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कलीसियाओं की यह रीति हुआ करती थी, और मेरा विश्वास है कि कुछ स्थानों में अब भी है, कि पास्टर-पद के लिये बुलाहट प्रस्तुत करते समय वे यह प्रमाणित करती थीं कि उसके परिश्रम के आत्मिक फल देखकर वे उसे सेवकाई के काम के लिये योग्य और परमेश्वर की ओर से बुलाया हुआ समझती हैं। कलीसियाओं को किसी न किसी रीति से भली-भाँति निश्चित कर लेना चाहिए कि वे एक फलवन्त पादरी को बुला रही हैं, न कि एक सूखे डंठल को—अर्थात् केवल एक बुद्धि को, केवल एक मस्तिष्क को जिसमें हृदय बहुत थोड़ा है; एक सुरुचिपूर्ण लेखक को, परन्तु जिसमें कोई अभिषेक नहीं; एक महान तार्किक को, परन्तु जिसमें विश्वास थोड़ा है; सम्भव है एक प्रखर कल्पना-शक्तिवाले को, परन्तु जिसमें पवित्र आत्मा की कोई सामर्थ नहीं।
कलीसियाओं को इस विषय में धर्मविज्ञान के विद्यालयों (थियोलॉजिकल सेमिनरियों) से कड़ा हिसाब लेना चाहिए; और जब तक वे ऐसा नहीं करतीं, मुझे डर है कि धर्मविज्ञान के विद्यालय अपनी ज़िम्मेदारी के प्रति कभी नहीं जागेंगे।
कुछ वर्ष पहले, स्कॉटलैंड की कलीसिया की एक शाखा उस अभिषेक और सामर्थ की कमी से, जो उनके धर्मविज्ञान के विद्यालय द्वारा दिए गए पादरियों में थी, इतनी परेशान हुई कि उन्होंने यह प्रस्ताव पारित किया कि जब तक वह विद्यालय इस विषय में सुधार न करे, तब तक वे वहाँ से शिक्षा पाए हुए पादरियों को नियुक्त नहीं करेंगे। यह एक आवश्यक, न्यायपूर्ण और समयोचित ताड़ना थी, जिसका, मेरा विश्वास है, बहुत हितकारी प्रभाव पड़ा। धर्मविज्ञान का विद्यालय हर हाल में केवल सिद्धान्त सिखाने का विद्यालय ही नहीं, वरन् उससे भी बढ़कर और विशेष रूप से मसीही अनुभव के विकास का विद्यालय होना चाहिए। निःसन्देह उन विद्यालयों में बुद्धि को भली-भाँति सुसज्जित किया जाना चाहिए; परन्तु इससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण यह है कि विद्यार्थियों को मसीह के, और उसके पुनरुत्थान की सामर्थ के, और उसके दुखों में सहभागी होने के पूरे व्यक्तिगत ज्ञान तक पहुँचाया जाए, और वे उसकी मृत्यु की समानता में ढाले जाएँ। जो धर्मविज्ञान का विद्यालय मुख्य रूप से बुद्धि के विकास को लक्ष्य बनाता है, और ऐसे विद्वान लोगों को भेजता है जिनमें ऊपर से मिलनेवाले इस सामर्थ के वरदान की कमी है, वह कलीसिया के लिये एक फन्दा और ठोकर का कारण है। विद्यालयों को कलीसियाओं के लिये किसी की भी सिफ़ारिश नहीं करनी चाहिए, चाहे उसकी बौद्धिक उपलब्धियाँ कितनी ही बड़ी क्यों न हों, जब तक उसके पास सब उपलब्धियों में से यह सबसे आवश्यक उपलब्धि, अर्थात् ऊपर से सामर्थ का वरदान, न हो। यदि यह देखा जाए कि विद्यालय ऐसे लोगों को पादरी बनाकर भेजते हैं जिनमें यह सबसे आवश्यक योग्यता नहीं है, तो उन्हें सेवकाई के लिये लोगों को शिक्षित करने में अक्षम समझा जाना चाहिए। कलीसियाओं को स्वयं जानकारी प्राप्त करनी चाहिए, और उन विद्यालयों की ओर देखना चाहिए जो केवल सबसे अधिक पढ़े-लिखे ही नहीं, वरन् सबसे अधिक अभिषेक से भरे और आत्मिक रूप से सामर्थी पादरी देते हैं। यह आश्चर्य की बात है कि जबकि सामान्य रूप से यह माना जाता है कि ऊपर से सामर्थ का वरदान एक वास्तविकता है और सेवकाई की सफलता के लिये आवश्यक है, तौभी व्यवहार में कलीसियाएँ और विद्यालय इसे अपेक्षाकृत बहुत कम महत्व का मानकर बरतते हैं। सिद्धान्त में इसे सब कुछ माना जाता है; परन्तु व्यवहार में ऐसे बरता जाता है मानो यह कुछ भी नहीं। प्रेरितों के समय से लेकर आज तक यह देखा गया है कि बहुत थोड़ी मानवीय शिक्षा वाले, परन्तु इस सामर्थ से भरे हुए लोग आत्माओं को मसीह के लिये जीतने में अत्यन्त सफल हुए हैं; जबकि सबसे बड़े विद्वान, विद्यालयों ने उनके लिये जो कुछ किया उस सब के बावजूद, जहाँ तक सेवकाई के वास्तविक काम का सम्बन्ध है, सामर्थहीन रहे हैं। और फिर भी हम मानवीय शिक्षा पर उससे दस गुना अधिक ज़ोर देते चले जाते हैं जितना पवित्र
आत्मा के बपतिस्मा पर। व्यवहार में मानवीय शिक्षा को ऊपर से मिलनेवाले सामर्थ के वरदान से असीम रूप से अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। विद्यालयों में विद्वान लोग तो होते हैं, परन्तु प्रायः आत्मिक सामर्थ वाले लोग नहीं होते; इसलिये वे सामर्थ के इस वरदान को सेवकाई के काम के लिये अनिवार्य मानकर उस पर ज़ोर नहीं देते। विद्यार्थियों पर लगभग सहनशक्ति से परे
