अध्याय 27 (68 में से)

कैसा परिवर्तन आ गया है। यह अवश्य जागृति का आरम्भ होगा।” हाँ; एक अद्भुत

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कैसा परिवर्तन आ गया है। यह अवश्य जागृति का आरम्भ होगा।” हाँ; जब कभी मसीही लोग जागृत होते हैं, तो सब सभाओं में एक अद्भुत परिवर्तन आ जाता है। तब उनके पाप-स्वीकार का कुछ अर्थ होता है। उनका अर्थ होता है सुधार और क्षतिपूर्ति। उनका अर्थ होता है काम।

उनका अर्थ होता है साधनों का उपयोग। उनका अर्थ होता है उनकी जेबों का, उनके हृदयों और हाथों का खुल जाना, और उनकी सारी शक्तियों का इस कार्य को बढ़ाने में समर्पित हो जाना।

(s) प्रबल प्रार्थना विशिष्ट होती है। वह किसी निश्चित उद्देश्य के लिये की जाती है। हम एक ही बार में हर बात के लिये प्रबल नहीं हो सकते। बाइबल में लिखे उन सब उदाहरणों में, जिनमें प्रार्थना का उत्तर मिला, यह ध्यान देने योग्य है कि विनती करनेवाले ने किसी निश्चित उद्देश्य के लिये प्रार्थना की।

(t) प्रबल प्रार्थना की एक और शर्त यह है कि प्रार्थना में जो हम कहते हैं, वही हमारा अभिप्राय हो; कि हम कोई झूठा दिखावा न करें; संक्षेप में, कि हम पूरी तरह बालक-समान और निष्कपट हों, हृदय से बोलें, और उससे न कुछ अधिक न कुछ कम कहें जो हमारा अभिप्राय है, जो हम अनुभव करते हैं और जिस पर हम विश्वास करते हैं।

(u) प्रबल प्रार्थना की एक और शर्त मन की ऐसी दशा है जो परमेश्वर की सब प्रतिज्ञाओं में उसकी सच्चाई (विश्वासयोग्यता) को निश्चित मानकर चलती है।

(v) एक और शर्त है “प्रार्थना के लिये जागते रहना” और साथ ही “पवित्र आत्मा में प्रार्थना करना।”

इससे मेरा अभिप्राय है हर उस बात से चौकस रहना जो हमारे हृदयों में परमेश्वर के आत्मा को बुझा सकती या शोकित कर सकती है। और उत्तर की बाट भी जोहते रहना, मन की ऐसी दशा में जो किसी भी कीमत पर सब आवश्यक साधनों का परिश्रम से उपयोग करे, और विनती पर विनती करती जाए।

जब मसीहियों के हृदयों में पड़ती भूमि पूरी तरह जोत दी जाती है, जब वे पाप मान लेते हैं और क्षतिपूर्ति कर देते हैं—यदि यह काम पूरा और ईमानदारी से हो—तो वे स्वाभाविक रूप से और अनिवार्य रूप से शर्तें पूरी करेंगे, और प्रार्थना में प्रबल होंगे। परन्तु यह बात जितनी स्पष्टता से समझी जाए उतना ही अच्छा है कि दूसरे कोई प्रबल नहीं होंगे। प्रार्थना-सभाओं और विचार-सभाओं में जो हम सामान्यतः सुनते हैं, वह प्रबल प्रार्थना नहीं है। इस विषय पर जो भ्रम फैले हुए हैं, उन्हें देखना प्रायः आश्चर्यजनक और दुःखदायी होता है। धर्म की सच्ची जागृतियाँ देखनेवालों में से कौन ऐसा है जो सचमुच जागृत हुए मसीहियों की प्रार्थनाओं की सम्पूर्ण आत्मा और ढंग में आनेवाले परिवर्तन से चकित न हुआ हो? मैं नहीं समझता कि यदि मैंने इस प्रश्न का समाधान न पाया होता तो मेरा कभी मन-परिवर्तन हो सकता: “ऐसा क्यों है कि जिसे प्रार्थना कहा जाता है, उसमें से इतनी अधिक का उत्तर नहीं मिलता?”

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