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उसके बिना ही काम चला लें; न अपने काम-धन्धे में लगे रहकर, और कभी-कभार यह प्रार्थना कर लेने के द्वारा कि प्रतिज्ञा पूरी हो जाए; वरन् वे प्रार्थना में लगे रहे, और अपनी विनती पर तब तक अड़े रहे जब तक उत्तर न आ गया। वे समझते थे कि यह पवित्र आत्मा का बपतिस्मा होगा। वे समझते थे कि यह मसीह से प्राप्त होगा। उन्होंने विश्वास से प्रार्थना की। वे अत्यन्त दृढ़ आशा के साथ डटे रहे, जब तक कि वरदान न आ गया। अब, इन तथ्यों से हम सामर्थ के इस वरदान को पाने की शर्तों के विषय में शिक्षा लें।
मसीही होने के नाते हमें भी वही आज्ञा पूरी करनी है। जितनी सच्चाई से उन्हें ऊपर से सामर्थ के वरदान की आवश्यकता थी, उतनी ही हमें भी है। निस्सन्देह, हमें भी वही आदेश दिया गया है कि जब तक हम इसे न पा लें तब तक परमेश्वर की बाट जोहते रहें।
हमारे पास वही प्रतिज्ञा है जो उनके पास थी। तो आइए, हम सार रूप में और आत्मा में वही मार्ग अपनाएँ जो उन्होंने अपनाया। वे मसीही थे, और प्रार्थना और समर्पण में उनकी अगुवाई करने के लिए उनमें आत्मा का कुछ अंश था। हममें भी है। हर मसीही में मसीह के आत्मा का कुछ अंश होता है — पवित्र आत्मा का इतना अंश कि वह हमें सच्चे समर्पण की ओर ले जाए और हममें वह विश्वास उत्पन्न करे जो प्रार्थना में हमारी प्रबलता के लिए आवश्यक है। तो आइए, हम उसे शोकित न करें और न उसका विरोध करें: वरन् आज्ञा को स्वीकार करें, अपने आप को, अपने सब कुछ के साथ, प्राणों के उद्धार के लिए अपने जीवन के महान और एकमात्र काम के रूप में पूरी तरह समर्पित कर दें। आइए, हम अपने सब कुछ के साथ, और जो कुछ हम हैं उस सब के साथ वेदी पर चढ़ जाएँ, और वहीं पड़े रहें और तब तक प्रार्थना में लगे रहें जब तक हमें वरदान न मिल जाए। अब ध्यान दीजिए, मसीह की ओर मन-परिवर्तन को संसार का मन-परिवर्तन कराने की इस आज्ञा के स्वीकार करने के साथ मिलाकर गड़बड़ नहीं करना चाहिए। पहली बात प्राण और मसीह के बीच उस प्राण के अपने उद्धार से सम्बन्धित एक व्यक्तिगत लेन-देन है। दूसरी बात प्राण का उस सेवा को स्वीकार करना है जिसमें मसीह उसे लगाना चाहता है। मसीह हमसे बिना भूसे के ईंटें बनवाने की माँग नहीं करता। जिसे वह आज्ञा देता है, उसे वह चेतावनी और प्रतिज्ञा भी देता है। यदि आज्ञा को हृदय से स्वीकार किया जाए, यदि प्रतिज्ञा पर विश्वास किया जाए, यदि जब तक हमारा बल नया न हो जाए तब तक प्रभु की बाट जोहने की चेतावनी का पालन किया जाए, तो हमें वह वरदान मिलेगा।
यह अत्यन्त महत्वपूर्ण है कि सब मसीही यह समझें कि संसार का मन-परिवर्तन कराने की यह आज्ञा मसीह ने उनमें से हर एक को व्यक्तिगत रूप से दी है।
हर पुरुष और हर स्त्री पर यह बड़ी ज़िम्मेदारी डाली गई है कि वह जितने अधिक प्राणों को हो सके, मसीह के लिए जीते। यह मसीह के सब चेलों का महान विशेषाधिकार और महान कर्तव्य है। इस काम के बहुत से विभाग हैं। परन्तु हर विभाग में हमें यह सामर्थ प्राप्त हो सकती है और होनी चाहिए, ताकि चाहे हम प्रचार करें, या प्रार्थना करें, या लिखें, या छापें, या व्यापार करें, या यात्रा करें, बच्चों की देखभाल करें, या राज्य का शासन चलाएँ, या जो कुछ भी करें, हमारा सारा जीवन और प्रभाव इस सामर्थ से भरा हुआ हो। मसीह कहता है: “यदि कोई मुझ पर विश्वास करे, तो उसके हृदय में से जीवन के जल की नदियाँ बह निकलेंगी” — अर्थात् एक मसीही प्रभाव, जिसमें मनुष्यों के हृदयों पर मसीह के सत्य की छाप डालने की सामर्थ का तत्व हो, उससे निकलेगा। इस समय कलीसिया की सबसे बड़ी आवश्यकता, पहले तो, यह जीवन्त दृढ़ विश्वास है कि संसार का मन-परिवर्तन कराने की यह आज्ञा मसीह के हर चेले को उसके जीवन के काम के रूप में दी गई है। मुझे डर है कि मुझे यह कहना पड़ेगा कि मसीही होने का अंगीकार करनेवालों की विशाल भीड़ पर मानो इस सत्य की छाप कभी पड़ी ही नहीं। प्राणों के उद्धार का काम वे पादरियों पर छोड़ देते हैं।
