अध्याय 10 (68 में से)

अपशब्दों और निन्दा पर मैंने विशेष रूप से ध्यान दिया था, तो अपने भरे हुए हृदय और उमड़ते आँसुओं के साथ

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अपशब्दों और निन्दा पर मैंने विशेष रूप से ध्यान दिया था, तो अपने भरे हुए हृदय और उमड़ते आँसुओं के साथ

मैंने उनकी ओर संकेत करके कहा, “मैंने इन लोगों को परमेश्वर से अपने साथियों को नरक में डालने की दुहाई देते सुना।” वचन का सामर्थी प्रभाव पड़ा। कोई भी नाराज़ होता हुआ नहीं दिखा, वरन् लगभग हर कोई बहुत पिघल गया।

आराधना के अन्त में सुशील होटल-मालिक, श्री कोपलैंड, खड़े हुए और कहा कि वे दोपहर के बाद सभा-भवन खोल देंगे। उन्होंने वैसा ही किया। सभा-भवन भर गया, और सुबह की ही तरह वचन का सामर्थी प्रभाव पड़ा। इस प्रकार गाँव में एक सामर्थी जागृति आरम्भ हुई, जो शीघ्र ही चारों ओर फैल गई। मेरे विचार में यह इसके बाद के दूसरे सब्त की बात है, जब मैं दोपहर बाद मंच (पल्पिट) से उतरा, तो एक बूढ़ा व्यक्ति मेरे पास आया और मुझसे बोला: “क्या आप हमारे मोहल्ले में आकर प्रचार नहीं कर सकते? वहाँ हमारी कभी कोई धार्मिक सभा नहीं हुई।” मैंने दिशा और दूरी पूछी, और अगले दिन, सोमवार को दोपहर बाद पाँच बजे उनके स्कूल-भवन में प्रचार करना तय किया। प्रभु के दिन मैं गाँव में तीन बार प्रचार कर चुका था, और दो प्रार्थना-सभाओं में सम्मिलित हो चुका था; और सोमवार को

मैं यह वचन निभाने के लिए पैदल चल पड़ा। उस दिन बहुत गर्मी थी, और वहाँ पहुँचने से पहले ही मुझे ऐसा लगा कि मैं इतना शिथिल हो गया हूँ कि चल भी नहीं सकता, और मैं मन में बहुत निरुत्साहित हो गया। मैं मार्ग के किनारे छाया में बैठ गया, और मुझे लगा कि मैं इतना थका हुआ हूँ कि वहाँ पहुँच नहीं सकूँगा; और यदि पहुँच भी गया, तो इतना निरुत्साहित हूँ कि लोगों के सामने मुँह भी नहीं खोल सकूँगा। जब मैं पहुँचा तो मैंने भवन को भरा हुआ पाया, और तुरन्त एक भजन पढ़कर आराधना आरम्भ की। उन्होंने गाने का प्रयत्न किया, परन्तु उस भयानक बेसुरेपन ने मुझे अवर्णनीय पीड़ा दी। मैं आगे झुक गया, अपनी कोहनियाँ घुटनों पर टिकाईं और हाथों से कान बन्द कर लिए, और साथ ही बेसुरेपन को रोकने के लिए सिर भी हिलाता रहा, जिसे मैं तब भी मुश्किल से सह पा रहा था। जैसे ही उन्होंने गाना बन्द किया, मैं लगभग हताशा की दशा में घुटनों के बल गिर पड़ा। प्रभु ने मुझ पर स्वर्ग के झरोखे खोल दिए, और मुझे प्रार्थना में बड़ी स्वतन्त्रता और सामर्थ दी। इस क्षण तक

मुझे कुछ पता नहीं था कि इस अवसर पर मैं कौन-सा मूल-पाठ लूँगा। जब मैं घुटनों से उठा तो प्रभु ने मुझे यह वचन दिया: “उठो, इस स्थान से निकल चलो; क्योंकि यहोवा इस नगर को नाश करने पर है।” जहाँ तक मुझे याद था, मैंने लोगों को बताया कि यह वचन उन्हें कहाँ मिलेगा, और फिर उन्हें सदोम के विनाश के विषय में बताने लगा। मैंने उन्हें अब्राहम और लूत के इतिहास की, और उनके आपसी सम्बन्धों की रूपरेखा बताई; अब्राहम के सदोम के लिए प्रार्थना करने की, और लूत की, जो उस नगर में पाया गया एकमात्र भक्त मनुष्य था। जब मैं यह कर रहा था तो मैंने इस बात पर ध्यान दिया कि लोग मेरे विषय में बहुत क्रोधित दिखाई दे रहे थे। बहुत से चेहरे बड़े धमकी भरे लग रहे थे, और मेरे निकट बैठे कुछ पुरुष ऐसे दिख रहे थे मानो मुझे मारने ही वाले हों। यह मेरी समझ में नहीं आया, क्योंकि मैं तो आत्मा की बड़ी स्वतन्त्रता के साथ उन्हें केवल बाइबल के इतिहास के कुछ रोचक चित्र दे रहा था। जैसे ही मैंने ऐतिहासिक वर्णन पूरा किया, मैं उनकी ओर मुड़ा, और कहा कि मुझे मालूम हुआ है कि उस मोहल्ले में उनकी कभी कोई धार्मिक सभा नहीं हुई; और उस तथ्य को उन पर लागू करते हुए, मैंने अपनी पूरी शक्ति से आत्मा की तलवार से उन पर वार किया। उस क्षण से गम्भीरता बड़ी तेज़ी से बढ़ती गई। कुछ ही क्षणों में ऐसा लगा मानो पूरी मंडली पर एकाएक एक झटका आ पड़ा। जो अनुभूति मुझे हुई, और जो मंडली में स्पष्ट दिखाई दे रही थी, उसका मैं वर्णन नहीं कर सकता; परन्तु वचन मानो सचमुच तलवार के समान काट रहा था। ऊपर से सामर्थ उन पर ऐसी धारा के समान उतरी कि वे

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