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ओझल रखा जाता है? क्या परमेश्वर की पवित्र व्यवस्था, अपनी कठोर आज्ञा और अपने भयानक दण्ड के साथ, उन स्त्री-पुरुषों में लोकप्रिय हो गई है जिनका मन-परिवर्तन नहीं हुआ? या क्या प्रचार-मंच पर उसकी अनदेखी की जाती है, और प्रचारक की कर्तव्य की उस उपेक्षा के लिए प्रशंसा की जाती है जिसके लिए उसे तुच्छ जाना जाना चाहिए? मेरा विश्वास है कि निजी और सार्वजनिक नैतिकता में इस गिरावट की प्रवृत्ति को रोकने का एकमात्र सम्भव मार्ग यही है कि इस देश के प्रचार-मंचों से, बिना किसी रियायत के पूरी विश्वासयोग्यता के साथ, परमेश्वर का सम्पूर्ण सुसमाचार प्रस्तुत किया जाए, जिसमें जीवन के एकमात्र नियम के रूप में परमेश्वर की सिद्ध और पवित्र व्यवस्था भी सम्मिलित हो।
इस व्यवस्था को प्रस्तुत करने से हृदय की नैतिक भ्रष्टता प्रकट होगी, और मसीह के शुद्ध करनेवाले लहू को प्रस्तुत करने से हृदय पाप से शुद्ध होगा। सेवकाई में मेरे प्रिय भाइयो, क्या इस विषय पर प्रचार-मंच की सार्वजनिक शिक्षाओं में एक बड़ी कमी नहीं है? हम धन्य सुसमाचार की रक्षा के लिए और परमेश्वर की पवित्र व्यवस्था को सही ठहराने के लिए ठहराए गए हैं। मैं आपसे विनती करता हूँ, आइए, हम अपने सुननेवालों के विवेक को टटोलें, आइए, हम परमेश्वर की व्यवस्था और सुसमाचार को तब तक गरजकर सुनाएँ जब तक कि हमारी आवाज़ कांग्रेस में हमारे प्रतिनिधियों के द्वारा इस राष्ट्र की राजधानी तक न पहुँच जाए। अब तो धर्मनिरपेक्ष समाचार-पत्रों में भी उपदेशों के अंश छपना बहुत आम हो गया है। आइए, हम पत्रकारों को ऐसा काम दें जिससे उनके और उनके पाठकों के कान सनसना उठें। हमारे रेलमार्गों के भ्रष्ट गुट, हमारे शेयरों के जुआरी, हर श्रेणी के हमारे अधिकारी, यदि वे उसकी आवाज़ की पहुँच में आएँ, तो प्रचार-मंच से ऐसा हितकारी प्यूरिटन प्रचार सुनें जो उन्हें बेहतर विचारों और बेहतर जीवन के लिए जगा दे। दूर हो मसीह के ऐसे प्रेम का यह पानी मिले दूध जैसा फीका प्रचार, जिसमें न कोई पवित्रता है और न नैतिक विवेचन। दूर हो परमेश्वर के ऐसे प्रेम का प्रचार जो प्रतिदिन पापियों पर क्रोध नहीं करता। दूर हो ऐसे मसीह का प्रचार जो पाप के लिए क्रूस पर नहीं चढ़ाया गया।
संसार के पापों के लिए क्रूस पर चढ़ाया गया मसीह ही वह मसीह है जिसकी लोगों को आवश्यकता है। आइए, हम अपने आप को इस उचित आरोप से मुक्त करें कि हम परमेश्वर की व्यवस्था का प्रचार करने में इतनी उपेक्षा करते हैं कि मनुष्यों का विवेक सो जाता है। यदि हमारे प्रचार में से प्यूरिटन तत्व बड़ी हद तक निकल न गया होता, तो इस देश में विवेक का ऐसा पतन कभी न हुआ होता।
कुछ वर्ष पहले मैं एक ऐसी मंडली में प्रचार कर रहा था जिसके पास्टर की कुछ महीने पहले मृत्यु हो गई थी। ऐसा प्रतीत होता था कि वह अपनी कलीसिया और समाज में लगभग सबके बीच लोकप्रिय रहा था। उसकी कलीसिया ने तो मानो उसे लगभग पूज्य ही बना रखा था। हर कोई उसकी प्रशंसा कर रहा था और उसे एक आदर्श के रूप में प्रस्तुत कर रहा था; और फिर भी कलीसिया और समाज दोनों स्पष्ट रूप से यह प्रमाणित कर रहे थे कि उन्हें एक विश्वासघाती पादरी मिला था, एक ऐसा मनुष्य जो अपने लोगों की वाहवाही से प्रेम करता और उसी की खोज में रहता था। मैंने उसकी शिक्षाओं के विषय में इतना कुछ सुना और उसकी शिक्षाओं के स्वाभाविक फलों को इतना कुछ देखा कि मैं प्रचार-मंच से लोगों को यह बताने के लिए विवश हुआ कि उन्हें एक विश्वासघाती पादरी मिला था; कि ऐसे फल, जैसे कलीसिया के भीतर और बाहर दोनों ओर हर तरफ़ प्रकट थे, सुसमाचार को विश्वासयोग्यता से प्रस्तुत करने के परिणामस्वरूप कभी उत्पन्न नहीं हो सकते थे। यदि यह बात किन्हीं और परिस्थितियों में कही गई होती, तो निस्सन्देह उन्हें इससे बड़ा धक्का लगता; परन्तु क्योंकि मार्ग पहले से तैयार हो चुका था, वे इसका खण्डन करने को इच्छुक नहीं दिखे।
भाइयो, हमारा प्रचार अपने स्वाभाविक फल लाएगा। यदि देश में अनैतिकता का बोलबाला है, तो बड़ी हद तक दोष हमारा है। यदि विवेक का ह्रास हुआ है, तो प्रचार-मंच इसके लिए उत्तरदायी
