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अध्ययन और बुद्धि के विकास का बोझ डाला जाता है, जबकि मसीही अनुभव की शिक्षा के लिये दिन में मुश्किल से एक घंटा दिया जाता है। सच तो यह है कि मैं नहीं जानता कि धर्मविज्ञान के विद्यालयों में मसीही अनुभव पर व्याख्यानों की एक भी श्रृंखला दी जाती हो। परन्तु धर्म एक अनुभव है। वह एक चेतना है। परमेश्वर के साथ व्यक्तिगत संगति ही उसका सम्पूर्ण रहस्य है। इस दिशा में अत्यन्त आवश्यक ज्ञान का एक संसार है जिसकी धर्मविज्ञान के विद्यालय पूरी तरह उपेक्षा करते हैं। उनके लिये सिद्धान्त, दर्शनशास्त्र, धर्मविज्ञान, कलीसिया का इतिहास और उपदेश-रचना ही सब कुछ हैं, और परमेश्वर के साथ हृदय की वास्तविक एकता कुछ भी नहीं। परमेश्वर के साथ प्रबल होने और मनुष्यों के साथ प्रबल होने की आत्मिक सामर्थ को उनकी शिक्षा में बहुत थोड़ा स्थान मिलता है। सेवकाई की तैयारी कर रहे युवकों की भावी उपयोगिता के विषय में लोग जो अनुमान लगाते हैं, उस पर मुझे प्रायः आश्चर्य हुआ है।
मैं देखता हूँ कि प्रोफ़ेसर (प्राध्यापक) भी इस विषय में अपने आप को धोखा देने के लिये बहुत प्रवृत्त रहते हैं। यदि कोई युवक अच्छा विद्वान हो, अच्छा लेखक हो, पवित्रशास्त्र की व्याख्या में अच्छी प्रगति करे, और बौद्धिक शिक्षा में ऊँचा स्थान रखता हो, तो वे उससे बड़ी आशाएँ रखते हैं, यद्यपि ऐसे बहुत से मामलों में उन्हें अवश्य पता होगा कि ये युवक प्रार्थना नहीं कर सकते; कि उनमें कोई अभिषेक नहीं, प्रार्थना में कोई सामर्थ नहीं, परमेश्वर से मल्लयुद्ध करने, वेदना सहने और प्रबल होने की कोई आत्मा नहीं। फिर भी वे अपेक्षा करते हैं कि ये अपनी शिक्षा के कारण सेवकाई में अपनी छाप छोड़ेंगे और बहुत उपयोगी होंगे। जहाँ तक मेरी बात है, मैं इस प्रकार के लोगों से ऐसी कोई अपेक्षा नहीं रखता। मुझे उस व्यक्ति की उपयोगिता से असीम रूप से अधिक आशा है जो किसी भी कीमत पर परमेश्वर के साथ प्रतिदिन संगति बनाए रखेगा; जो सबसे ऊँची सम्भव आत्मिक उपलब्धि के लिये तरसता और संघर्ष करता है; जो प्रार्थना में प्रतिदिन प्रबल हुए बिना और ऊपर से सामर्थ पहने बिना जीना स्वीकार नहीं करेगा। कलीसियाएँ, प्रेस्बिटरियाँ, एसोसिएशन (संघ), और वे सब जो युवकों को सेवकाई के लिये अनुज्ञा (लाइसेंस) देते हैं, इस विषय में प्रायः बहुत दोषी होते हैं। वे उम्मीदवारों की बौद्धिक शिक्षा के विषय में जानकारी लेने में घंटों लगा देंगे, परन्तु उनके हृदय की शिक्षा का पता लगाने में मुश्किल से उतने मिनट भी लगाएँगे—कि वे पाप से बचाने की मसीह की सामर्थ के विषय में क्या जानते हैं, प्रार्थना की सामर्थ के विषय में क्या जानते हैं, और क्या, और किस सीमा तक, वे आत्माओं को मसीह के लिये जीतने के लिये ऊपर से सामर्थ से भरे हुए हैं। ऐसे अवसरों पर सारी कार्यवाही यही प्रभाव छोड़े बिना नहीं रह सकती कि आत्मिक अभिषेक की अपेक्षा मानवीय विद्या को अधिक पसन्द किया जाता है। आह! काश, यह भिन्न होता, और हम सब व्यावहारिक रूप से, अब और सदा के लिये, इस बात पर सहमत होते कि मसीह की प्रतिज्ञा को दृढ़ता से थामे रहें, और जब तक हम ऊपर से सामर्थ का भरपूर वरदान न पा लें, तब तक न अपने आप को और न किसी और को कलीसिया के महान कार्य के योग्य समझें। मैं अपने भाइयों से, और विशेष रूप से अपने युवा भाइयों से, विनती करता हूँ कि वे इन लेखों को निन्दा की आत्मा में लिखे हुए न समझें। मैं कलीसियाओं से विनती करता हूँ, मैं विद्यालयों से विनती करता हूँ, कि वे एक बूढ़े व्यक्ति के उपदेश का यह वचन ग्रहण करें, जिसे इन बातों का कुछ अनुभव है, और जिसका हृदय इस विषय में कलीसिया, पादरियों और विद्यालयों की कमियों को देखकर शोक करता है और बोझ से दबा हुआ है। भाइयो, मैं आपसे विनती करता हूँ कि आप इस विषय पर और भी गहराई से विचार करें, जाग उठें और इसे मन में रखें, और तब तक चैन न लें जब तक ऊपर से सामर्थ के वरदान का यह विषय अपने उचित स्थान पर न लाया जाए, और सारी कलीसिया की दृष्टि में वह प्रमुख और व्यावहारिक स्थान न ले ले जो मसीह ने उसके लिये ठहराया था।
