अध्याय 30 (68 में से)

10. पापियों को उनके बैर का बोध कराया जाना चाहिए। वे परमेश्वर को नहीं जानते, और परि-

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10. पापियों को उनके बैर का बोध कराया जाना चाहिए। वे परमेश्वर को नहीं जानते, और परिणामस्वरूप प्रायः अपने हृदयों के उस विरोध से अनजान रहते हैं जो वे उसके प्रति रखते हैं। “व्यवस्था के द्वारा पाप की पहिचान होती है,” क्योंकि व्यवस्था के द्वारा ही पापी को परमेश्वर का पहला सच्चा ज्ञान मिलता है। व्यवस्था के द्वारा ही वह पहली बार सीखता है कि परमेश्वर पूर्ण रूप से परोपकारी है, और हर प्रकार के स्वार्थ का असीम रूप से विरोधी है। इसलिये इस व्यवस्था को उसकी सारी महिमा के साथ पापी के स्वार्थ और बैर के विरुद्ध खड़ा किया जाना चाहिए।

11. यह व्यवस्था अपनी धार्मिकता का ऐसा बोध कराती है जिसका विरोध नहीं किया जा सकता, और कोई भी नैतिक कर्ता उस पर सन्देह नहीं कर सकता।

12. सब मनुष्य जानते हैं कि उन्होंने पाप किया है, परन्तु सब को पाप के दोष और उसके दण्ड-योग्य होने का बोध नहीं होता। अधिकांश लोग लापरवाह हैं और पाप का बोझ, पछतावे की भयानकता और आतंक अनुभव नहीं करते, और उन्हें दोषी ठहराए जाने और खोए हुए होने का कोई बोध नहीं होता।

13. परन्तु इसके बिना वे उद्धार की सुसमाचारीय विधि को न समझ सकते हैं और न उसका मूल्य आँक सकते हैं। कोई भी समझ-बूझकर और हृदय से क्षमा न माँग सकता है और न स्वीकार कर सकता है, जब तक वह अपने दोषी ठहराए जाने के तथ्य और उसके न्यायोचित होने को देख और अनुभव न कर ले।

14. यह मान लेना मूर्खता है कि एक लापरवाह पापी, जिसे पाप का बोध नहीं हुआ, समझ-बूझकर और धन्यवाद के साथ सुसमाचार की क्षमा के प्रस्ताव को स्वीकार कर सकता है, जब तक कि वह अपने दोषी ठहराए जाने में परमेश्वर की धार्मिकता को स्वीकार न कर ले। मसीह की ओर मन-परिवर्तन एक समझ-बूझकर किया गया परिवर्तन है। इसलिये दया को स्वीकार करने से पहले अपने दण्ड-योग्य होने का बोध होना आवश्यक है; क्योंकि इस बोध के बिना प्राण अपनी दया की आवश्यकता को नहीं समझता। निश्चय ही, तब वह प्रस्ताव ठुकरा दिया जाता है। लापरवाह, पाप-बोध-रहित पापी के लिये सुसमाचार कोई शुभ समाचार नहीं है।

15. व्यवस्था की आत्मिकता को बिना किसी रियायत के विवेक पर तब तक लागू किया जाना चाहिए जब तक पापी की आत्म-धार्मिकता मिट न जाए, और वह एक पवित्र परमेश्वर के सामने निरुत्तर और स्वयं दोषी ठहरा हुआ खड़ा न हो जाए।

16. कुछ मनुष्यों में यह बोध पहले ही से पक चुका होता है, और प्रचारक तुरन्त मसीह को इस आशा के साथ प्रस्तुत कर सकता है कि उसे ग्रहण किया जाएगा; परन्तु साधारण समयों में ऐसे मामले अपवाद होते हैं।

पापियों का बड़ा समूह लापरवाह है, उसे पाप का बोध नहीं है; और यह मान लेना कि उन्हें पाप का बोध हो चुका है और वे मसीह को ग्रहण करने के लिये तैयार हैं, और इसलिये पापियों से तुरन्त उसे ग्रहण करने का आग्रह करना, अपने काम को गलत सिरे से आरम्भ करना है—अपनी शिक्षा को समझ से परे बना देना है। और ऐसा मार्ग, वर्तमान में चाहे कुछ भी दिखाई दे और लोग चाहे कुछ भी अंगीकार करें, अन्त में भूल भरा पाया जाएगा। ऐसी शिक्षा के अधीन पापी को एक आशा मिल सकती है; परन्तु जब तक पवित्र आत्मा वह पूरा न करे जिसे करने में प्रचारक चूक गया, तब तक वह आशा झूठी पाई जाएगी। सत्य की सब आवश्यक कड़ियाँ जोड़ी जानी चाहिए।

17. जब व्यवस्था अपना काम कर चुके, आत्म-धार्मिकता को मिटा दे, और पापी को दया स्वीकार करने के लिये विवश कर दे, तब उसे यह समझाया जाना चाहिए कि जब व्यवस्था की आज्ञा का उल्लंघन हुआ हो, तब दण्ड को लागू न करना कितना नाज़ुक और कितना खतरनाक विषय है।

18. ठीक यहीं पापी को यह समझाया जाना चाहिए कि परमेश्वर के परोपकार से वह न्यायपूर्वक यह निष्कर्ष नहीं निकाल सकता कि परमेश्वर संगतिपूर्वक उसे क्षमा कर सकता है। क्योंकि जब तक सार्वजनिक न्याय सन्तुष्ट न हो, तब तक सार्वभौमिक परोपकार की व्यवस्था पाप की क्षमा को मना करती है। यदि दया करते समय सार्वजनिक

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