस विश्वास से लेकर जिसका हमें मुश्किल से ही बोध होता है, उस विश्वास तक जो प्राण में अनन्त जीवन की ऐसी बाढ़ आने देता है कि वह देह की शक्ति पर बिलकुल हावी हो जाती है। विश्वास के सबसे प्रबल प्रयोग में, मन के अत्यधिक प्रबल प्रयोग के नीचे, देह की नसें कुछ समय के लिए जवाब देती हुई प्रतीत होती हैं। मानसिक प्रयोग की यह बड़ी प्रबलता शायद बहुत आम नहीं है। हम अपने प्राणों में परमेश्वर की ज्योति और प्रेम को बहुत थोड़ा ही सह सकते हैं और फिर भी देह में बने रह सकते हैं। कभी-कभी मुझे ऐसा लगा है कि थोड़ा सा और स्पष्ट दर्शन मेरे प्राण को देह से पूरी तरह खींच ले जाएगा, और मुझे बहुत से ऐसे मसीही लोग मिले हैं जिनके लिए आत्मिक प्रभाव के ये प्रबल झोंके परिचित थे। परन्तु इस प्रकार लिखने में मेरा उद्देश्य उद्धार देनेवाले विश्वास के स्वरूप या मनोविज्ञान और उसके परिणामों को स्पष्ट करना है।
मसीह के सम्बन्ध में धर्म का अंगीकार करनेवाले बहुत से मसीहियों की मनोवृत्ति और अनुभव पर विचार करना, यह देखते हुए कि बाइबल उनके हाथों में है, सचमुच खेदजनक और आश्चर्यजनक है। उनमें से बहुत से लोग कमोबेश दृढ़ता से रखे गए धर्मवैज्ञानिक मतों पर ही आकर रुक गए प्रतीत होते हैं। इसी को वे विश्वास समझते हैं। दूसरे अधिक गम्भीर हैं, और बाइबल में मसीह के विषय में दिए गए सत्यों की कमोबेश वास्तविकता का अनुभव करानेवाली धारणा तक पहुँचे बिना नहीं रुकते। कुछ और लोगों पर व्यवस्था के दायित्वों की गहरी छाप होती है, जो उन्हें कर्मों के एक गम्भीर जीवन में लगने को प्रेरित करती है, जो उन्हें बन्धन में ले जाता है। वे कर्तव्य की भावना से प्रार्थना करते हैं; वे कर्तव्यनिष्ठ तो हैं, परन्तु प्रेम करनेवाले नहीं, भरोसा रखनेवाले नहीं। उन्हें न शान्ति है, न विश्राम, सिवाय उन अवसरों के जब वे अपने आप को यह विश्वास दिला लेते हैं कि उन्होंने अपना कर्तव्य पूरा कर दिया है। वे एक बेचैन और यातनापूर्ण दशा में रहते हैं।
“वे विवेक-बुद्धि की बात सुनते हैं, उसकी सलाहों को तौलते हैं,
